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गोबर बादशाह का कमाल हिंदी कहानी Gobar Badshah kaa Kamaal Hindi Story

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एक औरत का छोटा और मासूम बच्चा कई दिनों से बीमार चला आ रहा था. कई डॉक्टर को दिखा चुकी थी. जिसने भी जिस डॉक्टर या वैद्य का नाम बताया, बच्चे को लेकर उधर ही दौड़ पड़ती. कोई दवा काम नहीं कर रही थी. जो भी जान-पहचान का मिलता, तो यह पूछता था, “अभी ठीक नहीं हुआ तुम्हारा बच्चा?”

वह उसको सीधा-सादा जबाब देती, “किसी की दवा नहीं लग रही है. कई वैद्यों को दिखा चुके हैं.” एक दिन वह कहीं से बच्चे की दवा लेकर आ रही थी. रास्ते में उसे मोहल्ले का एक व्यक्ति मिला. मोहल्ले के नाते से वह उसे भाभी कहता था. बोला, “भाभी क्या हाल है तुम्हारे बच्चे का ?”

उसने उत्तर दिया, “अभी तो कोई दवा नहीं लगी है. बहुतों का इलाज करा लिया है. तुम्हीं बता दो कोई डॉक्टर हो तो ?”
वहीं गली के किनारे एक छोटा मैदान-सा था. वहाँ एक पीपल का पेड़ खड़ा था. वहाँ घुमतु गाएँ आकर बैठ जाती थीं. वहाँ गोबर हमेशा पड़ा ही रहता था. उसने उसी गोबर की ओर इशारा करते हुए मजाक किया, “देखो, वो गोबर बादशाह हैं. वहाँ पीपल के नीचे जाकर मत्था टेको और दो अगरबत्ती जलाओ. ठीक हो जाएगा. लेकिन दवाएं खिलाना बंद मत करना.”

उसने कहा, “अच्छा देवर जी. मैं यह भी करके देखती हूँ,” और आगे बढ़ गई. एक दिन सुबह स्नान करके वह महिला वहां आई. वहाँ उसे कुछ नजर नहीं आया. फिर उसे याद आया कि उसने गोबर बादशाह कहा था. गोबर तो पड़ा था. उसने वहीं मत्था टेका. दो अगरबत्ती जलाकर गोबर में लगाई और चली गई. इधर वह दवा भी खिलाती रही और उधर वह मत्था टेकती, अगरबत्ती जलाती और जय गोबर बादशाह कह कर चल देती. एक दिन उसे वही आदमी फिर मिला. वह बोला “भाभी, अब तुम्हारे बच्चे की तबीयत कैसी है?”

गोबर बादशाह का कमाल हिंदी कहानी Gobar Badshah kaa Kamaal Hindi Story

महिला बोली, “देवर जी, भगवान तुम्हारा भला करे. गोबर बादशाह को मत्था टेकने से मेरा बेटा बिलकुल ठीक हो गया है.” यह सुन उस आदमी को बड़ा आश्चर्य हुआ. फिर वह बोला, “अच्छा, बिलकुल ठीक हो गया ?” महिला ने हंसते हुए कहा, “हां देवर जी.”

वह आदमी बोला, “सब ऊपर वाले की मेहरबानी है.” इतना कहकर वह सोचने लगा, “मैंने तो ऐसे ही मजाक में कह दिया था. यानि डॉक्टर की दवा ने काम किया और इस महिला को गोबर पर विश्वास हो गया.”

बच्चे के ठीक होने की खुशी में उस महिला ने वहां पीपल के पेड़ के नीचे एक आयताकार जगह में किनारे-किनारे ईंटे गडवा दीं और छ: इंच उंचा चबूतरा बना दिया. रास्ते में जब उसे कोई दूसरी महिला मिलती तो वह पूछती कि तुम्हारा बच्चा किसकी दया से ठीक हुआ. मेरे बच्चे को भी किसी की दवा नहीं लग रही है, तो वह महिला कहती, “बहन, मैंने तो गोबर बादशाह को मत्था टेका था और दो अगरबत्तियां जलाई थीं.”

दूसरी महिला बोली, “बहन यह गोबर बादशाह हैं कहाँ?” उसने बताते हुए कहा, “डेयरी के सामने वाली गली में पीपल का पेड़ है. उसके नीचे मैदान-सा है. वहाँ गोबर पड़ा रहता है.” वह बोली, “अच्छा बहन! मैं भी जाउंगी मत्था टेकने,” उस महिला ने यह भी बताया कि जिस डॉक्टर की दवा दे रही हो, दवा करते रहना है. दवा बंद नहीं करना है. महिला ने ‘अच्छा बहन’ कहा और चली गई. इस प्रकार जो भी उस महिला के पास आता, वह उसे गोबर बादशाह का स्थान बता देती और साथ में हिदायत देती कि दवा खिलाना बंद मत करना.

कुछ दिन बाद किसी को किसी डॉक्टर की दवा सटीक बैठ गई और वह ठीक हो गया. लेकिन उसने समझा कि गोबर बादशाह की कृपा से ठीक हुआ है. वह महिला थोडा अधिक खाते-पीते घराने की थी. उसने उस छ: इंच उंची जगह पर तीन फुट उंचा चबूतरा बनवा दिया. इसी प्रकार जब तीसरे का बच्चा ठीक हुआ, उसने उस चबूतरे पर संगमरमर के पत्थर बिछवा दिए. इसी प्रकार कुछ दिन बाद एक ने पक्का कमरा बनवा दिया. अब वहाँ मत्था टेकने वालों की भीड़ होने लगी.

गोबर बादशाह का कमाल हिंदी कहानी Gobar Badshah kaa Kamaal Hindi Story

उधर से एक भिखारी निकला करता था. उसने देखा कि यहाँ पर तो कुछ नहीं था. धीरे-धीरे यहाँ कमरा बन गया और कोई देखभाल करने वाला भी नहीं है. उसने वहाँ अपना डेरा जमा लिया. अब वह सुबह-शाम उसको पानी से धोकर साफ रखता और अगरबत्ती लगा देता. आने वाले लोग जो श्रद्धा से देते, ले लेता था. कुछ समय बाद वहां शहर तथा आस-पास के गांव के लोग मत्था टेकने आने लगे. जब किसी की मनौती पूरी हो जाती तो कुछ न कुछ उस जगह की बढ़ोत्तरी हो जाती. अब वह स्थान गोबर बादशाह के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

कुछ दिन बाद उस पुजारी ने साल में दो-तीन तारीखें निश्चित कर दीं. उन तारीखों में मेले लगने शुरू हो गए. मन्दिर के आस-पास फूल वाले, धुप-अगरबत्ती वाले, प्रसाद वाले, चाट वाले आदि रास्ते के एक लाइन में बैठने लगे. आस-पडोस वालों को तो गोबर बादशाह की जन्म-कुंडली मालूम ही थी. इसलिए वे मत्था टेकने नहीं जाते थे.

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जब कभी उस गली के लोग आपस में बैठकर बातें करते तो एक बुजुर्ग उस आदमी की ओर हाथ उठाकर कहता, “असली तो गोबर बादशाह ही हैं. इन्होने वहाँ पड़े गाय के गोबर को मजाक में गोबर बादशाह कह दिया था. आज सचमुच ‘गोबर बादशाह’ का कमाल है.”

यदि आप ध्यान से देखें तो आपको अपने आस-पास इस तरह के गोबर बादशाह किसी और अन्य नाम से अवश्य मिल जायेंगे. जय हो गोबर बादशाह!

 

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ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया Ishwar ki Maya Kahin Dhoop Kahin Chhaya

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अक्सर लोगों के मुंह से सुनने को मिल जाता है – ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया. इसको और स्पष्ट करने के लिए एक दृष्टान्त का जिक्र करना लाजिमी हो जाता है.

Ishwar ki Maya Kahin Dhoop Kahin Chhaya

पिछले दिनों एक सज्जन अपने एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने गए थे. उस परिवार की गिनती शहर के अमीर और संपन्न लोगों में होती है. उनका फलता-फूलता व्यवसाय ही उनकी सम्पन्नता का कारण है. उनके घर में शहर के नामी-गिरामी लोगों का आना-जाना लगा रहता है.

शादी वाले दिन तो उनके घर की प्रत्येक चीज से उनकी सम्पन्नता झलक रही थी. उनकी शानो-शौकत देखते ही बन रही थी. पूरे बंगले को फूलों और रंग-बिरंगी बत्तियों से सजाया गया था. मेहमानों को लाने और ले जाने के लिए मँहगी-मँहगी कारों का काफिला लगा था. जो लोग इस शादी में शामिल होने के लिए शहर के बाहर से आये थे, उनके ठहरने के लिए डीलक्स होटलों में व्यवस्था की गयी थी. उनके बंगले की ओर जो भी जाता था वह कुछ पल के लिए भौचक्का रह जाता था. दूर-दूर तक इसी शादी के चर्चे थे.

खान-पान की भी व्यवस्था किसी पाँच सितारा होटल से कम नहीं थी. लोग जितना खा रहे थे उससे ज्यादा बरबाद कर रहे थे. मेहमानों की विदाई मँहगे उपहारों से की जा रही थी.

ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया Ishwar ki Maya Kahin Dhoop Kahin Chhaya

रात काफी हो चुकी थी, इसलिए वे सज्जन भी सभी से इजाजत लेकर अपने घर की ओर चल पड़े . दिसम्बर का महीना था, रात को ठंड थोड़ी बढ़ गई थी. उन्होंने ओला का कैब मंगाया और घर की ओर बढ़ चले.रास्ते में टैक्सी में कुछ खराबी आ गई और उसकी मरम्मत में थोड़ा समय लग गया. ड्राइवर खराबी को ठीक करने में लगा हुआ था. इस बीच में उस सज्जन ने सड़क के किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर गए और चाय की चुस्कियाँ लेने लगे. वहीं पास में उनकी  नजर एक माँ-बच्चे पर पड़ी जो भूखे-प्यासे ठंडी रात में ठिठुर रहे थे.

उनके तन पर कपड़ों के नाम पर चिथड़े लिपटे हुए थे. माँ बच्चे को सीने से लगाकर उसे ठंड से बचाने की कोशिश कर रही थी. उसने  अभिलाषा भरी नजरों से उस सज्जन की और देखा और अपने बच्चे को खिलाने के लिए उनसे कुछ याचना की. उसके लिए कुछ खाने को माँगा. उनका  मन करुणा से भर गया और उन्होंने उसे  कुछ पैसे दे दिए.

