उत्तर प्रदेश की विभिन्न जनजातियां Tribes of Uttar Pradesh UP GK in Hindi

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उत्तर प्रदेश की विभिन्न जनजातियां Tribes of Uttar Pradesh UP GK in Hindi

भारतीय संविधान में आदिवासियों को ‘जनजाति (Tribe)’ से संबोधित किया गया है। उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी, गोंड, खारवाड़, खैरवाड़, पहरिया, बैगा, पंखा, पानिका, अगरिया, पटारी, चेरो, भुइया, भुनिया और थारू आदि जनजातियां निवास करती हैं। इसके अलावा प्रदेश में खरवार व माहीगीर जनजातियां भी यहाँ निवास करती हैं। प्रदेश की मुख्य जनजातियों का विवरण इस प्रकार है: –

थारू जनजाति (Tharu Tribes)

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निवास क्षेत्र

थारू जनजाति उत्तर प्रदेश में गोरखपुर एवं तराई क्षेत्र में निवास करती है।

उत्पत्ति एवं वंश

ये किरात वंश (Kirat Dynasty) के हैं तथा कई उपजातियों में विभाजित हैं। थारू नाम की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों द्वारा अनेक सम्भावनाएँ व्यक्त की गई हैं। कुछ विद्वानों के विचार से ‘थार’ का तात्पर्य है ‘मदिरा’ और ‘थारू’ का अर्थ ‘मदिरापान करने वाला’। चूंकि ये मदिरा का सेवन पानी की तरह करते हैं, अतः थारू कहलाते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि थारू जाति के लोग राजपूताना के ‘थार मरुस्थल से आकर यहाँ बसे हैं’ अतः थारू कहलाते हैं।

शारीरिक गठन

थारू जाति के लोग कद में छोटे, चौडी मुखाकृति और पीले रंग के होते हैं। पुरुषों से स्त्रियाँ कहीं अधिक आकर्षक और सुन्दर होती हैं।

वेशभूषा

थारू पुरुष लंगोटी की भाँति धोती लपेटते हैं और बड़ी चोटी रखते हैं, जो हिन्दुत्व का प्रतीक है। थारू स्त्रियाँ रंगीन लहँगा, ओढ़नी, चोली और बूटेदार कुर्ता पहनती हैं। इन्हें आभूषण प्रिय हैं। शरीर पर गुदना गुदवाना भी इन्हें रुचिकर लगता है।

आवास एवं गृह

थारू जाति के लोग अपना घर मिट्टी और ईंटों का नहीं बनाते हैं। इनके मकान लकड़ी के लट्ठों और नरकुलों के द्वारा बनाये जाते हैं। इनके मकान उत्तर-दक्षिण की ओर होते हैं और द्वार पूर्व की ओर होता है। इनके मकानों में कई कमरे होते हैं। घर में एक पूजाघर भी होता है।

भोजन

थारूओं का भोजन मुख्य रूप से चावल है। मछली, दाल, गाय-भैंस का दूध, दही तथा जंगल से आखेट किये जन्तुओं का माँस भी खाते हैं। ये सूअर और मुर्गी पालते हैं और उनका माँस व अण्डे भी प्रयोग करते हैं। इनके भोजन का समय निर्धारित होता है। समयानुसार उनके अलग-अलग नाम हैं –
जैसे –  कलेवा (प्रातः का नाश्ता), मिझनी (दोपहर का भोजन) और बेरी (शाम का भोजन)।
थारू लोग माँस और मदिरा का खूब प्रयोग करते हैं। मदिरा थारूओं का मुख्य पेय है जिसे वे सभी शुभ अवसरों पर खूब पीते हैं। ये चावल द्वारा निर्मित ‘जाड़’ नामक मदिरा को स्वयं बनाते हैं।

