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Nagaur District GK in Hindi नागौर जिला Rajasthan GK in Hindi

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Nagaur District GK in Hindi नागौर जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

नागौर जिले का सामान्य ज्ञान

Rajasthan Gk In Hindi Series 62

Rajasthan Gk In Hindi Series 61

  • नागौर – पंचायती राज की शुरुआत [2 अक्टूबर 1959]
  • v मकराना – संगमरमर के लिए प्रसिद्ध
  • v मेड़ता सिटी – देश की पहली रेल बस [मेड़ता शहर से मेड़ता रोड (15 किमी) सन् 1994 में प्रारम्भ प्रतिदिन यह रेल बस छ: चक्कर लगाती है.
  • v लाडनू – जैन विश्व भारती संस्था
  • v परबतसर – राज्य का सबसे बड़ा पशु मेला
  • v राजस्थान में अनुसूचित जनजाति की सबसे कम आबादी.
  • v राज्य के सर्वाधिक पशु मेले नागौर में आयोजित किए जाते है.
  • v राज्य में सर्वाधिक दलहन का उत्पादक जिला.
  • v सर्वाधिक क्षेत्रफल में मुंग बोई और उत्पादन सर्वाधिक होता है.
  • v पशु सम्पदा नागौर जिला का चौथा स्थान है.
  • v भौगोलिक परिदृश्य à
  • v स्थिति à 25025” से 27040” उत्तरी अक्षांश और 73018 से 75015’ पूर्वी देशांतर के मध्य
  • v वर्षा à17 से.मी.,
  • v क्षेत्रफल à 17,718 वर्ग किमी.
  • v प्रमुख नदी à लूनी
  • v बांध à भाकरी भोलास, हरसोट, मुंडवा का लाखोलाव तालाब, डेगाना का प्रताप सागर, परबतसर का पीर जी का नाका और डेगाना का हरसौर बांध प्रसिद्ध है.
  • v वन à93 वर्ग किलोमीटर. न्यूनतम वन क्षेत्र में नागौर का दूसरा स्थान
  • v इतिहास à राजस्थान के निर्माण से पूर्व नागौर जोधपुर रियासत का भाग था.
  • v प्राचीन नाम à अहिच्छत्रपुर था.
  • v जिला प्रमुख à बिंदु चौधरी
  • v सांसद – ज्योति मिर्धा
  • v जिलाधीश à नागौर जिला कलेक्टर –>अशोक भंडारी
  • Rajasthan Gk In Hindi Series 100

    Rajasthan Gk In Hindi Series 99

  • v लोक देवता à
    • o पीपासर – जांभोजी का जन्मस्थल
    • o खरनाल – तेजाजी का जन्मस्थल
    • o भुंडेल – हडबुजी का स्थान
    • o मेड़ता – कल्लाजी का स्थान
    • o पांचौरा – तल्लीनाथ जी की मूर्ति स्थापित
  • v राजस्थान की धातु नगरी
  • v शिकार प्रतिबंधित क्षेत्र – जरोदा और रोतू
  • v नागौर जिले की बरुण गाँव की बकरियां देश में प्रसिद्ध
  • v नागौरी नस्ल की गाय और बैलो के लिए नागौर में प्रजनन केन्द्र स्थापित
  • v स्थानीय प्रशासन à उपखंड – 9, तहसील -10 , उप तहसीले -7 , कुल राजस्व ग्राम -1577 , ग्राम पंचायत -461 , पुलिस थाने -30 , चौकियां -21 , कारागृह -5 , निकाय -10 , विधानसभा क्षेत्र -10 , पंचायत समिति -11, नवीनतम घोषित ग्राम – 77, पटवार सर्किल -432.
  • v नागौर जिला राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है. जिला कलेक्टर जिला प्रशासन का सिर है. जिला प्रशासन में दो अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (नागौर एंड डीडवाना) उसे प्रशासनिक कर्तव्यों केनिर्वहन में मदद.
  • v उप डिवीजन कार्यालय — उप विभाजन के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सहायता प्रदान में दस उप मंडल अधिकारी (SDOs) काम करते हैं. नागौर जिले के दस उप डिवीजनों है जो कर रहे हैं:

नागौर, खींवसर, जायल, मेड़ता, डेगाना, डीडवाना, लाडनू, परबतसर, मकराना, नावां

  • v तहसील इस जिले में दस तहसील मुख्यालय हैं. हर एक प्रशासनिक अधिकारी, जो भूमि – रिकॉर्ड करने के लिए ग्रामीण किसानों और जमीन धारकों की सेवा प्रणाली के साथ अनुसार काम करता है के रूप मेंएक तहसीलदार है. जिले की तहसीलें हैं: नागौर, खींवसर, जायल, मेड़ता, डेगाना, डीडवाना, लाडनू, परबतसर, मकराना, नावां

तहसील “पटवार – मंडलों की एक संख्या है, जिनमें से प्रत्येक एक ‘पटवारी landholders औरकिसानों के लिए गांव स्तर पर सेवा में शामिल है. कुचामन, देह, मौलासर, संजू, रियान, भेरुंडा और पीलवा – सात अपर / उप तहसील अर्थात् हैं.

  • v ब्लॉक (पंचायत समितियों) नागौर जिले के 11 पंचायत समितियों ब्लॉक जो विकास इकाइयों में विभाजित है. प्रत्येक ब्लॉक(खंड विकास अधिकारी) बीडीओ ग्रामीण क्षेत्रों में जिला प्रशासन के representives के रूप में सेवा कीहै. नागौर, मुंडवा, जायल, मेड़ता, रिया बड़ी, डेगाना, डीडवाना, लाडनू, परबतसर, मकराना, कुचामन
  • v विभिन्न विकास और ग्रामीण स्तर (ग्राम पंचायत स्तर) पर काम करता है परियोजनाओं ब्लॉककार्यालयों के माध्यम से चलाए जा रहे हैं. एक ग्राम सेवक प्रत्येक ग्राम पंचायत में नियुक्त किया जाता है विकास कार्यों का रिकार्ड रखने के लिए और आवश्यक विकास कार्य परियोजना. “ग्राम सभा(विलेज बैठक) निश्चित अंतराल पर आयोजित कर रहे हैं गांवों के विकास के बारे में चर्चा. जिले में 461 ग्राम पंचायतों हैं.

डीडवाना को लोग आभा-नगरी उपकाशी के नाम से भी जानते है !

  • v जिले के विधायक à
  • o लाडनू – हरजीराम बुरडक (निर्दलीय)
  • o डीडवाना – रूपराम डूडी (कांग्रेस)
  • o जायल – मंजू मेघवाल (कांग्रेस)
  • o नागौर – हबीबुर्रहमान (भाजपा)
  • o खींवसर – हनुमान बेनीवाल (भाजपा)
  • o मेड़ता – सुखराम मेघवाल (भाजपा)
  • o डेगाना – अजय किलक (भाजपा)
  • o मकराना – जाकिर हुसैन (कांग्रेस)
  • o नावां – महेंद्र चौधरी (कांग्रेस)
  • o परबतसर – मानसिंह (भाजपा)
  • v प्रथम अशोक चक्र विजेता – हवलदार शम्भूदयाल सिंह

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  • v बनवारी लाल जोशी – दिल्ली, मेघालय के उपराज्यपाल और उत्तराखंड के राज्यपाल रहे जोशी को हल में उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया है. (छोटी खाटू गाँव – नागौर)
  • v राजस्थान राज्य टंग्स्टन विकास निगम लि. – डेगाना (22 नवम्बर 1988)
  • v कुचामन – लोकनाट्य कुचामन ख्याल के लिए प्रसिद्ध है. लच्छीराम इसके प्रसिद्ध कलाकार है.
  • v डीडवाना – यहाँ पर खारे पानी की झील स्थित है जिसका विस्तार १० वर्ग किलोमीटर है क्षेत्र है. यहाँ प्रमुख उद्योग राजस्थान स्टेट केमिकल्स वर्क्स स्थित है जो सोडियम सल्फाइड व सोडियम सल्फेट का निर्माण करता है.
  • v गोटन – सन् 1984 में सफेद सीमेंट का बनाने का राज्य का पहला कारखाना स्थित है.
  • v मेड़ता सिटी – भक्त शिरोमणी मीरा बाई का विशाल मंदिर . [ चारभुजा नाथ मंदिर इसका का निर्माण मीरा बाई के पितामह ने करवाया था ] श्रावणी एकादशी से पूर्णिमा तक प्रतिवर्ष झूलोत्सव मेला लगता है. मेड़ता के राजा मालदेव ने भी मालकोट किला बनाया.
  • v जायल – गोठ मांगलोद गाँव में दधिमाता का प्राचीन मंदिर है.
  • v नागौर दुर्ग – अमरसिंह राठौर की नगरी नागौर परकोटे के मध्य बसाई गई थी. नागौर दुर्ग धान्वन दुर्ग का उदाहरण है. राव अमरसिंह राठौर की छतरी – नागौर में झडा तालाब में.
  • v भवाल माता का मंदिर – मेड़ता सिटी से 32 किलोमीटर की पर जसनगर क पास भवाल माता का मंदिर.
  • v जिप्सम – देश में कुल उत्पादित जिप्सम का 93 प्रतिशत राजस्थान में होता है राजस्थान के जिप्सम के दो-तिहाई भण्डार नागौर जिले में है.
  • v डेगाना भाखरी-सामरिक महत्त्व के खनिज टंगस्टन की एकमात्र खान
  • v कुडकी (मेड़ता) कृष्ण भक्त मीराबाई का जन्म स्थान
  • v अबुल फजल , फैजी का जन्म स्थान
  • v डेगाना – देश की सबसे बड़ी टंगस्टन खनन परियोजना
  • v परबतसर – राज्य का सबसे बड़ा पशु मेला वीर तेजाजी

Rajasthan Gk In Hindi Series 62

Rajasthan Gk In Hindi Series 61

डाबड़ा कांड —  ग्राम डाबड़ा में 13 मार्च 1947  को किसानों एवं जमींदारों के बीच घमासान युद्ध लड़ा गया था। इसमें पांच किसान नेताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी व कई घायल हुए।

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District Statistics

                                 CENSUS DATA 2011 (Provisional)

     Category Numbers
Total Population 3309234
Male 1698760
Female 1610474
% Decadal Growth (2001-11) 19.25
Sex Ratio 948
Density 187
Child Population (0-6) 498585
Literacy Rate (Total) 64.08
Literacy Rate (Male) 78.90
Literacy Rate (Female) 48.63

Panchayati Raj

S.N. Name of Panchayat Samiti (P.S.) P.S. Members Gram Panchayats Total Wards in P.S. Total Zila Parishad Members
1 Nagaur 27 47 565 47
2 Mundwa 23 39 449
3 जायल 27 45 527
4 Merta 21 34 422
5 Riyan 21 38 438
6 डेगाना 25 43 497
7 Didwana 33 57 677
8 Ladnu 19 32 376
9 परबतसर 21 35 427
10 Makrana 25 36 466
11 Kuchaman 31 55 633
12 Total 273 461 5477

          Religion wise Percentage                  

     Religion As per 1991 Census As per 2001 Census
Numbers Percentage (%) Numbers Percentage (%)
Hindu 1867744 87.08 2399173 86.45
Muslim 259632 12.11 356405 12.84
Sikh 197 0.01 998 0.04
Jain 16743 0.77 17478 0.63
Critstian 312 0.02 570 0.02
Other 182 0.01 434 0.02
Total 2144810 100% 2775058 100%

                       Police Network

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     Rank Numbers (Strength)
Superintendent of Police  (S.P.) 1
Addl. Superintendent of Police  (Addl.S.P.) 2
Deputy Superintendent of Police  (Dy.S.P.) 7
Inspector 12
Sub Inspector  (S.I.) 63
Assistant Sub Inspector  (A.S.I.) 103
Head Constable 147
Constable 1374
Police Thana 31
Police Chowkies 30

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                          Education

Descriptions Numbers
Sr. Secondary Schools 270
Secondary Schools 471
Middle Schools 2407
Primary Schools 3043
School Lecturers (strength) 767
Second Grade Teachers (strength) 3193
Third Grade Teachers (strength) 11021


Health

Description Nos.
Hospitals / Dispensaries 11
Primary Health Centres 968
Sub Health Centres 679
Beds 1458
Community Health Centres 17
Block Primary Health Centres 11
Medical Relief Society 105
Ayurvedic Hospitals / Dispensaries 154
Homeopathic Hospitals 3
Yunani Hospitals 4
Allopethic Hospitals 2

                    
Banking facilities

S.No. Name of Bank/Institution No. of Branches
1 United Commercial Bank (UCO Bank) 20
2 State Bank of Bikaner & Jaipur 32
3 State Bank of India 6
4 Centra Bank of India 10
5 Panjab National Bank 4
6 Oriental Bank of Commerce 4
7 Bank of Baroda 3
8 Canara Bank 3
9 Bank of Rajasthan / ICICI 8
10 IndusInd Bank 2
11 Union Bank of India 1
12 Axis Bank 1
13 Corporation Bank 1
14 Jaipur Nagaur Anchlik Gramin Bank 57
15 Nagaur Central Cooperative Bank 15
16 Nagaur Bhumi Vikas Bank 4
17 Nagaur Unban Cooperative Bank 2
18 Rajathan Finance Corporation (R.F.C.) 2
19 Khadi Gramodyog Board (K.V.I.B.) 1

Communication Network 

S.No. Category Numbers
1 Post Office 542
2 Telegraph Offices 2
3 Telephone Exchanges 168
4 Public Call Offices 1158

                Energy  

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S.No. Description Numbers
1 Consumers 343241
2 Electricity Comsumed (MKV) 1378.46 LU
3 Electrified Wells 43318
4 400 KVA GSS 1
5 220 KVA GSS 5
6 132 KVA GSS 22 (1 in progress)
7 33 KVA Sub Station 246
8 33 KV Line 2612.816
9 11 KV Line 15939.531
10 LT Line 18790.649

Road Network 

S.No. Category of Road Length in Kms.
1 National Highway  (N.H. No. 65, 89) 330.00
2 B.T. Road 7069.70
3 Metal Road 1.50
4 Gravel Road 321.85
5 Kuchcha Road 28.85
Total 7750.90

नागौर की बेटी ने एवरेस्ट पर फहराया हिन्दुस्तान का झंडा —  दीपिका राठौड़ [मई 2012, मौलासर(डीडवाना)]

नए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक – डॉ. लक्ष्मण सिंह राठौड़ [2012]

नागौर जिले में पर्यटक स्थल

 

नागौर किले – सैंडी किला, केन्द्र स्थित है, 2 सदी पुराने, देखा कई लड़ाइयों, उदात्त दीवारों और विशाल परिसर, कई महलों और मंदिरों के अंदर रही है.

Tarkeen दरगाह – अजमेर दरगाह के बाद हाल प्रसिद्ध पवित्र जगह है, मुसलमानों और सूफियों के लिए.

ग्लास में जैन मंदिर – कांच की बुलंद संरचना, जैन समुदाय के लिए पवित्र जगह.

Saiji का टंका – एक प्रसिद्ध संत की समाधि, सादगी और सच्चाई के साथ आत्मा की मुक्ति प्रेरित करती है, सांप्रदायिक सौहार्द के एक प्रतीक है.

अन्य स्थानों अमर सिंह राठौड़ की कब्र, बंसीवाला मंदिर, नाथ जी की छतरी, बरली

खींवसर — खींवसर फोर्ट राष्ट्रीय राजमार्ग जोधपुर की ओर नंबर 65 पर नागौर से 42 किमी दूर स्थित है, थार रेगिस्तान के बीच में 500 साल पुराना किला, आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित होटल में बदल गयाहै. मुगल सम्राट औरंगजेब यहाँ रहने खींवसर शहर के 25 छोटे मंदिरों, काला हिरण झुंड में घूम केएक बहुत लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण हैं.

पशु मेले

रामदेव पशु मेला à नागौर (राजस्थान का तीसरा सबसे बड़ा पशु मेला) [माघ]

वीर तेजाजी मेला à परबतसर (राजस्थान का दूसरा बड़ा मेला) [श्रावण]

Other important Fairs of Nagaur District

S.No. Name of fair Place   Date
1 Sheetla Asthami mela Nagaur Chaitra Krishna Asthami
2 Hariram baba ka mela Jhorda Bhadwa Shukla Chaturthi-Panchami
3 Hanumanji ka mela Shribalaji Chaitra Shukla Purnima, Ashvin Shukla Purnima
4 Meerabai Charbhuja mela Merta City Baishakh Shukla Ekadasi-Purnima
5 Parsawanathji ka mela Merta Road Bhadra Shukla Dashami
6 Sufi Tarkeen Salana Urs Nagaur Zamadi-Ul-Awwal
7 Mataji ka mela Goth Maglod Ashwin & Chaitra Navratra
8 Mataji ka mela Bhanwal Ashwin & Chaitra Navratra
9 Gusaiji ka mela Junjala Ashwin Shukla
10 Jhulotsawa Molasar Shrawan Shukla Ekadasi-Purnima
11 Jhulotsawa Jaswantgarh Shrawan Shukla Ekadasi-Purnima
12 Shivratri mela Nagaur Falgun Krishna Trayodashi
13 Narsingh Chaturdarshi mela Nagaur Vaishakh Sukla Chaturdashi
14 Varah Avtar Mahotsava Nagaur Vaishakh Sukla Purnima
15 Krishna Janamotsava mela Nagaur Bhadra Krishna Ashthami
16 Pitra Shrad mela Chenar, Nagaur Bhadwa Krishna Amawasya
17 Urs mela Rol Muslim date
18 Didwana  mela Didwana Maghsheersh Krishna

अन्यस्थानों

मारोठ – नागौर जिले के नावां तहसील में स्थित। 11 नावां एंड कुचामन सड़क रेलवे स्टेशन से दूर 11 किमी से दूर किलोमीटर दूर।

हरसोर – नागौर जिले के डेगाना तहसील में स्थित। डेगाना से 30 किलोमीटर

Phalvardhika (Phalodi) – Merta सड़क रेलवे स्टेशन के पास नागौर जिले के Merta tehsil में स्थित। एक पुराने मंदिर के Brahamani विदेशी Phalvardhika करने के लिए गढ़ता रहा सदी से संबंधित माता के रूप में जाना जाता है या पहले भी। कुछ विश्वास मंदिर Pratihara अवधि के दौरान का निर्माण किया गया था और Merta शहर से 11 किलोमीटर दूर स्थित है।

Khatu – Khatu के पुराने नाम था Shatkup (छह कुओं #। जब Shak शासकों भारत आए तो वे दो नए वेल्स जो Shakandhu कहा जाता था उनके साथ लाया # Stepwell # & Kalandh # Rahat #। Accoring Prathivraj Raso Khatu के पुराने नाम के लिए Khatwan था। पुराने Khatu लगभग नष्ट कर दिया है। अब दो गांवों वहाँ रहे हैं, एक बारी Khatu और अन्य छोटी छोटी Khatu कहा जाता है। छोटी छोटी Khatu के पहाड़ी पर एक छोटा सा फोर्ट खड़ा है। फोर्ट Prathviraj चौहान द्वारा बनाया गया था। एक पुरानी stepwell पेशकश छोटी Khatu, फूल Bawadi रूप में जाना जाता है में स्थित है, यह माना जाता है कि इस stepwell Gurjara Pratihara की अवधि में निर्माण किया गया था। इस stepwell वास्तुकला की अपनी शैली में कलात्मक है।

Harsolav – यह माना जाता है कि इस गांव कई सदियों पुरानी है। यह एक पुराने किले है एक गणेश मंदिर, जैन मंदिर एवं रामचंद्र Gurjar जो एक यात्रा के लायक है की एक cenotaph. एक इमारत में देखा सुंदर पत्थर नक्काशियों कर सकते हैं। गांव नागौर जिले के Merta tehsil में Gothan-जोधपुर रोड पर स्थित है।

Mundiyad – यह स्थित है के बारे में 25 किलोमीटर दूर नागौर से जिला मुख्यालय. नागौर tehsil में। गांव सदियों पुरानी है, है यह मानना है कि गांव मुंद्रा माहेश्वरी द्वारा स्थापित किया गया था, इसलिए यह Mundiyad कहा जाता है है। यहाँ एक पुरानी Mataji मंदिर एवं समाधियों जागीरदारों एंड medival काल के Charans की है। वहाँ भी है एक छोटा सा गणेश मंदिर के पास लोगों द्वारा के बीच बहुत प्रसिद्ध।