इस बीच ड्राईवर आया और बोला कि साहब  टैक्सी ठीक हो गई. टैक्सी पर सवार होते हुए उन्होंने कुछ समय के ही अंतराल की दोनों घटनाओं को याद किया  और उनके  मुँह से अनायास ही निकल पड़ा- ‘ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया’.

मूर्ख मित्र जान का ग्राहक हिंदी कहानी | Murkh Mitra Jaan ka Grahak Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

मूर्ख मित्र जान का ग्राहक हिंदी कहानी | Murkh Mitra Jaan ka Grahak Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |  short bal kahani in hindi, baccho ki kahani suno, dadi maa ki kahaniyan, bal kahaniyan, cinderella ki kahani, hindi panchatantra stories, baccho ki kahaniya aur cartoon, stories, kids story in english, moral stories, kids story books, stories for kids with pictures, short story, short stories for kids, story for kids with  moral, moral stories for childrens in hindi, infobells hindi moral stories, hindi panchatantra stories, moral stories in hindi,  story in hindi for class 1, hindi story books, story in hindi for class 4, story in hindi for class 6, panchtantra ki kahaniya.

ऐसे तो यह एक बहुत प्रचलित कहानी है. लेकिन इस पोस्ट Murkh Mitra Jaan ka Grahak Hindi Story द्वारा इसे एक नए परिपेक्ष्य में देखने की जरुरत है. खासकर जब  हम अपने मित्र का चुनाव करें. कहा भी गया है पूत परखिये मीत से. अर्थात आपका पुत्र की संगति कैसे लोगों से है, इसे देखकर आप उसके बारे में अंदाजा लगा सकते हैं. यदि उसका मित्र मूर्ख या बुद्धिहीन है तो वह कभी भी संकट से घिर सकता है.

Murkh Mitra Jaan ka Grahak Hindi Story

एक राजा था. उसे बंदरों से बहुत ही लगाव था. उसने एक  बड़े बन्दर को तो  अपने निजी सेवक के रूप में पाल रखा  था. वह राजा लोगों से कहता – ‘यह बन्दर नहीं, यह तो मेरा मित्र है.’ जब राजा अपने शयनकक्ष में होता तो वह बंदर वहीं निकट ही पहरेदारी करता रहता.

एक बार राजा जंगल में शिकार खेलने गया तो काफी दिनों बाद वापस लौटा.  वह यात्रा के दौरान काफी थक चुका था. अतः आते ही वह शयनकक्ष में आराम करने चला गया. उसने बंदर को आदेश दिया कि  किसी को भी उसकी नींद में खलल न डालने दे. बंदर आदेश का पालन करने के लिए वहीं राजा के पलंग के निकट नंगी तलवार हाथ में लेकर बैठ गया.

मूर्ख मित्र जान का ग्राहक हिंदी कहानी | Murkh Mitra Jaan ka Grahak Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

थोड़ी देर बाद बंदर ने देखा कि एक मक्खी शयनकक्ष में घुस आई है. फिर वह मक्खी राजा की नाक पर बैठ गई. बंदर ने उसे उड़ाना चाहा लेकिन मक्खी वहीं आसपास मंडराती रही.

अब बंदर से रहा न गया, इस बार जैसे ही मक्खी राजा की नाक पर बैठी. बंदर ने आव देखा न ताव, उस पर तलवार चला दी. मक्खी  का तो क्या होना था, वह तो उड़ गई, लेकिन राजा का सिर जरूर धड़ से अलग हो गया.

यदि राजा ने एक बन्दर की मानसिक दशा, उसकी सोच और समझ को ध्यान में रखा होता तो उसे अपनी जान गवानी नहीं पड़ती. इसलिए कहा भी गया है कि एक मूर्ख मित्र से कहीं अच्छा होता है एक बुद्धिमान शत्रु.

यह अब आप पर निर्भर करता है कि आप अपने लिए कैसा मित्र चुनते हैं एक बन्दर या फिर एक समझदार जो आपको सुख और दुःख में समझता हो और आपको अच्छे काम में प्रोत्साहित करता हो , वहीँ बुरे काम से बचाता हो.

 

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शबरी के बेर रामायण की कहानी Shabari Ke Ber Ramayan Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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श्रमणा एक भीलनी थी. वह शबरी जाति की थी. बचपन से ही वह भगवान् श्रीराम की अनन्य भक्त थी. उसे जब भी समय मिलता वह भगवान की सेवा-पूजा करती. घर वालों को उसका व्यवहार, पूजा पाठ  अच्छा नहीं लगता था.

Shabari Ke Ber Ramayan Story

Shabari Ke Ber Ramayan Story

बड़ी होने पर श्रमणा का विवाह हो गया, पर अफसोस, उसके मन के अनुरूप कुछ भी नहीं मिला. उसका पति भी उसके मन के अनुसार नहीं था. यहाँ के लोग अत्यंत अनाचारी-दुराचारी थे. हर समय लूट-मार तथा हत्या के काम में लिप्त रहते. श्रमणा का उनसे अक्सर झगड़ा होता रहता.

इस गंदे माहौल में श्रमणा जैसी सात्विक स्त्री का रहना बड़ा कष्टकर हो गया था. वह इस वातावरण से निकल भागना चाहती थी. वह किसके पास जाकर आश्रय के लिए शरण मांगे. यह भी एक समस्या थी.

आखिर काफी सोच- विचार के बाद उसने मतंग ऋषि के आश्रय में रहने का निश्चय किया. मौका पाकर वह ऋषि के आश्रम में पहुंची. अछूत होने के कारण वह आश्रम के अंदर प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा सकी और वहीं दरवाजे के पास गठरी-सी बनी बैठ गई.

शबरी के बेर रामायण की कहानी Shabari Ke Ber Ramayan Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

काफी देर बाद उस स्थान पर मतंग ऋषि आए. श्रमणा को देखकर चौंक पड़े. श्रमणा से आने का कारण पूछा. उसने बहुत ही नम्र स्वर में अपने आने का कारण बताया. मतंग ऋषि सोच में पड़ गए. काफी देर बाद उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में रहने की अनुमति प्रदान कर दी.

श्रमणा अपने व्यवहार और कार्य-कुशलता से शीघ्र ही आश्रमवासियों की प्रिय बन गई. इस बीच जब उसके पति को पता चला कि वह मतंग ऋषि के आश्रम में रह रही है तो वह आगबबूला हो गया. श्रमणा को आश्रम से उठा लेने के लिए वह अपने कुछ हथियारबंद साथियों को लेकर चल पड़ा.

मतंग ऋषि को इसके बारे में पता चल गया. श्रमणा दुबारा उस वातावरण में नहीं जाना चाहती थी. उसने कातर दृष्टि ऐ से ऋषि की ओर देखा. मतंग ऋषि सिद्ध पुरुष थे. श्रमणा की इस करुण दशा को देख  वे द्रवित हो उठे.

ऋषि ने फौरन उसके चारों ओर अग्नि पैदा कर दी . जैसे ही उसका पति आगे बढ़ा,  अपनी पत्नी के चारों तरफ के इस अग्नि सुरक्षा कवच को देखकर डर गया और वहाँ से भाग खड़ा हुआ. इस घटना के बाद उसने फिर कभी श्रमणा की तरफ कदम नहीं बढ़ाया.

शबरी के बेर रामायण की कहानी Shabari Ke Ber Ramayan Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

दिन गुजरते रहे.
भगवान श्रीराम सीता की खोज में मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे. मतंग ने उन्हें पहचान लिया. उन्होंने दोनों भाइयों का यथायोग्य आदर -सत्कार किया.

मतंग ऋषि ने श्रमणा को बुलाकर कहा, “श्रमणा !जिस राम की तुम बचपन से सेवा-पूजा करती आ रही थीं, वही राम आज साक्षात् तुम्हारे सामने खड़े हैं. मन भरकर इनकी सेवा कर लो.”

श्रमणा भागकर कंद-मूल लेने गई. कुछ क्षण बाद वह लौटी. कंद- मूलों के साथ वह कुछ जंगली बेर भी लाई थी.
कंद-मूलों को उसने श्रीभगवान के अर्पण कर दिया. पर बेरों को देने का साहस नहीं कर पा रही थी. कहीं बेर खराब और खट्टे न निकलें, इस बार का उसे भय था.

उसने बेरों को चखना आरंभ कर दिया. अच्छे और मीठे बेर वह बिना किसी संकोच के श्रीराम को देने लगी.
श्रीराम उसकी सरलता पर मुग्ध थे. उन्होंने बड़े प्रेम से जूठे बेर खाए.श्रीराम की कृपा से श्रमणा का उद्धार हो गया. वह स्वर्ग गई.

यही श्रमणा रामायण में शबरी के नाम से प्रसिद्ध हुई. इस कहानी के माध्यम से भगवान श्रीराम ने तत्कालीन जाति व्यवस्था पर प्रहार किया है. आज हमारे देश में caste system गहरी पैठ बनाये हुये है. यह समाज को विभाजित करता है. यह आज के युवाओं और सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को इसके खिलाफ काम करना होगा. भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर भक्त और भगवान् के संबंध को एक नयी ऊंचाई प्रदान की है.

सेर को मिला सवा सेर हिंदी कहानी | Ser Ko Mila Saba Ser Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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किसी जंगल में एक ऊंट रहता था. वह बहुत ही मुंहफट और बदतमीज था. दूसरों का मजाक उड़ाने में उसे बहुत मजा आता था. वह हमेशा जंगल के अन्य जानवरों, पशुओं और पक्षियों का उनकी शारीरिक बनावट, उनके रंग और आदतों को लेकर उनका मजाक उड़ाता रहता था.

Ser Ko Mila Saba Ser Hindi Story

यदि सामने बंदर दिखता तो उससे कहता – “सुन बे बन्दर, तुमने जरुर कोई बड़ा पाप किया होगा जो आदमी बनते- बनते रह गए. लगता है सबकुछ आदमी वाला देने के बाद ईश्वर के पास अक्ल कम पड़ गयी होगी, इसलिए तुमको बन्दर बनाकर जंगल में इस पेड़ से उस पेड पर कूदने के लिए छोड़ दिया.”

भैंस मिल जाय तो उससे कहता – “तुमने कभी अपना काला –कलूटा रूप देखा है? तुमने भगवान् के साथ जरुर कोई शैतानी की है, जो उन्होंने तुम्हारे सिर पर टेढ़े- मेढ़े सींग लगाकर धरती की सुन्दरता को बिगाड़ने भेज दिया है.”

तोते से कहता – “तुमने कभी अपना लाल रंगवाला टेढ़ी चोंच देखा है? ईश्वर ने तुम्हारे साथ ही यह मजाक क्यों किया है, मेरी तो समझ में नहीं आता.”

