कमाल नाम का | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कमाल नाम का | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

दस वर्ष की अनुपमा चंद्रलतिका को संसार में दो बातें सबसे ज्यादा नापसंद थी ।

एक थी उसके छोटे भाई का उसकी चोटी खींचकर भाग जाना और दूसरा था, उसका लंबा नाम ।

‘अनुपमा चंद्रलतिका’ हुँ, ये भी कोई नाम हुआ । वह हमेशा अपने-आपसे कहती थी ।

सिर्फ अनुपमा होता या फिर सिर्फ लतिका होता तो भी ठीक ही लगता ।

लेकिन अनुपमा चंद्रलतिका और साथ में मिश्रा भी तो है । बोलने में ही इतना समय लग जाता है कि आप बाजार से सब्जी लेकर आ जाएँ ।

क्यों रखा ऐसा नाम आपने ? वह हमेशा अपने मम्मी-पापा से पूछती थी ।

और मम्मी-पापा से हमेशा वही जवाब मिलता, जब तुम बड़ी हो जाओगी तब बदल लेना अपना नाम ।

पता नहीं तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ?

कितना सुंदर नाम है अनुपमा चंद्रलतिका । और अनुपमा चुप रह जाती थी ।

एक बार वह अपने मम्मी-पापा के साथ घूमने मेले में गई ।

उसने मम्मी-पापा से पहले ही कह दिया था कि किसी के सामने उसे उसके पूरे नाम से न बुलाएँ ।

सिर्फ अनु कहकर बुलाएँ । मेले में एक जगह बड़ी भीड़ थी । बच्चे एक-दूसरे के ऊपर कूद-कूदकर अंदर झाँकने की कोशिश कर रहे थे ।

अनु यानि कि हमारी अनुपमा चंद्रलतिका ने भी अंदर झाँककर देखा ।

और बस वह देखती ही रह गई । अंदर उसका सबसे पसंदीदा कलाकार, जो उसका हीरो था, स्टेज पर अभिनय कर रहा था ।

‘करणकुमार!’ वह खुशी के मारे चिल्ला उठी ।

बाहर एक काउंटर था, जिस पर एक लड़की बैठकर कुछ लिख रही थी ।

उसने जाकर पूछा तो पता चला कि बच्चों के लिए एक पुरस्कार की योजना है, जो भी बच्चे चाहें अपना नाम यहाँ आकर लिखा दें ।

सभी नाम करणकुमार को दिखाए जाएँगे । करणकुमार एक बच्चे को चुनेंगे और आज की शाम वह उस बच्चे के साथ बिताएँगे ।

सभी बच्चे चिल्ला-चिल्लाकर अपना नाम लिखा रहे थे ।

अनु की मम्मी बोली, जाओ अपना नाम लिखाओ, तुम्हारा तो सपना है करणकुमार से मिलने का।

अनु से साफ मना कर दिया, कभी नहीं, मैं अपना मजाक नहीं बनवा सकती।

नहीं माँ कभी नहीं । और तब माँ खुद आगे गईं, अनु के मना करने के बाद भी ।

लिखिए मेरी बेटी का नाम, अनुपमा चंद्रलतिका मिश्रा, वे बोली ।

क्या ? क्या नाम बताया आपने ? काउंटर पर बैठी लड़की चौंककर बोली। ‘अनुपमा चंद्रलतिका।’

उन्होंने एक-एक शब्द साफ-साफ बता दिया। बोली, ये है मेरी बेटी।

और अचानक सबकी नजरें अनुपमा चंद्रलतिका की ओर घूम गई ।

उसे ऐसा लगा जैसे कि वह वहाँ से कहीं भाग जाए । वह धीरे से मम्मी-पापा के साथ आगे बढ़ गई ।

वे मेले में घूम ही रहे थे, तभी उन्हें लाउस्पीकर पर आवाज सुनाई दी, आज की शाम करणकुमार के नाम पुरस्कार जीता है एक बच्ची ने, जिसका नाम है अनुपमा चंद्रलतिका मिश्रा ।

और अनुपमा चंद्रलतिका को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ ।

घोषणा अभी चल ही रही थी, करणकुमार जी को बच्चों के नामों की पूरी सूची में यही नाम सबसे ज्यादा पसंद आया ।

वे देखना चाहते हैं कि इस अलग-से नाम वाली बच्ची आखिर है कौन ? तो इस नाम की जो भी बच्ची हो वह अंदर आ जाए ।

बस, उसके बाद पूरी शाम अनुपमा चंद्रलतिका के जीवन की सबसे सुंदर शाम बन गई । और यह कमाल था उसके नाम का! मानो या ना मानो!