Manjhwas – गांव “Pashupati नाथ मंदिर” & “Phulabai मंदिर” के लिए प्रसिद्ध है। यह 20 किमी नागौर जिला मुख्यालय. देह मार्ग पर से दूर है। Pashupati नाथ मंदिर भारत में अद्वितीय है और काठमांडू, नेपाल के रूप में archelogically का निर्माण किया। Phulabai सेंट साल 1938 में किसी जाट परिवार में पैदा हुआ था। वह अत्यधिक बचपन से सही भगवान राम को समर्पित किया गया और उसे खर्च “भक्ति” और “Kirtana” श्रीराम का में समय की सबसे।

Ren – इस गांव नागौर जिले के Merta Tehsil में स्थित है। 15 किलोमीटर दूर। Merta शहर से दूर। यहाँ एक प्रसिद्ध Peeth राम Sanehi समुदाय का है। यह माना जाता है कि आदि Acharaya Daryavji राम Sanehi समुदाय के “tapsaya” यहाँ प्रदर्शन किया। हर साल चैत्र के महीने में पूरी दोपहर पर एक बड़ा मेला आयोजित की जाती है।

Kurki – Kurki नागौर जिले के Merta Tehsil में एक छोटा सा गांव है। यह प्रसिद्ध राजकुमारी और कवयित्री, Meera बाई, के बारे में 30 किलोमीटर का जन्म स्थान है। Merta से।

Kharnal – यह नागौर से लगभग 15 किलोमीटर के पास नागौर जोधपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। इसे लोकसभा गोलू देवता वीर Tejaji के जन्म स्थान है। यह माना जाता है कि Kharnal Dhawal Khichi जो Choudhan शासक Gundal राव Khichi Jayal राज्य की 5 वीं पीढ़ी में थे द्वारा स्थापित किया गया था। यह माना जाता है कि वीर Tejaji Dhawal Khichi का बेटा था।

Jhorda – यह स्थित है नागौर के उत्तर पर के बारे में 30 किलोमीटर दूर। यह महान संत बाबा Hariram और कवि Kandan Kalpit के जन्म स्थान है। हर वर्ष Bhadrapad Chaturthy एंड Panchmi एक बड़ी वार्षिक निष्पक्ष यहाँ आयोजित किया है के महीने में जहां के बारे में 1-2 लाख लोगों को भाग लेने के जो राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब से आए।

बेटा
नगर – यह जिले के उत्तर-पश्चिम सीमा पर स्थित है और विदेशी पर्यटकों जो रेगिस्तान जीवन शैली यहाँ का आनंद लें कर सकते हैं के लिए एक पसंदीदा जगह है। गांव में एक छोटा संग्रहालय जहां राजस्थानी जीवन शैली वस्तुओं प्रदर्शित & हैं एकत्र की है। # इस गांव भी अपनी कलात्मक “Kathi” के लिए प्रसिद्ध है-ऊंटों और घोड़ों के लिए काठी. #

Gogelav – इस गांव लोक गोलू देवता Gogaji के नाम में स्थापित किया गया था और यह माना जाता है कि Gogaji के Barat-शादी पार्टी यहाँ रहे थे। 150 के बारे में प्रवेश द्वार के निकट गांव में, वहाँ रहे हैं और उनमें से कुछ पत्थर नक्काशियों के साथ बहुत सुंदर हैं। मुख्य रूप से एंपोरियम Mahajans गांव के निवासी हैं और सुंदर और बड़े havelies उन से संबंधित हैं। प्रमुख एंपोरियम महाजन परिवारों के अधिकांश शतक, चेन्नई और भारत के अन्य बड़े शहरों के लिए यहाँ से चले गए हैं और काफी इन परिवारों के कुछ संयुक्त राज्य अमेरिका, दुबई, जर्मनी और ईरान में प्रयोजनों के व्यापार के लिए तय कर रहे हैं।

Peepasar – Peepasar नागौर जिले के नागौर Tehsil में एक छोटा सा गांव है। यह महान सेंट Jambhoji, Vishnoi समुदाय के संस्थापक के जन्म स्थान है।

Panchla Sidha – Panchla Sidha, नागौर से 60 किमी पश्चिम नागौर जिले के Khinvsar Tehsil में एक छोटा सा गांव है। यह Jasnath समुदाय के लिए प्रसिद्ध है। यह एक होली 1575 में की स्थापना की सिद्ध पद्धति Peeth नामक तीर्थ है विक्रम Samwat, Siddh सेंट Boyatji द्वारा। वहाँ एक Citedal श्री जगत सिंह, उदयपुर के महाराजा द्वारा बनाया गया है। जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह conservations वन्य जीवन के लिए Peeth के लिए भूमि प्रस्तुत किया। इस Peeth आध्यात्मिक शिक्षण, tantras और योग के माध्यम से जनता के कल्याण के लिए समर्पित है। सांस्कृतिक और धार्मिक मेलों फरवरी, अप्रैल और हर साल सितंबर के महीने में इस होली द्वारा आयोजित कर रहे हैं peeth. मुख्य त्योहार falls एक वर्ष में दो बार एक बड़ी “जागरण” और “अग्रि Nriyta (आग नृत्य)” है। आग नृत्य अनुयायियों के में peeth आग पर नंगे पांव नृत्य। वर्तमान में peeth अपने peethadheesh Siddh श्री सूरज नाथ जी द्वारा की अध्यक्षता है जो खुद को योग का एक अच्छा शिक्षक (गुरु) है और करता है योग शिविरों में भारत और विदेशों में विभिन्न स्थानों पर।

Khundiyas – Khundiyas (Parbatsar) “बाबा RamdeoJi” Parbatsar Tehsil में नागौर जिले के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

Kinsariya – Kinsariya नागौर जिले के Parbatsar Tehsil में “Keway माता” के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

Butati – Butati सेंट श्री Chaturdasji नागौर जिले के एक जन्म स्थान है। Butati यह है देवत्व के लिए प्रसिद्ध है। पक्षाघात रोगियों से सब कुछ खत्म भारत हर दिन Butat मंदिर पर जाएँ और अपने वसूली के लिए प्रार्थना करने के लिए इस्तेमाल किया।इस गांव में राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) 89, लगभग 31 से किलोमीटर Merta सिटी, चारों ओर 49 से किमी नागौर सिटी, लगभग 110 किमी अजमेर से स्थित है। श्री Chaturdasji महाराज के मंदिर बहुत अच्छी तरह से जाना जाता है और निकट राजस्थान में भारत में अमेरिका द्वारा। कई मरीज पक्षाघात का इलाज करने के लिए राज्य भर में आया था। पक्षाघात के रोगियों के लिए स्वर्ग।

Nagaur District GK in Hindi नागौर जिला Rajasthan GK in Hindi

Nagaur: History, Geography, Places

Location, Area & Administration of Nagaur:

Nagaur districtis located in the heart of the Rajasthan state between 260.25” & 270.40” North Latitude & 730.10” & 750.15” East Longitude. The district boundary is shared by seven districts of Rajasthan viz.-Jaipur, Ajmer, Pali, Jodhpur, Bikaner, Churu and Sikar.

Nagaur is the fifth largest district in Rajasthan with an area of  17,718 Square Kms. It has been divided into 12 tehsils namely . Nagaur, Merta, Jayal, Ladnun, Didwana, Nawa, Makrana, Degana, Parbatsar, Khimsar, Kuchaman City and Mundwa.

Imagesource: MapsofIndia
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History of Nagaur:

Glorified by the bards, the history of Nagaur finds mention even in the Mahabharata. The kingdom of Ahichhatrapur which Arjuna is said to have conquered and offered to his Guru Dronacharya, was perhaps some of the area of the Nagaur district. It was the capital of Jangladesh.

The foundation of city dates back to 4th century BC. Nagas originally ruled over this place and about 7th century onwards the Chauhans became the overlords of Nagaur and it was included in Sapadalaksha.

After independence, Nagaur had the honour of being selected as the place in the country from where the Democratic Decentralisation (Panchayati Raj) process was launched by the late Shri Jawaharlal Nehru, the first Prime Minister of India on the 2nd October 1959.

Historical Places of Nagaur:

Nagaur Fort:nagaur-fort

It is said that Nagaur fort was initially built by ruler of Nag dynasty in 2nd century and was then rebuilt in the early 12th century. This fort has witnessed several battles and has also been altered multiple times. Being one of the first Mughal strongholds in North-India it is an outstanding example of Rajput-Mughal architecture.

Khimsar Fort:khimsar

It is said that the Nagaur fort was initially built by the ruler of the Nag dynasty in 2nd century, and this 500 year old fort, located on the eastern edge of the Thar Desert was built in about 1523. Mughal Emperor Aurangzeb used to stay at this fort. Black deer roam in herds around this fort.

Makrana:

Nagaur district is well known in the world over owing to the presence of Makrana marble. Marble occurring in the vicinity of Makrana town is so famous that ‘Makrana’ has become the synonymous of marble. Word famous Taj Mahal of Agra: Victoria Memorial, Kolkata: Delwara Jain Temple at Mount Abu and Ranakpur Temple in Pali & other famous monuments of excellent architectural art and beauty are constructed of Makrana marble.

Kuchaman Fort:kuchaman_fort

Kuchaman Fort is the oldest & most inaccessible forts of Rajasthan. Situated on top of a straight hill, it possess unique water harvesting system, a beautiful palace and stunning wall paintings. The rulers of Jodhpur used to mint their gold and silver currency here.

Khatu

Khatu’s old name was Shatkup (six wells). When Shak rulers came to India then they brought two new wells with them which were called Shakandhu (Stepwell) & Kalandh (Rahat). Accoring to Prathivraj Raso, Khatu’s old name was Khatwan. Old Khatu is almost destroyed. Now there are two villages, one is called Bari Khatu & other Chhoti Khatu. On the hillock of Chhoti Khatu a small fort built by Prathviraj Chouhan still stands. An old stepwell is located in Chhoti Khatu, known as Phool Bawadi, is believed to be constructed in Gurjara Pratihara period.

Ladnun:

The town of Ladnu in the district has gained its place on the map of the country being the headquarters of the famous ‘Jain Vishwa Bharti’ which has become a centre of spiritual learning & knowledge under the leadership of Acharya Tulsi, a great Jain saint, who has propagated the philosophy of “ANUVRAT” in order to enlighten people in this area of the country.

Dadhimati Temple:

Also known as Goth-Manglod temple, 40 km away from Nagaur; the oldest temple of the district constructed during the Gupta Dynasty (4th Century), Kul Devi of Dadhich Brahimins.

Gogelav:

This village was established in the name of Lok Devta Gogaji and it is believed that Gogaji’s Barat-marriage party had stayed here.

Fairs & Festivals of Nagaur:

Ramdeo Cattle Fair Ramdev

This is the third largest cattle fair in Rajasthan founded by the great King of the Jodhpur Dynasty, Umed Singh in honour of Shri Ramdeoji 56 years back. The fair continues to be held in the month of Magh (January / February). Although the famous Nagauri bull is the prime attraction of the fair, the indigenous breeds of camel, horses, bullocks, buffalos, goat and sheep are in no way less attractive buys. Traders from all over the country participate actively and vie with each other in purchasing high pedigree animals to upgrade their cattle.

Baldeo Cattle Fair:Baldeo

It is held in the month of Chaitra (March / April) at Merta city every year. Its history dates back 36 years when this fair was initiated in the memory of the great leader of the farmers Baldeo Ram Mirdha. The Nagauri breed of cattle are traded here in abundance and cattle competitions are the biggest attraction of the fair, providing a glimpse of rural Rajasthan.

Veer Tejaji Fair

Veer tejajiThis is the second largest fair held every year in the month of Shrawan (August / September) at Parbatsar. It is primarily cattle fair but routine things are also bought and sold. Its history dates back to pre-Independence.

Apart from the above mentioned fairs, a number of other fairs are also held in Nagaur district. These include the Sheetla Asthami mela, Hariram baba ka mela, Hanumanji ka mela, Meerabai Charbhuja mela, Parsawanathji ka mela, Sufi Tarkeen Salana Urs, Mataji ka mela, Gusaiji ka mela, Jhulotsawa and the Narsingh Chaturdarshi mela among others.

Geography of Nagaur:

A big part of the district is covered by blown sand and sand dunes which form part of the great Thar district. Active dunes and sand shifting are main hazards to cultivation. Sand dunes are common in the north and western parts, where they arise over 30 meters and are aligned in a north west and south cast direction. Constant deterioration of soil and mining activity has resulted in soil erosion.

The Aravali range of hills passes in eastern and south eastern part of the district. The average elevation of the hills in district is barely 310 meters.

A big salt lake exists about 3 Km., to the South West of Deedwana. A part of the famous Sambhar lake falls in Nagaur district.

There is no perennial river in the district, River Luni is a non-perennial river which flows through the district. The flow of river-Luni depends upon the volume of rain fall it receives during monsoons. The river rises near Pushkar in Ajmer district and after passing over the Western slopes of the Aravali enters Nagaur district in the south and flows through it towards the west for nearly 37 Kilometers before entering Pali district.

The western part of the district is devoid of natural vegetation cover except for low hurbs and grass which grows on low sand dunes. However, the south-eastern part of the district and part of the northern tehsil of Ladnun & Deedwana have much greater greenery as compared to north-west part of the district Khejri trees are commonly found in the district.

Natural Resources/ Minerals of Nagaur:

It is the Makrana marble which has brought the Nagaur district on mineral map of the world. Other than the marble, limestone of varying grades. i.e. SMS grade, cement grade and chemical grade: tungsten, gypsum, lignite, halite with potash, clay etc. are important mineral resources of district. Mineral wise description is given as below:

LIMESTONE:

Limestone occurring in the district belongs to Bilara Group of Marwar Supergroup. It occurs in three prominent belts.

  • The first major and important belt is passing through Gotan, Bilara, Heera, Keria, Hari Singh, Bhawanda, Tadas, Tankla, Manakpur, Bher, Madpura-Gujron Ki Dhani, Chawandia and Tantwas.
  • The second one is passing through Mundwa, Rol-Quazia, Gangwana, Surjniyawas Somna and Deh.
  • The third belt which is comparatively smaller is located between Jayal and Katothi.

LIGNITE

  • As a result of exploration activities of various agencies in Rajasthan, lignite deposits/ occurrences have been proved at 34 locations in Bikaner, Nagaur and Barmer districts.
  • In Nagaur, Lignite deposits have been confirmed at 9 locations viz. Merta Road and Meera Nagar, Mokala, Indawar, Kasnau-Igear, Kuchera, Matasukh, Kaparion-Ki-Dhani, Nimbri Chandawatan and Lunsare.

MARBLE:

  • Since long Makrana in tehsil Parabatsar is known in the world for the production of quality marble.
  • Makrana marble belt has been divided into 14 blocks. Out of these 14 blocks, marble produced from Chausara block is white in colour and of best quality.

GYPSUM

  • Thick gypseous beds belonging to Nagaur formation are found around Nagaur, Bhadwasi, Khairat, Malgan, Manglot, Pilanwasi and Untiwalia village.

TUNGSTEN

  • Occurrences of tungsten in India are very few, the best known deposit being those of Degana area in Nagaur district. Here tungsten ore occurs in quartz veins along shear zones in the granite and also as stock works in these hills. It also occurs as alluvial deposit around the foot hills.

SANDSTONE

  • The sandstone of Jodhpur group of rocks is exploited from Khatu and Ladnun area. Near Harsolpv and Nagaur, sandstone is extensively quarried for masonary purpose.

CLAYS

  • The clays occurring in the district belong to the category of china clay and highly plastic ball clays which are added to induce plasticity and high bonding quality.
  • Clay occurs at occur at Khajwana, Kuladah, Indawar, Mundwa, Nimbri Chundawatan, Saradhana and Huldah.

FULLER’S EARTH

  • In Nagaur district kuchera – Khajwana Formation (Eocene age) is reported to contain fuller’s earth associated with ferrugineous grits, gritty felspathic sandstone, black shale and lignite.

COMMON SALT

Salt lake of Nagaur district are considered as an important sources of salt production in the country. The salt lakes of district include:

  • The Sambhar lake near Nawa which is partly in Jaipur district,
  • Didwana lake
  • Kuchaman lake
  • Sargot lake

Population:

  • As per the 2011 census, the population of the district is 33,07,743, which is 4.82% of the total population of the State.
  • Decadal Growth of population between 2011 and 2011 was 19.20%.
  • The density of population in the district is 187 persons persq.km, as against 200 of Rajasthan as a whole.
  • Literacy rate is 62.80%. Out of this literate population 77.20% are males and 47.80% are females.

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Tonk District GK in Hindi टोंक जिला Rajasthan GK in Hindi

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Rajasthan Districts wise General Knowledge

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

टोंक भारतीय राज्य राजस्थान का एक जिला है। जिले का मुख्यालय टोंक है।

   यह रियासत काल में राजस्थान की एक मात्र मुस्लिम रियासत थी।

टोंक जिले के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं- 1. डिग्गी कल्याण मन्दिर, डिग्गी(मालपुरा)++

  यहां पे भाद्रपद सुक्ल एकादशी को विशाल मेला लगता है।

2.अरबी फारसी शोध संस्थान(टोंक)+++

  इसकी स्थपना 4 दिसंबर 1978 को किया, यहां पर विश्व की सबसे बड़ी "कुरान" बनाई गई है।

3.सुनहरी कोठी(टोंक)++++

      यह टोंक में बड़े कुए के पास नजर बाग में रतन,कांच,व सोने की झाल देकर बनवाई गई। पहले इसे "शीशमहल" के नाम से जाना जाता था।

4. कल्पवृक्ष बालुन्दा (नगर दुर्ग के पास) 5. माण्डव ऋषि की तपोभूमि –

    इसे लघु-पुष्कर भी कहा जाता है। यह नगरदुर्ग के पास स्थित है। यहां पे 15 दिवसीय विशाल पशु मेला कार्तिक पूर्णिमा से लगता है।
6. श्री चामुण्डा देवी का मन्दिर नगर ( मालपुरा)

7. श्री देव नारायण देव धाम जोधपुरिया निवाई बनस्थली

8.””बीसलपुर बांध””## __यह राजस्थान का सबसे बड़ा दूसरे न. का बांध है,जो टोंक जिले की टोड़ारायसिंह तहसील के राजमहल में ,बनास, खारी, डाई,तीन नदियों के संगम पर बना हुआ है यह राजस्थान का एकमात्र कंक्रीट से बना हुआ बांध है तथा यह राजस्थान की सबसे बड़ी जल पेयजल परियजना है। 9. टोरडी सागर बांध##

   इस बांध के सभी गेट खोलने पर एक बूंद भी जल नहीं बचता है।

10.ककोड़ का किला+++

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   यह टोंक से 20 कि.मी. दूर NH 116 पर ककोड़ में एक उची पहाड़ी पर बना हुआ है।

11.हाथीभाटा++

   यह ककोड़ के पास 5 कि.मी. दूर गुमानपुरा गाव में विशाल पहाड़ी को काटकर बनाया गया हाथी है,जो पाषाण कालीन निर्मित बताया गया है।

12. चोराशी++

  यह टोंक जिले के पश्चिमी भाग  जयपुर के दक्षिणी पश्चिमी भाग में बोली जाती है।

13.केंद्रीय भेड़ व उन अनुसंधान केंद्र++

  यह टोंक कि मालपुरा तहसील के अविकाकनगर में 4000एकड़ ज़मीन पर बना हुआ है!

14. रेड+++

  यह जगह टोंक में निवाई के पास स्थित है, इसे "प्राचीन भारत का टाटानगर" के नाम से जाना जाता है, यहां पे से आज तक का एशिया का सबसे बड़ा पंचमार्क सिक्को का भंडार मिला 

15. खातोली ++++

 इस जगह पे सरसो के बचे वेस्ट भाग से विद्युत बनाई जाती है। जिसका नाम "कल्पतरु पावर प्लांट (खातोली)"है,

16.संत पिपा कि गुफाएं (टोड़ारायसिंह) 17. हाड़ी रानी का कुंड(टोड़ारायसिंह) 18. रानीपुरा+++ काले हिरणों के लिए प्रसिद्ध।। क्षेत्रफल – 7194वर्ग कि.मी.

जनसंख्या – (2011 जनगणना)

ग्रामीण– 1103868

नगरीय– 317843

साक्षरता – 62.46 प्रतिशत

एस. टी. डी (STD) कोड – 01432

District collector-श्री रामचन्द्र ढेनवाल “”Additional District collector– श्री लोकेश गौतम

“”SDO TONK__श्री सूरज सिंह नेगी समुद्र तल से उचाई -लगभग 264.32 मीटर

अक्षांश – 25°41″से 26°34″उत्तरी अक्षांश

देशांतर – 75°70″ से 76°19″ पूर्वी देशान्तर

औसत वर्षा – 61.36 मि.मी.