यदि चलते- चलते रास्ते में हाथी मिल जाता तो उसकी खिल्ली उड़ाते हुये कहता – “छिः, तुम तो बिलकुल कार्टून दीखते हो. इतना विशाल आकार को पतली रस्सी जैसा लटकता पूँछ. इतने बड़े कान और इतनी छोटी-छोटी आँखें. भगवान् ने तो तुम्हें मजाक के क्षणों में ही यह रूप दिया होगा.”

मोर से कहता – “ तुम्हारे पैरों ने तो तुम्हारी सारी खूबसूरती ही समाप्त कर दी. अब नाचते रहो जंगल में यों ही.”
इस तरह से वह बदतमीज ऊंट सबकी खिल्ली उड़ाता रहता था. स्थिति ऐसी आ गयी थी कि रास्ते में कोई जानवर यदि उसे आता देखता तो अपना मार्ग बदल लेता था.

लेकिन सच ही कहा गया है कि एक न एक दिन सेर को सवा सेर मिल ही जाता है.
एक बार उसी ऊंट की मुलाकात एक लोमड़ी से हुई. वह लोमड़ी बहुत चालाक और मुंहफट थी. किसी को खरी खोटी सुनाने से वह कभी बाज नहीं आती थी.

ऊंट उसके बारे में कुछ ऐसा-वैसा बोले, उसके पहले ही वह लोमड़ी ऊंट से बोल पडी – “ ओय ऊंट! पता चला है कि तू जंगल के सभी जानवरों और पक्षियों को खरी- खोटी सुनाते फिरता है. यह आदत बदल ले तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा. कभी अपनी सूरत जलाशय में पानी पीते वक़्त देखी है? एक तो पत्थर सी आँखें, इतना बड़ा कूबड़ पीठ पर, टॉप जैसी गर्दन, पीले- पीले भद्दे दांत, टेढ़े-मेढ़े पैर. ये बता तू अपने कौन से अंग को अच्छा मानता है? अन्य जानवरों में तो एक या दो कमियां हैं, तुम्हारे शरीर में केवल खामियां ही हैं. यह जंगल यदि बदसूरत कहलायेगा तो तुम्हारी बदसूरती के कारण. तुम्हें अन्य जानवरों के सम्मुख आते हुये शर्म नहीं आती. लगता है भगवान ने तुम्हारी रचना कूड़े- करकट से किया है.”

लोमड़ी के इन वचनों को सुनकर ऊंट का गर्दन शर्म से झुक गया. वह नजर बचाता हुआ वहां से चुपचाप खिसक लिया. उस दिन से उसने दूसरों का मजाक उड़ाना, उनके बारे में उल्टा सीधा बोलना बिलकुल बंद कर दिया.

 

 

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कुएँ का मेंढक हिंदी कहानी | Kuyen ka Mendhak Hindi Kahani | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

कुएँ का मेंढक हिंदी कहानी | Kuyen ka Mendhak Hindi Kahani | Baccho ki Kahaniyan in hindi | short bal kahani in hindi, baccho ki kahani suno, dadi maa ki kahaniyan, bal kahaniyan, cinderella ki kahani, hindi panchatantra stories, baccho ki kahaniya aur cartoon, stories, kids story in english, moral stories, kids story books, stories for kids with pictures, short story, short stories for kids, story for kids with  moral, moral stories for childrens in hindi, infobells hindi moral stories, hindi panchatantra stories, moral stories in hindi,  story in hindi for class 1, hindi story books, story in hindi for class 4, story in hindi for class 6, panchtantra ki kahaniya.

एक कुएँ में एक मेंढक रहता था. एक बार समुद्र का एक मेंढक कुएँ में आ पहुँचा तो कुएँ के मेंढक ने उसका हालचाल, अता-पता पूछा. जब उसे ज्ञात हुआ कि वह मेंढक समुद्र में रहता है और समुद्र बहुत बड़ा होता है तो उसने अपने कुएँ के पानी में एक छोटा-सा चक्कर लगाकर उस समुद्र के मेंढक से पूछा कि क्या समुद्र इतना बड़ा होता है ? कुएँ के मेंढक ने तो कभी समुद्र देखा ही नहीं था. समुद्र के मेंढक ने उसे बताया कि इससे भी बड़ा होता है.

Kuyen ka Mendhak Hindi Kahani

कुएँ का मेंढक चक्कर बड़ा करता गया और अन्त में उसने कुएँ की दीवार के सहारे-सहारे आखिरी चक्कर लगाकर पूछा- ‘क्या इतना बड़ा है तेरा समुद्र ?’  इस पर समुद्र के मेंढक ने कहा – ‘इससे भी बहुत बड़ा.’ अब तो कुएँ के मेंढक को क्रोध् ही आ गया.  कुएँ के अतिरिक्त उसने बाहर की दुनिया तो देखी ही नहीं थी. उसने कह दिया – ‘जा तू झूठ बोलता है. कुएँ से बड़ा कुछ होता ही नहीं. समुद्र भी कुछ नहीं होता है, तू बकता है.’

आज जीवन में पग-पग पर हमें ऐसे कुएँ के मेंढक मिल जायेंगे, जो केवल यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं, उसी का नाम ज्ञान है, उसके इधर – उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं है. कुएँ का मेंढक यहाँ सीमित ज्ञान का प्रतीक है जबकि समुद्र से आया मेंढक ज्ञान की विशालता और गहराई का प्रतीक है. जितना अध्ययन होगा उतना अपने अज्ञान का आभास होगा. यह भी सत्य  है कि सागर की भाँति ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं है. अपने ज्ञानी होने के अज्ञानमय भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्ययन करना आवश्यक है. जितना अधिक अध्ययन किया जाएगा, भ्रम टूटेगा और ऐसा आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ जानना और पढ़ना शेष है.

कुएँ का मेंढक हिंदी कहानी | Kuyen ka Mendhak Hindi Kahani | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

अध्ययन के अनेकों विभाग हैं. विज्ञान, भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, धर्म, दर्शन, साहित्य आदि ऐसे विभाग है जिनके एक भी उपविभाग में व्यक्ति सम्पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता तो अनन्त विभागों में सम्पूर्ण होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है. हाँ, इतना अवश्य निश्चित है कि अधिक से अधिक अध्ययन करते रहने से एक मानसिक परितोष,आनन्द और शान्ति अवश्य प्राप्त होती है. उसके आगे और अध्ययन करने की जिज्ञासा भी उत्पन्न होती है. अधिक अध्ययन करने से मनुष्य के हृदय की संकीर्णता समाप्त हो जाती है तथा उसका दृष्टिकोण उदार होता जाता है.

सतत अध्ययनशीलता और दृष्टि की उदारता शनैः शनैः व्यक्ति को पूर्णता और पवित्रता की ओर ले जाती है. सतत अध्ययन एक ओर नई दिशाएँ देता है तो दूसरी ओर पुरानी मान्यताएँ दूर कर नई स्वस्थ मान्यताओं की स्थापना में भी सहायक होता है. उदाहरणार्थ भारत में बैठकर हम पश्चिमी अथवा अन्य किसी समाज व राष्ट्र की सभ्यता की निन्दा करते रहते हैं. लेकिन जब उसी सभ्यता को स्वयं आँखों से देखते हैं अथवा उसके विषय में विस्तार से पढ़ते हैं, अध्ययन करते हैं, तो हमारी मान्यताएँ बदल भी जाती हैं.

सतत अध्ययन मनुष्य की आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों को विकसित करता है, शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति द्वारा मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को दूर कर उसे शुद्ध और पवित्र बनाता है. मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्यता की प्राप्ति कराता है.

किताबी ज्ञान से आगे बढ़ें

इसलिए विशेष रूप से छात्रों से अपील है कि कुएँ का मेंढक न बनें. किताबी ज्ञान के साथ ही साथ जीवन के लिए उपयोगी और व्यवहारिक ज्ञान होना भी अधिक जरुरी है. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि बहुत पढ़े लिखे लोग व्यवहारिक ज्ञान के क्षेत्र में कमजोर होते हैं और कालांतर में उन्हें अपनी इस कमी के चलते अफ़सोस होता है. इसलिए समुद्र की तरह शांत और व्यापक ज्ञान के तलाश में रह वक्त प्रयत्नशील रहना चाहिए.

भोजन का दान हिंदी कहानी | Bhojan Ka Daan Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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एक गाँव में गरीब आदमी रहता था. आदमी का नाम मंगल था. वह बिलकुल अकेला था. बैलगाड़ी लेकर जंगल जाता  और लकड़ियाँ काट कर उस पर लाद लाया करता था. शहर में लकड़ियाँ बेचने से जो कुछ भी मिल जाता था, उसी से वह अपने जीवन का निर्वाह करता था.
उस दिन दोपहर के बाद का समय था. मंगल बैलगाड़ी पर लकड़ियाँ लाद कर शहर की ओर जा रहा था. बाग़ में उसे एक ऐसा आदमी मिला, जो पैदल चलते-चलते थक गया था. वह आदमी शहर का रहने वाला था. उसका नाम सूरज  था.

Bhojan Ka Daan Hindi Story भोजन का दान हिंदी कहानी 

सूरज  ने मंगल से कहा, “भाई, मैं बहुत थक गया हूँ. यदि तुम शहर जा रहे हो, तो कृपा करके मुझे अपनी बैलगाड़ी पर बिठा लो.”
मंगल बोला, “हां, मैं शहर जा रहा हूँ. आओ, बैठ जाओ बैलगाड़ी पर. एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य की सहायता करनी ही चाहिए.”
सूरज लगाड़ी पर बैठ गया, दोनों रास्ते  भर प्रेम से बात करते रहे, एक- दूसरे को अपने जीवन का हाल-चाल बताते रहे. जब शहर आ गया तो सूरज ने मंगल को अपने घर का पता बताते हुए कहा, “लकड़ियाँ बेचने के बाद मेरे घर पर आना. मैं चाहता हूँ आज तुम मेरे अतिथि बनो. तुम्हारा आदर-सत्कार करने से मुझे सुख प्राप्त होगा.”

भोजन का दान हिंदी कहानी | Bhojan Ka Daan Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

मंगल ने वचन दे दिया. सूरज प्रसन्न होकर अपने घर चला गया और उत्सुकतापूर्वक मंगल की राह देखने लगा.
मंगल जब लकड़ियाँ बेच चुका, तो संध्या होने के बाद सूरज  के घर गया. सूरज  ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया. उसे अच्छा से अच्छा खाना खिलाया और उसके सोने का सुंदर प्रबंध किया. रात में दोनों देर तक आपस में बातचीत करते रहे.