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कुरूप कौन | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कुरूप कौन | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक स्कूल की छठी कक्षा में एक दिन टीचर पर्यायवाची पढ़ा रही थी।

पानी के पर्यायवाची हैं – नीर, जीवन और……

‘जल’ सभी बच्चे एक साथ बोले।

सुंदर के पर्यायवाची हैं – रमणीय, मनोहर…………

‘ खूबसूरत ‘ सभी बच्चों ने कहा।

वो संजयदत्त और उर्मिला वाली…….. एक बच्चा फुसफुसाया।

श ससससस चुप, टीचर सुन लेंगी। दूसरा बोला।

टीचर ने आगे पूछा, असुंदर के पर्यायवाची हैं – कुरूप, भद्दा और………

सभी बच्चे चुप हो गए। तभी एक कोने से आवाज आई ‘ कोमल त्यागी ? ‘

अचानक सभी की नजरें कोमल की ओर गई।

उसे ऐसा लगा जैसे वह शर्म के कारण मर ही जाएगी। टीचर ने बच्चों को खूब डाँटा पर कोमल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी।

वह पढ़ने में काफी तेज थी। सबसे पहले अपना काम पूरा कर लेती थी। यहाँ तक की उसके क्लास के बच्चे कभी-कभी उसकी नोटबुक लेकर काम पूरा करते थे।

वह भी सभी बातों को भुलाकर हमेशा सबकी मदद करती थी। लेकिन जब कभी ऐसा कुछ हो जाता था तो उसे बहुत दुख होता था।

जब वह बहुत छोटी थी, तब एक बार वह और उसकी माँ आग में फँस गए थे। उसी समय उसका चेहरा एक ओर से जल गया था।

यही कारण था कि कोई भी उसके पास नहीं आना चाहता था। उसकी ओर देखकर सब दया दिखाते थे। लेकिन ऐसा कोई नहीं था, जिसे वह अपना दोस्त कह सके।

आज फिर कोमल बहुत उदास थी। घर आकर अपनी पेंसिल कागज और रंग लेकर बैठ गई।

कोमल को चित्र बनाना बहुत अच्छा लगता था।

वह हमेशा सुंदर चित्र बनाती थी। उसके चित्रों में चहचहाते हुए पक्षी होते थे, सूरज की रोशनी होती थी। छोटे-छोटे प्यारे घर होते थे। कोमल को चित्रकला के लिए की पुरस्कार मिल चुके थे।

लेकिन आज वह एक बहुत ही बदसूरत और भद्दा प्राणी बनाना चाहती थी।

ऐसा एक जीव, जो कि उससे ज्यादा कुरूप हो। और फिर उसने एक चित्र बनाया।

एक ऐसा जीव का चित्र, जिसका शरीर मगरमच्छ का था, सर उल्लू का था और पैर गिद्ध के थे, नुकीले नाखून थे और बड़े-बड़े डरावने पंख थे। उसने इसे नाम दिया ‘ कुरूप। ‘

वह चित्र को अपने बिस्तर के सामने वाली दीवार पर लगाकर सो गई। थोड़ी देर बाद वह चौंककर उठी। उसने देखा सामने के चित्र से कुरूप गायब था।

तभी उसने एक धीमी-सी मीठी आवाज सुनी, कोमल, मैं यहां हूँ। उसने देखा सामने की खिड़की से कुरूप झाँक रहा था।

कोमल ने आश्चर्य से पूछा, तुम वहाँ क्या कर रहे ?

तुम्हें मुझको देखर डर नहीं लगता ? कुरूप ने पूछा। तब कोमल बोली, नहीं, मैं कैसे डर सकती हूँ ? मैं तो खुद ही कितनी कुरूप हूँ।

कुरूप बोला, मैं तुम्हें एक जगह ले जाना चाहता हूँ, तुम्हें वहाँ अच्छा लगेगा।

लेकिन मैं कैसे आऊँगी ?

मेरी पीठ पर बैठ जाओ।

और कोमल कुरूप की पीठ पर बैठ गई। वे उड़कर एक सुंदर नदी के किनारे पहुँचे।

वहाँ सब कुछ बहुत सुखकर था। ठंडी हवा चल रही थी। हरियाली थी। पक्षी चहचहा रहे थे। सब कुछ उसके सुंदर चित्रों जैसा ही था।

तभी उसे याद आया कि कुछ दिन पहले उसने ठीक ऐसा ही एक चित्र बनाया था। अपने चित्र की दुनिया में पहुँचकर वह बहुत खुश थी।

कुरूप ने उसे बताया यह वह जगह है, जहाँ केवल वे लोग ही आ सकते हैं. जो मन से सुंदर हों, जो सबका भला चाहते हों और जिनके मन में हमेशा अच्छे विचार आते हों।

और तभी कोमल चौंककर जाग गई। उसने देखा कि उसकी माँ उसे उठा रही थी, कुरूप वापिस तस्वीर में आ गया था।

कितना अच्छा सपना था! उसने सोचा।

उसे आईने में दिखी अपनी तस्वीर अच्छी तरह याद थी। और उसके बाद उसने अपने आपको कभी असुंदर नहीं समझा।

कुरूप कौन | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

आई बात समझ में | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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आई बात समझ में | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक चालाक लोमड़ी अक्सर दूसरे जानवरों को बेवकूफ बनाया करती थी ।

उनको अपने घर बुलाकर उनका मजाक उड़ाने में उसे बड़ा मजा आता था । वह इस तरह से बात करती थी कि दूसरे जानवरों को समझ नहीं आता था कि क्या कहें ।

एक बार उसने कुछ मुर्गियों को अपने घर आने का निमंत्रण दिया । लेकिन बेचारी मुर्गियाँ कैसे आती ?