पारिवारिक व्यवस्था

थारू जनजाति में संयुक्त परिवार प्रथा है। नेपाल की तराई में अनेक ऐसे थारू मिलते हैं जिनके पारिवारिक सदस्यों की संख्या पाँच सौ तक होती है। परिवार का वृद्ध व्यक्ति की सम्पूर्ण परिवार का मुखिया होता है जो परिवार के अन्य सदस्यों को उनकी क्षमता के अनुसार कार्य सौंप देता है। फिर वही व्यक्ति उस कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं। कार्यों में एक पखवाड़े के बाद परिवर्तन कर दिया जाता है, जिससे कार्यों के प्रति सरसता बनी रहे। थारू जनजाति में संयुक्त पारिवारिक जीवन की प्रथा है। यहाँ सास-बहू, भाई-बहन, माँ-बेटी, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, ननद-भावज और देवर-भौजाई के उभयपक्षीय अर्थात् कटु एवं मधुर सम्बन्धों का आकर्षक रूप दिखाई देता है।

विवाह प्रथा

थारूओं की विवाह प्रथा अत्यन्त विचित्र है। इनमें वर पक्ष की ओर से किसी मध्यस्थ व्यक्ति द्वारा विवाह की बातचीत चलाई जाती है। अधिकांशतः इन लोगों में विवाह फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में होते हैं, किन्तु कुछ लोगों के विवाह वैशाख में शुक्ल पक्ष में भी होते हैं। थारूओं में अभी तक बदला विवाह अर्थात् बहनों के आदान-प्रदान की प्रथा थी, परन्तु अब कम होती जा रही है। दोनों ओर से जब विवाह तय हो जाता है तो उसे पक्की पोढ़ी कहते हैं। इस समय दोनों पक्षों में एक समझौता होता है जिसके अन्तर्गत वर पक्ष के लोगों को एक निश्चित मात्रा में चावल, दाल इत्यादि वधू पक्ष वालों को उस समय तक देना पड़ता है जब तक कि वर-वधू का विवाह नहीं हो जाता है। थारू लोग अपनी बारातें गाँव के बाहर चप्पेदार खेतों में ठहराते हैं। द्वारचार के समय लइके और लड़की के पिता को एक अंगोछे से बाँध दिया जाता है। फिर बीस तक गिनती पढ़कर छोड़ देते हैं। थारूओं में विधवा विवाह की भी प्रथा है। यदि कोई विवाहित लड़की जिसका गौना न आया हो अथवा उसका पति मर जाए, तो उसका पिता उसे किसी के घर भेज देगा और बिरादरी को एक भोज़ देगा। इस प्रकार के विवाह भोज को लठभरवा भोज कहते है। यदि किसी विवाहित स्त्री का पति, जिसका गौना हो चुका हो, मर जाता है तो उस लड़की के ससुराल वाले किसी युवक को खोजकर लाते हैं और घर के बाहर लड़की को लड़के और लड़के को लड़की की पोशाक पहना देते हैं। तदुपरान्त लड़की आगे-आगे तथा लड़का उसके पीछे-पीछे अपने मकान में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी के रूप में जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

धर्म

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थारू हिन्दू धर्म को मानते हैं। इनके अनेक देवी-देवता होते हैं। ये भूत-प्रेत और जादू-टोना इत्यादि में विश्वास करते हैं। ये देवी काली को अधिक मानते हैं। भैरव और महादेव भी इनके आराध्य देव हैं। इनका शिवलिंग पत्थर का न होकर बाँस का होता है। ये राम-कृष्ण की भी पूजा करते हैं। थारूओं के अनेक छोटे-छोटे देवी-देवता भी होते हैं। ये पीपल की पूजा करते हैं। इनके अतिरिक्त ये कहीं-कहीं गाय, बन्दर एवं साँप की भी पूजा करते हैं।

