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बच्चों द्वारा स्वच्छता अभियान हिंदी कहानी Swachhata Abhiyan by Kids Hindi Short Story

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बच्चों द्वारा स्वच्छता अभियान हिंदी कहानी Swachhata Abhiyan by Kids Hindi Short Story 

दामोदर  कालोनी अभी नई बनी थी. सभी घर चमकते और साफ – सुथरे थे. कालोनी के बगल में एक तरणताल था. बहुत दिनों से उसकी सफाई नहीं हुई थी. पानी जमा हो जाने से वह गंदे पानी का तालाब बन गया था.

उसी पानी में मच्छरों का परिवार चैन से रहता था. तालाब से थोड़ी दूर पर कूड़े – कचरे का ढेर जमा हो गया था. उस पर मक्खी का परिवार रहता था. दोनों परिवारों में गहरी दोस्ती थी.

Swachhata Abhiyan by Kids Hindi Short Story

एक दिन मोहल्ले के कुछ बच्चे हाथ में तैराकी की पोशाक लिए आए. तालाब गन्दा देखा तो लौट गए.

दूसरे दिन तालाब का गन्दा पानी निकाल कर  उसमें साफ पानी भरा जाने लगा. उस समय मच्छरों का परिवार मक्खी के घर मिलने गया था.जब वे लौटे तो उन्हें बड़ा झटका लगा. यह क्या! गंदे पानी की जगह तालाब में साफ पानी चमक रहा था. मच्छर बिना घर -बार के हो गए.उन्हें समझ में न आया कि क्या करें. परिवार की मादा मच्छर रोने लगी. तभी उसे अपनी सहेली मक्खी आती दिखाई दी.

मादा मच्छर ने पूछा – क्या हुआ बहन? तुम क्यों रो रही हो? मक्खी की आँखों में आँसूं थे. वह बोली – अरे कुछ मत पूछो बहन, आज मेरा दिन खराब है. मैं कालोनी के कई घरों में गई. रसोई में घुसी. मुझे कुछ भी खाने को न मिला. आज सबने खाना ढककर रखा था. कहीं फल कटा और खुला न मिला. जूठे बरतन भी नहीं थे. मैं तो भूखी लौट आई. ऐसा रहा तो मैं भूखी ही मर जाउंगी.

मादा मच्छर बोली – यह तो बहुत बुरा हुआ. और देखो न मेरी परेशानी, तालाब में साफ पानी आ गया. अब मैं अंडे कहाँ दूंगी? हमारा परिवार कैसे बढ़ेगा?

तभी मोहल्ले के बच्चों का झुंड उधर आता दिखाई दिया. वे सब विद्यार्थी थे. साफ तालाब देखकर  वे खुश हुए. जब चलने लगे. तभी एकाएक उनकी नजर कूड़े के ढेर पर पड़ी.वे उसके पास जाकर रूक गए. एक ने कहा – यहाँ अभी कूड़े-कचरे का ढेर पड़ा है. कितनी गंदी बदबू आ रही है.

दूसरा बोला – मच्छर और मक्खियों की तो दावत हो रही है.

चलो कल इसकी सफाई कर  देते हैं – कई बच्चे एक साथ बोल पड़े.

मैं एक बाल्टी लाऊंगा – एक लडके ने कहा.

मैं झाड़ू लाऊंगा – दूसरे ने कहा.

मैं ब्लीचिंग पाउडर लाऊंगी – किसी लडकी की आवाज आई.

हाँ, यह ठीक होगा – सबने सहमति जताई.

तो कल सुबह मिलेंगे – कहकर वे लौट गए.

दूसरे दिन दामोदर कालोनी के सभी बच्चे व्यस्त थे. उन्होंने झाड़ू और फावड़े से कूड़े को साफ किया. कचरे को बाल्टी में भरकर कूड़े के डिब्बे में डाला. जगह साफ कर वहाँ ब्लीचिंग पाउडर डाला.

दामोदर कालोनी साफ – सुथरी हो गई. तालाब का गन्दा पानी और कूड़े का ढेर कुछ न बचा. मक्खी ने मच्छरों से कहा – अब हमारे लिए यहाँ खाने-रहने को कुछ नहीं बचा. चलो, किसी नई जगह को ढूंढें. जहाँ हम रोग के कीटाणु लाएं और कालरा फैलाएँ. हम रोग फैलाएँगे. तभी लोग हमसे डरेंगे. मच्छर बोले – और हम लोग भी मलेरिया फैलाएँ.

मादा मच्छर बोली – तब तो मैं वहीं अंडे दूंगी और मेरा बड़ा – सा परिवार होगा.

मक्खी और मच्छरों का झुंड फिर किसी गंदी जगह की खोज में निकल पड़े.

इस कहानी में बच्चों की सक्रियता ने अपने कोलनी को मच्छर मुक्त कर दिया.  इसी तरह से लोग यदि गंदगी के प्रति जागरूक हो जाएँ तो हमारा देश स्वच्छ और सुन्दर बन जाएगा. आइये आज हम सब संकल्प लेते हैं कि हम अपने आसपास को साफ़ सुथरा रखेंगें.

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थोडा और आगे बढ़ो हिंदी कहानी Thoda Aur Aage Badho Hindi Story

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थोडा और आगे बढ़ो हिंदी कहानी Thoda Aur Aage Badho Hindi Story

बंगाल में माता काली के एक महान भक्त और संत हुए. उनका नाम था – स्वामी रामकृष्ण परमहंस. वे बहुत ही सरल स्वाभाव के थे. बहुत सारे लोग उनके आश्रम में उनका दर्शन करने आते और अपने मन की जिज्ञासा शांत कर घर लौट जाते. यह Hindi Story बहुत ही प्रेरणादायक है.

Hindi Story Thoda Aur Aage Badho

Hindi Story Thoda Aur Aage Badho

एक दिन एक गरीब लकड़हारा स्वामीजी से मिलने आया. स्वामीजी सबके मन की बात समझ लेते थे. उन्होंने उस लकड़हारा को बड़े प्रेम से अपने पास बिठाया और उससे पूछा – “क्या काम करते हो?”

“स्वामी जी! एक निर्धन लकड़हारा हूँ. दिन भर मेहनत करता हूँ, बड़ी मुश्किल से अपना और अपने परिवार का गुजर- बसर करता हूँ.”

“लकड़ी काटने कहाँ जाते हो?”

“जी महाराज, जंगल जाता हूँ.”

“तो थोडा-सा और आगे बढ़ो.”

उस लकड़हारे के मन में स्वामीजी की बात बैठ गयी. जब वह अगले दिन जंगल गया तो लकड़ी काटने जंगला में थोडा- सा आगे बढ़ गया. उसे उस जगह पर चन्दन के पेड़ मिले. उस दिन वह चन्दन की लकड़ी लेकर वापस घर आया.

