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परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

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परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध :

भूमिका : हर वर्ष करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा देते हैं। स्कूलों व् कोलेजों में बहुत प्रकार की परीक्षाएं आयोजित करवाई जाती हैं। अगर किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी प्रकार की नौकरी प्राप्त करनी हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी कोर्स का दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षाओं के अनेक रूप होते हैं। लेकिन हम केवल एक ही परीक्षा से परिचित हैं जो की लिखित रूप से कुछ प्रश्नों के उत्तर देने से पूरी होती है। खुदा ने अब्राहम की परीक्षा ली थी। परीक्षा के नाम से फरिश्ते घबराते हैं पर मनुष्य को बार-बार परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षा क्या है : परीक्षा को वास्तव में किसी की योग्यता, गुण और सामर्थ्य को जानने के लिए प्रयोग किया जाता है। शुद्ध -अशुद्ध अथवा गुण-दोष को जांचने के लिए परीक्षा का प्रयोग किया जाता है। हमारी शिक्षा प्रणाली का मेरुदंड परीक्षा को माना जाता है। सभी स्कूलों और कॉलेजों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसका उद्देश्य विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल कराने के लिए किया जाता है।

स्कूलों में जो सामान्य रूप से परीक्षा ली जाती हैं वह वार्षिक परीक्षा होती है। जब वर्ष के अंत में परीक्षाएं ली जाती हैं तब उनकी उत्तर पुस्तिका से उनकी क्षमता का पता चलता है। विद्यार्थियों की योग्यता को जांचने के लिए अभी तक कोई दूसरा उपाय नहीं मिला है इस लिए वार्षिक परीक्षा से ही उनकी योग्यता का पता लगाया जाता है। परीक्षाओं से विद्यार्थियों की स्मरन शक्ति को भी जांचा जा सकता है।

परीक्षा का वर्तमान स्वरूप : तीन घंटे से भी कम समय में विद्यार्थी पूरी साल पढ़े हुए और समझे हुए विषय को हम कैसे जाँच -परख सकते हैं ? जब प्रश्न -पत्रों का निर्माण वैज्ञानिक तरीके से नहीं होता तो विद्यार्थियों की योग्यता को जांचना त्रुटिपूर्ण रह जाता है। जब परीक्षा के भवन में नकल की जाती है तो परीक्षा-प्रणाली पर एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है। प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना आजकल आम बात हो गई है। हमारी परीक्षा -प्रणाली की विश्वसनीयता लगातार कम होती जा रही है।

नकल क्यूँ : जिस प्रकार राम भक्त हनुमान को राम का ही सहारा रहता था उसी तरह कुछ बच्चों को बस नकल का ही सहारा रहता है। पहले समय में बच्चों को नकल करने के लिए कला का सहारा लेना पड़ता था लेकिन आजकल तो अध्यापक ही बच्चों को नकल करवाने के लिए चारों तरफ फिरते रहते हैं।

नकल करना और करवाना अब एक पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। अगर नकल करवानी है तो माता-पिता के पास धन होना जरूरी हो गया है। कुछ विद्यार्थी दूसरों के लिए आज भी नकल करवाने और चिट बनाने का काम करते रहते हैं। बहुत से विद्यार्थी तो ब्लू-टूथ और एस० एम० एस० के द्वारा भी नकल करते रहते हैं। बच्चों के मूल्यांकन में भी बहुत गडबडी होने लगी है।

नकल के लिए सुझाव : कोई भी परीक्षा प्रणाली विद्यार्थी के चरित्र के गुणों का मूल्यांकन नहीं करती है। जो लोग चोरी करते हैं हत्याएँ करते हैं वे भी जेलों में बैठकर परीक्षा देते और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हैं। जो परीक्षा प्रणाली केवल कंठस्थ करने पर जोर देती है वो विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती। सतत चलने वाली परीक्षा प्रणाली की स्कूलों और कॉलेजों में विकसित होने की जरूरत है। विद्यार्थी के ज्ञान , गुण और क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उपसंहार : आजकल बहुत से लोगों को परीक्षाएं देनी पडती हैं। अगर आपको कोई भी कार्य करना है तो पहले आपको परीक्षा देनी पडती है | कुछ लोग परीक्षा देने के परिश्रम से बचने के लिए नकल करते हैं तो कुछ लोग पैसे देकर नकल करते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। आगे चलकर जब उन्हें कोई व्यवसायिक कार्य या फिर नौकरी पाने के लिए फिर भी परीक्षा देनी ही पड़ेगी।

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

यूँ तो प्रत्येक परीक्षा केंद्र के बाहर बड़े-बड़े इश्तिहार लगाए जाते हैं, जिन पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता है- ‘परीक्षा में नकल करना पाप है/ सामाजिक बुराई है।’ फिर भी ‘रघुकुल रीत सदा चली आई’ की तर्ज पर परीक्षाओं में नकल है कि चलती ही आ रही है। यदि किसी रोज इस अपील का ऐसा असर हो जाए कि परीक्षाओं में नकल होना बिलकुल ही बंद हो जाए तो इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
मसलन ऐसे कई प्राइवेट स्कूलों को अपना बोरिया-बिस्तर गोल करना पड़ सकता है, जिनमें विद्यार्थी दाखिला ही इस आश्वासन के बाद लेते हैं कि उन्हें ‘शर्तिया पास’ करवाया जाएगा और इस गारंटी को पूरा करने के लिए ‘परीक्षा केंद्र अधीक्षक’ नामक प्राणी की ‘पेड’ सेवाएँ ली जाती हैं। दूसरी तरफ नकल बंद होने के कारण आए खराब परीक्षा परिणामों के मद्देनजर गुस्साए अभिभावकों द्वारा सरकारी स्कूलों पर, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, ताले जड़े जा सकते हैं।
सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों के इस प्रकार धड़ाधड़ बंद होने से पूरी शिक्षा व्यवस्था ही चरमरा सकती है और विद्या के इन मंदिरों में तैयार होने वाले समाज के भावी नागरिकों का प्रोडक्शन यकायक बंद हो सकता है।

यही नहीं, प्राइवेट स्कूलों में अपना शोषण करवाकर भी जैसे-तैसे अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे शिक्षक सड़कों पर आ जाएँगे, जिससे कि बेरोजगारी के सेंसेक्स में अभूतपूर्व उछाल आ सकता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को खराब परीक्षा परिणाम के कारण खराब हुई अपनी एसीआर को सुधरवाने के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जेबें गर्म करनी पड़ सकती हैं, जिससे कि भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से ऊपर की ओर जाने लगेगा। 

विभिन्न परीक्षा केंद्रों के आसपास ‘फोटोस्टेट’ की दुकान वालों, जो कि मात्र परीक्षाओं के दिनों में ही अपनी-अपनी जीरोक्सिंग मशीन की पूरी लागत से भी कहीं अधिक रकम वसूल कर लेते हैं, को नकल न होने की स्थिति में अभूतपूर्व गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। नकल करवाने वाले परीक्षा केंद्र अधीक्षकों एवं इस सुकृत्य में उनके सहयोगी चपरासियों, क्लर्कों, सुपरवाइजरी स्टाफ आदि को मिलने वाले सुविधा शुल्क एवं उपहारों का सिलसिला बंद होने की स्थिति में अपना सोशल स्टेटस बनाए रखने में काफी दिक्कतें पेश आ सकती हैं।
इतना ही नहीं, नकल न होने की स्थिति में पर्चियाँ बनाने जैसी उच्चकोटि की प्राचीनकाल से चली आ रही कला का दम घुट जाएगा। नकल बंद होने के फलस्वरूप विभिन्न राज्यों के अथवा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालयों आदि के परीक्षा परिणामों में भारी गिरावट आने पर, शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर विधानसभा, लोकसभा अथवा राज्यसभा में धरना, विरोध, प्रदर्शन, हंगामा जैसी अप्रिय स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं और मीडिया कवरेज के चलते, देश की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बट्टा लग सकता है।
कहीं भी नकल न होने की स्थिति में परीक्षाओं में फेल होने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के चलते युवा वर्ग में बेचैनी, निराशा एवं कुंठा जैसे नकारात्मक भाव जागृत हो सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हो सकती है और अंततोगत्वा संपूर्ण सामाजिक वातावरण तनावग्रस्त हो सकता है। परीक्षाओं में नकल न होने के फलस्वरूप उपरोक्त दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चाहिए कि वह इस मामले में यथास्थिति बनाए रखे और परीक्षाओं में नकल रोकने जैसे अभियान को, जैसा कि अब तक होता आया है, ‘औपचारिकता मात्र’ बनाकर सिर्फ कागजों तक ही सीमित रखा जाए।

 

परीक्षाओं को नकलमुक्त करने के लिए शिक्षा बोर्ड प्रत्येक वर्ष काफी प्रतिबद्धता का ढिंढोरा पीटता है, परंतु परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’ वाला ही रहा है। मेरा ऐसा कहने का तात्पर्य यह नहीं कि पूर्व में किए गए बोर्ड द्वारा प्रयत्न संदेहास्पद थे। बोर्ड ने विगत वर्षों में अपनी क्षमता के अनुसार विद्यार्थियों में नकल की प्रवृत्ति को रोकने के लिए भरसक प्रयत्न किए। इसके लिए बोर्ड ने सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शिक्षा अधिकारियों तथा अध्यापकों तथा बोर्ड के अधिकारी वर्ग और अन्य कर्मचारियों को भी परीक्षाओं के दौरान निरीक्षण पर लगाया, परंतु परिणाम इतने उत्साहवर्धक नहीं रहे। बोर्ड इस बार भी काफी होम वर्क कर रहा है, देखते हैं परिणाम कैसे रहते हैं। बोर्ड की अब तक की असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण सभी स्कूलों में परीक्षा केंद्रों का होना है, जबकि 80 प्रतिशत परीक्षा केंद्रों के भवन इतने घटिया स्तर के हैं कि वहां पर परीक्षा केंद्र रखना नकल को बढ़ावा देना है। बोर्ड ने काफी संख्या में परीक्षा केंद्रों को इस बार बंद किया है। बोर्ड का यह पग अति सराहनीय है, परंतु और भी परीक्षा केंद्र ऐसे हैं, जिनको बंद करना भी अनिवार्य है। इन परीक्षा केंद्रों के दो कमरे एक जगह हैं और दो या तीन कमरे दूसरी जगह हैं। इनकी खिड़कियां और दरवाजे भी टूटे हैं। अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर भी सही नहीं हैं। न ही इन कमरों के बाहर कोई कांटेदार तार लगी है, जिससे कि बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सके। एक आदर्श परीक्षा केंद्र के लिए एक बड़ा हाल जिसमें 200 से 300 बच्चों के बैठने का प्रावधान हो, होना चाहिए। यदि कमरों को परीक्षा केंद्र बनाया गया है, तो वे अंदर से एक दूसरे के साथ जुडे़ होने चाहिए, ताकि परीक्षार्थियों का ठीक ढंग से निरीक्षण किया जा सके। बोर्ड अधिकारियों को समय रहते इन सभी परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करना चाहिए और जो परीक्षा केंद्र बोर्ड के मापदंडों के अनुसार नहीं हैं उन्हें तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए। परीक्षाओं के संचालन में केवल, स्वच्छ छवि, ईमानदार और चरित्रवान अध्यापकों को ही लगाया जाना चाहिए। बहुत से ऐसे पेशेवर अध्यापक हैं जो अपनी ड्यूटी परीक्षाओं में बोर्ड कर्मचारियों के साथ मिलीभगत से प्रतिवर्ष लगवा लेते हैं, ऐसे अध्यापकों को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। परीक्षा अधीक्षक केवल स्कूलों के प्रिंसीपल और मुख्याध्यापक ही लगाए जाने चाहिए तथा इस ड्यूटी को मैनडेटरी किया जाना चाहिए। यदि प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक किसी कारण इस ड्यूटी पर नहीं जा सकते तो सीनियर पीजीटी को इस ड्यूटी पर भेजा जाना चाहिए। सीबीएससी केवल प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक या सीनियर पीजीटी को ही परीक्षा अधीक्षक की ड्यूटी पर लगाता है और दूसरे इसके परीक्षा केंद्र कम होते हैं और यही कारण है कि  सीबीएससी की परीक्षाओं में नकल का नामोनिशान नहीं है। यदि हिमाचल बोर्ड भी इस नीति का अनुसरण करता है तो मुझे पूरा भरोसा है कि नकल पर काबू पाया जा सकता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पुस्तकों तक ही सीमित है। इसको ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए अध्यापक को स्वयं रोल मॉडल बनना चाहिए, ताकि बच्चों में अच्छे संस्कार बने और वे उचित और अनुचित में भेद कर सकें और नकल को पास होने का अनुचित ढंग समझ कर इसे त्याग दें। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अध्यापकों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। यदि अध्यापक नकल को समाप्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है तो समझ लो कि नकल समाप्त हो गई। ऐसी मानसिकता बनाने के लिए बोर्ड को समय-समय पर ऐसी समस्याओं पर गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए। नकल रोको अभियान में अध्यापकों को अग्रणी किया जाना चाहिए और नकल को समाप्त करने का पूरा श्रेय उन्हीं को दिया जाना चाहिए। स्कूली स्तर जहां परीक्षा केंद्र हैं, वहां पर नकल को रोकने के लिए स्थानीय विशिष्ट व्यक्तियों की एक कमेटी बनाई जानी चाहिए। इसमें सेवानिवृत्त प्रिंसीपल मुख्याध्यापक, अध्यापक तथा अन्य विभागों के सेवानिवृत्त अधिकारी होने चाहिएं जो परीक्षाओं के दौरान नकल रोकने के लिए रणनीति बनाएं तथा उस पर कार्य करें।

 

क्या कभी परीक्षा के दौरान क्लास के दूसरे बच्चों के पेपर में झाँकने का आपका मन किया है? अगर हाँ, तो ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं हुआ। बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाली जॆना, अपनी क्लास के कई बच्चों के नकल करने के बेशर्म रवैए के बारे में इस तरह कहती है: “वे शेखी बघारते हुए बताते हैं कि उन्होंने नकल कैसे की। अगर आप नकल नहीं करते तो वे आपको अजीब निगाहों से देखते हैं!”

अमरीका में किए एक सर्वे से पता चला कि अपनी क्लास में सबसे ज़्यादा नंबर लानेवाले 80 प्रतिशत किशोरों ने कबूल किया कि उन्होंने नकल की थी और इन “सबसे अच्छे नंबर” लानेवालों में से 95 प्रतिशत विद्यार्थी कभी नहीं पकड़े गए। पाँचवीं से बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाले 20,000 से भी ज़्यादा बच्चों का सर्वे लेने के बाद जोसेफसन इंस्टिट्यूट ऑफ एथिक्स इस नतीजे पर पहुँचता है: “ईमानदारी और खराई के मामले में स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है।” नकल करना हर कहीं इतना आम हो गया है कि शिक्षक भी हक्के-बक्के रह जाते हैं! स्कूल के निर्देशक गैरी जे. नील्स ने यहाँ तक कहा: “अब नकल न करनेवालों की संख्या बहुत कम है।”

ज़्यादातर माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई के मामले में ईमानदार रहें। मगर अफसोस कि कई नौजवान नकल करने के लिए अपनी ईमानदारी को ताक पर रख देते हैं। वे कौन-से नए तरीके अपनाते हैं? कुछ नौजवान नकल क्यों करते हैं? आपको इससे दूर क्यों रहना चाहिए?

आधुनिक तकनीक के ज़रिए नकल करना

नए ज़माने के नकल करनेवाले कई धूर्त तरीके अपनाते हैं। किसी का होमवर्क नकल करना या परीक्षा के दौरान चुपके से परचे में से नकल करना, ये सारे तरीके तो आज की आधुनिक तकनीकों और तरकीबों के आगे बिलकुल फीके पड़ जाते हैं। आधुनिक तकनीक में पेजर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से परीक्षा में आए सवालों के जवाब दूसरे व्यक्‍ति से लिए जा सकते हैं; कैलकुलेटर में ऐसे प्रोग्राम बनाए गए हैं, जिसमें “अतिरिक्‍त” जानकारी मिलती है; कपड़ों में बिलकुल छोटे कैमरे छिपे होते हैं जिससे दूसरी जगह मौजूद मददगार तक परीक्षा में आए सवाल पहुँचाए जाते हैं; कुछ आधुनिक कैलकुलेटर ऐसे हैं जो इंफ्रारॆड रेडिएशन के ज़रिए क्लास में बैठे दूसरे विद्यार्थी तक संदेश पहुँचाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी इंटरनॆट साइट्‌स भी हैं, जिनमें किसी भी विषय पर पूरा-का-पूरा जवाबों का परचा पाया जा सकता है!

नकल करने के इस खतरनाक चलन को रोकने और उस पर काबू पाने के लिए शिक्षक काफी कोशिश कर रहे हैं, मगर यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि नकल करने के मतलब के बारे में सभी विद्यार्थियों या शिक्षकों की राय अलग-अलग है। मसलन, जब किसी प्रॉजॆक्ट पर विद्यार्थियों का समूह काम करता है तो इसमें मिलकर ईमानदारी से किए काम और साँठ-गाँठ से बेईमानी के काम के बीच की रेखा, साफ-साफ नज़र नहीं आती। ऐसे भी कुछ विद्यार्थी होते हैं जो समूह का फायदा उठाते हुए सारा काम दूसरों पर छोड़ देते हैं। सरकारी कॉलेज में पढ़नेवाला युजी कहता है, “कुछ विद्यार्थी तो बेहद आलसी होते हैं। वे कुछ भी नहीं करते! फिर भी उन्हें उनके बराबर अंक मिलते हैं जिन्होंने असल में सारी मेहनत की थी। मेरे हिसाब से यह भी नकल करना ही है!”

वे नकल क्यों करते हैं?

एक सर्वे से पता चला कि नकल करने का सबसे बड़ा कारण है, विद्यार्थियों का तैयारी करके न जाना। कुछ मामलों में, स्कूल में एक-दूसरे से होड़ लगाने का माहौल या माता-पिताओं की ऊँची उम्मीदों पर खरे उतरने का दबाव विद्यार्थियों पर इतना ज़्यादा होता है कि वे कहते हैं, उनके पास नकल करने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता। तेरह साल का सैम कहता है: “मेरे मम्मी-पापा के लिए ज़्यादा नंबर लाना ही सब कुछ था। वे मुझसे पूछते थे: ‘तुम्हें गणित में कितने नंबर मिले? तुम अँग्रेज़ी के पेपर में कितने नंबर लाए हो?’ और इन सवालों से मुझे नफरत थी!”

कुछ लोगों पर अच्छे नंबर लाने का लगातार दबाव रहता है इसलिए वे नकल करने लगते हैं। किताब अमरीकी किशोरों की निजी ज़िंदगी (अँग्रेज़ी) कहती है: “जिस व्यवस्था में विद्यार्थियों पर इतना दबाव होता है कि उन्हें किसी विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज़्यादा चिंता अच्छे नंबर लाने की लगी रहती है, और वह भी इतनी कि वे कभी-कभी ईमानदारी को भी ताक पर रख देते हैं, तो ऐसी व्यवस्था में बिलकुल संतुलन नहीं है।” यह बात कई विद्यार्थी मानते हैं। आखिर कौन परीक्षा में फेल होना चाहेगा या खासकर कौन फिर से उसी क्लास में बैठना चाहेगा। हाई स्कूल का एक विद्यार्थी जिमी कहता है, “कुछ बच्चे तो फेल होने से इतना डरते हैं कि सही जवाब मालूम होने पर भी वे नकल करते हैं, सिर्फ यह तय करने के लिए कि उनके जवाब गलत ना जाएँ।”

आज ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग ईमानदारी के स्तर को छोड़कर नकल कर रहे हैं तो ऐसा लग सकता है कि नकल करने में कोई नुकसान नहीं है। कभी-कभी तो शायद इसके फायदे ही फायदे नज़र आएँ। सत्रह साल का ग्रेग कहता है, “कल मैंने अपनी एक क्लास में एक बच्चे को नकल करते देखा। आज जब हमें अपना-अपना पेपर मिला तो उसको मुझसे ज़्यादा नंबर मिले थे।” कई लोग अपने दोस्तों की देखा-देखी नकल करने लगते हैं। युजी कहता है, “कुछ बच्चे सोचते हैं कि ‘अगर दूसरे करते हैं तो मुझे करने में क्या हर्ज़ है?’” लेकिन क्या ऐसी सोच सही है?

ऐसी लत जो एक धोखा है

ज़रा नकल करने की तुलना चोरी से कीजिए। आज चोरी करना आम हो गया मगर क्या यह बात चोरी करने को जायज़ ठहराती है? ‘हरगिज़ नहीं।’ आप शायद ऐसा कहें, खासकर तब जब आपका पैसा चुराया गया हो! दरअसल नकल करके हम उस बात का श्रेय ले रहे होते हैं, जिसके हम हकदार नहीं। यहाँ तक कि हम उस इंसान का भी नाजायज़ फायदा उठा रहे होते हैं, जिसने ईमानदारी से काम किया था। हाल ही में हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म करनेवाला टॉमी कहता है, “नकल करना बिलकुल सही नहीं है। ऐसा करके दरअसल आप कह रहे होते हैं कि ‘मुझे उन विषयों की अच्छी जानकारी है’ जबकि हकीकत में आप कुछ नहीं जानते। तो यह एक झूठ ही हुआ।” इस मामले में बाइबल का नज़रिया में बिलकुल साफ बताया गया है: “एक दूसरे से झूठ मत बोलो।”

नकल करना एक ऐसी लत बन सकती है, जिसे छुड़ाना बहुत मुश्‍किल हो सकता है। जॆना कहती है: “नकल करनेवाले यह सीख लेते हैं कि पास होने के लिए उन्हें पढ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए वे पूरी तरह से नकल करने पर निर्भर रहते हैं। लेकिन ज़िंदगी में जब उन्हें अपने बलबूते कुछ करना पड़ता है, तो वे ठीक से काम नहीं कर पाते।”

में दिया गया सिद्धांत वाकई गौर करने लायक है: “मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।” स्कूल में नकल करनेवालों को ये अंजाम भुगतने पड़ सकते हैं, जैसे उनका विवेक उन्हें कचोटने लगे, दोस्तों का उन पर से भरोसा उठ जाए और पढ़ने की क्रिया को टालने की वजह से उनकी पढ़ने-लिखने की क्षमता कमज़ोर पड़ जाए। जिस तरह कैंसर शरीर में फैलकर जानलेवा हो जाता है, उसी तरह धोखाधड़ी करने की आदत ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं पर असर कर सकती है, और यह अच्छे-से-अच्छे रिश्‍तों में भी ज़हर घोल सकती है। लेकिन इसका सबसे बुरा असर परमेश्‍वर के साथ आपके रिश्‍ते पर पड़ेगा क्योंकि उसे धोखाधड़ी से सख्त नफरत है।—

नकल करनेवाले दरअसल खुद को ही धोखा देते हैं। अपने काम से वे दिखाते हैं कि वे प्राचीन नगर यरूशलेम के उन भ्रष्ट शासकों की तरह हैं: “हम ने झूठ की शरण ली और मिथ्या की आड़ में छिपे हुए हैं।”  लेकिन यह हकीकत है कि नकल करनेवाला अपना काम, परमेश्‍वर की नज़रों से छिपा नहीं सकता।

नकल मत कीजिए!

कई मामलों में नौजवान नकल करने के लिए बहुत दिमाग लड़ाते और मेहनत करते हैं। इसके बजाए वे ईमानदारी से पढ़ाई करने में उतना ही दिमाग लगाएँ और मेहनत करें तो ज़्यादा फायदा पा सकते हैं। जैसा कि 18 साल की ऐबी कहती है, “अगर वे नकल करने के बजाय पढ़ाई करने में खुद को लगाएँ तो ज़्यादा अच्छे नंबर ला सकते हैं।”

यह सच है कि नकल करने का प्रलोभन ज़बरदस्त होता है। लेकिन गलत राह की ओर ले जानेवाले ऐसे फँदे से दूर रहिए! आप यह कैसे कर सकते हैं? सबसे पहले, याद रखिए कि आप स्कूल क्यों जाते हैं—सीखने के लिए। बेशक, ऐसा लग सकता है कि उन सारी बातों को सीखने का क्या फायदा, जिनका आप शायद ही कभी इस्तेमाल करें। मगर जो इंसान पढ़ाई करने से जी चुराता है और नकल करता है, वह नयी-नयी बातों को सीखने और ज्ञान का व्यावहारिक तरीके से इस्तेमाल करने की अपनी काबिलीयत को कमज़ोर कर देता है। सचमुच की समझदारी बिना मेहनत के हासिल नहीं की जा सकती; उसे पाने के लिए कोशिश करनी पड़ती है। बाइबल कहती है: “सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।” जी हाँ, आपको अपनी पढ़ाई और उसकी तैयारी को गंभीरता से लेना चाहिए। जिमी सलाह देता है: “परीक्षा से पहले पढ़ाई करनी ही चाहिए। इससे आपमें आत्म-विश्‍वास बढ़ेगा कि आप सवालों के जवाब जानते हैं।”

बेशक कभी-कभी हो सकता है कि आप सभी जवाब न जानते हों, जिसकी वजह से आपको नंबर कम मिले। लेकिन अगर आप अपने सिद्धांतों से समझौता न करें तो आप देख सकेंगे कि सुधरने के लिए आप और क्या कर सकते हैं।—

युजी, जिसका पहले भी ज़िक्र किया गया है, एक यहोवा का साक्षी है। वह बताता है कि जब नकल करने के लिए क्लास के बच्चों की मदद करने का उस पर दबाव आता है तो वह क्या करता है: “सबसे पहले मैं उन्हें बता देता हूँ कि मैं एक साक्षी हूँ। और इससे मुझे काफी मदद मिली है क्योंकि वे जानते हैं कि यहोवा के साक्षी ईमानदार हैं। अगर कोई मुझसे परीक्षा के दौरान किसी सवाल का जवाब पूछता है तो मैं साफ मना कर देता हूँ। फिर बाद में उसे समझाता हूँ कि मैंने क्यों ऐसा किया।”

युजी, इब्रानियों को कहे प्रेरित पौलुस के कथन से सहमत है: “हम सब बातों में अच्छी चाल [या “ईमानदारी से,” NW] चलना चाहते हैं।” (इब्रानियों 13:18) अगर आप ईमानदारी के ऊँचे स्तर पर टिके रहते हैं और नकल करने से इनकार करके समझौता नहीं करते तो इससे आप जो अच्छे नंबर हासिल करेंगे, उन नंबरों की असली कीमत होगी। उस समय आप अपने माता-पिता को सबसे बेहतरीन तोहफा दे रहे होंगे और वह है, मसीही खराई का सबूत। (3 यूहन्‍ना 4) इसके अलावा, आप एक शुद्ध विवेक बनाए रखते हैं और इस बात से खुश रहते हैं कि आपने यहोवा परमेश्‍वर के दिल को खुश किया है।

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भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

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भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार पर निबंध (Essay On Corruption In Hindi) :

भुमिका : संसार में जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसकी आत्मा इतनी अधिक सात्विक , उसके विचार इतने कोमल होते हैं और उनकी बुद्धि इतनी निर्मल होती है कि अगर उसे भगवान कहा जाये तो भी कुछ गलत नहीं होता है। इसी वजह से ही तो कुछ लोग बच्चों को बाल-गोपाल भी कहते हैं।

जिस तरह से वह सभी के संपर्क में आता है तो उसके विचारों और बुद्धि में भी परिवर्तन होने लगता है। इसकी वजह होती है कि वह समाज में जो कुछ भी देखता है सुनता है और अनुभव करता है उसी की तरह ढलता चला जाता है। एक दिन वह बालक या तो उच्च स्थान पर पहुंच जाता है या तो दुराचारी बनकर समाज पर एक कलंक बन जाता है।

किसी भी देश के विकास के रास्ते में उस देश की समस्याएं बहुत ही बड़ी बाधाएं होती हैं। इन सभी समस्याओं में सबसे प्रमुख समस्या है भ्रष्टाचार की समस्या। जिस राष्ट्र या समाज में भ्रष्टाचार का दीमक लग जाता है वह समाज रूपी वृक्ष अंदर से बिलकुल खाली हो जाता है और उस समाज व राष्ट्र का भविष्य अंधकार से घिर जाता है।

इस क्षेत्र में भारत बहुत ही दुर्भाग्यशाली है क्योंकि उस पर यह समस्या पूरी तरह से छाई हुई है। अगर उचित समय पर इसका समाधान नहीं ढूंढा गया तो इसके बहुत ही भयंकर परिणाम निकलेंगे। वर्तमान समय में भ्रष्टाचार हमारे देश में पूरी तरह से फैल चुका है। भारत देश में आज के समय लगभग सभी प्रकार की आईटी कंपनियां , बड़े कार्यालय , अच्छी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी आज भारत पूरी तरह से विकसित होने की दौड़ में बहुत पीछे है। इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है।

भ्रष्टाचार का अर्थ : भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ होता है – आचार से अलग या भ्रष्ट होना। अत: यह भी कहा जाता है कि समाज स्वीकृत आचार संहिता की अवहेलना करके दूसरों को कष्ट पहुँचाकर अपने निजी स्वार्थों और इच्छाओं को पूरा करना ही भ्रष्टाचार कहलाता है। अगर दुसरे शब्दों में कहा जाये तो भ्रष्टाचार वह निंदनीय आचरण होता है जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य अपने कर्तव्य को भूलकर अनुचित रूप से लाभ प्राप्त करने का प्रयास करने लगता है।

भाई-भतीजावाद , बेरोजगारी , गरीबी इसके दुष्परिणाम हैं जो लोगों को भ्रष्टाचार की वजह से भोगने पड़ते हैं। जो मनुष्य का दुराचार होता है वहीं अपना व्यापक रूप धारण करके भ्रष्टाचार की जगह को ग्रहण कर लेता है। कुछ लोग भ्रष्टाचार को बहुत ही संकुचित अर्थों में समझाते हैं।

अगर मैं अपने विचारों को व्यक्त करूं तो भ्रष्टाचार वह बुराई होती है जो समाज को अंदर-ही-अंदर खोखला करती रहती है। वास्तव में भ्रष्टाचार की स्थिति भी एक राक्षस की तरह होती है जिसमें काला बाजार उनका दूषित ह्रदय होता है और मिलावट होता है उनका पेट।

रिश्वत भ्रष्टाचार के हाथ हैं और व्यवहार और अनादर इसके पैर हैं , सिफारिश इसकी जीभ है तो शोषण इसके कठोर दांत हैं। यह राक्षस बेईमानी की आँखों से देखता है और कुनबापरस्ती कानों से सभी को सुनता है और अन्याय की नाक से सूँघता है। जब भ्रष्टाचार रूपी राक्षस अपना रूप धारण करके निकलता है तो समाज रूपी देवता भी घबरा जाता है।

भ्रष्टाचार के मूल कारण : हर बड़ी समस्या के पीछे कोई-न-कोई बड़ा कारण अवश्य होता है। इसी तरह से भ्रष्टाचार के पीछे भी बहुत से कारण हैं। वस्तुत: जहाँ पर सुख और एश्वर्य पनपता है वहीं पर भ्रष्टाचार भी पनपता है। भ्रष्टाचार के मूल में मानव का कुंठित अहंभाव , स्वार्थपरता , भौतिकता के प्रति आकर्षण , कुकर्म और अर्थ की प्राप्ति का लालच छुपा हुआ होता है।

आज के मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली इच्छाएं भी भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण होती हैं। इसके आलावा अपनों का पक्ष लेना भी भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण है। किसी कवि ने भी कहा है कि परिजनों में पक्षपात तो होता ही है और यही पक्षपात भ्रष्टाचार का मूल कारण बनता है। भ्रष्टाचार को उत्पन्न करने का कारण एक प्रकार से मनुष्य खुद होता है।

जब अंग्रेज भारत से गये थे तो भारत में भ्रष्टाचार की बहुत कम मात्रा थी। अंग्रेज भारत में कुछ परिक्षण छोड़ गये थे लेकिन भारत को इस बात पर पूरा विश्वास था कि भारत के स्वतंत्र होते ही वे उनका पूरी तरह से नाश कर देंगे लेकिन इसका बिलकुल उल्टा हुआ था। भ्रष्टाचार कम होने की जगह पर और अधिक बढ़ जाता है। भारत के वासी और भारत की सरकार दोनों ने ही स्वतंत्रता के असली अर्थ को नहीं समझा हैं।

भ्रष्टाचार की व्यापकता एवं प्रभाव : भ्रष्टाचार का प्रभाव और क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। आज के समय में कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ पर भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ों को न फैला रखा हो। भ्रष्टाचार की गिरफ्त में व्यक्ति , मनुष्य , समाज , राष्ट्र यहाँ तक की अंतर्राष्ट्रीय भी फंसे हुए हैं। भ्रष्टाचार कण-कण और घट-घट में श्री राम की तरह समाया हुआ है।

ऐसा लगता है जैसे इसके बिना संसार में कोई भी काम नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक क्षेत्र तो पूरी तरह से भ्रष्टाचार का घर ही बन चुका है। आज के समय में चाहे विधायक हो या संसद हो सभी बाजार में रखी वस्तुओं की तरह बिक रहे हैं। आज के समय में भ्रष्टाचार के बल पर ही सरकारे बनाई और गिराई जाती हैं।

आज के समय में तो पुजारी भी भक्तों की स्थिति को देखकर ही फूल डालता है। किसी भी धार्मिक स्थल पर जाकर देखा जा सकता है कि जो लोग धर्मात्मा कहलाते हैं वही लोग भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकियाँ लगाते हैं। भ्रष्टाचार ने आर्थिक क्षेत्र में तो कमाल ही कर दिया है। आज के समाज में करोड़ों की रिश्वत लेने वाला व्यक्ति सीना तान कर चलता है , अरबों का घोटाला करने वाला नेता समाज में सम्मानीय बना रहता है।

चुरहट कांड , बोफोर्स कांड , मन्दिर कांड , मंडल कांड और चारा कांड ये सभी भ्रष्टाचार के ही भाई बन्धु होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। योग्य छात्र को ऊँची कक्षा में दाखिला नहीं मिल पाता है लेकिन अयोग्य छात्र भ्रष्टाचार का सहारा लेकर उपर तक पहुंच जाते हैं लेकिन योग्य छात्र ऐसे ही रह जाते हैं।

जब मनुष्य स्वार्थ में अँधा हो जाता है तो वह अभिमान के नशे में झुमने लगता है , वह कामवासना से वशीभूत होकर उचित और अनुचित में फर्क करना छोड़ देता है , वह धर्म कर्म को छोड़कर नास्तिकता और अकर्मण्यता के संकीर्ण पथ पर आरूढ़ हो जाता है। करुणा और सहानुभूति की भावना को त्यागकर निर्दय और कठोर बन जाता है।

वह धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में फंस जाता है कि जिससे निकलना उसके लिए असंभव हो जाता है। भ्रष्टाचार की वजह से सिर्फ मनुष्य की ही नहीं बल्कि राष्ट्र की भी हानि होती है। भ्रष्टाचार कुछ इस तरह से भारत में दीमक की तरह फैल चुका है कि इसके प्रभाव बता पाना बहुत मुश्किल है।

भले ही कोई ढोंगी बाबा हो या कोई रोड , ईमारत या पुल बनाने वाला कॉन्ट्रेक्टर का काम हो हर जगह भ्रष्टाचार दिख ही जाता है। भारत की बहुत सी जगहों पर धर्म सम्प्रदाय , आस्था और विश्वास के नाम पर लोगों का शोषण किया जा रहा है। सरकारी दफ्तरों में पैसे या घूस न देने पर काम पूरे नहीं होते हैं।

दुकानों में मिलावट का सामान मिल रहा है और कई कंपनियों का सामान खाने के लायक न होने पर भी भ्रष्टाचार के कारण दुकानों पर मिल रहा है। कुछ पैसों के लिए बड़े-बड़े कर्मचारी और नेता गलत चीजों को पास कर देते हैं जिसका प्रभाव अक्सर आम आदमी पर पड़ता है।

भ्रष्टाचार कम इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि भ्रष्टाचार हर किसी की आदत बन चुका है। आज के समय में भ्रष्टाचार होने पर लोगों को लगता है कि यह तो आम बात है। जब तक भारत देश से भ्रष्टाचार मुक्त नहीं होगा तब तक हम भारत को एक विकसित देश नहीं बना सकते हैं। आज के समय में भ्रष्टाचार की वजह से सरकार द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक काम पूरे नहीं हो पाते हैं।

भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय : भ्रष्टाचार को रोकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योंकि जब-जब इसे रोकने के लिए कदम उठाये जाते हैं तब-तब कुछ दिनों तक व्यवस्था ठीक प्रकार से चलती है लेकिन बाद में फिर से व्यवस्था में भ्रष्टाचार आ जाता है। भ्रष्टाचार एक संक्रामक रोग की तरह होता है। यह एक व्यक्ति से शुरू होता है और पूरे समाज में फैल जाता है।

अगर भ्रष्टाचार को रोकना है तो फिर से समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी। जब तक हमारे जीवन में नैतिकता नहीं आएगी तब तक हमारा भौतिकवादी दृष्टिकोण नहीं बदल सकता है। जब तक हमारे जीवन में नैतिकता नहीं आएगी तब तक हमारे जीवन की सारी बातें केवल कल्पना बनकर ही रह जाएँगी।

इसी वजह से हमें हर व्यक्ति के अंदर नैतिकता के लिए सम्मान और श्रद्धा को उत्पन्न करना होगा। समाज से भ्रष्टाचार को कम करने के लिए ईमानदार लोगों को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि उन्हें देखकर दुसरे लोग भी उनकी होड़ करने लगें हैं और ईमानदारी के लिए लोगों के मनों में आस्था जागने लगे।

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सख्ती के कानूनों और दंडों की व्यवस्था की जानी चाहिए। आज के समय में दंड व्यवस्था इतनी कमजोर हो गयी है कि अगर कोई व्यक्ति रिश्वत लेता पकड़ा जाता है तो दंड से बचने के लिए रिश्वत देकर बच जाता है। ऐसी स्थिति में भी भ्रष्टाचार को बहुत बढ़ावा मिलता है।

इसके साथ ही किसी भी नए मंत्री की नियुक्ति के समय चल और अचल संपत्ति का पूरी तरह से ब्योरा करना चाहिए। सरकार को निष्पक्ष समिति का उपयोग करना चाहिए ताकि वे बड़े-बड़े लोगों पर लगे आरोपों की जाँच कर सकें। लगभग सभी केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों को 7 वें वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बहुत हद तक अच्छा वेतन मिल रहा है।

अभी भी राज्य सरकार के कर्मचारियों को ठीक तरह से वेतन नहीं मिल पाया है। लेकिन वेतन ठीक प्रकार से मिलने के बाद भी भ्रष्टाचार अब दफ्तरों में एक आदत बन चुकी है जिसकी वजह से भ्रष्टाचार बढ़ता चला जाता है। इसलिए सोच समझकर और सही समय पर वेतन बढ़ाया जाना चाहिए जिससे कर्मचारियों के मन में भ्रष्टाचार की भावना उत्पन्न न हो सके।

बहुत सारे सरकारी दफ्तरों में जरूरत से बहुत कम कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं जिस वजह से काम करने वाले कर्मचारियों पर भार बढ़ जाता है। इस तरह से दो तरह की असुविधाएं उत्पन्न होती हैं पहले आम आदमी का काम सही समय पर पूर्ण नहीं हो पाता है और दूसरा काम को जल्दी पूर्ण कराने के लिए लोग भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाते हैं।

इस स्थिति में जो लोग घूस देते हैं उनका काम सबसे पहले हो जाता है और जो लोग घूस नहीं देते हैं उनका काम पूरा होने में साल भर का समय लग जाता है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हर विभाग में भ्रष्टाचार के विरुद्ध काम करने वाले आयोग बनाने चाहिए जो ऐसे अनैतिक कार्यों पर ध्यान रख सकें। आज के समय में सभी कार्यालयों में कैमरे लगाए जाते हैं जिससे कार्यालय में निगरानी रखी जा सके।

उपसंहार : भ्रष्टाचार को खत्म करना केवल सरकार का ही नहीं बल्कि हम सब का कर्तव्य बनता है। आज के समय हम सभी को एक साथ मिलकर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए प्रयास करने चाहियें। हर मनुष्य को सिर्फ अपने स्वार्थों तक सिमित नहीं रहना चाहिए बल्कि दुसरे लोगों के सुख को अपना सिद्धांत बनाकर चलना चाहिए तभी हम कुछ हद तक भ्रष्टाचार को कम कर सकेंगे।

यह बात स्पष्ट हैं कि जब तक भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म नहीं किया जायेगा तब तक राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता है। भ्रष्टाचार की वजह से ही आज के समय में अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है। भ्रष्टाचार कभी भी देश की स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकता है। जब भारत से भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा तो भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

अनैतिक तरीको का इस्तेमाल कर दूसरो से कुछ फायदा प्राप्त करना भ्रष्टाचार कहलाता है। देश और व्यक्ति के विकास में ये अवरोध का एक बड़ा कारक बनता जा रहा है। आप इस तरह के निबंधों से अपने बच्चों को घर और स्कूलों में भ्रष्टाचार के बारे में अवगत करा सकते है।

भ्रष्टाचार पर निबंध (करप्शन एस्से)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hin

Find below some essays on Corruption in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, 400 and 500 words.