सूरज  और मंगल  दोनों में घनिष्ठ मित्रता हो गई. मंगल  जब भी शहर जाता था, सूरज  से अवश्य मिला करता था. कभी-कभी रात में उसके घर रह भी जाता था.
पूर्णिमा का दिन था. मंगल  लकड़ियाँ बेचने के बाद सूरज  के घर रूक गया था. रात के 8-9 बज रहे थे. आकाश में पूर्णिमा का चन्द्रमा हँस रहा था. धरती पर चारों ओर दूध की धारा की तरह  बह रही थी. पेड़-पौधे उस धारा में नहा कर सफेद-से हो गये थे.

सूरज  ने मंगल  से कहा, “मंगल, आओ चलो मेरे साथ चलो. आज मैं तुम्हें एक ऐसा दृश्य दिखाउंगा कि देखने की कौन कहे, तुमने कभी उसके बारे में सोचा तक नहीं होगा.”

मंगल बोला, “पर पहले यह तो बताओ, वह कैसा दृश्य है और उसमे क्या विशेषता है?”

सूरज  ने उत्तर दिया, “देखोगे तो आश्चर्य में डूब जाओगे. मेरे नगर के राजा का एक प्रधान खजांची है. उसका सिधांत है, खाना-पीना और आनन्द से रहना. वह कहता है, एक-न-एक दिन मनुष्य को सब कुछ छोड़कर जाना पड़ता है. अतः संग्रह से कोई लाभ नहीं है. मनुष्य को अपने जीवन में ही, अपनी उपार्जित वस्तुओं का उपभोग के लेना चाहिए.”

भोजन का दान हिंदी कहानी | Bhojan Ka Daan Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

यों तो खजांची प्रतिदिन बड़े ठाट-बाट से भोजन करता है, पर पूर्णिमा की रात में वह जिस ढंग से भोजन करता है, वह देखने योग्य होता है, पर उसका भोजन सोने के बर्तनों में तैयार किया जाता है वह जिन बर्तनों में भोजन करता है वह भी सोने के ही होते हैं. सोने के ही चम्मच, सोने की ही प्यालियाँ और सोने के ही गिलास होते हैं. वह जिस चाट पर बैठकर भोजन करता है वह भी सोने के ही होते हैं खजांची नीचे से लेकर ऊपर तक पीले परिधानों से सुशोभित रहता है. उसके शरीर पर भी सोने के अमूल्य आभूषण रहते हैं.

उसके नौकर-चाकर और उसका रसोईया भी पीले वस्त्र तथा स्वर्ण आभूषण धारण किये रहता है. चांदनी रात में खजांची के घर ऐसी स्वर्ण आभा बिखरती रहती है कि मनुष्य का मन ही नहीं, देवताओं का मन भी ललक उठता होगा, लालच से भर उठता होगा. नगर के बड़े-अमीर भी उस अनुपम दृश्य को देखने के लिए वहाँ इकट्ठे होते हैं.

सूरज  के कथन को सुनकर मंगल  के मन में भी लालसा उत्पन्न हो उठी. वह खजांची के भोजन के दृश्य को देखने के लिए सूरज  के साथ उसके घर गया, वहाँ मेला-सा जुटा हुआ था.

खजांची तरह-तरह के सोने के आभूषणों और पीले परिधानों से सज्जित होकर भोजन के लिए सोने के पाट पर बैठा. उसके सामने जब सोने के पात्रों में तरह-तरह के व्यंजन परोसे गये, तो उस दृश्य और उन व्यंजनों को देखकर मंगल  अपने मन को अपने वश में नहीं रख सका, वह धीरे से सूरज  से बोला, “भाई सूरज , सचमुच यह तो बड़ा अपूर्व दृश्य है. काश, मैं भी एक दिन ऐसी ढंग से ऐसी तरह का भोजन करता, पर क्या कभी सम्भव हो सकता है? नहीं, इस गरीब के जीवन में यह कभी नहीं हो सकता.”

हालांकि मंगल  ने बहुत ही धीमे स्वर में अपनी बात सूरज  से की थी, पर फिर भी खजांची के कानों में जा पड़ी. खजांची ने दृष्टि  उठा कर मंगल की ओर देखा. उसे मंगल के मुखमंडल पर कुछ अनूठापन-सा दिखाई पड़ा, उसे लगा कि इस मनुष्य के शरीर के भीतर कोई चमत्कार है.

खजांची जब भोजन कर चुका, तो उसने मंगल को अपने पास बुलाया. उसने उसकी ओर देखते हुए कहा, “मैंने तुम्हारी बात सुन ली है, तुम पूर्णिमा की रात में मेरे ही समान भोजन करना चाहते हो न! इसके लिए तुम्हें कठोर तप करना पड़ेगा. क्या तुम इसके लिए तैयार हो?”
मंगल बोला, “श्रीमान, यदि एक दिन मुझे आपके समान भोजन करने का अवसर प्राप्त हो, तो मैं तप क्या, पहाड़ भी उठाने के लिए तैयार हूँ.”

खजांची सोचता हुआ बोला, “नहीं, तुम्हें पर्वत नहीं उठाना पड़ेगा तुम्हें तीन वर्षों तक खेतों में काम करना होगा.”
मंगल बोल उठा, “श्रीमान, मैं अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए आपके खेतों में काम करने के लिए तैयार हूँ, पर तीन वर्षों के बाद मुझे आपके समान भोजन करने का अवसर प्राप्त होगा न !”
खजांची ने दृढ़तापूर्वक कहा, “अवश्य प्राप्त होगा, अवश्य प्राप्त होगा.”

मंगल लकड़ियाँ काटना छोडकर खजांची के खेतों में काम करने लगा. वह दिन भर खेतों में पसीना भाता और रात में मजदूरों के साथ खा-पीकर  सो जाया करता था. वह हर एक मजदूर से प्रेम तो करता ही था, बीमार मजदूरों की सेवा भी किया करता था. मजदूर उसके मधुर भाषण और मृदु व्यवहार पर मुग्ध थे. वे उसे अपना मसीहा मानते थे.

धीरे-धीरे तीन वर्ष बीत गये. मंगल की लगन, मेहनत और उसके प्रेम से तीन वर्षों में खजांची के खेतों में इतना अनाज पैदा हुआ कि उसके लिए रखना भी कठिन हो गया. खजांची मंगल के श्रम पर मुग्ध हो गया. साथ ही उसके मन में विचार पैदा हुआ, यह मनुष्य साधारण मनुष्य नहीं है. अलौकिक है, चमत्कारिक है.

तीन वर्षों के बाद मंगल पुनः खजांची के सामने उपस्थित हुआ. खजांची ने प्रेम-भरे स्वर में कहा, “मंगल, मैं तुम्हारी मेहनत पर बहुत प्रसन्न हूँ. मैं 24 घंटे के लिए तुम्हें अपने भवन का मालिक बना रहा हूँ. तुम्हें अधिकार होगा, तुम चाहे जो करो, चाहे जैसा भोजन करो.”
मंगल ने निवेदन किया, “श्रीमान, मैं आपके भवन का मालिक बन कर क्या करूंगा? मैं तो केवल एक दिन आपके समान भोजन करना चाहता हूँ.”

खजांची बोला, “पर तुमने जिस लगन और मेहनत से काम किया है, उसे देखते हुए तुम्हारी यह मजदूरी भी बहुत कम है. तुम 24 घंटे के लिए मेरे भवन के मालिक हो.”
खजांची ने अपने सभी नौकरों को बुलाकर आदेश दिया, “मंगल 24 घंटे के लिए मेरे भवन का मालिक है. उसकी आज्ञाओं का पालन तुम लोगों को उसी तरह करना होगा, जिस तरह मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो.”

भोजन का दान हिंदी कहानी | Bhojan Ka Daan Hindi Story | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

भवन का मालिक बनने पर मंगल किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. बस, उसे एक ही बात याद थी- “कल पूर्णिमा की रात है. मैं खजांची के समान ही भोजन करूंगा. मेरी इच्छा पूरी होगी, मेरा जीवन धन्य बनेगा.”

दूसरे दिन पूर्णिमा की रात थी. चांदनी खिली हुई थी. मंगल खजांची के समान ही सज-धज कर सोने के पाट पर भोजन करने के लिए बैठा. उसके सामने सोने के पात्रों में तरह-तरह के व्यंजन रखे गये. वह खाने ही जा रहा था कि, उसे एक बौद्ध भिक्षु दिखाई पड़ा. भिक्षु ने मंगल की ओर देखते हुए कहा, “बुद्धम् शरणम् गच्छामि.”

मंगल के हृदय के तार बज उठे, हृदय के भीतर दिव्य प्रकाश पैदा हो उठा- उस प्रकाश से अपने आप को उसने देखा- सारा विश्व उसके भीतर है, सारा ब्रह्माण्ड उसके भीतर है और सारे प्राणी उसके भीतर हैं.

मंगल ने बिना किसी मोह के अपना भोजन भिक्षु कोदान कर  दिया. खजांची आश्चर्यचकित हो उठा. उसने आश्चर्य-भरे स्वर में कहा, “मंगल, तुमने यह क्या किया? जिस भोजन के लिए तुमने तीन वर्षों तक कठिन श्रम किया, उसे तुमने बौद्ध भिक्षु को दे दिया?”

मंगल बोला, “मैंने ठीक ही किया है श्रीमान् ! जो मैं हूँ, वह बौद्ध भिक्षु भी है. मैंने भोजन किया या बौद्ध भिक्षु ने किया एक ही बात है.”
खजांची मंगल के कथन पर मुग्ध हो उठा. वह बोला, “मंगल, मैं सदा-सदा के लिए तुम्हें अपने घर का मालिक बना रहा हूं, पर मंगल ने मालिकाना भी उस बौद्ध भिक्षु को दान में दे दिया.”

मंगल के इस भोजन दान की खबर राजा के कानों में पड़ी. उसने मंगल के त्याग पर प्रसन्न होकर उसे अपना पूरा राज्य दे दिया. पर मंगल ने राजा के राज्य को भी बौद्ध भिक्षु को दान में दे दिया.

बौद्ध भिक्षु मुस्कराता हुआ बोला, “इस मनुष्य की मेहनत और लगन पर प्रसन्न होकर भगवान बुद्ध ने इसे अपनी शरण में ले लिया है, जो प्राणी भगवान बुद्ध की शरण में जाता है, उसे ब्रह्माण्ड का राज्य भी तुच्छ होता है.”

मंगल के त्याग का प्रभाव खजांची और राजा के मन पर भी पड़ा. वे दोनों भी अपना सब कुछ छोड़ कर बौद्ध भिक्षु बन गये, धर्मसंघ में सम्मिलित हो गये.