वे तो पिंजरे में कैद थी ।

कुछ दिन बाद उसने एक बंदर को नदी के बीचों-बीचों एक टापू पर खाने के लिए बुलाया ।

बेचारा बंदर क्या करता, उसने मना कर दिया क्यूंकि उसे तैरना ही नहीं आता था ।

ऐसा ही मज़ाक करने के लिए उसने एक दिन एक सारस को अपने घर रात के खाने पर बुलाया ।

सारस ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया । रात को सारस लोमड़ी के घर पहुँचा ।

लोमड़ी ने दो बड़ी प्लेटों में सूप लाकर रख दिया । सारस ने जब यह देखा तो बेचारा दुखी हो गया क्यूंकि वह अपनी लंबी चोंच से सूप पी ही नहीं सकता था ।

लोमड़ी ने मजे ले-लेकर सूप चटा और सारस को बिना खाए-पिए ही अपने घर लौट जाना पड़ा ।

कुछ दिन बाद सारस ने लोमड़ी को अपने घर खाने पर बुलाया ।

लोमड़ी जब सारस के घर पहुँची तो सारस ने उसका खूब प्यार से स्वागत किया ।

उसे बैठाया और बताया कि उसने लोमड़ी के लिए स्वादिस्ट खीर बनाई है । सुनकर लोमड़ी के मुहँ में पानी आ गया ।

तब सारस ने दो लंबी सुराहियों में खीर लाकर रख दी । फिर उसने अपनी लंबी चोंच अंदर डाली और आराम से खीर खाने लगा ।

लोमड़ी ने सुराही को सब तरफ से चाटने की कोशिश की लेकिन खीर की एक बूँद भी नहीं चख पाई ।

बेचारी को निराश होकर भूखा ही लौटना पड़ा ।

जो वह अब तक सबके साथ करती थी, आज उसके साथ हो रहा था ।

सारस ने वापिस लौटते समय उससे सिर्फ इतना ही कहा, क्यों लोमड़ी, आई बात समझ में ?

कोई सताए तो कैसा लगता है यह बात लोमड़ी अच्छी तरह समझ गई थी ।

आई बात समझ में | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

छोटे हैं तो क्या हुआ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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छोटे हैं तो क्या हुआ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक हाथी को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड था ।

छोटे जानवरों को वह अपने सामने बिलकुल कमजोर समझता था ।

वह धम-धम करके चलता था, जिससे आस-पास के छोटे प्राणी डर जाते थे ।

चलते समय वह यह भी नहीं देखता था कि पाँव के नीचे क्या आ रहा है ।

कितने ही छोटे कीड़ें और जानवर उसके पाँव के नीचे पिचकर मर जाते थे ।

वह अकसर पानी पीने के लिए जंगल के पोखर पर आया करता था । फिर सूँड़ में पानी भरकर तेजी से उछलता था और जोर से चीखता था ।

उसकी धम-धम चाल से रोज कई मेढक उसके पाँव के नीचे दबकर मर जाते थे ।

एक दिन एक बूढ़े और अनुभवी मेढक ने हाथी को प्यार से समझाया, अरे भाई, तुम रोज यहाँ पानी पीने आते हो और हमारे कई भाइयों को चोट पहुँचाते हो ।

तुम नीचे देखकर क्यों नहीं चलते ?

हम छोटे जरूर है लेकिन हमें भी चोट लगती है । हाथी ने चिंघाड़कर कहा – तुम जैसे कीड़े-मकोड़ों का ध्यान रखना मेरे बस की बात नहीं ।

तुम तो मेरे नाखून के बराबर हो । दो चार मर भी गए तो क्या फर्क पड़ता है ?

बेचारा बूढ़ा मेढ़क उस घमंडी हाथी से क्या कहता । वह चुप हो गया ।

उसने आस-पास के छोटे जानवरों से बात की । पास के एक बिल में कुछ चूहे रहते थे ।

मेढ़क ने चूहों से अपनी समस्या कही । एक चूहा बोला, वैसे तो हम सच में हाथी के नाखून के बराबर ही हैं ।

लेकिन हम सब मिल जाएँ तो बड़े हाथी का मुकाबला भी कर सकते हैं ।

चूहे पोखर के आस-पास के मच्छरों को जानते थे ।

उन्होंने मच्छरों से बात की तो वे भी उनका साथ देने के लिए तैयार हो गए ।

सबने मिलकर एक सेना तैयार की । अगले दिन जब हाथी आया तो सब पहले से तैयार थे ।

जैसे ही हाथी ने अपनी सूँड नीचे की, एक चूहा उसकी सूँड से चिपक गया ।

हाथी चौंक गया । तभी दूसरा चूहा सूँड पर उछलकर सीधा आँखों तक पहुँच गया ।

और काटने लगा । हाथी चिल्लाया और तभी मच्छरों की पूरी सेना उस पर टूट पड़ी ।

हाथी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है । वह भागने लगा और मच्छर उसके साथ उसके पीछे-पीछे उड़े ।