भ्रष्टाचार पर निबंध 1 (100 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hin

भ्रष्टाचार एक जहर है जो देश, संप्रदाय, और समाज के गलत लोगों के दिमाग में फैला होता है। इसमें केवल छोटी सी इच्छा और अनुचित लाभ के लिये सामान्य जन के संसाधनों की बरबादी की जाती है। इसका संबंध किसी के द्वारा अपनी ताकत और पद का गैरजरुरी और गलत इस्तेमाल करना है, फिर चाहे वो सरकारी या गैर-सरकारी संस्था हो। इसका प्रभाव व्यक्ति के विकास के साथ ही राष्ट्र पर भी पड़ रहा है और यही समाज और समुदायों के बीच असमानता का बड़ा कारण है। साथ ही ये राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुप से राष्ट्र के प्रगति और विकास में बाधा भी है।

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार पर निबंध 2 (150 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार से व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति, शक्ति और सत्ता का गलत इस्तेमाल अपनी आत्म संतुष्टि और निजी स्वार्थ की प्राप्ति के लिये करता है। इसमें सरकारी नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर फायदा पाने की कोशिश होती है। भ्रष्टाचार की जड़े समाज में गहराई से व्याप्त हो चुकी है और लगातार फैल रही है। ये कैंसर जैसी बीमारी की तरह है जो बिना इलाज के खत्म नहीं होगी। इसका एक सामान्य रुप पैसा और उपहार लेकर काम करना दिखाई देता है। कुछ लोग अपने फायदे के लिये दूसरों के पैसों का गलत इस्तेमाल करते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त होते है और साथ ही अपनी छोटी सी की पूर्ति के लिये किसी भी हद तक जा सकते है।


 

भ्रष्टाचार निबंध 3 (200 शब्द

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindiहम सभी भ्रष्टाचार से अच्छे तरह वाकिफ है और ये अपने देश में नई बात नहीं है। इसने अपनी जड़ें गहराई से लोगों के दिमाग में बना ली है। ये एक धीमे जहर के रुप में प्राचीन काल से ही समाज में रहा है। ये मुगल साम्राज्य के समय से ही मौजूद रहा है और ये रोज अपनी नई ऊँचाई पर पहुँच रहा है साथ ही बड़े पैमाने पर लोगों के दिमाग पर हावी हो रहा है। समाज में सामान्य होता भ्रष्टाचार एक ऐसा लालच है जो इंसान के दिमाग को भ्रष्ट कर रहा है और लोगों के दिलों से इंसानियत और स्वाभाविकता को खत्म कर रहा है।

भ्रष्टाचार कई प्रकार का होता है जिससे अब कोई भी क्षेत्र छुटा नहीं है चाहे वो शिक्षा, खेल, या राजनीति कुछ भी हो। इसकी वजह से लोग अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझते। चोरी, बेईमानी, सार्वजनिक संपत्तियों की बरबादी, शोषण, घोटाला, और अनैतिक आचरण आदि सभी भ्रष्टाचार की ही ईकाई है। इसकी जड़े विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में व्याप्त है। समाज में समानता के लिये अपने देश से भ्रष्टाचार को पूरी तरह से मिटाने की जरुरत है। हमें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति निष्ठावान होना चाहिये और किसी भी प्रकार के लालच में नहीं पड़ना चाहिये।

भ्रष्टाचार पर निबंध 4 (250 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

वर्तमान में ‘भ्रष्टाचार’ फैलने वाली बीमारी की तरह हो चुका है जो समाज में हर तरफ दिखाई देता है। भारत के वो महान नेता जिन्होंने अपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराईयों को मिटाने में लगा दिया, लेकिन ये शर्म की बात है कि आज उनके दिखाये रास्तों की अनदेखी कर हम अपनी जिम्मेदारियों से भागते है। धीरे-धीरे इसकी पैठ राजनीति, व्यापार, सरकार और आमजनों के जीवन पर बढ़ती जा रही है। लोगों की लगातार पैसा, ताकत, पद और आलीशान जीवनशैली की भूख की वजह से ये घटने के बजाय दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

पैसों की खातिर हमलोग अपनी वास्तविक जिम्मेदारी को भूल चुके है। हमलोग को ये समझना होगा कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता साथ ही ये एक जगह टिकता भी नहीं है। हम इसे जीवनभर के लिये साथ नहीं रख सकते, ये केवल हमें लालच और भ्रष्टाचार देगा। हमें अपने जीवन में मूल्यों पर आधारित जीवन को महत्व देना चाहिये ना कि पैसों पर आधारित। ये सही है कि सामान्य जीवन जीने के लिये ढ़ेर सारे पैसों की आवश्कता होती है जबकि सिर्फ अपने स्वार्थ और लालच के लिये ये सही नहीं है।


 

भ्रष्टाचार पर निबंध 5 (300 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

जैसा कि हम सभी जानते है कि भ्रष्टाचार बहुत बुरी समस्या है। इससे व्यक्ति के साथ-साथ देश का भी विकास और प्रगति रुक जाता है। ये एक सामाजिक बुराई है जो इंसान की सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक क्षमता के साथ खेल रहा है। पद, पैसा और ताकत के लालच की वजह से ये लगातार अपनी जड़े गहरी करते जा रहा है। अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिये शक्ति, सत्ता, पद, और सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग है भ्रष्टाचार। सूत्रों के मुताबिक, पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान 85वाँ है।

भ्रष्टाचार सबसे अधिक सिविल सेवा, राजनीति, व्यापार और दूसरे गैर कानूनी क्षेत्रों में फैला है। भारत विश्व में अपने लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये प्रसिद्ध है लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से इसको क्षति पहुँच रही है। इसके लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार हमारे यहाँ के राजनीतिज्ञ है जिनको हम अपनी ढ़ेरों उम्मीदों के साथ वोट देते है, चुनाव के दौरान ये भी हमें बड़े-बड़े सपने दिखाते है लेकिन चुनाव बीतते ही ये अपने असली रंग में आ जाते है। हमे यकीन है कि जिस दिन ये राजनीतिज्ञ अपने लालच को छोड़ देंगे उसी दिन से हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा।

हमें अपने देश के लिये पटेल और शास्त्री जैसे ईमानदार और भरोसेमंद नेता को चुनना चाहिए क्योंकि केवल उन्हीं जैसे नेताओं ने ही भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम किया। हमारे देश के युवाओं को भी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये आगे आना चाहिये साथ ही बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये किसी ठोस कदम की आवश्यकता है।

 

भ्रष्टाचार पर निबंध 6 (400 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार समाज में तेजी से फैलने वाली बीमारी है जिसने बुरे लोगों के दिमाग में अपनी जड़े जमा ली है। कोई भी जन्म से भ्रष्ट नहीं होता बल्कि अपनी गलत सोच और लालच के चलते धीरे-धीरे वो इसका आदी हो जाता है। यदि कोई परेशानी, बीमारी आदि कुछ आए तो हमें धैर्य और भरोसे के साथ उसका सामना करना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी बुरा काम नहीं करना चाहिए। किसी के एक गलत कदम से कई सारी जिन्दगीयाँ प्रभावित होती है। हम एक अकेले अस्तित्व नहीं है इस धरती पर हमारे जैसे कई और भी है इसलिये हमें दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए और सकारात्मक विचार के साथ जीवन को शांति और खुशी से जीना चाहिए।

आज के दिनों में, समाज में बराबरी के साथ ही आमजन के बीच में जागरुकता लाने के लिये नियम-कानून के अनुसार भारत सरकार ने गरीबों के लिए कई सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई है। जबकि, सरकारी सुविधाएं गरीबों की पहुँच से दूर होती जा रही है क्योंकि अधिकारी अंदर ही अंदर गठजोड़ बना कर गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं का बंदरबाँट कर रहे है। अपनी जेबों को भरने के लिये वो गरीबो का पेट काट रहे है।

समाज में भ्रष्टाचार के कई कारण है, आज के दिनों में राजनीतिज्ञ सिर्फ अपने फायदे की नीति बनाते है न कि राष्ट्रहित में। वो बस अपने को प्रसिद्ध करना चाहते है जिससे उनका फायदा होता रहे, उन्हें जनता के हितों और जरुरतों की कोई परवाह नहीं। आज इंसानियत का नैतिक पतन हो रहा है और सामाजिक मूल्यों में हरास हो रहा है। भरोसे और ईमानदारी में आयी इस गिरावट की वजह से ही भ्रष्टाचार अपने पाँव पसार रहा है।

भ्रषटाचार को सहने की क्षमता आम जनता के बीच बढ़ चुकी है। इसकी खिलाफत करने के लिये समाज में कोई मजबुत लोक मंच नहीं है, ग्रामीण क्षेत्रों में फैली अशिक्षा, कमजोर आर्थिक ढ़ाचाँ, आदि कई कारण भी जिम्मेदार है भ्रष्टाचार के लिये। सरकारी कर्मचारियों का कम वेतनमान उन्हें भ्रष्टाचार की ओर विमुख करता है। सरकार के जटिल कानून और प्रक्रिया लोगों को सरकारी मदद से दूर ले जाते है। चुनाव के दौरान तो ये अपने चरम पर होता है। चालाक नेता हमेशा गरीब और अनपढ़ों को ख्याली पुलाव में उलझाकर उनका वोट पा लेते है उसके बाद फिर चंपत हो जाते है।


 

भ्रष्टाचार पर निबंध 7 (500 शब्द

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार एक बीमारी की तरह देश में ही नहीं वरन् विदेश में भी फैलता जा रहा है। भारतीय समाज में ये सबसे तेजी से उभरने वाला मुद्दा है। सामान्यतः इसकी शुरुआत और प्रचार-प्रसार मौकापरस्त नेताओं द्वारा शुरु होती है जो अपने निजी स्वार्थों की खातिर देश को खोखला कर रहे है। वो देश की संपदा को गलत हाथों में बेच रहे है साथ ही इससे बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल हो रही है।

वो अपने व्यक्तिगत फायदों के लिये भारत की पुरानी सभ्यता तथा संसकृति को नष्ट कर रहे है। मौजूदा समय में जो लोग अच्छे सिद्धांतों का पालन करते है दुनिया उन्हें बेवकूफ समझती है और जो लोग गलत करते है साथ ही झूठे वादे करते है वो समाज के लिये अच्छे होते है। जबकि, सच ये है कि कदाचारी सीधे, साधारण, और निर्दोष लोगों को धोखा देते है और उनके दिमाग पर हावी भी रहते है।

भ्रषटाचार दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि अधिकारियों, अपराधियों और नेताओं के बीच में सांठगांठ होती है जो देश को कमजोर करते जा रही है। भारत को 1947 में आजादी मिली और वो धीरे-धीरे विकास कर रहा था कि तभी बीच में भ्रष्टाचार रुपी बीमारी फैली और इसने बढ़ते भारत को शुरु होते ही रोक दिया। भारत में एक प्रथा लोगों के दिमाग में घर कर गई है कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं में बिना रिश्वत दिये अपना काम नहीं किया जा सकता और इसी सोच की वजह से परिस्थिति और गिरती ही जा रही है।

कदाचार हर जगह है चाहे वो अस्पताल, शिक्षा, सरकारी कार्यालय कुछ भी हो कोई इससे अछुता नहीं है। सबकुछ व्यापार हो चुका है पैसा गलत तरीके से कमाया जा रहा है शिक्षण संस्थान भी भष्टाचार के लपेटे में है, यहाँ विद्यार्थीयो को सीट देने के लिये पैसा लिया जाता है चाहे उनके अंक इस लायक हो या न हो। बेहद कमजोर विद्यार्थी भी पैसों के दम पर किसी भी कॉलेज में दाखिला पा जाते है इसकी वजह से अच्छे विद्यार्थी पीछे रह जाते है और उन्हें मजबूरन साधारण कॉलेज में पढ़ना पड़ता है।

आज के दिनों में गैर-सरकारी नौकरी सरकारी नौकरी से बेहतर साबित हो रही है। प्राईवेट कंपनीयाँ किसी को भी अपने यहाँ क्षमता, दक्षता, तकनीकी ज्ञान और अचछे अंक के आधार पर नौकरी देती है जबकि सरकारी नौकरी के लिये कई बार घूस देना पड़ता है जैसे टीचर, क्लर्क, नर्स, डॉक्टर आदि के लिये। और घूस की रकम हमेशा बाजार मूल्य के आधार पर बढ़ती रहती है। इसलिये कदाचार से दूर रहे और सदाचार के पास रहें तो भ्रटाचार अपने-आप समाप्त हो जाएगा।

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार अर्थात भ्रष्ट + आचार। भ्रष्ट यानी बुरा या बिगड़ा हुआ तथा आचार का मतलब है आचरण। अर्थात भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है वह आचरण जो किसी भी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो।

जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत आचरण करने लगता है तो वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी कहलाता है। आज भारत जैसे सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश में भ्रष्टाचार अपनी जड़े फैला रहा है।
आज भारत में ऐसे कई व्यक्ति मौजूद हैं जो भ्रष्टाचारी है। आज पूरी दुनिया में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 94वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि।

भ्रष्टाचार के कारण : भ्रष्टाचार के कई कारण है। जैसे 1. असंतोष – जब किसी को अभाव के कारण कष्ट होता है तो वह भ्रष्ट आचरण करने के लिए विवश हो जाता है।

2. स्वार्थ और असमानता : असमानता, आर्थिक, सामाजिक या सम्मान, पद -प्रतिष्ठा के कारण भी व्यक्ति अपने आपको भ्रष्ट बना लेता है। हीनता और ईर्ष्या की भावना से शिकार हुआ व्यक्ति भ्रष्टाचार को अपनाने के लिए विवश हो जाता है। साथ ही रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद आदि भी भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं।

भारत में बढ़ता भ्रष्टाचार : भ्रष्टाचार एक बीमारी की तरह है। आज भारत देश में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है। इसकी जड़े तेजी से फैल रही है। यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया तो यह पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगा। भ्रष्टाचार का प्रभाव अत्यंत व्यापक है।

जीवन का कोई भी क्षेत्र इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है। यदि हम इस वर्ष की ही बात करें तो ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जो कि भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। जैसे आईपील में खिलाड़ियों की स्पॉट फिक्सिंग, नौकरियों में अच्छी पोस्ट पाने की लालसा में कई लोग रिश्वत देने से भी नहीं चूकते हैं। आज भारत का हर तबका इस बीमारी से ग्रस्त है।

भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय : यह एक संक्रामक रोग की तरह है। समाज में विभिन्न स्तरों पर फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दंड-व्यवस्था की जानी चाहिए। आज भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि व्यक्ति रिश्वत के मामले में पकड़ा जाता है और रिश्वत देकर ही छूट जाता है।

जब तक इस अपराध के लिए को कड़ा दंड नही दिया जाएगा तब तक यह बीमारी दीमक की तरह पूरे देश को खा जाएगी। लोगों को स्वयं में ईमानदारी विकसित करना होगी। आने वाली पीढ़ी तक सुआचरण के फायदे पहुंचाने होंगे।

उपसंहार : भ्रष्टाचार हमारे नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। भ्रष्टाचार से जुड़े लोग अपने स्वार्थ में अंधे होकर राष्ट्र का नाम बदनाम कर रहे हैं।

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आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

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आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद पर निबंध (Essay On Terrorism In Hindi) :

भूमिका : विविधता में एकता भारत की प्रमुख विशेषता है। उक्त विविध जनों को हमारे संविधान ने अपने में समान रूप से समाहित किया है। लेकिन विवध संस्कृतियों के इस अद्भुत सामंजस्य को देखकर बहुत से देश निस्तबद्ध रह जाते हैं। वे इस देश के एकीकरण को तोडकर देश को बिखेरना चाहते हैं।

वे हमारे देश को मिलकर रहता हुआ नहीं देख सकते हैं। वे अपने दलालों को भेजकर हमें तोडना चाहते हैं। हमारे समाज में विविध प्रकार से विघटन करके जनसाधारण को अपने कुकृत्यों से आतंकित कर देते हैं जिसकी वजह से समाज में आतंकवाद छा जाता है। आतंकवाद आधुनिक युग की सबसे भयंकर समस्या है।

आतंकवाद की समस्या सिर्फ हमारे ही देश की नहीं सभी देशों की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। आतंकवादी अपने-अपने गिरोह बनाकर रखते हैं वे किसी भी देश की क़ानूनी व्यवस्था को स्वीकार नही करते हैं। अपनी इच्छा से लोगों की हत्या करते हैं। आज के समय में जब हम विभिन्न समस्याओं के बारे में सोचते हैं तो हमें यह पता चलता है कि हमारा देश अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ है।

एक तरफ भुखमरी , दूसरी तरफ बेरोजगारी, कहीं पर अकाल पड़ रहा है तो कहीं पर बाढ़ अपना प्रकोप दिखा रही है। इन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद की समस्या जो देश रूपी वृक्ष को धीरे-धीरे खोखला करती जा रही है। भारत देश की कुछ अलगाववादी शक्तियाँ और पथ-भ्रष्ट नवयुवक हिंसात्मक रूप से देश के बहुत से क्षेत्रों में दंगा-फसाद कराकर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं।

आतंकवाद का अर्थ :-आतंकवाद दो शब्दों से मिलकर बना होता है – आतंक + वाद। आतंक का अर्थ होता है – भय या डर और वाद का अर्थ होता है – पद्धति। आतंकवाद शब्द आतंक से बनता है। समाज को अपने कुकृत्यों से भयभीत कर देना आतंकवाद कहलाता है। जो उन्हें भयभीत करते हैं वो आतंकवादी कहलाते हैं।

आतंकवादियों का केवल एक ही उद्देश्य होता है सरकार और देश के लोगों में भय उत्पन्न करके अपनी अनुचित बातों को मनवाना। आतंकवादियों का कोई देश , धर्म तथा जाति नहीं होते हैं। आतंकवादी भोले-भले बच्चों , स्त्रियों , बूढों और जवानों की बहुत ही बेरहमी से हत्या कर देते हैं। क़ानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर आतंकवादी देश में आराजकता फैलाते हैं।

इनके कार्यों का विरोध करने वाले व्यक्तियों या उनके विरुद्ध कार्यवाई करने वाले अधिकारीयों को हताहत करके भगा देते हैं जिससे आगे आने वाले उनका विरोध न कर सकें। वे ऐसा करने के बाद किसी समुचित स्थान पर छिप जाते हैं। भारतवर्ष में इस तरह का आतंकवाद कई जगहों पर छाया हुआ है।

आतंकवाद दो प्रकार के होते हैं – राजनितिक आतंकवाद और आपराधिक आतंकवाद। राजनितिक आतंकवाद वह होता है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जनता में डर फैलाता है और आपराधिक आतंकवाद वह होता है जो अपहरण करके पैसे की मांग करता है।

भारत में आतंकवाद की समस्या : भारत में आतंकवाद का मतलब है भारत में आतंक की स्थिति का उत्पन्न होना। भारत में आतंकवाद के लिए देश के कई क्षेत्रों में हिंसात्मक तरीके अपनाये जाते हैं जिससे सरकार देश के विकास के लिए कोई कार्य नहीं कर पाती है। जब भारत निरंतर विकास करने लगता है तो कुछ विदेशी शक्तियाँ भारत के विकास से जलने लगती हैं।

वे भारत के लालची लोगों को पैसा देकर उनसे दंगे-फसाद करवाती हैं जिसकी वजह से देश विकास न कर सके। अधिकतर आतंकवादी रेल पटरियों को उखाडकर , बस के यात्रयों को मारकर , बैंकों को लूटकर , सार्वजनिक स्थानों पर बम्ब फेंककर आदि इन कामों से आतंकवाद फ़ैलाने में सफल हो जाते हैं।

छठे और सातवें दशक में बंगाल , उड़ीसा , आंद्रप्रदेश , बिहार में नक्सलवादी लोग जनता में आतंक फ़ैलाने का काम करते थे , अब नक्सलवादियों का आतंक अन्य प्रान्तों से हटकर आंध्र और मध्यप्रदेश में पहुंच गया है। इस समय में पंजाब और कश्मीर दो ऐसे स्थान है जहाँ पर अब आतकवाद ज्यादा है।

जनता को आतंकवादियों से मुक्ति दिलाने के लिए हमारी सरकार प्रयत्नशील है। कुछ बड़ी शक्तियाँ और पड़ोसी देश हमारे देश में अव्यवस्था को फैलाना चाहते हैं। अगर हमारा देश दो भागों में विभक्त हो जाता है तो उन्हें बहुत प्रसन्नता होगी।

आतंकवादियों की गतिविधियाँ : सशक्त सैन्य शक्ति से सुदृढ सरकार का मुकाबला प्रत्यक्ष सामने आकर करना बिलकुल असंभव है। इसीलिए आतंकवादी किसी भी सरकार व जनता का सामना छिपकर , आतंक दिखाकर , आतंक फैलाकर करते हैं। हमारे यहाँ आतंकवादी किसी सार्वजनिक जगह पर अचानक पहुंचकर अँधा-धुंध गोली-बारी कर देते है।

पटरी पर सोये हुए मजदूर भी आतंकवादियों की गोली के शिकार होते हैं। प्रमुख राजनेताओं , अधिकारीयों , सामाजिक कार्यकर्ताओं को वे अवसर पाकर गोली मारकर मौत के घाट उतार देते हैं। उनके विरोध करने वालों को वे कोई-न-कोई अवसर पाकर या कोई षड्यंत्र रचकर मृत्यु को प्राप्त करा देते हैं।

कई बार आतंकवादी चलती बस को रोककर उसमें बैठे हुए यात्रियों को चुन-चुनकर मार देते हैं जिसकी वजह से लोग बसों में यात्रा करने से घबराते हैं। विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर टाइम बम्ब आदि रखकर आतंक का वातावरण फैलाए रखते हैं।

आतंकवाद के मूल कारण : भारत में आतंकवाद के विकसित होने के अनेक कारण हैं। आतंकवाद की समस्या पिछले एक दशक से शुरू हुई है। आज से दस साल पहले छोटे-छोटे लूटपाट के मामले सामने आते थे लेकिन आज के समय में यह समस्या बहुत बढ़ गयी है आज यह छोटी लूटपाट से मारकाट पर उतर आये हैं।

आतंकवाद के उत्पन्न होने के मूल कारण हैं गरीबी , बेरोजगारी , भुखमरी , और धार्मिक उन्माद। आतंकवाद की गतिविधियों को सबसे अधिक प्रोत्साहन धार्मिक कट्टरता से मिलता है। लोग धर्मों के नाम पर एक-दुसरे का गला काटने से भी पीछे नहीं हटते हैं। धर्म के विपक्षी लोग धर्म मानने वाले लोगो को सहन नहीं कर पाते हैं।

इसी के फल स्वरूप हिन्दू-मुस्लिम , हिन्दू-सिक्ख , मुस्लिम , ईसाई आदि धर्मों के नाम पर बहुत से दंगे-फसाद भड़का दिए जाते हैं। बहुत से अलगाववादी धर्म के नाम पर अलग राष्ट्र की भी मांग करने लगते हैं। इसकी वजह से देश की एकता भी खतरे में पड़ जाती है। कुछ विदेशी ताकतें भारत को कमजोर बनाना चाहती हैं इसलिए वे भारत में अक्सर आतंकवाद को बढ़ावा देती रहती हैं।

आतंकवादियों को बाहर से हथियार भेजे जाते हैं। उनका प्रयोग करके आतंकवादी देश में आतंक का वातावरण पैदा करते हैं। लेकिन अगर अपनी नीति स्पष्ट हो , सुदृढ हो , राष्ट्रिय भावना बलवती हो तो बाहर की कोई शक्ति भारत में हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं कर सकती है इसलिए हमारे देश के नेताओं की ढुलमुल नीति ही हमें आतंकवाद का शिकार बना रही है।

आजकल हिन्दू आतंकवाद भारत में एक नए सिरे से सिर उठा रहा है जिसे कुछ सिरफिरे नेता लोग हवा देकर भारत की एकता और अखण्डता को खतरा पैदा कर रहे है। कश्मीरी आतंकवादियों ने नेहरु जी की कमजोर एवं गलत नीति के कारण सहारा पाया , तो सिख आंतकवादियों का जन्म भी इंदिरा जी की कुटिल नीति से हुआ। जो देशभक्त व निष्ठ्वन थे उन्हें आतंकवाद का शिकार होना पड़ता था। कुछ नेता और अधिकारी अंदर से आतंकवादियों से मिले रहते हैं और दिखावे के लिए उनका विरोध करते हैं।

आतंकवाद पर नियंत्रण : भारत सरकार को आतंकवादी गतिविधियों को खत्म करने के लिए कठोर कदमों को उठाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सबसे पहले कानून व्यवस्था को सुदृढ बनाना चाहिए। जहाँ-जहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा हमारे देश की सीमा को छू रही है, उन समस्त क्षेत्रों की नाकाबंदी की जानी चाहिए जिसकी वजह से आतंकवादी सीमा पार से हथियार , गोला-बारूद और प्रशिक्षण प्राप्त करने में असफल हो जाएँ।

जो युवक और युवतियां अपने रास्ते से भटक चुके हैं उन्हें समुचित प्रशिक्षण देकर उनके लिए रोजगार के बहुत से पर्याप्त अवसर ढूंढने चाहियें। अगर युवा वर्ग को व्यस्त रखने तथा उनकों उनकी योग्यता के अनुरूप कार्य दे दिए जाएँ तो वे कभी भी रास्ते से नहीं भटकेंगे। इसकी वजह से आतंकवादियों को अपने षड्यंत्रों को पूरा करने के लिए जन शक्ति नहीं मिल पायेगी और वे खुद ही समाप्त हो जायेंगे।

साम्प्रदायिकता का जहर : साम्प्रदायिकता आतंकवाद का एक प्रमुख कारण होता है। हमारे देश में कुछ ऐसे लोगों का वर्ग रहता है जो 61 साल की स्वतंत्रता के बाद भी संकीर्ण और कट्टर धार्मिक विचारधारा के शिकार बने हुए हैं। ऐसे लोग ही दुसरे धर्मों के प्रति असहज हो जाते हैं।

ये लोग पुन: धर्म और राजनीति को मिलाने की कोशिश करते हैं। ये सभी धर्म के नाम पर अलग राज्य बनाना चाहते हैं। जो लोग उनकी धार्मिक पद्धति में नहीं आते हैं उनके प्रति वे सभी नफरत की भावना को फैलाते हैं। इस तरह से साम्प्रदायिकता की भावना ही आतंकवाद को जन्म देती है। जो लोग एक सम्प्रदाय के प्रति समर्पित होते हैं वे दूसरे सम्प्रदायों के लोगों से नफरत करते हैं।

जनता का सहयोग : जनता को भी सरकार से सहयोग करना चाहिए। कहीं-भी किसी भी संदिग्ध व्यक्ति अथवा वस्तु को देखते ही उसकी सूचना पुलिस को देनी चाहिए। बस अथवा रेलगाड़ी में बैठते समय यह देख लेना चाहिए कि आस-पास कोई लावारिस वस्तु तो नहीं पड़ी है अथवा रखी है।

जिन व्यक्तियों को आप जानते न हों उनसे कभी भी कोई उपहार नहीं लेना चाहिए। सार्वजनिक स्थल पर भी संदिग्ध आचरण वाले व्यक्ति से हमेशा ही बचकर रहना चाहिए। हम सभी जागरूक रहकर भी आतंकवादियों को आतंक फ़ैलाने से रोक सकते हैं।

दूषित राजनीति : आज के समय में देश असंख्य समस्याओं के लिए हमारी दूषित राजनीति जिम्मेदार होती है। हमारे देश के राजनीतिज्ञ और राजनीति पार्टियाँ देश में धर्म और जाति के नाम पर लोगों को भडकाते हैं और अपनी वोटों को पक्का कर लेते हैं। आज के समय में भी धर्म और जाति के नाम पर उम्मीदवारों को खड़ा किया जाता है।

कालान्तर में जो लोग संकीर्ण और कट्टर बन जाते हैं वही लोग आतंकवादी बन जाते हैं। 11 सितम्बर , 2001 को आतंकवादियों ने न्यूयार्क में स्थित विश्व व्यापर संगठन कार्यालय के दो टावरों और अमेरिका में अमेरिकी रक्षा वभाग के प्रमुख कार्यालय पेंटागन के कुछ क्षेत्रों को विमान द्वारा टक्कर मारकर ध्वस्त कर दिया था।

अमेरिका की यह सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है जिसमें हजारों बेगुनाह लोगों की हत्या हो गयी थी। अमेरिका सरकार इस दुर्घटना के लिए ओसामा बिन लादेन को दोषी मानती है। हमारे देश के 55 हजार लोग पिछले 20 सालों से आतंकवादियों के आतंकवाद के शिकार बन चुके हैं।

सरकार के कदम : कोई भी धर्म किसी की भी निर्मम हत्या की आज्ञा नहीं देता है। हर धर्म मानव से ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र से भी प्यार करना सिखाता है। अत: जो लोग धर्मिक संकीर्णता से ग्रस्त व्यक्तियों का समाज से बहिष्कार किया जाना चाहिए और धार्मिक स्थानों की पवित्रता को अपने स्वार्थ के लिए नष्ट करने वाले लोगों के विरुद्ध सभी धर्मावलम्बियों को एक साथ मिलकर प्रयास करना चाहिए। इसकी वजह से धर्म की ओट में आतंकवाद फ़ैलाने वाले लोगों पर अंकुश लग सकेगा। सरकार को भी धार्मिक स्थलों के राजनीतिक उपयोगों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

विषयों की गंभीरता : अगर आतंकवाद की समस्या को गंभीरता से समाप्त नहीं किया गया तो देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। इस प्रकार से लड़कर सभी समाप्त हो जायेंगे। जिस आजादी को प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया था हम उस आजादी को आपसी वैर भाव की वजह से समाप्त करके अपने ही पैरों पर कुलाढ़ी मार लेंगे। देश फिर से परतंत्रता के बंधन में बंध जायेगा। आतंकवादी हिंसा के बल से हमारा मनोबल तोड़ रहे हैं।

युवकों में बेरोजगारी : जितने भी लोग आतंकवादी बनते हैं वे सभी या तो बेरोजगार होते हैं या फिर आधे पढ़े-लिखे होते हैं। जो लोग आतंकवाद की नीति चलाते हैं वे इन बेरोजगार युवकों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। जब भी कोई युवक अपराधी बन जाता है तो उसका आतंकवाद से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

युवकों का मन और मस्तिष्क अपरिपक्व होते हैं उन्हें किसी भी सांझे में ढाला जा सकता है। युवक जिस प्रकार के लोगों के पास रहते हैं वे खुद भी वैसे ही बन जाते है। पंजाब में जितने भी आतंकवादियों को पकड़ा गया था उन्होंने बेरोजगारी से परेशान होकर इस रास्ते को अपनाया था।

आतंकवाद रोकने के उपाय : आतंकवाद मानवता के नाम पर एक कलंक होता है। आतंकवाद किसी के लिए भी लाभकारी नहीं होता है खुद आतंकवादियों के लिए भी नहीं। आतंकवाद से मानवता को बहुत हानि हो चुकी है। आतंकवाद ने पता नहीं कितने बच्चों को अनाथ बना दिया , कितनी औरतों को विधवा कर दिया और कितने ही लोगों को बेसहारा बना दिया।

सबसे पहले सरकार को आतंकवादियों के साथ बहुत कठोरता से कार्यवाई करनी चाहिए। देश की सीमा पर बहुत ही कड़ी निगरानी रखने की जरूरत है। जों युवक आतंकवाद के जाल में फंस गये हैं उन्हें सही रास्ते पर लाकर किसी रोजगार में लगा देना चाहिए। इसी तरह से लोगों में देशभक्ति की भावना को उत्पन्न करना चाहिए।

स्कूलों और कॉलेजों में भी राष्ट्रिय एकता की भावना को उत्पन्न करने की शिक्षा दी जानी चाहिए। देश की बढती हुई आर्थिक विषमता को भी समाप्त करना चाहिए। देश में आतंकवादियों के अड्डे सफेदपोश धूर्त नेताओं के संरक्षण में सुरक्षित होते हैं उनको समाप्त किया जाये। जब तक इन धूर्त सफेदपोशों का देश से नाश नहीं होता तब तक देशों की कोई भी समस्या नहीं सुलझ सकती। बिना उनके संरक्षण व संकेतों के कोई भी देश के अंदर गलत कदम नहीं बढ़ा सकता है।

उपसंहार : हमारा देश शांति और अहिंसा की जन्म भूमि है। इस देश में महात्मा गाँधी जी जैसे मानवता प्रेमियों का जन्म हुआ था। हमें महान संतों , ऋषियों , मुनियों , गुरुओं की वाणी का पुरे देश में प्रचार करना चाहिए। हमें संगठित होकर ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए।

जिससे उनका मनोबल समाप्त हो जाए तथा वे जान सके कि उन्होंने अपने गलत मार्ग पर पैर रख दिया है। जब वे आत्मग्लानी से वशीभूत होकर जब अपने किए पर पश्चाताप करेंगें तभी उन सभी को देश की मुख्य धारा में सम्मिलित किया जा सकता है। हमें आतंकवादी समस्या का समाधान जनता और सरकार दोनों के मिले-जुले प्रयासों से ही संभव हो सकता है।

हिन्दू , सिख , मुसलमान , ईसाई सब भारत के सपूत हैं। इन सभी को आतंकवाद को खत्म करने के लिए प्रयास करना चाहिए। भारत देश सभी सम्प्रदायों की अमूल्य निधि है। जिस प्रकार से आतंकवाद का विस्तार हो रहा है उसको समय रहते नहीं रोका गया तो यह भारत और अन्य देशों के लिए बहुत बड़ी समस्या बन जायेगा।

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

हिंसापूर्वक आम लोगों को सीधे डराने के लिये आतंकवाद एक गैर-कानूनी कृत्य है। आज के दिनों में हर समय वास्तव में लोग आतंकवाद और आतंकवादी हमलों से डरते रहते हैं। ये सभी देशों के लिये एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका है क्योंकि ये एक सामाजिक मुद्दा है। यहाँ पर विद्यार्थियों के लिये आतंकवाद के संदर्भ में आधारभूत समझ बनाने के लिये बेहद सरल शब्दों में कुछ निबंध प्रस्तुत किया जा रहा है जो इन्हें विभिन्न परीक्षाओं और निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में उपयोगी साबित होगा।

आतंकवाद पर निबंध (टेररिज्म एस्से)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

Get here some essays on Terrorism in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