Tonk District GK in Hindi टोंक जिला Rajasthan GK in Hindi

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1. महत्वपूर्ण तथ्य

  • टोंक जिले का कुल क्षेत्रफल = 7194 किमी²
  • टोंक जिले की जनसंख्या (2011) = 14,21,711
  • टोंक जिले का संभागीय मुख्यालय = अजमेर

2. भौगोलिक स्थिति

  • भौगोलिक स्थिति: 26.17°N 75.78°E
  • टोंक शहर, राजस्थान राज्य के मध्य में स्थित है।
  • टोंक बनास नदी के ठीक दक्षिण में स्थित है।

3. इतिहास

  • टोंक की स्थापना 1643 में हुई थी और यह छोटी पर्वत श्रृंखला की ढलानों पर अवस्थित है।
  • इसके ठीक दक्षिण में क़िला और नए बसे क्षेत्र हैं। आसपास का क्षेत्र मुख्यत: खुला और समतल है, जिसमें बिखरी हुई चट्टानी पहाड़ियाँ हैं।
  • भूतपूर्व टोंक रियासत में राजस्थान एवं मध्य भारत के छह अलग-अलग क्षेत्र आते थे, जिन्हें पठान सरदार अमीर ख़ाँ ने 1798 से 1817 के बीच हासिल किया था।
  • 1948 में यह राजस्थान राज्य का अंग बना।
  • टोंक शहर का नाम अजयमेरू के नाम पर पडा हैं।

4. कला एवं संस्कृति

  • टोंक में राजस्थानी, हिंदी एवं उर्दू भाषा बोली जाती हैं ।
  • टोंक में 35% से अधिक मुस्लिम आबादी हैं, जो राजस्थान के किसी भी जिले का सर्वाधिक हैं
  • टोंक में हिंदू, मुस्लिम एवं जैन धर्म के निवासी सभी त्यौहारों को सौहार्द पूर्वक मनाते हैं ।

5. शिक्षा

  • यहाँ सरकारी एवं अन्य निजी संस्थान हैं
  • प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा हेतु सरकारी, स्कूल एवं निजी क्षेत्र की कई स्कूल हैं

6. खनिज एवं कृषि

  • टोंक इस क्षेत्र का प्रमुख कृषि बाज़ार एवं निर्माण केंद्र है।
  • ज्वार, गेहूं, चना, मक्का, कपास और तिलहन यहाँ की मुख्य फ़सलें हैं।
  • यहाँ मुर्ग़ीपालन व मत्स्य पालन होता है तथा अभ्रक व बेरिलियम का खनन होता है।

7. प्रमुख स्थल

  • डिग्गी कल्याण मन्दिर, डिग्गी
  • अरबी फारसी शोध संस्थान
  • माण्डव ऋषि की तपोभूमि – इसे लघु-पुष्कर भी कहा जाता है। यह नगरदुर्ग के पास स्थित है।

8. नदी एवं झीलें

  • बनास एवं बांडी टोंक की दो प्रमुख नदियाँ हैं

9. परिवहन और यातायात

  • टोंक पहुँचने के लिए सबसे बेहतर रोड द्वारा है
  • निकटतम हवाई अड्डा, जयपुर है

10. उद्योग और व्यापार

  • सूती वस्त्र बुनाई, चर्मशोधन और नमदा बनाने की हस्तकला यहाँ के मुख्य उद्योग हैं।
  • यहाँ मुर्ग़ीपालन व मत्स्य पालन होता है तथा अभ्रक व बेरिलियम का खनन होता है।

Tonk: History, Geography, Places

The district of Tonk is located between latitudes 25°42′ to 26°34′ and longitudes 75°07′ to 76°19′.  It is bounded in north by Jaipur district, in the east by Sawai Madhopur district and in the south by Bundi, Kota and Bhilwara districts.

Tonk has an area of 7194 Sq. kms. and comprises six tehsils namely, Malpura, Niwai, Deoli, Tonk, Uniara and Toda Rajsingh.

Imagesource: MapsofIndia
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History of Tonk:

The history of Tonk is very old as it is connected with Bairath culture & civilization. It was known as SAMWAD LAKSHYA in Mahabharat period. In the regime of Mauryas, it is under mauryas then it was merged in to Malvas. Most of the part was under Harsh Vardhan.

In the regime of Rajputs, the parts of this state are under Chavras, Solankis, Kachvahs, Sisodiyas and Chouhans. Later during Mughal period, Jaipur’s King Man Singh conquered Tari & Tokra Janpad in the regime of Akbar. In 1643 twelve village of Tokra janpad were given to Bhola Brahmin. Later Bhola gave a name to these twelve villages as ‘Tonk’.

Later, it was under the regime of King Holkar and Sindhia.

In 1806, Amir Khan conqurred it from Balvant Rao Holkar. Later, British government gained it from Amir Khan. As per the treaty of 1817, British government returned it to Amir Khan.ON 25th March 1948, when Nawab Mohd. Ismile Ali Khan was the ruler; Tonk was merged in to Rajasthan including an area of Tonk and Aligarh Tehsils of old Tonk State Newai. Malpura, Toda Raisingh and Uniara of Jaipur State, Deoli of Ajmer, Marwar and 27 villages of Bundi.

Tonk has been called Rajasthan ka Lucknow, Adab ka Gulshan, Romantic poet Akhtar Shreerani ki Nagri, Meethe Kharboojo ka Chaman, Hindu Muslim Ekta ka Maskan and as result of which Tonk could keep an isolated status in Rajasthan.

Historical Places of Tonk:

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Arabic Persian Research Institute

Arabic Persian Research Institute in Tonk is the premier Indian Institute engaged in promotion and furtherance of Arabic and Persian studies. This institute was established by the Government of Rajasthan in 1978 with the objective of preserving and conserving the sources of Persian and Arabic Manuscripts available in Rajasthan.

Sunhari Kothisunehari-kothi

Sunhari Kothi (Mansion of Gold) is a magnificent hall,built by Nawab Mohammed Ibarahim Ali Khan (1867-1930), the Nawab of Tonk. The hall in within the old palace complex, white walls and ceilings are one sumptuous expanse of enamel mirror-work, gilt and painted glass illuminated through stained-glass windows. The entire effect is that of an exquisite piece of enamel jewellery blown up to the size of a hall.

Hathi Bhata

Carved out from a single stone this is a stone elephant which attracts tourists from all over to this place.

Bisaldeo Temple & Bisalpur Dam

bisaldeoBisalpur or Vigrahapura was founded by the Chahamana ruler Vigraharaja IV in the twelfth century A.D. Bisalpur was preceded by a still older city called Vanapura, which seems to have been ruled by the Takshakas (Nagas) of Todarai Singh. The importance of Bisalpur is due to its temple of Gokarnesvara, also known as Bisal Deoji’s temple, constructed by Vigraharaja IV or Visala, who was a devotee of Gokarna. The temple (22.20 m x 15.30 m) has a pancharatha sanctum, antarala, square mandapa and portico with sikhara. The sanctum enshrines a linga. The temple surmounted by a hemispherical dome, is supported on eight tall pillars carved on the lower section with floral festoons, chain-and-bell and circular medallions. There are several short inscriptions which record the visit of pilgrims from time to time. The earliest of these is dated A.D. 1154-65 and the inscription is important for mentioning the Chahamana chief Prithviraja III.

Hadi Rani Baori, Todrai Singh

hadi_rani_baoriThe step-tank is rectangular on plan with double-storeyed corridors on the western side, each having arched doorway. Below the lower storey, there are images of Brahma, Ganesa and Mahishasuramardini which are enshrined in niches. On all the three sides, steps are arranged in sets of thirteen each at higher level and five each at lower level, going up to the water level.  It is datable to circa twelfth-thirteenth century A.D.

Diggi Kalyan ji, Temple

digi-kalyan-jiThis is a very old temple, the antiquity of which is fabulous. The pinnacle of the temple (Shikhar) is magnificent. There are sixteen pillars supporting the Shikhar which has become extremely attractive because of the statuettes incurved thereon. The Sanctum Sanctorum, circumbulatory path, Jagmohan there in are a fine example of elegant architecture in marble. Adjacent is the temple Laxmi Narayan Ji. On the front gateway beautiful figures and statuettes have been incurved.

Geography of Tonk:

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Rajasthan Gk In Hindi Series 64

Rajasthan Gk In Hindi Series 63

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Tonk district has the shape of kite or rhombus with its eastern and western sides bending some what inward and the south-eastern portion protruding between Sawai Madhopur and Bundi districts. The district is flat at a general elevation of about 214.32 meters above sea level with rocky but scrubby hills.

The district mainly comprises a flat peneplain with thick alluvium cover. The Rajkot Baneta hills in the eastern part of Rajmahal- Toda Raisingh ridge in the southern part of the district with isolated hills, Tordi and Chansen are the main hill ranges of district.

Banas is the only perennial river which flows through the district. It enters Tonk district at Negdia in Deoli Tehsil and from this place it takes serpentine course, diving the district in roughly two third to its west and north and one third to its east and south. Its total length is 400 Kms.

Manshi the principal tributary of Banas travels along the borders of Jaipur and Tonk district between the Tehsils of Malpura and Phagi unitl it turns south to join the Banas at Galod village. The Sohadra is another important river as it feeds the Tordi sagar Tank, the biggest irigation tank in Rajasthan. It joins Mashi near village Dundia and thereafter meets, Banas River near village Galod. Other small river are khari, Daian , Bandi and Galwa which join Banas and Mashi river at Negdia , Bisalpur , Chaturpura and Chouth-ka-Barwara respectively.

Natural Resources of Tonk:

Tonk district is known on the mineral map of the state for its important occurrences of garnet and aquamarine. Other important mineral occurrences of the district are silica sand, mica, andalusite, corundum, soapstone and building stones.

Aquamarine

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Aquamarine is one of the semiprecious varieties of beryl with sea-green to greenish blue in colour and transparent in nature. The occurrences of aquamarine are found near Toda Raisingh, Bagre, Rampura, Jhonparia, Botunda, Tharel and Hamirpur areas. It is found within or at the contact of pegmatite with the schist.

Garnet

Tonk district enjoyed top position in Rajasthan in the production of gem garnet. The almandine variety of gem garnet is found between Rajmahal and Kalyanpura through Bisalpur. Many of the garnet quarries now fall into the catchment area of Bisalpur Dam.

Population:

According to the 2011 census Tonk district has a population of 1,421,711. The district has a population density of 198 inhabitants per square kilometer. Its population growth rate over the decade 2001-2011 was 17.33%. Tonk has a sex ratio of 949 females for every 1000 males,and a literacy rate of 62.46%.

Tonk District

Tonk District is a district of the state of Rajasthan in western India. Tonk town is the district headquarter. Tonk is a town, situated on the banks of the River Banas. Tonk was once a princely state and had been ruled by various dynasties until the time of Indian independence. Tonk is one of the well developed districts of Rajasthan. Nawabi Nagari ‘Tonk’ is famous not only in Rajasthan but also all over India for its historical Importance.

District Tonk
Headquater Tonk Town
Area (km2) 7,194
Population(2011) 1421711
Division Ajmer
Official Website http://www.tonk.nic.in

Tourist Places In Tonk District

  • Rasiya ka Tekri
  • Hathi Bhata
  • Bilaspur
  • Ghanta Ghar
  • Rajamahal
  • Sunahari Kothi

Tonk District Location

Rajasthan Gk In Hindi Series 43

Rajasthan Gk In Hindi Series 42

Rajasthan Gk In Hindi Series 41

Rajasthan Gk In Hindi Series 40 (400 Questions)

Rajasthan Gk In Hindi Series 39

The Tonk district is situated near the right bank of river banas, Just 60 miles by road south from jaipur. Tonk was also the capital of the eponymous princely state of British India from 1817 to 1947.

Tonk District Climate

Tonk experiences hot semi-arid climate and temperarture ranges from 45°C to 4°C

Transportation In Tonk District

Tonk is well connected by road but don’t have its own railway station and airport.The Isharda railway station is located bour 41 kms away from the district headquarter, Tonk town . The Jaipur International Airport is 88 kms away from Tonk town.

 

 

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Jodhpur District GK in Hindi जोधपुर जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

जोधपुर भारत के राज्य राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा नगर है। इसकी जनसंख्या १० लाख के पार हो जाने के बाद इसे राजस्थान का दूसरा “महानगर ” घोषित कर दिया गया था। यह यहां के ऐतिहासिक रजवाड़े मारवाड़ की इसी नाम की राजधानी भी हुआ करता था। जोधपुर थार के रेगिस्तान के बीच अपने ढेरों शानदार महलों, दुर्गों और मन्दिरों वाला प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है।

वर्ष पर्यन्त चमकते सूर्य वाले मौसम के कारण इसे “सूर्य नगरी” भी कहा जाता है। यहां स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग को घेरे हुए हजारों नीले मकानों के कारण इसे “नीली नगरी” के नाम से भी जाना जाता था। यहां के पुराने शहर का अधिकांश भाग इस दुर्ग को घेरे हुए बसा है, जिसकी प्रहरी दीवार में कई द्वार बने हुए हैं हालांकि पिछले कुछ दशकों में इस दीवार के बाहर भी नगर का वृहत प्रसार हुआ है। जोधपुर की भौगोलिक स्थिति राजस्थान के भौगोलिक केन्द्र के निकट ही है, जिसके कारण ये नगर पर्यटकों के लिये राज्य भर में भ्रमण के लिये उपयुक्त आधार केन्द्र का कार्य करता है।

वर्ष २०१४ के विश्व के अति विशेष आवास स्थानों (मोस्ट एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी प्लेसेज़ ऑफ़ द वर्ल्ड) की सूची में प्रथम स्थान पाया था। ] एक तमिल फ़िल्म, आई, जो कि अब तक की भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फ़िल्मशोगी, की शूटिंग भी यहां हुई थी।

नगर परिचय

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सूर्य नगरी के नाम से प्रसिद्ध जोधपुर शहर की पहचान यहां के महलों और पुराने घरों में लगे छितर के पत्थरों से होती है, पन्द्रहवी शताब्दी का विशालकाय मेहरानगढ़ दुर्ग , पथरीली चट्टान पहाड़ी पर, मैदान से १२५ मीटर ऊंचाई पर विद्यमान है। आठ द्वारों व अनगिनत बुजों से युक्त यह शहर दस किलोमीटर लंबी ऊंची दीवार से घिरा है।

सोलहवीं शताब्दी का मुख्य व्यापार केन्द्र, किलों का शहर जोधपुर, अब राजस्थान का दूसरा विशालतम शहर है। पूरे शहर में बिखरे वैभवशाली महल ,किले और मंदिर , एक तरफ जहां ऐतिहासिक गौरव को जीवंत करते हैं वही दूसरी ओर उत्कृष्ट हस्तकलाएं लोक नृत्य , संगीत और प्रफुल्ल लोग शहर में रंगीन समां बांध देते हैं।

जीवन शैली

जोधपुर शहर के लोग बहुत मिलनसार होते है, ये सदैव दुसरों की मदद के लिये ततपर रहते है, उलझी हुई घुमावदार गलियाँ पटरियों पर लगी दुकानों से घिरी हैं। कलात्मक रूप से बनी हुई रंगबिरंगी पोशाकें पहने हुए लोगों को देखकर प्रतीत होता हैं कि जोधपुर की जीवनशैली असाधारण रूप से सम्मोहित करने वाली है। औरतें घेरदार लहंगा और आगे व पीछे के हिस्सों को ढकने वाली तीन चौथाई लंबाई की बांह वाली नितम्ब स्थल तक की जैकेट पहनती हैं। पुरूषों द्वारा पहनी हुई रंगीन पगड़ियाँ शहर में ओर भी रंग बिखेर देती हैं। आमतौर से पहने जाने वाली ढ़ीली ढ़ाली और कसी, घुड़सवारी की पैंट जोधपुरी ने यहीं से अपना नाम पाया। जोधपुर के कपदो मैं जोधपुरी कोट पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

शिक्षा क्षेत्र

राजस्थान में जोधपुर शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे हैं। दूर दूर से विद्यार्थी यहाँ पढ़ने के लिये आते है। जोधपुर को सीए कि खान कहा जाता है। पूरे भारत में सबसे ज्यादा सीए यहीं से निकलते है। शिक्षा के लिये यहां पर विकल्प मौजूद है। यहाँ विश्व प्रसिद्ध आईआईटी , नेशनल लो युनिवर्सिटी, एम्स, काजरी , आफरी आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय स्थित है। इनके अलावा जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय हैं। तथा साथ ही बालिकाओं के लिए भी कॉलेज है। जोधपुर में लगभग हर गांव में विद्यालय है।

हस्तशिल्प

उत्कृष्ट हस्तशिल्पों के समृद्ध संग्रह का रंगीन प्रगर्शन देख कर जोधपुर के बाजारों में खरीददारी करना एक उत्साहपूर्ण अनुभव है। बंधेज का कपड़ा , कशीदाकारी की हुई चमड़े, ऊँट की खाल, मखमल आदि की जूतियां आकर्षक रेशम की दरियां मकराना के संगमरमर से बने स्मृतिचिन्ह, उपयोगी व सजावटी वस्तुओं की विस्तृत किस्में आदि इन बाजारों में पाई जाती हैं।

अनगिनत त्योहारों , समृद्ध अतीत और शाही राज्य की संस्कृति का उत्सव मनाते हैं। वर्षा में एक बार विशाल पैमाने पर मारवाड़ समारोह भी मनाया जाता है।

उपलब्धियां

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जोधपुर को राजस्थान की न्यायिक राजधानी कहा जाता है, राजस्थान का उच्च न्यायालय भी जोधपुर में ही स्थित है। जोधपुर पूरे विश्व से जुड़ने के लिये अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी मौजुद है। पूरे राजस्थान के प्रसिद्ध विभाग जैसे मौसम विभाग , नार्कोटिक विभाग सी बी आइ, कस्टम ,वस्त्र मन्त्रालय आदि मौजूद है।

मुख्य आकर्षण

चित्र दीर्घा

मेहरानगढ़ का किला

मेहरानगढ़ दुर्ग पहाड़ी के बिल्‍कुल ऊपर बसे होने के कारण राजस्‍थान के सबसे खूबसूरत किलों में से एक है।इस किले के सौंदर्य को श्रृंखलाबद्ध रूप से बने द्वार और भी बढ़ाते हैं। इन्‍हीं द्वारों में से एक है-जयपोल इसका निर्माण राजा मानसिंह ने १८०६ ईस्वी में किया था। दूसरे द्वार का नाम है-विजयद्वार इसका निर्माण राजा अजीत सिंह ने मुगलों पर विजय के उपलक्ष्‍य में किया था। किले के अंदर में भी पर्यटकों को देखने हेतु कई महत्‍वपूर्ण इमारतें हैं। जैसे मोती महल, सुख महल, फूलमहल आदि-आदि

१२५ मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित पांच किलोमीटर लंबा भव्य किला बहुत ही प्रभावशाली और विकट इमारतों में से एक है। बाहर से अदृश्य, घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार द्वार हैं। किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार किवाड़, जालीदार खिड़कियाँ और प्रेरित करने वाले नाम हैं। इनमें से उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत खाना। इन महलों में भारतीय राजवंशो के साज सामान का विस्मयकारी संग्रह निहित है इसके अतिरिक्त पालकियाँ, हाथियों के हौदे, विभिन्न शैलियों के लघु चित्रों, संगीत वाद्य, पोशाकों व फर्नीचर का आश्चर्यजनक संग्रह भी है।

जसवंत थड़ा

जसवंत थड़ा जो पूरी तरह से [11]संगमरमर से निर्मित है। इसका निर्माण १८९९ में महाराज सरदार सिंह ने अपने पिता राजा जसवंत सिंह (द्वितीय) और उनके सैनिकों की याद में किया गया था। इसकी कलाकृति आज भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की याद में सफेद संगमरमर से ईसवी सन् १८९९ में निर्मित यह शाही स्मारकों का समूह है। मुख्य स्मारक के अंदर जोधपुर के विभिन्न शासकों के चित्र हैं।