वे तब तक उसे काटते रहे, जब तक कि हाथी गिर नहीं पड़ा ।

उस दिन के बाद वह कभी वहाँ नहीं आया । इस तरह छोटे-छोटे जानवरों ने मिलकर एक विशाल घमंडी हाथी को हरा दिया ।

छोटे हैं तो क्या हुआ | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

और कछुआ जीत गया | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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और कछुआ जीत गया | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक खरगोश और एक कछुए में गहरी मित्रता थी ।

वे साथ-साथ घूमते थे, खेलते थे और हमेशा एक-दूसरे की मदद करते थे ।

एक बार खेल-खेल में दोनों ने दौड़-प्रतियोगिता करने की बात सोची । उनको बरगद के पेड़ तह पहुँचना था ।

यह पेड़ वहाँ से कुछ ही दूर एक गाँव के ठीक बाहर था ।

यह निश्चित हुआ कि जो वहाँ पहले पहुँचेगा, वही विजेता कहलाएगा ।

दौड़ शुरू हुई ।

खरगोश जो कि खूब तेज दौड़ता था और उछल-उछलकर चलता था, बड़ी तेजी से आगे निकल गया ।

कछुआ अपनी आदत के अनुसार चल रहा था ।

एकदम धीरे-धीरे ।

कुछ देर दौड़ने के बाद खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा तो उसे कछुआ दूर तक कहीं दिखाई नहीं दिया ।

पास ही में एक ऊँचा घना पेड़ था । धीमी-धीमी हवा चल रही थी ।

खरगोश ने सोचा कि थोड़ा सुस्ता लेता हूँ फिर जल्दी से आगे बढ़ जाऊँगा ।

कछुए को तो यहाँ तक पहुँचने में अभी देर लगेगी ।

यह सोचकर वह पेड़ के नीचे लेट गया ।

ठंडी हवा ने उसे झटपट सुला दिया । उधर कछुआ धीरे-धीरे पेड़ की ओर बढ़ता जा रहा था ।

खरगोश काफी देर तक सोता रहा ।

जैसे ही उसकी आँख खुली, वह बरगद के पेड़ की ओर भागा ।

वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि कछुआ तो पहले से ही वहाँ पहुँच गया है ।

और इस तरह से धीरे-धीरे ही सही, पर लगातार चलकर कछुए ने प्रतियोगिता जीत ली ।

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सच्ची सुंदरता | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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सच्ची सुंदरता | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

बहुत पुराने समय की बात है ।

एक बड़े से समुद्र के बीचों-बीच एक छोटा-सा सुंदर टापू था ।

पुरे टापू पर बहुत सारे पेड़-पौधे थे । मैदानों में हरी-हरी घास थी और हर रंग के सुंदर फूल वहाँ उगते थे ।

फूलों की महक से सारा वातावरण महकता रहता था ।

वहाँ एक बहुत ही अच्छा राजा राज्य करता था ।

सभी की खुशी में वह खुश होता था । और सबके दुखों को बाँटकर कम करता था ।

हर वर्ष वहाँ राज्य के कुलदेवता की पूजा की जाती थी और उसके लिए बगीचे के सबसे सुंदर फूल को चुना जाता था ।

यह चुनाव राजा करता था । उस भाग्यशाली फूल को कुलदेवता के चरणों में चढ़ाया जाता था ।

पिछले कई वर्षों से बागीचे के सबसे सुंदर लाल गुलाब के फूलों को इसके लिए चुना जा रहा था ।

इसलिए गुलाब का पौधा बहुत ही घमंडी हो गया था ।

उसे लगता था कि वही एक है, जो सब फूलों में सबसे सुंदर हैं ।

घमंड के कारण वह तितलियों और मधुमक्खियों को अपने फूलों पर बैठने भी नहीं देता था ।

यहाँ तक कि पक्षियों को अपनी डालियों के पास भी आने नहीं देता था ।

उसके ऐसे व्यवहार के कारण कोई तितली या पक्षी उसके पास आना ही नहीं चाहते थे ।

हर वर्ष की तरह एक बार फिर वह दिन आने वाला था, जब कुलदेवता की पूजा की जानी थी ।

गुलाब के पौधे को पूरा विश्वास था कि राजा आएँगे और उसी को चुनेंगे ।

गुलाब के पौधे के पीछे मिटटी के ढेर पर एक पौधा अपने आप उग आया था ।

छोटा-सा, नाजुक-सा । उस पर चमकदार पीले रंग के छोटे-छोटे फूल उगे थे ।

वह एक जंगली पौधा था, इसलिए कभी कोई उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता था ।

उसके फूल छोटे थे, लेकिन बेहद सुंदर थे ।

घंटी के आकार के उन फूलों की पंखुड़ियाँ किनारों पर गहरे लाल रंग की थी ।

वह जानता था कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता है फिर भी वह बड़े प्यार से सभी तितलियों और पतंगों को अपने पास बुलाकर अपना रस पीने देता था ।

