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गड़बड़ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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गड़बड़ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक थी नीना। थोड़ी भोली, थोड़ी-सी बुद्धू और थोड़ी-थोड़ी पगली।

एक दिन वह घर में किसी को बिना बताए जंगल में घूमने गई। उसे छोटे-छोटे खरगोश बहुत अच्छे लगते थे। थोड़ी-देर खेलने के बाद वह थक गई। जंगल में एक छोटी-सी नदी थी।

नीना नदी के किनारे पर आकर बैठ गई। उसने पानी में अपनी परछाई देखी और बोली वह नीना, तुम कितनी प्यारी हो। अपने-आपसे बातें करते-करते वह सो गई।

उसे पता ही नहीं चला की वह कहाँ सो रही है। जब उसकी नींद खुली तो अँधेरा हो गया था।

उसने पानी में झाँका। वहां कोई परछाई ही दिखाई नहीं दी। उसने फिर देखा, पर अँधेरे के आलावा कुछ नजर नहीं आया। वह घबराकर बोली, अरे मेरी परछाई पानी में दिखाई नहीं दे रही है, इसका मतलब क्या हुआ ? मैं यहां हूँ भी या नहीं ?

उसने सोचा कि वह घर जाकर पता करेगी।

अपने घर पहुंचकर उसने बाहर से आवाज लगाई, नीना घर पर है क्या ?

नीना किसी को भी बताकर नहीं गई थी। इसलिए उसकी मम्मी को पता नहीं था कि वह कहाँ है। उसकी मम्मी बोली अपने कमरे में सो रही होगी।

तन बाहर खड़ी नीना ने सोचा, अगर नीना घर में सो रही है तो मैं कौन हूँ ?

इसका मतलब है मैं नीना नहीं हूँ……… हे भगवान, कौन हूँ मैं…… कौन हूँ….. कौन हूँ ?

ऐसा कहते-कहते नीना वापिस जाने लगी। वह तो अच्छा हुआ कि तभी नीना की मम्मी ने दरवाजा खोलकर देखा। वह बोली, अरे नीना, तू बाहर क्यों खड़ी है ? बिना बताए तू कहाँ गई थी। मई तो सोच रही थी तू अपने कमरे में है।

नीना ने देखा माँ उसे पहचानकर अपने पास बुला रही है। तब उसकी जान-में-जान आई। अगर माँ बाहर न आती तो क्या होता ?

नीना को कौन बताता कि वह कौन है ? हो जाती न गड़बड़।

गड़बड़ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

देखो गुस्सा न करना | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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देखो गुस्सा न करना | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

सूरज और हवा एक दिन अपनी बहादुरी की कहानियाँ सूना रहे थे।

सूरज कहता था कि वह ज्यादा ताकतवर है हवा कहती थी कि वह ज्यादा शक्तिशाली है।

दोनों ने तय किया कि वे एक प्रतियोगिया करेंगे। दोनों एक बड़े से मैदान की ओर मुहँ करके खड़े हो गए। उन्होंने निश्चय किया कि इस मैदान से होकर जो पहला यात्री जाएगा, उस पर ध्यान देना है।

हवा और सूरज में से जो उस यात्री को कपड़े उतरने के लिए मजबूर कर देगा व्ही ज्यादा ताकतवर होगा।

तभी उस मैदान में एक व्यक्ति आता दिखाई दिया। हवा ने कहा कि पहले वह कोशिश करेगी। उसे विश्वास था कि वह जरूर जीतेगी।

हवा ने जोर से चलना शुरू किया। उस व्यक्ति के कपड़े उड़ने लगे। उसको चलना मुश्किल होने लगा। लेकिन उसके कपड़े जितना उड़ने की कोशिश करते थे, उतना ही वह उन्हें और कसकर अपने शरीर पर बाँध लेता था। यह देखकर हवा को गुस्सा आने लगा।

वह इतनी जोर से बही कि तूफान-सा आने लगा। अपनी सुरक्षा के लिए वह व्यक्ति एक कोने में खड़ा हो गया। आखिर हवा थक कर चूर हो गई। लेकिन वह उस व्यक्ति का एक भी कपड़ा नहीं उतरवा पाई।

हवा के झोंके रुके तो वह व्यक्ति फिर से आगे बढ़ा।

उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अचानक सूरज तेजी से चमकने लगा था और गर्मी बढ़ने लगी थी।

बात यह थी कि अब सूरज की बारी थी अपनी कोशिश करने की।

सूरज ने न तो गुस्सा किया और न ही ज्यादा ताकत लगाई। बस आराम से चमकता रहा। आखिर उस व्यक्ति को गर्मी लगने लगी। गर्मी से परेशान होकर उसने अपने कपड़े उतारे।