त्योहार एवं पर्व

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थारू जनजाति के लोग हिन्दुओं के सभी त्योहार मनाते हैं। मकर संक्रांति, होली, कन्हैया अष्टमी (जन्माष्टमी), दशहरा और बजहर थारूओं के मुख्य त्योहार हैं। होली के दिनों में स्त्री-पुरुष दोनों ही मदिरा पीकर गाते हैं तथा साथ-साथ नशे में मस्त होकर नृत्य करते हैं। होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा से आठ दिनों तक लगातार मनाया जाता है। इस पर्व के अवसर पर रंग-अबीर का खुलकर प्रयोग होता है। बजहर नामक त्योहार ज्येष्ठ अथवा वैशाख के दिनों में होता है। उस दिन गाँव की समस्त स्त्रियाँ गाँव छोड़कर खाना बनाने के आवश्यक सामान के साथ समीप के किसी ऐसे स्थान पर चली जाती हैं जहाँ पीपल अथवा बरगद का पेड़ होता है। उस स्थान पर वे सभी खाना बनाती हैं। इसके बाद भोजन कर पूजा-पाठ और नृत्य संगीत आदि का कार्यक्रम होता है। पुरुष भी वहीं पर भोजन इत्यादि करते हैं, लेकिन रात्रि के समय उनका वहाँ रहना वर्जित होता है जबकि स्त्रियाँ रात्रि में वहीं रहती हैं।

मकर संक्रान्ति और दशहरा का पर्व थारू लोग बडे उल्लास से मनाते हैं। मकर संक्रांति को प्रातः जल्दी सोकर उठते हैं तथा नदी या तालाब में स्नान आदि कर एक-दूसरे को प्रणाम करते हैं। दान-पुण्य आदि भी किया जाता है। इस दिन थारू खिचड़ी खाते हैं तथा शराब क़ा उसके साथ सेवन करते हैं। रात्रि में नृत्य आदि होता है। दशहरा का पर्व कुछ क्षेत्रों में क्वार माह में मनाया जाता है। दूज के दिन ये लोग मकई और जौं मिलाकर किसी मिट्टी के बर्तन में बोकर रख देते हैं। जब वह उग आता है। तब अष्टमी के दिन देवताओं पर चढ़ाते हैं तथा नवमी के दिन जानवरों को खिलाते हैं। तदुपरान्त इन जानवरों की बलि दी जाती है। बलि का गोश्त थारू लोग अपने परिचितों व रिश्तेदारों में बाँटते हैं। सभी लोग मिलजुल कर गाना-बजाना एवं नृत्य करते हैं तथा शराब पीते हैं।

अर्थव्यवस्था

थारूओं की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। ये लोग मुख्यतः धान की खेती करते हैं, इसके अतिरिक्त दालें, तिलहन तथा गेहूँ की भी कृषि करते हैं। प्रत्येक थारू परिवार सब्जियाँ स्वयं उगाता है। सब्जियों में आलू, बैंगन, सेम, चिचिन्डा, भिण्डी, अरई, गोभी, मूली, शलजम, टमाटर, प्याज, लहसुन आदि प्रमुख हैं।

इनके अन्य व्यवसायों में पशुपालन, लकड़ी ढुलाई, लकड़ी कटाई, शिकार, वन्य भूमियों से लकड़ी, जड़ी-बूटी, फल-फूल एकत्र करना आदि कुटीर उद्योग हैं। शिक्षित थारू सरकारी नौकरियाँ भी करने लगे हैं। भारत तथा उत्तर प्रदेश सरकार थारू जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान हेतु निरन्तर प्रत्यनशील हैं। इस हेतु अनेक योजनाओं को भी शुरू किया गया है। लखीमपुर जनपद में एक महाविद्यालय थारू जनजाति के लड़के-लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने हेतु स्थापित किया गया है। जहाँ पर बड़ी संख्या में ये शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और उच्च सरकारी पदों पर कार्य कर रहे हैं। शिक्षा के प्रसार से इस जनजाति के लोगों में सांस्कृतिक चेतना आयी है तथा इनका जीवन सुधर रहा है।

बुक्सा जनजाति (Buksa Tribe)

निवास

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बुक्सा अथवा भोक्सा जनजाति उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियों में निवास करती है।