उम्मैद भवन पैलेस

महाराजा उम्‍मैद सिंह ने इस महल का निर्माण सन १९४३ में करवाया था। संगमरमर और बालूका पत्‍थर से बने इस महल का दृश्‍य पर्यटकों को खासतौर पर लुभाता है। इस महल के संग्रहालय [13] में पुरातन युग की घड़ियाँ और चित्र भी संरक्षित हैं। यही एक ऐसा बीसवीं सदी का महल है जो बाढ़ राहत परियोजना के अंतर्गत निर्मित हुआ। जिसके कारण बाढ़ से पीड़ित जनता को रोजगार प्राप्त हुआ। यह महल सोलह वर्ष में बनकर तैयार हुआ था। बलुआ पत्थर से बना यह अतिसमृद्ध भवन अभी पूर्व शासकों का निवास स्थान है जिसके एक हिस्से में होटल चलता है और बाकी के हिस्से में संग्राहालय

गिरडीकोट और सरदार मार्केट

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छोटी-छोटी दुकानों वाली, संकरी गलियों में छितरा रंगीन बाजार शहर के बीचों बीच है और हस्तशिल्प की विस्तृत किस्मों की वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है तथा खरीददारों का मनपस्द स्थल है।

राजकीय संग्राहलय

इस संग्राहलय में चित्रों, मूर्तियों व प्राचीन हथियारों का उत्कृष्ट समावेश है।

अरना झरना मरु संग्रहालय

अरना झरना मरु संग्रहालय एक मरु संग्रहालय है जो जोधपुर के मोकलावास गाँव के निकट स्थित है।

उत्सव व मेले

जोधपुर में सभी पर्वों को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है, यहाँ का बेतमार मेला और कागा का शीतला माता [15] मेला बहुत प्रसिद्ध है लोग दूर – दूर से ये मेला देखने आते है। राजस्थान के लोक देवता रामदेव पीर का मसुरिया मेला भी काफी प्रसिद्ध है।

मारवाड़ उत्‍सव, नागौर का प्रसिद्ध पशु मेला और पीपाड़ का गंगुआर मेला। यह कुछ महत्‍वपूर्ण उत्‍सव है जो जोधपुर में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाते है। यहाँ पर सावन माह की बड़ी तीज और बेतमार मेला विश्व प्रसिद्ध है।

जोधपुर में गणगौर पूजन का भी विशेष महत्व है और इसी उत्सव पर पुराने शहर में गणगौर की झांकियां भी निकाली जाती हैं। धिंगा गवर इसके बाद आने वाला एक आयोजन है इस दिन महिलाऐं शहर के परकोटे में तरह तरह के स्वांग रच कर रात को बाहर निकलती हैं और पुरुषों को बैंत से मारती हैं अपने प्रकार का एक अनोखा त्योहार है।

निकटवर्ती स्थल

बालसंमद झील

यह जोधपुर से ५ कि॰मी॰ दूर है। इस सुंदर झील का निर्माण ईसवीं सन् ११५९ में हुआ था। झील के किनारे खड़ा भव्य ग्रीष्मकालीन महल खूबसूरत बगीचों से घिरा हुआ है।[16] भ्रमण करने के लिए यह एक रमणीय स्थल है।

मंडोर गार्डन

यह शहर से ०८ किलोमीटर की दूरी पर है। मारवाड़ की प्राचीन राजधानी में जोधपुर के शासकों के स्मारक हैं। हॉल ऑफ हीरों में चट्टान से दीवार में तराशी हुई पन्द्रह आकृतियां हैं जो हिन्दु देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती है। अपने ऊँची चट्टानी चबूतरों के साथ, अपने आकर्षक बगीचों के कारण यह प्रचलित पिकनिक स्थल भी बन गया है।

महामंदिर

इसका निर्माण ईसवीं सन १८१२ में किया था। यह अपने ८४ नक्काशीदार खंभों के कारण असाधारण है।

कायलाना झील

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कायलाना झील जो कि जोधपुर की एक प्रसिद्ध झील है। यह खूबसूरत झील एक आदर्श पिकनिक स्थल है। झील मुख्य शहर से ११ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ओसियां

ओसियां जोधपुर जिले का एक प्राचीन क्षेत्र है तथा वर्तमान में एक तहसील के रूप में विस्तृत है। यह जोधपुर – बीकानेर राजमार्ग की दूसरी दिशा पर रेगिस्तान में बसा हुआ है। इस प्राचीन क्षेत्र की यात्रा के दौरान बीच – बीच में पड़ते हुए रेगिस्तानी विस्तार व छोटे-छोटे गांव अतीत के लहराते हुए भू-भागों में ले जाते है। ओसियां में सुंदर तराशे हुए जैनब्राह्मणों के ऐतिहासिक मन्दिर है। इनमें से सबसे असाधारण हैं आरंभ का सूर्य मंदिर और बाद के काली मंदिर, सच्चियाय माता मन्दिर [17] और भगवान महावीर मन्दिर भी स्थित है। यह काफी प्राचीन नगर है पूर्व में इसका नाम उपकेश था।

रोहट किला

(40 किलोमीटर) – अब हैरिटेज होटल है, यह किला देखने योग्य है।

लूनी किला

(20 किलोमीटर) – किले को अब हैरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। किला व उसके आसपास का वातावरण दर्शनीय है।

खरीददारी

जोधपुर के मोची गली से चमड़े का जूता, रंगीन कपड़ा, टाई, पॉलिश किया हुआ घरेलू सजावटी सामान आदि की खरीददारी की जा सकती है। जोधपुर के मिर्ची बड़े बाहर के देशों में भी निर्यात किये जाते है।[18]

भोजन

यहाँ खासतौर पर दूध निर्मित खाद्य पदार्थों का ज्‍यादा प्रयोग होता है। जैसे मावा का लड्डू, क्रीम युक्‍त लस्‍सी, मावा कचौरी, और दूध फिरनी आदि।

यहाँ का मिर्ची बड़ा और प्याज कि कचौरी बहुत ही प्रसिद्ध है। भोजन में प्राय यहाँ बाजरे का आटे से बनी रोटियां, जिन्हें सोगरा कहते हैं, प्रमुखता से खाया जाता है। सोगरा किसी भी चटनी, साग आदि के साथ खाया जाता है। जो खाने में स्वादिष्ट होता है। इसी प्रकार छाछ और प्याज भी इसके साथ खाया जाता है।

Jodhpur District GK in Hindi जोधपुर जिला Rajasthan GK in Hindi

 

Jodhpur: History, Geography, Places

Location, Area and Administration of Jodhpur:

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Rajasthan Gk In Hindi Series 64

Rajasthan Gk In Hindi Series 63

Rajasthan Gk In Hindi Series 62

Jodhpur district is located in western part of Rajasthan, located between 26°00′ to 27°37′ North latitude and 72°55′ to 73°55′ East longitude. It shares common border with five districts viz., Bikaner, Jaisalmer in north and north west, Banner and Pali in SW & SE and Nagaur in E-NE.

The district has a geographical area of 22850 sq. kms which is 6.60% of total area of the state and 11.6% of total arid zone of Rajasthan. It has been divided into Mandore, Osian, Phalodi, Bilara, Bhopalgarh, Shergarh, Luni, Pipar City, Baori, Balesar Bap, Lohawat, Tinwari.

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Image Source: maps of India, Only 7 Tehsils shown.

History of  Jodhpur:

The history of Jodhpur revolves around the Rathore Clan. Rao Jodha, the chief of the Rathore clan, is credited with the origin of Jodhpur in India. He founded Jodhpur in 1459. The city is named after him only. It was previously known as Marwar.

Marwar History: Rulers (1226-1949)

  • After the destruction of the Gahadavala kingdom, and the migration of the Gahadwalas to Rajputana, a prince of the Kannauj kings founded the Rathore dynasty of Marwar in 1226.
  • Rao Siyaji, grand son of Jai Chandra, of Kannauj, came to marwar during his pilgrimage to dwarka.
  • His Son, Rao Asthan conquered Pali, and Khed (in western Marwar), but ultimately got killed in battle by Sultan Jalauddin Khilji of Delhi.
  • Rao Chanda/Chundarji, 10th in succession from Siyaji, finally wrested control of Marwar from the Gurjara Pratiharas – and established rule of Rathores in Marwar.
  • Jodhpur was the primary state of Rathores but different states (Bikaner, Kishangarh etc)were also founded by different Rathore rulers.

Rulers of Jodhpur

  • Rao Chanda/Chundarji secured & found kingdom of Marwar.
  • Rao Chanda, is killed in battle by Salim Shah of Multan. The king’s son, Kanha, subsequently has to fight to retain his throne when his brother Rao Ranmal. Ultimately, Ranmal succeeds.
  • Rao Jodha(1438 – 1489)
    • Son of Ranmal becomes first fully independent king of Jodhpur,
    • 1459- Laid foundation of modern city of Jodhpur
    • Reconquers Mandore from the Sisodiyas of Mewar (Rana Kumbha).
    • Began Construction of Mehrangarh fort.
    • Jodha’s son Rao Beeka – founded the kingdom of Bikaner
  • Rao Satal (1489-1492)
  • Rao Suja (1492 1515)
  • Rao Biram Singh (1515-1515)
    • Son of Bagha
  • Rao Ganga (1515-1532)
  • Rao Maldeo (1532-1562)
    • Maldeo refused to ally with either the Sur Empire or the Mughal Empire after Humayun regained control of north India in 1555.
    • Muslim historian Ferishta calls him as the “most Potent Ruler of Hindustan”
    • In 1543, Battle of Sammel: with Sher Shah Suri – Maldeo lost.
    • In 1562, lost Merta and Ajmer to Emperor Akbar, and forced to send two of his sons as hostages to the Imperial Court
  • Rao Chandra Sen (1562-1565)
    • 3rd Son but Maldeo named him successor.
    • Elder brother Udai Singh, sided with Akbar – Battle of Merta 1562 – Lost his territories in wars with the Mughals.
    • He was defeated but refused to form any alliance with Mughals.
    • He continued his struggle until his death in 1581 at Pali, after which, Marwar submitted to Mughal rule in 1583
  • Raja Udai Singh (Mota Raja) (1583-1595)
    • Restored by the Mughals with the title ‘Raja’ as a vassal
  • Sawai Raja Suraj-Mal(1595-1619)
  • Maharaja Jaswant Singh (1638-1678)
    • Shah Jehan made him ruler, in line with his wishes.
    • Author of “Siddhant-bodh”, “Anand Vilas” and “Bhasa-bhusan”
    • Aurangzeb revolted against Shah Jehan, Jaswant Singh sided with Shah Jehan – Battle of Dharmatpur. Aurangzeb won – named place of Victory- Fatehabad
    • His son Prithvi Raj Singh – was murdered by Aurangzeb through poisonous robe.
  • Raja Rai Singh (1659-1659)
    • Son of Raja Amar Singh
  • Maharaja Ajit Singh (1679-1724)
    • When Jaswant Singh died, he left no male heir. But 2 of his wives were pregnant. AJit was born later.
    • However, Aurangzeb appointed Indra Singh as ruler.
    • Durgadas went to Auranzeb to recognize Ajit singh as successor but Aurangzeb kept condition of converting Ajit to muslim. Durga das disagreed.
    • For 20 years, Marwar remained under direct Mughal rule, Durga das continued stuggle.
    • When Aurangzeb died 1707, Durga das seized occasion, Ajit Singh regained Jodhpur.
  • Maharaja Abhai Singh (1724-1749)
    • Battle of Ahmedabad against Sarbaland – won
    • Battle of Gangwan against Amber.
  • Maharaja Ram Singh  (1749-1751)-(1753-1772)
    • Was defeated in battle by his uncle Bakht Singh at Luniawas, 27 November 1750 and was expelled from Jodhpur and sought refuge in Jaipur.
  • Maharaja Bakht Singh (1751-1752)
    • Brother of Abhai Singh- defeated his son Ram Singh.
  • Maharaja Vijay Singh – 1752-1753) – (1772-1793)
  • Maharaja Bhim Singh (1793 1803)
  • Maharaja Man Singh (1803 1843)
  • Maharaja Sir Takht Singh (1843-1873)
    • Not in the direct line
    • Formerly Regent of Ahmednagar.
    • Assists the British in India during the Indian Mutiny of 1857.
  • Maharaja Sir Jaswant Singh II(1873-1895)
    • Kaisar-i-Hind
  • Maharaja Sir Sardar Singh –  1895   1911
  • Maharaja Sir Sumair Singh –  1911 1918
  • Maharaja Sir Umaid Singh (1918-1947)
  • Maharaja Sir Hanwant Singh (1947-47)

Historical Places of Jodhpur:

Mandore:madore

Towards the north of Jodhpur is the ancient capital of Marwar, Mandore. This area is of major historical importance and you will find the dewals or cenotaphs of Jodhpur’s former rulers. Unlike the original chhatri-shaped cenotaphs that are typical patterns of Rajasthan architecture, these are built along the lines of Hindu temples.

Mehrangarh Fort

meharangarhSituated on a steep hill, Mehrangarh fort is one of the largest forts in India. The beauty and the grandeur of numerous palaces in the fort narrates a saga of hard sandstones yielding to the chisels of skilled Jodhpuri sculptures. The fort is known for its exquisite latticed windows, carved panels, intricately decorated windows and walls of Moti Mahal, Phool Mahal and Sheesh Mahal.

Moti Mahal:Moti

Moti Mahal, as the name suggests, is the Pearl Hall where the royal families held their audience. The hall is known to have glass windows and five nooks that enabled the queens to listen to the proceedings taking place in the Sringar Chowki, The Royal Throne of Jodhpur.

Phool Mahal:phool-mahal

Going by the name, the Phool Mahal or Flower Hall is the most exorbitant of all the halls in the palace. This beautiful chamber is said to be the pleasure dome for the Maharajas. The gold used for constructing the Mahal came from Ahmedabad, Gujarat.

Osian:

osian-temples65 Kms from Jodhpur, lies ruins of an ancient city called Ossian. This city is famous for Brahmanical and Jain temples, which belong to 8th and 11th century. The shikhar of Sachiya temple is clustered by two rows of turrets, an ambulatory and a large assembly hall with an elaborate ceiling. This town which was once a great trading centre is an oasis and houses an abundance of peacocks. The largest of the 16 Jain and Brahmanical temples is dedicated to Mahavira.

Khejarla Fort:kherjaliya

Located 85 kilometres from the main city, the 400-year old Khejarla Fort is situated in a rural setting. The stunning red sandstone monument, now a hotel, is an example of Rajput architecture. Visitors will be mesmerised by the fort’s picturesque settings, latticework friezes and intricate Jharokas.

Ummaid Bhawan Palace:

ummaidUmaid Bhawan Palace was built by Maharaja Umaid Singh in 1929 to counter a famine which had hit the state at the time. It was also known as the Chittar Palace while being constructed thanks to the use of stones drawn from the Chittar hill. The palace was designed by HV Lanchester, a renowned British architect, and was completed in 16 years. Built with sandstone and marble, the architecture of the palace is described as a blend of lndo-Saracenic, Classical Revival and Western Art Deco styles. It is recognised as one of the largest private homes in the world and also one of the more spectacular buildings. It is the only palace built in the 20th century.

Jaswant Thada:

jaswant-thadaThis milky white memorial built towards the end of the 19th century as a tribute to the leader Jaswant Singh is a huge tourist attraction. Jaswant Singh, who ruled Jodhpur, invested well in his state. He made attempts to bring down the level of crime, subdue dacoits, built railways and broadly worked on raising the economy of Marwar.

Ghanta Ghar:

ghanta-gharGhanta Ghar, also known as the clock tower of Rajasthan, is situated in one of the busiest areas of Jodhpur, the Sadar Bazaar. It was constructed by Shri Sardar Singh Ji of Jodhpur. The Sadar Market is quite popular among tourists, who throng the streets to purchase Rajasthani textiles, clay figurines, miniature camels and elephants, marble inlay work and classic silver jewellery.

Sardar Samand Palace:

sardarsamand-palaceBuilt on the banks of the Sardar Samand Lake by Maharaja Umaid Singh in 1933, the Sardar Samand Lake Palace is a spectacular hunting lodge. It remains the royal family’s favourite retreat and houses a vast collection of African trophies and original watercolour paintings.

Fairs & Festivals of Jodhpur:

Jodhpur fairs and festivals seem to express the rich culture and traditions Rajasthan. A number of festivals are celebrated in Jodhpur. However the most famous Fairs and festivals in Jodhpur are:

MARWAR FESTIVAL:

marwarThe Marwar festival is one the most famous festivals of Jodhpur and India. The two-day festival is held every year in the month of Ashwin (between September and October) and for one night in Osian Town in the Thar Desert, in memory of the heroes of Rajasthan. It was originally known as the Maand Festival. The Marwar festival is a centre of authentic folk music, culture and lifestyle of Rajasthan’s rulers. The festival is held at famous venues like the Umaid Bhavan Palace, Mandore and Mehrangarh Fort.

SHEETLAMATA FAIR

It is organized at a place locally known as ‘Kaga’ in Jodhpur City. This fair to is held on Chaitra Badi 8(March-April) every year. Nearly thirty thousand people assemble in this fair to pay homage to the image of Sheetla Mata.

VEERPURI FAIR AT MANDORE

A fair is held at Mandore, which is about 8 kms from Jodhpur city, in the memory of the heroes of Rajasthan on the penultimate Monday of Shravana(July-August) every year. Offerings of cash, coconuts and sweets are placed before the idols of deities-Ganesh, Bhairon, Chamunda and Kankali. About fifteen thousand persons of  all communities congregate in this fair.

DASHEHRA FAIR AT MASSORIA HILL

The hillock has been developed as a beautiful picnic spot. A fair is organized on Ashvina Sudi 10(September-October) every year at a place near Masooria hillock known as ‘Rawan-ka Chabutra’ lacs of people congregate here on this occasion.

CHAMUNDA MATA FAIR

The Temple of Chamunda Mata is located in Jodhpur Fort. Chamunda Mata is the family deity of Rathors (the former rulers of Jodhpur State). A fair is held on Ashvina Sudi 9(September-October) every year. More than 50,000 people, who worship the goddess, congregate in the fair.

NAU SATI KA MELA

This fair is held at a place known as Ban Ganga in Bilara town. It takes place on Chaitra Badi Amavasya (March April) every year. It is held in the memory of nine women who became sati at this place. More than 10,000 persons assemble in this fair normally to take a dip in the Ban Ganga River and also take part in singing and dancing.

BABA-RAMDEO KA MELA

This fair is held at Jodhpur City on Bhadrapada Sudi 2(August-September) at Massoria hillock, where the temple of Baba Ramdeo is situated. A Large number of people gather on this occasion from various parts of the state. It is locally known as Massoria Baba Ka Mela.

Geography of Jodhpur:

The region comprises three distinct physiography units, namely, the alluvial plains, Escarpments and Ridges and Sand dunes. Land surface of the district is nearly flat and sandy with exception of some parts of Bilara and Osian Tehsils.

The western & north-western parts of district are characterized by sand dunes. Sand dunes of transverse, longitudinal and parabolic variety are present and attain a height of 10 to 40 m.

There is only one important river in the district, viz., Luni, which enter the district near Bilara and flows for a distance of over 75 kms. before entering in Barmer district.

The climate here is of extreme desert condition of scorching summer with hot dry winds and arid conditions. Phalodi is the hottest place in the district where in summers maximum daily temperatures varies between 40°C to 45°C. Occasionally, it rises to 49°C. The winters are quite chilly.

From rain fall point of view, district has two distinct zones i.e., the NW part has 20-30 cms. average rain fall while SE part has 30-40 cms. average rainfall.  This rainfall mainly occurs during late June to September.

Natural Places of Jodhpur:

Gudha Vishnoiyan Conservation Reserve:gudha

This village is inhabited by the Bishnoi community. They are staunch believers in the sanctity of plant and animal life. Villages are marked by Khejri trees and deers which thrive. Wild animals found in the reserve include Chinkara, Black Buck, Wild boar. Also in the village is the Guda Bishnoi Lake. Around the Guda Bishnoi Lake, one can also see numerous migratory birds like domicile Cranes etc,

Ranisar Padamsar:padamsar

Located near the Fateh Pole in Mehrangarh, the Ranisar and Padmasar are adjacent lakes that were constructed in the year 1459. Ranisar Lake was built on orders of Queen Jasmade Hadi, Rao Jodha’s wife while Padmasar Lake was ordered by Queen Padmini of Rao Ganga, daughter of Rana Sanga of Mewar.

Kaylana Lake:kaylana_lake-jodhpur

Situated on Jaisalmer road, this small artificial lake is an ideal picnic spot. It is like a canvas with a splash of romantic colors. The beauty of the lake stays with you long after you’ve experienced it.