एक मनुष्य को दूसरे की सहायता करनी ही चाहिए. श्रम और लगन की दृढ़ता से मनुष्य अपनी मंजिल पर पहुंचता है. श्रम, सेवा और त्याग ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है. परिश्रमी और प्रेमनिष्ठ मनुष्य को ईश्वर की कृपा अवश्य मिलती है. आज लोगों में प्रेम की जगह घृणा का भाव ज्यादा बढ़ गया है. यह मानवता के खिलाफ  है. अपने भूखे रहकर भोजन क दान करनेवाले विरले मिलते हैं.

होनहार बालक | हिंदी कहानी | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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उन दिनों इंद्रगढ़  में राजा राममूर्ति का शासन था. वे  एक वीर, साहसी एवं दृढ निश्चयी राजा थे. उसके राज्य में सर्वत्र सुख एवं समृद्धि थी. राजा राममूर्ति को अपने राज्य के वैभव और अपनी सम्पदा पर बहुत घमंड था. उसकी शक्ति को देखकर कोई भी पड़ोसी राज्य उसके राज्य पर आक्रमण करने की बात सोच भी नहीं सकता था. अपनी सुदृढ़ राज्य व्यवस्था के कारण राजा का अधिकांश समय मनोरंजन एवं आखेट में ही व्यतीत होता था.

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एक दिन राजा राममूर्ति जंगल में आखेट की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था, किन्तु उसे जंगल में कोई  शिकार नजर नहीं आ रहा था. चारों ओर सन्नाटा था. राजा  की निगाहें चारों दिशाओं में घूम रहीं थीं. तभी एकाएक उसकी निगाह एक बालक पर पड़ी, जो एकाग्र होकर एक पेड़ के नीचे बैठा कुछ कर रहा था. यह देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर यह बालक कौन है जो इस भयानक  जंगल में अकेले ही निर्भीक बैठा क्या कर रहा है? राजा शिकार की चिंता छोड़ उस बालक के पास जा पहुंचा.

वहां पहुंचकर राजा ने देखा कि बालक स्लेट पर कुछ लिखता जा रहा है. राजा ने उससे पूछा, – “हे बालक ! तुम्हारा नाम क्या है?”

बालक ने उत्तर दिया, – “महाराज, मेरा नाम होनहार है.”

“तुम अकेले इस जंगल में क्या कर रहे हो?” राजा ने फिर से पूछा. बालक ने जबाब दिया, – “महाराज ! मेरे हाथ में स्लेट और पेन्सिल है. इससे आपको स्वयं ही अंदाजा लगा लेना चाहिए कि मैं क्या कर रहा हूँ? अब आप अपना परिचय तो दीजिए कि आप कौन हैं?”

राजा ने जबाब दिया, – “बेटे! मैं यहाँ का राजा राममूर्ति हूँ और यहाँ जंगल में शिकार करने आया हूँ.” फिर राजा ने उस बालक की ओर देखते हुए आगे कहा,  “तुम्हारा नाम मुझे कुछ अजीब-सा लगता है. भला होनहार भी कोई नाम होता है?”

होनहार बालक | हिंदी कहानी | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

इस पर बालक ने उत्तर दिया, – “हे राजन ! मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, पर आप तो महान सम्राट हैं. क्या आप इतना भी नहीं समझते कि कल मैं नवयुवक होउंगा तो मेरे कंधों पर कर्तव्यों का भार आ जाएगा. मैंने अपना नाम होनहार रखकर क्या गलती की है? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हर बालक कल का होनहार है.” बालक ने कुछ क्षण विराम लेकर राजा से आगे कहा, “हे राजन! आज जंगल में अपने प्राण संकट में डालकर आपसे मिलने के मन्तव्य से ही यहां बैठा हूँ. क्या आपने कभी ऐसा सोचा है कि यह राज्य आज बाल-शिक्षा की उपेक्षा कर कल के भविष्य को अंधकारमय बना रहा है. आप आखेट और वन्य जीवों की हत्या कर अपना मनोरंजन करते हैं क्योंकि आपके पास कोई काम नहीं है. हे राजन ! क्या आपके बालक को होनहार बनाना आपका दायित्व नहीं ?”

बालक की बात राजा राममूर्ति के मन में गहरे से बैठ गई. उसने झुककर बालक को उठाया और उसे अपनी छाती से लगा लिया. फिर बोला, “तुमने मेरी आँखें खोल दीं, बेटे ! आज से हम तुम्हें ‘होनहार’ कह कर ही पुकारेंगे. आज से हम शिकार करना छोड़ बच्चों के विकास और शिक्षा के कार्य में जुट जाएँगे, ताकि राज्य का भविष्य सुनहरा बन सके.”

उस दिन के बाद से राजा ने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया. यह सच है कि यदि किसी राज्य या देश की जनता पढी-लिखी और समझदार हो तो उस राज्य की आधी समस्या यूँ ही समाप्त हो जाती है. इतिहास साक्षी है कि जिस देश में शिक्षा है वह देश होनहार साबित हुआ है और वहां सर्वत्र सुख और शांति रहती है. वह देश धन और वैभव से भी परिपूर्ण रहता है. इसलिए हम सभी को बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देनी चाहिए.

Wooden Horse Hindi Story काठ का घोड़ा | हिंदी कहानी | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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लालच बुरी बला (Wooden Horse Hindi Story काठ का घोड़ा हिंदी कहानी)

किसी गाँव में एक लड़का रहता था. उसका नाम अंकुर था. पढने-लिखने ने तो होशियार था ही, पर उसे घूमने-फिरने का भी बहुत शौक था. वह चाहता था कि दुनिया में चारों ओर घूमे, पर उसके पास कोइ साधन नहीं था. उसके माता-पिता भी बहुत गरीब थे. एक बार वह घूमते-घूमते जंगल में चला गया.

Wooden Horse Hindi Story काठ का घोड़ा हिंदी कहानी

जंगल में अन्दर दूर तक जाने पर उसे एक महात्मा जी मिले. इतने घने जंगल में उसे अकेला देख महात्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ. जब अंकुर ने उन्हें अपने घूमने-फिरने के शौक के बारे में बताया तो महात्मा जी ने उसे एक काठ का घोड़ा दिया. वह घोड़ा बहुत अनोखा था. उसकी मूठ घुमाने से वह आकाश में उड़ सकता था. महात्मा जी ने अंकुर से कहा, ”देखो पुत्र, मैं तुम्हें जो घोड़ा दे रहा हूँ, वह तुम्हारी घूमने-फिरने की इच्छा को पूरी करने में पूर्णत: समर्थ है. परन्तु तुम एक बात सदैव याद रखना.”
“वह कौन सी बात है बाबा ” अंकुर ने पूछा.
“वह यह कि कभी लोभ मत करना. तुम लोभ की भावना मन में लेकर घोड़े पर बैठोगे तो इसकी शक्ति चली जाएगी.”

अंकुर को यह बात बताकर महात्मा जी अन्तर्धान हो गए. उनके जाने के बाद अंकुर घोड़े पर बैठा और उसकी मूठ घुमा दी. देखते ही देखते घोड़ा हवा से बातें करने लगा. अंकुर को बादलों के बीच उड़ते हुए बड़ा आनन्द आ रहा था. धीरे-धीरे शाम घिरने लगी. वह घोड़े को नीचे उतारना चाहता था पर तभी उसे याद आया कि महात्मा जी ने घोड़े को नीचे उतारना तो उसे सिखाया ही नहीं. अब तो वह बुरी तरह से घबरा गया कि अब क्या होगा?

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तभी उसने देखा कि मूठ के पास ही लकड़ी का एक छोटा-सा बटन लगा हुआ है. उसने जल्दी से उसे दबाया तो घोड़ा निर्जन जंगल में उतर गया रात हो गई थी, इस निर्जन जंगल में वह कहाँ जाएगा, यह सोचकर अंकुर बहुत घबरा गया तभी पास ही में उसे एक झोपड़ी में उसे  दीपक की रोशनी नजर आई. वह घोड़े को लेकर उस झोपड़ी में पहुंचा.

झोपड़ी में एक आदमी बैठा हुआ था. अंकुर ने उसे अपने बारे में बता कर रात भर ठहराने की बात कही. वह आदमी तैयार हो गया. उसने अंकुर को भोजन कराया और रात को सुला दिया. सुबह अंकुर ने उस आदमी को घोड़े के चमत्कार के बारे में भी बता दिया, तब उस आदमी ने कहा कि मेरे पास सोने के चार हार हैं. उनमें से दो हार मैं तुम्हें दे सकता हूँ, बशर्ते तुम अपना घोड़ा मुझे दे दो.

अंकुर सोच में पड़ गया. उसने सोचा कि मेरे माँ-बाप बहुत गरीब हैं.  इस घोड़े का क्या करूंगा, यदि मैं चारों ही हार ले लूं तो मेरे माता-पिता की दरिद्रता दूर हो जाएगी. हम खूब धनवान बन जाएँगे. अंकुर ने उसे चारों हार देने के लिए कहा तो उस आदमी ने मना कर दिया. विवश होकर अंकुर घोड़ा लेकर झोपडी से बाहर निकल आया. वह पैदल ही चलता हुआ झोपड़ी से बहुत दूर निकल आया. फिर उस पर बैठकर उसे उड़ाने के लिए उसकी मूठ घुमाने लगा, लेकिन घोड़ा उड़ा नहीं.

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तभी उसे याद हो आया कि महात्मा जी ने कहा था कि लोभ मत करना, पर मैंने लोभ किया. तभी एस घोड़े की शक्ति जाती रही. अब इस घने जंगल में वह खो ना जाए? उसे तो झोपड़ी का भी रास्ता नहीं मालूम रहा. तभी दूर कहीं सियारों के गुर्राने की आवाजें आने लगीं. वह भय के मारे रोने लगा और ‘बचाओ –बचाओ’ पुकारने लगा.

तभी उसकी आँखें खुल गई, उसके पिता जी उसे झिंझोड़ते हुए उठा रहे थे और पूछ रहे थे कि वह क्यों ‘बचाओ-बचाओ’ कहकर चीख रहा था? अब अंकुर को भी ध्यान आ गया कि वह काठ का घोड़ा तो महज एक सपना था. उसने अपने माता-पिता को भी अपना सपना सुनाया, उसकी बातें सुनकर उसके पिता ने उसके सर को धीरे-धीरे सहलाते हुए कहा, ” बेटा ! सपने में ही सही, उन महात्मा जी ने बिलकुल ठीक ही कहा था कि आदमी को लोभ नहीं करना चाहिए, लोभ समस्त पापों की जड़ होता है. जो भी व्यक्ति किसी लोभ में फंसा, कि वह पाप की दल-दल में समा जाता है, जहाँ से निकलना फिर कभी संभव ही नहीं होता.”