उत्पत्ति व शारीरिक गठन

अधिकांश लोगों का मत है कि बुक्सा जनजाति पतवार राजपूत घरानों से सम्बन्ध रखती है। कुछ विद्वानों ने इन्हें मराठों द्वारा भगाये जाने के बाद यहाँ आकर बसा माना हैं । बुक्सा जनजाति के लोगों का कद और आँखें छोटी होती हैं। उनकी पलकें भारी, चेहरा चौड़ा एवं नाक चपटी होती है। कुल मिलाकर इनका सम्पूर्ण चेहरा ही चौड़ा दिखाई देता है। जबड़े मोटे और निकले हुए तथा दाढ़ी और मूंछे धनी और बड़ी होती हैं। स्त्रियों में गोल चेहरा, गेहुँआ रंग तथा मंगोल नाकनक्श स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं। पुरुषों में श्याम वर्ण के लोग मिलते हैं जिनके शारीरिक लक्षण हिन्दुओं की नीची जाति के लोगों से मिलते है।

भाषा

बुक्सा लोग प्रमुख रूप से हिन्दी भाषा बोलते हैं। इनमें जो लोग लिखना-पढ़ना जानते हैं वे देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं।

भोजन

इनका मुख्य भोजन मछली व चावल है। इसके अलावा ये लोग मक्का व गेहूँ की रोटी और दूध-दही का प्रयोग करते हैं। इन लोगों में बन्दर, गाय और मोर का माँस खाना वर्जित होता हैं। मद्यपान पुरुषों की सामान्य आदत है।

वेशभूषा

बुक्सा पुरुषों की वेशभूषा में धोती, कुर्ता, सदरी और सिर पर पगड़ी धारण करते हैं। नगरों में रहने वाले पुरुष गाँधी टोपी, कोट, ढीली पेन्ट और चमड़े के जूते, चप्पल आदि पहनते हैं। स्त्रियाँ पहले गहरे लाल, नीले या काले रंग की छींट का ढीला लहंगा पहनती थीं और चोली (अंगिया) के साथ ओढ़नी (चुनरी) सिर पर पहनती थीं, लेकिन अब स्त्रियों में साड़ी, ब्लाउज, स्वेटर एवं कार्कीगन का प्रचलन सामान्य हो गया है। ये राजस्थानी मेवाड़ी राजपूतों के समान सिर पर ‘इडरी के द्वारा ऊँचा जूड़ा बाँधती हैं जिसके ऊपर उनकी रंगीन ओढ़नी एक विशेष प्रकार से पड़ी होती है। हिन्दी फिल्मों की नकल कर लड़कियाँ अब केश सज्जा में नयी-नयी शैलियों का प्रयोग करने लगी हैं। विवाहित स्त्रियाँ हिन्दू उच्च जाति की स्त्रियों की भाँति माथे पर सिन्दूर की गोल बिन्दी अवश्य लगाती हैं और हाथों में काँच की चूड़ियाँ पहनती हैं।

सामाजिक संरचनाup gk in hindi 2018

बुक्सा जनजाति चार सामाजिक वर्गों में बँटी हैबुक्सा ब्राह्मण समाज में सबसे ऊँचा स्थान रखते हैं। उसके बाद क्रमशः क्षत्रीय बुक्सा,  अहीर बुक्सा और नाई बुक्सा का स्थान है। हिन्दू जातियों के समान ही ये अन्तर्विवाही समूह के होते हैं, परन्तु हिन्दू समाज से भिन्न होते हैं, क्योंकि बुक्सा समाज में विवाह एक अनुबन्ध मात्र होता है। जो पति-पत्नी में से कोई भी किसी समय भंग कर सकता है। गाँव में प्रत्येक जाति के बक्सा बिना किसी भेद-भाव के एक साथ रहते हैं तथा गाँव में सहयोग और भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।  ‘गोत’ अथवा ‘गोथ’ (गोत्र) बुक्सा समाज की व्यावहारिक मूल सामाजिक इकाई है। इलियर ने बुक्सा समाज को 15 गोत्रों में विभाजित किया है

