Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

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Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

रस्तुत पोस्ट ‘Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya’ में जैन धर्म के 24वें  तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवन से सम्बंधित दो प्रेरक कहानियां शामिल की गयी हैं. ये कहानियां उनके मानवीय मूल्यों के उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करती हैं. आशा है, आपको पसंद आयेंगी.

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

Vardhman  Mahavira Hindi Kahaniya अन्याय है दास प्रथा

महाराजा सिद्धार्थ के पुत्र वर्धमान बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में पले – बढ़े थे. उनका हृदय दुसरे के दुख को देखकर द्रवित हो उठता था. वह यह मानने लगे थे कि प्रत्येक प्राणी में भगवान का निवास है कभी किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए.

राजकुमार युवा हो गए. एक दिन वह अपने मित्रों के साथ उद्दान में भ्रमण करने जा रहे थे. रास्ते में एक धनाढ्य व्यक्ति की हवेली के अंदर से चीखने-चिल्लाने की आवाज आई. रूदन सुनकर राजकुमार के पाँव वहीं ठहर गए. एक मित्र ने कहा, ‘ यहाँ क्यों ठहर गए? इस हवेली से तो प्रतिदिन चीख-पुकार की आवाज आती रहती है. ‘राजकुमार ने पूछा,’कौन चीख-पुकार कर रहा है?

‘मित्र ने बताया,’इस हवेली का मालिक अपने दास को मारता-पीटता है, दास पिटते समय चिल्लाता है, यह सुनकर वर्धमान का हृदय करूणा से भर गया. उन्होंने कहा, ‘क्या मनुष्य मनुष्य का दास हो सकता है? सभी प्राणी समान हैं. सभी में एक जैसी आत्मा होती है.’

मित्र ने बताया, ‘धनाढ्य लोग पैसे के बल पर गरीबों को दास की तरह खरीदते हैं. उनसे काम करते हैं. यह राजकीय व्यवस्था है.’ वर्धमान ने कहा, ‘यह घोर अव्यवस्था है. इस पाप कर्म को बंद किया जाना चाहिए’

राजकुमार वर्धमान वापस लौट आए. कुछ ही दिनों में उन्होंने आदेश जारी करके दास प्रथा को अन्याय व अधर्म घोषित कर दिया.

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya अपना-अपना धर्म

भगवान महावीर जहाँ एक ओर पवित्र आचरण और सेवा-परोपकार के कार्यों को धर्म बताते थे, वहीं कहा करते थे कि वस्तु का सहज स्वभाव ही उसका धर्म है.

एक बार एक व्यक्ति उनके सत्संग के लिए पहुंचा. उसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया था, फिर भी वह यह नहीं जान सका कि धर्म किसे कहना चाहिए. कुछ पंडित कर्मकाण्ड को तो कुछ तीर्थयात्रा करने को धर्म बताते थे. वह जिस संत के पास पहुंचता, उन्हीं से पूछता,’महाराज, धर्म किसे कहा जाता है?’ भगवान महावीर से भी उसने यही प्रश्न किया कि उनके अनुसार धर्म क्या है?

महावीर ने उत्तर दिया,’जो वस्तुओं का सहज स्वभाव है, वही उसका धर्म है. सभी वस्तुओं का अलग-अलग चरम है’ उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा,’आग जलाती है, यह उसका धर्म है पानी नीचे की ओर चला जाता है, यह उसका धर्म है. आदमी जन्मता और मरता है, यह उसकी नियति है- स्वभाव है. अतः जन्म के बाद मृत्यु को स्वभाव मानकर हम मृत्युपरांत कर्तव्य पालन, सेवा-परोपकार के कार्य में निरंतर लगे रहें, तो समझो कि हम अपने धर्म का पालन कर मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं’

जिज्ञासु धर्म का सार समझकर संतुष्ट हो गया.

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