Balasamand Lake:

balsamandlakejodhpurBalsamand Lake is about 5 kilometres from Jodhpur on the Jodhpur-Mandore Road. Built in 1159 AD, it was planned as a water reservoir to cater to Mandore. The Balsamand Lake Palace was built on its shore later as a summer palace. It is surrounded by lush green gardens that house groves of trees such as mango, papaya, pomegranate, guava and plum. Animals and birds like the jackal and peacock also call this place home.

Machiya Safari Park:machiya

This park is situated on the way to Jaisalmer, about 1 kilometer from Kailana Lake. It offers a bird watching point for visitors and is also home to several animals such as deer, desert foxes, monitor lizards, blue bulls, hare, wild cats, mongoose, monkeys, etc

Sardar Samand Lake:sardarsamand

The lake attracts several migratory and local birds such as the yellow-legged green pigeon, Himalayan griffon and Dalmatian pelican, making it a bird watcher’s paradise.

Natural Resources/ Minerals of Jodhpur:

Minerals have been playing an important role in development of Jodhpur district for last many decades. The district is mainly rich in non-metallic minerals like sandstone, rhyolite, limestone, jasper, granite, clay, murram, kankar, brick earth, bajri etc. The important Major and minor minerals occurring in the district are :­

Jasper:

  • Jasper is silica having dark red colour.
  • It has been found to be a good abrasive and is used in making grinding wheels.
  • Jasper occurs  near Mathania, Osiyan, Rundia, Sopra, Mogra, Lawera and Tamtia.

Dolomite:

  • Dolomite having high MgO with low silica percentage is a valuable industrial raw material for steel, refractory, glass and ferromanganese industries.
  • Dolomite/dolomitic limestone occrrences are mainly confined to an east-west trending zone between Phalodi and Nagaur.
  • Indo Ki Dhani & Indolai Ka Talaoarea is associated with siliceous dolomite.

Ball Clay:

  • Good ball clay is reported from northern part of the district in tehsil Phalodi near village Kanasar-Mandli.
  •  It can be used in ceramic, rubber & paint industry.

Sandstone:

  • This is an important building stone of whole of Western Rajasthan.
  • History of its mining in Jodhpur district is 500 years old. Temples and Palaces in Jodhpur area are ample proof of sandstone’s utility.
  • The important occurrences of sandstone are located around Jodhpur city viz., Mandore, Soor-Sagar, Keru, Berli, Kailana, Balesar, Dechu, Setrawa, Chokri, Ratkudiya, Osiyan, Bhopalgarh etc.
  • Handicraft items made out of sandstone are exported in international market.

Limestones:

  • This mineral finds multiple uses in variety of industries like cement, chemical, steel, sugar etc.
  • There are number of limestone belts of cement to chemical grade occurring in Western Rajasthan, located in Jaisalmer, Jodhpur, Pali and Nagaur districts.
  • Out of these most important are Sojat-Bilara-Gotan-Mundwa & Jaisalmer belts having cement-chemical grade limestone.
  • Part of Sojat belt passes through the eastern part of Jodhpur district. The important localities are Bilara-Ransigaon, Hariya Dhana, Borunda etc.
  • Small occurrences of limestone are also observed near Basni Had Singh, Suwana, Basni-Darmi and Asop villages of Bhopalgarh tehsil.

Granite:

  • Granite in Jodhpur district is scattered over 150 sq. kms. area around Pipar, Khejarla, Chokri, Salawas, Madliya, Rawniana, Kosana, Kharia etc.
  • Colour varies from grey, pink, cream to red-brown.
  • Jodhpur Granite has been classified as plutonic equivalant of Malani rhyolite.

Rhyolite:

  • Extrusive phase of Malani suite occupies large part of Jodhpur district.
  • The important localities around Jodhpur are Kailana, Fort and Lalsagar.
  • Rhyolite is mainly used for making road ballast, gitti and chips and powder.

Ochre:

  • Low grade red-yellow ochre is found associated with sandstone near Pichiyak in tehsil Bilara.
  • It is used for white washing of houses, floor, walls etc.

Brick-Earth:

  • Only one mining lease of brick earth is sanctioned in Kiron Ki Dhani.

Masonry stone:

  • Borunda, Ghati, Bujhawad, Daizar, Gangana, Rohilla Kalan, Sar (Sawri-Bhakri) etc. are main localities from where masonry stone is produced.
  • In addition to the above, recently department has located new areas of masonry stone near Osiyan, Tinwri, Bhopalgarh, Daizar etc.

Salt:

  • Salt occurs in form of brine solution near Malar-Bap area in north of Phalodi. Water is pumped out of wells and is spread in small shallow ponds and Salt is collected by evaporation method.

Population:

  • The district has a population density of 161 inhabitants per square kilometer.

 

 

Jodhpur District

Jodhpur is a district of the state of Rajasthan in western India with the city of Jodhpur as its the administrative headquarters. Formerly a princely state, Jodhpur is located in the Marwar region and is a well-known tourist destination and major commercial zone.Jodhpur city is famous for its rich history. It is also referred as the Blue City and “Sun City“. It is also the second largest city in the Rajasthan.

District Jodhpur
Headquater Jodhpur
Area (km2) 22,850
Population(2011) 3,685,681
Division Jodhpur
Official Website http://jodhpur.rajasthan.gov.in

Tourist Places In Jodhpur District

  • Mehrangarh Fort
  • Jaswant Thada
  • Umaid Bhawan Palace
  • Government Museum
  • Rai-ka-Bag Palace
  • Umed Garden
  • Raj Ranchhodji Temple
  • Achal Nath Shivalaya
  • Siddhnath
  • Ganesh Temple
  • Mandore Garden
  • Osian Temple
  • Balsamand Lake & Palace
  • Kaylana Lake
  • Guda Bishnoi
  • Jaswant Sagar Dam

Jodhpur District Location

Jodhpur district is located in West Rajasthan, with Jaisalmer and Bikaner on the North, Pali and Barmer to its South, Nagaur to its East and Jaisalmer manning its Western borders.

Jodhpur District Climate

Jodhpur has hot and dry weather in the summers with maximum temperature to 43 C. Winters are quite pleasant in Jodhpur with minimum temperature reach to 14 C.

Transportation In Jodhpur District

Jodhpur is well connected to all major cities in India by rail as Jodhpur Jn. is an important one for North Western railway zone . Rajasthan Road Transport Corporation provides government and private bus services to all cities in Rajasthan from Jodhpur.
Jodhpur airport is connected to Jaipur, Delhi, Udaipur and Mumbai by daily regular flights.

 

Pali District GK in Hindi पाली जिला Rajasthan GK in Hindi

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Pali District GK in Hindi पाली जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

पाली जिला भारत के राजस्थान प्रान्त का एक जिला है जिसकी पूर्वी सीमाएं अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़ी हैं। इसी सीमाएं उत्तर में नागौर और पश्चिम में जालौर से मिलती हैं। पाली शहर पालीवाल ब्राह्मणों का निवास स्थान था जब मुगलों ने कत्लेआम मचा दिया तो उन्हें यह शहर छोड़ कर जाना पड़ा। वीर योद्धा महाराणा प्रताप का जन्म भी यहीं पर अपने ननिहाल में हुआ था। यह नगर तीन बार उजड़ा और बसा। यहां के प्रसिद्ध जैन मंदिर भक्तों के साथ-साथ इतिहासवेत्ताओं को भी आकर्षित करते हैं। ये राजपूत वर्चस्व वाला जिला है यहाँ सभी सामान्य सीटो के 5 प्रधान राजपूत है और 85 सरपंच राजपूत है साथ ही एक मंत्री भी इसी समाज से है यहाँ मात्र 6% राजपूत हैं

 

इतिहास

कुषाण काल के दौरन, 120 ईस्वी में राजा कनिष्क ने रोहत और जैतारण क्षेत्र, (आज के पाली जिले) के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त की थी। सातवीं शताब्दी AD सदि के अंत तक वर्तमान राजस्थान राज्य के अन्य हिस्सों के साथ-साथ चालुक्य राजा हर्षवर्धन का शासन था।

10 वीं सदी से 15 वीं सदी तक की अवधि के दौरान, पाली की सीमाओं से सटे को मेवाड़, मारवाड़ और गोडवाङ बढ़ा दिया। नाडोल चौहान वंश की राजधानी थी। सभी राजपूत शासक विदेशी आक्रमणकारियों के विरोध में थे, लेकिन व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे की भूमि और नेतृत्व के लिए लड़ाई लड़ते थे। गोडवाङ के  पाली क्षेत्र के विषय में तो मेवाड के शासक  महाराणा कुंभा भी रूचि रखते थे। लेकिन पाली शहर पर  ब्राह्मण शासकों का राज रहा, जो पड़ोसी राजपूत शासकों के संरक्षण में था, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील बना रहा।

पाली जिला के मारवाड तहसील के अन्‍तर्गत धनला गांव का इतिहास बहुत पुराना है स्‍थानीय गांव के अन्‍तर्गत शोभा कोट नामक पहाडी है जंहा पर राव रीडमल रहते थे राव रीडमल के 29 पुत्र थे जिसमें पांचवे पुत्र राव जोधा थे जिन्‍होने जोधपुर की स्‍थापना की को राव के 23 वे पुत्र राव सायरसिंह उर्फ शेरसिहं थे जो कारण वश ध्‍ानला की एक नाडी में डुबने से देवलोकगमन हो गये तथा ग्रामीणो ने उनका भव्‍य मंदिर बनाया जो आज सारजी महाराज उर्फ भुरा राठौड के नाम से प्रसिद्व है इस गांव का इतिहास बहुत बड़ा है इस गांव में ग्राम पंचायत, सनीयर सैकडरी सहित पांच विघालय है गामीण बैक एक सरकारी व 2 निजी अस्‍पताल है तथा राजनीती में कांबिना मंत्री नरेन्‍द्र कंवर व विधायक केसाराम चौधरी इस गांव के है

एक धारणा के अनुसार पाली का नाम पालीवाल ब्राहम्‍णों के कारण ही पाली पड़ा है। इतिहास के कुछ अंशों से पता चलता है कि पालीवालों ने विदेशी आक्रांताओं से अपनी मातृभूमि को बचानें के लिये घोर संघर्ष एवं विरोध किया लेकिन विशाल सेना द्वारा उनके इस विरोध को दबा दिया गया और कई लोग मारे गये। वर्तमान में धोला चौतरा नामक स्‍थान पर पालीवाल समाज के व्‍यक्तियों की जनेउ व उनकी पत्नियों के स्‍वेत चूडों का ढेर सा लग गया था। जिसे धोला चबूतरा नामक स्‍थान से जाना गया था।

Pali: History, Geography, Places

Location, Area and Administration of Pali:

Rajasthan Gk In Hindi Series 105

Rajasthan Gk In Hindi Series 104

Rajasthan Gk In Hindi Series 103

Rajasthan Gk In Hindi Series 102

Pali district is located between 24°45′ to 26°29′ North Latitudes and 72° 47′ to 74° 18′ East Longitudes . It share its boundaries with 8 district of the state; In South west Sirohi & Jalore, in west Barmer; in south east Rajasamand & Udaipur in north Nagore, in North West Jodhpur and in north east Ajmer shares their boundaries with the district.

The district has total area of 12,387 sq. km, which has been divided into 10 tehsils namely Sojat, Marwar Junction, Jaitaran, Raipur, Sumerpur, Bali, Pali, Rohat, Desuri and Rani.

Imagesource: MapsofIndia Tehsil of Rani not shown in map
Imagesource: MapsofIndia
Tehsil of Rani not shown in map

History of Pali:

Geologists trace the existence of Pali to pre-historic age and maintain that it has emerged from the vast western sea spread over a large part of the present day Rajasthan. In the Vedic age Maharshi Javali stayed in this area for meditation and interpretation of Vedas. The Pandavas in the Mahabharata age also have made this area (near Bali) their resting place during the exile. As a part of ancient Arbuda Province, this area was known as Balla-Desh.

During the Kushana Age, King Kanishka had conquered Rohat and Jaitaran area, parts of today’s Pali district, in 120 AD. Till the end of seventh century A. D. this area was ruled by the Chalukya King Harshavardhana along with other parts of the present state of Rajasthan.

During the period from 10th to 15th century, boundaries of Pali extended to adjoining Mewar, Godwad and Marwar. Nadol was the capital of Chauhans. All Rajput rulers resisted the foreign invaders but individually fought for each other’s land and leadership. After the defeat of Prithviraj Chauhan, against Mohammed Gauri, the Rajput power of the area was disintegrated. Godwad area of Pali become the subjects of then ruler of Mewar, Maharana Kumbha. But Pali city which was ruled by Brahmin rulers with the patronage of neighboring Rajput rulers, remained peaceful and progressive.

The 16th and 17th centuries saw a number of battles in the surrounding areas of Pali. Shershah Suri was defeated by Rajput rulers in the battle of Giri near Jaitaran, Mughal emperor Akbar’s army had constant battles with Maharana Pratap in Godwad area. Again after the Mughals had conquered almost all of Rajputana, Veer Durga Das Rathore of Marwar made organized efforts to redeem the Marwar area from Aurangzeb, the last Mughal emperor. By then Pali had become subservient to Rathores of Marwar state. Pali was rehabilitated by Maharaja Vijay Singh and soon it became an important commercial center.

Under British era in India in 1857, various Thakurs of Pali under the stewardship of Thakur of Auwa fought against the British rule. Auwa fort was surrounded by the British army and then conflicts lasted many days.

Fairs & Festivals of Pali:

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Pali District is known for its colorful fairs & festivals, Dusseshra, Diwli, Holi, Ganesh Chaturthi, Janmastmi, Mahavir Jayanti & Mahashivratri etc. are celebrated with sanctity.

SHEETLA SAPTMI FAIR

It is the main fair of the district which is held at Sojat on Chaitra Badi 7 (March-April) Every year. About 20, 00 people assemble in this fair to worship ‘Sheetla Mata’. The people put ‘Pujapa’ and other offerings in the temple in honor of the ‘Mata’. The fairs of ‘Sheetla Mata’ are also held by Bayad in Pali tehsil, Isali in Marwar Jn. tehsil and at Chanod in Bali tehsil.

BARKANA PARASNATH FAIR

The fair is held in Village Barkana of Desuri tehsil on Posh Badi 10 (Dec-Jan) every year. There is a temple dedicated to deity Parasnath. About 10,000 people assemble in the fair to pay their homage to the deity.

SEWARI CATTLE FAIR

This fair is held near village Sewari of Bali tehsil. The duration of the fair is 5 days from posh Badi 2 to 6 (Dec.-Jan.) every year. About 15,000 people assemble in this fair for the purchase and sale of animals Phalna is the nearest railway station for the fair.

LAKKHI MELA- SONANA KHETLAJI

In the beginning of full moon of Chetra month a fair is organized in the basin of local river Sarangawas of Sonana khetlaji temple at Desuri tehsil. This fair represents the folk culture of not only pali district but also of other districts of western Rajasthan. Since this is organized after Holi festival, large number of Gair dancers participate in this fair in their conventional and fancy dresses.

Om Banna Temple

The Sacred temple or than of Om Banna is 20 km away from the city on jodhpur-pali highway.  The Motor bike of Om Banna is kept there for the devotees for worshiping.

Geography of Pali:

Rajasthan Gk In Hindi Series 66

Rajasthan Gk In Hindi Series 65

Rajasthan Gk In Hindi Series 64

Rajasthan Gk In Hindi Series 63

Rajasthan Gk In Hindi Series 62

The shape of the district resembles to an irregular triangle and has generally undulated plains with scattered hills. The Aravalli Range runs along the eastern side of the district from south-west to north-east. The highest peak in the district is 1,099 m.

There is no perennial river in the district. The tributaries Lilri, Sukri, Bandi and Jawai, discharge their water into Luni, the principal drainage of western Rajasthan.

There is no lake or natrural spring in the district.  But there are number of big and small dams constructed for irrigation purposes.  The important dams are Jawai dam in Bali tehsil,Raipur Luni, Hemawas, Kharda and Biratiya Khurd and Walar.

The climate of the district is, on the whole, dry and is very hot in summer and cold in winter. Normal annual rainfall in the district is about 47 cm.

Natural Places of Pali:

Jawai damjawai-dam

Jawai Dam is one of the biggest dam of western Rajasthan and situated in Sumerpur tehsil of Pali district, having capicity of 6000 million cubic feet. Jawai Dam is a good tourist spot.

Todgarh Raoli Wildlife Sanctuary

Todgarh Raoli Wildlife Sanctuary is spread over Ajmer, Pali and Rajsamand districts of Rajasthan. It occupies about 495 km2 of tropical deciduous forests and grassland. Major wildlife includes leopard, wild boar, chinkara, common langur, sloth bears and Indian wolf. An ancient Lord Shiva temple surrounded by tall trees of Karanj, Tamarind, and Banyan attract tourist from distance place.

Mao Todgarh-Raoli
Map Todgarh-Raoli

Natural Resources/ Minerals of Pali:

Rajasthan Gk In Hindi Series 43

Rajasthan Gk In Hindi Series 42

Rajasthan Gk In Hindi Series 41

Rajasthan Gk In Hindi Series 40 (400 Questions)

Rajasthan Gk In Hindi Series 39

Pali district is endowed with wide variety of minerals. Both metallic and non metallic minerals are found. Good quality deposits of asbestos, limestone, gypsum, magnesite, quartz are found which have been exploited for last so many years. The details of mineral deposits are given below.

Copper

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  • Copper mineral has been reported from Chitar and Naya Kheda.

Lead

  • Small occurrences of lead mineralization are located near Punagarh and Sandra area.

Nickel

  • Minor indications of nickel are noticed around Ranakpur. The occurrence is not of economic value.

Tungsten

  • Numerous scheelite bearing skarns were located near village Kararavav, Kuram, Bhimana, Sirava, Thandiberi etc. in tehsil Bali.

Asbestos

  • The asbestos deposits in Pali district are located near Dhal, Mala-ka-Guda, Sendra, Pateria, Chhagri-Ka Bhagal, Goria, Dhambarli, Kanotiya & Ramgarh.
  • Small occurrences of asbestos are also noticed near Sandra, Belphana and Halawal villages.

White clay

  • At Literia large deposit of white clay was located near the top of the limestone of the Vindhyans and overlain by pebble beds.

Felspar Quartz

  • The pegmatites occurring around Beranthia Khurd, Bhanuira, Kalyanpura, Kalakot, Raira in Raipur tehsil near villages Nana in Bali tehsil and Sitapura in Sojat tehsil consist mainly of quartz & felspar.
  • The felspar is of pink variety.

Calcite

  • Calcite occurrences are located at Bara Guda, Budha Lawa, Kalhab, Kapil-Ki -Bagal, Piplan, Nana, Khemel, Alipur, Khoral, Patan, Oayalpur etc.
  • These areas mainly fall in Raipur and Jaitaran tehsil.

Magnesite

  • The magnesite deposits of Sarupa-Chhaja, Gafa and Airaberi are located in the thickly forested border areas of Ajmer and Pali districts.
  • Small occurrences of magnesite are noticed around Koyalvav, Bhimana, Charia ki Bhagal in Bali tehsil and near Bhira in Raipur tehsil.

Garnet

  • This mineral has been exploited in past near Devkhedi and Karanpur villages of Raipur tehsil.

Mica

  • This is found associated with quartz, felspar in pegmatits near Kalatiya, Khemal etc. villages.

Soap stone

  • Small occurrences of soapstone associated with asbestos in ultrabasic rocks are reported from Kanatia & Manpura in tehsil Raipur.

Read ochre/Red oxide

  • It is observed near Botha-ki-Dhani in Raipur tehsil where it was being exploited by private mine owners.
  • Red oxide and clay are also found around jaitpura & Shyamgarh and have also been worked in past.

Graphite

  • Small occurrences of graphite are located near Bar­- Railway station.

Gypsum

  • Gypsum has been worked in past near Khutani village.

Wollastonite

  • The occurrence of Wollastonite found near Khera­ Uparla village of Udaipur district which also extends into Pali and Sirohi districts.

Lime stone:

  • Limestone is also found in Nana, Kararavav and Thandiberi areas and near Ras, Guria-Dhunimata-Deoli­Hullan,  Thandiberi-Siyava and Mandla-Atbara

Marble

  • Deposits are found at at Jadri, Sindru, Diyana, Bankli, Khiwandi, near Sumerpur town in Bali tehsil, Gurah and Kantaliya in Raipur tehsil.

Building Stone:

  • Extensively worked Bar conglomerate at Bar, Giri and Lawacha in Raipur tehsil are the only deposits in the district.