कुछ दिनों उपरांत वह फिर स्वामी जी के दर्शन को उनके आश्रम में गया. स्वामी जी ने उसे देखते ही पूछा- “क्या हाल हैं तुम्हारे?”

“आपकी कृपा है स्वामी जी”

“ अब भी उसी जंगल में लकड़ी काटते हो?”

“ जी, महाराज”

“तो थोड़ा और आगे बढ़ो”

अगले दिन वह लकड़हारा और आगे बढ़ा और उसने आगे देखा कि वहां चाँदी की एक खान है.

कल होकर वह पुनः स्वामीजी के आश्रम पर उनको धन्यवाद करने पहुंचा. स्वामीजी ने उसे देखा और उसको बोलने का कोई मौका दिए बिना उस लकड़हारे से वही बात कही – “थोड़ा और आगे बढ़ो.”

लकड़हारा स्वामीजी के निर्देशनुसार आगे बढ़ता गया. पहले उसे सोने की खान मिली और फिर हीरे की खान भी मिली. अब उस लकड़हारे को कोई काम करने की जरुरत नहीं थी. उसकी सारी गरीबी दूर हो गयी थी. उसने अपने रहने के लिये अच्छा मकान और नौकर चाकर रख लिये थे. उसका पारिवारिक जीवन बहुत ही सुखमय और आनंद्पूर्वक  व्यतीत हो रहा था.

कुछ दिनों के बाद वह पुनः स्वामीजी से मिलने गया. स्वामीजी ने उसे देखते ही बड़े प्रेम से अपने पास बैठाया और उसे समझाने लगे – “यह जब तो तुम्हारे पारिवारिक और गृहस्थ जीवन के लिये था. अब तुम्हारे पास सभी सांसारिक साधन उपलब्ध हैं. अब तुम्हे ईश्वर की साधना और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए. अब उसी मार्ग पर आगे बढ़ो और आगे बढ़ते ही जाओ.”

धन- वैभव से संपन्न हो चुका लकड़हारा स्वामीजी के उस दिव्य ज्ञान को समझ गया था. वह स्वामीजी का परम भक्त और अनुयायी बन चुका था.

दोस्तो! यह Hindi Story  हम सभी के सन्दर्भ में भी सटीक है. हमें भी अपने जीवन में हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए. एक छात्र को अपनी पढाई में और एक साधक को भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए. हम चाहे कोई भी कार्य करते हो, हमें हमेशा आगे बढ़ने के लिये प्रयत्न शील रहना चाहिए. आगे बढ़ते रहने से ही नयी मंजिले मिलेंगी और हम नयी ऊँचाइयों पर पहुँच सकते हैं. आपका यह कहानी पढने के लिये धन्यवाद!

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Lord Gautam Buddha Hindi Story

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Lord Gautam Buddha Hindi Story 

एक दिन की बात है. भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ सत्संग कर रहे थे. तभी एक जिज्ञासु शिष्य ने महात्मा बुद्ध से यह प्रश्न किया.

Lord Gautam Buddha Hindi Story

Lord Gautam Buddha Hindi Story

‘ हे प्रभु! क्या आपके सभी शिष्यों को निर्वाण प्राप्त हो जाएगा?’

बुद्ध ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, ‘कुछ को हो जाएगा, कुछ को नहीं होगा.’

शिष्य ने फिर प्रश्न किया, ‘भगवन! आप जैसे महान ज्ञानी और योग्य मार्गदर्शक के उपदेश सुनकर भी साधकों को निर्वाण क्यों नहीं प्राप्त होता?’

बुद्ध ने शिष्य से प्रतिप्रश्न किया, ‘यदि कोई पथिक तुमसे राजमहल का रास्ता पूछे, तो क्या गारंटी है कि वह नहीं भटकेगा.’

जिज्ञासु ने कहा, ‘यदि उसने रास्ता ठीक ढंग से नहीं समझा, तो वह भटक भी सकता है.’

भगवान बुद्ध ने उसे समझाया, ‘इसी तरह से, मेरे बताए उपदेश को सभी ठीक ढंग से समझकर उस पर अमल कर सकें, यह जरूरी तो नहीं है.

जो उपदेश का सार समझकर अमल करते हैं, उन्हें निर्वाण प्राप्त हो जाता है, जो अमल नहीं करते हैं, वे भटकते रहते हैं.’ जिज्ञासु को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया. उसने भगवान बुद्ध को प्रणाम करते हुए उनसे आशीर्वाद लिया क्योंकि उसकी जिज्ञासा का समाधान हो गया था.

Lord Gautam Buddha Hindi Story सत्य आचरण करो

भगवान बुद्ध गंगा नदी के तट पर स्थित एक उपवन में अपने शिष्यों के साथ रुके हुए थे. दिव्यक नामक एक व्यक्ति भगवान बुद्ध की ख्याति सुनकर उनके पास पहुंचा.

उनके दर्शन से उसे अपार शांति मिली. उसने एकांत में उनके पास पहुँच कर विनम्रता से कहा, ‘प्रभु, मुझे कुछ उपदेश दें, जिससे मेरा, जीवन सफल हो जाय.’

बुद्ध ने पूछा, ‘क्या मेरे उपदेश पर आज से ही अमल करोगे?’ उसने कहा, ‘ऐसा वचन देना तो बहुत मुश्किल है.’ बुद्ध ने कहा, ‘तो अभी वापस लौट जाओ. मन में यह पक्का तय करके ही आना कि उपदेश पर पूरी तरह अमल करोगे. यदि उपदेश सुनने के बाद तुम तमाम दुर्गुणों, हिंसा, असत्य वचन, लोभ आदि का त्याग कर सकोगे, तभी उपदेश देना सार्थक होगा.’

दिव्यक ने फिर अनुरोध किया, ‘आप आज ही उपदेश देने की कृपा करें. उसमें से कुछ पर फौरन अमल करने का प्रयास करूंगा. मेरे अंदर बहुत सारे दुर्गुण हैं. उन्हें एक साथ कैसे छोड़ा जा सकता है एक–एक करके उन्हें छोड़ने की कोशिश करूंगा’, बुद्ध समझ गए कि दिव्यक वास्तव में अपना जीवन बदलने का संकल्प ले चुका है. इसलिए वह उपदेश आज ही देने का आग्रह कर रहा है. वह मुस्कुराए तथा बोले, ‘ठीक है, आज से सत्य बोलने का संकल्प ले लो, तुम आज ही से सत्य आचरण  करना शुरू कर दो.’ एक महीने बाद आकर और उपदेश ले जाना.’