पक्षी उसकी डालियों पर बैठ कर खुश होते थे ।

यह सब देखकर पौधे को खुशी होती थी कि वह किसी के काम तो आ सका ।

और फिर वह दिन आया, जब राजा बागीचे में फूल चुनने आए । माली उन्हें सीधा गुलाब के पौधे के पास ले गया । इस बार तो गुलाब और भी सुंदर और बड़े खिले हैं महाराज! वह बोला ।

उसने सबसे बड़ा गुलाब तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन महाराज ने रोक लिया वे किसी और सुंदर फूल को ढूँढ़ रहे थे ।

वापिस जाने के लिए जैसे ही घूमे, उनकी निगाह पीले रंग के फूल पर पड़ी ।

उन्होंने घूमकर देखा तो उनको वह पीले फूलों वाला जंगली पौधा दिखाई दिया ।

उसके आस-पास अनेक तितलियाँ और पतंगे घूम रहे थे ।

जबकि गुलाब का पौधा अकेला, अलग खड़ा था । राजा धीरे से जंगली पौधे के पास गए और बोले – यह वह पौधा है जो बिना खाद-पानी के उग आया है ।

बाकी सभी पौधों का माली विशेष ध्यान रखते हैं ।

समय से पानी देते हैं, खाद डालते हैं, काट-छाँट करते हैं, इसलिए वे इतने सुंदर हैं । लेकिन यह वह पौधा है, जो अपनी हिम्मत से खड़ा है ।

फिर भी कितना स्वस्थ है, सुंदर है । सबसे अच्छी बात यह है कि इसके अच्छे स्वभाव के कारण सभी तितलियाँ उसके पास आकर बेहद खुश हैं ।

यही है सच्ची सुंदरता इसलिए कुलदेवता की पूजा के लिए मैं इस जंगली फूल को चुनता हूँ ।

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बिल्ली ने उठाया फायदा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

बिल्ली ने उठाया फायदा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |  100+ hindi story kahaniyan short bal kahani in hindi, baccho ki kahani suno, dadi maa ki kahaniyan, bal kahaniyan, cinderella ki kahani, hindi panchatantra stories, baccho ki kahaniya aur cartoon, stories, kids story in english, moral stories, kids story books, stories for kids with pictures, short story, short stories for kids, story for kids with  moral, moral stories for childrens in hindi, infobells hindi moral stories, hindi panchatantra stories, moral stories in hindi,  story in hindi for class 1, hindi story books, story in hindi for class 4, story in hindi for class 6, panchtantra ki kahaniya.

बिल्ली ने उठाया फायदा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक बिल्ली को रोटी का एक टुकड़ा दिखाई दिया । वह बहुत भूखी थी, इसलिए जल्दी से उस टुकड़े की ओर दौड़ी ।

इससे पहले कि वह टुकड़े तक पहुँच पाती, एक दूसरी बिल्ली ने भी उस टुकड़े को देख लिया ।

वह टुकड़े के नजदीक ही खड़ी थी ।

इसलिए उसने लपककर रोटी के टुकड़े को उठा लिया ।

इस बात पर दोनों बिल्लियाँ लड़ने लगीं ।

मैंने इसे पहले देखा था, इसलिए यह मेरा है । पहली बिल्ली बोली ।

लेकिन इसे उठाया तो पहले मैंने है न! इसलिए यह मेरा है ।

दूसरी बिल्ली जोर से म्याऊँ कहकर बोली ।

‘मेरा है’

‘मेरा है’

‘नहीं मेरा है’

‘नहीं मेरा है’

‘मेरा’

‘मेरा’

और इस तरह दोनों जोर-जोर से चिल्लाने और झगड़ने लगीं ।

यह शोर छत पर बैठे एक बंदर ने सुना । वह नीचे उतरा और बिल्लियों से बोला, ‘बिल्लियो, तुम लड़ों नहीं, मैं तुम्हारी मदद करता हूँ ।’

‘कैसे ?’

बंदर बोला , तुम दोनों इस टुकड़े को आधा-आधा बराबर बाँट क्यों नहीं लेतीं ।

यह बात दोनों बिल्लियों को अच्छी लगी ।

लेकिन कौन इस रोटी को बराबर बाँटेगा ?

‘यह काम मैं करूँगा ।’ बंदर बोला ।

उसने रोटी हाथ में ली और दो हिस्सों में तोड़ दी ।

लेकिन एक टुकड़ा थोड़ा-सा बड़ा और दूसरा थोड़ा-सा छोटा था । बंदर बोला, इन टुकड़ों को बराबर करना ही होगा । नहीं तो तुम दोनों फिर से लड़ने लगोगी ।

यह कहकर उसने बड़े टुकड़े में से एक भाग तोड़कर खा लिया । लेकिन यह क्या ?