Granite:

  • Granite occurs in  Kharda-Ki-Dhani, Dharm-Dhari-Chotila, Bali-Maniyari, Nadol-Narlai, Kotsamariya, Bar-Sandra- JhakKi-Chowki, Ramniya, Jawariya, Natra-Jhakhora-Rajora areas.

Population:

  • The district has a population density of 165 inhabitants per square kilometer.
Om Banna is shrine near Jodhpur, India, devoted to a motorcycle god, also called Bullet Baba. Om Banna Dham is located Jodhpur to Pali national highway shift while going to shift approximately 20 km before Rohit police station “accident prone” area of ​​the board looks more than a few steps away the side of the road in the woods about 30 to 40 offerings and prayers goods lined with shops visible as well as mirrored crowd, surrounded by a terrace on which a large photo engaged, and constantly holy burning flame  and pops to see a single full of fresh flower  bullet motorcycle. The bike is a Royal Enfield Bullet 350. Hundreds of devotees turn up every day to pray for a safe journey, often bearing liquor.
Om Banna Story: Om banna or Om Singh Rathore belongs to Rathore family of Chotila. In 1991, on the way from Pali to Chotila, he drove into a tree and his motorcycle fell into a ditch which killed him on the spot. The motorcycle was seized by the local police and taken to the police station but was found the next morning at the accident spot. The bike was seized and taken back to Police station again where it was locked and chained, but it was found at the same place next morning again. The legend says that the bike without fail made it out of the police station even when the fuel tank was allegedly emptied. It is popularly believed that no matter what the policemen did Om Bana’s Bullet returned to the accident site before dawn. This was seen as a godly miracle by the people who continue to worship the Bullet Bike still. Om Banna Dham chotila Rohit Pali district is opened every time 24 hour in every season with holy burning flame called Jyote.There are many shopes full of worship things.There are above 50 small and big shops near by Om Bnna Ji Dham Chottila on National highway Jodhpur to Pali Ahmadabad its also opened every season in 24 hour because any time many devotes  visit here. This temple is known as “Bullet Baba’s temple“.
The Godwad festival is a new three-day cultural festival introduced by the Rajasthan Tourism Department to promote the ‘Godwad’ region of the Pali district. The festival is held at Ranakpur and was initially promoted as a “Yoga Retreat and Classical Dance Festival”. The first festival was held in August 2011 and the second Godwad festival was held in March 2012. Classical dances performances are held at the 13th century Sun Temple, besides traditional processions of Marwari horses and elephants, horse dancing and racing and folk dances as part of the festival. Godwad Festival- 2013 is scheduled to be held on 9-12 April 2013.

 

Pali District GK in Hindi पाली जिला Rajasthan GK in Hindi

Pali District

Pali is a district of Rajasthan which has its existence from the pre historic age. Pali town is the headquarter of the district. Pali have 9 sub- divisons or Tehsils namely- Sojat, Marwar Junction, Jaitaran, Raipur, Sumerpur, Bali, Pali, Rohat and Desuri. Rani is proposed to be the 10th tehsil of Pali district. Pali District is one of the well-known tourist destinations of India.

District Pali
Headquater Pali city
Area (km2) 12387
Population(2011) 2,038,533
Division Jodhpur
Official Website http://www.pali.nic.in

Tourist Places In Pali District

  • Sojat Fort
  • Parashuram mahadev temple
  • Somnath Mandir
  • Sri Bangur Government Museum
  • Jawai Dam
  • Korta Teerth
  • Nana Teerth
  • Desuri
  • Jadan Aashram
  • Todgarh-Rawali Wildlife Sanctuary
  • Shri Takhatgarh Teerth
  • Mahavira Temple
  • Velar Teerth
  • Jakhoda Teerth

Pali District Location

Pali is located in the south western side of Rajasthan. It is sorrounded by Nagaur District to the north, Ajmer District to the northeast, Rajsamand District to the east, Udaipur District to the southeast, Sirohi District to the southwest, Jalore District and Barmer District to the west, and Jodhpur District to the northwest.

Pali District Climate

The climatic conditions of Pali district are some what different than the Western Rajasthan. Although, basically the summer season raise the temperature upto 46-47 degree centigrade at peak Time in May-June , a large variation in temperature  is found due to adjoining green and hilly areas. Winters are moderately cool during December-Janruary  lowering the mercury to 4-5 degree centigrade occasionally. Average rainfall in the district during the months of July-October is 300 mm.

Transportation In Pali District

Pali is well connected by road and railways. Regular government and private buses are available to other major cities. Pali railway station connects Pali with all the major cities of Rajasthan and rest of india. Jodhpur airport is the nearest airport to pali district.

 

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Sirohi District GK in Hindi सिरोही जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

सिरोही पश्चिमी भारत में राजस्थान राज्य में एक शहर है। यह [[सिरोही जिला] का प्रशासनिक मुख्यालय है और पूर्व में देवड़ा चौहान राजपूत द्वारा शासित सिरोही राज्य रियासत की राजधानी थी। इसमें पांच तहसील (प्रशासनिक प्रभाग) हैं:आबू रोड, शिवगंज, रेवदर, पिंडवाड़ा और सिरोही स्वयं। इसे देवनगरी भी कहा जाता है। सिरोही के निकटतम रेलवे स्टेशन सिरोही रोड है। सिरोही को वर्ष 2014 में “स्वच्छ भारत अभियान” के लिए राजस्थान के 33 जिलों में पहला स्थान मिला।

परिवहन

सिरोही राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के माध्यम से भारत के सभी शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आरएसआरटीसी की जयपुर, उदयपुर, अजमेर, कोटा, बाड़मेर, दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत, कल्याण सिरोही सेंट्रल बस की स्टॉप से ​​दैनिक सेवाएं हैं। वीआरएल ट्रेवल्स, एमआर ट्रेवल्स, एसआरएस ट्रेवल्स, श्रीनाथ ट्रेवल्स जैसी विभिन्न निजी कंपनी बसों द्वारा सिरोही से बैंगलोर और पुणे तक दैनिक सेवाएं हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन सिरोही रोड और आबू रोड है। निकटतम घरेलू हवाई अड्डा उदयपुर और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद है।

भूगोल

सिरोही 24.885 डिग्री N 72.8625 डिग्री E पर स्थित है। इसकी औसत ऊंचाई 321 मीटर (1053 फीट) है।

शिक्षण संस्थान

सिरोही का एक अस्पताल और राजस्थान विश्वविद्यालय से संबद्ध एक सरकारी महाविद्यालय है।

जनसंख्या

सिरोही नगर की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 35,531 है और सिरोही ज़िले की कुल जनसंखया 8,50,756 है।

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प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थल

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  • विश्व का सबसे बड़ा गणेश, मगरीवाड़ा
  • अखंड भगवान श्री रामचन्द्रजी मंदिर,मगरीवाड़ा
  • श्री बाँण माताजी पर्वत, मगरीवाड़ा
  • मल्लेशवर महादेव मन्दिर
  • श्री वाराही माताजी मंदिर पालड़ी(R)
  • गाजण माता मदिंर सिरोही
  • सारणेश्वर महादेव
  • मातर माताजी मंदिर
  • वोवेश्वर महादेव(झाड़ौली-वीर)
  • सूर्य मंदिर
  • बसंतगढ़
  • वासा
  • मल्लेश्वर महादेव मंदिर मंण्डवारिया
  • खैतलाजी महाराज मदिंर,गोयली
  • खिमज माता जी मदिंर, गोयली
  • हनुमानजी मदिंर, वराडा
  • खेतलाजी मंदिर और सिन्द्रथ गोगा धाम
  • लीलाधारी महादेव , मंडार
  • जागॆश़वर महादॆव मदिंर, हरणी- दाॅतराई
  • वैजनाथ महादेव मंदिर, वाण
  • सैनजी दाता मंदिर, वाण
  • गंगा धाम वासाडा koshik purohit
  • देवक्षैत्र महादेव तीथ॔ धाम मंदिर, असावा
  • श्री सदका माताजी मंदिर आबु ( असावा )
  • हडमतिया हनुमान जी कालन्द्री
  • साई धाम (साई बाबा) कालन्द्री
  • शनि धाम (शनि महाराज) कालन्द्री
  • श्री बृह्मजी मंदिर कालंद्री
  • श्री जागेश्वर महादेव मड़िया

 

Sirohi District GK in Hindi सिरोही जिला Rajasthan GK in Hindi

 

Sirohi: History, Geography, Places

Location, Area & Administration:

Sirohi district is situated in the south-west part of Rajasthan between 24°20′ and 25°17′ North Latitude and 72°16′ and 73°10′ East Longitude. It is bounded by district Pali in the north-east, district Udaipur in the east, Jalore in the west and Banaskantha district of Gujarat in the south.

Sirohi has an area of 5136 sq. kms which is divided into 5 tehsils namely Sirohi, Sheoganj, Pindwara, Abu Road and Reodar for administration purposes.
sirohi-tehsil-map

History of Sirohi:

The Name Sirohi had been derived from Siranwa hills on the Western Slope of which it stands. In 1405, Rao Sobha Ji (Sixth in descent from Rao Deoraj, the Progenitor of the Deora Clan of Chauhans ) founded a town Shivpuri on eastern slope of Siranwa hill which is called KHUBA.

Sehastramal, the son of Rao Sobha ji founded the present city SIROHI on western slope and laid foundation stone of the Sirohi fort on second day of Vaisakh in the year 1482 (V.S.) i.e. 1425 (A.D.) on the top the present town of Sirohi and made it his Capital which lies on the Western Slope of the Siranwa hills, later all the area under Deoras came to be known as Sirohi.

After Independence an agreement was signed between Central Government and minor ruler of Sirohi State, with this the State Administration of the Sirohi State was taken over by Bombay Government from 5th January 1949 to 25th January 1950. The first administrator representing a bombay state was Prema Bhai Patel. After final merger with Rajasthan in 1950, an area of 787 Sq. Km. consisting of Aburoad and Delwara tehsils of Sirohi district was renamed with the Bombay State on 01, Nov. 1956, after the recommendation of the State organisation Commission, which forms the present position of the district

Rulers of Sirohi State:

Raos

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  • Durjan Singh – 1697 – 1705
  • Umaid Singh I  – 1705 – 1749
  • Prithvi Singh  – 1749 – 1773
  • Takhat Singh – 1773 – 1781
  • Jagat Singh  – 1773 – 1782
  • Verisalji II – 1782 – 1808
  • Udaibhan Singh – 1808 – 1847
  • Sheo Singh -Regent – 1847 – 1862
  • Umaid Singh -Regent – 1861 – 1862
  • Umaid Singh II – 8 Dec 1862 – 16 Sep 1875
  • Keshri Singh – 16 Sep 1875 – 1 Jul 1889

Maha Raos

  • Keshri Singh – 1 Jul 1889 – 29 Apr 1920
  • Sarup Ram Singh – 29 Apr 1920 – 23 Jan 1946
  • Tej Ram Singh – 5 May 1946 – 15 Aug 1947
  • Maharani Krishna – 5 May 1946 – 15 Aug 1947

Geography of Sirohi:

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Sirohi district is broken up by hills and rocky ranges. The granite massif of Mount Abu divides the district into two portions, running from north-east to south-west. The south and south-east part of the district, which lies between Mount Abu and the main spine of the Aravallis, is mountainous and rugged, and is drained by the West Banas River. Abu Road, a station on the main Delhi-Ahmedabad rail line, lies in the valley of the West Banas. Dry deciduous forest is common in this part of the district, and the higher elevations of Mount Abu are covered in conifer forests.

The portion of the district west and north of Mount Abu is drier, lying in the rain shadow of the mountain, which blocks the southwest monsoon. The southwest corner of the district is drained by the Sukri river, an intermittent stream that drains the western slope of Mount Abu. The northwestern portion of the district is drained by tributaries of the Luni River. The Northwestern thorn scrub forests cover the western and northern portion of the district.

Major Rivers: Jawai, Sukhadi, Khari, Bodi, Krishnavati, Kapalganga, and Banas.

Major Dams: Banas, Oda, Danta, Chandela, Girwar, Niboda, Javal, KarodiDwaj, and Angor.

Major Crops: Millets, Pulses, Sesame, and Red Chillies.

Natural Places of Sirohi:

Mount Abu Wildlife Sanctuary

Natural Resources of Sirohi:

The Sirohi district is full of minerals therefore the industries based on minerals were developed rapidly.
Sirohi Minerals

Population

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According to the 2011 census Sirohi district has a population of 10,37,185. The district has a population density of 202 inhabitants per square kilometer. Sirohi has a sex ratio of 938 females for every 1000 males, and a literacy rate of 56.02%.

Pavapuri Tirtvh Jiv Metri Dham is situated at Sirohi district of Rajasthan. This campus is developed by K. P. Sanghvi Group and it comprises of a Jain Tirth (Temple complex) and Jeev Raksha Kendra (Animal Welfare Center). The Tirth derived its name after the Pavada Agriculture well that exists there. Shri Kumarpalbhai V. Shah inspired Late Shri Hajarimalji Poonamchandji Sanghvi (Bafna) and Shri Babulalji Poonamchandji Sanghvi (Bafna), the founders of K. P. Sanghvi Group, to construct a Tirth Dham. They started construction and development of the campus on May 30, 1998, Saturday (Jeth Shukla 15, 2054 V. S.). The initial thought was to construct a small temple and a shelter for 100 cows only but by God’s grace and blessings the campus is now spread over more than 500 acres of land. The temple complex occupies 31,01,472 sq. ft. area and the Jeev Raksha Kendra (Animal Welfare Center) occupies 71,96,112 sq. ft. area to provide shelter to 6,300 stray cattle. It took two and a half years to construct the temple with an average of 400 artisans working daily. The construction was completed on February 07, 2001, Wednesday (Magh Shukla 14, 2057 V. S.) and was finally opened for worship. The devotees were spellbound during the Pratishtha Mahotsav, opening ceremony of the Tirth Dham.
Summer festival 2014 is held in Mount Abhu (Rajasthan) from 12th to 14th May 2014. Summer festival is held every year during the month of May on Budh Poornima. The festival celebrates the warmth and cheerfulness of the people of hill station, who welcome the tourist from the depth of their hearts. The hospitality of the people, their colorful culture and exotic location made this festival a never to be forgotten experience.
The festival begins with a ceremonial procession, which starts from the RTDC Hotel Shikhar and gather at the Nakki Lake Chowk followed by folk performances of Rajasthan & Gujrat states. The grand finale of the Festival a display of dazzling fire works all three days. This three day colourful festival is organized by the Rajasthan Tourism, Municipal Board, Mt.Abu & District Administration. The second and third day of the festival is more interesting because of various competitions that take place the whole day. Skating Race, skater’s Show, CRPF Band Show, Boat Race, Horse Race, Tug of War, Panihari Matka Race and Deepdan add to the excitements of the celebration.
Adhar Devi (Arbuda Devi) Temple is situated in Mount Abu of Sirohi. The Adhar Devi Temple is one of the popular religious themed tourist destinations in the Mount Abu region. It is situated three kilometers north of the main town of Mount Abu. The Adhar Devi Temple can be reached by climbing up 365 stairs carved into the mountain. The temple itself is located inside a rocky cleave and is reached by crawling through a small opening into the cave. The Adhar Devi Temple is dedicated to the Goddess Durga. It got its name because the legend has it that “Adhar” of the Mataji (Goddess deity) fell here, also it was believed that the image of the goddess could be found there hanging in mid air. As well as being a popular tourist destination, the Adhar Devi Temple is also a common destination for many religion pilgrimages. The Adhar Devi temple receives most pilgrims during the 9 days of the holy Navratri season.

Sirohi District

Sirohi District is a district in the southern Rajasthan in western India. The Sirohi City is the district headquarters and formerly was the capital of the princely state Sirohi and was ruled by Deora Rajputs. This district is comprised of 6 tehsils namely- aburoad, sheoganj, reodar, pindwara and sirohi itself.

Sirohi is also known as the Dev Nagri due to the large numer of temples in the city.

District Sirohi
Headquater Sirohi
Area (km2) 5,136
Population(2011) 1,037,185
Division Jodhpur
Official Website http://www.sirohi.nic.in

Tourist Places In Sirohi District

  • Sarneshwar Ji Temple
  • Sarvadham Temple
  • Pava Puri Temple
  • Sun Temple at Varman
  • Chandravati
  • Ambheshwar Ji Temple
  • Mirpur
  • Vasantagrh
  • Ajari
  • Bheru Tarak Dham
  • Jiraval- A Jain pilgrimage center.

Sirohi District Location

Sirohi district is located in South Rajasthan. Its neighbors are Udaipur in the east, Banaskantha District (Gujarat) in the south, Pali in the north-east and Jelore in the west.

Sirohi District Climate

The climate of Sirohi varies to an great extent. During the summer tempreture reaches upto 42°C while in winter it goes down to 0 °C. In the winter season the tempreture maximum upto 20°C.

Transportation In Sirohi District

Sirohi is well connected by road and railways. many trains are there from Sirohi town, Abu railway station, which connects sirohi with rest of Rajasthan and India as well. Regular government and private buses are available to other major cities. The airport at Udaipur is the nearest o the district, almost 110 km. This airport is served by a good number of flights from Jaipur and other cities.

 

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Chittorgarh District GK in Hindi चित्तौड़गढ़ जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

चित्तौड़गढ़ राजस्थान का एक शहर है। यह शूरवीरों का शहर है जो पहाड़ी पर बने दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़गढ़ की प्राचीनता का पता लगाना कठिन कार्य है, किन्तु माना जाता है कि महाभारत काल में महाबली भीम ने अमरत्व के रहस्यों को समझने के लिए इस स्थान का दौरा किया और एक पंडित को अपना गुरु बनाया, किन्तु समस्त प्रक्रिया को पूरी करने से पहले अधीर होकर वे अपना लक्ष्य नहीं पा सके और प्रचण्ड गुस्से में आकर उसने अपना पाँव जोर से जमीन पर मारा, जिससे वहाँ पानी का स्रोत फूट पड़ा, पानी के इस कुण्ड को भीम-ताल कहा जाता है; बाद में यह स्थान मौर्य अथवा मूरी राजपूतों के अधीन आ गया, इसमें भिन्न-भिन्न राय हैं कि यह मेवाड़ शासकों के अधीन कब आया, किन्तु राजधानी को उदयपुर ले जाने से पहले 1568 तक चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी रहा। यहाँ पर रोड वंशी राजपूतों ने बहुत समय राज किया। यह माना जाता है गुलिया वंशी बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी के मध्य में अंतिम सोलंकी राजकुमारी से विवाह करने पर चित्तौढ़ को दहेज के एक भाग के रूप में प्राप्त किया था, बाद में उसके वंशजों ने मेवाड़ पर शासन किया जो 16वीं शताब्दी तक गुजरात से अजमेर तक फैल चुका था।

अजमेर से खण्डवा जाने वाली ट्रेन के द्वारा रास्ते के बीच स्थित चित्तौरगढ़ जंक्शन से करीब २ मील उत्तर-पूर्व की ओर एक अलग पहाड़ी पर भारत का गौरव राजपूताने का सुप्रसिद्ध चित्तौड़गढ़ का किला बना हुआ है। समुद्र तल से १३३८ फीट ऊँची भूमि पर स्थित ५०० फीट ऊँची एक विशाल (ह्वेल मछ्ली) आकार में, पहाड़ी पर निर्मित्त यह दुर्ग लगभग ३ मील लम्बा और आधे मील तक चौड़ा है। पहाड़ी का घेरा करीब ८ मील का है तथा यह कुल ६०९ एकड़ भूमि पर बसा है।

चित्तौड़गढ़, वह वीरभूमि है जिसने समूचे भारत के सम्मुख शौर्य, देशभक्ति एवम् बलिदान का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। यहाँ के असंख्य राजपूत वीरों ने अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए असिधारारुपी तीर्थ में स्नान किया। वहीं राजपूत वीरांगनाओं ने कई अवसर पर अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने बाल-बच्चों सहित जौहर की अग्नि में प्रवेश कर आदर्श उपस्थित किये। इन स्वाभिमानी देशप्रेमी योद्धाओं से भरी पड़ी यह भूमि पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर रह गयी है। यहाँ का कण-कण हममें देशप्रेम की लहर पैदा करता है। यहाँ की हर एक इमारतें हमें एकता का संकेत देती हैं।

 

सार्विक जानकारी

जनसंख्या
2011 की जनगणना के अनुसार चित्तौड़गढ़ शहर की जनसंख्या
कुल 116,409
पुरुष 60,229
महिला 56,180
क्षेत्रफल 7 वर्ग कि॰मी॰
समुद्रतल से ऊँचाई 408 मी.
मौसम

गर्मियों में अधिकतम 33.8 डिग्री से., न्यूनतम 11.6 डिग्री से.
सर्दियों में अधिकतम 28.3 डिग्री से., न्यूनतम 11.6 डिग्री से.