एक सप्ताह बाद ही दिव्यक उनके पास पहुंचा और बोला, ‘भगवान सत्याचरण ने मेरे अन्य दुर्गुण भी दूर कर डाले. आज से मैं आपकी शरण में ही रहूँगा.’ दिव्यक का जीवन बदल चुका था.

 

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Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

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Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

रस्तुत पोस्ट ‘Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya’ में जैन धर्म के 24वें  तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवन से सम्बंधित दो प्रेरक कहानियां शामिल की गयी हैं. ये कहानियां उनके मानवीय मूल्यों के उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करती हैं. आशा है, आपको पसंद आयेंगी.

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya

Vardhman  Mahavira Hindi Kahaniya अन्याय है दास प्रथा

महाराजा सिद्धार्थ के पुत्र वर्धमान बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में पले – बढ़े थे. उनका हृदय दुसरे के दुख को देखकर द्रवित हो उठता था. वह यह मानने लगे थे कि प्रत्येक प्राणी में भगवान का निवास है कभी किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए.

राजकुमार युवा हो गए. एक दिन वह अपने मित्रों के साथ उद्दान में भ्रमण करने जा रहे थे. रास्ते में एक धनाढ्य व्यक्ति की हवेली के अंदर से चीखने-चिल्लाने की आवाज आई. रूदन सुनकर राजकुमार के पाँव वहीं ठहर गए. एक मित्र ने कहा, ‘ यहाँ क्यों ठहर गए? इस हवेली से तो प्रतिदिन चीख-पुकार की आवाज आती रहती है. ‘राजकुमार ने पूछा,’कौन चीख-पुकार कर रहा है?

‘मित्र ने बताया,’इस हवेली का मालिक अपने दास को मारता-पीटता है, दास पिटते समय चिल्लाता है, यह सुनकर वर्धमान का हृदय करूणा से भर गया. उन्होंने कहा, ‘क्या मनुष्य मनुष्य का दास हो सकता है? सभी प्राणी समान हैं. सभी में एक जैसी आत्मा होती है.’

मित्र ने बताया, ‘धनाढ्य लोग पैसे के बल पर गरीबों को दास की तरह खरीदते हैं. उनसे काम करते हैं. यह राजकीय व्यवस्था है.’ वर्धमान ने कहा, ‘यह घोर अव्यवस्था है. इस पाप कर्म को बंद किया जाना चाहिए’

राजकुमार वर्धमान वापस लौट आए. कुछ ही दिनों में उन्होंने आदेश जारी करके दास प्रथा को अन्याय व अधर्म घोषित कर दिया.

Vardhman Mahavira Hindi Kahaniya अपना-अपना धर्म

भगवान महावीर जहाँ एक ओर पवित्र आचरण और सेवा-परोपकार के कार्यों को धर्म बताते थे, वहीं कहा करते थे कि वस्तु का सहज स्वभाव ही उसका धर्म है.

एक बार एक व्यक्ति उनके सत्संग के लिए पहुंचा. उसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया था, फिर भी वह यह नहीं जान सका कि धर्म किसे कहना चाहिए. कुछ पंडित कर्मकाण्ड को तो कुछ तीर्थयात्रा करने को धर्म बताते थे. वह जिस संत के पास पहुंचता, उन्हीं से पूछता,’महाराज, धर्म किसे कहा जाता है?’ भगवान महावीर से भी उसने यही प्रश्न किया कि उनके अनुसार धर्म क्या है?

महावीर ने उत्तर दिया,’जो वस्तुओं का सहज स्वभाव है, वही उसका धर्म है. सभी वस्तुओं का अलग-अलग चरम है’ उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा,’आग जलाती है, यह उसका धर्म है पानी नीचे की ओर चला जाता है, यह उसका धर्म है. आदमी जन्मता और मरता है, यह उसकी नियति है- स्वभाव है. अतः जन्म के बाद मृत्यु को स्वभाव मानकर हम मृत्युपरांत कर्तव्य पालन, सेवा-परोपकार के कार्य में निरंतर लगे रहें, तो समझो कि हम अपने धर्म का पालन कर मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं’

जिज्ञासु धर्म का सार समझकर संतुष्ट हो गया.

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APJ Abdul Kalam Wet Grinder Hindi Story

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APJ Abdul Kalam Wet Grinder Hindi Story 

Dr APJ Abdul Kalam को कौन नहीं जानता. वह हमारे देश के राष्ट्रपति थे. कई लोग उनके बारे में यह बोलते हैं कि उनको हमेशा overrate किया गया यानि वो जितना थे उससे कई गुना बढ़ा चढ़ाकर उनके बारे में कहा गया, और लिखा गया. मैं यहाँ पर उनके बारे में एक छोटी सी बात शेयर करना चाहता हूँ जो उनकी महानता को दिखाता है.

APJ Abdul Kalam Wet Grinder Hindi Story

यह एक सच्ची घटना है जो 2014  में घटी थी.

जैसा कि आपको पता होगा कि राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने के बाद Dr APJ Abdul Kalam देश भर में स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कॉर्पोरेट जगत के कार्यकर्मों में भाग लेते रहते थे. ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान उनकी मृत्यु भी हो गयी थी और देश ने एक महान विभूति को खो दिया.

इरोड में एक फर्म है – सौभाग्य इंटरप्राइजेज. यह फर्म wet grinder यानि गीली चक्की बनाने के लिये प्रसिद्द है. Wet grinder का उपयोग रसोई के कार्यों में होता है. इसी फर्म द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में Dr APJ Abdul Kalam को आमंत्रित किया गया. वे उस कार्यक्रम में भाग लेने गए.

APJ Abdul Kalam Wet Grinder Hindi Story

उस कार्यक्रम की समाप्ति के दिन सौभाग्य इंटरप्राइजेज ने उनको एक wet grinder उपहार स्वरुप दिया. ऐसे Dr APJ Abdul Kalam भी अपने घर में उपयोग के लिये एक wet grinder लेने की सोच रहे थे. अब्दुल कलाम साहब ने उस wet grinder को उपहार के रूप में लेना अस्वीकार कर दिया. उन्होंने उसके लिये एक 4850 रूपये का चेक काटकर उस कंपनी के अधिकारी को दे दिया.

कंपनी और कंपनी के प्रबंध निदेशक कलाम साहब के इस व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए और अपने आपको गौरवान्वित महसूस करने लगे. उन लोगों ने उस चेक को भुनाने की बजाय फ्रेम करके अपने कार्यालय में दीवार पर सम्मानपूर्वक लगवा दिया.

दो महीने बाद, उन लोगों को Dr APJ Abdul Kalam के ऑफिस से फ़ोन आया कि उस 4850 रूपये के चेक को बैंक में जमाकर उसे clear करा लें. यदि वे लोग ऐसा नहीं करते हैं तो उनका wet grinder वापस कर दिया जाएगा.