अब दूसरा टुकड़ा बड़ा हो गया ।

उसे छोटा करने के लिए उसने इस बार दूसरे टुकड़े में से एक भाग तोड़ा और खा गया ।

अब परेशानी यह हुई कि पहले वाला टुकड़ा बड़ा हो गया । तो उसने अब पहले वाला टुकड़ा लिया और उसमें से थोड़ा-सा खा गया ।

बिल्लियाँ चुपचाप खड़ी देख रही थी और बंदर को कुछ कह भी नहीं पा रही थी ।

देखते-ही देखते बंदर ने एक-एक भाग खाते-खाते सारी रोटी खत्म कर दी और खौं-खौं करते हुए भाग गया ।

और बिल्लियाँ बेचारी क्या करती । उनकी लड़ाई में बंदर ने फायदा जो उठा लिया था ।

बिल्ली ने उठाया फायदा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

चिड़िया का घोंसला | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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चिड़िया का घोंसला | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

इस बार गर्मी की छुट्टियों में एनी अपनी सहेलियों के साथ खेलने के बजाय सारा दिन पार्क में बैठी छोटे-छोटे पक्षियों को घोंसला बनाते देखती रहती ।

पार्क में तरह-तरह के पक्षी आते थे – गौरैया, कबूतर, कठफोड़वा, लवा और बुलबुल ।

एनी किसी भी पक्षी को देखते ही पहचान जाती थी, क्योंकि उस की मैम ने उसे सभी पक्षियों के सुंदर चित्र दिखाए थे और कहा था कि इन छुट्टियों में तुम सब पक्षियों की आदतें गौर से देखना और गरमी

की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुलेगा तब तुम सब को पक्षियों पर एक लेख लिखने के लिए दिया जाएगा ।

सब से अच्छे लेख पर जो किताब इनाम में दी जाने वाली थी, वह भी बच्चों को दिखाई गई थी ।

मैम ने उम्हें जानवरों और पक्षियों की कहानियों वाली उस किताब के रंगीन चित्र भी दिखाए थे और कहानियां भी पढ़ कर सुनाई थी ।

एनी को वह किताब इतनी पसंद आई थी कि उस ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि जैसे भी हो वह इस किताब को पाने के लिए मेहनत करेगी और इसलिए एनी अपनी छुट्टियां खेलने के बजाय पार्क में बैठ कर पक्षियों की आदतों को जानने में गुजार रही थी ।

एनी देखती कि पक्षी अपना घोंसला बनाने के लिए कितने धैर्य से छांटछांट कर पुराणी सुतली, घास, पत्तियां और घोंसले को आरामदेह बनाने के लिए पंख आदि जमा करते हैं ।

एनी का जी चाहता, कितना अच्छा होता कि मैं भी इन पक्षियों की कुछ मदद कर सकती ।

अचानक एनी को एक खयाल आया । इन दिनों ज्यादातर पक्षियों ने अपने घोंसले बना लिए थे, फिर भी कुछ पक्षी ऐसे थे जिन के घोंसले अभी तक तैयार नहीं हुए थे ।

कुछ शरारती लड़कों ने पत्थर मार कर इन के घोंसले नष्ट कर दिए थे । एनी ने उन्हें गुस्सा कर रोकना चाहा ।

एनी ने सोचा-क्यों न मैं अपने हाथों से एक घोंसला बना कर बगीचे के किसी पेड़ पर लटका दूं ।

हो सकता है कोई पक्षी वहां रहने आ जाए, आह, कितना अच्छा लगेगा जब पक्षी वहां अंडे देंगे और कुछ दिनों में घोंसला छोटे-छोटे पक्षियों से भर जाएगा ।

पक्षियों की चहचहाहट से मेरे बगीचे में रौनक आ जाएगी, यह सोच कर एनी बहुत खुश हुई ।

अब तो एनी को अपने आप गुस्सा आ रहा था कि इतनी अच्छी बात उसे पहले क्यों नहीं सूझी ? कुछ मिनटों का ही तो काम होगा और बस घोंसला तैयार हो जायेगा । पक्षियों के चोंच से बने घोंसलों के मुकाबले मेरा यह घोंसला ज्यादा सफाई से बना हुआ होगा, एनी ने सोचा ।

अगले दिन एनी की मां यह देख कर बड़ी हैरान हुई कि एनी सारा दिन तिनके, कागज आदि ही बुनती रही ।

कहां तो एनी ने सोचा था कि घोंसला बनाना तो कुछ मिनटों का ही काम है और कहां एनी को सारी शाम घोंसला बनाते- बनाते गुजर गई ।

घोंसला को टिकाने के लिए एनी ने बांस की कुछ तीलियां भी लगाई थी । अब वे तीलियां टिक नहीं रही थी ।

बेचारी एनी ने धागे की पूरी रील लगा दी ।

तब कहीं जा कर घोंसला इधर-उधर से बंध कर तैयार हुआ, पर घोंसला अजीब ऊबड़खाबड़ सा बना था ।

यह तो पक्षियों को बहुत चुभेगा, यह सोच कर एनी मां के पास गई और बोली, मां, यह घोंसला अंदर से कितना सख्त है, इसे जरा नरम बना दो न ।

मां ने एक छोटी कटोरी ली और घोंसले के अंदर उसे गोलमोल घुमा कर काफी हद तक उसे आरामदेह बना दिया । ऊबड़खाबड़ तिनके और कागज बैठ गए थे |