विवाह

बुक्सा लोगों में भी हिन्दुओं के समान ही अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह भी प्रचलित हैं, साथ ही अन्तर्जातीय विवाह अधिकांशतः होते हैं। परिवार तथा विवाह का रूप हिन्दू समाज के समान है। अधिकांश संयुक्त तथा विस्तृत परिवार है। साथ ही, केन्द्रीय परिवार भी हैं अब धीरे-धीरे उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है। परिवार पितृसत्तात्मक पितृवंशीय हैं। इन लोगों में हिन्दू समाज की ही भाँति पत्नी विवाह के उपरान्त पति के घर जाकर रहती है। वर्तमान में इनमें घर जमाई व्यवस्था बढ़ रही हैं। इनमें बहपत्नी प्रथा प्रचलित है। बहुपति प्रथा नहीं है। विधवा विवाह प्रचलित है। तलाक सरलता से हो जाता है। पूर्व वैवाहिक तथा अतिरिक्त वैवाहिक यौन सम्बन्धों में वृद्धि हो रही है। व्यक्तिवादी विचारधारा विकसित हो रही है जो नई चेतना, नई शिक्षा, जागृति तथा सामुदायिक विकास का परिणाम है।

धर्म

बुक्सा आदिवासियों में धर्म का पारम्परिक रूप हिन्दू धर्म का ही प्रतिरूप है। ये लोग महादेव, काली माई, दुर्गालक्ष्मी, राम, कृष्ण की पूजा करते हैं। काशीपुर (उत्तराखंड) की चौमुण्डा देवी सबसे बड़ी देवी मानी जाती है। इनके व्रत व त्योहार हिन्दुओं के समान ही होते हैं। होली, दीवाली, दशहरा, जन्माष्टमी प्रमुख त्योहार हैं। ग्रामदेवी की पूजा पवित्र ‘थान पर गाँव के बाहर होती है। प्रकृति पूजा जीव का रूप भी हिन्दू धर्म के समान होता है। उसके साथ-साथ जन्म से मृत्यु तक के प्रमुख संस्कार हिन्दुओं के समान होते हैं।

राजनीतिक संगठन

बुक्सा जनजाति में बिरादरी पंचायत एक मुख्य आदिवासी राजनीतिक संगठन है जो बुक्सा समाज में न्याय एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तरदायी है। बिरादरी पंचायत चार स्तरों में बँटी है। जिसमें सर्वोच्च अधिकारी तखत मुंसिफ, दरोगा और सिपाही नामक चार स्तर सम्मिलित हैं। इन सभी के अधिकारी वंशगत होते हैं और इन्हें समाज में बड़े सम्मान से देखा जाता है।

गाँव की पंचायत में तीन स्तर होते हैं। सरपंच, ग्राम पंचायत का सभापति और मुखिया। ये क्रमशः न्याय पंचायत अध्यक्ष, ग्राम पंचायत अध्यक्ष और गाँव का मुखिया होता है। ये सभी ग्राम प्रशासन के लिए कटिबद्ध होते हैं।

अर्थव्यवस्था

बुक्सा आदिवासियों के गाँव प्रायः उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र को भाबर के नाम से भी जाना जाता है। यह क्षेत्र हरा-भरा, उपजाऊ भूमि और स्वास्थ्यकर जलवायु का क्षेत्र है। यहाँ बुक्सा लोग धान की खेती करते हैं। इसके साथ-साथ गन्ना, मक्का, गेहूँ, चना तथा लाहा (सरसों) भी उगाते हैं। कृषि के अतिरिक्त बुक्सा जनजाति के लोग गाय, भैंस, बकरी पालते हैं जिनका दूध भी प्रयोग किया जाता है। ये लोग नौकरी करना पसन्द नहीं करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति कृषि कार्य, लकड़ी, लोहे का काम, मकान बनाना, इलिया बुनना, मछली पकड़ने के जाल बुनना, बर्तन बनाना जानता है, परन्तु उनकी यह आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। केन्द्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा जनजातियों के आर्थिक उत्थान हेतु चलाई गई विभिन्न योजनाओं से इनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

माहीगीर जनजाति (Mahigeer Tribal)

निवास क्षेत्र

माहीगीर आदिवासी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद क्षेत्र में निवास करते हैं। ये लोग नजीबाबाद के अलावा सहारनपुर, जलालाबाद, किरतपुर, मनेरा, मंडवार और धारानगर में भी निवास करते है।