कोई अन्य विकल्प नहीं देख सौभाग्य इंटरप्राइजेज के प्रबंध निदेशक ने उस चेक का फोटो कॉपी करा लिया. उस फोटो कॉपी को फ्रेम कराकर अपने ऑफिस में लगवा दिया और कलाम साहब वाला चेक बैंक में क्लीयरेंस के लिये भेज दिया.

ऐसे थे हमारे कलाम साहब

बात तो बहुत छोटी है और साधारण सी जान पड़ती है. लेकिन यदि इस पर विचार किया जाय तो इससे कलाम साहब की छोटी छोटी चीजों के बारे में जानकारी रखना और उसका पालन करना स्पष्ट दीखता है. यही छोटी छोटी बातें लोगों को महान बनाती हैं.

वाकई कलाम साहब एक विनम्र इंसान थे, जिन्होंने देश और मानवता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। सन्दर्भ के लिये उस चेक का चित्र भी दिया जा रहा है, यह चित्र इन्टरनेट से लिया गया है.

APJ Abdul Kalam Wet Grinder Hindi Story

 

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गद्दारी का पुरस्कार हिंदी देशभक्ति कहानी Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

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गद्दारी का पुरस्कार हिंदी देशभक्ति कहानी Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

 

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

चापेकर बंधुओं ने शहादत की उच्चतम मिसाल पेश की. सादर नमन!

अप्रैल 1897 ईo में पूना शहर को महामारी प्लेग की काली छाया ने घेर रखा था. शहर की मुस्कान को मानो ग्रहण लग गया था. चारों ओर उदासी छाई हुई थी. हर व्यक्ति महामारी के चपेट में आने वाले खतरे से बोझिल था. मुर्दा घरों पर मुर्दों की लाइन लगी थीं. कई घरों में तो शवों को उठाने वाला भी कोई नहीं बचा था. लोग शहर छोड़-छोड़ कर अन्यत्र भाग रहे थे.

मौत के दैवी-तांडव के बीच एक और खेल चल रहा था. वह खेल था महामारी से ग्रस्त जनता के लूट का खेल. वह खेल था रोग के कीटाणुओं को मरने के लिये दवा छिडकने के बहाने घरों में घुसकर जवान बहू-बेटियों के साथ अभद्रता और छेड़-छाड़ का खेल. वह खेल था विरोध करने पर घरों को आग लगाने का खेल. आखिर यह खेल कौन खेल रहा था?

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

प्लेग महामारी पर काबू पाने के लिये मिस्टर वाल्टर चार्ल्स रैंड को पूना का प्लेग कमिश्नर नियुक्त किया गया था. रैंड महलालची, क्रूर और अत्याचारी था. उसने कर्मचारियों और सैनिकों की ऐसी टीम तैयार की हुई थी जो उसके इशारे पे काम करे. अत: उसके कर्मचारी प्लेग की गिल्टी को देखने के बहाने औरतों के वस्त्र उतरवा लेते थे और अभद्रता की सीमा लाँघ कर उन्हें बेइज्जत करते थे. उनके जेवर उतरवा लेते थे. यह खेल प्लेग कमिश्नर रैंड खेल रहा था.

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने लार्ड सांडर्स को कड़ा पत्र लिखा. उन्होंने इस पत्र में रैंड के अत्याचारों को तुरंत बंद करने की मांग की थी. इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा. तिलक के ‘केसरी’ पत्र के ओजस्वी लेखों ने युवकों में नई चेतना भर दी. उनकी प्रेरणा से महाराष्ट्र में देश की आजादी हेतु अनेक गुप्त संगठन कार्य कर रहे थे. ऐसे ही एक संगठन के सदस्य थे – दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर, इन दोनों का छोटा भाई वासुदेव चापेकर एवं महादेव रानाडे. वासुदेव और रानाडे की आयु अभी केवल सत्रह वर्ष थी. एस युवा दल ने घोषणा कर दी – “पूना की जनता को रैंड के अत्याचारों से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाएगी.”

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

दामोदर चापेकर ने रैंड के कोचवान से दोस्ती गांठ ली. उससे नौकरी मांगने के बहाने से रैंड के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली. वासुदेव चापेकर ने रैंड के यार-दोस्तों, रिश्तेदारों और कार्यक्रमों का ब्यौरा तैयार किया. महादेव रानाडे ने शस्त्रों का प्रबंध किया. इस प्रकार यह युवा दल तीन माह तक पूरी तैयारी में जुटा रहा.

22 जून, 1897 ई. महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण को पच्चीस वर्ष पूरे हो चुके थे. पूना के गवर्नमेंट हाउस में राज्यारोहण की हीरक जयंती का कार्यक्रम था. कमिश्नर रैंड भी इसमें उपस्थित था. यह युवा दल घात लगाये बाहर बैठा था और उत्सव की समाप्ति का इन्तजार कर रहा था.

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

रात्रि के बारह बजकर दस मिनट पर उत्सव समाप्त हुआ. रैंड बाहर निकला और बग्घी पर सवार होकर घर की ओर जाने लगा. युवा दल ने भी लुकते-छिपते आगे बढ़ते हुए बग्घी से कुछ दूरी बनाए रखी. जैसे ही बग्घी सुनसान से इलाके में पहुंची दामोदर चापेकर रैंड की बग्घी पर चढ़ा और उसे गोलियों का निशाना बना डाला. उसके पीछे केवल एक बग्घी और थी. बालकृष्ण चापेकर ने स बग्घी में बैठे अंग्रेज अधकारी आयरिष्ट की हत्या कर दी. यह क्रांतिकारी दल अपना काम करके सुरक्षित भाग निकला.

अगले दिन रैंड की हत्या का समाचार जैसे ही शहर में फैला, शहर के लोगों ने चैन की साँस ली. अपराधियों को पकड़ वाने वाले को बीस हजार रूपये के इनाम की घोषणा कर दी गई. उन दिनों २० हजार रूपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. शहर की नाकेबंदी कर खुफिया पुलिस को सतर्क कर दिया गया.

चापेकर बन्धुओं के दल में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचन्द्र द्रविड़ दो सगे भाई थे. उन्होंने इनाम की लालच में रैंड की हत्या का भेद पुलिस को बता दिया. घर का भेदी लंका डाहे. अत: वासुदेव चापेकर गिरफ्तार कर लिए गए. 18 अप्रैल,1898 को इन्हें फाँसी दे दी गई. बालकृष्ण चापेकर भूमिगत हो गए बाद में इन्हें भी आत्मसमर्पण करना पड़ा.