अब एक छोटा सा घोंसला तैयार था जो न गोल कहा जा सकता था, न चौरस और न लंबा ।

चिड़ियाँ चोंच से घोंसला बनाती हैं, पर कितने सलीके और सफाई से बनाती हैं । हाथों से तो कभी ऐसे घोंसला बनाए ही नहीं जा सकते ।

सुबह एनी ने बड़ी शान से वह घोंसला बगीचे के एक पेड़ पर लटका दिया और खुद कुछ दूरी पर खड़ी इंतजार करती रही कि कोई पक्षी आ कर उसे अपना घर बना ले ।

पर जब काफी समय गुजर गया और कोई पक्षी न आया तो एनी बड़ी निराशा हुई । अचानक उस ने देखा लवा पक्षियों के एक जोड़े ने, जो घोंसला के ऊपर मंडरा रहा था, चोंच मारमार कर घोंसला तोड़फोड़ डाला ।

‘शैतान, पक्षी ‘ गुस्से से एनी बड़बड़ाई ।

एनी की आवाज सुनकर उसकी मां वहां आ गई ।

मां, देखो न, उन्हें मेरा घोंसला पसंद नहीं आया, एनी ने सुबकते हुए कहा ।

मां भी वहीं खड़ी हो कर पक्षियों की हरकतें देखने लंगी ।

अचानक मां जोर से हंस पड़ी, देखो, एनी, ये पक्षी पहले घोंसले से तिनके चुनचुन कर एक नया घोंसला तैयार कर रहे हैं । हो सकता है ये लोग और किसी के बनाए घोंसलों में रहना पसंद न करते हों । मां, मैं जो लेख लिखूंगी न, उस में यह बात भी जरूर लिखूंगी, एनी बोली ।

एनी, पक्षियों ने घोंसला चाहे जिस कारण तोड़ा हो, पर वे तुम्हारा बड़ा एहसान मान रहे होंगे कि तुम ने घोंसला बनाने का सारा सामान एक जगह जमा कर रखा है, मां ने कहा ।

मां, तुम ने एक बात पर गौर किया ? एनी ने मां से कहा, यह लवा अपना घोंसला झाड़ियों के अंदर बनाती है ।

हाँ, एनी, अभी तक तो मैं ने यही देखा सुना था कि लवा अपना घोंसला पेड़ पर या घरों के रोशनदानों आदि में बनाती है । आज पहली बार मैं यह तरीका देख रही हूँ ।

एनी सारा दिन बगीचे में बैठी लवा पक्षियों को काम में जुटे देखती रहती । एनी की मौजूदगी का पक्षी भी बुरा नहीं मानते थे । शायद उन्हें पता था कि वह उन की मित्र है ।

जल्दी ही घोंसला छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भर गया । इसी बीच एनी को लवा पक्षी की एक और दिलचस्प आदत का पता चला ।

आमतौर पर पक्षी उड़ते हुए आते हैं और सीधे अपने घोंसले पर ही उतरते हैं, पर लवा कभी ऐसा नहीं करती। वह हमेशा अपने घोंसले से थोड़ी दूरी पर उतरती है और फिर फुदकफुदक कर और थोड़ा इधर-उधर पता चले ।

घूम कर अपने घोंसले में जाती है । शायद वह नहीं चाहती कि किसी को उसी के घोंसले की जगह पता चले ।

छुट्टियों के बाद जब लेख प्रतियोगिता हुई तो एनी को प्रथम पुरस्कार मिला । इनाम वाली किताब हाथ में पकड़े एनी अपनी सहेलियों को बता रही थी, तुम्हें पता है, मैं ने एक नहीं दो इनाम जीते हैं । एक तो यह किताब और दूसरा अपने बगीचे में छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भरा घोंसला ।

इस कहानी से हमे ये सीख मिलती है कि “कोई प्रतियोगिता जीतने से ज्यादा, दूसरों की मदद कर के खुशी मिलती है । ”

चिड़िया का घोंसला | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

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कौन है सबसे ताकतवर | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक छोटे से शहर में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था । उनके पास बहुत थोड़ी-सी जमीन थी ।

वे उस पर खेती करके फसल को बाजार में बेचते थे । इससे उन्हें थोड़े-से पैसे मिलते थे ।

एक बार वे दोनों दीपावली पर घर की सफाई कर रहे थे । तभी उनको लकड़ी के एक पुराने डिब्बे के पीछे से चाँदी का एक सिक्का मिला ।

वे दोनों बहुत खुश हुए । उन्होंने उससे अच्छे बीज और खाद खरीदी ।

इस बार उनके यहाँ बहुत अच्छी फसल हुई ।

अगली दीपावली पर वे फिर सफाई कर रहे थे । तब उन्हें एक और चाँदी का सिक्का मिला ।

इस बार उन्होंने दो बैल खरीदे, जिससे की खेत जोतने में आसानी हो ।

बैलों के साथ काम जल्दी और अच्छा हो जाता था । इस बार फसल पहले से भी ज्यादा अच्छी हुई । अब उनके पास काफी पैसे हो गए थे ।