उत्पत्ति

माहीगीर जनजाति मछुआरे हैं तथा उन्हीं से अपना सम्बन्ध बताते हैं। महाभारत में भी इस जनजाति के होने का उल्लेख मिलता है। भाषा व बोली-माहीगीर आदिवासी एक विशेष प्रकार की बोली बोलते हैं। जो खड़ी बोली से मिलती-जुलती है। इन लोगों में शिक्षा का प्रसार बहुत कम हुआ है।

धर्म

इस जनजाति के लोगों ने इस्लाम धर्म को अपना लिया है। मस्जिदों का उपयोग नमाज पढ़ने के लिए करते हैं। इन लोगों में सामाजिक भेद-भाव तथा ऊँच-नीच कम पायी जाती है।

विवाह

माहीगीर जनजाति अपने ही समुदाय में विवाह करती है। विवाह के रीति-रिवाज़ मुस्लिम तौर-तरीके से सम्पन्न होते हैं

भोजन

राजी आदिवासी मुख्य रूप से जंगली जानवरों का शिकार कर उनके माँस का प्रयोग भोजन हेतु करते हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों का छुआ हुआ भोजन नहीं करते हैं। इनके परिवार के सभी सदस्य चौके (रसोई) में एक साथ भोजन करते हैं तथा साथ-साथ स्प्रिट का प्रयोग शराब के रूप में करते हैं।

अर्थव्यवस्था

इस जनजाति का मख्य व्यवसाय मछली पकड़ना है। हालांकि, परम्परागत साधनों से मत्स्य आखेट के कारण इनकी स्थिति काफी दयनीय है। इस कारण कुछ लोग मजदूरी व रिक्शा चलाने का भी कार्य करते हैं। यह कृषक श्रमिक के रूप में भी काम करते हैं। माहीगीर जनजाति के अधिकांश सदस्य एक ही कार्य करते हैं। हालांकि, माहीगीर मछुआरों का जीवन व्यतीत करते हैं। फिर भी इन्हें अपने

आपको मछुआरे कहलाने पर आपत्ति होती है। ये नगरों के पास स्थित तालाबों में मछली पकड़ने का काम करते हैं, लेकिन अब नगरों का विकास होने के कारण तालाबों के नष्ट हो जाने से इन लोगों का मछली पकड़ने का अधिकार भी लगभग समाप्त हो गया है। इस कारण इनकी आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई है।

सामाजिक व्यवस्था

माहीगीर जनजाति का सामाजिक संगठन अति सरल है। ये लोग संगठित समाज के रूप में रहते हैं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ये स्वयं साधन उपलब्ध करते हैं। अपराध करने की प्रवृत्ति इन लोगों में कम पायी जाती है। इनके समाज में पंचायतों का प्रचलन है। नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत की इकाइयाँ होती हैं जिसमें बादशाह तथा वजीर विभिन्न मामलों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बादशाह और वजीर के पद वंशानुक्रम से – प्राप्त होते है। पंचायत में निर्णय सर्वसम्मति से किये जाते हैं जिसका सभी आदर करते हैं।

इस जनजाति में शिक्षा का काफी अभाव है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी आधुनिक उपचारों को अपनाने में कठिनाई अनुभव करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार एवं विभिन्न समाजसेवी संस्थाएँ इनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

खरवार जनजाति (Kharwar Tribe)

निवास क्षेत्र

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में खरवार जनजाति निवास करती है। इनका मूल क्षेत्र बिहार का पलामू और अठारह हजारी क्षेत्र है। खरवार 11वीं एवं 12वीं शताब्दी में अपने पूर्ण वैभव को प्राप्त थे। इनका पतन मिर्जापुर के दक्षिणी भाग में चन्देल राजाओं द्वारा सन् 1203 ई० में किये गये आक्रमणों के उपरान्त हुआ।