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

एक भाई को फाँसी लग चुकी थी. दूसरे के लिये फाँसी का फंदा तैयार था. यह विचार मन में आते ही वासुदेव बेचैन हो उठता था. एक दिन वह महादेव रानाडे से मिला और बोला – “मेरे दोनों भाइयों को द्रविड़ भाइयों ने पकड़वाया है. उनकी फाँसी के लिये वे ही जिम्मेदार हैं. मैं उन्हें इस गद्दारी की सजा अवश्य दूँगा. क्या तुम मेरा साथ दोगे?”

“वासुदेव ! हमने देश के लिये ही मरने और जीने की कसम खाई थी. मैं उसे भूला नहीं हूँ. हम लोग उन्हें गद्दारी का मजा अवश्य चखाएंगे “

महादेव रानाडे से बात करके वासुदेव अपने घर पहुंचा. माँ के चरण स्पर्श करता हुआ माँ से बोला – “माँ मुझे आशीर्वाद दीजिए.”

“माँ भौंचक्की सी होकर पूछ बैठीं – “बेटा कैसा आशीर्वाद? तू क्या करने जा रहा है?”

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

माँ, मैं अपने भाइयों को पकडवाने वाले को इनाम देने जा रहा हूँ.”

“पकडवाने वाले को…… इनाम ? मैं समझ गई, तू जरूर कोई गलत कार्य करने जा रहा है. बेटा इनाम और सजा तो ऊपर वाले के हाथ में है. हम उसे क्या सजा देंगे?”

“लेकिन माँ, ऊपर वाला स्वयं तो सजा देने आता नहीं है वह भी किसी न किसी को भेजता है, तो मुझे भी ऊपर वाले का आदेश है. अत: माँ मुझे आशीर्वाद दो.”

यह कहते हुए वासुदेव ने अपनी माँ का हाथ पकड़ा, उसे अपने सर पर रखा और चल दिया. माँ बिलखते हुए हृदय की पीड़ा को थामे उसे आशीर्वाद देती हुई आखें फाड़ कर उसकी ओर निहारती ही रह गई.

8 फरवरी,1899 ई. महादेव रानाडे और वासुदेव ने पंजाबी वेश धारण किया और द्रविड़ बन्धुओं के घर संदेश पहुंचा दिया कि उन्हें पुलिस स्टेशन बुलवाया है. दोनों भाइयों ने सोचा – “जरूर इनाम के बारे में बात करनी होगी और वह घर से निकल पड़े. घर से थोड़ी ही दूर चले थे कि दनादन गोलियों की बौछार से द्रविड़ भाइयों को वहीँ ढेर कर दिया.” देश के गद्दारों का अंत देख दोनों बहुत खुश थे. दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

Gaddari Ka Puraskaar Desh Bhakti Hindi Story

वासुदेव चापेकर ने 8 मई तथा रानाडे ने 10 मई, 1899 को फाँसी का फन्दा चूमा. वासुदेव के बड़े भाई बालकृष्ण चापेकर को उसके चार दिन बाद 12 मई को फाँसी पर लटकाया गया.

जिस माँ ने अपने तीन बेटों को फाँसी के फंदे पर झूलते हुए देखा हो, उस माँ के हृदय की पीड़ा का अनुमान लगाना कठिन है. राष्ट्र ऐसी वीर माताओं के आगे नतमस्तक है. राष्ट्र ऐसे वीर बालकों का सदैव ऋणी रहेगा. आज हम जिस आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, न जाने कितने वीर सपूतों के बलिदानों का यह परिणाम है. सभी जाने- अनजाने वीर देशभक्तों को सादर नमन!

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सबसे अच्छा अपना घर हिंदी कहानी Hindi Story Sabse Achha Apna Ghar

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सबसे अच्छा अपना घर हिंदी कहानी Hindi Story Sabse Achha Apna Ghar

आज विष्णुलोक में सभी प्रकार के पक्षियों का मेला लगा है. सारे पक्षी सज धज कर पधारे हैं. अवसर ही ऐसा है. तभी भगवान् विष्णु वहां आये और सभी पक्षियों की ओर ध्यान से देखने लगे. उनकी नजर गरुड़ के सफ़ेद मुख, लाल पंख और सुनहले शरीर पर पड़ी. उन्होंने उस पक्षी गरुड को अपना रथ बना लिया.

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अब गरुड़ सुबह उठते, तालाब के सुगंधित जल में स्नान करते. सुन्दर वस्त्र और गहने धारण करते, और तैयार होकर श्री हरि विष्णु की सेवा में उपस्थित हो जाते. उनको अपने पीठ पर बिठाकर पूरी सृष्टि का चक्कर लगाते. ऐसा करते हुए पक्षिराज गरुड़ का समय काटने लगा. कुछ महीनों बाद गरुड़ राज को अपना पुराना घर जाने की इच्छा हुई. उन्होंने श्री हरि विष्णु से छुट्टी माँगी. श्री हरि विष्णु ने कहा – अभी विष्णु लोक में बहुत काम है, कभी और अपने घर चले जाना.

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कुछ महीनों के बाद गरुड़ ने पुनः छुट्टी माँगी. श्री हरि विष्णु ने कहा – “मैं जानता हूँ गरुड़, तुम्हें कभी खुले आकाश में, तो कभी पेड़ों कि फुनगी पर उड़ना अच्छा लगता है. इस लोक में भी पेड हैं, वन हैं, नदी हैं, उसके किनारे बड़े-बड़े पेड़ हैं. तुम वहां जाओ, खूब विचरण करो, तुम्हारा मन लग जाएगा. अभी तुम्हें अपने घर जाने की क्या जरुरत है.”

गरुड़ बोले – “प्रभु! मुझे अपने घर कि बहुत याद आ रही है. मुझे चाहे आप दो दिन कि छुट्टी दे दीजिये, लेकिन मुझे अपने घर जाने दीजिये. मेरी आपसे विनती है.”

श्री हरि विष्णु ने कहा – “तुमने छुट्टी छुट्टी की रट लगा रखी है. यहाँ तुम्हें किस चीज की कमी है. जरा बताओ तो मुझे? सोने के लिये नर्म नर्म बिस्तर, खाने के लिये मेवे-मिष्टान, दूध दही, फल, मेवे जो चाहो खाओ. नहाने के लिये स्वच्छ जल वाला तालाब. तुम्हारे घर में वहां क्या ऐसा है जो तुम्हें यहाँ नहीं मिल रहा है और जिसके लिये तुम वहां अपने घर जाने की रट लगा रखे हो.”