पास में ही एक नदी बहती थी। नहाने के लिए वह नदी की ओर चला गया।

सूरज जीत गया। हवा समझ गई कि क्रोध करने से कुछ नहीं होता। बीएस शांत रहकर अपना काम करना चाहिए। जो काम शांत स्वभाव वाले कर सकते हैं, वही काम क्रोधी व्यक्ति के लिए कर पाना मुश्किल होता है।

देखो गुस्सा न करना | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

माँ-पापा का कहना मानो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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माँ-पापा का कहना मानो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

सर्दियों का मौसम था। नन्हे खरगोश के घर को चारों ओर घास-फूस लगाकर गर्म रखा जाता था।

रात होने वाली थी। नन्हे खरगोश के मम्मी-पापा ने उससे कहा, आ जाओ नन्हे, सो जाओ। रात होने वाली है और बाहर ठंड भी बहुत है।

लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही। मुझे बाहर जाकर खेलना है। नन्हे ने कहा।

बेटा, कल सुबह खेल लेना। रात में बाहर जाओगे तो बीमार हो जाओगे।

मम्मी ने उसे समझाया। मम्मी की बात मानकर नन्हे आकर लेट गया।

लेकिन उसे जरा भी नींद नहीं आ रही थी। वह थोड़ी देर लेटा। फिर मम्मी-पापा से छिपकर बाहर आ गया और जंगल में घूमने निकल पड़ा।

वह चलता जा रहा था। इस तरह कभी भी वह जंगल की ओर नहीं आया था।

लेकिन वह रास्ता ध्यान से देख रहा था। मिट्टी में उसके पाँवों के छोटे-छोटे निशान बनते जा रहे थे।

इनकी मदद से मैं घर वापिस पहुँच जाऊँगा, उसने सोचा।

वह काफी दूर आ गया था। तभी जोर से आँधी चलने लगा। वापिस जाने का रास्ता उसके पाँवों के वो निशान ही बता सकते थे।

लेकिन तेज आँधी ने इतनी धूल उड़ाई थी कि निशान मिट गए थे। वह घबराकर इधर-उधर भागने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा थी कि क्या करे ?

नन्हे बहुत दर गया था। दौड़ते-दौड़ते उसने यह भी नहीं देखा कि आगे तालाब है।

और फिर छपाक से तालाब में गिर गया। वह मदद के लिए चिल्लाने लगा।

एक हिरण और उसका बच्चा वहाँ से जा रहे थे। उन्होंने नन्हे खरगोश को मुश्किल में देखा तो रुक गए। उन्होंने किसी तरह खरगोश को बाहर निकाला।

वह ठंड से काँप रहा था। हिरन जल्दी से नन्हे को अपने घर ले गया।

घर जाकर हिरण की मम्मी ने उसे अपनी गोद में लपेट लिया और दूध पीने को दिया। अब नन्हे को अच्छा लग रहा था।

लेकिन उसको अब घर की याद आने लगी थी।

हिरन ने उससे घर के बारे में पूछा तो नन्हे ने बताया कि उसे ठीक से पता नहीं है।

इधर नन्हे की मम्मी-पापा परेशान थे कि नन्हे कहाँ गया।

वे उसे ढूंढने निकल पड़े।

हिरन भी नन्हे को लेकर जंगल में निकला। रस्ते में ही नन्हे के मम्मी-पापा उसे दूर से आते हुए दिखाई दिए।

वे दौड़कर नन्हे के पास आए और उसे गले से लगा लिया।

कहाँ चले गए थे तुम ? मम्मी रो रही थी।

ऐसे बिना बताए थोड़े ही जाते हैं। पापा बोले।

नन्हे ने उनसे माफी माँगी।

नन्हे के मम्मी-पापा ने हिरण को धन्यवाद दिया और नन्हे को साथ घर की ओर चल दिए।

माँ-पापा का कहना मानो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

कुत्ते का एक छोटा-सा पिल्ला अपने माता-पिता के साथ जंगल के पास रहता था।

एक दिन उसके माता-पिता खाना ढूंढने के लिए निकले। शाम होने लगी लेकिन वे वापिस नहीं आए।

पिल्ले को डर लगने लगा। बाद में पता चला कि किसी किसी गाड़ी से टकराकर दोनों की मृत्यु हो गई थी।

पिल्ले को बहुत रोना आया। उसे मम्मी -पापा की याद आ रही थी। रोता-रोता वह जंगल की ओर चल पड़ा।