आतंकवाद पर निबंध 1 (100 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद हिंसा का एक गैर-कानूनी तरीका है जो लोगों को डराने के लिये आतंकवादियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। आज, आतंकवाद एक सामाजिक मुद्दा बन चुका है। इसका इस्तेमाल आम लोगों और सरकार को डराने-धमकाने के लिये हो रहा है। बहुत आसानी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये विभिन्न सामाजिक संगठन, राजनीतिज्ञ और व्यापारिक उद्योगों के द्वारा आतंकवाद का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोगों का समूह जो आतंकवाद का समर्थन करते हैं उन्हें आतंकवादी कहते हैं। आतंकवाद को परिभाषित करना बहुत आसान नहीं है क्योंकि इसने अपनी जड़ें बहुत गहराई तक जमायी हुयी है। आतंकवादियों के पास कोई नियम और कानून नहीं है; ये समाज और देश में आतंक के स्तर को बढ़ाने और उत्पन्न करने के लिये केवल हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेते हैं।

आतंकवाद

आतंकवाद पर निबंध 2 (150 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

पूरे विश्व के लिये आतंकवाद एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुका है। ये एक वैश्विक समस्या है जिसने लगभग सभी राष्ट्रों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित किया हुआ है। हालाँकि बहुत सारे देशों के द्वारा आतंकवाद का सामना करने की कोशिश की जा रही है; लेकिन कुछ लोगों के द्वारा इसे आज भी समर्थन दिया जा रहा है। आम लोगों को किसी भी समय ख़ौफनाक तरीके से डराने का एक हिंसात्मक कुकृत्य है आतंकवाद। आतंकवादियों के बहुत सारे उद्देश्य होते हैं जैसे कि समाज में हिंसा के डर को फैलाना, राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति आदि। इनके निशाने पर हर वक्त देश का आम नागरिक होता है।

एक खास देशों की सरकार से अपनी माँगों को पूरा करवाना ही आतंकवादियों का मुख्य लक्ष्य होता है। लोगों और सरकार तक अपनी आवाज को पहुँचाने के लिये वो ऑनलाइन सोशल मीडिया, समाचारपत्र या पत्रिकाओं से संपर्क करते हैं। कई बार आतंकवादी हमले अपने वैचारिक और धार्मिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिये होते है।

आतंकवाद पर निबंध 3 (200 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

भारत एक विकसित देश है जिसने पूर्व और वर्तमान में बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया है, आतंकवाद उनमें से एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या है। भारत ने भूखमरी से होने वाली मृत्यु, अशिक्षा, गरीबी, असमानता, जनसंख्या विस्फोट और आतंकवाद जैसी चुनौतियों का सामना किया है जिसने इसकी विकास और वृद्धि को बुरी तरह प्रभावित किया है। आतंकवादियों के धर्म, मातृभूमि और दूसरे गैर-तार्किक भावनाओं के उद्देश्यों के लिये आम लोगों और सरकार से लड़ रहा आतंकवाद एक बड़ा खतरा है। आतंकवादी अपने आप को एक बहादुर सैनिक बताते हैं हालाँकि, वो वास्तविक सैनिक नहीं होते हैं। सच्चे सैनिक कभी-भी आम लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं और वो केवल दुश्मनों से अपने देश को बचाने के लिये ही लड़ते हैं। वास्तव में असली सैनिक वो होते हैं जो राष्ट्रहित के लिये लड़ते हैं। जबकि आतंकवादी अपने खुद के गलत उद्देश्यों के लिये लड़ते हैं।

एक राष्ट्रीय सैनिक अपनी सभी जिम्मेदारियों को समझता है जबकि एक आतंकवादी कभी-भी ऐसा नहीं करता। आतंकवादियों को उनका नाम आतंक शब्द से मिला है। पूर्व में, आतंकवाद केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था जैसे जम्मू- कश्मीर हालाँकि; आज के दिनों में, ये लगभग सभी क्षेत्रों में फैल चुका है खासतौर से भारत के उत्तरपूर्वी इलाकों में। हाल ही में, भारत में आतंकवादी हमला मुम्बई में नरीमन हउस और ताज होटल में हुआ था। उस हमले ने भारत में कई जिन्दगियों को लील लिया था और बहुत आर्थिक हानि पहुँचायी थी।


 

आतंकवाद पर निबंध 4 (250 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है जो पूरी जीत के लिये मानव दिमाग का इस्तेमाल कर रहा है। लोगों को कमजोर बनाने के लिये उन्हें डरा रहा है जिससे वो दुबारा से राष्ट्र पर राज कर सकें। इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने की जरुरत है। हमें इसे जड़ से खत्म करने के बारे में सोचना होगा। मानव मस्तिष्क से असाधारण आतंक को हटाने के साथ ही इसके साम्राज्य को पूरी तरह से नेस्तानाबूद करने के लिये हमें एक मजबूत नीति बनानी चाहिये। आतंकवाद अपने सकारात्मक परिणामों को पाने के लिये हिसांत्मक तरीका अपनाता है।

आतंकवाद एक हिंसात्मक कुकृत्य है जिसको अंजाम देने वाले समूह को आतंकवादी कहते हैं। वो बहुत साधारण लोग होते हैं और दूसरों के द्वारा उनके साथ घटित हुये कुछ गलत घटनाओं और या कुछ प्राकृतिक आपदाओं के कारण वो किसी तरह अपने दिमाग पर से अपना नियंत्रण खो देते हैं जो उनकी इच्छाओं को सामान्य या स्वीकृत तरीके से पूरा करने के में अक्षम बना देता है। धीरे-धीरे वो समाज के कुछ बुरे लोगों के प्रभाव में आ जाते हैं जहाँ उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करने का वादा किया जाता है। वो सभी एक साथ मिलते हैं और एक आतंकवादी समूह बनाते हैं जो कि अपने ही राष्ट्र, समाज और समुदाय से लड़ता है। आतंकवाद, देश के सभी युवाओं के विकास और वृद्धि को प्रभावित करता है।

ये राष्ट्र को उचित विकास से कई वर्ष पीछे ढकेल देता है। आतंकवाद देश पर अंग्रेजों की तरह राज कर रहा है, जिससे हमें फिर से आजाद होने की जरुरत है। हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि आतंकवाद हमेशा अपने जड़ को गहराई से फैलाता रहेगा क्योंकि अपने अनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये राष्ट्र के कुछ अमीर लोग अभी-भी इसको समर्थन दे रहें हैं।

 

आतंकवाद पर निबंध 5 (300 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

भारत ढ़ेर सारी चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे गरीबी, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता, असमानता आदि बहुत कुछ, फिर भी आतंकवाद इन सबसे ज्यादा खतरनाक है जो पूरी मानव जाति को प्रभावित कर रहा है। ये बहुत ही डरावनी बीमारी है जो लोगों को मानसिक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित कर रही है। चाहे ये छोटे देशों में होता हो (आयरलैंड, इज़रायल आदि) या बड़े देशों (यूएसए, रुस आदि) में; ये दोनों ही जगह चुनौती के रुप में है। अपने कुछ राजनीतिक, धार्मिक या व्यक्तिगत लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आतंकवादी अर्थात् परेशान लोगों के समूह के द्वारा हिंसात्मक तरीकों का प्रयोग आतंकवाद है। आज ये दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

आतंकवाद का कोई नियम कानून नहीं होता वो केवल अपनी माँगों को पूरा करने के लिये सरकार के ऊपर दबाव बनाने के साथ ही आतंक को हर जगह फैलाने के लिये निर्दोष लोगों के समूह या समाज पर हमला करते हैं। उनकी माँगे बेहद खास होती हो, जो वो चाहते हैं केवल उसी को पूरा कराते हैं। ये मानव जाति के लिये एक बड़ा खतरा है। वो कभी-भी अपने दोस्त, परिवार, बच्चे, महिला या बूढ़े लोगों के लिये समझौता नहीं करते हैं। वो केवल लोगों की भीड़ पर बम गिराना चाहते हैं। वो लोगों पर गोलियाँ चलाते हैं, विमानों का अपहरण करते हैं और दूसरी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

कम से कम समय में अपने मुख्य क्षेत्रों या देशों में आतंक फैलाने के लिये आतंकवादी लक्ष्य बनाते हैं। पूर्व में, ऐसा माना जाता है कि आतंकवादी गतिविधियाँ केवल जम्मू और कश्मीर तक ही सीमित थी लेकिन अब ये अपनी जड़ें देश के दूसरे क्षेत्रों में भी फैला रहा है। देश में अलग-अलग नामों के साथ कई सारे आतंकवादी समूह सक्रिय हैं। अपने कार्य के अनुसार राजनीतिक और आपराधिक आतंकवाद के दो मुख्य प्रकार हैं। कुछ खास लक्ष्यों को पूरा करने के लिये प्रशिक्षित लोगों का समूह है आतंकवाद। विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने के लिये एक से ज्यादा आतंकी समूह प्रशिक्षित किये जाते हैं। ये एक बीमारी की तरह है जो नियमित तौर पर फैल रही है और अब इसके लिये कुछ असरदार उपचार की जरुरत है।


 

आतंकवाद पर निबंध 6 (400 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवादी कहे जाने वाले प्रशिक्षित लोगों के समूह के द्वारा अन्यायपूर्ण और हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देने की प्रक्रिया को आतंकवाद कहते हैं। वहाँ केवल एक मालिक होता है जो समूह को किसी भी खास कार्य को किसी भी तरीके से करने का सख्त आदेश देता है। अपने अन्यायी विचारों की पूर्ति के लिये उन्हें पैसा, ताकत और प्रचार की जरुरत होती है। ऐसी परिस्थिति में, ये मीडिया होती है जो किसी भी राष्ट्र के समाज में आतंकवाद के बारे में खबर फैलाने में वास्तव में मदद करती है। अपनी योजना, विचार और लक्ष्य के बारे में लोगों तक पहुँच बनाने के लिये आतंकवाद भी मीडिया का सहारा लेता है।

अपने उद्देश्य और लक्ष्य के अनुसार विभिन्न आतंकी समूह का नाम पड़ता है। आतंकवाद की क्रिया मानव जाति को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है और लोगों को इतना डरा देती है कि लोग अपने घरों से बाहर निकलने में डरते हैं। वो सोचते हैं कि आतंक हर जगह है जैसे घर के बाहर रेलवे स्टेशन, मंदिर, सामाजिक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय कार्यक्रमों आदि में जाने से घबराते हैं। लोगों के दिमाग पर राज करने के साथ ही अपने कुकृत्यों कों प्रचारित और प्रसारित करने के लिये अधिक जनसंख्या के खास क्षेत्रों के तहत आतंकवादी अपने आतंक को फैलाना चाहते हैं। आतंकवाद के कुछ हालिया उदाहरण अमेरिका का 9/11 और भारत का 26/11 हमला है। इसने इंसानों के साथ ही बड़े पैमाने पर देश की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुँचायी है।

राष्ट्र से आतंकवाद और आतंक के प्रभाव को खत्म करने के लिये, सरकार के आदेश पर कड़ी सुरक्षा का प्रबंध किया गया है। वो सभी जगह जो किसी भी वजह से भीड़-भाड़ वाली जगह होती या बन जाती है जैसे सामाजिक कार्यक्रम, राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, मंदिर आदि को मजबूत सुरक्षा घेरे में रखा जाता है। सभी को सुरक्षा नियमों का पालन करता पड़ता है और ऑटोमैटिक बॉडी स्कैनर मशीन से गुजरना पड़ता है। इस तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करने के द्वारा सुरक्षा कर्मियों को आतंकवादी की मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिलती है। इस तरह की कड़ी सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी हम लोग अभी-भी आतंकवाद का खिलाफ प्रभावशाली रुप से नहीं खड़े हो पा रहें हैं।

आतंकी समूह को खत्म करने के साथ ही आतंक के खिलाफ लड़ने के लिये हर साल हमारा देश ढ़ेर सारे पैसे खर्च करता है। हालाँकि, ये अभी-भी एक बीमारी की तरह बढ़ रही है क्योंकि रोजाना नये आतंकवादी तैयार हो रहें हैं। वो हमारी तरह ही बहुत सामान्य लोग हैं लेकिन उन्हें अन्याय करने के लिये तैयार किया जाता है और अपने एक समाज, परिवार और देश के खिलाफ लड़ने के लिये दबाव बनाया जाता है। वो इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि उन्हें अपने जीवन से भी प्यार नहीं होता, वो लड़ते समय हमेशा अपना कुर्बान होने के लिये तैयार रहते हैं। एक भारतीय नागरिक के रुप में, आतंकवाद को रोकने के लिये हम सभी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं और ये तभी रुकेगा जब हम कुछ बुरे और परेशान लोगों की लालच भरी बातों में कभी नहीं आयेंगे।

आतंकवाद पर निबंध | Terrorism in Hindi!

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद किसी एक व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र विशेष के लिए ही नहीं अपितु पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है । हमारे देश मे ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे इसका जहर इतनी तीव्रता से फैल रहा है कि यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया तो यह पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है ।

शाब्दिक अर्थों में आतंकवाद का अर्थ भय अथवा डर के सिद्‌धांत को मानने से है । दूसरे शब्दों में, भययुक्त वातावरण को अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति हेतु तैयार करने का सिद्धांत आतंकवाद कहलाता है । विश्व के समस्त राष्ट्र प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हैं । रावण के सिर की तरह एक स्थान पर इसे खत्म किया जाता है तो दूसरी ओर एक नए सिर की भाँति उभर आता है ।

यदि हम अपने देश का ही उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि अथक प्रयासों के बाद हम पंजाब से आतंकवाद का समाप्त करने में सफल होते है तो यह जम्यू-कश्मीर, आसाम व अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रारंभ हो जाता है । पड़ोसी देश पाकिस्तान द्‌वारा भारत में आतकवाद को समर्थन देने की प्रथा तो निरंतर पचास वर्षो से चली आ रही है ।

हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है । यहाँ अनेक धर्मो के मानने वाले लोग निवास करते हैं । हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ब्रहम समाजी, आर्य समाजी, पारसी आदि सभी धर्मो के अनुयाइयों को यहाँ समान दृष्टि से देखा जाता है तथा सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं ।

वास्तविक रूप में धर्मो का मूल एक है । सभी ईश्वर पर आस्था रखते है तथा मानव कल्याण को प्रधानता देते हैं । सभी धर्म एक-दूसरे को प्रेमभाव व मानवता का संदेश देते है परंतु कुछ असामाजिक तत्व अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए धर्म का गलत प्रयोग करते है ।

धर्म की आड़ में वे समाज को इस हद तक भ्रमित कर दैत है कि उनमें किसी एक धर्म के प्रति घृणा का भाव समावेशित हो जाता है । उनमें ईर्ष्या, द्वेष व परस्पर अलगाव इस सीमा तक फैल जाता है कि वे एक पूँक्षर कह खून बहच सं भी नहीं चूकते हैं ।

 

देश में आतंकवाद के चलते पिछले पाँच दशकों में 50,000 से भी अधिक परिवार प्रभावित हो चुके हैं । कितनी ही महिलाओं का सुहाग उजड़ गया है । कितने ही माता-पिता बेऔलाद हो चुके हैं तथा कितने ही भाइयों से उनकी बहनें व कितनी ही बहनें अपने भाइयों से बिछुड़ चुकी हैं । पिछले दशक के हिंदू-सिख में कितने ही लोग जिंदा जला दिए गए । इसी आतंकवाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी ।

हमारे भूतपूर्व युवा प्रधानमंत्री स्व॰ राजीव गाँधी इसी आतंक रूपी दानव की क्रूरता का शिकार बने । अनेक नेता जिन्होंने अपने स्वार्थों के लिए आतंकवाद का समर्थन किया बाद में वे भी इसके दुष्परिणाम से नहीं बच सके । पाकिस्तान के अंदर बढ़ता हुआ आतंकवाद इसका प्रमाण है । वहाँ के शासनाध्यक्षों पर लगातार आतंकी हमले हो रहे है ।

पूरी दुनिया में छोटी-बड़ी आतंकवादी घटनाओं का एक सिलसिला सा चल पड़ा है । धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तो खून की नदियाँ बहना आम बात हो गई है । प्राकृतिक सौंदर्य का यह खजाना आज भय और आतंक का पर्याय बन रहा है । खून-खराबा, मार-काट, बलात्कार आदि घटनाओं से ग्रस्त यह प्रदेश पाँच दशकों से पुन: अमन-चैन की उम्मीदें लिए कराह रहा है ।

आतंकवाद के कारण यहाँ का पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है । हजारों की संख्या में लोग वहाँ से पलायन कर चुके हैं । विगत वर्षो में इस आतंकवाद ने जितनी जाने ली हैं कितने सैनिक शहीद हुए हैं इसका अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है । चूँकि यह आतंकवाद एक सुनियोजित अभियान के तहत चलाया जा रहा है, इसलिए इसकी समाप्ति उतनी सरल नहीं है ।

आतंकवाद के चलते खलनायकों को नायक के रूप में देखा जा रहा है । ऐसा नहीं है कि केवल निरीह लोग ही इसकी गिरफ्त में आते हैं । आतंकवाद ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भी नहीं छोड़ा जिसके फलस्वरूप हजारों लोग मौत के मुँह में समा गए तथा अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा ।

आतंकवाद मानव सम्यता के लिए कलंक है । उसे किसी भी रूप में पनपने नहीं देना चाहिए । विश्व के सभी राष्ट्रों को एक होकर इसके समूल विनाश का संकल्प लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक सुनहरा भविष्य प्रदान कर सकें ।

आतंकवाद पर निबंध। Terrorism Essay in Hindi

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद पर निबंध। Terrorism Essay in Hindi
प्रस्तावना : आतंकवाद वर्तमान समय की एक गंभीर समस्या है। आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो अपना स्वार्थ पाने के लिए लोगों में भय फैलाता है। सामान्यतः दो प्रकार के आतंकवाद होते है। एक तो राजनीतिक आतंकवाद जो अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ती के लिए भय फैलाते हैं और दूसरा आपराधिक आतंकवाद जो अपहरण करके रूपए मांगते हैं।
राजनीतिक आतंकवाद : राजनीतिक आतंकवाद बहुत खतरनाक है। राजनीतिक आतंकी सुसंगठित और प्रशिक्षित होते हैं। यह पुलिस के लिए भी कठिन होता है की इनको समय से गिरफ्तार कर पाए। राजनीतिक आतंकवादी बड़े पैमाने पर हिंसा कर सकते हैं। इनका उद्देश्य जनता और सरकार को भयभीत करना होता है। वे हवाईजहाजों को बंधक बनाते हैं, डकैती करते हैं, बैंक लूटते हैं। वे मासूम लोगों की ह्त्या करते हैं। भय फैलाने के लिए वे बेम विस्फोट करते है और अफवाहें फैलाते हैं।
आतंकी और आतंकवाद : सामान्यतः आतंकी युवा होते हैं और उनके पीछे जिनका समर्थन होता है वे वृद्ध होते हैं। वे आतंकी क्रियाकलापों को संगठित करते हैं। आतंकी उग्रवादी होते हैं जो अपना कार्य महान उत्साह के साथ करते हैं लेकिन वे लोगों को गलत सलाह देते हैं जो कभी-कभी यह नहीं समझ पाते हैं की वे वास्तव में क्या कर रहे हैं। कभी-कभी विदेशी एजेंसियां देश के भीतर भय फैलाने के लिए आतंकियों की सहायता करती हैं। ऐसे मामलों में, आतंकियों को जटिल हथियारों से प्रशिक्षण दिया जाता है। विदेशी एजेंसियां उन्हें हथियार और धन भी देती हैं।
भारत और आतंकवाद : भारत लम्बे समय से आतंकवाद का सामना कर रहा है। नागा विद्रोहियों की समस्या भारत में चिंता का विषय है। देश में नक्सल आंदोलन भी चल रहा है। वर्तमान में आतंकवाद पंजाब और अन्य स्थानों तक फ़ैल चुका है।  कुछ बड़ी शक्तियां और पड़ोसी देश हमारे देश में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यदि हमारा देश दो भागों में विभक्त हो गया तो वे बहुत प्रसन्न होंगे। कुछ समस्याएँ जम्मू-कश्मीर की हैं जिन्हे शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हत्याएं जारी हैं। हमें आशा है की राजनीतिक शक्तियां इस समस्या का समाधान निकालेंगी।
शान्ति के लिए खतरा : फिलिस्तीन की समस्या अभी तक हल नहीं हुई है और यह आतंकवाद और हिंसा को बढ़ा रही है। इंग्लैण्ड में आइरिश आतंकी देश की शान्ति को भांग करने में लगे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों में आतंकवाद एक बड़ी समस्या है। पाकिस्तान और श्रीलंका भी हिंसा की चपेट में हैं। आतंकवाद अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से हल किया जा सकता है। संसार के देशों को अन्य देशों के विरुद्ध आतंकी क्रियाकलापों की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता और मणनवीय मूल्यों में कोई विश्वास भी नहीं होता है। यूं. एन. ओ. ने इस समस्या को हल करने की अनुमति दे दी है। हमें आशा है की भारत और सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही इस भयावह स्वप्न से बाहर आ पाने में सफल होंगे।
प्रमुख आतंकवादी घटना : 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जो की अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित है पर बंधक हवाई जहाजों द्वारा हमला किया गया। इसमें लगभग 7000 लोगों की मृत्यु हुई। वर्तमान में सीरिया और उसके आस-पास के क्षेत्र भी आतंकवाद से ग्रसित हैं। इन इलाकों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति व्याप्त है। बमों और मिसाइलों के हमलों में हजारों की संख्या में निर्दोष और मासूम लोग मारे जा रहे हैं। भारज के मुंबई शहर में ताज होटल में हुए आतंकी हमले में भी कई लोग मारे गए। इसके अलावा रोज कहीं न कहीं छोटे-बड़े आतंकी हमले होते ही रहते हैं। आतंकवाद में आज सम्पूर्ण विश्व को युद्ध की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
उपसंहार : आतंकवाद का जिस ढंग से विस्तार हो रहा है यदि उसको समय रहते नहीं रोका गया तो भारत सहित सभी देशों के लिए यह एक विकत समस्या बन जाएगा। दुनिया की सभी देशों को मिलकर ऐसी आपराधिक प्रवृत्ति पर रोक लगाने के प्रयास करने चाहिए। लेकिन दुःख इस बात का है की दुनिया के बड़े देश इस समस्या से मुकाबला करने में भी अपने हितों पर अधिक ध्यान देते हैं।

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बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

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बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध :

भूमिका : बेरोजगारी उन्नति के रास्ते में बहुत बड़ी समस्या है। बेरोजगारी का अर्थ होता है काम करने की इच्छा करने वाले को काम न मिलना। आज भारत को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन सभी समस्याओं में से बेरोजगारी की समस्या प्रमुख है। प्राचीनकाल में हमारा भारत पूर्ण रूप से संपन्न देश था इसी वजह से इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था।

बहुत सालो से इस समस्या को दूर करने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन अभी तक किसी को भी सफलता नहीं मिल पायी है। इसकी वजह से बहुत से परिवार आर्थिक दशा से खोखले हो चुके हैं। आर्थिक योजनाओं में यह सबसे बड़ी रुकावट है। हमारे देश में आर्थिक योजनाएँ तब तक सफल नहीं हो पाएंगी जब तक बेरोजगारी की समस्या खत्म नहीं हो जाती।

आज हम स्वतंत्र तो हैं लेकिन अभी तक आर्थिक दृष्टि से सक्षम नहीं हुए हैं। हम चारों तरफ से चोरी ,छीना-छपटी , खून और लूटमार की बातें सुनते रहते हैं। आज के समय में सभी जगह पर हड़तालें की जा रही हैं। आजकल हर किसी को अपने परिवार के पेट को भरने की चिंता रहती है।

वो लोग अपने परिवार का पेट अच्छाई के मार्ग पर चलकर भरें या बुराई के मार्ग पर चलकर इस बात का कोई मूल्य नहीं है। बेरोजगारी सामाजिक और आर्थिक समस्या है। यह समस्या गांवों और शहरों में समान रूप से फैली हुई है।

जनसंख्या में वृद्धि : हमारे देश की बेरोजगारी में रोज वृद्धि हो रही है। हमारी सरकार इस समस्या का हल ढूंड रही है पर लगातार बढती जनसंख्या इसका हल नहीं ढूंढने देती है। हर साल जितने व्यक्तियों को काम दिए जाते हैं उनसे कई गुना लोग बेरोजगार हो जाते हैं। सरकार ने जनसंख्या को कम करने के कई अप्राकृतिक उपाय खोजे हैं लेकिन इसके बाद भी जनसंख्या लगातार बढती ही जा रही है।

जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण शिक्षा के साधनों में कमी होने लगी जिससे लोग अशिक्षित रह गये। हमारे देश में अशिक्षित पुरुष और स्त्रियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही है। बढती जनसंख्या बेरोजगारी का बहुत ही बड़ा कारण है। जनसंख्या में वृद्धि के कारण देश का संतुलन बिगड़ रहा है। जनसंख्या में वृद्धि के अनुपात की वजह से रोजगारों की कमी और अवसर में बहुत कम वृद्धि हो रही है इसी वजह से बेरोजगारी बढती जा रही है।

अधूरी शिक्षा प्रणाली : हजारों सालों से हमारी शिक्षा पद्धति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारी शिक्षा प्रणाली के अधुरा होने की वजह से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। अधूरी शिक्षा प्रणाली को अंग्रेजी सरकार ने परतंत्र के समय में भारतियों को क्लर्क बनाने के लिए शुरू की थी। आगे चलकर जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे परेशानियाँ भी बदलने लगीं। इस शिक्षा प्रणाली से सिर्फ ऐसे लोग तैयार होते हैं जो बाबु बनते हैं।

जवाहरलाल नेहरु जी ने कहा था कि हर साल लाखों लोग शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिए तैयार होते हैं लेकिन हमारे पास नौकरियां बहुत ही कम होती हैं। ऐसे लोगों को नौकरी न मिलने की वजह से ये बेकार हो जाते है। आजकल किसी को भी एम० ए० या बी० ए० किये लोग नहीं उन्हें सिर्फ विशेषज्ञ और वैज्ञानिक चाहिएँ। इसी कारण से लोग बहुत कम लोग शिक्षा ग्रहण करते हैं।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में रोजगारोन्मुख शिक्षा की व्यवस्था नहीं होती है जिससे बेरोजगारी और अधिक बढती है। इसी वजह से जो व्यक्ति आधुनिक शिक्षा ग्रहण करते हैं उनके पास नौकरियां ढूंढने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता है। शिक्षा पद्धिति में परिवर्तन करने से विद्यार्थी शिक्षा का समुचित प्रयोग कर पाएंगे।

विद्यार्थियों को तकनीकी और कार्यों के बारे में शिक्षा देनी चाहिए ताकि वे अपनी शिक्षा के बल पर नौकरी प्राप्त कर सकें। सभी सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों में व्यवसाय के ऊपर शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज के युग में शिक्षित और कुशल लोगों की जरूरत होती है जिन लोगों के पास शिक्षा नहीं होती है उन लोगों को रोजगार प्राप्त नहीं होता है।

हमारी शिक्षा प्रणाली में साक्षरता को अधिक महत्व दिया जाता है। तकनीकी शिक्षा में केवल सैद्धांतिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है इसमें व्यावहारिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है इसी वजह से लोग मशीनों पर काम करने से कतराते है। साधारण शिक्षा से हम सिर्फ नौकरी करने के योग्य बनते हैं इसमें मेहनत का कोई काम नहीं होता है।

उद्योग धंधों की अवनति : उद्योग धंधो की अवनति के कारण भी बेरोजगारी बढती जा रही है। प्राचीनकाल में बेरोजगारी की समस्या ही नहीं थी उस समय हर व्यक्ति के पास काम था। कुछ लोग चरखा चलाते थे , कुछ गुड बनाते थे और कुछ लोग खिलौने बनाते थे। जब अंग्रेजी हुकुमत आई तो उन लोगों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए इस सब कामों को नष्ट कर दिया था।

अंग्रेजों ने लोगों में से आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया था। रोजगारों के दस्तावेजों के हिसाब से हर साल लाखों लोग बेरोजगार होते थे लेकिन अब इनकी संख्या करोंड़ों से भी ऊपर हो गई है। हमें बेरोजगार लोगों की पूरी संख्या का निश्चित पता नहीं होता क्योंकि बहुत से लोग रोजगार कार्यालय में अपना नाम ही दर्ज नहीं करवाते हैं।

पढ़े लिखे लोग भूखा मरना तो पसंद करते हैं पर मजदूरी करना पसंद नहीं करते हैं। वे लोगों के सामने छोटे काम को करने में संकोच करते हैं। वे यह सोचते हैं कि लोग कहेंगे कि पढ़ा-लिखा होकर भी मजदूरी कर रहा है। यही बात लोगों को कुछ नहीं करने देते हैं। लेकिन शिक्षा उन्हें यह तो नहीं कहती है कि तुम मजदूरी मत करो।

सरकारी नीतियाँ : बेरोजगारी की समस्या शहर और गाँव दोनों में उत्पन्न हो रही है। जिससे धन की ठीक व्यवस्था न होने की वजह से बड़े-बड़े कारीगर भी बेकार होते हैं। गांवों में किसान खेती के लिए वर्षा पर आश्रित रहता है। उसे अपने खाली समय में कुटीर उद्योग चलाने चाहिएँ। इस वजह से उसकी और देश की हालत ठीक हो जाती है।

आजकल गाँव के लोग शहरों में आकर बसने लगे हैं जिसकी वजह से बेरोजगारी बढती जा रही है। गांवों में लोग कृषि करना पसंद नहीं करते जिसकी वजह से गांवों की आधी जनसंख्या बेरोजगार रह जाती है। पुराने समय में वर्ण व्यवस्था में पैतृक व्यवसाय को अपना लिया गया था जिस वजह से बेरोजगारी कभी पैदा ही नहीं होती थी।

जब वर्ण-व्यवस्था के भंग हो जाने से पैतृक व्यवसाय को नफरत की नजर से देखा जाता है तो बेटा पिता के व्यवसाय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता है। आज के युवाओं की ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उन्हें रोजगार दिलाने में सहायता करे। औद्योगिक शिक्षा की तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिए ताकि शिक्षित लोगों की बेरोजगारी को कम किया जा सके।

शिक्षा से लोग स्वालम्बी होते हैं। उन लोगों में हस्तकला की भावना पैदा नहीं होती है। आधे से भी ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में भटकते रहते हैं और बेरोजगारों की लाइन और लम्बी होती चली जाती है। हमारे देश में बहुत अधिक जनसंख्या है जिस वजह से उद्योग धंधों में उन्नति की बहुत अधिक आवश्यकता है।

उद्योग धंधों को सार्वजनिक क्षेत्रों में ही स्थापित किया गया है , जब तक घरेलू दस्तकारों को प्रोस्ताहन नहीं दिया जाएगा तब तक बेरोजगारी की समस्या ठीक नहीं हो सकती है। सरकार कारखानों की संख्या में वृद्धि कर रही है। उद्योग धंधों की स्थापना की जा रही है। उत्पादन क्षेत्रों को विकसित किया जा रहा है।

सामाजिक और धार्मिक मनोवृत्ति और सरकारी विभागों में छंटनी : सामाजिक और धार्मिक मनोवृत्ति से भी बेरोजगारी की समस्या बढती जा रही है। आज के समय में ऋषियों और साधुओं को भिक्षा देना पुण्य की बात मानी जाती है। जब स्वस्थ लोग दानियों की उदारता को देखते हैं को देख कर भिक्षावृत्ति पर उतर आते हैं। इस प्रकार से भी बेरोजगारी की परेशानी बढती जा रही है।

हमारे यहाँ के सामाजिक नियमों के अनुसार वर्ण-व्यवस्था के अनुसार विशेष-विशेष वर्गों के लिए बहुत विशेष-विशेष कार्य होते हैं। सरकारी विभागों में वर्ण-व्यवस्था के अनुसार काम दिए जाते हैं। अगर उन्हें काम मिलता है तो करते हैं वरना हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इस तरीके की सामाजिक व्यवस्था से भी बेरोजगारी बढती है।

बेकारी की वजह से युवाओं में असंतोष ने समाज में अव्यवस्था और अराजकता फैला रखी हैं। हमें सरकारी नौकरियों के मोह को छोडकर उस काम को करना चाहिए जिसमें श्रम की जरूरत होती है। लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय को छोडकर रोजगार की खोज में इधर-उधर घूमते रहते हैं।

जनसंख्या वृद्धि पर रोक और शिक्षा : जनसंख्या वृद्धि को रोककर बेरोजगारी को नियंत्रित किया जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए विवाह की आयु का नियम कठोरता से लागु किया जाना चाहिए। साथ ही शिक्षा-पद्धिति में भी सुधार करना चाहिए। शिक्षा को व्यावहारिक बनाना चाहिए। विद्यार्थियों में प्रारंभ से ही स्वालंबन की भावना को पैदा करना होगा।

देश के विकास और कल्याण के लिए पंचवर्षीय योजना को चलाया गया जिससे किसी भी राष्ट्र की पहली शर्त सब लोगों को रोजगार देना होता है। लेकिन पहली पंचवर्षीय योजना से बेरोजगारी की समस्या और अधिक बढ़ गई थी। बेरोजगारी की समस्या को सुलझाने के लिए मन की भावना को बदलना बहुत जरूरी है।

मन की भावना को बदलने से किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा चाहिए। डिग्री लेना ही ज्यादा जरूरी नहीं होता है जरूरी होता है अपनी कुशलता और योग्यता को प्राप्त करना।

उपसंहार : बरोजगारी देश की एक बहुत बड़ी समस्या है। सरकार के द्वारा बेरोजगारी को खत्म करने के लिए बहुत से कदम उठाये जा रहे हैं। बेरोजगारी उस संक्रामक बीमारी की तरह होती है जो अनेक बिमारियों को जन्म देती है। लोगों का कहना है कि अभी सरकार को बेरोजगारी से छुटकारा नहीं मिल पाया है पर वो इतने साधन जुटा रही है जिससे भविष्य में बेरोजगारी की समस्या को खत्म किया जा सके।

बेरोजगारी व्यक्ति की सच्चाई , ईमानदारी और दया का गला घोट देती है। बेरोजगारी लोगों को अनेक प्रकार के अत्याचार करने के लिए मजबूर करती है। सरकार बेरोजगारी को दूर करने के लिए बहुत से कदम उठा रही है। भविष्य में एक समय ऐसा होगा जिसमे हर एक व्यक्ति के पास काम होगा। नव युवकों को उद्यम लगाने के लिए ऋण दे रही है और उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी साथ दे रही है।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध | Essay on The Problem of Unemployment in Hindi!

प्राचीन काल में भारत आर्थिक दृष्टि से पूर्णत: सम्पन्न था । तभी तो यह ‘ सोने की चिड़िया ‘ के नाम से विख्यात था । किन्तु, आज भारत आर्थिक दृष्टि से विकासशील देशों की श्रेणी में है । आज यहाँ कुपोषण और बेरोजगारी है । आज हमारे देश में जो अव्यवस्था व्याप्त है, उसकी जड़ में बेरोजगारी की समस्या विकराल है । लूट-खसोट, छीना-झपटी, चोरी-डकैती, हड़ताल आदि कुव्यवस्थाएँ इसी समस्या के दुष्परिणाम हैं । बेरोजगारी का अभिप्राय है – काम करने योग्य इच्छुक व्यक्ति को कोई काम न मिलना । भारत में बेरोजगारी के अनेक रूप हैं । बेरोजगारी में एक वर्ग तो उन लोगों का है, जो अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित हैं और रोजी-रोटी की तलाश में भटक रहे हैं । दूसरा वर्ग उन बेरोजगारों का है जो शिक्षित हैं, जिसके पास काम तो है, पर उस काम से उसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह उसकी आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं है । बेरोजगारी की इस समस्या से शहर और गाँव दोनों आक्रांत हैं ।

देश के विकास और कल्याण के लिए 1951 – 52 में पंचवर्षीय योजनाओं को आरंभ किया गया था । योजना आरंभ करने के अवसर पर आचार्य विनोबा भावे ने कहा था किसी भी राष्ट्रीय योजना की पहली शर्त सबको रोजगार देना है । यदि योजना से सबको रोजगार नहीं मिलता, तो यह एकपक्षीय होगा, राष्ट्रीय नहीं । आचार्य भावे की आशंका सत्य सिद्ध हुई । प्रथम पंचवर्षीय योजनाकाल से ही बेरोजगारी घटने के स्थान पर निरंतर बढ़ती चली गयी । आज बेरोजगारी की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है ।

हमारे देश में बेरोजगारी की इस भीषण समस्या के अनेक कारण हैं । उन कारणों में लॉर्ड मैकॉले की दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति, जनसंख्या की अतिशय वृद्धि, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के कारण कुटीर उद्योगों का ह्रास आदि प्रमुख हैं । आधुनिक शिक्षा प्रणाली में रोजगारोन्मुख शिक्षा व्यवस्था का सर्वथा अभाव है । इस कारण आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के सम्मुख भटकाव के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह गया है । बेरोजगारी की विकराल समस्या के समाधान के लिए कुछ राहें तो खोजनी ही पड़ेगी । इस समस्या के समाधान के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए ।

भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल आसान नहीं है, फिर भी प्रत्येक समस्या का समाधान तो है ही । इस समस्या के समाधान के लिए मनोभावना में परिवर्तन लाना आवश्यक है । मनोभावना में परिवर्तन का तात्पर्य है – किसी कार्य को छोटा नहीं समझना ।

इसके लिए सरकारी अथवा नौकरियों की ललक छोड्‌कर उन धंधों को अपनाना चाहिए, जिनमें श्रम की आवश्यकता होती है । इस अर्थ में घरेलू उद्योग- धंधों को पुनर्जीवित करना तथा उन्हें विकसित करना आवश्यक है । शिक्षा नीति में परिवर्तन लाकर इसे रोजगारोम्मुखी बनाने की भी आवश्यकता है । केवल डिग्री ले लेना ही महत्त्वपूर्ण नहीं, अधिक महत्त्वपूर्ण है योग्यता और कार्यकुशलता प्राप्त करना ।

युवा वर्ग की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होनी चाहिए कि वह शिक्षा प्राप्त कर स्वावलंबी बनने का प्रयास करे । सरकार को भी चाहिए कि योजनाओं में रोजगार को विशेष प्रश्रय दिया जाए । भारत सरकार इस दिशा में विशेष प्रयत्नशील है । परन्तु सरकार की तमाम नीतियाँ एवं कार्यान्वयण नाकाफी ही साबित हुए हैं । मतलब साफ है कि सरकार की नीतियों में कहीं न कहीं कोई व्यावहारिक कठिनाई अवश्य है । अत: सरकार को चाहिए कि वह इसके निराकरण हेतु एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए और समस्या को और अधिक बढ़ने न दे ।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध | Essay on Unemployment in Hindi!