पिता की इस सीख को अंकुर ने हमेशा के लिए याद कर लिया. उसने अपने जीवन में अच्छा इन्सान बनने का संकल्प कर लिया उस दिन के बाद वह फिर कभी किसी लोभ में नहीं फंसा.

बेटी, पत्नी और मां के रूप में एक सच्ची भारतीय नारी हिंदी कहानी | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

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आपने कभी सोचा है कि आखिर एक नारी क्या कर सकती है? वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी मतलब कुछ भी. प्रस्तुत कहानी True Indian Women Daughter Wife Mother Hindi Story इस बात को साबित करती है. यह कहानी नहीं बल्कि एक नारी के जीवन की गाथा है.

एक गांव था. एक ऐसा गांव जहाँ महिलाओं का कोई सम्मान नहीं था. अगर कोई लड़की अपने मां बाप से अपनी पढ़ाई के बारे में बात करती तो उसे उसके मां-बाप डांट कर चुप कर देते थे. लड़कियों की मर्जी के खिलाफ जाकर उनकी शादी कर दी जाती थी. इसी कारण कुछ लड़कियां आत्महत्या भी कर लेती थीं.

मगर ऐसे गांव में भी एक सज्जन आदमी रहते थे, जिनका नाम मोहनदास था. वह एक धनवान आदमी थे. उनका गांव में एक शानदार घर था. वह एक सफल कारोबारी थे. उनका शहर में अच्छा कारोबार चल रहा था. वह इस गांव में अपनी पत्नी के साथ रहते थे. उनकी पत्नी गर्भवती थी. मोहनदास को अपने गांव के प्रति बड़ा लगाव था. वह गांव की उन्नति के लिए गांव के लड़कों के साथ लड़कियों को भी पढ़ाना चाहते थे. लेकिन गांव वाले उनका विरोध करते थे. वह कहते कि लड़कियां पढ़ कर क्या करेगी. उन्हें तो अपने पति का घर संभालना है. गांव वालों ने मोहनदास की बात को ठुकरा दी. लेकिन मोहनदास गांव वालों को समझाने की बार-बार कोशिश करते रहे.

एक दिन गांव वालों ने गुस्सा होकर मोहनदास को बोल दिया कि हमारी बेटियों के भविष्य की चिंता करने वाले आप कौन हैं, उनकी चिंता करने के लिए हम बैठे हैं. उसके बाद मोहनदास ने गांव वालों को समझाना बंद कर दिया. लेकिन वह रोज भगवान से अपनी संतान के रूप में एक बेटी मांगने लगे और वह कहते हैं ना कि अच्छे काम में भगवान भी अपना साथ देते हैं. एक दिन भगवान की कृपा से मोहनदास के घर एक सुंदर बेटी ने जन्म लिया. उन्होंने उसका नाम जागृति रखा. मोहनदास की आंखों से खुशी के आंसू थे. वह बहुत खुश हुए. पूरे गांव में नाच गाना हुआ. मोहनदास बेटी के आने पर पूरे गांव में नाच रहे थे. यह बात गांव के पुरुषों को अच्छी नहीं लगी क्योंकि एक लड़की के जन्म होने पर आज पहली बार उस गाँव कोई मर्द ऐसे नाच रहा था.

धीरे-धीरे मोहनदास की बेटी जागृति चार साल की हो गई. वे अपनी बेटी को एक बेटे की तरह पालने लगे. वे उसे लड़कियों के कपड़ों की बजाय लड़कों के कपड़े पहनाते थे. जब जागृति लड़कों के कपड़े पहन कर गांव में निकलती तो गांव की सभी लड़कियां उसे देख अपने मां बाप से भी वैसे कपड़ों की मांग करती. जागृति जब बाल मंदिर में झोला लेकर पढ़ने जाती तो गांव की लड़कियां भी अपने मां-बाप से पढ़ने की इच्छा व्यक्त करती.

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बच्चों की ऐसी जिद के कारण गांव वाले तंग आ गए. एक दिन वे मोहनदास के घर पहुंच गए और जागृति को पढ़ाने के लिए मना करने लगे. फिर मोहनदास ने हंसकर वही बात कही जो एक दिन गांव वालों ने उनसे कहा था. उन्होंने कहा कि जागृति मेरी बेटी है. उसके भविष्य की चिंता करने वाले आप कौन हैं. उनकी चिंता करने वाला में बैठा हूं न. यह सुनकर गांव के लोग वहां से लौट गए. गांव के लोगों को यह अच्छा नहीं लगा.

मोहनदास अपनी बेटी जागृति को बार-बार तीन बातें कहा करते थे. एक कि वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी मतलब कुछ भी. दूसरा जब इंसान को आगे रास्ता ना दिखाई दे तो उसे एक ही दिशा में चलते रहना चाहिए. उसे मंजिल जरूर दिखाई देगी और तीसरी की संघर्ष के बिना कुछ नहीं मिलता. मोहनदास अपनी बेटी जागृति को भगवान का दिया हुआ प्रसाद मानते थे. उन्हें लगता था कि उनकी बेटी एक दिन समाज में उनका नाम रोशन करेगी.

दिन ऐसे ही बीतते गए और जागृति बड़ी होती रही. उसके जीवन में वह सब कुछ मिला था जिसकी वह हकदार थी लेकिन उसी जीवन में एक दिन उसे सब कुछ खोना भी लिखा था. एक दिन ऐसा आया जब जागृति अपने मां बाप के साथ मेले में घूमकर वापस घर आ रही थी, तभी कुछ गांववालों ने वेश बदलकर उन पर हमला कर दिया. उन्होंने मोहनदास और उनकी पत्नी को घायल कर दिया और वे दोनों अचेत हो गए. उन लोगों ने जागृति को एक बहती नदी में फेंक दिया. कुछ समय बाद जब उसके मां-बाप को होश आया तब जागृति उन्हें कहीं दिखाई नहीं दी तो वह घबरा गए. जागृति को इधर-उधर ढूंढने लगे पर उनकी बेटी उनको कहीं नहीं मिली. वे दोनों फूट-फूट कर रोने लगे. अपनी बेटी को पुकारने लगे. लेकिन वह कहीं नहीं मिली.

दूसरी तरफ नदी में डूब रही जागृति के चिल्लाने की आवाज को वहां से गुजर रहे एक लकड़हारा ने सूनी और उसने तुरंत नदी में छलांग लगा दी. उसने जागृति को बचाया और उसे अपने घर ले गया. उसकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए लकड़हारा और उसकी पत्नी उसे अपनी बेटी समझकर उसकी परवरिश करने लगे.

जागृति लकड़हारे के घर धीरे-धीरे बड़ी हुई. लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वैस-वैसे उसके दिमाग से अपने असली माता-पिता की यादें जाती रही. लेकिन वह अपने पिता की कही हुई बातें नहीं भूली. वह अपने इस मां-बाप से हमेशा कहती रहती थी कि वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी मतलब कुछ भी. इस गांव में भी लड़कियां स्कूल नहीं जा सकती थी. लकड़हारे ने फिर भी जागृति का स्कूल में दाखिला करवाया. पर गांव वालों ने उसे स्कूल भेजने के लिए मना किया. जागृति अब लकड़हारे को अपना बाप समझने लगी थी. उसने अपने पिता की परेशानी को समझा और पिता से कहा – “वह सिर्फ उसको किताबें ला कर दें वह खुद घर पर बैठी पढ़ना लिखना सीख लेगी”. पिता ने कहा कि तू कैसे सीख लेगी? तो जागृति ने फिर वही बात कही कि “वह कुछ भी कर सकती है. कुछ भी मतलब कुछ भी.”

मोहनदास की कही हुई इन बातों को वह कभी नहीं भूली. दिन बीतते गए. जागृति की अब उमर हो चली थी. इसलिए लकड़हारे को उसकी शादी की चिंता सताने लगी. वह जागृति के लिए एक योग्य वर ढूंढने लगा. जागृति को इस बात का पता चला तो उसने शादी करने से इनकार किया. कहने लगी कि उसको अभी और पढ़ना है. पढ़ लिखकर कुछ बनना है. यह सुनकर लकड़हारे की चिंता और बढ़ गई. बेटी की शादी की चिंता में वह बीमार पड़ने लगा.

एक दिन बीमारी इतनी बढ़ गई कि लकड़हारा तड़पने लगा. जागृति दौड़कर वैद्य जी के घर उनको बुलाने गई. उसी समय वैद्य जी के घर अपने बेटे के लिए दुल्हन ढूंढ रहे कुछ लोग आए हुए थे. जागृति उनको पसंद आ गई. उन्होंने वैद्य जी से यह बात कही. उसके बाद वैद्य जी जागृति के साथ उसके घर गए. उन्होंने लकड़हारे को देखा और दवा दी. जाते वक्त उसने जागृति के पसंद आने की बात कही. घरबार सब कुछ अच्छा है. लड़के के अच्छे होने की भी बात कही. अब तक तो जागृति अपने पिता की बीमारी का कारण समझ चुकी थी, इसलिए उसने अपने मां-बाप के लिए शादी करने के लिए तैयार हो गयी.

कुछ दिनों के बाद जागृति की शादी होने लगी. उसका कन्यादान हुआ. विदाई के समय जागृति बार-बार अपने पिता को गले लगा लेती थी. ऐसा भावुक दृश्य था कि बाराती भी रोने लगे थे. लकड़हारा अपनी बेटी को सिर्फ देखता रहा. उसकी आंखों से आंसू निकलते रहे. जागृति अपने पिता का आंगन छोड़ अपने ससुराल चली गई.

बेटी, पत्नी और मां के रूप में एक सच्ची भारतीय नारी हिंदी कहानी | Baccho ki Kahaniyan in hindi |

जागृति अब अपने मां-बाप की यादों को अपने साथ लेकर अपने पति के साथ उसके ससुराल आ गई. जिंदगी का एक नया अध्याय अब शुरू हुआ, लेकिन उसकी जिंदगी में मुश्किलें घटने की बजाए और बढ़ने लगी. शादी की पहली रात को उसको यह मालूम हुआ कि उसका पति एक शराबी है, बेशर्म है, नल्ला है. तब उसकी आंखों से पहली बार आंसू निकल आए. वह बहुत रोई. लेकिन जागृति एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी. वह यह जानती थी कि जिंदगी हमारे हिसाब से नहीं बल्कि हम जिंदगी के हिसाब से चलते हैं.