वेशभूषा गर्मियों में हल्के सूती वस्त्र, सर्दियों में ऊनी वस्त्र
सर्वश्रेष्ठ समय अक्तूबर से मार्च
भाषा मेवाड़ी , राजस्थानी, हिन्दी ;

चित्तौड़गढ़ का दुर्ग[

इस किले ने इतिहास के उतार-चढाव देखे हैं, यह इतिहास की सबसे खूनी लड़ाईयों का गवाह है, इसने तीन महान आख्यान और पराक्रम के कुछ सर्वाधिक वीरोचित कार्य देखे हैं, जो अभी भी स्थानीय गायकों द्वारा गाये जाते हैं।

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बीका खोह[

चत्रंग तालाब के समीप ही बीका खोह नामक बूर्ज है। सन् १५३७ ई॰ में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय लबरी खाँ फिरंगी ने सुरंग बनाकर किले की ४५ हाथ लम्बी दीवार विस्फोट से उड़ा दी थी तथा दुर्ग रक्षा के लिए नियुक्त बून्दी के अर्जुन हाड़ा अपने ५०० वीर सैनिकों सहित वीरगति को प्राप्त हुए।

भाक्सी[

चत्रंग तालाब से थोड़ी दूर उत्तर की तरफ आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर चहारदीवारी से घिरा हुआ एक थोड़ा-सा स्थान है, जिसे बादशाह की भाक्सी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस इमारत में, जिसे महाराणा कुम्भा ने सन् १४३३ में बनवाया था, मालवा के सुल्तान महमूद को गिरफ्तार कर रखा था।

घोड़े दौड़ाने के चौगान[

भाक्सी से आगे कुछ अन्तर पर पश्चिम की तरफ बून्दी, रामपुरा तथा सलूम्बर की हवेलियों के खण्डहर दीख पड़ते हैं। इसी के पूर्व में पुराना चौगान है, जहाँ पहले सेना की कवायद हुआ करती थी। इसी को लोग घोड़े दौड़ाने का चौगान कहते है।

पद्मिनी का महल[

पद्मिनी का महल

चौगान के निकट ही एक झील के किनारे रावल रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के महल बने हुए हैं। एक छोटा महल पानी के बीच में बना है, जो जनाना महल कहलाता है व किनारे के महल मरदाने महल कहलाते हैं। मरदाना महल में एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहाँ से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढ़ियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दर्पण में नजर आता है, परन्तु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। सम्भवतः अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी का प्रतिबिम्ब देखा था।

खातन रानी का महल[

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पद्मिनी महल के तालाब के दक्षिणी किनारे पर एक पुराने महल के खण्डहर हैं, जो खातन रानी के महल कहलाते हैं। महाराणा क्षेत्र सिंह ने अपनी रुपवती उपपत्नी खातन रानी के लिए यह महल बनवाया था। इसी रानी से चाचा तथा मेरा नाम के दो पुत्र थे, जिसने सन् १४३३ में महाराणा मोकल की हत्या कर दी थी।

*गोरा* – बादल की घुमरें[

पद्मिनी महल से दक्षिण-पूर्व में दो गुम्बदाकार इमारतें हैं, जिसे लोग गोरा और बादल के महल के रूप में जानते हैं। गोरा महारानी पद्मिनी का चाचा था तथा बादल चचेरा भाई था। रावल रत्नसिंह को अलाउद्दीन के खेमे से निकालने के बाद युद्ध में पाडन पोल के पास गोरा वीरगति को प्राप्त हो गये और बादल युद्ध में १२ वर्ष की अल्पायु में ही मारा गया था। देखने में ये इमारत इतने पुराने नहीं मालूम पड़ते। इनकी निर्माण शैली भी कुछ अलग है।

राव रणमल की हवेली[

गोरा बादल की गुम्बजों से कुछ ही आगे सड़क के पश्चिम की ओर एक विशाल हवेली के खण्डहर नजर आते हैं। इसको राव रणमल की हवेली कहते हैं। राव रणमल की बहन हंसाबाई से महाराणा लाखा का विवाह हुआ। महाराणा मोकल हँसा बाई से लाखा के पुत्र थे।

कालिका माता का मंदिर

पद्मिनी के महलों के उत्तर में बांई ओर कालिका माता का सुन्दर, ऊँची कुर्सीवाला विशाल महल है। इस मंदिर का निर्माण संभवतः ९ वीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिलवंशीय राजाओं ने करवाया था। मूल रूप से यह मंदिर एक सूर्य मंदिर था। निजमंदिर के द्वार तथा गर्भगृह के बाहरी पार्श्व के ताखों में स्थापित सूर्य की मूर्तियाँ इसका प्रमाण है। बाद में मुसलमानों के समय आक्रमण के दौरान यह मूर्ति तोड़ दी गई और बरसों तक यह मंदिर सूना रहा। उसके बाद इसमें कालिका की मूर्ति स्थापित की गई। मंदिर के स्तम्भों, छतों तथा अन्तःद्वार पर खुदाई का काम दर्शनीय है। महाराणा सज्जनसिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। चूंकि इस मंदिर में मूर्ति प्रतिष्ठा वैशाख शुक्ल अष्टमी को हुई थी, अतः प्रति वर्ष यहाँ एक विशाल मेला लगता है।

सूर्यकुण्ड (सूरज कुण्ड)

कालिका माता के मंदिर के उत्तर-पूर्व में एक विशाल कुण्ड बना है, जिसे सूरजकुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड के बारे में मान्यता यह है कि महाराणा को सूर्य भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था तथा कुण्ड से प्रतिदिन प्रातः सफेद घोड़े पर सवार एक सशस्र योद्धा निकलता था, जो महाराणा को युद्ध में सहायता देता था।

पत्ता तथा जैमल की हवेलियाँ

गौमुख कुण्ड तथा कालिका माता के मंदिर के मध्य जैमल पत्ता के महल हैं, जो अभी भगनावशेष के रूप में अवस्थित हैं। राठौड़ जैमल (जयमल) और सिसोदिया पत्ता चित्तौड़ की अंतिम शाका में अकबर की सेना के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे। महल के पूर्व में एक बड़ा तालाब है, जिसे जैमल-पत्ता का तालाब कहा जाता है। जलाशय के तट पर बौद्धों के ६ स्तूप हैं। इन स्तूपों से यह अनुमान लगाया जाता है कि प्राचीन काल में अवश्य ही यहाँ बौद्धों का कोई मंदिर रहा होगा।

गौमुख कुण्ड[

महासती स्थल के पास ही गौमुख कुण्ड है। यहाँ एक चट्टान के बने गौमुख से प्राकृतिक भूमिगत जल निरन्तर एक झरने के रूप में शिवलिंग पर गिरती रहती है। प्रथम दालान के द्वार के सामने विष्णु की एक विशाल मूर्ति खड़ी है। कुण्ड की धार्मिक महत्ता है। लोग इसे पवित्र तीर्थ के रूप में मानते हैं। कुण्ड के निकट ही उत्तरी किनारे पर महाराणा रायमल के समय का बना एक छोटा सा पार्श्व जैन मंदिर है, जिसकी मूर्ति पर कन्नड़ लिपि में लेख है। यह संभवतः दक्षिण भारत से लाई गई होगी। कहा जाता है कि यहाँ से एक सुरंग कुम्भा के महलों तक जाती है। गौमुख कुण्ड से कुछ दूर दो ताल हाथी कुण्ड तथा खातण बावड़ी है।

समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) महादेव का मंदिर[

गौमुख कुण्ड के उत्तरी छोर पर समिध्देश्वर का भव्य प्राचीन मंदिर है, जिसके भीतरी और बाहरी भाग पर बहुत ही सुन्दर खुदाई का काम है। इसका निर्माण मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज ने ११ वीं शताब्दी में करवाया था। इसे त्रिभुवन नारायण का शिवालय और भोज का मंदिर भी कहा जाता था। इसका उल्लेख वहाँ के शिलालेखों में मिलता है। सन् १४२८ (वि. सं. १४८५) में इसका जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने करवाया था, जिससे लोग इसे मोकलजी का मंदिर भी कहते हैं। मंदिर के निज मंदिर (गर्भगृह) नीचे के भाग में शिवलिंग है तथा पीछे की दीवार में शिव की विशाल आकार की त्रिमूर्ति बनी है। त्रिमूर्ति की भव्यता दर्शनीय है। मंदिर में दो शिलालेख हैं, पहला सन् ११५० ई. का है, जिसके अनुसार गुजरात के सोलंकी राजा कुमारपाल का अजमेर के चौहान राजा आणाजी को परास्त कर चित्तौड़ आना ज्ञात होता है तथा दूसरा शिलालेख जो सन् १४२८ का है महाराणा मोकल से सम्बद्ध है।

महासती (जौहर स्थल)[

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समिध्देश्वर महादेव के मंदिर से महाराणा कुम्भा के कीर्कित्तस्तम्भ के मध्य एक विस्तृत मैदानी हिस्सा है, जो चारों तरफ से दीवार से घिरा हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व तथा उत्तर में दो द्वार बने हैं, जिसे महा सती द्वार कहा जाता है। ये द्वार व कोट रावल समरसिंह ने बनवाया था।

चित्तौड़ पर बहादुर शाह के आक्रमण के समय यही हाड़ी रानी कर्मवती ने सम्मान व सतीत्व की रक्षा हेतु तेरह हजार वीरांगनाओं सहित विश्व प्रसिद्ध जौहर किया था। इस स्थान की खुदाई करने पर मिली राख की कई परतं इस करुण बलिदान की पुष्टि करती है। यहाँ दो बड़ी-बड़ी शिलाओं पर प्रशस्ति खुदवाकर उसके द्वार पर लगाई गई थी, जिसमें से एक अभी भी अस्तित्व में है।

कीर्तिस्तम्भ (विजय स्तम्भ, जय स्तम्भ)

विजय स्तम्भ

महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी को सन् १४४० ई. (वि. सं. १४९७) में प्रथम बार परास्त कर उसकी यादगार में इष्टदेव विष्णु के निमित्त यह कीर्तिस्तम्भ बनवाया था। इसकी प्रतिष्ठा सन् १४४८ ई. (वि॰सं॰ १५०५) में हुई। यह स्तम्भ वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप मंजिल पर झरोखा होने से इसके भीतरी भाग में भी प्रकाश रहता है। इसमें विष्णु के विभिन्न रुपों जैसे जनार्दन, अनन्त आदि, उनके अवतारों तथा ब्रम्हा, शिव, भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं, अर्धनारीश्वर (आधा शरीर पार्वती तथा आधा शिव का), उमामहेश्वर, लक्ष्मीनारायण, ब्रम्हासावित्री, हरिहर (आधा शरीर विष्णु और आधा शिव का), हरिहर पितामह (ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश तीनों एक ही मूर्ति में), ॠतु, आयुध (शस्र), दिक्पाल तथा रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियाँ खुदी हैं। प्रत्येक मूर्ति के ऊपर या नीचे उनका नाम भी खुदा हुआ है। इस प्रकार प्राचीन मूर्तियों के विभिन्न भंगिमाओं का विश्लेषण के लिए यह भवन एक अपूर्व साधन है। कुछ चित्रों में देश की भौगोलिक विचित्रताओं को भी उत्कीर्ण किया गया है। कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरुप सिंह ने मरम्मन करायी।

जटाशंकर महादेव देवालय[

कीर्तिस्तम्भ के उत्तर में जटाशंकर नामक शिवालय है। इस मंदिर के बाहरी हिस्से तथा सभामंडप की छत पर उत्कीर्ण देवताओं तथा अन्य तरह की आकृतियाँ प्रशंसनीय है। अधिकतर मूर्तियाँ अखण्डित एवं सुरक्षित हैं।

कुम्भस्वामी (कुंभश्याम) का मंदिर[

कुंभश्याम का मंदिर

महाराणा कुम्भा ने सन् १४४९ ई. (वि. सं. १५०५) में विष्णु के बराह अवतार का यह भव्य मंदिर बनवाया। इस मंदिर का गर्भ प्रकोष्ठ, मण्डप व स्तम्भों की सुन्दर मूर्तियाँ दर्शनीय हैं। विष्णु के विभिन्न रुपों को दर्शाती हुई मूर्तियाँ, नागर शैली के बने गगनचुम्बी शिखर तथा समकालीन मेवाड़ी जीवन शैली को अंकित करती दृश्यावली, इस मंदिर की विशिष्टतायें हैं। मूल रूप से तो यहाँ, वराहावतार की ही मूर्ति स्थापित थी, लेकिन मुस्लिम आक्रमणों से मुर्ति खण्डित होने पर अब कुम्भास्वामी की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर दी गयी।

मीराँबाई का मंदिर[

मीराँबाई का मंदिर

कुंभ श्याम के मंदिर के प्रांगण में ही एक छोटा मंदिर है, जिसे कृष्ण दीवानी भांतिमति मीराँबाई का मंदिर कहते हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार पहले यह मंदिर ही कुंभ श्याम का मंदिर था, लेकिन बाद में बड़े मंदिर में नई कुंभास्वामी की प्रतिमा स्थापित हो जाने के कारण उसे कुंभश्याम का मंदिर जानने लगे और यह मंदिर मीराँबाई का मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस मंदिर के निज भाग में भांतिमति मीरा व उसके आराध्य मुरलीधर श्रीकृष्ण का सुंदर चित्र है। मंदिर के सामने ही एक छोटी-सी छतरी बनी है। यहाँ मीरा के गुरु स्वामी रैदास के चरणचिंह (पगलिये) अंकित हैं।

सतबीस देवलां[

ग्यारहवीं शताब्दी में बना यह भव्य जैन मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशी के काम के लिए जाना जाता है। इसमें २७ देवरियाँ बनी है। अतः इस मंदिर को सतबीस (७अ२० देवरा) कहा जाता है।

महाराणा कुंभा के महल

तेरहवीं शताब्दी में निर्मित इन महलों का जीर्णोद्धार महाराजा कुंभा द्वारा कराये जाने से इन महलों को महाराणा कुंभा का महल कहा जाता है। प्रवेश द्वार बड़ी पोल तथा त्रिपोलिया कहे जाते हैं। खण्डहरों के रूप में होते हुए भी ये महल राजपूत शैली की उत्कृष्ट स्थापत्य कला दर्शाते हैं। सूरज गोरवड़ा, जनाना महल, कँवलदा महल, दीवात-ए-आम तथा शिव मंदिर इस महल के कुछ उल्लेखनीय हिस्से हैं। मान्यता है कि इन्हीं महलों में एक तहखाना है, जिसमें एक सुरंग के माध्यम से गोमुख तक जाया जा सकता है। महारानी पद्मिनी ने हजारों वीरांगनाओं के साथ इसी रास्ते गौमुख कुंड में स्नान करने के बाद इन्हीं तहखानों में जौहर किया था, लेकिन यहाँ इस तरह के किसी सुरंग का प्रमाण नहीं मिला है।

इसी ऐतिहासिक महल में उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदयसिंह का जन्म हुआ था तथा यहीं स्वामीभक्त पन्नाधाय ने उदयसिंह की रक्षार्थ अपने लाडले पुत्र को बनवीर के हाथों कत्ल हो जाने दिया। मीराँबाई की कृष्ण भक्ति तथा विषपान की घटनाएँ भी इसी महल से संबद्ध है।

फतह प्रकाश

महाराणा फतहसिंह द्वारा निर्मित यह भव्य महल आधुनिक ढ़ंग का है। फतहसिंह के नाम पर ही इन्हें फतह प्रकाश कहा जाता है। महल में गणेश की एक विशाल प्रतिमा, फव्वारा तथा विविध भित्ति चित्र दर्शनीय हैं।

मोती बाजार[

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फतहप्रकाश के पास ही भग्नावस्था में दूकानों की कतारें हैं। बताया जाता है कि शताब्दियों पूर्व यहाँ कीमती पत्थरों की दुकानें हुआ करती थी।

शृंगार चौरी (सिंगार चौरी)[

सन् १४४८ (वि. सं. १५०५) में महाराणा कुंभा के कोषाध्यक्ष बेलाक, जो केल्हा साह का पुत्र था, ने श्रृंगार चौरी का निर्माण करवाया था। यह शान्तिनाथ का मंदिर है तथा जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

यहाँ से प्राप्त शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि भगवान शान्तिनाथ की चौमुखी प्रतिमा की प्रतिष्ठा खगतरगच्छ के आचार्य जिनसेन सूरी ने की थी, परंतु मुगलों के आक्रमण से यह मूर्ति विध्वंस कर दी गई लगती है। अब सिर्फ एक वेदी बची है, जिसे लोग चौरी बतलाते हैं। मंदिरों की बाह्य दीवारों पर देवी-देवताओं व नृत्य मुद्राओं की अनेकों मूर्तियाँ कलाकारों के पत्थर पर उत्कीर्ण कलाकारी का परिचायक है।

श्रृंगार चौरी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि यहीं महाराणा कुंभा की राजकुमारी का विवाह हुआ था, लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचने पर यह सत्य नहीं लगता।

महाराणा साँगा का देवरा

श्रृंगार चौरी के दक्षिण में स्थित इस मंदिर का निर्माण महाराणा साँगा ने भगवान देवनारायण की आराधना हेतु करवाया था। कहा जाता है कि भगवान द्वारा दिये कवच को महाराणा इसी देवरे में पहन कर युद्धों में जाते और विजित होकर लौटते थे।

तुलजा भवानी का मंदिर

इस मंदिर का निर्माण काल सन् १५३६-४० ई. है। इसका निर्माण दासी पुत्र बनवीर ने कराया था। बनवीर भवानी का उपासक था और उसने अपने वजन के बराबर स्वर्ण इत्यादि तुलवा (तुलादान) कर इस मंदिर का निर्माण आरंभ कराया था, इसी कारण इसे तुलजा भवानी का मंदिर कहा जाता है।

बनवीर की दीवार

सन् १५३६ ई. में महाराणा विक्रमादित्य को छल से मारकर दासीपुत्र बनवीर चित्तौड़ का स्वामी बन बैठा। अपनी स्थिति को अधिक सुदृढ़ व सुरक्षित करने हेतु उसने दुर्ग को दो भागों में विभक्त करने के लिए इस दीवार का निर्माण आरंभ कराया था, परंतु महाराणा उदयसिंह द्वारा सन् १५४० ई में चित्तौड़ से खदेड़ दिये जाने पर इसका निर्माण अधूरा ही रह गया।

नवलखा भण्डार[

बनवीर की दीवार के पश्चिमी सिरे पर एक अर्द्ध वृत्ताकार अपूर्ण बुर्ज बना है, जिसे बनवीर ने अपनी सुरक्षा व अस्र-शस्र के भण्डार हेतु बनवाया था। इसकी पेंचिदी बनावट को कोई लख (जान) नहीं सकता था। अतः इसे नवलखा भण्डार कहा जाता था। कुछ लोग यह बताते हैं कि यहाँ नौ लाख रुपयों का खजाना रहता था, जिससे इसका नाम नौ लखा भण्डार पड़ा।

पातालेश्वर महादेव का मंदिर[

पुरातत्व संग्रहालय के पास ही स्थित इस मंदिर का निर्माण सन् १५६५ ई. में हुआ था। मंदिर की स्थापत्य कला एवं उत्कीर्ण आकृतियाँ बड़ी आकर्षण एवं दर्शनीय है।

भामाशाह की हवेली[

अब भग्नावस्था में मौजूद यह इमारत, एक समय मेवाड़ की आनबान के रक्षक महाराणा प्रताप को मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दान करने वाले प्रसिद्ध दानवीर दीवान भामाशाह की याद दिलाने वाली है। कहा जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप का राजकोष खाली हो गया था व मुगलों से युद्ध के लिए बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता थी। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री भामाशाह ने अपना पीढियों से संचित धन महाराणा को भेंट कर दिया। कई इतिहासकारों का मत है कि भामाशाह द्वारा दी गई राशि मालवा को लूट कर लाई गई थी, जिसे भामाशाह ने सुरक्षा की दृष्टि से कहीं गाड़ रखी थी।

आल्हा काबरा की हवेली

भामाशाह की हवेली के पास ही आल्हा काबरा की हवेली है। काबरा गौत्र के माहेश्वरी पहले महाराणा के दीवान थे।