बेरोजगारी देश के सम्मुख एक प्रमुख समस्या है जो प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरुद्‌ध करती है । यहाँ पर बेरोजगार युवक-युवतियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है । स्वतंत्रता के पचास वर्षों बाद भी सभी को रोजगार देने के अपने लक्ष्य से हम मीलों दूर हैं ।

बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है । हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं । अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है । देश के 90% किसान अपूर्ण या अर्द्ध बेरोजगार हैं जिनके लिए वर्ष भर कार्य नहीं होता है । वे केवल फसलों के समय ही व्यस्त रहते हैं ।

शेष समय में उनके करने के लिए खास कार्य नहीं होता है । यदि हम बेरोजगारी के कारणों का अवलोकन करें तो हम पाएँगे कि इसका सबसे बड़ा कारण देश की निरंतर बढ़ती जनसंख्या है । हमारे संसाधनों की तुलना में जनसंख्या वृद्‌धि की गति कहीं अधिक है जिसके फलस्वरूप देश का संतुलन बिगड़ता जा रहा है ।

इसका दूसरा प्रमुख कारण हमारी शिक्षा-व्यवस्था है । वर्षो से हमारी शिक्षा पद्‌धति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है । हमारी वर्तमान शिक्षा पद्‌धति का आधार प्रायोगिक नहीं है । यही कारण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी हमें नौकरी नहीं मिल पाती है ।

बेरोजगारी का तीसरा प्रमुख कारण हमारे लघु उद्‌योगों का नष्ट होना अथवा उनकी महत्ता का कम होना है । इसके फलस्वरूप देश के लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय से विमुख होकर रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं ।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ । इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा ।

यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा पद्‌धति में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ । उन्हें आवश्यक व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सकें । विद्‌यालयों में तकनीकी एवं कार्य पर आधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्‌योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें ।

 

इस दिशा में सरकार निरंतर कार्य कर रही है । अपनी पंचवर्षीय व अन्य योजनाओं के माध्यम से लघु उद्‌योग के विकास के लिए वह निरंतर प्रयासरत है ।

सभी सरकारी एवं गैर सरकारी विद्‌यालयों में तकनीकी तथा व्यवसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है । बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रण में लेने हेतु विभिन्न परिवार कल्याण योजनाओं को लागू किया गया है । सभी बड़े शहरों में रोजगार कार्यालय खोले गए हैं जिनके माध्यम से युवाओं को रोजगार की सुविधा प्रदान की जाती है ।

परंतु विभिन्न सरकारों ने यह स्वीकार किया है कि रोजगार कार्यालयों के माध्यम से बहुत थोड़ी संख्या में ही बेराजगारों को खपाया जा सकता है क्योंकि सभी स्थानों पर जितने बेकार हैं उसकी तुलना में रिक्तियों की संख्या न्यून है । इस कारण बहुत से लोग असंगठित क्षेत्र में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने के लिए विवश हैं ।

वर्तमान में सरकार इस बात पर अधिक बल दे रही है कि देश के सभी युवक स्वावलंबी बनें । वे केवल सरकारी सेवाओं पर ही आश्रित न रहें अपितु उपयुक्त तकनीकी अथवा व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर स्वरोजगार हेतु प्रयास करें ।

नवयुवकों को उद्‌यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान कर रही है तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी सहयोग कर रही है । हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि बदलते परिपेक्ष्य में हमारे देश के नवयुवक कसौटी पर खरे उतरेंगे और देश में फैली बेरोजगारी जैसी समस्या से दूर रहने में सफल होंगे ।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

( बेरोजगारी की समस्या पर निबंध |Unemployment Essay in Hindi) :-आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारा देश भारत कई प्रकार की समस्याओं से उभर नहीं पाया है। इन समस्याओं में एक सबसे बड़ी समस्या है – बेरोजगारी की समस्या। बेरोजगारी का अर्थ है कार्य सक्षम होने के बावजूद एक व्यक्ति को उसकी आजीविका के लिए किसी रोज़गार का न मिलना| रोज़गार के अभाव में व्यक्ति मारा-मारा फिरता है|

ऐसे में तमाम तरह के अवसाद उसे घेर लेते हैं, फिर तो न चाहते हुए भी कई बार वह ऐसा कदम उठा लेता है, जिनकी कानून इजाजत नहीं देता| राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन ने बेरोजगारी को इस प्रकार से परिभाषित किया है यह वह अवस्था है, जिसमें काम के आभाव में लोग बिना कार्य के रह जाते है|

यह कार्ययत व्यक्ति नहीं है, किंतु रोजगार कार्यालयों, मध्यस्थो, मित्रों, संबंधियों आदि के माध्यम से या संभावित रोज़गारदाताओं का आवेदन देकर या वर्तमान परिस्थितियों और प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने की इच्छा प्रकट कर कार्य तलाशते है|

बेरोजगारी के कारण नवयुवक नौकरी की तलाश में प्रतिदिन दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं तथा अखबारों, इन्टरनेट आदि में दिए गए विज्ञापनों द्वारा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की खोज में लगे रहते हैं, परन्तु उन्हें रोजगार की प्राप्ति नहीं होती। केवल निराशा ही उनके हाथ लगती है।

देश में उद्योगों का विकास करना चाहिये ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें। देश में विदेशी पूँजी व उन्नत तकनीक को आकर्षित करना चाहिये जिससे रोजगार में वृद्धि होती है तथा बेरोजगारी कई समस्याओं को जन्म देती हैं जैसे भ्रष्टाचार, आतकंवाद, अराजकता इत्यादि। युवा वर्ग की शक्ति एवं ऊर्जा के प्रयोग के लिये उन्हें सही शिक्षा और उसके बाद उचित मार्गदर्शन मिलना जरूरी है, वरना युवक भटक जाते हैं और समाज में बुराईया फैलती हैं।

आज पढ़ा लिखा व्यक्ति रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत में माँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योग स्थापित नहीं हो रहे हैं, वहीं उत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है।

हमारा देश अधिक जनसंख्या वाला है । इसलिए यहां पर बड़े उद्योगों तथा घरेलू उद्योगों का विकसित किया जाना परमावश्यक है । जहां तक बड़े उद्योगों का सम्बन्ध है वह तो निजी सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित हुए है, परन्तु इससे हमारी बेकारी की समस्या का समाधान नहीं निकल सकता जब तक कि घरेलू दस्तकारी को प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा । हमारे गांवों में कृषक वर्ष में छ: मास तक बेकार रहते हैं ।

इन गांवों में कुटीर एवं लघु उद्योगों का पतन होने के कारण बेकारी भी बढ़ गई है । प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में पैतृक व्यवसाय को अपना लिया जाता था जिससे बेकारी उत्पन्न ही नहीं होती थी । लेकिन अब शिक्षा के प्रसार तथा वर्ग-व्यवस्था के भंग हो जाने से पैतृक व्यवसाय को साधारणतया मृणा की दृष्टि से देखा जाता है तो पुत्र पिता के व्यवसाय को अपनाने के लिए तैयार नहीं होता ।

आजकल पढ़ा लिखा व्यक्ति भी रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत में माँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योग स्थापित नहीं हो रहे हैं, वहीं उत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है।

बेरोजगारी धीरे धीरे एक अभिशाप बनते चले जा रहा। एक बड़ी कहावत है – खाली मन शैतान का घर होता है। इसीलिए तो नौजवानों के लिए करियर के अच्छे अवसर और बेरोजगारी न होने के कारण ही समाज में लूट-पाट, चोरी-चकारी, दंगा-फसाद, और नशा जैसी बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो रही है।

अन्य शिक्षा और स्वच्छ भारत अभियान की तरह ही बेरोजगारी की समस्या का भी हल निकालने की बहुत आवश्यकता है। जब तक देश में सभी नागरिकों को उनकी योग्यता व आवश्यकता के अनुसार काम नहीं मिलता तब तक एक स्वच्छ, सुखी और उन्नत देश का निर्माण असंभव है।

भारत में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से चली आ रही है; किंतु वर्तमान समय में इसने विकराल रूप धारण कर लिया है । द्वितीय महायुद्ध के पूर्व भी बेरोजगारी की समस्या थी । महायुद्ध के समय अधिकांश व्यक्तियों को उनके अनुरूप काम मिल गया । सबको पेट भर खाना मिलने लगा; किंतु युद्ध की समाप्ति के पश्चात् बेकारी की समस्या दोगुनी हो गई ।

देश में वस्तुओं और नौकरियों का अभाव होते हुए भी बड़ी मात्रा में श्रमिक-शक्ति शून्य पड़ी है । एक ओर तो देश में सभी प्रकार के उत्पादन की कमी है तथा दूसरी ओर मानव-संसाधन अब तक अप्रयुक्त खड़े हैं । स्पष्टतया पूंजी और साहस की कमी ही बेरोजगारी का प्रमुख कारण है ।

उत्तरी भारत में किसानों को वर्ष में सात महीने बेकार रहना पड़ता है । भूमिहीन श्रमिकों की दशा और भी दयनीय है । इनकी संख्या कुल ग्रामीण जनता का 20 प्रतिशत है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ ।

इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा । यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा पद्धति में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ । उन्हें आवश्यक व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सकें । विद्‌यालयों में तकनीकी एवं कार्य पर आधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें ।

बेरोजगारी कई समस्यों को जन्म देती है जैसे भ्रष्टाचार, आतंकवाद ,अराजकता वादी इत्यदि।  युवा वर्ग की शक्ति एवं ऊर्जा के प्रयोग के लिए उन्हें  सही शिक्षा और उसके पश्चात उचित मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है ,वरन युवक भटक जाते हैं और समाज में बुराइयाँ फैलती है।

हमारे देश में जनसंख्या में दिन-प्रतिदिन अत्यधिक वृद्धि हो रही है । वर्ष भर में जितने व्यक्तियों को काम- धन्धों में लगाया जाता है उससे कई गुणा अधिक और बेकारों की संख्या को बढ़ा देते हैं । लेकिन जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि इस समस्या को हल नहीं होने देती । इसलिए जनसंख्या की इस वृद्धि को हर हालत में रोकना चाहिए ।

 बेरोजगारी को दूर करने का उपाय:-

बेरोज़गारी दूर करने के लिए हमें जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, कुटीर उद्योगों का विकास, औद्योगीकरण, सहकारी खेती, सहायक उद्योगों का विकास, राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी विभिन्न कार्य आदि करने चाहिए। नवयुवकों को उद्यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान किये जाए तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम लगाए जाए जिससे व्यक्ति स्वयं रोजगार उत्पन्न कर सके। प्रत्येक समस्या का समाधान उसके कारणों में छिपा रहता है |

अतः यदि ऊपर-कथित कारणों प्र प्रभावी रोक लगाई जाए तो बेरोज़गारी की समस्या का काफी सीमा तक समाधान हो सकता है | हम भारतीयों को स्वयं को ज्ञान और नए आविष्कारों के माध्यम से इतना सक्षम बनाना होगा जिससे विश्व भर के बड़ी कंपनियों को हमारी ताकत का पता चल सके और वह भारत में निवेश करें तथा अपनी कंपनियां शुरू करें।

इससे हमारे देश के लोगों को करियर के नए अवसर प्राप्त होंगे और हमारे देश को विकसित होने में मदद मिलेगी। हाल ही में सरकार ने भी भारत के नौजवानों को आगे ले जाने के लिए कई प्रकार के योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुद्रा लोन योजना, आवास योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, सुकन्या समृद्धि योजना शुरू किया है।लोगों को सरकार की इन योजनाओं से जुड़ना चाहिए और इन योजनाओं के माध्यम से अपने आने वाली पीढ़ी को शिक्षित बनाना चाहिए जिससे वह हमारे देश भारत का भविष्य बन सकें।

व्यवसिक शिक्षा, लघु उद्योगों को प्रोत्साहन, मशिनिकरण प्र नियंत्रण, कंप्यूटरीकरण पर नियंत्रण, रोज़गार के नए अवसरों की तलाश, जनसंख्या पर रोक आदि उपायों को शीघ्रता से लागु किया जाना चाहिए |

हमारे समाज की एक और सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर युवा अपनी शिक्षा के बाद नौकरी करने के विषय में बहुत सोचते हैं। जबकि हमारे युवाओं को सोचना चाहिए कि वह अपनी शिक्षा के बाद अपने ज्ञान की मदद से कोई  लघु उद्योग शुरू करें जिससे  उन्हें नौकरी की जरूरत ना पड़े।

उद्योग शुरू करने का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह स्वयं तो सफल बनेंगे साथ ही उनके उद्योग के माध्यम से और भी नौजवानों और देश के नागरिकों को नौकरी के नए अवसर प्राप्त होंगे। चाहे गांव हो या शहर, हर जगह एक छोटे से व्यापार को शुरू कर सकते हैं और अगर शुरू करने के लिए पूंजी नहीं है तो बैंक से लोन लेकर भी शुरू कर सकते हैं।

बेरोजगारी समाज में विभिन्न समस्याओं का मूल कारण है। हालांकि सरकार ने इस समस्या को कम करने के लिए पहल की है लेकिन उठाये गये उपाय पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। इस समस्या के कारण विभिन्न कारकों को प्रभावी और एकीकृत समाधान देखने के लिए अच्छी तरह से अध्ययन किया जाना चाहिए।

यह समय है कि सरकार को इस मामले की संवेदनशीलता को पहचानना चाहिए और इसे कम करने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाने चाहिए। बेरोजगारी बेकारी देश की एक विकट समस्या है । यह उस बीमारी के समान है जो अनेक बीमारियों को जन्म देती है । यह अपराधों तथा अनेक प्रकार के अत्याचार करने के लिए विवश करती है ।

यह व्यक्ति की सच्चाई, उसकी ईमानदारी, दया और सहानुभूति का गला घोंटती है । अतः केन्द्र तथा राज्य सरकारों का यह कर्तव्य है कि बेरोजगारी को दूर करने का सफल प्रयत्न करें ।तो दोस्तों हम उम्मीद करते हैं की आपको ( बेरोजगारी की समस्या पर निबंध |Unemployment Essay in Hindi) पर निबंध  काफी पसंद आयी होगी और इसे आप अपने दोस्तों के साथ शेयर करना चाहेंगे

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छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

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छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध :

भूमिका : भारत में सबसे बड़ा लोकतंत्र है और कई जातियों और धर्मों में विभाजित है। छुआछूत भारत के हिन्दू समाज से जुडी हुई एक बहुत ही गंभीर समस्या है। छुआछूत हमारे देश के लिए एक ऐसी बीमारी है जो दूसरी समस्याओं को पैदा करती है। छुआछूत दीमक की तरह होती है जो हमारे देश को अंदर से खोखला कर रही है।

हमारे देश में अनेक समस्याएँ हैं लेकिन छुआछूत बहुत ही भयंकर और घातक सिद्ध होने वाली समस्या है। किसी विद्वान् ने कहा था कि छुआछूत इन्सान और भगवान दोनों के प्रति एक पाप है। छुआछूत एक ऐसा कलंक है जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि मेरा कोई अपना देश ही नहीं है जिसे मैं अपना देश कहता हूँ उस देश में हमारे साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता है।

छुआछूत का अर्थ : छुआछूत का अर्थ होता है – जो स्पर्श करने योग्य न हो। जब किसी व्यक्ति के समूह या समुदाय को अस्पर्शनीय माना जाता है और उसके हाथ की छुई हुई वस्तु को कोई नहीं खाता उसे छुआछूत कहते हैं। उन लोगों के साथ कोई भी मिलजुल कर नहीं रहता और न ही उनके साथ कोई खाना खाता है।

जिन लोगों से निचली जाति का काम करवाया जाता है उन्हें अछूत कहा जाता है। प्राचीनकाल में महाराजाओं के द्वारा किसी व्यक्ति के व्यवसाय क देखकर ही उसके धर्म की स्थापना की गई थी। उस समय पर हर किसी ने अपने धर्म को खुद चुना था। ब्राह्मण लोगों को शिक्षा देते थे , क्षत्रिय देश और समाज की रक्षा किया करते थे।

वैश्यों का काम व्यापार और वाणिज्य की देखभाल करना और शूद्रों का काम ऊपर की तीन जातियों की सेवा करना था। लेकिन कालान्तर में ये विभाजन रूढ़ हो गया था। एक वेद में भी कहा गया है कि मैं एक शिल्पी हूँ। मेरे पिता वैश्य हैं और मेरी माँ उपले थापने का काम करती हैं। प्राचीनकाल में एक ही परिवार के लोग अलग-अलग काम करते थे फिर भी वे ख़ुशी से रहते थे। उन लोगों में उंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं था।

भारत के अछूत लोग : हमारे भारत में हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के अनुसार चार जातियाँ हैं – ब्राह्मण , क्षत्रिय , सैनिक , शुद्र आदि। जो लोग हरिजन जाति मतलब दबी हुई जाति के होते हैं उन्हें अछूत कहते हैं। अछूत लोगों को हिन्दू की वर्ण-व्यवस्था की जातियों में नहीं गिना जाता हैं। अछूत लोगों को बहिष्कृत जाति का व्यक्ति समझा जाता है।

अछूतों को हिन्दू की जाति व्यवस्था में नहीं गिना जाता है। अछूत वर्ण एक अलग पांचवां वर्ण स्थापित किया गया है। प्राचीनकाल में जो लोग घटिया स्तर का काम करते थे या निचली जाति के लोग जो नौकरों का काम करते थे वे अपराधी होते थे और जिन लोगों को छूत की बीमारी होती थी वे लोग देश से बाहर ही रहते थे।

जो लोग सभ्य होते थे वो लोग उन लोगों को ही अछूत कहते थे। ऐसे लोगों से दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया जाता था क्योंकि यह बीमारी छूने से होती थी। उस समय पर छूत बीमारी वाले लोग दूसरे लोगों के लिए बहुत ही हानिकारक होते थे।

उस समय इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं था इसी वजह से छूत लोगों को दूसरे लोगों को स्वस्थ रखने के लिए उस राज्य से दूर भेज दिया जाता था ताकि यह बीमारी किसी और को ना हो। छुआछूत एक तरह का दंड होता है जो उन लोगों को दिया जाता था। जो लोग राज्य के बनाए हुए कानूनों को तोड़ता था और समाज की व्यवस्था में एक बाधा पैदा करता था।

जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें दलित कहा जाता है। उन्हें इस नाम से इसलिए बुलाया जाता है क्योंकि जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें भी अछूत ही माना जाता है। सफाई , चमडा ,स्वच्छता , मृत शरीरों को हटाने वाले लोगों को अछूत माना जाता है।

छुआछूत को दूर करने के प्रयत्न : छुआछूत को एक बुराई के रूप में समाज ने स्वीकार किया है जिसको दूर करने के लिए प्राचीनकाल से ही कोशिशें की जा रही हैं। बहुत से महापुरुषों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन फिर भी यह समस्या वैसी की वैसी बनी रही। महात्मा बुद्ध ने इसके खिलाफ सशक्त आवज उठाई थी।

रामायण को दिखाकर इस भेदभाव को समाप्त करने की भी कोशिश की गई। उन्हें श्री राम के गुहराज , शबरी और भीलों के संग मेल-मिलाप की बातें बताई गयीं। सबसे पहले तो दयानन्द जी ने छुआछूत को खत्म करने की जिम्मेदारी ली थी। एक तरफ तो उन्होंने मूल हिन्दुओं को हिन्दू बनाया था दूसरी तरफ उन्हें अछूत कहकर गले से लगाया था।

आर्य समाज में भी अछूतोद्धार शब्द का प्रयोग किया गया था। वे खुद जाकर हरिजन बस्ती में रहे थे जिसका अर्थ होता है भगवान का प्यारा व्यक्ति। हरिजन में रहने वाले लोगों के लिए भीम राव अंबेडकर ने बहुत ही उत्थान काम किया था उससे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।

युवाओं के विचारों को बदला जा रहा है और भी चीजों में धीरे-धीरे परिवर्तन किये जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा और वैश्वीकरण से भी युवाओं की सोच को बदला जा रहा है इसे धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से सोच को बदला नहीं गया है।

जब संविधान का निर्माण किया गया था तब यह निर्धारित किया गया था कि समाज में फैली बुराईयों का उन्मूलन करने के लिए पिछड़ी जातियों के उत्थान में संविधान में प्रावधान किये जायेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान में अनुच्छेद 17 बनाया गया था।

अछूतों के साथ भेदभाव : भारत के दलितों के साथ एन.सी.डी.एच.आर.के अनुसार बहुत भेदभाव किया जाता है। अछूत लोगों के साथ कोई भी भोजन नहीं कर सकता। कोई भी किसी अलग जाति के सदस्य से शादी नहीं कर सकता। गांवों में चाय की दुकानों पर अछूत लोगों के लिए अलग बर्तन होते हैं।

अछूत लोग मंदिरों में नहीं जा सकते। अछूत लोगों को सार्वजनिक रास्ते पर चलना मना होता है। अछूत बच्चों को स्कूलों में अलग बैठाया जाता है। अछूतों के लिए होटलों में बैठने के लिए और खाने के लिए अलग बर्तनों की व्यवस्था होती है। अछूतों के लिए गांवों के कार्यक्रम या त्यौहारों में बैठने और खाने के लिए अलग व्यवस्था होती है।

जब अछूत लोग अपना काम करने से मना कर देते हैं तो समाज से उनका बहिष्कार कर दिया जाता है। अछूत लोगों को उच्च जाती के लोगों के सामने छाता लगाना और चप्पल पहनना मना है। अछूत लोगों के लिए अलग शमशान बनाया गया है। उनसे कोई अन्य जाति का सदस्य दोस्ती नहीं कर सकता।

वर्तमान युग में छुआछूत के बने रहने के कारण :- आज भी हमारे समाज में जाति और जन्म के बीच आज भी भेदभाव किया जाता है। आज भी हम देख सकते हैं कि गाँव और कस्बों के लोगों में छुआछूत का व्यवहार किया जाता है। आज के युग में भी अछूत लोगों को पनघटों और मन्दिरों में जाने से रोका जाता है। उनके रहने के लिए जगह भी अलग दी जाती है।

आख़िरकार ये कुप्रथा अब तक किस प्रकार से बनी हुई है ? शहरों में जो लोग कूड़ा बीनते हैं उन लोगों को भी अछूतों की नजर से देखा जाता है। बुराई हिन्दू समाज के लोगों में बहुत ही गहराई तक पहुंच गई है इसी वजह से आजादी के बाद भी आज तक ये समस्या अलग-अलग तरह से समाज में बनी हुई है।

जो लोग छुआछूत में विश्वास रखते हैं उनके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाई की जाती है क्योंकि छुआछूत के खलिफ कानून बनाए गये हैं। ऐसा करने से भी छुआछूत की समस्या खत्म नहीं हो रही है। इस प्रथा के अब तक बने रहने का सबसे बड़ा कारण हमारे देश में उचित शिक्षा का न होना है। जो लोग अछूत समझे जाते हैं वे लोग आज भी अशिक्षित और रूढ़ग्रस्त होते हैं।

उन के पास अभी तक अन्य ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुँचा है। हम लोग प्राय देखते हैं कि जो हरिजन लोग शिक्षा को प्राप्त करते हैं वे अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार लेते हैं और उन्हें अछूत नहीं माना जाता है। अछूतों की आर्थिक स्थिति भी एक प्रकार से छुआछूत की समस्या का एक बहुत ही मुख्य कारण है।

छुआछूत के दुष्परिणाम : सारे जगत में छुआछूत के सामाजिक , राजनितिक , धार्मिक और संस्कृतिक दुष्परिणाम बहुत ही प्रचलित हैं। आज के युग में हमारा देश आगे तो बढ़ रहा है पर फिर भी छुआछूत की समस्या की वजह से देश के एक बहुत बड़ा भाग को सुख-सुविधाओं से अभी तक परिचित नहीं कराया गया है।

जो हरिजन गाँव में रहते हैं उनके पास जीवन को जीने के लिए सुविधाएँ बहुत ही कम होती हैं। हमारे देश में गरीबी का एक कारण छुआछूत भी है। जब तक अच्चुत लोगों को समाज की मुख्यधारा में स्थान नहीं मिल जाता तब तक देश का समुचित विकास कभी नहीं हो सकता है।

हमारा देश कई साल पहले आजाद हो चूका है लेकिन हरिजन वर्ग आज तक राजनितिक ,आर्थिक और सामाजिक रूप से आजाद नहीं हो पाया है। हम लोगों से समय यह मांग करता है कि छुआछूत को समाप्त कर दिया जाये। प्राचीनकाल में लोग यह मानते थे की अगर अछूत लोग उन्हें छू लेते या फिर उनकी परछाई भी उन पर पड़ जाती थी तो वे अपवित्र हो जाते हैं और दोबारा से पवित्र होने के लिए उन्हें गंगा जल से स्नान करना पड़ता है।

उपसंहार :- आज के युग में भी छुआछूत की समस्या हमारे लोगों के बीच की दीवार बनी हुई है। आज के समय में भी कुछ लोग अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ , उच्च और योग्य समझते हैं। हरिजन वर्ग के लोगों पर आज भी अत्याचार किया जाता है उनके साथ जानवरों से भी बुरा बरताब किया जाता है।

जब चुनाव होते हैं तो लोगों को अपने मत को स्वंय चुनने का अधिकार नहीं दिया जाता है। आज भी बंधुआ मजदूर के रूप में बहुत से लोग अमीरों के दास बने हुए हैं। हमारी सरकार अछूतों की आर्थिक स्थिति को सुधरने के लिए अनेक प्रयास कर रही है। जो लोग अछूत माने जाते हैं उन्हें भी अपनी तरफ से कुछ प्रयास करने चाहिए। जब तक वे शिक्षित नहीं हो जाते तब तक उनका सुधार होना असंभव है।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

अस्पृश्यता या छूआछूत परम्परागत हिन्दू समाज से जुड़ी सामाजिक बुराई और एक गंभीर खतरा है। ये बहुत से समाज सुधारकों के विभिन्न प्रयासों के बाद भी जैसे डॉ. भीमराव अंबेडकर और उनके द्वारा निर्मित संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन के बावजूद ये अति प्राचीन समय से प्रचलित प्रथा आज भी प्रचलन में है।

छूआछूत (अस्पृश्यता) क्या है?

अस्पृश्यता या छूआछूत एक सामान्य शब्द है जिसे अभ्यास द्वारा समझा जा सकता है जहाँ एक विशेष जाति या वर्ग के व्यक्ति को निम्न जाति में जन्म लेने या उस निचली जाति समूह से संबंध रखने के कारण उस समूह से निचले स्तर के कार्यों को कराकर भेदभाव किया जाता है। उदाहरण के लिये; तथाकथित ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उच्च जाति के लोग भंगी के साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते।

ये मान्यता है कि अस्पृश्य या अछूत लोगों से छूने, यहाँ तक कि उनकी परछाई भी पड़ने से उच्च जाति के लोग अशुद्ध हो जाते है और अपनी शुद्धता वापस पाने के लिये उन्हें पवित्र गंगा-जल में स्नान करना पड़ता है।

भारत में अस्पृश्य या अछूत कौन है?

हिन्दूओं की परंपरागत प्राचीन “वर्ण-व्यवस्था” के अनुसार, एक व्यक्ति का जन्म कर्म और ‘शुद्धता’ के आधार पर चारों में से किसी एक जाति में होता है। जिनका जन्म ब्राह्मण वर्ण में होता है वो पुजारी या शिक्षक होता है, क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाला शासक या सैनिक; वैश्य वर्ण में जन्म लेने वाला व्यापारी और शूद्र वर्ण में जन्म लेने वाला मजदूर होता है।

अछूत सचमुच बहिष्कृत जाति है। वो किसी भी हिन्दूओं की परंपरागत “वर्ण व्यवस्था” में सीधे रुप से गिनती में नहीं आते। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार, अछूत पूरी तरह से नया वर्ग है उदाहरण के तौर पर पहले से स्थापित चार वर्णों से अलग पांचवां नया वर्ण है। इस प्रकार, अछूत हिन्दूओं की जाति व्यवस्था में पहचाने नहीं जाते।

हांलाकि, ऐतिहासिक रुप से निचले स्तर के व्यक्ति जो घटिया निम्न स्तर के नौकर-चाकर वाले कार्य करते थे, अपराधी, व्यक्ति जो छूत (छूने से फैलने वाली बीमारी) की बीमारी से पीड़ित होते थे, वो समाज से बाहर रहते थे, उन्हें ही सभ्य कहे जाने वाले नागरिकों द्वारा अछूत माना जाता था। उस समय उस व्यक्ति को समाज से निष्काषित इस आधार पर किया जाता था कि वो समाज के अन्य लोगों के लिये हानिकारक है, उसकी बीमारी छूने से किसी को भी हो सकती है और उस समय में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं था जिसकी वजह से उसे समाज से बाहर अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा के लिये रखा जाता था।

अस्पृश्यता दंड़ के रुप में भी दी जाने वाली प्रथा थी जो उन व्यक्तियों को दी जाती थी जो समाज के बनाये हुये नियमों को तोड़कर समाजिक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करते थे।

दलित कौन है?

दबी हुई जाति (दबाब में जीने वाले), हरिजनों आदि को अस्पृश्य या अछूत के रुप में जाना जाता है; लेकिन आज उन्हें दलित कहा जाता है। आधुनिक समय में, दलित, एक व्यक्ति के स्तर की अपेछा उसकी जाति को संबोधित किया जाता है। ऐसा उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अस्पृश्य कहे जाने वाले, घटिया काम करने वाले व्यक्ति के घर या उससे संबंधित किसी भी सदस्य के घर में पैदा होते है। ऐसा सिर्फ इसलिये कहा या किया जाता है कि उनके परिवार का सदस्य अछूत था तो पंपरागत रुप से उससे जुड़ा हर व्यक्ति या समुदाय भी उसी श्रेणी में आयेगा। वो अपवित्र और दूषित माने जाते है जिसके कारण शारीरिक और सामाजिकता से बाकि के समाज से निष्काषित करके पृथक या अलग रखे जाते है।

आजकल अनुसूचित जाति या जनजाति (एस.सी/एस.टी.) के सदस्यों को ‘दलित’ माना जाता है और उन्हें समाज में विभिन्न प्रकार के भेदभावों का विषय बनाया जाता है। विशेषरुप से अनुसूचित जाति जैसे चमार, पासी और भंगी को दलित के रुप में माना जाता है, ये लोग सामान्यतः निकृष्ट (निचले स्तर के काम) कामों जैसे गंदगी साफ करना, चमड़े से चीजें बनाने का काम करना, झाड़ू लगाना, कूड़े या कचरे से काम की चीजें खोजकर बेचना आदि को करते है।

 

दलित या अस्पृश्यों के साथ भेदभाव के प्रकार

नेशनल कैंपेन ऑफ दलित ह्यूमैन राइट्स (एन.सी.डी.एच.आर.) के अनुसार, भारत में दलितों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के भेदभावों को किया जाता है जो निम्न है:

  • अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करना निषेध।
  • किसी अन्य जाति के सदस्य के साथ शादी करना निषेध।
  • गाँवों में चाय के ठेलो पर दलितों के लिये चाय के अलग गिलास।
  • होटलों में बैठने की व्यवस्था में भेदभाव और खाने के लिये अलग बर्तन।
  • गाँवों में त्यौहारों और कार्यक्रमों में बैठने और खाने की अलग व्यवस्था।
  • मन्दिरों में प्रवेश पर निषेध।
  • शासित जाति के व्यक्तियों के सामने पैरों में चप्पल पहनने और छाता लगाने पर निषेध।
  • गाँवों में सार्वजनिक रास्ते पर चलना निषेध।
  • अलग शमशान (जहाँ मरे हुये व्यक्तियों को जलाया जाता है।)।
  • स्कूलों में दलित बच्चों के लिये अलग बैठने की व्यवस्था।
  • अपने कामों को करने से मना कर देने पर शासित जातियों द्वारा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन

भारत को 100 वर्षों के लम्बे दर्दनाक संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। ये संघर्ष केवल विदेशी ब्रिटिश शासन के ही खिलाफ नहीं था बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक बुराईयों जैसे छूआछूत के खिलाफ भी था। आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम के महान नेताओं ने संविधान का निर्माण करते समय निर्धारित किया कि समाज में फैली बुराईयों के उन्मूलन के संदर्भ में और पिछड़ी जातियों के उत्थान आदि के लिये संविधान में प्रावधान किया जाये।

इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुये अनुच्छेद 17 को संविधान में जोड़ा गया, जिसमें निम्न प्रावधान किये गये थे:

“अस्पृश्यता” का उन्मूलन हो और किसी भी तरह से इसे व्यवहार में लाने की अनुमति नहीं है। “अस्पृश्यता” के नाम पर किसी भी तरह का भेदभाव को अपराध मानते हुये कानून के अन्तर्गत दंड दिया जायेगा।”

इस प्रकार, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन करते हुये किसी भी रुप में अपनाने की अनुमति नहीं देता। साथ ही, ये इसे एक अपराध मानते हुये संसद में बनाये गये कानूनों के अन्तर्गत दंड का भी प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 17 को संविधान में मान्यता प्रदान करने के लिये संसद में अस्पृश्यता अधिनियम 1955 पारित किया गया था। ये अधिनियम हर तरह से भेदभावों को करने पर दंड का प्रावधान करता है, यद्यपि इसके लिये निर्धारित किया गया दंड कम होने के साथ ही इसका वास्तविकता में बहुत कम ही प्रयोग किया जाता है।

 

अस्पृश्यता या छूआछूत अधिनियम 1955 के क्रियान्वयन में बहुत की कमियाँ और बचने के तरीके थे जिसके कारण सरकार ने इसमें 1976 में संशोधन करके इसके दंड को और भी अधिक कठोर कर दिया। ये अधिनियम नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम में परिवर्तित कर दिया।

हांलाकि, अस्पृश्यता का खतरा लगातार बना हुआ है और दलितों के साथ आज भी भेदभाव किया जा रहा है, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सोचनीय है, उन्हें बहुत से नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं है और इसके साथ ही वो अनेक अपराधों, अपमान और तिरस्कार के विषय है।

इसके साथ ही समाज के दलित वर्ग के साथ हिंसा को रोकने के लिये संसद ने ‘अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम 1989 (हिंसात्मक निषेधता)’ को पारित किया। ये अधिनियम दलितों के साथ भेदभाव व हिंसा को रोकने के लिये और भी अधिक विस्तृत व दंडात्मक साधन उपलब्ध कराता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य दलितों को भारतीय समाज में सम्मान के साथ शामिल करना था।

ये ऊपर वर्णित अधिनियम दलितों/अस्पृश्यों के साथ होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिये अच्छे लक्ष्य और सकारात्मक उद्देश्य के साथ बनाये गये थे लेकिन वास्तविकता में ये अधिनियम उम्मीदों पर खरे उतरने में फेल हुये है।

अस्पृश्यता या छूआछूत: वर्तमान परिदृश्य

हमारे समाज में जाति और जन्म की श्रेष्ठा की भावना आज भी उपस्थित है। हम अपने जीवन में प्रतिदिन चारों तरफ के वातावरण में विशेषरुप से ग्रामीण और कस्बों में छूआछूत के व्यवहार का अनुभव करते है। यहाँ तक कि बड़े शहरों में भी कूड़े बीनने वालों से आज भी अमानवता का व्यवहार किया जाता है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पी.टी.आई.) की 3 जनवरी 2014 की सूचना के अनुसार, कर्नाटक पुलिस ने 4 चाय विक्रेताओं को छूआ-छूत को व्यवहार में लाने के लिये गिरफ्तार किया, वो हिन्दू और एस.सी. और एस.टी. जाति के लोगों को चाय देते समय अलग-अलग तरह के कपों का प्रयोग करते थे। ये घटना दिखाती है कि ये बुराई हिन्दू समाज में इतनी गहराई तक पहुँची हुई है कि आजादी के 67 साल के बाद भी अलग-अलग रुपों में उपस्थित है।

हांलाकि, ये कहा जाता है कि चीजें धीरे धीरे बदलती है; आधुनिक युवाओं की सोच में भी परिवर्तन हुआ है। आज के युवाओं की आधुनिक शिक्षा और वैश्विकरण के परिदृश्य ने सामाजिक स्तर पर समानता के विभिन्न आयामों पर सोच को बदला है और न कि धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से।

उम्मीद यही है कि अस्पृश्यता या छूआछूत की दुष्ट प्रथा समाज से बहुत जल्द खत्म हो जायेगी जिसके बाद हमारा देश सामाजिक समानता और भाईचारे के नये युग का प्रतिनिधिकर्ता होगा जो गाँधी और अंबेडकर का वो सच्चा भारत होगा जिसकी कल्पना उन्होंने आजादी और संविधान का निर्माण करने के समय की थी।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने पिछले दिनों मंदिरों में दलितों के प्रवेश निषेध को उचित ठहराते हुए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बयान का समर्थन किया है। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पिछले कुछ समय से मंदिरों में साई बाबा की पूजा-अर्चना का विरोध कर रहे हैं। वे मंदिरों से साई बाबा की मूर्तियों को हटाने की मुहिम में जुटे हैं। अब पुरी के शंकराचार्य का कहना है कि मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। ऐसी मानसिकता की प्रेरणा क्या है? द्वारका पीठ के शंकराचार्य जहां लोगों की आस्थाओं को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं पुरी के शंकराचार्य इस सनातनी राष्ट्र की बहुलतावादी मान्यताओं को कलंकित करने का प्रयास कर रहे हैं।