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गरुड ने कहा – “ नहीं प्रभु! ऐसा कुछ भी नहीं है. आपके लोक में किसी चीज की कोई कमी नहीं है. आप तो तीनों लोकों के स्वामी हैं. यहाँ आने के लिये तो ऋषि मुनि वर्षों तक तपस्या करते हैं. लेकिन क्या करें प्रभु अपने घर की बहुत याद आ रही है. मुझे कुछ दिनों के लिये छुट्टी दे दीजिये. आपकी बड़ी कृपा होगी.”

यह सब सुनकर श्री हरि विष्णु ने गरुड़ को छुट्टी दे दी. छुट्टी मिलते ही गरुड़ ने अपने घर की ओर उड़ चले.

गरुड़ के जाते ही श्री हरि विष्णु ने अपने एक सेवक को बुलाया और उससे कहा – “तुम गरुड़ के पीछे पीछे जाओ और वहां देखो कि उसका घर कैसा है? वह कैसा रहता है? क्या खाता है? सब कुछ पता करो.”

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वह सेवक गरुड़ के पीछे पीछे गया. उसने देख कि गरुड़ एक पुराने वृक्ष की कोटर में बैठे हैं. वहां से आती जाती चिड़िया को देख खुश हो जाते हैं. उनके आवाज कि नक़ल करते हैं. कभी कौआ कि तरह कॉव कॉव करते हैं तो कभी तोता की तरह बोलते तो कभी मैना की तरह बोलते. सड़ी गली पत्तियों को हटाते, उसमें कीडे मकोडे को खाते. कभी नील गगन में उंची उड़ान लगाते तो कभी पानी की खोज में खूब उड़ते. कभी चिड़ियों के झुण्ड में उड़ते तो कभी नदी किनारे कीचड में लोटते. सेवक कई ड़ों तो यह सब देखता रहा और पुनः वापस विष्णु लोक जाकर श्री हरि को यह सब बताया.

अपनी छुट्टियां बिताकर जब गरुड़ विष्णु लोक पहुंचे तो श्री हरि ने पूछा – “सुनाओ गरुड़! कैसी रही तुम्हारी छुट्टी?

“प्रभु बहुत अच्छा रहा. खूब मजा आया”– गरुड़ खुश होकर बोले.

श्री हरि विष्णु बोले – पक्षिराज! यहाँ सब कुछ है, सारी सुविधाएं है. लेकिन इनके बावजूद तुम पेड़ की कोटर में रहने गए. कीडेमकोडे का भोजन करने गए. इसी के लिये तुमने रोते हुए छुट्टी माँगी थी.”

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“प्रभु! आप तो जगत है स्वामी हैं. आपको तो ज्ञात हि है कि अपना घर सबसे अच्छा होता है. चाहे वह पेड़ का कोटर ही क्यों न हो. यह आपका लोक है. आपके यहाँ मैं आपका सेवक हूँ. कुछ नियम और कायदे क़ानून से बंधा हूँ. चाहकर भी सदा अपने मन की नहीं कर सकता. यहाँ मुझे वैसी आजादी कहाँ? आजादी तो केवल अपने घर, अपने वतन में होती है. इसलिए सबसे अच्छा होता है अपना घर.”

गरुड़ के मुख से यह सब सुनकर श्री हरि विष्णु बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने कहा – “मैं तो तुम्हारे मुंह से यह सब सुनना चाह रहा था. यह बिलकुल सत्य है कि अपना घर सबसे अच्छा और प्रिय होता है.”

 

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सोना बरसाने वाला संत हिंदी कहानी Saint aur Gold Rain Hindi Story

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एक बहुत सिद्ध संत थे. उन्हें आकाश से सोना बरसाने की विद्या आती थी. परन्तु वह विद्या एक खास नक्षत्र में ही अपना काम कर सकती थी. यह नक्षत्र समाप्त हो जाने पर विद्या बेअसर हो जाती थी. विद्या में एक खास बात यह थी कि उसका प्रयोग वे संत अपने लाभ के लिये नहीं कर सकते थे.

Hindi Story Saint aur Gold Rain

चूँकि संत भ्रमण बहुत करते हैं, इसलिए उनको कभी नगर तो कभी निर्जन स्थान से गुजरना पड़ता है. एक दिन वे अपनी यात्रा के दौरान उनके मार्ग में एक भयंकर जंगल पड़ा. जंगल में एक पेड़ के नीचे कुछ डाकू बैठे थे जिन्हें कई दिनों से कुछ मिला नहीं था. डाकुओं ने संत को घेर लिया, और बोले- ‘तुम्हारे पास जो कुछ हो उसे रख दो नहीं तो तलवार से काटकर दो टुकड़े कर देंगे,’ संत बोले – मैं तो स्वयं भिक्षा मांगने जा रहा हूँ मेरे पास कुछ नहीं है जो आप लोगों को दूं.’ डाकू बोले – ‘तो मरने के लिए तैयार हो जा.’

संत बहुत घबरा गए. तभी उसे अपनी स्वर्ण विद्या का ख्याल आया. यह भी ध्यान आया कि वह नक्षत्र अब लगने ही वाला है. वे डाकुओं से बोले –‘आप लोग आधे घंटे इंतजार कीजीये. मुझे स्वर्ण – विद्या आती है. पर वह विद्या एक खास नक्षत्र में ही काम कर सकती है. उस नक्षत्र के लगने में अभी आधे घंटे बाकी है. आप लोग मेरे साथ यहाँ से थोड़ी दूर पर बहने वाली नदी के किनारे चलें. वहीं मैदान में आकाश से सोने की बारिश होगी.’

डाकू संत की बात मान गये. उसे बांधकर नदी के किनारे लाये. संत ने कहा –‘ अब नक्षत्र लगने वाला है. मैं नदी में छाती भर पानी में खड़ा होकर मन्त्र जाप करूंगा. इससे आकाश से एक क्षण के लिए सोना बरसेगा. आप लोग उसे ले लीजिएगा.’ संत नदी के अंदर जाकर छाती भर पानी में मन्त्र जपने लगा. इतने में आकाश से सोने की बूंदें गिरने लगी. ठीक एक क्षण तक यह स्वर्ण-वर्षा हुई. डाकुओं ने अपनी- अपनी झोलियां भर लीं. वे खुशी से आगे बढ़े.

Hindi Story Saint aur Gold Rain

कुछ ही दूर जाने पर उन्हें डाकुओं का एक अन्य गिरोह मिल गया. उस गिरोह में बहुत सारे डाकू थे. गिरोह ने उन्हें घेर लिया और जो भी पास में हो, रख देने को कहा. पहले वाले गिरोह के डाकुओं ने कहा, – ‘हमें छोड़ दो. हमारे पीछे-पीछे जो संत आ रहा है, वह आकाश से स्वर्ण की वर्षा कर सकता है. इससे आप लोगों को इतना सारा सोना मिल जायेगा कि सारी जिन्दगी आपको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. पर डाकुओं के दूसरे गिरोह ने उन्हें बंदी बना लिया और उस संत के पास आये. उस संत ने साफ मना कर दिया. उसने कहा – ‘जिस नक्षत्र में वह विद्या काम कर सकती है, वह अब समाप्त हो गया है वह नक्षत्र अब साल भर के बाद लगेगा.’