तभी उसे एक हिरन मिला। हिरन को उस पर दया आ गई और वह पिल्ले को अपने साथ ले गया।

रात हुई तो उसने पिल्ले को सोने के लिए जगह दी। लेकिन पिल्ले को नींद नहीं आ रही थी। हर छोटी -सी आवाज पर वह बाहर निकलकर भौंकने लगता था।

हिरन को इस बात पर गुस्सा आया। उसने कहा, अगर तुम ऐसे ही बार-बार बाहर जाकर भौंकोगे तो शेर को पता हमारे बारे में पता चल जाएगा।

वह आकर हम दोनों को मार देगा। पिल्ला चुप तो हो गया लेकिन उसके मन में एक हु विचार आ रहा था, हिरन शेर से डरता है, इसलिए मुझे शेर के ही पास रहना चाहिए।

अगले दिन वह शेर के पास पहुँचा। उसने शेर को अपनी कहानी सुनाई। उसने शेर से प्रार्थना की कि वह उसे अपने साथ रहने दे।

शेर को पिल्ले पर दया आ गई। वह राजी हो गया।

रात को फिर वही हुआ। पिल्ला बार-बार भौंकने लगता था। शेर को गुस्सा आ गया।

वह जोर से दहाड़कर बोला, अगर तुम इस तरह भौंकोगे तो मनुष्य को हमारे बारे में पता चल जाएगा।

वह चुपके से आकर हम दोनों को पकड़ लेगा।

पिल्ले को आश्चर्य हुआ कि शेर भी किसी से डरता है। लेकिन उसने तय किया कि वह अगले ही दिन मनुष्य के पास जाएगा।

सुबह होते ही वह शहर की ओर चल पड़ा। उसे जो पहला मनुष्य मिला वह उससे बोला, मैं अकेला हूँ, क्या आप मुझे अपने साथ रहने देंगे ?

मनुष्य ने जब उसके माता-पिता के बारे में सुना तो उसे पिल्ले पर दया आ गई।

वह पिल्ले को अपने घर ले गया। रात हुई और पिल्ला अपनी आदत के अनुसार बाहर जाकर भौंकने लगा।

लेकिन मनुष्य नाराज नहीं हुआ।

बल्कि वह खुश हुआ। वह अब निश्चिंत था कि यदि कोई चोर उसके घर में आएगा तो कुत्ते से डरकर भाग जाएगा साथ ही कुछ गड़बड़ होगी तो कुत्ता भौंकेगा और उसकी नींद भी खुल जाएगी।

इस तरह मनुष्य और कुत्ता दोस्त बन गए। यह दोस्ती आज भी वैसी ही चल रही है।

मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

जब सोना को दो-दो दिखाई देने लगे | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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जब सोना को दो-दो दिखाई देने लगे | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक दिन सोना जब सोकर उठी तो उसे थोड़ा धुँधला-सा दिखाई दे रहा था।

उसने अपनी आँखे को अच्छी तरह धोया। तब यह धुँधलापन कुछ कम हुआ। लेकिन उसे लग रहा था कि आँखों में कुछ हो गया है।

वह स्कूल जाने के लिए तैयार हुई।

नाश्ता करने के लिए जब वह खाने की मेज पर आकर बैठी तो एक अजीब बात हुई। सामने दूध का गिलास लिए हुए दो मम्मियाँ खड़ी थी।

उसने अपनी आँखों को मला। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। वह दूध पीकर जल्दी से दौड़ गई।

स्कूल में सब कुछ ठीक-ठाक था। सोना ने चैन की साँस ली। गणित की क्लास में उसकी दोस्त रूपा ने उससे कहा, सोना, मेरी नोटबुक दे दो।

तुम कल घर ले गई थी न! मुझे काम करना है, लाओ दे दो।

सोना को अचानक ध्यान आया कि वह तो रूपा की नोटबुक लाना भूल गई है।

वह बोली, रूपा मैं नोटबुक कल दूँगी। मेरा काम अभी बाकी है।

लेकिन अब मैं क्या करूँ ? रूपा परेशान होकर बोली।

अरे भूल गई तो मैं क्या करूँ ? सोना बेफिक्री से बोली।

लेकिन तुम्हें ध्यान रखना चाहिए था न सोना ! रूपा फिर भी धीरे से ही बोल रही थी।

गलती सोना की थी। लेकिन वह ही रूपा पर गुस्सा करने लगी, रूपा क्या तुम एक दिन पेपर पर काम नहीं कर सकती ? ऐसे कह रही हो जैसे मैं तुम्हारी नोटबुक कभी दूँगी ही नहीं।

काम पूरा हो जाएगा तो दे दूँगी न ! वह मुँह बनाकर बोली।

रूपा बेचारी ने एक पेपर पर काम उतार लिया। तभी खाने की छुट्टी हो गई। सोना और रूपा खाने का डिब्बा लेकर बाहर आकर बैठीं।

सोना ने देखा कि रूपा बिलकुल शांत थी। रूपा उसकी बहुत प्यारी दोस्त थी। उसने पूछा, नाराज हो गई क्या ?