शादी के कुछ दिनों बाद जागृति की सांस उसको छोटी-छोटी बातों पर डांटने लगी. जागृति जब सामने बोलती तो उसका पति उसको मारने लगता. कभी-कभी उसको दिन भर खाना भी नहीं देता. एक दिन गांव के चौराहे पर किसी विषय पर चर्चा हो रही थी समस्या का निवारण ना मिलने पर जागृति ने एक सही उपाय बताया. उपाय सही था पर एक महिला ने दिया होने के कारण उस पर ध्यान नहीं दिया गया. जागृति की इस उपाय बताने वाली गलती के लिये उसकी सास ने उसे दो दिन तक एक कमरे में बंद कर दिया. वह दो दिनों तक बिना कुछ खाए पियें बंद कमरे में रही.

समय यूँ ही बीतता रहा. जिंदगी में बार-बार मुश्किलें आने पर भी वह निराश नहीं हुई. उसने फिर वही बात दोहराई कि वह कुछ भी कर सकती है. कुछ भी मतलब कुछ भी. उसने ठान लिया कि वह महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागृत करके ही रहेगी. महिलाओं का न्याय दिलाकर ही रहेगी लेकिन उसके लिए उसको अपने पति के साथ की आवश्यकता थी. उसका पति शराबी था लेकिन फिर भी वह उसे एक अच्छा आदमी बनाने के लिए लगातार कोशिशें करने लगी. उसने अपने सौंदर्य से अपनी प्रेम की शक्ति से धीरे-धीरे उसके पति को अपना बनाया. उसके पति को भी अब उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता था. वह अब उसकी बातों को सुनने लगा था. शराब छोड़ कर काम करने लगा था.

अपने बेटे को अब सही दिशा में जाते हुए देख जागृति की सास को बहुत अच्छा लगा. धीरे-धीरे उसने अपनी सास को भी अपने स्वभाव से अपना बना लिया. जागृति उसकी सास को मां मानने लगी थी और उसकी सास भी उसके साथ अपनी बेटी की तरह बर्ताव करने लगी थी.
घर में अब खुशियां ही खुशियां थी. चारों तरफ शांति थी. जागृति ने अपने प्रेम और चतुराई से घर के सारे सदस्यों को अपना बना लिया था, लेकिन गांव के लोगों को अपना बनाना अभी बाकी था. एक दिन अच्छा समय देखकर जागृति ने उसके पति से लड़कियों की पढ़ाई के बारे में बात की. तब उसके पति ने कहा कि वह अब हर पल उसके साथ है. वह जो करना चाहती है वह करें. उसके बाद उसके पति ने उसकी मां को यानि जागृति की सास को समझाने में जागृति की मदद की और माँ भी मान गई.

जागृति ने अपने परिवार को तो मना लिया पर गांव वालों को इस बात के लिए राजी करना बहुत मुश्किल था. वह जानती थी कि गांव का कोई भी पुरुष लड़कियों की पढ़ाई के लिए राजी नहीं होगा. इसलिए उसने गांव की सभी महिलाओं को एक जगह पर विनती करके बुलवाया और अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए समझाने लगी. उसने कहा कि हम नहीं पढ़ सके तो क्या हुआ अपनी बेटियों को जरूर पढाएंगे. उनको आगे बढ़ाएंगे. लेकिन तभी वहां कुछ आदमियों ने आकर इस बात का फिर से विरोध किया. उन्होंने फिर से कहा कि लड़कियां पढ़कर क्या करेंगी. वह अपने पति का घर संभालेगी तो उनके लिए बहुत है.

अपनी जिंदगी में बार-बार यह बात सुनकर जागृति थक चुकी थी. वह सबके आगे आकर चीखकर बोली कि वह कुछ भी कर सकती है. कुछ भी मतलब कुछ भी. यानी पढ़ सकती है, लिख सकती है, सपने देख सकती है, आसमान में उड़ सकती है. जब घर चला सकती है तो देश भी चला सकती है.

सारे मर्द सुनते रहे और जागृति बोलती रही. उसकी आंखों में आज एक अनोखा तेज था, एक जुनून था. उसने महिलाओं की तरफ देखकर आगे बोलते हुए कहा – भेदभाव जुल्म मिटाएंगे, दुनिया नइ बसायेंगे, नई है डगर, नया है सफर, अब हम नारी आगे ही बढ़ते जाएंगे.

उसके बाद पुरुषों के सामने जाकर बोला कि – जीवन की कला को अपने हाथों से साकार कर, नारी ने ही संस्कृति का रूप निखारा है. नारी का अस्तित्व ही सुंदर जीवन का आधार है.

यह सुनकर सारी महिलाओं ने अपने झुके हुए सर को ऊंचा कर दिया वे जागृत होकर एक साथ बोलने लगी –

हाँ हाँ हम पढेंगे, हम भी आगे बढ़ेंगे.

गांव के कुछ मर्द इस बात को लेकर क्रोधित हो गए. बात बिगड़ने ही वाली थी कि जागृति के पति ने आगे आकर बोला कि – जो महिलाओं को इज्जत देगा उसकी अपने आप में इज्जत खुद बढ़ जाएगी.

यह सुनकर गांव के सभी पुरुष शांत हो गए. जागृति के पति ने खुद अपना उदाहरण देकर समझाया कि कैसे वो एक शराबी से एक अच्छा इंसान बना. कुछ लोगों ने इस बात को अपना लिया. गांव की महिलाओं ने खुश होकर अपने-अपने पति को गले लगा लिया. गांव की सारी लड़कियां जागृति के पांव छूने लगी. जागृति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी मतलब कुछ भी. लड़कियां अब स्कूल जाने लगी. यह बात आसपास के गांव में फैल गई.

जागृति के पति को अब अपनी पत्नी पर गर्व होने लगा. वे दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे पर ना जाने जागृति के नसीब में और क्या लिखा था. पहली बार वह अपने असली मां-बाप से बिछड़ गई दूसरी बार उसको बेटी समझ कर बड़ा करने वाले मां बाप से दूर हो गई और इस बार उसको अपने पति से बिछड़ कर जाना था.

एक दिन दोपहर को जागृति अपने खेतों में काम कर रहे पति के लिए खाना लेकर जा रही थी, तभी रास्ते में कुछ लोगों ने उसे घेर लिया और उसके साथ जबरदस्ती करने लगे. जागृति का उन लोगों ने शारीरिक शोषण किया और फिर उसे पास की नदी में फेंक दिया.

इधर जागृति के पति को लगा, इतनी देर हो गई, लेकिन जागृति अभी तक खाना लेकर क्यों नहीं आई. इसलिए उसका पति घर की और चल पड़ा. रास्ते में उसे जागृति के कुछ गहने दिखाई पड़े. वह डर गया. वह समझ गया कि जागृति के साथ जरूर कुछ गलत हुआ है. उसको नदी में फेंकने वाले लोग अभी भी वही थे. उसके पति ने उन्हें देखा तो समझ गया कि जरूर उन लोगों ने ही कुछ किया होगा. वह उनके पास जाकर पूछने लगा की जागृति कहां है तब उन्होंने सारी बात कही. जागृति के पति ने क्रोधित होकर उन लोगों को मार डाला और फिर जागृति के पीछे उसने भी नदी में छलांग लगा दी.

जागृति के नसीब में न जाने और क्या लिखा था. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी वह जिंदा थी. कुछ दिनों के बाद जब उसे होश आया तो वह नदी के किनारे पड़ी हुईी थी. उसकी हालत ऐसी थी कि क्या करूं, कहां जाऊं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. लेकिन उसे अपने असली पिता मोहनदास की कही हुई बातें याद आई. उसके पिता ने कहा था कि जब इंसान को आगे रास्ता न दिखाई दे तब उसे एक ही दिशा में चलते रहना चाहिए. मंजिल उसे जरुर दिखाई देगी. जागृति ने चलना शुरू किया. कुछ दिनों के बाद चलते-चलते जागृति को एक गांव दिखाई दिया. यह गांव उसका अपना था जहां से वह बरसों पहले बिछड़ गई थी.

जिंदगी भी ना पता नहीं जागृति को किस मोड़ पर ले जा रही थी. नसीब में एक बार फिर जागृति को अपने असली मां-बाप से मिलना लिखा था. जागृति फिर से अपने गांव पहुंच गयी. आज भी वह गांव वैसा ही था जैसे बरसों पहले था. जागृति गांव को देख, गांव की गलियों को देख अचंभित हो गई. उसे महसूस होने लगा कि यह सबकुछ उसने पहले कभी देखा है और अपने दिमाग में लगातार विचार आने के कारण वह फिर से बेहोश हो गई. उसके आसपास लोगों की भीड़ जमा हो गई. कोई आदमी जागृति को अपने घर ले गया और वैद्य जी को बुलाया. उन्होंने कहा कि वह मां बनने वाली है. एक पल के लिए तो वहां खड़े लोग खुश हुए.

पर थोडी ही देर में किसी ने देखा की जागृति के गले में मंगलसूत्र नहीं है और माथे पर सिंदूर भी नहीं है तो लोग बातें बनाने लगे. थोड़ी देर के बाद जब जागृति को होश आया तो गांव के पुरुष बिना सोचे-समझे जागृति को कुलटा स्त्री कहने लगे. वहां खड़ी महिलाओं ने उसे सुनने को कहा लेकिन पुरुष सुने तब ना. जागृति को सारी बात समझ में आ गई. वो उठकर सिधा कुएं में कूद पड़ी. लेकिन उसी समय उसके असली पिता मोहनदास ने उसे बचा लिया और अपने घर ले गए.

वह अपने असली मां बाप के सामने थी, पर वे जागृति को पहचान नहीं पाए. जागृति बहुत रो रही थी. उसे इस कदर रोता हुआ देख उसकी मां उसके पास आई और उसके आंसू पोछे. उसे ऐसे रोता हुआ देख उसकी मां की आंखों से अचानक आंसू निकल आए क्योंकि वह जागृति की जननी थी. उसकी असली मां थी. थोड़ी देर बाद मोहनदास ने जागृति से अपनी ऐसी हालत के बारे में पूछा. तब उसने अपने साथ हुई सारी बातें बताई और फिर रोने लगी. कहने लगी कि वह अब अपने पति के पास क्या मुंह लेकर जाएगी. उसने मर जाना चाहा. तब मोहनदास उसके सर पर हाथ रखते हुए बोले. बेटी जो हुआ वह गलत था. लेकिन इसमें तेरी कोख में पलनेवाले इस बच्चे का क्या दोष.