8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर आदि अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। हिन्दू परम्परा, दर्शन और चिंतन के प्रचार-प्रसार में चार पीठों, उत्तर में जोशी मठ, दक्षिण में शृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारका पीठ का अत्यंत महत्व है। स्वाभाविक प्रश्न है कि जिन संतों पर समाज को आध्यात्मिक राह दिखाने की जिम्मेदारी है, वे किस काल खंड में जी रहे हैं? वे किस शास्त्र के आधार पर 21वीं सदी के समाज को संचालित करने का प्रयास कर रहे हैं? ऐसा यदि किसी शास्त्र और स्मृति में है भी तो वह कालबद्ध है और उसकी कोई प्रासंगिकता शेष नहीं रह गई है।

यह सही है कि भारतीय समाज में अनेक कुरीतियां रही हैं, किन्तु उन कुरीतियों को दूर करने के लिए अनेकों सुधारवादी सद्प्रयास हुए। रामायण के रचयिता वाल्मीकि दलित थे। आज उनके द्वारा सृजित रामायण और उसके साथ तुलसीकृत रामायण हर हिन्दू परिवार में पूर्ण आस्था और श्रद्धा के साथ पढ़ी जाती है। समाज में जातिपात और छुआछूत के लिए मनुस्मृति का उदाहरण दिया जाता है। कितने हिन्दुओं ने मनुस्मृति का अध्ययन किया होगा या कितने हिन्दू घरों में मनुस्मृति रखी जाती है? मनुस्मृति का उदाहरण देकर यह कहा जाता है कि परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैर से शूद्र की उत्पत्ति हुई। फिर सारे मांगलिक अनुष्ठानों में भगवान के चरणों में ही जल, पुष्प, नैवेद्य क्यों अर्पित किया जाता है? वास्तव में देखा जाए तो हिन्दू समाज में जो कुरीतियां थीं, उसे पोषित कर समाज को तोडऩे का काम विधर्मियों ने किया। ब्रिटिश शासकों ने उसे ही अपना गुरुमंत्र बनाया और समाज को जातियों में बांटकर अपने शत्रुओं को निस्तेज करने का काम किया।

जिस पुरी के स्वामी निश्चलानंद सरस्वती पीठाधीश हैं, उसी पुरी के जगन्नाथ धाम को विधर्मियों ने 18 बार लूटा है। इसमें से 17 हमले 14वीं सदी से 18वीं सदी में हुए। स्वाभाविक रूप से उस पुरी के पीठाधीश को समाज को जोडऩे का काम करना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है। इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्वित है। इसे लेकर मंदिर प्रबंधन की लंबे समय से आलोचना भी होती रही है। संत कबीर को भी पुजारी ने मुस्लिम मानते हुए उनके मंदिर-प्रवेश की मनाही की थी। गुरु नानक देव तीर्थाटन करते हुए जब पुरी पहुंचे तो उनके साथ भी पहले यही व्यवहार हुआ क्योंकि उनके साथ मुस्लिम शिष्य मर्दाना थे। कहा जाता है कि बाद में पुरी के गजपति राजा को स्वप्न आया जिसमें स्वयं भगवान ने कहा कि दोनों मेरे परम भक्त हैं तो संत कबीर और गुरु नानक देव जी को पूर्ण सम्मान के साथ प्रभु दर्शन के लिए ले जाया गया।

ब्रितानियों ने अपने साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए भारतीय समाज को जाति और वर्गों में बांटने की नीति अपनाई। पुरी मंदिर की इस विकृति के बारे में जब ब्रितानियों को खबर लगी तो उन्होंने फौरन इसे वैधानिक स्वीकृति दे दी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेस्ले ने अपने कमांडिंग अफसर कर्नल कैंपबेल को पुरी कूच करने से पूर्व ‘ब्राह्मणों के धार्मिक पूर्वाग्रहों’ का पूर्ण ध्यान रखने के कड़े निर्देश दिए थे। उनकी कूटनीति काम कर गई। ब्रिटिश फौज जब पुरी पहुंची तो उसे कहीं से किसी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति पर चलते हुए उन्होंने गैर-हिन्दुओं के मंदिर प्रवेश पर निषेध की जो परम्परा थी, उसे 1809 में कानूनी जामा पहना दिया।

आजादी के बाद परिस्थितियां बदलनी चाहिएं थीं किन्तु न केवल पुरी, बल्कि कई अन्य जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं। सभ्य समाज के लिए इस तरह का सामाजिक भेदभाव कलंक है। किन्तु हमारे यहां स्वयं समाज के अंदर से ही सुधार की आवाजें समय-समय पर उठती रही हैं। सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने के लिए गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, गांधी जी, डा. केशव बलिराम हेडगेवार, वीर सावरकर, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, संघ परिवार आदि करते आए हैं। मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर डा. भीमराव अम्बेदकर और वीर सावरकर ने सार्थक आंदोलन किए। सावरकर ने रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर की स्थापना की। नारायण गुरु और ज्योतिबा फूले आदि दलित थे और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुखर रहे।

हिन्दू समाज में भेदभाव और अलगाववाद का फायदा विधर्मियों को होता रहा है। जब अपने ही समाज में तिरस्कार और भेदभाव के शिकार व्यक्ति को छलावा या अन्य प्रलोभन के बल पर दूसरे मत के प्रचारक सम्मान देने का भरोसा देते हैं तो स्वाभाविक रूप से उस मत के प्रति प्रताडि़त व्यक्ति का आकर्षण भी बढ़ता है। शोषित और वंचित आदिवासी समाज में चर्च की दखल सामाजिक कार्य के लिए नहीं है। वह समाज में फैले भेदभाव का फायदा उठाकर अपने विस्तार और अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने में अपना ध्यान केन्द्रित रखे हुए है। निश्चलानंद सरस्वती जैसे विचारक वस्तुत: चर्च के मतांतरण अभियान में परोक्ष रूप से सहायक ही बनते हैं।

निश्चलानंद सरस्वती को आदि शंकराचार्य से जुड़ी एक घटना याद होगी। काशी में आदि शंकराचार्य स्नान व मंदिर जाने को निकले तो रास्ते में एक अछूत अपनी पत्नी और 4 कुत्तों के साथ खड़ा मिला। शंकराचार्य के शिष्य उनसे रास्ते से हटने को कहने लगे तो उसने कहा, ‘‘मैं कहां जाऊं? तुम्हारे अद्वैत सिद्धांत के अनुसार हर जीवात्मा परमात्मा है। मैं भला अपने से दूर कैसे जा सकता हूं?’’ आदि शंकराचार्य समझ गए। स्वयं भोलेनाथ उन्हें पाठ देने आए थे।

छुआछूत और भेदभाव का कभी कोई समर्थन नहीं कर सकता और न ही ग्रंथों में कहीं इसका उल्लेख है। उलटे सैंकड़ों प्रेरणादायक प्रसंग हैं। भगवान राम को अपनी नौका में सवार कराने वाला केवट कोई ब्राह्मण नहीं था। वह समाज के उपेक्षित वर्ग से था, किन्तु प्रभु राम ने क्या उसे दुत्कार दिया? नहीं, बल्कि उसे गले लगाया और कहा, ‘‘तुम संग सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।’’ श्री राम के हृदय में जो स्थान भरत के लिए था, वही स्थान केवट को दिया। वनवास काल में श्रीराम का तो अधिकांश समय कोलभीलों, वानरों के साथ गुजरा। उन्होंने गिद्धराज से मित्रता की, जो मांसाहारी था। ‘‘गीध अधम खग आमिश भोगी। गति दीन्हि जेहि याचत योगी,’’ उन्होंने गिद्धराज का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया।

शबरी के आश्रम में जब श्रीराम गए तो उसने अपना परिचय देते हुए कहा कि एक तो मैं कोलभील आदिवासी, ऊपर से अभागी नारी हूं। मैं बुद्धिहीन हर तरह से अधम हूं, किन्तु श्रीराम न केवल उसके भक्ति भाव से प्रसन्न हुए, बल्कि उसके जूठे बेर भी खाए। साधु-संतों का काम समाज को सही दिशा में प्रेरित करना है। इस बात में दो राय नहीं कि भारतीय समाज में अभी भी कई बुराइयां हैं और उसे दूर करने में साधु-संत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

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दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

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दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध (Dahej Pratha In Hindi) :

भूमिका : मानवीय समाज में विकास और सामाजिक जीवन की शुरुआत के लिए विवाह को एक पावन और अनिवार्य बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है। वैवाहिक जीवन में नर-नारी एक दुसरे के पूरक बनकर जीवन को और मधुर बनाते हैं और भारतीय संस्कृति में जो पितृ ऋण होता है उसे वंश वृद्धि के रूप में बढ़ाते हैं।

एक पुरुष के जीवन में स्त्री के शीतल जल की तरह होती है जो उसके जीवन को अपने प्यार और सहयोग से सुखी और शांतिपूर्ण बनाती है। लेकिन आज भारत के समाज में जो अनेक कुरीतियाँ फैली हुई हैं वो सब भारत के गौरवशाली समाज पर एक कलंक के समान हैं।

जाति , छूआछूत और दहेज जैसी प्रथाओं की वजह से ही विश्व के उन्नत समाज में रहने पर भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। समय-समय से कई लोग और राजनेता इसे खत्म करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इसका पूरी तरह से नाश नहीं हो पाया है। दहेज प्रथा दिन-ब-दिन और अधिक भयानक होती जा रही है।

जब हम समाचार पत्रों को पढ़ते हैं तो हमें ज्यादातर ऐसी खबरे मिलती हैं जैसे – सास ने बहु पर तेल छिडककर आग लगा दी , दहेज न मिलने की वजह से बारात लौटाई , स्टोव फट जाने की वजह से नवविवाहित स्त्री की मृत्यु हो गई। जब हम इन समाचारों को विस्तार से पढ़ते हैं तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कभी-कभी हम यह सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि क्या कोई मनुष्य सच में इतना निर्मम और जालिम हो सकता है ?

दहेज प्रथा : दहेज शब्द अरबी भाषा के जहेज शब्द से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ होता है सौगात। साधारणतया दहेज का अर्थ होता है – विवाह के समय दी जाने वाली वस्तुएँ। जब लडकी का विवाह किया जाता है तो वर पक्ष को जो धन , संपत्ति और सामान दिया जाता है उसे ही दहेज कहते हैं।

हमारे समाज के अनुसार विवाह के बाद लडकी को माता-पिता का घर छोडकर पति के घर जाना होता है। इस समय में कन्या पक्ष के लोग अपना स्नेह दर्शाने के लिए लडकी , लडकों के संबंधियों को भेंट स्वरूप कुछ-न-कुछ अवश्य देते हैं।

दहेज प्रथा का आरम्भ : ऐसा लगता है जैसे की यह प्रथा बहुत ही पुरानी है। प्राचीन काल से हमारे भारत में इस कथा का चलन होता आ रहा है। हमारे भारत में कन्यादान को एक धार्मिक कर्म माना जाता है। दहेज प्रथा का वर्ण हमारी लोक कथाओं और प्राचीन काव्यों में भी देखा जा सकता है।

प्राचीनकाल में बेटी को माता-पिता के आशीर्वाद के रूप में अपनी समर्थ शक्ति के अनुसार वस्त्र , गहने , और उसकी गृहस्थी के लिए सामान भेंट में दिया जाता था। इस दहेज का उद्देश्य वर वधु की गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाना था। प्राचीनकाल में लडकी का मान-सम्मान ससुराल में उसके व्यवहार और संस्कारों के आधार पर तय किया जाता था न कि उसके लाए हुए दहेज पर।

सात्विक रूप : दहेज को एक सात्विक प्रथा माना जाता था। जब पुत्री अपने पिता के घर को छोडकर अपने पति के घर जाती है तो उसके पिता का घर पराया हो जाता है। उसका अपने पिता के घर पर से अधिकार खत्म हो है। अत: पिता अपनी संपन्नता का कुछ भाग दहेज के रूप में विदाई के समय अपनी पुत्री को दे देता है।

दहेज में एक और सात्विक भावना भी है। दहेज का एक सात्विक रूप कन्या का अपने घर में श्री समृद्धि की सूचक बने। उसके खाली हाथ को पतिगृह में अपशकुन माना जाता है। इसी वजह से वः अपने साथ कपड़े , बर्तन , आभूषण और कुछ ऐसे प्रकार के पदार्थों को साथ लेकर जाती है।

विकृत रूप : दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वास्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौन्दर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।

आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली-बोली जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।

इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।

इसी वजह से लडकी की ख़ुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है। आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।

दहेज प्रथा के कारण : एक तरफ जहाँ पर वर पक्ष के लोगों की लोभी वृत्ति ने भी इस कुरीति को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है। दूसरी जगह पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने बहुत कालाधन कमाया जिसकी वजह से वे बढ़-चढकर दहेज देने लगे। उनकी देखा-देख निर्धन माता-पिता भी अपनी बेटी के लिए अच्छे वर ढूंढने लगे और उन्हें भी दहेज का प्रबंध करना पड़ा।

दहेज का प्रबंध करने के लिए निर्धन माता-पिता को बड़े-बड़े कर्ज लेने पड़े , अपनी संपत्ति को बेचना पड़ा और बहुत से कठिन परिश्रम करने पड़े लेकिन फिर भी वर पक्ष की मांगें बढती ही चली गयी । दहेज प्रथा का एक सबसे प्रमुख कारण यह भी है कि लडकी को कभी बराबर ही नहीं समझा गया।

वर पक्ष के लोग हमेशा यह समझते हैं कि उन्होंने कन्या पक्ष पर कोई एहसान किया है। यही नहीं वे विवाह के बाद भी लडकी को पूरे मन से अपने परिवार का सदस्य स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से वे बेचारी सीधी-साधी , भावुक , नवविवाहिता को इतने कठोर दंड देते हैं।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम : दहेज प्रथा की वजह से ही बाल विवाह , अनमेल विवाह , विवाह विच्छेद जैसी प्रथाओं ने फिर से समाज में अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया है। दहेज प्रथा की वजह से कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही हैं इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।

जन्म से पहले ही गर्भ में लडकी और लडकों की जाँच की वजह से लडकियों को गर्भ में ही मरवा देते हैं जिसकी वजह से लडकों और लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है। लडकियों के माता-पिता दूसरों की तरह दहेज देने की वजह से कर्ज में डूब जाते हैं और अपनी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देते हैं।

लडके वाले अधिक दहेज मांगना शुरू कर देते हैं और दहेज न मिलने पर नवविवाहिता को तंग करते हैं और उसे जलाकर मारने की भी कोशिश करते हैं। कभी-कभी लडकी यह सब सहन नहीं कर पाती है और आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती है या फिर तलाक देने के लिए मजबूर हो जाती है।

दहेज न होने की वजह से योग्य कन्या को अयोग्य वर को सौंप दिया जाता है। जो कन्याएं योग्य होती हैं वे अपने धन के बल पर योग्य वरों को खरीद लेती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए गैर क़ानूनी काम भी करने से पीछे नहीं हट पाते हैं। आज के समय में लडकों और लडकियों की खुले आम नीलामी की जाती है।

आज के माता-पिता अपने सरकारी , अधिकारी और इंजीनियर लडके को लाखों से कम में नीलाम नहीं करते हैं जिसकी वजह से अनेक सामाजिक कुरीतियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। रोज समाचार पत्र और पत्रिकाओं में पढ़ा जाता है कि दहेज न मिलने की वजह से लडकी पर उसके ससुराल वालों ने अमानवीय और क्रूर अत्याचार किये जिसकी वजह से आधुनिक पीढ़ी बहुत अधिक प्रभावित होती है।

उन्हें देखने को मिलता है कि स्टोव फटना , आग लगना , गैस या सिलिंडर से जलना यह सब कुछ सिर्फ नवविवाहिताओं के साथ ही होता है। आज की नारी जागृत , समानता , वैज्ञानिक दृष्टि , प्रगति और चहुमुखी विकास के इस युग में अपनी वास्तविकता की भावना से हटकर दहेज प्रथा एक तरह से दवाब डालकर लाभ कमाने का एक सौदा और साधन बनकर रह गया है। दहेज अपनी आखिरी सीमा को पार करके एक सामाजिक कलंक बन चूका है।

दहेज प्रथा का समाधान : अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो उसके लिए खुद युवकों को आगे बढना चाहिए। उन्हें अपने माता-पिता और सगे संबंधियों को बिना दहेज के शादी करने के लिए स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। जो लोग नवविवाहिता को शारीरक और मानसिक कष्ट देते हैं युवकों को उनका विरोध करना चाहिए।

दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए नारी का आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होना भी बहुत जरूरी होता है। जो युवती अपने पैरों पर खड़ी होती है उस युवती से कोई भी अनाप-शनाप नहीं कह सकता है। इसके अलावा वह पूरे दिन घर में बंद नहीं रहेगी और सास और नन्द के तानों से भी बच जाएगी।

बहु के नाराज होने की वजह से मासिक आय के हाथ से निकल जाने का डर भी उन्हें कुछ बोलने नहीं देगा। लडकियों को हमेशा लडकों के बराबर समझना होगा और उन्हें भी लडकों जितने ही अधिकार और शिक्षा भी देनी होगी। दहेज की लड़ाई को लड़ने में कानून भी हमारी सहायता कर सकता है।

जब से हमारा देश दहेज निषेध विधेयक बना है तब से वर पक्ष के अत्याचारों में बहुत कमी आ गयी है। दहेज प्रथा की बुराई को तभी खत्म किया जा सकता है जब युवक और युवतियां खुद जाग्रत होंगे। जो लोग दहेज देते और लेते हैं उन पर कड़ी से कड़ी कर्यवाई की जानी चाहिए और उन पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए।

विवाह में अधिक खर्च और अधिक बारातियों को रोकने का विधान था। लेकिन जब कानून को समाज का सहयोग नहीं मिल रहा हो तो कानून भी विवश हो गया है। दहेज प्रथा को सामाजिक चेतना और नैतिक जागृति के माध्यम से खत्म किया जा सकता है। अनेक प्रकार की स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा दहेज प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाकर इसे कम कर सकते हैं।

युवतियां दहेज प्रथा को खत्म करने में विशेष योगदान दे सकती हैं वे अपने माता-पिता को दहेज न देने के लिए प्रेरित करें और लोभी व्यक्तियों से विवाह न करें। लोग दहेज का सख्ती से विरोध करें इसकी वजह से जो लोग दहेज की मांग करते हैं उनमें एक प्रकार से प्रेरणा उत्पन्न हो जायेगा। अगर बिना दहेज के विवाह के लिए उन्हें सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जाये और उन्हें सम्मान और पुरुष्कृत करने से भी समाज में बहुत परिवर्तन किया जा सकता है।

उपसंहार : यह समस्या किसी एक पिता की नहीं बल्कि पुरे राष्ट्र की समस्या है। इसकी वजह से जीवन बगिया नष्ट हो जाती है। दहेज प्रथा हमारे समाज के लिए एक कोढ़ साबित हो रही है। दहेज को खत्म करने के लिए हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। यह हमें यह याद दिलाती है कि हमें अपने आप को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं है।

जिस समाज में दुल्हनों को यातनाएं दी जाती हैं वह सभ्यों का नहीं बल्कि बिलकुल असभ्यों का समाज है। अब ही समय है कि हम सब मिलकर इस कुरीति को उखाडकर अपने आप को मनुष्य कहलाने का अधिकार वापस प्राप्त कर लें। मनुष्य को सभी कठिनाईयों का सामना करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

 

जानिए दहेज प्रथा को विस्तार से: Detailed Introduction to Dowry System:

दहेज प्रथा एक सामाजिक बीमारी है जो की आज कल समाज में काफी रफ़्तार पकडे गति कर रहा है| ये हमारे जीवन के मकसद को छोटा कर देने वाला प्रथा है| ये प्रथा पूरी तरह इस सोच पर आधारित है, की समाज के सर्व श्रेष्ठ व्यक्ति पुरुष ही हें और नारी की हमारे समाज में कोई महत्व भी नहीं है|

इस तरह की नीच सोच और समझ ही हमारे देश की भविष्य पर बड़ी रुकावट साधे बैठे हें|

दहेज प्रथा को भी हमारे समाज में लगभग हर श्रेणी की स्वीकृति मिल गयी है जो की आगे चल के एक बड़ी समस्या का रूप भी ले सकती है |

महात्मा गाँधी ने दहेज प्रथा के बारे में कहा था की

जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरुरी सर्त बना देता है , वह अपने शिक्षा और अपने देश की बदनाम करता है, और साथ ही पूरी महिला जात का भी अपमान करता है | 

ये बात महात्मा गाँधी ने देश की आजादी से पहले कही थी| लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी दहेज प्रथा को निभायी जाती है| हमारे सभ्य समाज के गाल पर इससे बड़ा तमाचा और क्या हो सकता है?

हम सभी ऊँचे विचारों और आदर्श समाज की बातें करते हें, रोज़ दहेज जैसी अपराध के खिलाफ चर्चे करते हें, लेकिन असल जिंदगी में दहेज प्रथा जैसी जघन्य अपराध को अपने आस पास देख के भी हम लोग अनदेखा कर देते हें| ये बड़ी ही शर्म की बात है|

दहेज प्रथा को निभाने वालों से ज्यादा दोषी इस प्रथा को आगे बढ़ते हुए देख समाज में कोई ठोस कदम नहीं उठाने वाले है|

 दहेज प्रथा एक गंभीर समस्या : Dowry System- A Serious Concern:

दहेज प्रथा सदियों से चलती आई एक विधि है जो की बदलते वक़्त के साथ और भी गहरा होने लगा है| ये प्रथा पहले के जमाने में केवल राजा महाराजाओं के वंशों तक ही सिमित था| लेकिन जैसे जैसे वक़्त गुजरता गया, इसकी जड़ें धीरे धीरे समाज के हर वर्ग में फैलने लगा| आज के दिन हमारे देश के प्रयात: परिवार में दहेज प्रथा की विधि को निभाया जाता है|

दहेज प्रथा लालच का नया उग्र-रूप है जो की एक दुल्हन की जिंदगी की वैवाहिक, सामाजिक, निजी, शारीरिक, और मानसिक क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव डालता है, जो की कभी कभी बड़े ही भयंकर परिणाम लाता है|

दहेज प्रथा का बुरा परिणाम के बारे में सोच कर हर किसी का रूह काँपने लगता है, क्यूंकि इतिहास ने दहेज प्रथा से तड़पती दुल्हनों की एक बड़ी लिस्ट बना रखी है| ये प्रथा एक लड़की की सारी सपनो और अरमानो को चूर चूर कर देता है जो की बड़ी ही दर्दनाक परिणाम लाता है |

लगभग देश की हर कोने में ये प्रथा को आज भी बड़े ही बेजिजक निभाया जाता है|

ये प्रथा केवल अमीरों तक ही सिमित नहीं है, बल्कि ये अब मध्य बर्गियों और गरीबों का भी सरदर्द बन बैठा है|

सोचने की बात है की देश में बढती तरक्की दहेज प्रथा को निगलने में कहाँ चूक जाती है? ऊँच शिक्षा और सामाजिक कार्यकर्मों के बावजूद दहेज प्रथा अपना नंगा नाच आज भी पूरी देश में कर रही है| ये प्रथा हर भारतीयों के लिए सच में एक गंभीर चर्चा बन गयी है जो की हमारे बहु बेटियों पर एक बड़ी ही मुसीबत बन गयी है|

दहेज प्रथा के कारण: Causes of Dowry System in Hindi:

दहेज प्रथा समाज की बीमारी है | इस बीमारी ने न जाने कितने ही परिवारों की खुशियों को मिटा दिया है| आज समाज में दहेज प्रथा पूरी तरह अपनी जगह बना चुकी है जो की एक दस्तक है आगे चलते समय के लिए|

दहेज प्रथा को बढ़ावा देने में समाज की ही अहम् भूमिका है | वह समाज ही है जो की दहेज प्रथा की जड़ को मजबूत कर रही है|

दहेज प्रथा की कई कारण हें, जैसे की–

  1.    इ-शादी की विज्ञापन से फैलती दहेज प्रथा-

आज के इन्टरनेट युग में शादी के लिए लड़का-लड़की इन्टरनेट के माध्यम से भी खोजे जाते हें| इस प्रकार की विज्ञापनों में लड़की की परिवार वाले कई बार अच्छे लड़के की आश में अपना स्टेटस और कमाई को ज्यादा बताने की भूल कर बैठते हें, जो की लड़के वालों में कभी कभी लोभ आ जाता है| इस प्रकार की लोभ शादी के बाद मांग में बदल जाते हें, जो की धीरे धीरे दहेज प्रथा को पनपने देता हें| और दहेज की मांग होने लगती है|

2.    समाज में पुरुष प्रधान की लहर से फैलती देहेज प्रथा-

हमारे समाज पुरुष प्रधान है| बचपन से ही लड़कियों की मन में ये बात बिठा दिया जाता है की लडके ही घर के अन्दर और बाहर प्रधान हें, और लड़कियों को उनकी आदर और इज्ज़त करनी चाहिए| इस प्रकार की अंधविश्वास और दक्क्यानूसी सोच  लड़कियों की लड़कों के अत्याचार के खिलाफ अवाज़ उठाने की साहस की गला घूंट देते हें| और इससे बढती है लड़कियों पर अत्याचार और रूप लेता है विभिन्न मांगों की, जो की दहेज प्रथा का रास्ता खोल देता है|

3.     समाज में अपनी झूठी स्टेटस से फैलती दहेज प्रथा-

जी हाँ, चौंकाने वाला पर सच| ऊँचे समाज में आज कल अपना सोशल स्टेटस की काफी कम्पटीशन चल रही है| बेटी की शादी में ज्यादा से ज्यादा खर्च करना, महँगी तोहफे देना, लड़के वालों को मांग से ज्यादा तोहफे देना, आदि लड़के वालों के मन को कई बार छू जाता है| ये आदतें धीरे धीरे लड़की पर दबाव बना देती है| शादी के बाद भी लड़के वालों की इस तरह के तोहफों की लत लग जाती है, जो की धीरे धीरे मांग की रफ़्तार को और आगे ले जाती है| और इसी झूठी शान के चलते हम जाने अनजाने में दहेज प्रथा को पनपने देते हैं|

4 .    लड़की की सुन्दरता या कोई कमी कई बार दहेज की रस्म को निभा जाती है-

कई बार दहेज प्रथा खुद लड़की की माँ बाप की गलती से भी पनपता है| अगर लड़की की सुन्दरता में कोई कमी है या फिर लड़की की किसी भी कमी के कारण शादी में दिक्कत आती है, तो माँ- बाप लड़की की शादी को तुरंत करवाने की आड़ में दहेज देना आरम्भ कर देते हें| और ये बात दहेज प्रथा को हवा देती है|

दहेज प्रथा के कारण तो अनगिनत हैं, लेकिन अब वक़्त आ गया है की हमे कारणों की नहीं, दहेज प्रथा के समाधान के बारे में सोचें|

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम in Hindi: Effects of Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा के परिणाम बहोत ही भयंकर हैं| दहेज प्रथा के कारण गरीब माँ बाप अपनी बेटी की भविष्य को अनसुलझा ही पाते हें|

लड़कियों की शादी के वक़्त दहेज प्रथा अपने सबसे खतरनाक रूप लेती है| शादी या उसके बाद भी जिस घर में दहेज की बू आई, उस घर में दहेज प्रथा के दुष्परिणाम दिखाई देती है| दहेज प्रथा के दुष्परिणाम से हम सब वाकिफ हैं, लेकिन इस कलंक को हम ही बढ़ावा देते हैं|

दहेज प्रथा के बुरे असर हें

  1. दहेज प्रथा के कारण होती लड़कियों के साथ अन्याय:

कई बार दहेज दुल्हन के परिवार पर बहोत ही बुरा प्रभाव डालती है | दहेज के खर्चे पूरा सन्न कर जाति है| लड़की के शादी का माहोल खुशियों भरा नहीं रहता, अपमान और शर्मसार का माहोल बन के रह जाती है| इसी कारण हमारे समाज में लडकीयों को कई बार एक बोझ माना जाता है |

      2. दहेज प्रथा के कारण लड़कियों पर अत्याचार :

शादी के बाद जैसे ही दिन गुजरने लगते हें, वैसे ही दहेज की मांगे बढ़ने लग जाती है| अगर लड़की दहेज लाने के खिलाफ बोलती है तो उस पर शारीरिक, मानसिक अत्याचार किया जाता है | घरोई हिंसा को हवा दिया जाता है | लडकी पर कई तरह के जुर्म किया जाता है ताकि वह अपने माईके से दहेज की बात कर सके|

      3. देहेज प्रथा से बढती लड़का लड़की में अंतर:

दहेज प्रथा के कारण कई घरों मे लड़कियों को उतना मोह और प्यार नहीं मिलता जितना की घर के लड़कों को दिया जाता है| माँ बाप को लड़कियों को आने वाली वक़्त में खर्चा का साधन लगता है, और इसी कारण वह कन्या संतान को कई बार अपने हाल में छोड़ते हें|  इसी तरह लड़का और लड़की में अंतर बनता है |

दहेज़ प्रथा रोकने के उपाय in Hindi:How to Stop Dowry Practice:

दहेज प्रथा हमारे समाज को खोंखला और बेमतलब बना रही है| ये प्रथा हमारे ही जिंदगी को तबाह कर रही है| लेकिन अब वक़्त आ गया है की हमे दहेज प्रथा के खिलाफ एक जूट हो कर अपना आवाज़ बुलंद करना है|

हर समस्या का समाधान उसके अन्दर ही है| इस तरह से दहेज प्रथा का समाधान भी इसी प्रथा में ही है, बस दहेज लेने और देने की आदत को “हाँ” से “ना” में बदलना है|

आइए जानते हें की दहेज प्रथा को कैसे रोकें

दहेज प्रथा को रोकने के लिए हम ही सबसे बड़ा और कामयाब कदम उठा सकते हें |

दहेज प्रथा को पूरी तरह मिटाने के लिए हमे बस दो ही बातों को अपनाना है-

  1.  अगर आप एक लड़की हें- तो आप कभी भी ऐसी घर में शादी करने के लिए अपना स्वीकृति न दें जो दहेज की मांग कर रही हें|
  2. अगर आप एक लड़का हें- तो आप दहेज को अपने शादी या वैवाहिक जिंदगी का हिस्सा न बनने दें|

बस हममे ही है समस्या|

हम दहेज प्रथा को पूरी तरह नाकामयाब बना सकते हें अगर हम अपने आप को पूरी तरह इसके लिए जिम्मेदार मानें |

दहेज प्रथा हमारे समाज का एक पुराने जमाने की हिस्सा है| हम ऐसे ही इस प्रथा को झट से बंद नहीं कर सकते| इसके लिए हमे कदम कदम कर के चलना होगा| हमे अपने समाज और देश में कई प्रकार के बदलाव लाना होगा, जैसे की-

  • दहेज प्रथा को रोकने के लिए क़ानून व्यवस्था में बदलाव लाना होगा-

आज कल हमारे समाज में दहेज प्रथा खुली तरह से निभाया जाता है जब कि ये कानूनन जुर्म है| दहेज की व्यापार को बिना किसी दर से किया जाता है| ये ऐसा है क्यूंकि हमारे देश की कानूनी व्यवस्था जरुरत के मुताबिक़ मजबूत नहीं है| जरुरत है दहेज के खिलाफ क़ानून में बदलाव लाना|

  • लड़का-लड़की एक सामान के बारे में लोगों को अवगत करना होगा –

सबसे पहले हमे अपने सोच में बदलाव की जरुरत है| हमे लड़कियों को लड़कों के बराबर समझना है| लड़कियों को लड़कों से किसी भी तरह छोटा महसूस नहीं होने देना है| अगर ऐसा हुआ तो लड़कियों को ससुराल जाने के लिए दहेज का साथ की जरुरत नहीं होगी| कहते हैं की कोई भी कार्य की शुरुवात पहले अपने आस पास की माहोल से करनी चाहिए| घर में अपने बच्चो को लडकियों को सम्मान और आदर करने के बारे में बताना होगा| हमे लड़का लड़की एक समान  को अपनाना होगा|

  • कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाना होगा –

हमे कन्या भ्रूण हत्या(को पूरी तरह से बंद करने की सपथ लेना होगा| | जितनी लड़कियों की हत्या होगी, दहेज प्रथा को उतना हाथ मिलेगा| दहेज प्रथा लड़कियों की कमी के कारण भी हमारे समाज में पनपती है | ज्यादा से ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागृति बना के हम दहेज प्रथा पर रोक लगा सकते हें|

  • दहेज प्रथा को रोकने के लिए महिला सशक्तिकरण पर जोर देना होगा –

इसकी चाबी है एजुकेशन | हमे लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाना होगा| उन्हें आजादी देनी होगी, आजादी अपने आप को एक मजबूत नारी बनाने की | हमे लड़कियों के पढाई पे ज्यादा से ज्यादा ध्यान और महत्व देना होगा | लड़कियों को पढ़ा लिखा के अपने पैरों पे खड़े होने के काबिल बनाना होगा, जो की वक़्त आने पर दहेज के खिलाफ खुद लढ सकती हें |

  • देहेज्प्रथा के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाना होगा –

हमे दहेज के खिलाफ समाज में जागरूकता पैदा करना है| गाँव और सहारों में दहेज के बुरे प्रकोप के बारे में बताना होगा जो की कई इंसानों को दहेज की पाप करने से रोकने में सहायक साबित होगी| खुद दहेज के खिलाफ सख्ती से पेश आना होगा|

  • हमे सही और गलत तय करना होगा –

जी हाँ!

हमे कुछ बातें अपनी जिंदगी में तय करना होगा| तय करना होगा की हम किसी भी ऐसी शादी में न शामिल हों जहां दहेज की प्रथा को निभायी गयी है|

लड़कियों को ये तय करना होगा की उन्हें दहेज मांगे जाने वाली घरों को अलविदा कहना है, बिना इस बात कि झूठी सपने देख कर की वक़्त सब कुछ ठीक कर देगा|

दहेज प्रथा पर अन्तिम चर्चा: conclusion on dowry system

दहेज प्रथा हमारे समाज को हमारा नहीं छोड़ा | ये प्रथा पुरे समाज को अपने वस में कर खोखला बना चुका है | वक़्त आ गया है इसके खिलाफ आवाज़ उठाने की| वक़्त आ गया है दहेज प्रथा के क़ानून कि सख्ति से इस्तेमीलकरने की| देहेज प्रथा के कारण आज भी हमारा समाज पिछडा हुआ है| लड़का और लड़की में अंतर मानते हें|

तो चलिए एक मुहीम छेड़ें देहेज प्रथा के खिलाफ| अगर आप के मन में दहेज प्रथा के बारे में कोई जानकारी है तो प्लीज निचे हमे लिख के जरुर भेजें ताकि आप कि कही हुई शायद कोई छोटी सी बात कई जिंदगियों को तबाह होने से बचा दे| दहेज की आदत को हमे जड़ से उखाड़ फेंकना है और एक स्वच्छ भारत की गठन करना है|

हमे अपने सुझाव जरुर दें | और दहेज प्रथा को “ना” बोले|

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दहेज प्रथा पर भाषण व निबंध in Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध | Essay on Dowry System in Hindi!

भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है । मनुस्मृति मे ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति, गउवें आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करे ।

यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने उल्लेख नहीं किया । समय बीतता चला गया स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मान बैठे हैं ।

अखबारों में अब विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं । उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है । ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहा जाता है तो असली चेहरा सामने आता है । वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है ।

दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं । जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में सुन्दर हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है? कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है?