नहीं, रूपा ने मुस्कुराकर कहा।

तभी सोना के साथ फिर वही अजीब बात हुई। सामने दो रूपा दिखाई देने लगी। ये क्या हो गया दोबारा से ? उसने सोचा।

सोना ने ध्यान से देखा। दोनों रूपा में एक अंतर था। एक रूपा मुस्कुरा रही थी, लेकिन दूसरी दुखी थी।

उसे समझ नहीं आया कि इसका क्या मतलब है ?

छुट्टी के बाद वह घर आ गई। आकर तुरंत टी. वि. खोला और कार्टून देखने बैठ गई। मम्मी ने कहा, बेटा पहले कपड़े बदलो। हाथ-मुहँ धोकर दूध पी लो।

लेकिन सोना को जैसे सुनाई ही नहीं दिया।

मम्मी फिर बोली, सोना, बेटा कार्टून बाद में देखना। अभी उठो और कपड़े बदलो।

जब सोना ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया तो उन्हें बहुत गुस्सा आ गया। वो डाँटकर बोली, सोना उठो।

सोना चौंक गई। नाराजगी से मुहँ बनाकर अपने कमरे में गई।

कपड़े बदलकर दूध पिने आ गई। तभी रूपा का फोन आया। मम्मी ने फोन उठाया।

रूपा बोली, आंटी नमस्ते। मैंने सोना को यह याद दिलाने के लिए फोन किया था कि आज वह गणित का काम जरूर पूरा कर ले।

आज वह मेरी नोटबुक लाना भूल गई थी। आप उससे कह दीजिएगा। मम्मी को बड़ा गुस्सा आया।

वे सोना पर गुस्सा होने लगी, सोना मैंने तुमसे हजार बार कहा है कि अपना स्कूल बैग रात को ही लगा लिया करो।

रूपा की नोटबुक भूल गई थी न, और गणित का काम पूरा क्यों नहीं किया ? बोलो।

सोना पहले से नाराज थी। मम्मी ने दोबारा डाँटा तो उसे रोना आ गया।

वह बोली आप मुझे हमेशा डाँटती ही रहती हैं। आप मुझे बिलकुल प्यार नहीं करती।

उसने मम्मी की ओर देखा तो फिर वही हुआ। एक की जगह फिर दो मम्मियाँ सामने थी।

सोना ने आँसू भरी आँखों से देखा – एक के चेहरे पर गुस्सा था और दूसरी के चेहरे पर ढेर सारा प्यार था।

वे इसलिए गुस्सा थी क्योंकि वे उसकी भलाई चाहती थी। उसे याद आया की स्कूल में रूपा के दो चेहरों में से भी एक मुस्कुरा रहा था और दूसरा दुखी था।

मतलब मैंने जो कुछ रूपा से कहा, उसके कारण उसका मन बहुत दुखी हुआ होगा। सोना ने सोचा।

वह फौरन उठकर मम्मी के पास आई और उनसे माफी माँगी मम्मी ने प्यार से उसे गले से लगा लिया।

फिर उसने रूपा को फोन किया और उससे भी अपनी गलती के लिए सॉरी कहा।

रूपा खुश थी कि सोना को उसकी गलती समझ आ गई थी।

सोना ने जल्दी से दूध पिया और रूपा की नोटबुक से गणित का काम पूरा किया।

अपना स्कूल बैग लगाया और फिर कार्टून देखने बैठी। मम्मी ने अब उसे नहीं टोका। उस्सने अपना काम जो पूरा कर लिया था।

सोना को समझ आ गया था कि यह दूसरा चेहरा मन की बात बताता था।

उसने तय किया कि अब सोच-समझकर ही सबके साथ व्यवहार करेगी, जिससे किसी का मन दुखी न हो। और पता है उस दिन के बाद उसे वे दो-दो चेहरे कभी भी दिखाई नहीं दिए !