दीपावली फिर आई । एक बार फिर सफाई करते समय उनको चाँदी का एक सिक्का मिला ।

इस बार उन्होंने तय किया की एक बकरी खरीदी जाए । सिक्के से उन्होंने एक अच्छी-सी बकरी खरीदी जो कि बढ़िया दूध देती थी ।

अब वे खुश-खुशी रहते थे । खेती अच्छी होती थी । धीरे-धीरे उन्होंने कुछ और जमीन भी खरीद ली थी । उनके पास बैल थे खेत जोतने के लिए । अब बकरी भी थी जो दूध देती थी ।

दीपावली फिर आई । सफाई करते समय एक बार फिर उन्हें चाँदी का एक और सिक्का मिला । इस बार उन्होंने उस सिक्के से एक बिल्ली खरीदी । एक सुंदर-सी सफेद बिल्ली ।

किसान की पत्नी बिल्ली को बहुत प्यार करती थी और रोज उसे दूध पिलाती थी । बिल्ली झट-से सारा दूध पी जाती थी ।

इसी तरह एक साल निकल गया । दीपावली फिर से आ गई । एक बार फिर उन दोनों ने सफाई की और उन्हें फिर से मिला चाँदी का एक सिक्का ।

उनके पास अब बहुत से पैसे थे । किसी चीज की कोई कमी नहीं नहीं थी । उनका एक सुंदर घर था, उनके पास बैल थे, एक बकरी थी, एक सुंदर बिल्ली भी थी ।

उन्होंने निश्चय किया किया कि इस सिक्के से वे अपने घर के बगीचे में कांच का एक पुल बनाएँगे ।

इससे उनका घर और भी सुंदर दिखाई देगा । उन्होंने कांच का एक छोटा-सा पल अपने घर के आगे बनवाया । अब वे ये देखना चाहते थे की पुल मजबूत है या नहीं ।

इसलिए उन्होंने खुद पुल पर चढ़ने से पहले बाकी सबको पुल के ऊपर से जाने को कहा ।

पहले बैल चढ़ा, पुल नहीं टुटा । फिर बकरी पुल के ऊपर से गई । पुल नहीं टुटा । लेकिन जैसे ही बिल्ली पुल चढ़ी, पुल टूट गया ।

पता है क्यों ? क्योंकि वह रोज खुशी-खुशी दूध पीती थी और जो रोज दूध पीते हैं, वो सबसे ज्यादा ताकतवर होते हैं – सबसे ज्यादा मजबूत !

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बेचारी स्वीटी | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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बेचारी स्वीटी | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक छोटी बच्ची थी स्वीटी । यूँ तो देखने में एकदम गोल-मटोल थी, लेकिन वह हमेशा बीमार रहती थी ।

बीमार भी वह अचानक ही पड़ जाती थी । एक बार स्वीटी के हाथ में इतना ज्यादा दर्द हुआ कि उस पर पट्टी बाँधनी पड़ी ।

ऐसा अँगेजी के टैस्ट के ठीक पहले हुआ । उसकी अध्यापिका ने पूछा, दर्द बहुत ज्यादा है ?

बिलकुल भी नहीं लिख सकती ? नहीं टीचर, बिलकुल नहीं, स्वीटी बोली ।

टीचर को उस पर तरस आ गया और बोली, कोई बात नहीं बेटी, मैं बाद में तुम्हारा टैस्ट ले लूँगी ।

कुछ दिन बाद स्वीटी गले पर पट्टी बाँधकर आई ।

टीचर ने उससे पूछा, गला दर्द कर रहा है क्या ? हाँ, बहुत ज्यादा, स्वीटी फुसफुसाकर बोली ।

ओ हो मैं तो आज गाने की परीक्षा लेने वाली थी, टीचर ने कहा ।

लेकिन बेचारी स्वीटी की तो ठीक से बोल भी नहीं प् रही थी । वह कैसे गया सकती थी ।

कुछ दिन बीते और एक दिन स्वीटी पैर पर पट्टी बाँधकर स्कूल आई ।

बेचारी स्वीटी ठीक से चल भी नहीं पा रही थी । और मजे की बात यह थी की उसी दिन स्कूल में खेल कूद की प्रतियोगिताएँ थी ।

सभी बच्चे भाग-दौड़ रहे थे और बेचारी स्वीटी एक और चुपचाप बैठी थी, उदास ।

तब टीचर ने उसे बुलाया और पूछा, स्वीटी तुम्हारी आँखों में तो दर्द नहीं हो रहा है ना ?

नहीं टीचर, अभी तक तो नहीं, स्वीटी बोली ।

अगर होगा न, तो आँखों पर भी पट्टी बाँध लेना । सब बच्चे जान जाएँगे कि तुम्हें अपने झूठ बोलने पर शर्म आने लगी है । टीचर ने कहा ।

स्वीटी को अपनी गलती पर बहुत शर्म आई । उस दिन के बाद स्वीटी को फिर कभी दर्द के कारण पट्टी नहीं बाँधनी पड़ी ।

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