दूसरा गिरोह इस पर बहुत नाराज हुआ. उसने संत को वहीं तलवार से मार डाला और कहा कि यह झूठ बोलता है. हमें सोना देना नहीं चाहता.’ इसके बाद उन्होंने डाकुओं के पहले वाले गिरोह को मारना शुरू किया. थोड़ी ही देर में पहले गिरोह के सभी डाकू मार डाले गये. दूसरे गिरोह ने सारा सोना अपने कब्जे में कर लिया.

अब डाकुओं के बीच लूट का बंटवारा शुरू हुआ. थोड़ी ही देर में उनके बीच बंटवारे के बारे में झगड़ा होने लगा और मार-काट मच गई, अंत में दो को छोडकर शेष डाकू कट मरे.

शेष बचे दोनों डाकू बहुत थक गये थे. वे भूखे भी थे. उन्होंने आपस में सलाह किया कि एक डाकू सोने की रखवाली करता रहे, दूसरा पास के गाँव से जाकर कुछ खाना लाये.

Hindi Story Saint aur Gold Rain

जो डाकू खाना लेने गया था उसने वहीं भर पेट खाना खा लिया और अपने साथी के लिये लाये जाने वाले खाने में जहर मिला दिया, ताकि जहरीला खाना खाकर वह मर जाये और वह सारा सोना ले ले.

उधर उसका साथी इस फिराक में था कि जब वह खाना लेकर आये तो वह उसके उपर अचानक से टूट पड़े और तलवार से मारकर उसे खत्म कर दें और सारा सोना ले ले.

जब डाकू खाना लेकर आया और वह निश्चिंततापूर्वक खाना रखा रहा था तो पहले से ही मन बनाये उसका साथी उसके ऊपर टूट पड़े और मार डाला.

अपने साथी को मारकर डाकू ने सोचा कि अब आराम से भोजन कर थोडा सुस्ता ले, तब सोना लेकर चले.

भोजन कर वह लेट गया और थोड़ी देर में सदा के लिए आँख मूँद ली. सारा सोना धरा का धरा रह गया.

लालच या लोभ करनेवाले का यही हश्र होता है.

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तोता और चने का दाना हिंदी कहानी Parrot Aur Chane Ka Dana Hindi Story

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तोता और चने का दाना हिंदी कहानी Parrot Aur Chane Ka Dana Hindi Story

एक तोता था. उसे भूख लगी हुई थी. उसे कहीं से चने का एक दाना मिल गया. दाने को अपनी चोंच में पकड़ उसे खाने के लिये वह एक खूंटे के ऊपर जा बैठा. खूंटे में एक दरार थी. उसने जैसे ही खूंटे पर चना का दाना रखकर उसे फोड़ने के लिये उसपर चोंच मारी, दाल उस दरार में चली गयी. तोता बहुत परेशान हो गया. सोचा, अब क्या करें? उसने खूंटे से विनती इस प्रकार से की:

parrot aur chane ka dana hindi story

खूंटा- खूंटा दालि दे,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई बसेरे जाई.

खूंटे ने जब यह सुना तो तोते को डांटकर भगा दिया. तोता बढई के पास गया. वह बढई से जाकर बोला-

बढई-बढई, खूंटा चीर,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई बसेरे जाई.

parrot aur chane ka dana hindi story

बढई ने उसे भगा दिया. उसने तोता से कहा – ‘मेरे पास फुर्सत नहीं है.’ बढई से नाराज होकर तोता राजा के पास गया. वह राजा से जाकर बोला-

राजा राजा, बढई डांट,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

राजा ने तोते को वहां से भगा दिया क्योंकि वह उस समय अपनी रानी से बतिया रहा था. अब तोता रानी से बोला –

रानी रानी, राजा छोड़,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

रानी ने भी तोते को भगा दिया. अब तोता सांप के पास गया. जाकर सांप से बोला-

सांप सांप, रानी डस,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

parrot aur chane ka dana hindi story

सांप ने भी तोते को दुत्कार कर भगा दिया. अब तोता लाठी के पास जाकर उससे बोला-

लाठी लाठी, सर्प ठंठाव,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

लाठी ने भी तोते की बात नहीं मानी. अब तोता भाड़ के पास गया. उसको बोला-

भाड़ भाड़, लाठी जार,
लाठी न सर्प ठंठावइ,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

भाड़ ने भी तोते को भगा दिया. नाराज होकर अब वह समुद्र के पास पहुंचा. वह समुद्र से बोला-

समुद्र समुद्र, भाड़ बुताव,
भाड़ न लाठी जारइ,
लाठी न सर्प ठंठावइ,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

parrot aur chane ka dana hindi story

औरों की भांति ही समुद्र ने भी तोते को डांट कर भगा दिया. अब वह झल्लाहट में आकर हाथी के पास गया और उसको बोला –

हाथी हाथी, समुद्र सोख,
समुद्र न भाड़ बुतावइ,
भाड़ न लाठी जारइ,
लाठी न सर्प ठंठावइ,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

हाथी ने भी तोते की बात को नजरअंदाज करते हुए उसको वहां से चले जाने को कहा. अब वह आकाशबेलि के पास गया. बोला –

बंवरि बंवरि, हाथी बाँध,
हाथी न समुद्र सोखइ,
समुद्र न भाड़ बुतावइ,
भाड़ न लाठी जारइ,
लाठी न सर्प ठंठावइ,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

आकाशबेलि ने भी तोते को भगा दिया. अब तोता चूहे के पास गया. वह चूहे से बोला –

मूस मूस बंवरि काट,
बंवरि न हाथी बाँधइ,
हाथी न समुद्र सोखइ,
समुद्र न भाड़ बुतावइ,
भाड़ न लाठी जारइ,
लाठी न सर्प ठंठावइ,
सर्प न रानी डसइ,
रानी न राजा छोड़इ,
राजा न बढई डांटइ,
बढई न खूंटा चीरइ,
खुंटवा में दालि बा,
का खाई, का पीई,
का लेई, बसेरे जाई.

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चूहे ने तोते की पूरी बात ध्यान से सुना. उसे तोते के ऊपर दया आ गयी. वह बोला- ‘चलो, मैं अभी चलता हूँ. अभी बंवरि को काट- कूटकर बराबर कर देता हूँ.’ और वह आकाशबेलि की ओर उसे काटने को दौड़ा. इस पर आकाशबेलि सहमते हुए बोली-

‘हमके काटइ ओटइ मत कोइ,
हम त… हाथी बाँधब लोइ.’