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छोटी चीज का काम बड़ा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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छोटी चीज का काम बड़ा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक हाथी गहरी नींद में सो रहा था। वह जोर-जोर से खर्राटे ले रहा था।

खर्राटों की आवाज सुनकर पास के बिल से एक चूहा बाहर आया।

उसने देखा कि सामने पहाड़ जैसा हाथी सो रहा था। खर्राटे के कारण उसका बड़ा-सा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था।

चूहे को यह देखकर बड़ा मजा आया। वह धीरे से उसकी सूँड़ से चढ़कर पेट तक पहुँच गया। हाथी के पेट पर बैठकर वह झूलने लगा।

ऊपर-नीचे, ऊपर नीचे, बड़ा मजा आ रहा था। तभी हाथी की नींद खुली। एक छोटे-से चूहे को अपने पेट पर आराम से बैठ देखकर उसे बहुत गुस्सा आया।

उसने अपने पेट को जोर से हिलाया चूहा नीचे गिर गया। हाथी बोला -बेवकूफ चूहे, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे पेट पर चढ़ने की ?

चूहा घबरा गया। माफी माँगले लगा। हाथी से बोला, दादा मुझे माफ कर दो। ऐसी गलती कभी नहीं होगी।

हाथी को उस पर दया आ गई। उसने चूहे को जाने दिया। जाते समय चूहे ने कहा, दादा, कभी मेरी जरूरत हो तो बताना।

आप बहुत अच्छे हैं तभी आपने मुझे छोड़ दिया। मैं भी आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहूँगा। अच्छा, नमस्ते।

चूहे की बात सुनकर हाथी जोर-से हँसने लगा। चूहा चुपचाप वहाँ से चला गया।

कुछ दिनों बाद एक शिकारी जंगल में आया। चूहे ने उसे देख लिया था। उसके पास बहुत सारा सामान था।

लगता है कई दिन रुकने वाला है जंगल में। चूहे ने सोचा।

अगले दिन सुबह जोर की आवाज सुनकर चूहे की नींद खुली। यह को किसी हाथी की आवाज लगती है। उसने सोचा।

जब कई बार ‘बचाओ-बचाओ’ की आवाजें आई तो चूहा वाहन पहुँचा।

सामने देखा तो वही हाथी दादा खड़े थे। एक बड़ा-सा जाल उनके ऊपर पड़ा था, जिससे वे बाहर नहीं निकल पा रहे थे।

चूहे ने दादा को नमस्ते की। फिर वह अपने तेज दाँतों से जाल काटने लगा। वह बहुत तेजी से काम कर रहा था।

थोड़ी ही देर में जाल में एक बड़ा-सा छेड़ हो गया। हाथी उससे बाहर आ गया। अब उसे समझ आया कि छोटी चीज भी कभी-कभी बड़ा काम कर जाती है।

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जंगल में आया इंटरनेट | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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जंगल में आया इंटरनेट | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

हरे-भरे जंगल में चारों ओर एक ही चर्चा थी – जंगल में इंटरनेट आया है।

सब इसी बारे में बात कर रहे थे। हालाँकि आधे से ज्यादा जानवरों को यह पता नहीं था कि इंटरनेट कौन से नए जानवर का नाम है।

फिर भी वे यह पता लगाने की कोशिश लगातार कर रहे थे कि यह नया जानवर खतरनाक तो नहीं है।

अनेक सवाल थे उनके मन में। कैसा दीखता होगा यह इंटरनेट ?

उसकी पूँछ होगी या नहीं ? अरे नहीं भाई, यह जानवर का नाम नहीं है।

तो फिर क्या है ?

यह एक चिड़िया का नाम है।

ओह, अच्छा-अच्छा, चिड़िया होती है यह !

इस तरह की बातें पूरे जंगल में हो रही थी। शाम को राजा शेर ने सभी जानवरों को अपनी गुफा के सामने बुलाया है। तब वे हमको इस इंटरनेट से मिलवाएँगे।

वे एक-दूसरे को बता रहे थे। शाम को ठीक 6 बजे सभी जानवर, पक्षी और जंगल के बाकी सब प्राणी शेर की गुफा के सामने इकट्ठे हुए।

राजा शेर की गुफा के सामने इकट्ठे हुए। राजा शेर एक अजीब-सी चीज के साथ बाहर निकले।

ये क्या है ? फिर फुसफुसाहट होने लगी। तब शेर ने कहा, दोस्तों, यह है कंप्यूटर।

कंप्यूटर ? और एक जानवर ? सबने सोचा। यह एक मशीन है और इंटरनेट का प्रयोग करने के लिए हमारे पास कंप्यूटर होना बहुत जरूरी है। शेर ने कहा।

सभी ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे।

इंटरनेट के माध्यम से हम दूर-दूर रहने वाले अपने दोस्तों और संबंधियों से घर बैठे बात कर सकते हैं।