शायद इसलिए कि समाज में अच्छे वरों की कमी है तथा योग्य लड़के बड़ी मुश्किल से तलाशने पर मिलते हैं । हिन्दुस्तान में ऐसी कुछ जातियां भी हैं जो वर को नहीं, अपितु कन्या को दहेज देकर ब्याह कर लेते हैं; लेकिन ऐसा कम ही होता है । अब तो ज्यादातर जाति वर के लिए ही दहेज लेती हैं ।

दहेज अब एक लिप्सा हो गई है, जो कभी शान्त नहीं होती । वर के लोभी माता-पिता यह चाह करते हैं कि लड़की अपने मायके वालों से सदा कुछ-न-कुछ लाती ही रहे और उनका घर भरती रहे । वे अपने लड़के को पैसा पैदा करने की मशीन समझते हैं और बेचारी बहू को मुरगी, जो रोज उन्हें सोने का अडा देती रहे । माता- पिता अपनी बेटी की मांग कब तक पूरी कर सकते हैं । फिर वे भी यह जानते हैं कि बेटी जो कुछ कर रही है, वह उनकी बेटी नहीं वरन् ससुराल वालों के दबाव के कारण कह रही है ।

यदि फरमाइश पूरी न की गई तो हो सकता है कि उनकी लाड़ली बिटिया प्रताड़ित की जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और यह भी असंभव नहीं है कि उसे मार दिया जाए । ऐसी न जाने कितनी तरुणियों को जला देने, मार डालने की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं ।

ADVERTISEMENTS:

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है । इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं । अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है । यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है ।

किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है; क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है । दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं ।

वरपक्ष के लोग शादी से पहले ही एक मोटी रकम कन्यापक्ष वालों से ऐंठ लेते हैं । जहां तक सामान का सवाल है रंगीन टीवी, सोफा सेट, अलमारी, डायनिंग टेबल, घड़ी, अंगूठियां-ये सब चीजें पहले ही वर पक्ष की शोभा बढ़ाने के लिए भेज दी जाती हैं या शादी के समय दी जाती है । बाकी बचती हैं ज्योनार उसमें खा-पीकर लोग चले जाते हैं ।

शुरू-शुरू में वर एवं कन्यापक्ष दोनों में मेलभाव होता है, अतएव दोनों से पूरी सतर्कता बरती जाती है । यदि सब कुछ खुशी-खुशी चलता रहा, तब तो सब गुप्त रहता है अन्यथा कोई दुर्घटना हो जाने पर सब रहस्य खुल जाते हैं । कन्या अथवा कन्यापक्ष के लोगों में यह हिम्मत नहीं होती कि वे लोग ये सुनिश्चित कर लें कि शादी होगी तो बिना दहेज अन्यथा शादी ही नहीं होगी ।

दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता । इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए । विवाह अपनी-अपनी जाति में करने की जो परम्परा है उसे तोड़ना होगा तथा अन्तर्राज्यीय विवाहों को प्रोत्साहन देना होगा; तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा ।

 

अन्तर्राज्यीय, अन्तर्प्रान्तीय और अन्तर्राष्ट्रीय विवाहों का प्रचलन शुरू हो गया है, यदि कभी इसमें और लोकप्रियता आई और सामाजिक प्रोत्साहन मिलता रहा, तो ऐसी आशा की जा सकती है कि दहेज लेने की प्रथा में कमी जरूर आएगी । सरकार चाहे तो इस प्रथा को समूल नहीं तो आंशिक रूप से जरूर खत्म किया जा सकता है । सरकार उन दम्पतियों को रोजगार देने अथवा धंधों में ऋण देने की व्यवस्था करे, जो अन्तर्राज्यीय अथवा बिना दहेज के विवाह करना चाहते हों या किया हो ।

पिछले दिनों बिहार के किसी सवर्ण युवक ने हरिजन कन्या से शादी की थी, तो उसे किस प्रकार सरकार तथा समाज का कोपभाजन बनना पड़ा था, इसे सभी जानते हैं, ज्यादा पुरानी घटना नहीं है । अत: आवश्यकता है कि सरकार अपने कर्तव्य का पालन करे और सामाजिक जागृति आए, तो दहेज का कलंक दूर हो सकता है ।

दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है । आजकल यह प्रथा व्यवसाय का रूप लेने लगी है । मां-बाप चाहते हैं कि बच्चे को पढ़ाने-लिखाने और उसे लायक बनाने के लिए उन्होंने जो कुछ खर्च किया है, वह लड़के का विवाह करके वसूल कर लेना चाहिए । इंजीनियर, डॉक्टर अथवा आई.ए.एस. लड़कों का दहेज पचास लाख से एक करोड़ रुपये तक पहुंच गया है । बताइए एक सामान्य गृहस्थ इस प्रकार का खर्च कैसे उठा सकता है ।

 

वर्तमान परिस्थितियों में उचित यही है कि ऐसे सभी लोग एक मंच पर आवें, जो दहेज को मन से निकृष्ट और त्याज्य समझते हों । वे स्वयं दहेज न लें तथा दहेज लेने वालों के खिलाफ आवाज उठाएं । यदि वे ऐसा समझते हों कि उनके काम का विरोध होगा, तो वे अपने सद्उद्देश्य के लिए सरकार से मदद भी मांग सकते हैं ।

कुछ साल तक यदि समग्र देश में दहेज विरोधी आन्दोलन चलाया जाए, तभी इस कुप्रथा को मिटाना संभव बन पाएगा । अन्यथा, अन्य कोई सूरत ऐसी दिखाई नहीं पड़ती जो इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर सके ।

 

दहेज प्रथा पर निबंध : 21वीं सदी में विकासशील भारत के लिए दहेज प्रथा एक कोड का काम कर रही है। दहेज प्रथा हमारे देश के लिए एक कलंक है जो कि दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। यह फोड़े की तरह इतना नासूर हो गया है कि अब बहू – बेटियों की जान भी लेने लगा। दहेज प्रथा किसी आतंकवाद से कम नहीं है। दहेज प्रथा का चंगुल हर जगह व्याप्त है।  इसकी जड़ें इतनी मजबूत हो गई है कि अमीर हो या गरीब हर वर्ग के लोगों को जकड़ रखा है।

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Dehej Pratha Par Nibandh

दहेज प्रथा के खिलाफ भारत सरकार ने कई कानून भी बनाए है लेकिन उन कानूनों का हमारे रूढ़िवादी सोच वाले लोगों पर कोई असर नहीं होता है। वह दहेज लेना एक अभिमान का विषय मानते है, जिसको जितना ज्यादा दहेज मिलता है वह उतना ही गर्व करता है और पूरे गांव में इसका ढिंढोरा पीटता है। जबकि दहेज गर्व का नहीं शर्म का विषय है।

आइए जानते है दहेज प्रथा क्या है (What is dowry system in Hindi)

जब वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को विवाह करने के लिए किसी भी प्रकार की रुपयों, गाड़ी, सामान अन्य विलासता की वस्तुएं मांगना दहेज प्रथा के अंतर्गत आता है। दहेज लेना और देना दोनों भारतीय कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता है। पुरुष प्रधान देश होने के कारण हमारे देश में महिलाओं का शोषण किया जाता है। उसी शोषण का दहेज प्रथा एक रुप है।

दहेज लेना लोगों में एक गर्व का विषय बन चुका है, वह सोचते है कि अगर हम ने दहेज नहीं लिया तो समाज में हमारी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी। इसलिए लड़के वाले लड़कियों से जितनी ज्यादा हो सके उतनी दहेज की मांग करते है। पुराने रीति रिवाजों की ढाल लेकर इसे एक विवाह का रिवाज बना दिया गया है जिसे भारत के हर वर्ग ने अच्छी तरह से अपना लिया है।

इसके खिलाफ नहीं तो कोई बोलना चाहता है ना ही कोई सुनना चाहता है क्योंकि इसमें सब अपना – अपना स्वार्थ देखते है।  दहेज प्रथा नहीं लोगों की सोच को इतना खोखला कर दिया है कि अगर उनको दहेज नहीं मिलता है तो वह शादी करने से इनकार कर देते है और अगर कुछ लोग शादी कर भी लेते है तो फिर दहेज के लिए दुल्हन पर अत्याचार करते है उसका शोषण करते है जिसके कारण उसके मां-बाप मजबूर होकर दहेज देने को तैयार हो जाते है।

दहेज लेने  के वर्तमान में नए आयाम भी बना दिए गए है जिसके अनुसार दूल्हे की आय जितनी अधिक होगी उसको उतना ही अधिक दहेज मिलेगा। दहेज प्रथा मध्यम वर्गीय लोगों में आजकल बहुत प्रचलित हो गई है।

दहेज प्रथा की उत्पत्ति (Origin of dowry practice)

पुराने जमाने में लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों को उपहार स्वरूप कुछ वस्तुएं दी जाती थी जैसे कि घोड़ा, बकरी, ऊंट आदि है। लेकिन फिर जैसे जैसे भारत में प्रगति की तो लोगों के सोचने विचारने की मानसिकता भी बदलती गई।  लड़कियों वालों को जो वस्तुएं उपहार स्वरूप मिलती थी अब वे लड़की वालों पर उपहार देने के लिए विशेष मांग करने लगे है। जब से लड़के वालों की तरफ से यह विशेष मांग होने लगी है तब से दहेज प्रथा की उत्पत्ति होने लगी थी।

इसका एक अन्य पहलू यह भी है कि जब लड़की और लड़के की शादी कर दी जाती है तो उनकी आर्थिक सहायता के लिए उनको कुछ रुपए दिए जाते थे ताकि वह अपना जीवन ठीक प्रकार से निर्वाह कर सकें।

दहेज प्रथा को हवा तभी मिलती है जब लड़की में कुछ कमी हो जैसे कि वह  विकलांग हो उसका रंग रूप सावला होने पर लड़की वाले अपनी लड़की की शादी करने के लिए लड़की वालों को दहेज के रूप में बहुत सारे रुपए और अन्य विलासता की वस्तुएं देते है। जिससे इस प्रथा को और भी हवा मिलती है।

और वर्तमान में तो यह स्थिति है कि अगर लड़का कोई सरकारी नौकरी या किसी बड़े पद पर है तो उसको दहेज देना जरूरी है। लड़के वाले इसके लिए विशेष मांग रखने लगे है। जिसके कारण गरीब परिवार की लड़की वालों की आधी कमाई तो अपनी बेटी की शादी करने में ही चली जाती है।  और इसके कारण एक करने अभिशाप ने जन्म ले लिया है अब बेटियों को कोख में ही मार आज आने लगा है क्योंकि लोग मानते है कि बेटियां पराई होती है वह हमारे किसी भी प्रकार से काम नहीं आने वाली और उनकी शादी पर उनको दहेज भी देना पड़ेगा इसलिए अब बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या बहुत कम हो गई है।

दहेज प्रथा का जहरीला दंश (Poisonous bite of dowry practice)

दहेज प्रथा ने वर्तमान में एक महामारी का रुप ले लिया है, यह किसी आतंकवाद से कम नहीं है क्योंकि जब गरीब परिवार के माता पिता अपनी बेटी  की शादी करने जाते है तो उनसे दहेज की मांग की जाती है और वह दहेज देने में असमर्थ होते है तो या तो वे आत्महत्या कर लेते है या फिर किसी जमीदार से दहेज के लिए रुपए उधार लेते है और जिंदगी भर उसका ब्याज चुकाते रहते है।

इसका विस्तार होने का कारण इन लोगों की दकियानूसी सोच है वह सोचते है कि अगर बेटे की शादी में दहेज नहीं मिला तो समाज में उनकी थू-थू  होगी उनकी कोई इज्जत नहीं करेगा। वह दहेज लेना अपना अधिकार समझने लगे है जिस कारण यह दहेज रूपी महामारी हर वर्ग में फैल गई है। अगर जल्द ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह  मानव सभ्यता पर बहुत बड़ा कलंक होगा।

महात्मा गांधी जी ने भी दहेज प्रथा को एक कलंक बताया है उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि

“जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरुरी शर्त बना देता है, वह अपने शिक्षा और अपने देश की बदनाम करता है, और साथ ही पूरी महिला जात का भी अपमान करता है “

यह ऐसा कटु सत्य है जिस को झुठलाया नहीं जा सकता है। 21वीं सदी के भारत में लोग अपने सभ्य होने का दावा करते है लेकिन जब उनको कहा जाता है कि दहेज ना लें तो वह अपनी सभ्यता भूल जाते है और दहेज की मांग ऐसे करते है जैसे यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो।

समाज के पढ़े लिखे युवा भी इसके खिलाफ नहीं बोलते है क्योंकि उनको भी कहीं ना कहीं यह डर रहता है कि अगर उन्हें दहेज में कुछ नहीं मिला तो अपने परिवार वालों और दोस्तों में उनकी इज्जत घट जाएगी इसलिए वे भी दहेज की मांग करने लगे है। अगर पढ़े लिखे युवा ही इस प्रथा को बढ़ाने में लगे रहे तो मानव सभ्यता का विनाश दूर नहीं है।

दहेज प्रथा एक गंभीर समस्या (Dowry System is a Serious Problem)

दहेज प्रथा का जहरीला दंश सदियों से चला आ रहा है। और अब लोगों ने इसको एक परंपरा का रूप दे दिया है जिसके कारण लोगों को लगता है कि दहेज देना अनिवार्य है। इसके खिलाफ भारत सरकार ने कई कानून बनाए है लेकिन उनकी पालना सही प्रकार से नहीं होने के कारण लोगों का दहेज के प्रति आत्मविश्वास और बढ़ गया है।

दहेज प्रथा के कारण सभी लोग अमीर परिवारों में ही शादी करना चाहते है क्योंकि उनको उम्मीद होती है कि वहां से ज उनको ज्यादा दहेज मिलेगा। जिससे गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी नहीं हो पाती है और अगर कोई करना नहीं चाहता है तो लड़के वाले इतना दहेज मांगते है कि गरीब परिवार वाले उस देश की रकम को चुकाने में असमर्थ होते है। इसके कारण एक और गंभीर समस्या जन्म ले रही है। हम लड़कियों को कोख में ही मारे जाने लगा है क्योंकि हमारे आधुनिक भारत में अब  गर्भ में ही पता लगाया जा सकता है कि लड़का होगा या लड़की, अगर गर्भ में लड़की पाई जाती है तो उसको कोख में ही मरवा दिया जाता है क्योंकि लोग सोचते है कि लड़कियां किसी काम की नहीं होती और उनकी शादी पर दहेज भी देना पड़ेगा।

दहेज प्रथा के कारण भारत के कई राज्य में लड़के और लड़कियों का लिंगानुपात भी बिगड़ गया है जिसके कारण कई लड़कों की शादी नहीं हो पाती है। जिसके कारण देश में अब बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ने लगी है।

कुछ राज्यों में तो दहेज प्रथा के लिए Rate List भी बना ली गई है कुछ समय पहले राज्यों से खबर आई थी कि लड़के की शादी के लिए अभी दहेज की Rate List तय कर दी गई है।

– अगर कोई लड़का आईएएस अधिकारी है तो उसको साठ लाख से एक करोड़ का दहेज मिलेगा (इसमें जाति के  प्रकार पर दहेज कम ज्यादा हो सकता है)।

– और अगर कोई लड़का IPS अधिकारी है तो उसको 30 लाख से 60 लाख तक का दहेज मिल सकता है।

– अगर कोई लड़का किसी कंपनी के उच्च पद पर है तो उसे 40 से 50 लाख रुपए की रकम दहेज में मिल सकती है।

–  बैंक में काम करने वाले को 20 से 25 लाख और अगर कोई सरकारी Peon है तो वह भी 5 लाख तक का दहेज ले ही जाता है।

इस तरह की Rate List 21वीं सदी में आश्चर्य का विषय है। सोचने की बात तो यह है कि जिनको भी ज्यादा दहेज मिल रहा है वह उतने ही पढ़े-लिखे है लेकिन उनको दहेज देने में कोई शर्म नहीं आती है। वह इतने बड़े-बड़े सरकारी पदों पर बैठे है लेकिन सरकार के कानून का उनको कोई भी खौफ नहीं है। हम यह नहीं कह रहे कि सभी सरकारी या प्राइवेट पद के लोग दहेज लेते है लेकिन कुछ लालची लोग ऐसे है जो कि दहेज लेने को अभिमान मानते है।

उन लोगों को ऐसा करते हुए जरा भी शर्म का एहसास नहीं होता है वह खुलेआम दहेज की मांग करते है। अगर उनको दहेज नहीं मिलता है तो भी शादी करने से भी इनकार कर देते है। यह लोग समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है। यह लोग हर जगह पर पाए जाते है जब भी किसकी नई शादी होती है तो यह लोग वहां पर पहुंच जाते है और उनसे पूछते है कि बताओ दहेज में क्या-क्या मिला और अगर दहेज में  कम समान मिला होता है तो यह लोग अपना बखान करने लग जाते है और दूसरे को नीचा दिखाते है जिससे इस प्रथा को और हवा मिलती है।

वर्तमान समय में तो दहेज के लिए अब महिलाओं का शोषण भी होने लगा है उनको तरह-तरह के ताने सुनाए जाते है। और कोई लोग तो अब इतना आगे बढ़ गए है कि दहेज ना मिलने पर अपनी बहुओं को मारते-पीटते है और कुछ समय पहले खबर आई थी कि अब उनको जिंदा जलाकर मारा भी जाने लगा है।

ऐसे लोगों के कारण एक तरफ भारत विकासशील देश से विकसित होने के लिए बढ़ रहा है लेकिन इन लोगों की सोच की वजह से भारत में एक दहेज रूपी महामारी भी भयानक रूप ले रही है। अब समय आ गया है कि इन लोगों को समाज से बाहर किया जाए और उचित दंड का प्रावधान भी किया जाए।

दहेज प्रथा के कारण (Causes of Dowry System in Hindi)

दहेज प्रथा अभी इतनी नासूर बन गई है कि इतने कई अमीर और गरीब परिवारों की जिंदगी तबाह कर दी है।  जिसके कारण कई हंसते खेलते परिवार अब टूट गए है। दहेज प्रथा का यह विकराल रूप धारण करने के कई कारण है जैसे की हमारे समाज में चले आ रहे पुराने रीति रिवाज और लोगों का लालच, अशिक्षा, लोगों की दकियानूसी सोच के कारण इस प्रथा को बढ़ावा मिल रहा है।

1. पुराने रीति रिवाज –

लोग दहेज लेने के लिए अब पुराने रीति रिवाजों का सहारा लेते है और लड़की वालों से कहते है कि यह तो पुरानी परंपरा है आपको दहेज देना ही पड़ेगा। लेकिन अब उनको यह कौन समझाए कि पुराने समय में लोग अपनी इच्छा अनुसार उपहार दिया करते थे। लेकिन लोगों ने पुराने रीति रिवाजों को दहेज का चोला पहना करें अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे है।

2. पुरुष प्रधान समाज –

भारत में पुरुष प्रधान समाज होने के कारण महिलाओं को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं होता है।  जिसके कारण दहेज के लिए महिलाओं का शोषण होता है उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। ताकि वे अपने घरवालों से दहेज लेकर आए। महिलाओं को बचपन से ही यह समझा दिया जाता है कि पुरुषों की हर बात माननी चाहिए और उनका आदर सम्मान करना चाहिए इसी में उनकी भलाई है और यही उनका कर्तव्य है जिस कारण महिलाएं अपने आप को कमजोर मानती है। और इस दहेज रूपी महामारी का शिकार हो जाती है।

3. अशिक्षा –

हमारे विशाल देश में आज भी कई लोग पढ़े लिखे नहीं है जिसके कारण वह सोचते है कि अगर उन्होंने दहेज नहीं दिया तो उनकी बिटिया की शादी नहीं होगी। उन्हें कहा जाता है कि दहेज देना उनका कर्तव्य है।  शिक्षा की कमी के कारण उन लोगों को भारत सरकार के द्वारा बनाए गए दहेज के खिलाफ कानूनों का भी नहीं पता है। जिसका लाभ लालची व्यक्ति दहेज लेने के लिए उठाते है।

4. दहेज मान – सम्मान का विषय –

वर्तमान में दहेज को लोगों ने अपने मान सम्मान का विषय बना लिया है जिसको जितना ज्यादा दहेज मिलता है लोग उसका उतना ही सम्मान करते है जिसके कारण दहेज प्रथा को और बढ़ावा मिल रहा है। लोग सोचते है कि अगर उन्होंने दहेज नहीं लिया तो समाज में उनका कोई सम्मान नहीं करेगा उनकी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी इसलिए वह लड़की वालों से दहेज के लिए विशेष मांग रखते है।  अगर उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो भी रिश्ता तोड़ देते है या फिर शादी होने के बाद लड़की को दहेज के लिए प्रताड़ित करते है।

5. विवाह के लिए ई-विज्ञापन –

आजकल लोग शादी करने के लिए इंटरनेट पर भी विज्ञापन जारी करते है  जिसमें वे अपने आप को बढ़ा चढ़ाकर बताते है। जो स्वयं के पास नहीं भी होती है उनका भी बखान करते है। जिसके कारण  लड़के वाले सोचते है कि यह तो बहुत ही अमीर परिवार है इसलिए मैं उनसे अधिक दहेज की मांग करते है।

6. सांवला रंग या अन्य कोई विकार –

लोगों की मानसिकता का इसी से पता लगाया जा सकता है कि आपने अखबारों या इंटरनेट पर देखा होगा कि शादी के विज्ञापनों में लिखा होता है कि सुंदर लड़की या लड़का चाहिए इससे यह साफ जाहिर होता है कि लोग सुंदर लड़कियों  से ही शादी करना पसंद करते है। जिसके कारण सांवला रंग या अन्य कोई विकार होने पर उस लड़की से कोई शादी नहीं करता है इसलिए उसके मां-बाप उसकी शादी करने के लिए दहेज की पेशकश करते है या फिर कई लोग लड़की शादी करने के लिए दहेज की विशेष मांग रख देते है। जिसके कारण दहेज प्रथा को  बढ़ावा मिलता है।

7. अशिक्षित लड़कियां –

लड़कियों के शिक्षित होने के कारण उनकी शादी नहीं हो पाती है। इसलिए कुछ लोग अशिक्षित लड़कियों से शादी करने के लिए तो तैयार हो जाते है लेकिन वह कहते है कि हम इसकी जिंदगी भर देखभाल करेंगे इसलिए हमें आप दहेज के रूप में कुछ सहायता प्रदान करें। वह सहायता के नाम पर अपनी लालच की अभिलाषा को पूरा करते है।  ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए क्योंकि यह लोग दहेज मिलने के बाद भी लड़कियों को प्रताड़ित करते रहते है।

8. बेरोजगारी –

जी हां बेरोजगारी भी दहेज प्रथा का एक मुख्य कारण है क्योंकि जब बेरोजगार युवकों की शादी के लिए प्रस्ताव आता है तो वह कहते है कि हमें अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए आप कुछ धन की सहायता कीजिए जिससे कि हम विवाह के पश्चात अपना जीवन  सुख पूर्वक निर्वाह कर सकें। वह धन की सहायता के रूप में दहेज लेते है और दहेज प्रथा को बढ़ावा देते है। ऐसे लोग ना ही तो व्यवसाय करते है ना ही कोई नौकरी करते है यह लोगों दहेज के पैसों से ही अपना जीवन यापन करना चाहते है और दहेज के पैसे खत्म होते ही उस लड़की को प्रताड़ित करने लगते है कि वह अपने घरवालों से और दहेज लेकर आए। इस पर आपने कई कहानियां, फिल्में और नाटक भी देखे होंगे।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम (Effects of Dowry System in Hindi)

वर्तमान में आप देख ही रहे होंगे कि दहेज प्रथा के कारण महिलाओं का कितना शोषण हो रहा है उनको कितना प्रताड़ित किया जा रहा है। आए दिन खबरों में आता रहता है कि दहेज के लिए लड़के वालों वालों ने लड़की को जिंदा जलाकर मार डाला या फिर उस को घर से बाहर निकाल दिया। इससे आप सीधा अनुमान लगा सकते है कि लोगों की मानसिकता उनकी सोचने की शक्ति कितने हद तक नीचे गिर गई है।

दहेज प्रथा के कारण जब भी किसी परिवार में लड़की पैदा हो जाती है तो लोग खुश होने की वजह से सहम जाते है। क्योंकि उनको इस बात की चिंता सताती है कि अब इसके विवाह के लिए दहेज कहां से लाएंगे। दहेज का यह विकराल रूप हम बढ़ते हुए देख रहे है लेकिन इसके खिलाफ हम कोई आवाज नहीं उठा रहे है।  जिसके कारण आए दिन लड़कियों का शोषण होता रहता है।

अगर आप दहेज लेते या देते है और या फिर इसका समर्थन करते है तो आप भी कानून की नज़रों में गुनहगार है आप भी इसको बढ़ाने में सहयोग कर रहे है इसलिए जब भी आप ऐसा होते हुए देखें तो इसका विरोध करें और पुलिस को इसकी सूचना दें।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम इस प्रकार है-

1. लड़कियों का शोषण –

दहेज प्रथा के कारण आए दिन लड़कियों का शोषण हो रहा है क्योंकि जब लड़के वालों को  शादी में पर्याप्त धन नहीं मिलता है तो वे लड़की से कहते है कि अपने घरवालों से और अधिक धन की मांग करें अगर वह ऐसा नहीं करती है तो वह उसे मानसिक और शारीरिक रूप से पर्दा ना देते है कभी-कभी यह प्रताड़ना इतनी बढ़ जाती है कि लड़कियां आत्महत्या तक कर लेती है।  वर्तमान में तो यह भी देखने में आया है कि लड़कियों को दहेज के लिए या तो उन्हें जिंदा जला दिया जाता है या फिर उन्हें कहीं और ले जा कर उनकी हत्या कर दी जाती है।

2. लड़कियों के साथ भेदभाव –

दहेज प्रथा के कारण लड़कियों का उन्हीं के परिवार में भेदभाव किया जाता है क्योंकि लोग मानते है कि लड़कियां तो पराई होती है इसलिए मैं उनको ना तो पढ़ाते लिखाते है ना ही उन्हें किसी प्रकार के कार्य करने की आजादी होती है। कई परिवारों में तो यह भी देखा गया है कि  लड़कों की तुलना में लड़कियों को खाने और पहनने के लिए कम वस्तुएं दी जाती है। उन्हें घर से बाहर जाने की आजादी नहीं होती है।

3. घटता लिंगानुपात –

दहेज प्रथा के कारण लोग अब अपने घर में लड़कियां नहीं चाहते है वह लड़कियों को कोख में ही मरवा देते है जिसके कारण वर्तमान में लड़के और लड़कियों  के लिंगानुपात में भारी अंतर देखा गया है। वह लड़की होने को सिर्फ खर्चा मानते है जिस कारण बेचारी लड़कियों को बिना किसी कसूर की कोख में ही मरवा दिया जाता है। इसके खिलाफ कई कानून भी बनाए गए है लेकिन सब बेअसर है।

4. जनसंख्या वृद्धि –

जनसंख्या वृद्धि भी दहेज प्रथा का एक दुष्परिणाम है क्योंकि जहां पर अब लड़कियों के कोख में मारने पर  सख्त कार्रवाई होने लगी है वहां पर लोग अब लड़कियों को भी तो नहीं मारते है लेकिन लड़के की चाह में वे  एक के बाद एक बच्चे पैदा करते रहते है जिसके कारण जनसंख्या वृद्धि होती है।

5. देश के विकास की राह में रोड़ा –

चूँकि दहेज प्रथा के कारण जनसंख्या वृद्धि होती है तो बेरोजगारी भी उतनी ही बढ़ती है जिसके कारण देश के विकास की राह में बाधा आती है। और इससे देश की महिलाओं का शोषण भी होता है उनके मान सम्मान को भी ठेस पहुंचती है। और बाहरी देशों के लोग सोचते है कि जहां पर महिलाओं को सम्मान नहीं होता वहां के लोग कैसे होंगे इसलिए लोग यहां आने से कतराते है जिससे हमारे देश का विकास नहीं हो पाता है।

दहेज प्रथा को रोकने के उपाय (How to Stop Dowry Practice)

दहेज नामक इस प्रथा नहीं हमारी सोच को इतना नीचे तक गिरा दिया है कि अब हमें दहेज लेने पर शर्म तक नहीं आती है। ऐसा लगता है कि दहेज का दंश इतना घातक हो गया है कि ने हमारे जमीर को भी मार दिया है। यह कम होने की वजह दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है  जो कि हम और हमारे समाज के लिए बहुत ही घातक है। यह तो अभी इसका ट्रेलर है अगर इसे रोका नहीं गया तो यह हमारे पूरे समाज को निकल जाएगा और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाएंगे। दहेज लेना या देना हमारे ही हाथ में होता है इसलिए आग से हमें ही प्रण लेना होगा कि ना तो हम दहेज लेंगे ना ही किसी को देंगे।

दहेज प्रथा को रोकना कोई बड़ा कार्य नहीं है क्योंकि अगर दहेज प्रथा के दो मुख्य किरदार लड़का और लड़की ही इसका विरोध करने लगेंगे तो इसकी कमर वही टूट जाएगी।

दहेज प्रथा को रोकने के लिए लड़का और लड़की को दो बातें अपनानी होंगी-

  1. अगर आप लड़की है तो किसी भी ऐसे परिवार में शादी ना करें जो कि दहेज की मांग करते हो, या फिर आप को जरा सा भी ऐसा लगे कि यह परिवार आपके लिए सही नहीं है तो तुरंत शादी के लिए मना कर दें।
  2. और अगर आप लड़का है तो अपने घरवालों से साफ कह दें कि मैं शादी तभी करूंगा जब आप लड़की वालों से दहेज नहीं लेंगे।

लेकिन हमें पता है कि दहेज प्रथा को खत्म करना इतना आसान नहीं है क्योंकि किसी ना किसी के मन में तो खोट   आ ही जाती है। लड़की को उसके घर वाले किसी भी बात का दबाव देकर शादी के लिए मना लेते है और लड़के वाले लड़के को इतना गुमराह कर देते है कि वह दहेज लेने के लिए तैयार हो जाता है इसलिए हमें  दहेज प्रथा को रोकने के लिए कुछ कारगर उपाय खोजने होंगे जो कि इस प्रकार है –

1. दहेज प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर –

हमें सरकार से निवेदन करना चाहिए कि वह दहेज प्रथा के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाकर इस प्रथा को रोकने का प्रयास करें।  वर्तमान में कुछ ऐसे कानून भी आए है जो कि दहेज प्रथा को रोकने के लिए बनाए गए है उनमें प्रमुख है दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961 जिसके अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों दंडकारी है।

2. लड़कियों को शिक्षित बनाकर –

हमें लोगों में जागरूकता फैलाने होगी कि लड़कियों को जितना हो सके उतना ज्यादा पढ़ाया जाए उन्हें शिक्षित किया जाए जिससे कि वह कोई भी कार्य करने में सक्षम हो और उनको शादी करने के लिए दहेज भी नहीं देना पड़ेगा। शिक्षा ही हर विनाशकारी बीमारी का तोड़ है। अब तो सरकार भी बेटियों को पढ़ाने के लिए निशुल्क शिक्षा व्यवस्था जारी कर चुकी है बस लोगों को इस बारे में बताना है कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होती है।

3. लड़का और लड़की में भेदभाव बंद करें –

जब तक हम लड़की और लड़का में भेदभाव करते रहेंगे दहेज प्रथा को उतना ही अधिक बल मिलता रहेगा इसलिए हमें  लड़का और लड़की में भेदभाव बंद करना होगा लड़की को भी वही सभी सुविधाएं देनी होगी क्योंकि एक लड़के को दी जाती है  लड़की को भी उतना ही प्यार दिया जाए जितना कि लड़के को दिया जाता है। क्योंकि लड़की को भी उतना ही खुश रहने का हक है जितना कि लड़के को है। लड़की को भी उतनी आजादी दी जानी चाहिए जितनी कि लड़के को होती है उसे हर कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ना की मुझे लड़की जात होने का कहकर घर में बैठने को कहा जाए।

4. दहेज प्रथा के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाना –

दहेज प्रथा के खिलाफ हमें समाज में जागरूकता लानी होगी क्योंकि लोगों  की सोच इस कदर गिर चुकी है कि उन्हें दहेज के अलावा और कुछ भी नहीं सोचता इसलिए हमें गांव गांव जाकर दहेज प्रथा के खिलाफ चेतना के लानी होगी वहां के लोगों को बताना होगा कि इससे  देश का कितना नुकसान हो रहा है और साथ ही लड़कियों को इसके कारण कितनी प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।

हर स्कूल में ऐसे कार्यक्रम और नाटक होने चाहिए जिस दिन के माध्यम से समझाया जा सके कि लड़का और लड़की समान होते है उन्हें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए और दहेज लेना और देना दोनों ही पाप है  दंडकारी है। लोगों की सोच को बदलना होगा।

5. हमें दहेज प्रथा का विरोध करना होगा –

जब भी आप किसी भी विवाह में जाएं तो वहां देखें कि दहेज लिया और दिया तो नहीं जा रहा है अगर ऐसा होता है तो आपको उसका विरोध करना चाहिए। आपको ऐसे विवाह में नहीं जाना चाहिए जहां पर दहेज प्रथा को बढ़ावा मिलता हो। और आपकी सब की जिम्मेदारी बनती है कि आपको भी दहेज के लिए हां की जगह ना कहना होगा क्योंकि आपके जीवन में भी कभी ना कभी यह पल जरूर आएगा।

आपको इस दहेज प्रथा निबंध के माध्यम से पता तो चल ही गया होगा कि दहेज प्रथा के कारण हमारे समाज और परिवार को कितना नुकसान हो रहा है इसलिए जब भी ऐसा होते देखे तो इसका विरोध जरुर करें।

आप दहेज प्रथा के विरोध में हीन भावना फैला सकते है जब कोई भी व्यक्ति है दहेज ले रहा होता है तो उसे सिर्फ सिर्फ इतना कह दें कि लड़की वालों ने दहेज देकर लड़के को खरीद लिया। बस यह इतना सफ़र भी इतना असर  कर जाएगा कि लड़के के मन में दहेज प्रथा के खिलाफ हीन भावना उत्पन्न हो जाएगी और वह दहेज लेने से इंकार करेगा।

उपसंहार (Epilogue)

दहेज प्रथा में हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है। इसके कारण कई बहू बेटियों की जिंदगी खराब हो गई। दहेज प्रथा के कारण हमारे समाज के लोगों की  छोड़ आज इतनी गिर गई है कि वह दहेज लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।  और इसका उदाहरण आप आए दिन आने वाले समाचार और अखबारों में देख सकते है कि कैसे लोग दहेज के लिए अपनी बहुओं  की हत्या कर देते है या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वह खुद मजबूर हो सकती है आत्महत्या करने के लिए।

अब बहुत हुआ दहेज प्रथा के खिलाफ हमें आवाज उठानी होगी अगर आज हम ने आवाज नहीं उठाई तो कल हमारी ही बहन-बेटियां इसकी शिकार होंगे जिसके बाद आपको अफसोस होगा कि अगर हमने पहले ही इसके खिलाफ आवाज उठानी होती तो आज यह नहीं होता। हमें लोगों की पहचान उसकी सोच को बदलना होगा अगर हम उनका विरोध नहीं करेंगे तो कौन करेगा।

चलो आज हम सब प्रण ले कि दहेज प्रथा नामक इस महामारी को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। ना तो किसी को नहीं देंगे ना ही दहेज लेंगे।

हम आशा करते है कि हमारे द्वारा दहेज प्रथा पर लिखा गया आपको पसंद आया होगा। अगर यह लेख आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ शेयर करना ना भूले। इसके बारे में अगर आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

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बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बालश्रम पर निबंध (Essay On Child Labour In Hindi) :

भूमिका : बालश्रम बच्चों के द्वारा अपने बाल्यकाल में किया गया श्रम या काम है जिसके बदले उन्हें मजदूरी दी जाती है। बालश्रम भारत के साथ-साथ सभी देशों में गैर कानूनी है। बालश्रम एक कलंक होता है। बालश्रम एक अभिशाप है जिसने अपना जाल पूरे देश में बिछा दिया है कि प्रशासन की लाखों कोशिशों के बाद भी यह अपना प्रचंड रूप लेने में सफलता प्राप्त कर रहा है। बालश्रम हमारे समाज के लिए एक कलंक बन चुका है।

बालश्रम : किसी भी बच्चे के बाल्यकाल के दौरान पैसों या अन्य किसी भी लोभ के बदले में करवाया गया किसी भी तरह के काम को बालश्रम कहा जाता है। इस प्रकार की मजदूरी पर अधिकतर पैसों या जरूरतों के बदले काम किया जाता है। बालश्रम पूर्ण रूप से गैर कानूनी है। इस प्रकार की मजदूरी को समाज में हर वर्ग द्वारा निंदित भी किया जाता है।

लेकिन इसका ज्यादातर अभ्यास हम समाज वाले ही करते हैं। जब कोई बच्चे को उसके बाल्यकाल से वंचित कर उन्हें मजबूरी में काम करने के लिए विवश करते हैं उसे बालश्रम कहते हैं। बच्चों को उनके परिवार से दूर रखकर उन्हें गुलामों की तरह पेश किया जाता है।

अगर सामान्य शब्दों में समझा जाए तो बच्चे जो 14 वर्ष से कम आयु के होते हैं उनसे उनका बचपन , खेल-कूद , शिक्षा का अधिकार छीनकर उन्हें काम में लगाकर शारीरिक , मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित कर कम रुपयों में काम करा कर शोषण करके उनके बचपन को श्रमिक रूप में बदल देना ही बालश्रम कहलाता है।

बालश्रम के कारण : आज के समय में बालश्रम पूरे देश में फैल चुका है। हमारे समाज के लिए बालश्रम एक अभिशाप बन चुका है। सरकार द्वारा चलाए गए नियमों के बाद भी गंदी आदत समाज से कभी छूटती ही नहीं है। भारत देश की ज्यादातर आबादी गरीबी से पीड़ित है। कुछ परिवारों के लिए भर पेट खाना खाना भी एक सपना सा लगता है।

गरीबी से पीड़ित लोग बहुत बार अपनों को खोने के गम से अवगत हो चुके हैं। गरीबी की वजह से गरीब माता-पिता अपने बच्चों को घर-घर और दुकानों में काम करने के लिए भेजते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसे निर्णय बच्चों की शारीरिक और मानसिक अवस्था को झंझोर कर रख देते हैं। इस निर्णय को अपने परिवार के पेट पालने के उद्देश्य से लिया जाता है।

दुकान और छोटे व्यापारी बच्चों से काम बड़ों जितना करवाते हैं लेकिन उन्हें कीमत आधी देते हैं क्योंकि वो बच्चे होते हैं। बच्चे अधिक चालाक नहीं होते हैं इसलिए उन्हें ज्यादा चोरी और ठग का अवसर नहीं मिलता है। व्यापार में उत्पादन लागत कम लगने की वजह से भी कुछ व्यापारी बच्चों की जिन्दगी बर्बाद कर देते हैं।

बच्चे बिना किसी भी लोभ के मन लगाकर काम करते हैं। हमारे देश की आजादी के बाद भी बहुत से इलाके हैं जहाँ के बच्चे आज तक शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार से वंचित हैं। हमारे देश में हजारों गाँव हैं जहाँ पर पढाई की कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है लेकिन अगर व्यवस्था है तो कोशों दूर है।

इस तरह का प्रशासनिक ढीलापन भी बालश्रम के लिए जिम्मेदार है। इन सब से ज्यादा पीड़ित गरीब परिवार होते हैं क्योंकि उनके बच्चों के लिए पढना एक सपना होता है। बच्चों के लिए किफायती स्कूलों की कमी की वजह से बच्चों को अनपढ़ और बेबस रहना पड़ता है। बच्चों द्वारा अनपढ़ और बेबस रहना उन्हें मानसिक रूप से कई बार छू जाता है।

बहुत बार बच्चे पढाई के बिना जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं और कभी-कभी ये मजबूरियां उन्हें बालश्रम की खाई में धकेल देती हैं जिससे आज तक किसी का भी भला नहीं हुआ है न ही कभी होगा। बहुत से परिवारों में बालश्रम को परंपरा और रीती का नाम देकर इसको बड़ी आसानी से अंजाम दिया जाता है। बहुत से परिवारों का मानना होता है कि उनके जीवन में कभी अच्छी जिन्दगी लिखी ही नहीं है और वर्षों से चली आ रही मजदूरी की परंपरा ही उनका कमाई और जीवन व्यतीत करने का एक श्रोत होता है।

बहुत से परिवारों का तो यह भी मानना होता है कि बाल्यकाल से काम करने से बच्चे आने वाले समय में ज्यादा मेहनती और दुनियादार हो जाएंगे। बालश्रम बच्चों के निजी विकास को जन्म देता है जो आगे जिन्दगी जीने में आसान होता है। हमारे समाज को लगता है कि लडकियाँ लडकों से कमजोर होती हैं उनकी लडकों से समानता नहीं की जा सकती है। इसी वजह से उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

बालश्रम के परिणाम : एक बच्चे को 1000-1500 रूपए देकर मजदूरी करवाने से कई प्रकार की हानि होती है। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चा अशिक्षित रह जाता है। देश का आने वाला कल अंधकार की ओर जाने लगता है। इसके साथ ही बेरोजगारी और गरीबी और अधिक बढ़ने लगती है।

अगर देश का आने वाला कल इतना बुरा होगा तो इसमें सभी का नुकसान होगा। जिस उम्र में बच्चों को सही शिक्षा मिलनी चाहिए , खेल कूद के माध्यम से अपने मस्तिष्क का विकास करना चाहिए उस उम्र में बच्चों से काम करवाने से बच्चों का शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक और सामाजिक विकास रुक जाता है। शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार होता है। शिक्षा से किसी भी बच्चे को वंचित रखना अपराध माना जाता है।

बच्चों का कारखाने में काम करना सुरक्षित नहीं होता है। गरीबी में थोड़े से पैसों के लिए अपनी जान को खतरे में डालना या पूरी उम्र उस बीमारी से घिरे रहने जो लाइलाज हो। इसलिए किसी भी बच्चे के लिए बालश्रम बहुत अधिक खतरनाक होता है। अगर कोई बच्चा गरीबी या मजबूरी से परिश्रम कर रहा है तो उसका पर्याप्त वेतन नहीं दिया जाता है और हर प्रकार से उसका शोषण किया जाता है जो बहुत ही गंभीर अपराध है।

बालश्रम रोकने के उपाय : बालश्रम हमारे समाज के लिए एक अभिशाप है जो हमारे समाज को अन्याय मुक्त नहीं बनने देगा। हमें बालश्रम का अंत करने के लिए सबसे पहले अपने घरों या दफ्तरों में किसी भी बच्चे को काम पर नहीं रखना चाहिए। हमें हमेशा इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चे से काम करवाने के बदले उसे पैसे देकर या खाना देकर हम उन पर कोई एहसान नहीं करते हैं बल्कि हम उसके भविष्य से खेलते हैं।

बालश्रम को खत्म करने के लिए सबसे पहले हमें अपनी सोच को बदलना होगा। बालश्रम को रोकने के लिए मजबूत और कड़े कानून बनाने चाहिएँ जिससे कोई भी बाल मजदूरी करवाने से डरें। अगर आपके सामने कोई भी बालश्रम का मामला सामने आए तो सबसे पहले नजदीकी पुलिस स्टेशन में खबर करनी चाहिए।

हमें बालश्रम को पनाह देने वाले पत्थर दिलों के विरुद्ध अपनी आवाज को बुलंद करना चाहिए। आम आदमी को भी बाल मजदूरी के विषय में जागरूक होना चाहिए और अपने समाज में होने से रोकना चाहिए। गरीब माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए क्योंकि आज सरकार मुफ्त शिक्षा , खाना और कुछ स्कूलों में दवाईयां जैसी चीजों की सुविधाएँ प्रदान कर रही है।

कारखानों और दुकानों के लोगों को प्रण लेना चाहिए कि वो किसी भी बच्चे से मजदूरी या श्रम नहीं करवाएंगे और काम करवाने वाले लोगों को रोकेंगे। अक्सर हम लोग बाजार जाकर अपनी जरूरत का सामान खरीद लेते हैं बिना इस बात को जाने कि इसकी बनावट के पीछे किसी बालश्रम का अभ्यास है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि इससे हमारे समाज में बदलाव लाया जा सकता है।

हम जब भी कोई सामान खरीदें तो पहले दुकानदार से उसकी तकनीक के बारे में जरुर पूंछें। हम इस प्रश्न को पूंछ कर समाज में सचेतना का एक माहौल पैदा कर सकते हैं। बालश्रम की बनायीं गई किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अगर हमें किसी भी बालश्रम का पता चले उसके बारे में सबसे पहले बच्चे के परिवार वालों से बात करनी चाहिए। उनके हालातों को समझकर उनके बच्चे के भविष्य के बारे में उन्हें बताना चाहिए। बच्चों के परिवार वालों को बालश्रम के नुकसान और कानूनी जुर्म के बारे में बताना चाहिए।

उपसंहार : बालश्रम को खत्म करना केवल सरकार का ही कर्तव्य नहीं है हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस योजना में सरकार का पूरा साथ दें। सरकार इस योजना को सफल बनाने के लिए बहुत प्रयास कर रही है। बालश्रम एक बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है। इस समस्या को सभी के द्वारा जल्द-से-जल्द खत्म करने की जरूरत है। बच्चे बहुत कम हैं लेकिन वे भविष्य के विकासशील देश का भविष्य हैं।

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बाल श्रम पर निबंध | Essay on Child Labour!