एक मां अपने बच्चे को जीवन देती है, मौत नहीं. जागृति चाहकर भी अपने पति के पास नहीं जा सकती थी. इसलिए मोहनदास ने अपनी ही बेटी को अपने घर में अपना घर समझकर रहने को कहा और एक बार फिर नसीब जागृति को उसके अपने घर ले आया. मोहनदास और उनकी पत्नी अपनी बेटी को ही बेटी कह कर बुलाने लगे और जागृति भी उन्हें अपने मां-बाप मानने लगी थी.

समय का पहिया घूमता रहा. कुछ महीने बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया. एक बार फिर एक लड़की की कहानी शुरू हुई. जागृति अपने बीते हुए कल को भुलाकर अपनी बेटी की परवरिश करने लगी. मोहनदास ने एक बार फिर अपनी ही बेटी की बेटी का नाम रोशनी रखा. और कहने लगे कि यह रोशनी उनका नाम एक दिन जरुर रोशन करेगी.

एक दिन घर पर कारोबार के सिलसिले में कुछ कारोबारी आए. मोहनदास और वो लोग अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए तरकीबें सोच रहे थे. लेकिन हर सोच के अंत में गलत परिणाम दिखाई दे रहा था. इस बात को लेकर वह परेशान थे जागृति यह सब देख रही थी. उसे अपने पिता मोहनदास को यूँ परेशान होते हुए देखा नहीं गया. वह बिना कुछ सोचे समझे सबके सामने जाकर बोलने लगी. कारोबार को लेकर अच्छे आईडिया देने लगी. मोहनदास और उनके साथी को सारे आईडिया पसंद आए. उनहे बहुत सारा मुनाफा दिखने लगा. सब खुश हुए. जागृति को शाबाशी देने लगे. अपनी बेटी की ऐसी बुद्धि क्षमता को देखकर मोहनदास बहुत खुश हुए और उन्होंने अपनी बेटी को अपने कारोबार में साथ लेने का फैसला किया. कारोबारी भी इस बात को लेकर राजी हो गए.

जागृति अब अपने अतीत को पूरी तरह से भुला चुकी थी. एक बार फिर से उसने सपने देखना शुरू किया. वह बिना पंख के उड़ने लगी. वह अपनी बेटी रोशनी की परवरिश के साथ-साथ दिन रात एक कर अपने पिता के कारोबार को और आगे बढ़ाने लगी. दुनिया में उसका नाम हुआ. मोहनदास का कारोबार आसमान को छूने लगा.

जब दुनिया बोलती थी, तो वह अकेली सुनती थी. और आज जब वह अकेली बोलती है, तो पूरी दुनिया उसे सुनने लगी.

यह बात आस-पास के गांव में फैलने लगी. अब महिलाएं अपने घरों में अपने पति के सामने बोलने लगी थी. स्त्री हठ के आगे एक मर्द हारने लगा. एक दिन ऐसा आया कि गांव के एक घर से एक महिला अपनी बेटी को तैयार कर हाथ में किताबों का झोला पकड़कर स्कूल ले जा रही थी. तभी उसके पीछे पीछे गांव की सभी महिलाएं अपनी बेटियों को लेकर स्कूल जाने लगी. गांव के मर्द चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए. लड़कियां अब पढ़ने लगी थी.

मोहनदास यह सब देखकर गांव में नाचने लगे. गांव के सारे लोग मोहनदास को सिर्फ देखते रहें, बस देखते ही रहे. मोहनदास और जागृति ने पैसे लगाकर गांव को गांव से शहर बना दिया. गांव के मर्दों को अपनी भूल का एहसास हुआ. वह मोहनदास के घर गए और माफी मांगने लगे. उन्होंने सच्चाई बताई कि उन्होंने ही वर्षों पहले उनकी बेटी को नदी में फेंक कर मार डाला था. जबकि वही लड़की आज उनके सामने सर उठा कर खड़ी है.

समय के चक्रव्यूह में लोग फंसते गए. मैंने पहले भी लिखा था कि अच्छे कामों में भगवान भी अपना साथ देते हैं. मोहनदास ने जब यह बात सुनी तो उन्हें जोर का झटका लगा. उनकी आंखों से आंसू ऐसे निकलने लगे, जैसे नदी बह रही हो. मोहनदास को यूँ रोते हुए देख गांव के सारे मर्दों ने अपना सिर झुका दिया. वहा खड़ी महिलाएं भी रोने लगी. मोहनदास रो रहे थे. तब अपने पिता के आंसू पोछने जागृति ने अपनी बेटी रोशनी को अपने दादा के पास भेजा. तब रोशनी को देखकर मोहनदास ने कहा कि कौन कहता है कि मेरी बेटी मेरे पास नहीं है. उन्होंने रोशनी के सर को चूमा और गांव वालों को माफ कर दिया. उन्होंने कहा कि

तकदीर ने मुझसे मेरी एक बेटी छीनी है, लेकिन बदले में दो – दो बेटियां दी हैं. मोहनदास अपनी दोनों बेटियों को लेकर अपने घर में चले गए.

जागृति अपनी बेटी को एक डॉक्टर बनाना चाहती थी. इसलिए वह अपने परिवार को साथ लेकर विदेश जा रही थी. जिस जिंदगी ने जागृति को अपने मां बाप से जुदा किया था. उसी जिंदगी ने जागृति को फिर से अपने मां-बाप से मिलवाया. और आज वही जिंदगी उसे अपने पति से मिलवाने जा रही थी. उसने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा. नसीब में एक बार फिर पति-पत्नी का मिलना लिखा था. उसका पति आज तक उसे पागलों की तरह सड़कों पर ढूंढता फिरता है. उसकी हालत एक भिखारी के जैसी हो गई है. फटे हुए कपड़े, लंबे-लंबे बाल, भूख से बेहाल हो चुका है. लेकिन फिर भी जागृति की तस्वीर लेकर वह लोगों को पूछता फिरता है कि किसी ने इस लड़की को देखा है कहीं.

लोग जब तस्वीर देखते तो वह पहचान जाते थे कि वह जागृति है. लेकिन भिखारी और पागल जैसे दिखने वाले इंसान पर कौन भरोसा करता. आज भी वह ऐसे ही सड़कों पर घूम रहा था. संजोग से गाड़ी में जाती हुई जागृति ने अपने पति को देख लिया. उसने तुरंत ड्राइवर को गाड़ी रोकने के लिए कहा और गाड़ी से उतरकर वह अपने पति के पीछे भागने लगी. लोगों को जागृति को ऐसे भागते हुए देख आश्चर्य हुआ. उसने दौड़कर अपने पति को पकड़ लिया.

कुछ समय तक वह दोनों एक दूसरे को देखते रहे. उसका पति बस उसे देखता ही रहा और वह दोनों एक दूसरे के गले लग गए. लोग इस दृश्य को देखकर हैरान रह गए. एक भिखारी और पागल जैसे दिखते हुए इंसान को जागृति को गले लगाते हुए देख लोग जागृति को पागल मानने लगे. हमारे समाज के लोग भी ना पता नहीं क्या – क्या सोचते रहते हैं. जागृति का पूरा परिवार वहां खड़ा था. लोग भी वहां खड़े थे. कुछ देर के बाद पता चला कि वह दोनों पति- पत्नी है.

लोगों को और आश्चर्य हुआ. लगा कि आसमान को छूने वाले घर में रहने वाली लड़की एक भिखारी और पागल जैसे दिखने वाले इंसान की पत्नी है. मोहनदास अपनी बेटी के पति को देखकर बहुत खुश हुए. लेकिन देखते ही देखते उसके पति ने इतने सारे लोगों के बीच जागृति को थप्पड़ मारा और पूछा कि इतने सालो तक वो कहां थी. उसे एक बार भी अपने पति की याद नहीं आई. क्या सोचकर वह अपने पति के पास नहीं आई. क्या उसे इतना भी विश्वास नहीं था कि उसका पति ऐसे समय पर उसका साथ नही देगा पर फिर भी विश्वासघात किया. कितने साल तक वो पागलो की तरह ढूंढता रहा उसको. उसने कहा कि समाज उसके साथ नहीं था पर उसका पति तो उसके साथ था ना.

जागृति यह सुनकर रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी. तब उसका पति उसे कहता है कि उसे पेंरो में नहीं पर बराबरी का स्थान दिया था. वह जागृति को खड़ा करता है और रोशनी को अपनी बाहों में ले लेता है. तब जागृति उसको रोते हुए गले लगा लेती है.लोग यह सब कुछ देखते रहते हैं.

जागृति अपने पति को अपने साथ अपने घर ले जाती है. नौकर चाकर होने के बावजूद अपने पति के लिए अपने हाथों से खाना बनाती है. उसे अपने हाथों से खिलाती भी है. यह देख पति की आंखों से आंसू निकल आते हैं. जागृति आंसूओं को पोछती है और खुद रोती है. अपनी बेटी को उसके पति के साथ खुश देखकर मोहनदास बहुत खुश होते है.

कुछ दिन ऐसे ही बीत गए. जागृति का पति उसे वापस गांव ले जाना चाहता था. और जागृति उसके पूरे परिवार के साथ अपने ससुराल चली. बरसों के बाद वह अपने परिवार से मिली. सच्चाई मालूम होने के बावजूद उसकी सास ने उसको स्वीकार किया. क्योंकि वह खुद एक स्त्री थी, एक भारतीय नारी थी. कुछ दिन अपने ससुराल में बिताने के बाद वह अपने मायके चली.

अब जागृति को उसके असली मां-बाप से मिलने का समय आ चुका था.जागृति अपने परिवार के साथ मायके आई उसको पाल पोस कर बड़ा करने वाले मां बाप से मिली. जागृति उन्हें जन्म देने वाले माता पिता समझकर धन्यवाद देने लगी. तब जाकर लकड़हारे ने कहा कि वो उसकी बेटी नहीं हे, वह तो उसे नदी में डूबती हुई मिली थी. तब जाकर जागृति को पता चला कि मोहनदास ही उसका असली पिता है. मोहनदास एक बार फिर से रो पडे. बरसों से बिछड़ा हुआ परिवार आज पूरा हुआ.

जागृति इतनी सारी मुश्किलें आने पर भी हारी नहीं. हर मुश्किल का डटकर सामना करते हुए वह आगे बढ़ती गई. वह एक सच्चे पिता की सच्ची बेटी बनी, एक पति की सच्ची पत्नी बनी, एक बेटी की सच्ची मां बनी. इतना ही नहीं वह एक सच्ची भारतीय नारी भी बनी. इस महान

देश में सीता, सावित्री और दमयंती जैसी नारियां हुई हैं. इसलिए सच ही कहा गया है:

महिलाओं को दो इतना मान, की बढ़े भारत देश की शान