उन्हें हम पत्र भी भेज सकते हैं। पत्र भेजने के इस तरीका को ई-मेल कहते हैं।

यदि हम पत्र डाक विभाग के माध्यम से भेजते हैं तो उसे पहुँचने में दो-तीन दिन लगते हैं, लेकिन ई-मेल भेजने में बस कुछ सेकंड ही लगते हैं और सबसे बढ़िया बात है कि इसमें खर्चा न के बराबर आता है। शेर समझा रहा था।

और क्या फायदे हैं इंटरनेट के ? जानवरों ने उत्सुकता से पूछा।

बहुत से फायदे हैं। आप किसी भी समय दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकते हो। हर तरह की जानकारी इसमें है। शेर ने बताया।

वाह, ये तो कमाल की वस्तु है। सबने कहा। लेकिन कोई था जो इस सबसे खुश नहीं था और वह था कबूतर, खबरी।

इतने वर्षों से व्ही था, जो सारे समाचार और पत्र दूर-दूर के जंगलों तक पहुँचता था।

पर उसे लग रहा था कि अब उसकी कोई जरूरत नहीं थी। वह बहुत उदास था।

उसने शेर से इस बारे में बात की। शेर ने कहा, देखो खबरी तुमने सबकी बहुत सेवा की है। लेकिन जंगल की तरक्की के लिए कंप्यूटर को जंगल में लाना बहुत जरूरी था। तुम किसी और काम के बारे में सोचों। कबूतर उदास मन से अपने घर लौट गया।

जंगल में धीरे-धीरे सभी ने कंप्यूटर सीखना शुरू कर दिया। की महीने ऐसे ही बीत गए। सब जानवर आजकल ई-मेल भेजने लगे थे।

इसीलिए खबरी के लिए ज्यादा काम नहीं होता था। बच्चे किताबों से ज्यादा इंटरनेट पर पढ़ाई करना चाहते थे। पूरा जंगल जैसे कंप्यूटर पर निर्भर हो गया था।

एक दिन बहुत तेज बारिश हुई। तेज हवा चली और बहुत सारे पेड़ टूट गए। उस गड़बड़ में जंगल के कम्प्यूटरों का इंटरनेट से संबंध टूट गया।

जंगल के जानवर न तो किसी को ई-मेल भेज पा रहे थे और न ही उनके बच्चे ठीक से पढ़ाई कर पा रहे थे।

जानवर अब तक इतने आलसी हो चुके थे कि पत्र लिखना उन्हें अच्छा ही नहीं लगता था। तभी एक दुर्घटना हुई।

हिरन का बच्चा दौड़ रहा था, वह एक पेड़ से टकराया और उसके सर पर गहरी चोट लगी।

जंगल के डॉक्टर साहब उल्लू जी किसी का इलाज करने दूसरे जंगल में गए हुए थे। समस्या थी कि उन्हें कैसे बुलाया जाए। इससे पहले तो उन्हें ई-मेल भेजकर सन्देश दे दिया जाता था।

लेकिन अभी तो सारी व्यवस्था टूटी हुई थी। हिरन के माता-पिता रोते हुए राजा शेर के पास पहुँचे। राजा भी असहाय था, करे तो क्या करे ?

तब खबरी ने कहा, मैं बुलाकर लाऊँगा डॉक्टर को। आखिर पहले भी तो मैं ही यह सब काम करता था।

सबको बहुत तसल्ली हुई की खबरि आज भी उनकी मदद करने को तैयार था।

तो खबरी उड़ा और कुछ ही देर बाद डॉक्टर उल्लू जी वहाँ पहुंच गए।

खबरी के कारण ही हिरन के बच्चे की जान बच पाई। अब खबरी की बारी थी सबको समझाने की। वह बोला, मैं मानता हूँ कि जंगल का विकास जरूरी है, लेकिन हमें अपने पुराने तरीकों को भूलना नहीं चाहिए।

हम सभी टी. वी. में समाचार सुनते हैं, लेकिन अखवार में समाचार पढ़ने का मजा ही कुछ और है। ऐसे ही कंप्यूटर का प्रयोग करें, लेकिन हमें उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहिए।

क्योंकि मशीन तो मशीन ही होती है, क्यों ठीक कहा न मैंने ?

जवाब में सबने बस ‘हाँ’ में सिर हिलाया। वे समझ गए थे अपनी गलती को।

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अक्षर करते कूद-फाँद | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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अक्षर करते कूद-फाँद | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

मीतू स्कूल से आई और सबसे पहले अपनी सभी नोटबुक्स निकालकर बैठ गई।

आज गणित और अंग्रेजी दोनों में दो-दो पेज होमवर्क मिला था। मीतू पहली कक्षा में पढ़ती थी।

उसके लिए चार पेज लिखना काफी बड़ा काम था।

वह सोच रही थी कि आज खेलने के लिए कैसे जा पाएगी।

उसने मम्मी से कहा, मम्मी, आज खाना खाकर मैं पहले होमवर्क करुँगी। नहीं तो शाम को खेलने जाऊँगी तो आकर थक जाऊँगी। फिर चार पेज कैसे लिख पाऊँगी ?