अब वह हाथी को बाँधने के लिये दौड़ पडी. अपनी ओर आकाशबेलि को आते देखकर हाथी बोला-

‘हमके बाँधइ ओंधइ मत कोइ,
हम त… समुद्र सोखब लोइ.’

और वह समुद्र को पीने के लिये दौड़ पड़ा. अपनी ओर हाथी को आता देखकर समुद्र डर गया. वह समझ गया कि हाथी गुस्से में आकर उसे पी जाएगा. इसलिए वह डरकर बोला-

‘हमके पीअइ उअइ मत कोइ,
हम त… भाड़ बुताउब लोइ.’

समुद्र भाड़ को बुझाने के लिये उसकी तरफ दौड़ा. अपनी तरफ समुद्र को आता देख भाड़ बोला-

‘हंमई बुतावइ उतावइ मत कोइ,
हम त… लाठी जारब लोइ.’

भाड़ लाठी को जलाने के लिये उसकी ओर दौड़ा. अपनी तरफ भाड़ को आते देखकर लाठी बोली-

‘हमके जरावइ ओरावइ मत कोइ,
हम त… सर्प ठंठाउब लोइ.’

लाठी सर्प को पीट –पीट कर मारने के लिये दौड़ी. अपनी ओर लाठी को आते देखकर सांप बोला-

‘हमके ठंठावइ ओठावइ मत कोइ,
हम त… रानी डसब लोइ.’

सांप रानी को डसने के लिये चल पड़ा. अपनी ओर सांप को आते देखकर रानी बोली –

‘हमके डसइ ओंसइ मत कोइ,
हम त… राजा छोड़ब लोइ.’

रानी राजा को छोड़ने को तैयार हो गयी. यह देखकर राजा बोला –

‘हमके छोड़इ ओड़इ मत कोइ,
हम त… बढई डांटब लोइ.’

राजा उस बढई की खबर लेने निकल पड़ा. बढई ने सोचा कि अब तो राजा के हाथों मार पड़ना निश्चित है. वह तुरंत बोला –

‘हमके डांटइ ओंटइ मत कोइ,
हम त… खूंटा चीरन लोइ.’

और बढई आरी लेकर खूंटा चीरने चल पड़ा. बढई को अपनी ओर आता देख खूंटा बोला-

‘हमके चीरइ उरइ मत कोइ,
हम त… दालि देबइ लोइ.’

और फ़ौरन खूंटे ने चने की दाल निकाल कर बाहर फेंक दिया और उस दाने को लेकर तोता फुर्र से उड़ गया.

 

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महात्मा गांधी से जुड़ा प्रेरक प्रसंग Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

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महात्मा गांधी से जुड़ा प्रेरक प्रसंग Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने बापू के विषय में लिखा:Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

तू चला, लोग कुछ चौंक पड़े,
‘तूफ़ान उठा या आंधी है?’
ईसा की बोली रूह, ‘अरे!
यह तो बेचारा गांधी है!’

और आगे ..

बापू ने राह बना डाली,
चलना चाहे, संसार चले,
डगमग होते हों पाँव अगर
तो पकड़ प्रेम का तार चले!

Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

यह घटना उस समय की है, जब महात्मा गांधी यरवदा जेल में थे. उन दिनों यरवदा जेल में ही उनका ऑपरेशन हुआ था. ऑपरेशन होने के बाद वे शरीर से बेहद कमजोर हो गए थे. यहाँ तक कि उनको चलने फिरने में भी कठिनाई हो रही थी. वे पैरों में चप्पल की बजाय खडाऊं पहनते थे. वे जेल भी खडाऊं पहनकर ही गए थे. कई महीने उपयोग करने के कारण उनका खडाऊं टूट गया था. जेल प्रशासन की ओर से उन्हें एक नया खडाऊं दिया गया था, लेकिन वह खडाऊं बहुत वजनी था यानि भारी था. एक तो ऑपरेशन की वजह से कमजोर पड़ा शरीर और ऊपर से वजनी खडाऊं. इसे पहनकर चलने में गांधीजी को बहुत तकलीफ होती थी. कुछ दिनों बाद वे अपने आश्रम आ गए.

Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

एक रात की बात है. गांधीजी वही भारी वाला खडाऊं पहन कर चल रहे थे. इसको पहनकर चलने में उनको कुछ ज्यादा कष्ट हो रहा था. आश्रम में रह रहे सहयोगियों को उनकी यह तकलीफ नहीं देखी गयी. उसने चुपके से जेल से मिली उस भारी खडाऊं को वहां से हटाकर उसकी जगह एक हल्की खडाऊं की जोड़ी रख दी.

सुबह होने पर गांधीजी जब खडाऊं पहनने के लिये खड़े हुए तो उन्होंने अपने खडाऊं को इधर उधर ढूंढा. जब वह कहीं नहीं मिले तब उनकी नजर उस नए खडाऊं के जोड़ी पर पडी तो उसे नहीं पहनी और बोले – “अरे, मेरी खडाऊं तो रात तक यहीं पर थीं. पता नहीं कौन अपनी नयी खडाऊं यहाँ छोड़ कर चला गया है.” तभी एक आश्रमवासी उनके पास आया और बोला – “बापू! यह नयी खडाऊं की जोड़ी मैं आपके लिये ही लाया हूँ. आपको वह भारी खडाऊं पहनने में तकलीफ होती थी. मुझसे यह देखा नहीं गया, इसलिए मैंने ही उसे हटाकर इस नयी जोड़ी को वहां रख दिया था.”

इस पर गांधीजी बोले –“आश्रम के चारों तरफ रुपयों की बरसात हो रही है. इसलिए तो तुम्हें नयी जोड़ी खडाऊं लाने की सूझी. क्या तुम्हें यह पता है कि जो लोग रूपये भेजते हैं उनको यह विश्वास है कि उनके पाई पाई का यहाँ सदुपयोग हो रहा है? लेकिन यहाँ तो उनके साथ विश्वासघात हो रहा है.”

Mahatma Gandhi Devotion Motivational Story

यह सुनकर वह आश्रमवासी लज्जित हो गया. उसे अपनी गलती का एहसास हो गया. उसने कसम खाई कि आगे से वह बापू के आदेश का पालन करते हुए आश्रम के पाई पाई का सदुपयोग करेगा.

आज लोग सार्वजनिक जीवन में यदि इस सिद्दांत का पालन करें तो पता नहीं कितने जरूरतमंद लोगों का कल्याण हो जाए. आपको यह प्रेरक प्रसंग पढने के लिये धन्यवाद!