भारत में भगवान के बाल रूप के अनेक मंदिर हैं जैसे बाल गणेश, बाल हनुमान, बाल कृष्ण एवं बाल गोपाल इत्यादि । भारतीय दर्शन के अनुसार बाल रूप को स्वयं ही भगवान का रूप समझा जाता है । ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश एवं अभिमन्यू आज भी भारत में सभी के दिल-दिमाग में बसे हैं ।

आज के समय में गरीब बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं है । बाल श्रम समाज की गंभीर बुराइयों में से एक है । गरीब बच्चों का भविष्य अंधकारमय है । पूरे संसार में गरीब बच्चों की उपेक्षा हो रही है तथा उन्हें तिरष्कार का सामना करना पड़ता है । उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाता है और शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, साथ ही बाल श्रम हेतु मजबूर होना पड़ता है ।

समाज में गरीब लडकियों की स्थिति और भी नाजुक है । नाबालिक बच्चे घरेलु नौकर के रूप में काम करते हैं । वे होटलों, कारखानों, दुकानों एवं निर्माण स्थलों में कार्य करते हैं और रिक्शा चलाते भी दिखते हैं । यहाँ तक की वे फैक्ट्रियों में गंभीर एवं खतरनाक काम के स्वरुप को भी अंजाम देते दिखाई पड़ते हैं ।

भारतीय के संविधान, १९५० के अनुच्छेद २४ के अनुसार १४ वर्ष से कम आयु के किसी भी फैक्ट्री अथवा खान में नौकरी नहीं दी जाएगी । इस सम्बन्ध में भारतीय विधायिका ने फैक्ट्री एक्ट, १९४८ एवं चिल्ड्रेन एक्ट, १९६० में भी उपबंध किये हैं । बाल श्रम एक्ट, १९८६ इत्यादि बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने हेतु भारत सरकार की पहल को दर्शित करते हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४५ के अनुसार राज्यों का कर्त्तव्य है कि वे बच्चों हेतु आवश्यक एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करें ।

गत कुछ वर्षो से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा इस सम्बन्ध में प्रशंसा योग्य कदम उठाए गए हैं । बच्चों की शिक्षा एवं उनकी बेहतरी के लिए अनेक कार्यक्रम एवं नीतियाँ बनाई गयी है, तथा इस दिशा में सार्थक प्रयास किये गए हैं । किन्तु बाल श्रम की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है ।

इसमें कोई शक नहीं है कि बाल श्रम की समस्या का जल्दी से जल्दी कोई हल निकलना चाहिए । यह एक गंभीर सामाजिक कुरीति है तथा इसे जड़ से समाप्त होना आवश्यक है ।

 

बाल श्रम पर निबंध

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

Child Labour Essay in Hindi बालश्रम का तात्पर्य उस कार्य से है, जिसे करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु से छोटा हो |बालश्रम एक ऐसा सामाजिक अभिशाप है, जो शहरों में, गांव में, एवं चारों और मकड़जाल की तरह बचपन को अपने आगोश में लिए हुए हैं| खेलने-कूदने के दिनों में कोई बच्चा श्रम करने को मजबूर हो जाए तो, इससे बड़ी विडंबना किसी भी समाज के लिए भला और क्या हो सकती है| बालश्रम से परिवारों को आए स्त्रोतों का केवल एक छोटा सा भाग ही प्राप्त होता है, जिसके लिए गरीब परिवार अपने बच्चों के भविष्य को गर्त में झोंक देते हैं| बालश्रम मानवाधिकारों का हनन है| मानव अधिकारों के अंतर्गत प्रत्येक बच्चे को शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास का हक पाने का अधिकार है, लेकिन यथार्थ में स्कूल, खेल, प्यार-स्नेह, आत्मीयता आदि इनकी कल्पना में ही रह जाते हैं|

Child Labour Essay in Hindi 200 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बालश्रम का प्रारंभ औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से ही माना जाता है| कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कारखानों में मौजूदा स्वरुप में बाल श्रम के त्याग की बात कही थी| 1990 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोमालिया को छोड़कर अन्य सभी देशों ने बाल अधिकार सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर  किए| यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, दुकानों, कारखानों, ईंट-भट्ठों एवं खदानों के साथ-साथ घरेलू कार्यों में  विश्वभर में करोड़ों की संख्या में बाल श्रमिक कार्यरत हैं, किंतु सभी मामलों में बाल श्रमिकों का शोषण नहीं होता, कई बार तो उनके द्वारा किए गए श्रम उनके और उनके परिवार वालों के लिए हितकर भी होते हैं|

बांग्लादेश में 55,000 से भी ज्यादा बाल श्रमिक के वस्त्र उद्योग में कार्यरत हैं, जिनकी बदौलत यह देश अमेरिका को लगभग 75 करोड़ डॉलर के वस्त्र निर्यात करता है, किंतु अमेरिका द्वारा बाल श्रम कानून लागू किए जाने और बाल श्रमिको द्वारा तैयार किए गए माल पर प्रतिबंध लगाया जाने पर बांग्लादेश में 75% बाल श्रमिकों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिससे उनके साथ-साथ उनके परिवार वालों के सामने भुखमरी की स्थिति आ पहुँची | बावजूद इसके आज दुनिया के संपन्न देशों में बाल श्रम को मानव अधिकार का उल्लंघन मान इस पर कानून प्रतिबंध लगा दिया गया है | संयुक्त राज्य अमेरिका में बालश्रम कानून के अंतर्गत किसी भी प्रतिष्ठान में कार्य करने की न्यूनतम आयु 16 वर्ष है| संयुक्त राष्ट्र संघ एवं राष्ट्रीय संस्थान द्वारा वर्ष 1979 को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस के रुप में मनाया गया था|

Child Labour Essay in Hindi
बाल श्रम पर निबंध – Child Labour Essay in Hindi

Child Labour Essay in Hindi 300 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग 1.3 करोड़ थी | यहां अधिकांश बाल श्रमिक ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत हैं| उनमें से लगभग 60% 10 वर्ष की आयु से कम है| व्यापार एवं व्यवसाय में 23% बच्चे संग्लन हैं, जबकि 36% बच्चे घरेलू कार्य में| शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्याधिक, जो कैंटीन एरिया में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संग्लन है, लेकिन वह रिकॉर्ड में नहीं है| अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं| कितने ही बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईंट की दीवार पर कालिख जमी रहती है और जिनकी हवा में विषद्जनक बू होती है|

वे ऐसी भठियों के पास काम करते हैं, जो 1200 डिग्री सेल्सियस ताप पर जलती हैं| वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं| वह कांच-धमन की इकाइयों में कार्य करते हैं, जहां उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि उनके बदन में दर्द होता है, दिमाग परेशान रहता है, उनका दिल रोता है और आत्मा दुखी रहती है, लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है| कूड़े के ढेर में से रिसाइक्लिंग के लिए विभिन्न सामग्री इकट्ठा करने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही कई खतरनाक और संक्रामक बीमारियां घिर कर जाती है, जिनसे बचपन और जवानी का होने पता ही नहीं चल पाता और उनके कदम सीधे बुढ़ापे में भी चले जाते हैं|

Child Labour Essay in Hindi Language
बाल श्रम पर निबंध – Child Labour Essay in Hindi Language

भारत में बालश्रम के प्रमुख कारणों में निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, कम आय की प्राप्ति आदि है| जहां 40% से अधिक लोग गरीबी से जूझ रहे हैं| ऐसी स्थिति में बच्चे बालश्रम करके अपना और अपने माता-पिता का पेट भरते हैं| उनकी कमाई के बिना उनके परिवार का जीवन स्तर और गिर सकता है|

Child Labour Essay in Hindi 400 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

भारत में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है, जिसके दृष्टिकोण में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक आवश्यक है धन कमाना, जिससे बाल श्रम को बढ़ावा मिलता है| बड़ा और संयुक्त परिवार होने से परिवार के कम ही लोगों को रोजगार मिल पाता है, फलस्वरूप बच्चों को काम करने के लिए विवश होना पड़ता है| इसके अतिरिक्त समाज के स्वार्थी तत्वों और गलत तरीकों से आर्थिक हितों की पूर्ति करने वाले व्यावसायिक संगठनों के द्वारा जान-बूझकर प्रतिकूल स्थिति पैदा कर दी जाती है, ताकि उन्हें सस्ती मजदूरी पर बिना विरोध के काम करने वाले बाल श्रमिक आसानी से मिल जाए|

भारत के संविधान में बालश्रम को रोकने या हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएँ की गई है जैसे 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने में काम करने के लिए या किसी जोखिम वाले रोजगार में नियुक्त नहीं किया जाएगा (धारा -24), बाल्यावस्था और किशोरावस्था को शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक परित्यक्ता से बचाया जायेगा (धारा -39 Af ),  संविधान के प्रारंभ होने से 10 वर्षो की अवधि में सभी बालकों की, जब तक वे 14 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर लेते हैं, राज्य निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रत्यन करेगा (धारा -39 AF) आदि|

वर्ष 1949 में सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी श्रमिकों के कार्य करने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई| भारत सरकार ने वर्ष 1979 में बालश्रम समस्याओं से संबंधित अध्ययन हेतु गुरुपाद स्वामी समिति का गठन किया, जिसके सुझाव पर बालश्रम अधिनियम 1986 लागू किया गया| यह पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों:- जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण में रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाता है|

वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बालश्रम नीति तैयार की गई, जिसके अंतर्गत जोखिम भरे व्यवसायों में कार्यरत बच्चों के पुनर्वास पर जोर दिया गया| वर्ष 1996 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए उस फैसले ने बालश्रम के विरुद्ध कार्रवाई में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें संघीय एवं राज्य सरकारों को जोखिम भरे व्यवसायों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने  एवं शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था| केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 28 अगस्त 2012 को बालश्रम अधिनियम, 1986 में संशोधन को मंजूरी दी गई|

Child Labour Essay in Hindi 500 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

इस अधिनियम में संशोधन के द्वारा गैर-जोखिम भरे कार्यों में भी 14 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को लगाने पर पूर्णत:  प्रतिबंध लगाया गया है| इससे पूर्व 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों से सिर्फ जोखिम भरे व्यवसायों में कार्य कराने पर ही प्रतिबंध था| संशोधित अधिनियम के अनुसार, 14 से 18 वर्ष की आयु वालों को किशोर की श्रेणी में रखा गया और जोखिम वाले उद्योग धंधों में काम करने वालों की न्यूनतम आयु 14 से बढ़ाकर 18 कर दी गई है| इसमें बालश्रम का संघये अपराध कानून के उल्लंघन करने पर अधिकतम सजा 1 वर्ष से बढ़ाकर 2 वर्ष, साथ ही साथ जुर्माने की रकम 20000 से बढ़ाकर 50000 कर दी गई है| बावजूद इन सबके हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या आज भी करोड़ों में है|

भारतवर्ष से बालश्रम को पूर्णत: समाप्त करने का संकल्प लेने वाले वर्ष 2014 के नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी के शब्दों में “इससे बड़ी त्रासदी और भला क्या होगी कि देश में आज भी 17 करोड़ बाल श्रमिक और लगभग 20 करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं| ये वयस्क कोई और नहीं, बल्कि बाल श्रमिकों की माता पिता ही है| वास्तव में, यह विरोधाभास बालश्रम के खत्म होने से ही समाप्त हो पाएगा|” बालश्रम को बच्चों के विरूद्ध हिंसा मानने वाले श्री कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधन और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से बालश्रम समाप्त किया जा सकता है| इन्होंने बालश्रम मिटाने हेतु लोगों का आव्हान करते हुए यह नारा भी दिया “सहानुभूति का वैश्वीकरण, सूचना का लोकतांत्रिकरण और अधिकारों का सर्वव्यापीकरण|”

Essay on Child Labour in Hindi
बाल श्रम पर निबंध  – Essay on Child Labour in Hindi

वास्तव में, हम यह सोचते हैं कि इस तरह की समाज की कुरीतियों को समाप्त करने का दायित्व सिर्फ सरकार का है| सब कुछ कानूनों के पालन एवं कानून भंग करने वालों को सजा देने से सुधारा जाएगा, लेकिन यह असंभव है| हमारे घरों में, ढाबों में, होटलों में अनेक श्रमिक मिल जाएंगे जो, कड़ाके की ठंड या तपती धूप की परवाह किए बगैर काम करते हैं| सभ्य होते समाज में या अभिशाप आज भी क्यों बरकरार है? क्यों तथाकथित सभ्य एवं सुशिक्षित परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्चों को पसंद किया जाता है| हमें इन सब प्रश्नों के उत्तर स्वयं से पूछने होंगे|

हमें इन बच्चों से बालश्रम न करवाकर इन्हें प्यार देना होगा, जिनके लिए विलियम वर्ड्सवर्थ ने कहा था “द चाइल्ड इस द फादर ऑफ द मैन” अर्थात बच्चा ही व्यक्ति का पिता है| हमें भी निंदा फाजली की तरह ईश्वर की पूजा समझकर बच्चों के दुख को दूर करना होगा| आज हम 21वीं सदी में विकास और उन्नति की ऐसी व्यवस्था में जी रहे हैं, जहां समानता, धर्मनिरपेक्षता, मान्यता आदि की चर्चा बहुत जोर-शोर से की जा रही है|

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नैतिक शिक्षा पर निबंध-Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi

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नैतिक शिक्षा पर निबंध-Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi

नैतिक शिक्षा पर निबंध :

भूमिका : मनुष्य जन्म से ही सुख और शांति के लिए प्रयत्न करता है। जब से सृष्टि का आरंभ हुआ है वो तभी से ही अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसे पूरी तरह शांति सिर्फ शिक्षा से ही मिली है। शिक्षा के अस्त्र को अमोघ माना जाता है। शिक्षा से ही मनुष्य की सामाजिक और नैतिक उन्नति हुई थी और वह आगे बढने लगा था।

मनुष्य को यह अनुभव होने लगा की वह पशुतुल्य है। शिक्षा ही मनुष्य को उसके कर्तव्यों के बारे में समझती है और उसे सच्चे अर्थों में इंसान बनाती है। उसे खुद का और समाज का विकास करने का भी अवसर देती है।

अंग्रेजी शिक्षण पद्धति का प्रारंभ : मनुष्य की सभी शक्तियों के सर्वतोन्मुखी विकास को ही शिक्षा कहते हैं। शिक्षा से मानवीय गरिमा और व्यक्तित्व का विकास होता है। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है कि बच्चे की शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियों का सर्वतोन्मुखी विकास हो। यह दुःख की बात है शिक्षा भारत में अंग्रेजी की विरासत है। अंग्रेज भारत को अपना उपनिवेश मानते थे। अंग्रेजों ने भारतीयों को क्लर्क और मुंशी बनाने की चाल चली।

उन्हें यह विश्वास था कि इस शिक्षा योजना से एक ऐसा शिक्षित वर्ग बनेगा जिसका रक्त और रंग तो भारतीय होगा लेकिन विचार , बोली और दिमाग अंग्रेजी होगा। इस शिक्षा प्रणाली से भारतीय केवल बाबु ही बनकर रह गये। अंग्रेजों ने भारतीय लोगों को भारतीय संस्कृति से तो दूर ही रखा लेकिन अंग्रेजी संस्कृति को उनके अंदर गहराई से डाल दिया। यह दुःख की बात है की स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद भी अब तक अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व बना हुआ है।

प्राचीन शिक्षा पद्धति : प्राचीन कल में भारत को संसार का गुरु कहा जाता था। भारत को प्राचीन समय में सोने की चिड़िया कहा जाता था। प्राचीन समय में ऋषियों और विचारकों ने यह घोषणा की थी कि शिक्षा मनुष्य वृत्तियों के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। शिक्षा से मानव की बुद्धि परिष्कृत और परिमार्जित होती है।

शिक्षा से मनुष्य में सत्य और असत्य का विवेक जागता है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य मानव को पूर्ण ज्ञान करवाना, उसे ज्ञान के प्रकाश की ओर आगे करना और उसमें संस्कारों को जगाना होता है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में नैतिक शिक्षा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। पुराने समय में यह शिक्षा नगरों से दूर जंगलों में ऋषियों और मुनियों के आश्रमों में दी जाती थी।

उस समय छात्र पूरे पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और और अपने गुरु के चरणों की सेवा करते हुए विद्या का अध्ययन करते थे। इन आश्रमों में छात्रों की सर्वंगीण उन्नति पर ध्यान दिया जाता था। उसे अपनी बहुमुखी प्रतिभा में विकास करने का अवसर मिलता था। विद्यार्थी चिकित्सा, नीति, युद्ध कला, वेद सभी विषयों सम्यक होकर ही घर को लौटता था।

नैतिक शिक्षा का अर्थ : नैतिक शब्द नीति में इक प्रत्यय के जुड़ने से बना है। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है -नीति संबंधित शिक्षा। नैतिक शिक्षा का अर्थ होता है कि विद्यार्थियों को नैतिकता, सत्यभाषण, सहनशीलता, विनम्रता, प्रमाणिक सभी गुणों को प्रदान करना। आज हमारे स्वतंत्र भारत में सच्चरित्रता की बहुत बड़ी कमी है। सरकारी और गैर सरकारी सभी स्तरों पर लोग हमारे मनों में विष घोलने का काम कर रहे हैं।

इन सब का कारण हमारे स्कूलों और कॉलेजों में नैतिक शिक्षा का लुप्त होना है। मनुष्य को विज्ञानं की शिक्षा दी जाती है उसे तकनीकी शिक्षण भी दिया जाता है लेकिन उसे असली अर्थों में इन्सान बनना नहीं सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा ही मनुष्य की अमूल्य संपत्ति होती है इस संपत्ति के आगे सभी संपत्ति तुच्छ होती हैं। इन्हीं से राष्ट्र का निर्माण होता है और इन्हीं से देश सुदृढ होता है।

नैतिक शिक्षा की आवश्यकता : शिक्षा का उद्देश्य होता है कि मानव को सही अर्थों में मानव बनाया जाये। उसमें आत्मनिर्भरता की भावना को उत्पन्न करे, देशवासियों का चरित्र निर्माण करे , मनुष्य को परम उरुशार्थ की प्राप्ति कराना है लेकिन आज यह सब केवल पटकी पूर्ति के साधन बनकर रह गये हैं। नैतिक मूल्यों का निरंतर ह्रास किया जा रहा है।

आजकल के लोगों में श्रधा जैसी कोई भावना ही नहीं बची है। गुरुओं का आदर और माता -पिता का सम्मान नहीं किया जाता है। विद्यार्थी वर्ग ही नहीं बल्कि पूरा समाज में अराजकता फैली हुई है। ये बात खुद ही पैदा होती है कि हमारी शिक्षण व्यवस्था में आखिर कार क्या कमी है।

कुछ लोग इस बात पर ज्यादा बल दे रहे हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा के लिए भी जगह होनी चाहिए। कुछ लोग इस बात पर बल दे रहे हैं कि नैतिक शिक्षा के बिना हमारी शिक्षा प्रणाली अधूरी है।

उपसंहार : आज के भौतिक युग में नैतिक शिक्षा बहुत ही जरूरी है। नैतिक शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। नैतिक शिक्षा से ही राष्ट्र का सही अर्थों में निर्माण होता है। नैतिक गुणों के होने से ही मनुष्य संवेदनीय बनता है। आज के युग में लोगों के सर्वंगीण विकास के लिए नैतिक शिक्षा बहुत ही जरूरी है। नैतिक शिक्षा से ही कर्तव्य निष्ठ नागरिकों का विकास होता है।

नैतिक शिक्षा पर निबंध-Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi

नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता पर निबंध | Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi!

नैतिकता मनुष्य का वह गुण है जो उसे देवत्व के समीप ले जाता है । यदि शुरू में नैतिकता न हो तो पशुता और मनुष्यता में कोई विशेष अंतर नहीं रह जाता है । नैतिकता ही संपूर्ण मानवता का श्रुंगार है ।

वेदों, उपनिषदों एवं अन्य सभी धर्मग्रंथों में नैतिक अथवा सदाचार शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है । समस्त ऋषि-मुनियों व शास्त्रियों की मान्यता है कि मनुष्य का चरित्र तभी तक है जब तक उसमें नैतिकता व चारित्रिक दृढ़ता है ।

चरित्रविहीन मनुष्य पशु के समान है और एक पशु चाहे वह कितना ही सुंदर हो, उसकी आवाज कितनी ही मधुर क्यों न हो, वह एक मानव की ऊँचाइयों को कभी नहीं छू सकता । हमारी भारतीय संस्कृति में सदैव ही नैतिक मूल्यों की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया है । मनुष्य के जीवन में अच्छे चरित्र का विशेष महत्व है । दूसरे शब्दों में अच्छे चरित्र से ही मनुष्य की अस्मिता कायम है ।

अच्छे चरित्र के महत्व को उजागर करते हुए संस्कृत की एक सूक्ति निम्नलिखित है:

वृन्तं यत्नेन सरंक्षंद् विन्तयादाति याति च । अक्षीणो विन्तत: क्षीणो, वृन्ततस्तु हतो हत: ।।

ADVERTISEMENTS:

उक्त सूक्ति में चरित्रविहीन व्यक्ति को मृत के समान बताया गया है । अत: चरित्र का बल प्राणि जगत के लिए अनिवार्य है । इस चरित्र-बल की प्राप्ति हेतु नैतिक शिक्षा अनिवार्य है क्योंकि नैतिक मूल्यों की अवधारणा ही चरित्र-बल है ।

नैतिक शिक्षा का अभाव अनेक प्रकार के दुष्परिणामों को देखने के लिए बाध्य करता है । देश में फैले भ्रष्टाचार, लूटमा,र आगजनी, बलात्कार एवं अन्य अपराध नैतिकता के अभाव की ही परिणति हैं । हमारी वर्तमान पीढ़ी जब इतनी अनैतिक व चरित्रविहीन है तो आने वाली पीढ़ियों का स्वरूप क्या होगा इसकी कल्पना हम सहज ही कर सकते हैं । संपूर्ण विश्व में औद्‌योगिक प्रगति की लहर चल रही है ।

विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में नित नई खोजें व प्रयोग चल रहे हैं परंतु मानव जाति व देश के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे शिक्षा-शास्त्रियों व बड़े-बड़े नेताओं ने देश में नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता नहीं समझी है । वह शिक्षा जो आत्म-विकास एवं मनुष्य जीवन में संतुलन बनाए रख सकती है उसे ही पाठ्‌यक्रम में सम्मिलित नहीं किया गया । उसे निरंतर उपहास की दृष्टि से देखा जाता रहा है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि नैतिक शिक्षा का स्वरूप कैसा हो ? इस शिक्षा का प्रभावी रूप क्या है ? क्योंकि धर्मग्रंथों के उपदेश या फिर चरित्र निर्माण हेतु सजीले भाषण आज के वातावरण में प्रभावी नहीं हो सकते । इन परिस्थितियों में आवश्यक है कि नैतिक शिक्षा का स्वरूप प्रायोगिक एवं सतत् हो ।

इसके लिए आवश्यक है कि पाठ्‌यक्रमों में नैतिक शिक्षा को समाहित किया जाए तथा विज्ञान व अन्य विषयों की भांति इसे भी पूर्ण महत्व दिया जाए । अन्य विषयों के साथ ही नैतिक शिक्षा की भी विधिवत् परीक्षा होनी चाहिए तभी छात्र एवं शिक्षक दोनों मनोयोग से इसे स्वीकृति देंगे । छात्र को नैतिक शिक्षा में उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता होनी चाहिए । यदि ऐसा नहीं किया गया तो इसे प्रभावी रूप दे पाना संभव नहीं होगा।

 

नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में उन महापुरुषों व देशभक्तों की जीवन गाथाएँ होनी चाहिए जिन्होंने देश अथवा मानवता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है तथा जिनके जीवनपथ के पदचिह्‌नों का अनुसरण कर मनुष्य नैतिकता की राह पर चल सकता है । विशिष्ट व्यक्ति के जीवन-चरित्र भी पाठ्‌यक्रम में शामिल किए जाने चाहिए जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है अथवा अपने परिश्रम और संघर्ष के बल पर उच्च स्थान प्राप्त किया है ।

नैतिक शिक्षा के पाठ्‌यक्रम में व्यायाम तथा योग साधना का भी उल्लेख आवश्यक है । अर्थात् पाठ्‌यक्रम में वह सभी सामग्री उपलब्ध होनी चाहिए जो मनुष्य के संपूर्ण चारित्रिक विकास के लिए आवश्यक है । देश अथवा समाज नैतिकता के पदचिह्‌नों का अनुसरण करके ही उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है ।

यदि हम प्रारंभ से ही अपने बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान करेंगे तभी भविष्य में हम अच्छे, चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार शासक, अधिकारी, अध्यापक व कर्मचारी की कल्पना कर सकते हैं । भावी पीढ़ी को नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाना हम सभी का उत्तरदायित्व है ।

यदि आज कोई भी समाज या राष्ट्र नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता की अनदेखी करता है तो वह स्वयं को पतन की ओर अग्रसर कर रहा है । यदि हम राष्ट्र उत्थान के महत्व को स्वीकारते हैं तो नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता को भी समझना होगा, तभी हम राष्ट्र नायकों व निर्माताओं के स्वप्न को साकार कर सकेंगे ।

बच्चों को नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण करने के लिए यह भी आवश्यक है कि अभिभावकों व शिक्षकों में भी नैतिकता का समावेश हो । यदि शिक्षक ही नैतिक मूल्यों से रहित हों तो उनके छात्र भी खुलेआम उनका अनुसरण करेंगे ।

तब उन्हें रोकने व समझाने का नैतिक बल कहाँ से आएगा, यह विचारणीय तथ्य है । लेकिन यदि गुरुजनों एवं अभिभावकों का नैतिक बल उच्च होगा तो छात्र स्वयं ही उनका अनुसरण करने का प्रयास करेंगे ।

नैतिक शिक्षा पर निबंध-Essay on The Inevitability of Moral Education in Hindi

Essay on Moral Education in Hindi- नैतिक शिक्षा पर निबंध

भूमिका- नैतिक शिक्षा से अभिप्राय उन मूल्यों, गुणों और आस्थाओं की शिक्षा से है, जिन पर मानव की निजी और समाज की सर्वश्रेष्ठ समृद्ध निर्भर करती है। नैतिक शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक सद्गुणों को विकसित एवं संपुष्ट करती है, क्योंकि व्यक्ति समष्टि का ही एक अंश है, इसलिए उसके सद्गुणों के विकास का अर्थ है-‘समग्र समाज का सुसभ्य एवं सुसंस्कृत होना।”

परिभाषा- नैतिक शिक्षा और नैतिकता में कोई अंतर नहीं है अर्थात् नैतिक शिक्षा को ही नैतिकता माना जाता है। समाज जिसे ठीक मानता है, बह नैतिक है और जिसे ठीक नहीं मानता वह अनैतिक है। कत्र्तव्य की अतिरिक भावना नैतिकता है, जो उचित एवं अनुचित पर बल देती है। नैतिकता की विभिन्न परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

महात्मा गाँधी नैतिक कार्य उसे मानते थे, जिसमें सदैव सार्वजनिक कल्याण की भावना निहित हो। स्वेच्छा से शुभ कर्मों का आचरण ही नैतिकता है।

पंडित मदन मोहन मालवीय के कथनानुसार, ‘नैतिकता मनुष्य की उन्नति का मूल आधार है। नैतिकता विहीन मनुष्य पशु से भी निम्न है। नैतिकता एक व्यापक गुण है।”

सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन् के अनुसार, ‘नैतिकता व्यक्ति के आध्यात्मिक, बौदिधक एवं सामाजिक विकास का आधार है। नैतिकता का प्रभाव व्यक्ति के सभी क्रिया-कलापों पर पड़ता है।”

पश्चिमी विचारक नैतिकता को एक धार्मिक गुण मानते हैं। इन गुणों में आत्म-संयम, त्याग, दया, परोपकार सहष्णुिता, सेवा आदि सम्मिलित हैं। इसी कारण हरबर्ट ने उच्चतर विचारों के सृजन एवं निम्न प्रवृत्तियों के दमन को नैतिकता कहा है।

नैतिक शिक्षा का महत्त्व- नैतिक शिक्षा वस्तुत: मानवीय सद्वृत्तियों को उजागर करती है। यदि यह कहा जाए कि नैतिक शिक्षा ही मानवता का मूल है तो असंगत न होगा। नैतिक शिक्षा के अभाव में मानवता पनप ही नहीं सकती। क्योंकि मानव की कुत्सित वृत्तियाँ विश्व के लिए अभिशाप हैं। इन्हें केवल नैतिक शिक्षा से ही नियंत्रित किया जा सकता है। इसी के माध्यम से उसमें नव-चेतना का संचार हो सकता है। नैतिक शिक्षा ही व्यक्ति को उसके परम आदर्श की प्रेरणा दे सकती है और उसे श्रेष्ठ मनुष्य बनाती है।

नैतिक शिक्षा का उददेश्य- नैतिक शिक्षा का संबंध छात्र-छात्राओं की आंतरिक वृत्तियों से है। नैतिक शिक्षा उनके चरित्र-निर्माण का एक माध्यम है। चरित्र ही जीवन का मूल आधार है। अंग्रेजी में यह कथन प्रसिद्ध हैं”

If wealth is gone, nothing is gone, If health is gone, something is gone, If character is gone, everything is gone.” (यदि हमने धन खोया तो कुछ नहीं खोया, यदि हमने स्वास्थ्य खोया तो कुछ खोया, परंतु यदि हमने अपना चरित्र खोया तो अपना सब कुछ खो दिया।)

इसलिए चरित्र की रक्षा करना नैतिक शिक्षा का मूल उद्देश्य है। नैतिकता को आचरण में स्वीकार किए बिना मनुष्य जीवन में वास्तविक सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। छात्र-छात्राओं के चरित्र को विकसित एवं संवद्र्धित करने के लिए नैतिक शिक्षा अनिवार्य है। नैतिक शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(1) सर्वागीण विकास- छात्र-छात्राओं के नैतिक गुणों को प्रफुल्लित करना नैतिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है, कि वे आगे चलकर देश के आदर्श नागरिक बन सकें। शिष्टाचार, सदाचार, अनुशासन, आत्म संयम, विनम्रता, करुणा, परोपकार, साहस, मानव-प्रेम, देशभक्ति, परिश्रम, धैर्यशीलता आदि नैतिक गुण हैं। इनका उत्तरोत्तर विकास नितांत आवश्यक है। यह कार्य नैतिक शिक्षा के द्वारा ही परिपूर्ण हो सकता है।

(2) धार्मिक सहिष्णुता- छात्र-छात्राओं में धार्मिक सहिष्णुता को विकसित करना भी नैतिक शिक्षा का उद्देश्य है। छात्र विभिन्न धर्मों के मूल तत्वों से परिचित हों, आज के संदर्भ में यह बहुत ही आवश्यक बात है क्योंकि ऐसी स्थिति में ही उन्हें सभी धर्मों के समन्वय सूत्रों की एकता दिखाई देगी। छात्रों के हृदय में धार्मिक सहिष्णुता विकसित होगी। उन्हें धार्मिक संकीर्णता से दूर रखने में नैतिक शिक्षा ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

(3) देशभक्ति- नैतिक शिक्षा से ही छात्र-छात्राओं में देश-भक्ति के अटूट भाव पल्लवित हो सकते हैं। वैयक्तिक स्वाथों से ऊपर उठकर उनमें देश के हित को प्राथमिकता प्रदान करने के विचार पनप सकते हैं। नैतिक शिक्षा से छात्र देश के प्रति सदैव जागरूक रहते हैं।

(4) विश्व बंधुत्व की भावना- नैतिक शिक्षा से छात्र-छात्राओं में विश्व बंधुत्व की भावना को जागृत किया जा सकता है। जब छात्रों में यह भाव विकसित होगा कि मानव उस विराट पुरुष की कृति है तो उनके समक्ष ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का महान् आदर्श साकार हो सकता है। यह तभी हो सकता है, जब उन्हें नैतिक शिक्षा दी गई हो।

उपसंहार- महात्मा गाँधी जी कहा करते थे-‘ स्कूल या कॉलेज पवित्रता का मंदिर होना चाहिए, जहाँ कुछ भी अपवित्र या निकृष्ट न हो। स्कूल-कॉलेज तो चरित्र निर्माण की शालाएँ हैं।’ इस कथन का सारांश यही है कि नैतिक शिक्षा छात्र-छात्राओं के लिए अनिवार्य हैं।