मम्मी खुश थी की मीतू को आज होमवर्क की चिंता तो हुई।

मीतू ने जल्दी-जल्दी खाना और फटाफट होमवर्क करने बैठ गई।

पहले गणित का काम किया। फिर अंग्रेजी के दो पेज पुरे कर दिए। आधे घंटे में सब खत्म।

अरे वाह, मम्मी बोली आज तो कमाल हो गया। लेकिन जब बाद में उन्होंने मीतू की नोटबुक देखि तो पाया कि उसने जल्दबाजी में गलतियाँ की हैं।

लेख भी अच्छा नहीं लिखा था, उसने। मम्मी ने मीतू को बहुत समझाया , मीतू पहले ये गलतियाँ ठीक कर लो।

फिर खेलने जाना।

लेकिन मीतू ने मम्मी की बात पर ध्यान ही नहीं दिया।

शाम को जब वह खेलकर लौटी तो बहुत थक गई थी। उसने खाना खाया। फिर किसी तरह गलतियाँ ठीक की और सोने के लिए चली गई।

जैसे ही रात के बारह बजे, अचानक मीतू का बस्ता खुला और उसमें से उसकी सारी नोटबुक निकलकर बाहर आ गई।

उनके पन्ने अपने आप खुल रहे थे और अंदर लिखे हुए अक्षर नाच रहे थे।

अचानक जैसे उसके बस्ते के अंदर की दुनिया में जान आ गई थी।

तभी उसका पैमाना बाहर कूदा और जोर से बोलै, शांत!! लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

अक्षर धीरे-धीरे नोटबुक के पन्नों से कूदकर मेज पर आ गए। ये सारे टेढ़े-मेढ़े अक्षर थे। मीतू ने आज आज टेढ़ा-मेढ़ा लेख लिखा था। इसलिए ये सारे टेढ़े-मेढ़े शैतान अक्षर बाहर निकलकर उछल-कूद मचा रहे थे।

उसकी नोटबुक के बाकी के पन्नों पर बहुत सुंदर अक्षर लिखे हुए थे। वे सरे अक्षर परेशान होकर यह सब कुछ देख रहे थे।

मेज पर ही मीतू के रंगों का डिब्बा रखा था। एक-एक करके सरे अक्षर रंगों में कूद गए। फिर मेज पर आए और पूरी मेज रंगों से गंदी कर दी ।

अब तक पैमाने को बहुत गुस्सा आ गया था। उसने एक-एक करके सभी अक्षरों को डाँटा।

अक्षर ही-ही करते हुए नोटबुक पर चढ़े और अपनी पुरानी जगह जाकर बैठ गए। लेकिन उस सारी शैतानी मैं मीतू की नोटबुक बहुत गंदी हो गई थी।

अक्षरों के रंगवाले पैरों के निशान सारे पन्नों पर छप गए थे। हे भगवान ! ये क्या हो गया ?

टीचर बहुत गुस्सा करेंगी। कहते हुए मीतू चौंककर उठी। तब उसे पता चला की वह सपना देख रही थी।

उसने चैन की साँस ली। कितना खराब सपना था। सोचते हुए वह वापिस लेट गई। सुबह मीतू जल्दी उठी।

और सबसे पहले उसने होमवर्क का गन्दा लेख ठीक किया। अब उसके टेढ़े-मेढ़े अक्षर शैतान नहीं रहे थे।

बल्कि सुंदर बन गए थे। उस दिन के बाद मीतू हमेशा काम सफाई से और सुंदर ढंग से करती है। जल्दबाजी कभी नहीं करती। कहीं किसी दिन उसका सपना सच हो गया तो !

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अत्यधिक ज्ञान जाए बेकार | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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एक छोटा लड़का था आशु। उसे नई-नई बातें सीखना बहुत अच्छा लगता था।

वह सभी लोगों से तरह-तरह के प्रश्न पूछता था और अपना ज्ञान बढ़ाता था।

कोई साधु बाबा उसे मिल जाते तो वह उनके पास घंटों बैठकर ज्ञान की बातें सुना करता था।

अपने आसपास के सभी विद्यालयों के शिक्षकों के पास जाकर वह ज्ञान प्राप्त कर चूका था।

उस इलाके में अब कोई नहीं बचा था, जिसके पास जाकर उसने सीखा न हो।

इसलिए उसने निश्चय किया कि वह दूर देशों में रहने वाले शिक्षकों के पास जाएगा।

उसने विजयनगर के एक शिक्षक के विषय में बहुत सुना था। बस वह विजयनगर के लिए निकल पड़ा।

लंबी यात्रा के बाद वह विजयनगर पहुँचा। वहाँ जाकर उसने शिक्षक को प्रणाम किया।

शिक्षक ने उसे अपने पास बैठाया और पूछा कि उसने क्या-क्या सीखा है ?