उत्पत्ति

खरवार आरम्भ में एक शिकारी जनजाति थी। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि खरवार कत्थे का व्यापार करते थे जबकि, कुछ लोग इन्हें बिहार में सोन घाटी क्षेत्र का शासक मानते हैं। वर्तमान में इस जाति के लोगों की आर्थिक दशा काफी खराब है। इस कारण इन्हें जनजातियों की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। इनकी उपजातियों में सूरजवंशी, पटबन्दी, दौलतबन्दी, खेरी, राउत, मौगती, मोझयाली, गो आर्मिया आदि हैं। ये शरीर में खूखार व बलिष्ठ होते हैं। इनकी स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति हिम्मती एवं बहादुर होती हैं।

भाषा तथा बोली

विभिन्न स्थानों पर रहने वाले खरवारों की भाषा व बोली पर स्थानीयता का प्रभाव परिलक्षित होता है। इनकी वाणी में कर्कशता अधिक देखी जाती है तथा किसी शब्द का उच्चारण खींच कर करते है। प्रमुख रूप से खरवार जनजाति के लोग अनुनासिक ध्वनियों का प्रयोग अधिक करते हैं जिसमें ‘रे’, ‘तोर’, ‘मोर’, ‘केकर’, ‘ओकर आदि शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है।

वेशभूषा

खरवार जाति के लोग साधारणतः टेहुन तक धोती, बंडी एवं सिर पर पगड़ी पहनते हैं तथा स्त्रियाँ साड़ी पहनती हैं। इनके आभूषणों में हैकल, हँसुली, बाजूबन्द, कड़ा, नथिनी, बरेखा, गुरिया या नँगा की माला आदि मुख्य हैं।

धर्म

खरवार जनजाति मुख्यतः हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों का पालन करती है। ये लोग बघउस, घमसान, वनसन्ती, दूल्हादेव, गोरइया, शिव, दुर्गा, हनुमान आदि देवी देवताओं के अलावा वृक्षों में सेमल, पीपल, नीम तथा जन्तुओं में नाग, बिच्छू आदि की पूजा करते हैं। इनकी स्त्रियाँ टोना करने में बड़ी दक्ष होती हैं।

पर्व

खरवार जीवितपुत्रिका (जिउतिया), अनन्त चतुर्दशी, नवरात्रि, होली आदि पर्व हर्षोल्लास से मनाते हैं तथा इन पर्वो पर नाचते-गाते एवं करमा का आयोजन करते हैं। इन अवसरों पर मदिरापान भी विशेष रूप से किया जाता है।

भोजन

खरवार जनजाति के लोग माँसाहारी और शाकाहारी दोनों प्रकार के होते हैं। मुख्यतः गेहूँ व चावल का प्रयोग भोजन में करते हैं, लेकिन उत्सवों के अवसर पर पशुओं का माँस खाते हैं तथा मदिरापान भी करते हैं। शेर, भालू, चीता, सूअर आदि का शिकार कर माँस खाते हैं।

अर्थव्यवस्था

प्रारम्भ में खरवार जनजाति के लोग जंगलों पर आश्रित थे, लेकिन प्रदेश सरकार की वनों की विशेष सुरक्षा की नीति के कारण अब इनके लिए वनों की लकड़ी काटना निषेध कर दिया गया है। अब ये लोग जंगल में दातून, पत्ता, लकड़ी तक नहीं काट पाते हैं। वर्तमान में न तो इनके पास कृषि भूमि है और न ही कोई उद्योग-धन्धा, अतः इन्हें मजबूर होकर भिक्षाटन के लिए निकलना पड़ता है। कुछ स्थानों पर इन्हें बंधुआ मजदूरों का भी जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। फलस्वरूप इनमें शिक्षा भी नाममात्र को ही पायी जाती है, क्योंकि अपनी गरीबी के कारण ये अपने बच्चों को विद्यालयों में भेज ही नहीं पाते हैं। इनके बच्चे गाय-बैल चराने, बीडी-पत्ता तोड़ने एवं लकड़ी काटने का काम करते हैं। सदियों से शोषित रहने के कारण खरवार जनजाति की आर्थिक दशा और भी दयनीय हो गयी है। सरकार इनके आर्थिक स्तर को सुधारने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही है।

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