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विद्यार्थी और फैशन पर निबंध-Vidyarthi Aur Fashion Essay In Hindi

विद्यार्थी और फैशन पर निबंध :

भूमिका : शब्दकोश में फैशन का अर्थ होता है ढंग या शैली लेकिन लोकव्यवहार में फैशन का परिधान शैली अथार्त वस्त्र पहनने की कला को कहते हैं। मनुष्य अपने आप को सुंदर दिखाने के लिए फैशन का प्रयोग करता है। कोई भी व्यक्ति गोरा हो या काला , मोटा हो या पतला , नवयुवक हो या प्रौढ़ सभी का कपड़े पहनने का अपना-अपना ढंग होता है।

मनुष्य केवल अपनी आयु , रूप-रंग और शरीर की बनावट को देखकर ही फैशन करता है। यहाँ तक की फैशन के विषय में कोई विशेष विवाद नहीं है। कोई भी अध्यापक हो या विद्यार्थी , लड़का हो या लडकी , पुरुष हो या स्त्री सभी को फैशन करने का अधिकार होता है।

फैशन पर विवाद : जब हम फैशन का गूढ़ अर्थ बनाव सिंगार लेते हैं तो फैशन के विषय में विवाद उठता है। इस गूढ़ अर्थ दूल्हा और दुल्हन का संबंध हो सकता है लेकिन छात्र और छात्राओं का इससे कोई संबंध नहीं होता है।

छात्र और छात्राएं अभी विद्यार्थी हैं और विद्यार्थी का अर्थ होता है विद्या की इच्छा करने वाला। अगर विद्या की इच्छा करने वाले विद्यार्थी फैशन को चाहने लगेंगे तो वे अपने लक्ष्य से बहुत दूर भटक जायेंगे। अगर विद्यार्थी विद्या की जगह पर फैशन को चाहेगा तो विद्या उससे रूठ जाएगी।

प्राचीनकाल में विद्यार्थियों में फैशन की भावना : प्राचीनकाल में विद्यार्थी फैशन को इतना पसंद नहीं करते थे जितने आज के विद्यार्थी करते हैं। प्राचीनकाल में विद्यार्थी सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते थे उनमे फैशन की अपेक्षा विद्या को चाहने की बहुत तीव्र इच्छा होती थी।

आज के विद्यार्थियों में फैशनेबल दिखने की इच्छा तीव्र होती है। आजकल विद्यार्थी जिस तरह के कपड़े दूसरों को पहने हुए देखते हैं वैसे ही कपड़ों की मांग वे अपने माता -पिता से करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि आस-पास के लोगों में खुद को धनी दिखा सकें लेकिन वास्तव में वे धनी नहीं होते हैं।

धनी के साथ-साथ आज का विद्यार्थी खुद को दूसरों से सुंदर दिखाना चाहता है जो वो होता नहीं है। इस तरह वे फैशन में इतना समय व्यर्थ में गंवा देते हैं लेकिन बहुत से महत्वपूर्ण कामों के लिए उसके पास समय ही नहीं होता है। ऐसी अवस्था में कौन उन्हें यह बात समझाएगा कि वे धन के अपव्यय के साथ-साथ समय की भी बरबादी करते हैं।

सौन्दर्य के लिए धन की आवश्यकता : जब विद्यार्थी सुंदर दिखने की भावना को प्रबल कर लेते हैं तो उन में धन विलासिता भी बढ़ जाती है। फैशन के जीवन को जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जव विद्यार्थी को फैशन का जीवन जीने के लिए धन आसानी से नहीं मिलता है तो वह झूठ का सहारा लेकर धन को प्राप्त करने की कोशिश करता है।

वह धन को पाने के लिए चोरी तक करने लगता है। ऐसा करने के बाद जुआ जैसे बुरे काम भी उनसे दूर नहीं रह पाते हैं। इस तरह से विद्यार्थी की मौलिकता खत्म हो जाती है और वह आधुनिक वातावरण में जीने लगता है। ऐसा करने से घर के लोगों से उसका संबंध टूट जाता है और सिनेमा के अभिनेता उसके आदर्श बन जाते हैं।

वे विद्यालय की जगह पर फिल्मों में अधिक रूचि लेने लगते हैं और अपने मार्ग से भटक जाते हैं। जो विद्यार्थी फैशन के पीछे भागते हैं वे अपने जीवन में कभी भी आगे नहीं बढ़ पाते हैं। आगे चलकर उन्हें पछताना ही पड़ता है।

सिनेमा का कुप्रभाव : आज के समय में हमारे जीवन में सिनेमा एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। ज्यादातर छात्र-छात्राएं फिल्मों से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। अमीर परिवार तो फैशनेबल कपड़े पहन सकते हैं और अपने बच्चों को भी फैशनेबल कपड़े पहना सकते हैं लेकिन गरीब लोग ऐसा नहीं कर सकते हैं। विद्यार्थियों में देखा-देखी फैशन की होड़ बढती ही जा रही है। टीवी की संस्कृति से हमारे देश के लोगों के लिए समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं। यह फैशनपरस्ती फिल्मों की ही देन है।

फैशन के दुष्परिणाम : आज के विद्यार्थियों में फैशन की प्रवृत्ति के बढने से केवल माता-पिता ही नहीं बल्कि पुरे समाज मे घातक सिद्ध हो रही है। गरीब परिवार के लोग अपने बच्चों की मांगों की पूर्ति नहीं कर पाते हैं। इसकी वजह से उनके घर के बच्चे घर में असहज वातावरण उत्पन्न कर देते हैं।

जो विद्यार्थी फैशन के पीछे भागते हैं वो सिनेमा घरों में जाकर अशोभनीय व्यवहार करते हैं ,गली मोहल्लों में हल्ला मचाते हैं और हिंसक गतिविधियों में भाग लेते हैं। जो विद्यार्थी फैशनपरस्ती होते हैं वे जीवन के विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं | जो विद्यार्थी फैशनपरस्ती के पीछे भागते हैं वो अपनी शिक्षा की तरफ ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसे विद्यार्थी अपने माता-पिता के सपनों को तोड़ देते हैं।

उपसंहार : हम यह कह सकते हैं कि फैशन विद्यार्थियों के लिए अच्छा नहीं होता है। विद्यार्थियों का आदर्श हमेशा सादा जीवन उच्च विचार होना चाहिए। फैशन के मामलों में विद्यार्थी को अपना जीवन कभी भी खर्च नहीं करना चाहिए।

विद्यार्थी का लक्ष्य बस अपने जीवन का निर्माण होना चाहिए। जो विद्यार्थी अपनी शिक्षा पर ध्यान देते हैं वे ही अपने जीवन में सफल होते हैं। बस फैशन के पीछे भागने वाले बाद में पछताते हैं।

विद्यार्थी और फैशन पर निबंध-Vidyarthi Aur Fashion Essay In Hindi

विद्दार्थी और फैशन

विद्या ही विद्यार्थी का आभूषण है| स्कूलों में तो यूनिफार्म अनिवार्य है| यह एक सुखद अहसास है क्योंकि स्कूल में सभी विद्यार्थी सिर्फ विद्या अर्जन के लिए आते है न कि कोई दिखावा करने| वहां जाति, लिंग,आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेद नही होता| अत: विद्यार्थियों से ये अपेक्षित है कि वे फेशन की आड़ में किसी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा न बनें| सादगी से रहे| अपना श्रम और समय अध्ययन में लगाये| वैसे भी विद्या की देवी सरस्वती है जो स्वयम श्वेत परिधान धारण करती है| अत्यंत सादगी से रहती है पर उनके मुख की आभा और तेज उन्हें सबकी पूजनीय बनाता है| अत: बाहरी चमक-दमक दिखाने की अपेक्षा बेहतर होगा विद्यार्थी अपना व्यक्तित्व आकर्षक बनाये अपने ज्ञान को विस्तृत बनाये| अत: निष्कर्ष रूप में महाकवि कालिदास जी की यह उक्ति प्रासंगिक होगी कि “सुन्दर वस्तुओं के विषय में प्रत्येक वस्तु अलंकार बन जाती है इसलिए विद्यार्थियों को भड़कीले परिधान , आभूषण और दिखावे को त्यागकर विद्या अर्जन को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए|”

रहने, खाने-पीने, वेशभूषा आदि में नई-नई रीतियों व ढंगों का अपनाया जाना ही फैशन है | अर्थात शारीरिक प्रसाधनो से समाज के समक्ष आत्म-प्रदर्शन करने को फैशन कहा जाता है | विभिन्न प्रकार की वेश-भूषा, केश –विन्यास व कपड़ो के नये-नये नमूने अपनाना ही आदुनिक फैशन को दर्शाने वाले है | फैशन को अपनाने के कुछ विशेष कारण है _ हिन् – भावना का होना, तथा आत्म – प्रदर्शन की लालसा का होना आदि | मानव सदैव अपनी सौदर्य – पिपासा की सन्तुष्टि हेतु फैशन का सहारा लेता है | विद्दार्थी जीवन पर तो प्रतिदिन परिवर्तित होने वाले फैशन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर  होता है |

प्राचीन भारत में फैशन करने का अधिकारी केवल गृहस्थो को ही माना जाता था | विद्दार्थी , सन्यासी , वानप्रस्थी तथा गुरु इससे पूर्ण रूप से अछूते रहते थे | उस समय विद्दार्थी जीवन में फैशन त्याज्य समझा जाता था | सादा जीवन तथा उच्चविचार ही उसेक लक्षण थे तथा विद्दार्जन ही उसका लक्ष्य था विद्दा अर्जित करने वाले को फैशन से क्या लेना देना ?

समय परिवर्तन के साथ-साथ मान्यताएँ भी बदल गई | पशिचमी सभ्यता के प्रभाव से खाओ, पीओ और मौज उडाओ ‘ जैसी मान्यताओ और स्वछन्द जीवन प्रणाली ने समाज के साथ – साथ विद्दार्थी वर्ग को भी बदल डाला वह विद्दा प्राप्ति के मूल लक्ष्य को भूलकर, समाज का अधानुकरण करने लग गया और शीघ्र ही फैशन का दास बन कर रह गया | वह विभिन्न प्रकार की वेशभूषा व केश- विन्यासों को अपनाने लगा चलचित्रों का विद्दार्थियो के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा| हीरो तथा हिरोइन के पहने हुए वस्त्र प्रत्येक युवक व युवती के लिए आदर्श वेशभूषा बन जाते है | धीरे – धीरे बालो का विन्यास भी दिलीप क्त, अमिताभ कट या धर्मेन्द्र कट होने लगा | युवतियों के हाथो की चूड़ियाँ और पहनने की साड़ियाँ आदि भी हीरोइनो की पसंन्द के अनुरप ही अपनाई जाने लगी | फैशन का यह प्रभाव केवल नगरो तक ही सीमित नही रहा बल्कि ग्रामो तक भी फैल गया |

फैशन ऐसी जोक है कि यदि इसे दूर न किया गया तो यह युवा समाज अर्थात विद्दार्थी वर्ग का सारा खून चूस जाएगी | विद्दार्थी को इससे बचना चाहिए | इसमें धन का अपव्यय होता है तथा विद्दार्थी पढाई – लिखाई से विमुख हो जाता है | विद्दार्थी को चाहिए कि वह अपना अधिकांश समय विद्दा – अर्जन में लगाए न कि फैशन करने में | विद्दार्थी जीवन में जो स्वर्णिम अवसर उसे प्राप्त हुआ है उसे नष्ट करना अपने भावी जीवन को नष्ट करना है | अंत : विद्दार्थी को फैशन से बचना चाहिए | फैशन का अंत ही जनहित है | गांधी जी के सिद्धांत ‘सादा जीवन उच्चविचार को अपनाना चाहिए |

विद्यार्थी और फैशन पर निबंध-Vidyarthi Aur Fashion Essay In Hindi

Vidyarthi aur fashion essay in hindi

yuva varg aur fashion essay in hindi-हेलो दोस्तों कैसे हैं आप सभी,आज का हमारा निबंध student and fashion essay in hindi आप सभी के लिए बहुत ही प्रेरणादायक है इसके अलावा हमारे इस nibandh का उपयोग विद्यार्थी अपने स्कूल या कॉलेज की परीक्षा में लिखने के लिए भी इस निबंध से जानकारी ले सकते हैं तो चलिए पढ़ते हैं हमारे आज के इस प्रेरणादायक निबंध को.

Vidyarthi aur fashion essay in hindi
Vidyarthi aur fashion essay in hindi

आजकल के इस आधुनिक युग में विद्यार्थी और फैशन एक साथ चलते हैं विद्यार्थी जो अपने स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई करते हैं वह अपने इस जीवन में तरह तरह के फैशन अपनाते हैं यहां पर फैशन से तात्पर्य है किसी व्यक्ति द्वारा अपने खान-पान,रहन-सहन,वेशभूषा आदि में नए तरह से बदलाव लाना फेशन होता है आज के इस आधुनिक युग में सबसे ज्यादा फैशन का प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ा है.विद्यार्थी अभिनेता और अभिनेत्रियों के द्वारा अपनाए गए नए नए फैशन को अपनाते हैं इन फैशन को अपनाने वाले लड़के और लड़कियां दोनों होते हैं जिस वजह से इस युवा उम्र में उनका काफी नुकसान भी होता है वह बहुत सा पैसा अपने इन फैशनो पर खर्च करते हैं.

पहले के जमाने में फैशन सिर्फ गृहस्थ् ही अपनाया करते थे लेकिन आज के इस आधुनिक युग में सभी तरह के वर्ग के लोग फैशन अपनाने लगे हैं जिनमें फेशन अपनाने वालों लोगों की संख्या में से सबसे ज्यादा विद्यार्थियों की है इन विद्यार्थियों में युवक एवं युवतियां हैं आजकल के फैशन के इस दौर में लड़के,लड़कियों को पहचानना भी मुश्किल है क्योंकि बहुत सी लड़कियां लड़कों की तरह कपड़े पहनती हैं लड़कों की तरह ही अपना हेयर स्टाइल बनाती हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे लड़के भी हैं जो लड़कियों की तरह हेयर स्टाइल बनाते हैं जिसकी वजह से उन्हें पहचानना भी मुश्किल होता है.विद्यार्थी जीवन वह जीवन होता है जिसमें एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को शिक्षा का ज्ञान कराकर जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है उन्हें शिक्षा देता है लेकिन फैशन के दौर में विद्यार्थी शिक्षा से ज्यादा अपने फैशन पर ध्यान देते हैं लोगों का फैशन बहुत ही तेजी से बदल रहा है आज हर कोई चाहता है कि मैं किसी दूसरे के सामने अच्छा दिखू,अच्छे कपड़े पहनू,नए फैशन के साथ उसके सामने प्रस्तुत होऊं जिससे उस पर कुछ अच्छा प्रभाव डाल सकूं.विद्यार्थियों का यह फैशन सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं रहा है गांव के विद्यार्थी भी आज फैशन के लिए जाने जाते हैं.

कॉलेजों में भी युवक,युवतिया अपने आपको अच्छा दिखाने के लिए तरह-तरह के फैशन करके आते हैं वह समझते हैं कि इससे सामने वाले पर कुछ अच्छा प्रभाव पड़ेगा आजकल के इस आधुनिक युग में ज्यादातर लोगों की धारणा बन चुकी है कि जो भी विद्यार्थी नए फैशन के साथ कॉलेज में नहीं आता उसको कुछ भी नहीं समझा जाता या उसका मजाक उड़ाया जाता है आजकल के जमाने में विद्यार्थी और फैशन दोनों साथ-साथ चल रहे हैं विद्यार्थी फिल्मी दुनिया के अभिनेता,अभिनेत्रियों से बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं और उन्हें देखकर उनका फैशन निरंतर बदलता जाता है.नया फैशन अपनाना कुछ गलत नहीं है लेकिन विद्यार्थी जीवन में हर किसी विद्यार्थी को इस फैशन से बचना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी जीवन का प्रमुख उद्देश्य केवल विद्या अर्जित करना होना चाहिए तभी वह जीवन में आगे बढ़ सकेगा.अगर वह अपना ध्यान फैशन की तरफ रखेगा तो वह अपनी शिक्षा के ज्ञान में कमजोर हो सकता है उसे हमेशा शिक्षा ग्रहण करने के बारे में सोचना चाहिए तभी वह जीवन में आगे बढ़ सकेगा तथा हर किसी को ऐसे नए फैशन से भी बचना चाहिए जो भड़कीला या काम वासना उत्पन्न करने वाला हो क्योंकि इससे वह अपने आपको मुसीबत में भी डाल सकते है और उसका जीवन भी मुसीबत में फंस सकता है और जीवन बर्बाद भी हो सकता हैं.कहने का तात्पर्य यह है कि विद्यार्थी को केवल शिक्षा ग्रहण करने के बारे में सोचना चाहिए उसको अपने शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाना चाहिए,इस फैशन से दूर रहना चाहिए क्योंकि इससे विद्यार्थी जीवन का अमूल्य समय नष्ट होता है.

एक कहावत है सादा जीवन उच्च विचार.जहां तक हो सके हमें सादा जीवन अपनाना चाहिए और विचार हमारे उच्च होना चाहिए लेकिन फिर भी आप ये ना कर सके तो कम से कम अपने विद्यार्थी जीवन को अमूल्य समझते हुए विद्यार्थी जीवन में जरूर ही सादा जीवन अपनाना चाहिए जिससे आने वाला भविष्य आप का उज्जवल हो सके.
पहले के जमाने में विद्यार्थी फैशन नहीं करते थे सादा जीवन अपनाते थे वह अपने गुरु के साथ गुरुकुल में रहते थे सादा जीवन और उच्च विचार ही उनका विद्यार्थी जीवन था उनके पास फैशन अपनाने के लिए ना तो समय था और ना ही परिवार वालों की किसी तरह की मदद मिलती थी लेकिन बदलते इस जमाने में विद्यार्थियों के लिए फैशन को अपनाने के लिए परिवार के लोगों द्वारा मदद भी की जाती है विद्यार्थी फैशन के नाम पर बहुत पैसा भी खर्च करते हैं कुछ विद्यार्थी तो ऐसे होते हैं जो अपने दोस्त से पढ़ाई के मामले में आगे निकले या ना निकले लेकिन फैशन के मामले में वह अपने दोस्त से आगे निकलना चाहते हैं इसके लिए वह बहुत सारा खर्च करते हैं उनका अमूल्य समय निरंतर बर्बाद होता जाता है और वह अपने अमूल्य समय को खोकर जीवन में कुछ भी खास नहीं कर पाते.विद्यार्थियों का जीवन और उनका समय बहुत ही अमूल्य है.विद्यार्थीयो पर ही हमारे देश का भविष्य निर्भर है लेकिन अगर विद्यार्थी अपना अमूल्य समय बर्बाद करता रहे तो हमारे देश के भविष्य का क्या होगा इसलिए हमें विद्यार्थियों को सबसे ज्यादा विद्या अर्जित करने की ओर ध्यान दिलाना होगा और इस फैशन के कीड़े को विद्यार्थियों से दूर करना होगा.

एक समय था जब बच्चों के माता-पिता अपनी इच्छानुसार वस्त्र पहनते थे। तब बच्चों को भी इतना ज्ञान नहीं था कि फैशन के वस्त्र पहनना क्या होता है। माता-पिता जो कपड़े ला के देते थे वह कपड़े बच्चे खुशी-खुशी पहन लेते थे, लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है।
आज समय और परिस्थतियां परिवर्तित हो गई हैं। आज बच्चों का फैशन के प्रति बहुत तीव्रता से आकर्षण बढ़ा है। आज के युग के छोटे-छोटे बच्चे जिनके दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं, उन्हें भी फैशन का कीड़ा काटने लगा है। मेरा स्वयं का बेटा तोहीद जो मात्र अभी ढाई वर्ष का है वह भी बढ़िया वस्त्र अपनी पसंद के पहनता है और उसकी पसंद मेें हस्तक्षेप करना आफत मोल लेने के बराबर है। बहुत आश्चर्य होता है यह देख कर कि जिस फैशन का क्रेज युवा पीढ़ी तक सीमित था आज वह छोटे बच्चों से लेकर प्रौढ़ और वृद्धजनों तक विस्तार पा चुका है। फैशन के निरन्तर बढ़ते क्रेज ने बच्चों को इस सीमा तक प्रभावित किया है कि वह युवावस्था में कदम रखने से पूर्व ही अपने शारीरिक सौष्ठव को आकर्षक बनाने के लिए फैशन के अनगिनत प्रयोग स्वयं के ऊपर करने लगे हैं।
फैशन की इस अंधी दौड़ में कभी वह आकर्षक नजर आते हैं तो कभी नमूना बनकर हंसी का पात्र बनते हैं।
फैशन के प्रति बच्चों के आकर्षण का  मुख्य कारण टी.वी. चैनल के विज्ञापनों और फिल्मों में फैशन को प्रमुखता से दिखाया जाना भी है।
फैशन जिससे दो शब्द भी सम्बन्धित हैं जिसमें प्रथम फैड और क्रेज इन शब्दों को हम इस प्रकार से भी समझ सकते हैं कि फैड को धुन और क्रेज को हम उन्माद भी कह सकते हैं। फैशन के प्रति धुन की अधिकता ही उन्माद के रूप में परिवर्तनशील आकर्षक प्रक्रिया है। आज कुछ तो कल कुछ।
फैशन को आधार प्रदान करने में वस्त्रों का महत्वपूर्ण योगदान होता है वस्त्रों के सम्बन्ध में हरलॉक के शब्द फैशन में वस्त्रों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हैं। वस्त्रों का एक मुख्य मूल्य यह है कि वह व्यक्तियों को अपना इस प्रकार विज्ञापन करने योग्य बनाते हैं जिससे कि वे दूसरों का ध्यान और प्रशंसा आकर्षित कर सकते हैं।
बहुत से लोग जिसमें कोई योग्यता नहीं होती और जो अपने गुणों के आधार पर औसत से ऊपर उठने की आशा नहीं कर सकते, वस्त्रों के माध्यम से सम्मान की इस इच्छा को सन्तुष्ट करने का साधन पा जाते हैं। फैशन में हो रहे निरन्तर परिवर्तन के सम्बन्ध में दिल्ली निवासी जींस के निर्माता रईस अहमद का कहना है कि फैशन को नवीन आधार देने व परिवर्तन की दिशा को स्थापित करने में प्रसिद्ध और चर्चित व्यक्तियों का विशेष स्थान होता है। इस श्रेणी के अंतर्गत फिल्म स्टार व मॉडल आते हैं। यह लोग समाज में एक आदर्श के रूप में होते हैं, इस कारण लोग उनकी हर अच्छी बुरी बात का अनुकरण बिना सोचे करते हैं। उनके द्वारा स्थापित फैशन शीघ्र ही उन्माद का रूप धारण कर लेता है। जिसमें बच्चे, युवा, प्रौढ़ सभी डूब जाते हैं और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत जैसे गरीब देश में भी लोग अपनी आय का अधिक हिस्सा फैशन की चीजों और वस्त्रों की खरीद पर व्यय करते हैं।
मध्यम वर्ग के स्त्री- पुरुषों में फैशन की प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है। बहरहाल फैशन आज के बदलते युग की मांग है इसलिए अभिभावकों का कर्तव्य बनता है कि वह अपने बच्चों में फैशन के वास्तविक अर्थ समझायें। यह फैशन ही है जो आपको आकर्षक भी बना सकता है और वहीं दूसरी ओर आपके व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह भी लगा सकता है।

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वर्तमान शिक्षा प्रणाली-Essay on Modern Education System in Hindi

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वर्तमान शिक्षा प्रणाली-Essay on Modern Education System in Hindi

वर्तमान शिक्षा प्रणाली :

भूमिका : भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली को परतंत्र काल की शिक्षा प्रणाली माना जाता है। यह ब्रिटिश शासन की देन मानी जाती है। इस प्रणाली को लॉर्ड मैकाले ने जन्म दिया था। इस प्रणाली की वजह से आज भी सफेद कॉलरों वाले लिपिक और बाबु ही पैदा हो रहे हैं। इसी शिक्षा प्रणाली की वजह से विद्यार्थियों का शारीरिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता है।

प्राचीन भारत में शिक्षा का महत्व : प्राचीन काल में शिक्षा का बहुत महत्व था। सभ्यता , संस्कृति और शिक्षा का उदय सबसे पहले भारत में हुआ था। प्राचीनकाल में शिक्षा का स्थान नगरों और शोरगुल से बहुत दूर वनों के गुरुकुल में होता था। इन गुरुकुलों का संचालन ऋषि -मुनि करते थे। प्राचीन काल में विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और अपने गुरु के चरणों में बैठकर ही पूरी शिक्षा प्राप्त करते थे।

कुछ इसी तरह के विद्यालय तक्ष शिला और नालंदा थे। यहाँ पर विदेशी भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। फिर मध्ययुग आया तब भारत को लम्बे समय तक परतंत्रता भोगनी पड़ी थी। मुसलमानों के युग में अरबी-फारसी शिक्षा का प्रसार हुआ। जब 18 वीं और 19 वीं शताब्दी आई तो शिक्षा को केवल अमीर और सामंत ही ग्रहण कर सकते थे। स्त्री शिक्षा तो लगभग खत्म ही हो गई थी।

नवीन शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता : हमारा भारत 15 अगस्त , 1947 को आजाद हुआ था। हमारे कर्णधारों का ध्यान नई शिक्षा प्रणाली की तरफ गया क्योंकि ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली हमारी शिक्षा प्रणाली के अनुकूल नहीं थी। गाँधी जी ने शिक्षा के विषय में कहा था कि शिक्षा का अर्थ बच्चों में सारी शारीरिक ,मानसिक और नैतिक शक्तियों का विकास करना होता है। शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए अनेक समितियां बनाई गयीं।

कमेटी द्वारा एक विशाल योजना बनाई गई जो तीन साल के भीतर 50 % शिक्षा का प्रसार कर सके। सैकेंडरी शिक्षा का निर्माण किया गया। विश्वविद्यालय से ही समस्या को सुलझाने के प्रयास किये गये। बाद में बेसिक शिक्षा समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारत में बेसिक शिक्षा का प्रसार करना था। अखिल भारतीय शिक्षा समिति की सिफारिस की वजह से बच्चों में बेसिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया था।

कोठारी आयोग की स्थापना : शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए कोठारी आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर नई योजना लागु करने की सिफारिश की। इस योजना की चर्चा-परिचर्चा लम्बे समय तक चली थी। देश के बहुत से राज्यों में इस प्रणाली को लागु किया गया था। इस प्रणाली से दस साल तक दसवीं कक्षा में सामान्य शिक्षा होगी।

इसमें सभी विद्यार्थी एक जैसे विषयों का अध्ययन करेंगे। इस पाठ्यक्रम में दो भाषाएँ , गणित , विज्ञान और सामाजिक पांच विषयों पर अध्ययन किया जायेगा। लेकिन विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा से भी परिचित होना चाहिए। सातवीं की परीक्षा के बाद विद्यार्थी अलग-अलग विषयों पर अध्ययन करेंगे। अगर वो चाहे तो विज्ञान ले सकता है, कॉमर्स ले सकते हैं , और औद्योगिक कार्यों के लिए क्राफ्ट भी ले सकता है।

नवीन शिक्षा नीति के लाभ : नवीन शिक्षा प्रणाली को रोजगार को सामने रखकर बनाया गया है। हम लोग अक्सर देखते हैं कि लोग विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में भाग तो लेते हैं लेकिन पढने में उनकी रूचि नहीं होती है। ऐसे लोग समाज में अनुशासनहीनता और अराजकता पैदा करते हैं। नई शिक्षा नीति से हमें यह लाभ होगा कि ऐसे विद्यार्थी दसवीं तक ही रह जायेगे और वे महाविद्यालय में प्रवेश नहीं ले पाएंगे।

जो विद्यार्थी योग्य होंगे वे कॉलेजों में प्रवेश ले सकेंगें। दसवीं करने के बाद विद्यार्थी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर रोजगार प्राप्त कर सकेंगे। लेकिन अगर हमें नवीन शिक्षा प्रणाली को सफल बनाना है तो स्थान-स्थान पर डिप्लोमा पाठ्यक्रम खोलने पड़ेंगे जिससे दसवीं करने के बाद विद्यार्थी कॉलेजों की तरफ नहीं भागें।

उपसंहार : इससे शिक्षित लोगों की बेरोजगारी में कमी आएगी और शिक्षित लोगों का समाज में मान-सम्मान होगा। इस शिक्षा प्रणाली से विद्यार्थियों का सर्वंगीण विकास होगा और यह भविष्य के निर्माण के लिए भी सहायक होगी। इस प्रणाली को पूरी तरह से सफल बनाने का भार हमारे शिक्षकों पर है।

सरकार को इस बात पर ध्यान देना होगा कि योग्य विद्यार्थी ही शिक्षक बने क्योंकि वो ही उत्तम शिक्षा दे पाएंगे। नई शिक्षा नीति में इस बात पर बल दिया गया है योग्य शिक्षक ही शिक्षा जगत में प्रवेश कर सकते हैं। इसके साथ इस बात पर भी बल दिया गया है कि विद्यार्थियों को रोजगार के अधिक से अधिक अवसर मिलें।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली-Essay on Modern Education System in Hindi

आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध | Essay on Modern Education System in Hindi!

किसी भी राष्ट्र अथवा समाज में शिक्षा सामाजिक नियंत्रण, व्यक्तित्व निर्माण तथा सामाजिक व आर्थिक प्रगति का मापदंड होती है । भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है जिसे सन् 1835 ई॰ में लागू किया गया ।

जिस तीव्र गति से भारत के सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक परिदृश्य में बदलाव आ रहा है उसे देखते हुए यह आवश्यक है कि हम देश की शिक्षा प्रणाली की पृष्ठभूमि, उद्‌देश्य, चुनौतियों तथा संकट पर गहन अवलोकन करें ।

सन् 1835 ई॰ में जब वर्तमान शिक्षा प्रणाली की नींव रखी गई थी तब लार्ड मैकाले ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अंग्रेजी शिक्षा का उद्‌देश्य भारत में प्रशासन के लिए बिचौलियों की भूमिका निभाने तथा सरकारी कार्य के लिए भारत के विशिष्ट लोगों को तैयार करना है ।

इसके फलस्वरूप एक सदी तक अंग्रेजी शिक्षा के प्रयोग में लाने के बाद भी 1935 ई॰ में भारत की साक्षरता दस प्रतिशत के आँकड़े को भी पार नहीं कर पाई । स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता मात्र 13 प्रतिशत ही थी ।

इस शिक्षा प्रणाली ने उच्च वर्गों को भारत के शेष समाज में पृथक् रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । ब्रिटिश समाज में बीसवीं सदी तक यह मानना था कि श्रमिक वर्ग के बच्चों को शिक्षित करने का तात्पर्य है उन्हें जीवन में अपने कार्य के लिए अयोग्य बना देना । ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली ने निर्धन परिवारों के बच्चों के लिए भी इसी नीति का अनुपालन किया ।

लगभग पिछले दो सौ वर्षों की भारतीय शिक्षा प्रणाली के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह शिक्षा नगर तथा उच्च वर्ग केंद्रित, श्रम तथा बौद्‌धिक कार्यों से रहित थी । इसकी बुराइयों को सर्वप्रथम गाँधी जी ने 1917 ई॰ में गुजरात एजुकेशन सोसायटी के सम्मेलन में उजागर किया तथा शिक्षा में मातृभाषा के स्थान और हिंदी के पक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर तार्किक ढंग से रखा । स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में शांति निकेतन, काशी विद्‌यापीठ आदि विद्‌यालयों में शिक्षा के प्रयोग को प्राथमिकता दी गई ।

सन् 1944 ई॰ में देश में शिक्षा कानून पारित किया गया । स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत हमारे संविधान निर्माताओं तथा नीति-नियामकों ने राष्ट्र के पुननिर्माण, सामाजिक-आर्थिक विकास आदि क्षेत्रों में शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया । इस मत की पुष्टि हमें राधाकृष्ण समिति (1949), कोठारी शिक्षा आयोग (1966) तथा नई शिक्षा नीति (1986) से मिलती है ।

 

शिक्षा के महत्व को समझते हुए भारतीय संविधान ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए शिक्षण संस्थाओं व विभिन्न सरकारी अनुष्ठानों आदि में आरक्षण की व्यवस्था की । पिछड़ी जातियों को भी इन सुविधाओं के अंतर्गत लाने का प्रयास किया गया । स्वतंत्रता के बाद हमारी साक्षरता दर तथा शिक्षा संस्थाओं की संख्या में नि:संदेह वृद्‌धि हुई है परंतु अब भी 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या निरक्षर है ।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्रता के बाद विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा व प्राविधिक शिक्षा का स्तर तो बढ़ा है परंतु प्राथमिक शिक्षा का आधार दुर्बल होता चला गया । शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्रीयता, चरित्र निर्माण व मानव संसाधन विकास के स्थान पर मशीनीकरण रहा जिससे चिकित्सकीय तथा उच्च संस्थानों से उत्तीर्ण छात्रों में लगभग 40 प्रतिशत से भी अधिक छात्रों का देश से बाहर पलायन जारी रहा ।

देश में प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता के नाम पर लूट-खसोट, प्राथमिक शिक्षा का दुर्बल आधार, उच्च शिक्षण संस्थानों का अपनी सशक्त भूमिका से अलग हटना तथा अध्यापकों का पेशेवर दृष्टिकोण वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए एक नया संकट उत्पन्न कर रहा है ।

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के नए चेहरे, निजीकरण तथा उदारीकरण की विचारधारा से शिक्षा को भी ‘उत्पाद’ की दृष्टि से देखा जाने लगा है जिसे बाजार में खरीदा-बेचा जाता है । इसके अतिरिक्त उदारीकरण के नाम पर राज्य भी अपने दायित्वों से विमुख हो रहे हैं ।

इस प्रकार सामाजिक संरचना से वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संबंधों, पाठ्‌यक्रमों का गहन विश्लेषण तथा इसकी मूलभूत दुर्बलताओं का गंभीर रूप से विश्लेषण की चेष्टा न होने के कारण भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज भी संकटों के चक्रव्यूह में घिरी हुई है । प्रत्येक दस वर्षों में पाठ्य-पुस्तकें बदल दी जाती हैं लेकिन शिक्षा का मूलभूत स्वरूप परिवर्तित कर इसे रोजगारोन्मुखी बनाने की आवश्यकता है ।

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली गैर-तकनीकी छात्र-छात्राओं की एक ऐसी फौज तैयार कर रही है जो अंततोगत्वा अपने परिवार व समाज पर बोझ बन कर रह जाती है । अत: शिक्षा को राष्ट्र निर्माण व चरित्र निर्माण से जोड़ने की नितांत आवश्यकता है ।

 

शिक्षा का वास्तविक अर्थ होता है, कुछ सीखकर अपने को पूर्ण बनाना। इसी दृष्टि से शिक्षा को मानव-जीवन की आंख भी कहा जाता है। वह आंख कि जो मनुष्य को जीवन के प्रति सही दृष्टि प्रदान कर उसे इस योज्य बना देती है कि वह भला-बुरा सोचकर समस्त प्रगतिशील कार्य कर सके। उचित मानवीय जीवन जी सके। उसमें सूझ-बूझ का विकास हो, कार्यक्षमतांए बढ़ें और सोई शक्तियां जागगर उसे अपने साथ-साथ राष्ट्री के जीवन को भी प्रगति पथ पर ले जाने में समर्थ हो सकें। पर क्या आज का विद्यार्थी जिस प्रकार की शिक्षा पा रहा है, शिक्षा प्रणाली का जो रूप जारी है, वह यह सब कर पाने में समथ्र है? उत्तर निश्चय ही ‘नहीं’ है। वह इसलिए कि आज की शिक्षा-प्रणाली बनाने का तो कतई नहीं। यही कारण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतना वर्षों बाद भी, कहने को शिक्षा बहुत अधिक विस्तार हो जाने पर भी, इस देश के व्यक्ति बहुत कम प्रतिशत आमतौर पर साक्षर से अधिक कुछ नहीं हो पाए। वह अपने आपको सुशिक्षित तो क्या सामान्य स्तर का शिक्षित होने का दावा भी नहीं कर सकता। इसका कारण है, आज भी उसी घिसी-पिटी शिक्षा-प्रणाली का जारी रहना कि जो इस देश को कुंठित करने, अपने साम्राज्य चलाने के लिए कुछ मुंशी या क्लर्क पैदा करने के लिए लार्ड मैकाले ने लागू की थी। स्वतंत्रता-प्राप्ति के लगभग पचास वर्ष बीत जाने के बाद भी उसके न बदल पाने के कारण ही शिक्षा ही वास्तविकता के नाम पर यह देश मात्र साक्षरता के अंधेरे में भटक रहा है। वह भी विदेशी माध्यम से, स्वेदेशीपन के सर्वथा अभाव में।

हमारे विचार में वर्तमान शिक्षा-प्रणाली शिक्षित होने के दंभ ढोने वाले लोगों का उत्पादन करने वाली निर्जीव मशीन मात्र बनकर रह गई है। तभी तो वह उत्पादन के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों दिशाहीन नवयुवकों को उगलकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती है। इस शिक्षा-प्रणाली का ही तो दोष है कि बी.ए., एम.ए. करने के बाद भी सक्रियता या जीवन व्यवहारों के नाम पर व्यक्ति अपने को कोरा-बल्कि थका-हारा और पराजित तक अनुभव करने लगता है। यह प्रणाली अपने मूल रूप में कई-कई विषयों की सामान्यत जानकारी देकर शिक्षित होने का बोझ तो हम पर लाद देती है, पर वास्तिवक योज्यता और व्यावहारिकता का कोना तक भी नहीं छूने देती। परिणामस्वरूप व्यक्ति व्यक्तित्व से हीन होकर अपने लिए ही एक अबूझ पहेली और बोझ बनकर रह जाता है। ऐसे व्यक्ति से देश जाति के लिए कुछ कर पाने की आशा करना व्यर्थ है।

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