सब सुनने के बाद उन्होंने अपने एक शिष्य से कहाँ, आशु के लिए पानी लेकर आओ। बोल-बोलकर थक गया होगा।

उनका शिष्य एक खाली गिलास और पानी से भरा लोटा रख गया।

तब शिक्षक ने लोटे से गिलास में पानी डालना शुरू किया। आशु देख रहा था। शिक्षक पानी डालते जा रहे थे।

धीरे-धीरे गिलास भर गया लेकिन उन्होंने पानी डालना बंद नहीं किया। पानी गिलास से निकलकर बाहर गिरने लगा।

आशु को आश्चर्य हुआ। आखिर जब पानी जमीन पर बहने लगा तब उसने पूछा, गिलास तो पूरा भर गया है।

अब आप पानी क्यों डाल रहे हैं, देखिये न, पानी यूँ ही बेकार हो रहा है।

यही मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ बेटा। शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा।

तुम इस गिलास की तरह हो और तुम्हारा ज्ञान इस पानी की तरह। तुमने पहले ही इतना सीख लिया है कि गिलास पूरा भर गया है।

यदि मैं और अधिक सिखाऊँगा तो ज्ञान का दुरूपयोग होगा। इसलिए जो कुछ सीखा है, उसका सही ढंग से उपयोग करो।

जाओ बेटा और अपने ज्ञान को खर्च करो। उन्होंने आशु को समझाया।

आशु समझ गया और संतुष्ट होकर अपने घर लौट आया।

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कम बोलो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कम बोलो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक छोटी-सी बच्ची थी – आँचल। आँचल बहुत प्यारी थी।

उसे चित्र बनाना बहुत अच्छा लगता था। सभी उसकी चित्रकला की प्रशंसा करते थे।

पढ़ने में भी वह बहुत तेज थी। अपने सभी काम खुद करती थी।

यहाँ तक कि रोज जब माँ दूध का गिलास उसे देती थी तो वह गट-गट पी जाती थी।

खूब सब्जियाँ खाती थी और माँ का कहना मानती थी। लेकिन वह बोलती बहुत थी और उसकी इस बात से माँ अक्सर परेशान हो जाती थी।

एक बार माँ ने उससे कहा कि आँचल ‘म’ अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्द लिखो और उनके चित्र बनाओ। आँचल ने तीन शब्द लिखे –

‘म’ से मेढक

‘म’ से मुर्गा

‘म’ से माँ

वह माँ के पास आई और उन्हें चित्र दिखाए। माँ ने उससे पूछा

आँचल बेटा, तुम्हें इस तीनों में से सबसे अच्छा कौन लगता है ?

‘माँ।’ आँचल बोली।

माँ मुस्कुराईं और बोली, उसके बाद।

उसके बाद मुर्गा और फिर मेढक। आँचल बोली।

अच्छा अब ये बताओ कि ऐसा क्यों है ? माँ ने आगे पूछा।

आँचल ने उत्तर दिया, वह इसलिए की सभी की सबसे प्यारी होती है, क्योंकि वह बहुत प्यार करती है, बिलकुल आपकी तरह।

फिर मुर्गा, क्योंकि वह सुबह-सुबह बाँग देकर सबको जगाती है।

और मेढक तो बिलकुल पसंद नहीं है मुझे, क्योंकि वह दिन-रात बस टर्र-टर्र करता रहता है।

ओफ्फोह! कितनी आवाज करता है !

माँ ने आँचल से कहाँ, बेटा, मैं यही तुम्हें समझाना चाहती हूँ।

देखो, मुर्गा बीएस सुबह सही समय पर बोलता है, इसलिए सब उसकी आवाज ध्यान से सुनते हैं और जाग जाते हैं।

लेकिन मेढक हमेशा टर्र-टर्र करता रहता है, इसलिए सब उससे ऊब जाते है।

कोई उसकी बात नहीं सुनता, न ही कोई उसे पसंद करता है।

इसलिए बस उतना ही बोलना चाहिए जितना जरूरी हो। समझी!

आँचल समझ गई कि माँ उससे क्या कहना चाहती हैं।

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