नगरी

चित्तौड़ के किले से ७ मील उत्तर में नगरी नाम का एक प्राचीन स्थान है, जो बेदले के चौहान सरदार की जागीर में पड़ता था। यह भारतवर्ष के प्राचीन नगरों में से एक है, जिसके अवशेष खंडहरों के रूप में दूर-दूर तक फैले हुए हैं, जहाँ कोट से घिरे हुए राजप्रासाद होने का अनुमान किया जाता है। यहाँ से कई जगहों पर बावड़ी, महलों के काट आदि के निर्माणार्थ पत्थर ले जाये गये। महाराणा रायमल की रानी श्रृंगारदेवी की बनवाई हुई घोसड़ी गाँव की बावड़ी भी नगरी से ही पत्थर लाकर बनाई गई है। नगरी का प्राचीन नाम मध्यमिका था। बली गाँव (अजमेर जिला में) से मिले हुए सन् ४४३ ई. पू. (वि. सं. ३८६) के शिलालेख में इस नाम का प्रमाण मिलता है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य मध्यमिका पर युनानियों (मिनैंडर) के आक्रमण का उल्लेख किया है। वहाँ से मिलने वाले शिलालेखों में से तीन वि. सं. पूर्व की तीसरी शताब्दी के आसपास की लिपि में है। इनके लेखों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि वि. सं. पूर्व की तीसरी शताब्दी के आसपास विष्णु की पूजा होती थी तथा उनके मंदिर भी बनते थे। एक शिलालेख सर्वतात नामक किसी राजा द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख करता है। एक अन्य शिलालेख वाजपेय यज्ञ के सम्पादन की चर्चा करता है।

नगरी से थोड़ी ही दूरी पर हाथियों का बाड़ा नाम का एक विस्तृत स्थान है, जिसकी चहारदीवारी बहुत लंबी व चौड़ी है। यह तीन-तीन मोटे पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर बनाई गई है। उस समय ऐसे विशाल पत्थरों को इस प्रकार व्यवस्थित करना एक कठिन कार्य जान पड़ता है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बड़े-बड़े पत्थरों से बनी हुई एक चतुरस्र मीनार है, जिसे लोग ऊमदीवट कहते हैं। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि इस मीनार में इस्तेमाल किये गये पत्थर हाथियों का बाड़ा से ही तोड़कर लाये गये थे। इसके संबंध में यह कहा जाता है कि जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई किया तब इस मीनार में रौशनी की जाती थी। नगरी के निकट तीन स्तूपों के चिंह भी मिलते हैं।

वर्तमान में गाँव के भीतर माताजी के खुले स्थान में प्रतिमा के सामने एक सिंह की प्राचीन मूर्ति जमीन में कुछ गड़ी हुई है। पास में ही चार बैलों की मूर्तियोंवाला एक चौखूंटा बड़ा पत्थर रखा हुआ है। ये दोनों टुकड़े प्राचीन विशाल स्तम्भों का ऊपरी हिस्सा हो सकता है।

 

राजस्थान के प्रमुख जौहर, साका (Jauhar, Saka in Rajasthan) : राजस्थान के इतिहास में “जौहर तथा साकों” का एक विशिष्ठ स्थान है। यहाँ पर युद्ध में वीर सैनिकों एवं उनकी स्त्रियों ने शत्रु की पराधीनता को स्वीकार करने की बजाए सहर्ष मृत्यु का चुनते हुए जान न्यौछावर की है। जौहर व साका उस स्थिति में किए गए जब शत्रु को घेरा डाले बहुत अधिक दिन हो गए या युद्ध में हार निश्चय हो या शत्रु ने युद्ध में विजय प्राप्त कर ली हो। जौहर की घटनाएँ मुख्यत: राजस्थान में मुगल शासकों के आक्रमण एवं युद्ध में हराने के पश्चात उनके द्वारा लूट-पाट एवं स्त्रियों के शीलभंग के कारण होती थी।
जौहर किसे कहते हैं: युद्ध के बाद महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने तथा अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा करके जलती चिताओं में कूद पड़ती थी। वीरांगना महिलाओं का यह आत्म बलिदान का कृत्य जौहर के नाम इतिहास में जाना जाता है। जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था।
साका किसे कहते हैं: युद्ध के दौरान जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी एवं महिलाओं को जौहर की ज्वाला में कूदने का निश्चय करते देख पुरूष केशरिया वस्त्र धारण कर मरने मारने के निश्चय के साथ युद्ध में दुश्मन सेना पर टूट पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करेंगे। इसे साका कहा जाता है।
 

राजस्थान के प्रमुख जौहर, साका (Jauhar, Saka in Rajasthan)

  • चित्तौड़गढ़ के 3 साके
    1. प्रथम साका: यह सन् 1303 में राणा रतन सिंह के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी पद्मनी सहित स्त्रियों ने जौहर किया था। अलाउद्दीन की महत्वाकांक्षा और राणा रतनसिंह की अनिंद्य सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने की लालसा हमले का कारण बनी। चित्तौड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 हजार रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था।
    2. दूसरा साका:  यह 1534 ई. में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें राजमाता हाड़ी (कर्णावती) और दुर्ग की सैकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान कर अपने प्राणों की आहुति दी।
    3. तीसरा साका: यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ था जिसमें जयमल और पत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था। यह साका जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया के पराक्रम और बलिदान के प्रसिद्ध है।
  • जैसलमेर के ढाई साके:
    1. प्रथम साका:  यह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें भाटी शासक रावल मूलराज, कुंवर रतनसी सहित अगणित योद्धाओं ने असिधारा तीर्थ में स्नान किया और ललनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया।
    2. दूसरा साका:  दूसरा साका फिरोज शाह तुगलक के शासन के शुरुआती वर्षों में हुआ। रावल, दूदा, त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों और योद्धाओं ने शत्रु सेना से लड़ते हुए वीरगति पाई और दुर्गस्थ वीरांगनाओं ने जौहर किया।
    3. तृतीय साका (आधा साका): यह घटना 1550 ईस्वी में लूणकरण के शासन काल में कंधार के शासक अमीर अली के आक्रमण के समय हुआ था। तीसरा साका अद्र्ध साका कहलाता है। कारण इसमें वीरों ने केसरिया तो किया लेकिन जौहर नहीं हुआ। अत: इसे आधा साका ही माना जाता हैं। इसलिए जैसलमेर के ढाई साके गिने जाते हैं।
  • गागरोण (जालौर) के 2 साके:
    1. प्रथम साका: 1423 ईस्वी में अचलदास खींची के शासन काल में माण्डू के सुल्तान होशंगशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानियों व स्त्रियों ने जौहर किया।
    2. दूसरा साका: गागरोण का दूसरा साका 1444 ईस्वी में हुआ। जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने विशाल सेना के साथ इस दुर्ग पर आक्रमण किया एवं स्त्रियों ने जौहर किया।
  • रणथंभौर का 1 साका: यह सन् 1301 में अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक आक्रमण के समय हुआ था। इसमें हम्मीर देव चौहान विश्वासघात के परिणामस्वरूप वीरगति को प्राप्त हुआ तथा उसकी पत्नी रंगादेवी ने जौहर किया था। इसे राजस्थान का प्रथम साका माना जाता है।
  • जालौर का 1 साका: कान्हड़देव के शासनकाल में 1311-12 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था एवं स्त्रियों ने जौहर किया।

श्री सांवलिया सेठ मंदिर, मण्डफिया

  • श्री सांवलिया सेठ मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित एक प्रमुख मंदिर है जो चित्तौड़गढ़ से 40 किमी दूर मण्डफिया ग्राम में स्थित है।
  • श्री सांवलिया सेठ मंदिर में भगवान कृष्ण की काले रंग की प्रतिमा है, इन्हें साँवरिया सेठ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
  • किवदंतियों के अनुसार सन 1840 मे भोलराम गुर्जर नाम के ग्वाले को एक सपना आया की भादसोड़ा – बागूंड के छापर मे 3 मूर्तिया ज़मीन मे दबी हुई है. जब उस जगह पर खुदाई की गयी तो भोलराम का सपना सही निकला और वहा से 3 एक जैसे मूर्तिया निकली. सभी मूर्तिया बहुत ही मनोहारी थी.
  • इन मूर्तियो मे साँवले रूप मे श्री कृष्ण भगवान बाँसुरी बजा रहे है. इनमे से एक मूर्ति मण्डपिया ग्राम ले जायी गयी और वहा पर मंदिर बनाया गया । दूसरी मूर्ति भादसोड़ा ग्राम ले जायी गयी और वहा पर भी मंदिर बनाया गया । तीसरी मूर्ति को यही प्राकट्य स्थल पर ही मंदिर बना कर स्थापित की गयी । कालांतर में तीनो मंदिरों की ख्याति भी दूर-दूर तक फेली। आज भी दूर-दूर से हजारों यात्री प्रति वर्ष दर्शन करने आते हैं।

Begu Kisan Andolan (बेगूँ किसान आंदोलन) – Some facts to remember: 

* Begu or Begun farmer’s movement was one of the farmer’s movements of Rajasthan during British Raj in India. Begun is a village in Chittorgarh district.
* It was a movement of peasants against high taxes by then Mewar government. This movement was started from Menal in 1921 where farmers gathered and decided for struggle against government for demad of implementing taxation system fair and reasonable.
* Vijay Singh Pathik gave leadership of this movement to Ramnarayan Chaudhary. Later leadership of this movement was handed over to Vijay Singh Pathik…So Pathik and Choudhary both headed this movement
* The farmers decided not to pay Lags and Begars(Taxes and labour work) as well as to boycott courts and govt. offices. In reaction govt. launched a operation of crushing movement against people. After 2 years a ageement was made between Rajasthan Sewa Sangh(a farmer’s union) and Thakur Anup Singh but it was opposed by government naming it ‘Bolshevik agreement’ and a government appointed a government employee in the place of Thikanedar under its ‘Munsarmat policy’.
* Government sent Trench commission for the inquiry of demands of Bengun movement. Mr. Trench, head of the commission justified almost all taxes except small taxes. Later on 13 July 1923,Mr. Trench opened fire after lathicharge on a non-violent assembly of farmers. Rupaji and Kripaji, two farmers were dead. These are remembered as martyrs of Begun in history of Rajasthan.
Jo Dridh rakhe dharm ne, Tahi rakhe kartar (जो दृढ राखै धर्म ने, तिहीं राखै करतार) :
जो दृढ राखै धर्म को, तिहीं राखै करतार
ये शब्द मेवाड़ के बारे में कहे जाते हैं एवं  दक्षिण राजस्थान के प्राचीन “मेवाड़ राज्य” के राज्य चिन्ह में अंकित शब्द हैं जो मवाड़ की स्वतंत्रता प्रियता एवं धर्म पर दृढ रहने को स्वयंमेव ही स्पष्ट करता है । मेवाड़ के महाराणाओं ने मुग़ल बादशाहों के पास जाकर उनका विशेष कृपापात्र बनाना उचित नहीं समझा व अपना गौरव बनाये रखा |
It is believed that the slogan Jo dridh rakhe dharm ne, tahi rakhe kartar was spoken by Abdur Rahim Khankhana, who is also known as “Rahim das” in Hindi poetry.
About Maharana Pratap: Maharana Pratap (May 9, 1540-January 29, 1597) was a ruler of Mewar, a state in north-western India. He belonged to the Sisodia clan of Suryavanshi Rajputs. The epitome of fiery Rajput pride and self-respect, Pratap has for centuries exemplified the qualities that Rajputs aspire to. Pratap, eldest of 25 brothers and 20 sisters, was born at Kumbhalgarh on Sunday the May 9, 1540 to Maharana Udai Singh II and Maharani Javanta Bai Songara (Chauhan). Polygamy and maximum children were social necessity of the period owing to higher female population and high battle casualties. Rana Pratap had 17 sons and five daughters. The male-line descendants of Udai Singh II bear the patronymic “Ranawat”. Maharana Pratap was Born in Pali-Marwar. His birth place known as Juni Kacheri.
Chittorgarh Fort – Some Fact & GK QUIZ:
* Chittorgarh Fort is the largest fort in India and Rajasthan.
* Chittorgarh Fort was build by the Mauryans during the 7th century AD and hence derives its name after the Mauryan ruler, Chitrangada Mori, as inscribed on coins of the period.
* It is situated on the left bank of the Berach river (a tributary of the Banas River)
* The fort was sacked three times between the 15th and 16th centuries, Following these defeats, Jauhar was committed thrice by more than 13,000 ladies and children of the Rajput heroes who laid their lives in battles at Chittorgarh Fort, first led by Rani Padmini wife of Rana Rattan Singh who was killed in the battle in 1303, and later by Rani Karnavati in 1537 AD.
* Vijay Stambha (Tower of Victory) or Jaya Stambha, called the symbol of Chittor and a particularly bold expression of triumph, was erected by Rana Kumbha between 1458 and 1468 to commemorate his victory over Mahmud Shah I Khalji, the Sultan of Malwa, in 1440.

Chittorgarh: History, Geography, Places

Location, Area & Administration of Chittorgarh:

Chittorgarh is located in the southern part of the state of Rajasthan at an altitude of 394 meters above sea level with Latitude of  24.88°N  and longitude of 74.63°E. The district has two parts, the smaller portion or Bhainsrorgarh in the east is separated by the state of Madhya Pradesh. Chittorgarh District shares its border with ,Bhilwara District to the North ,Pratapgarh & Neemuch (M.P) District to the South ,Udaipur District to the west  and shares border with Madhya Pradesh State to the East.

Chittorgarh has an area of 10,856 square km which is divided into 10 tehsils namely: Chittorgarh, Rashmi, Gangrar, Begun, Kapasan, Rawatbhata, Dungla, bhadesar, Bari Sadri and Nimbahera.

Imagesource:MapsofIndia
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History of Chittorgarh:

The antiquity of chittorgarh is difficult to trace, but it’s believed that Bhim the legendary figure of the Mahabharata, visited this place to learn the secrets of immortality and became the disciple of a sage, but his impatience to perform all the rites deprived him of his goal, and out of sheer anger, he stamped on the ground creating a water reservoir, this reservoir is called as BhimLat.

THe region was originally called Medhpaat and Lord Shiva (Ekling Nath) is called Medhpateshwar (Lord of Medhpaat). Over time, the name Medhpath became Mewar.

Later on, it came under Mauryas or Mori Rajputs. Maan Mori, 7th in line ruled the kingdom till 734 AD when he was killed by Bappa Rawal of the Guhilot clan. Born as Kalbhoj, Bappa Rawal was the founder of a dynasty which later comes to rule Mewar.

Rulers of Mewar: (Chittorgarh as Capital)

  • Khumar (753 – 773 )
  • Mattat (773 – 793 )
  • Bhratrabhat (773 – 813 )
  • Sinha (813 – 828)
  • Khuman II (828 – 853)
    • Repelled up to 24 Muslim attacks.
    • Ruled a Golden Age in Mewar.
  • Mahayak (853 – 878)
  • Khuman III (878 – 942)
  • Bhratrabhat II (942 – 943)
  • Allat (943 – 953)
    • Possibly near start of his reign, Allat is driven from Chittor by the Paramara king of Malwa, Munja Raja, who then rules Chittor and is succeeded by his nephew, Raja Bhoj. Allat establishes a new capital at ancient Ahar.
  • (953 – 971)
    • The death of Allat leaves a gap in the succession, and there is no Guhilot leader at all for a total of eight years while the Paramaras attack Ahar. The Paramara king, Vakpati Raj of Malwa, rules Chittor. It takes until 971 for a new Guhilot king to reign.
  • Naravan / Narvahan (971 – 973)
  • Shalivahan (973 – 977)
  • Shaktikumar (977 – 993 )
  • Amba Prasad (993 – 1007)
    • Fought against Mahmud Ghazni (Yamin-ud-Dawlah Mahmud).
  • Suchivarma (1007 – 1021)
  • Narvarma (1021 – 1035)
  • Kirtivarma (1035 – 1051)
  • Yograj (1051 – 1068)
  • Bairat / Vairat(1068 – 1088)
  • Hanspal (1088 – 1103)
  • Vairi Singh (1103 – 1107)
  • Vijay Singh (1107 – 1127)
  • Ari Singh I (1127 – 1138)
    • Chittor is again captured by Malwa.
  • Chaur Singh (1138 – 1148)
    • The Western Chalukyas attack the Paramaras who hold Chittor.
  • Vikram Singh / Vikramaditya I (1148 – 1158)
  • Karan Singh (1158 – 1168)
    • The royal family divides, possibly near the end of Karan Singh’s reign. His son Rahap establishes the Sisodia branch of the family while another son, Mahap, establishes the Dungarpur kingdom.
  • Kshem Singh (1168 – 1172)
  • Samant Singh (1172 – 1179)
    • Samant Singh occupies Bagar (in the Dungarpur area) during his reign. After seven years on the throne he is slain by Kirtipal Solanki of Nadol in battle at Ghaggar (Punjab).
  • Kumar Singh(1179 – 1191)
    • Possibly relocated capital to Nagda at end of his reign.
  • Mathan Singh (1191 – 1211)
    • 1191 – 1192 – Mathan Singh fights in the Battles of Tarain, in which the Chauhan ruler, Prithviraj III, and the Rajput confederation which includes Mewar (the Hindu League) are defeated by the Ghurid Sultan Mohammed Ghuri.
    • 1207 – Chittor is taken and ruled by the Western Chalukyas just as they are facing their own terminal decline.
  • Padam Singh (1211 – 1213)
  • Jait Singh / Jaitra Singh (1213 – 1253)
    • During his reign, Jait Singh defeats the Malwa Rajputs who rule Chittor, reinstating its fort as the capital of Mewar. This probably occurs shortly after Sultan Iltutmish of Delhi has destroyed Nagda.
    • 1234 – Sultan Iltutmish of Delhi is defeated by Mewar when he invades the region.
  • 1253 – 1261
    • There is an apparent interregnum. No known ruler of Mewar exists during this period, although the circumstances behind the gap are unknown. The relation of the next known ruler of Mewar to his predecessor is also unknown.
  • Tej Singh (1261 – 1267)
  • 1267 – 1273
    • There is a second apparent interregnum. No known ruler of Mewar exists during this period, and the fate of Tej Singh is unknown, as are the circumstances behind the gap are unknown. It takes six years for Tej Singh’s son to ascend the throne.
  • Samar Singh (1273 – 1302)
    • Samar Singh builds wall around Mahasati in Chittor. His son, Kumbh Karan, migrates to Nepal (where his descendants become the Nepalese royal family).
  • Ratan Singh (1302 – 1303)
    • Last Guhilot king to rule.
    • 1303 – 1st Jauhar of Chittor
    • Ala ud din Khilji, Sultan of Delhi, rallied his forces against Mewar, in 1303 AD. The Chittorgarh fort was till then considered impregnable and grand, atop a natural hill. But his immediate reason for invading the fort was his obsessive desire to capture Rani Padmini, the unrivalled beautiful queen of Rana Ratan Singh. The Rana, out of politeness, allowed the Khilji to view Padmini through a set of mirrors. But this viewing of Padmini further fired Khilji’s desire to possess her. After the viewing, as a gesture of courtesy, when the Rana accompanied the Sultan to the outer gate, he was treacherously captured. Khilji conveyed to the queen that the Rana would be released only if she agreed to join his harem. But the queen had other plans. She agreed to go to his camp if permitted to go in a Royal style with an entourage, in strict secrecy. Instead of her going, she sent 700 well armed soldiers disguised in litters and they rescued the Rana and took him to the fort. But Khilji chased them to the fort where a fierce battle ensued at the outer gate of the fort in which the Rajput soldiers were overpowered and the Rana was killed. Khilji won the battle on August 26, 1303. Soon thereafter, instead of surrendering to the Sultan, the royal Rajput ladies led by Rani Padmini preferred to die through the Rajput’s ultimate tragic rite of Jauhar (self immolation on a pyre).
    • Administration of the captured state is handed to the ruler of the neighbouring state of Jalore, Maldeo.
  • Rana Hammir (1326-64)
    • Progenitor (Shuruwat karne wala) of the Sisodia clan
    • Built the Annapoorna Mata temple, located in the Chittorgarh Fort
    • Alauddin Khilji defeated Rana Ratan Singh (Padmini ne Jaauhar kiya) and transferred administration of new territories ( including chitter) to Maldeo, ruler of Jalore.
    • Maldeo , married his widowed daughter Songari with Rana Hammir.
    • Hammir organized overthrow of Maldeo and established Mewar again in 1326.
  • Khaitsi or Khetra Singh (1364-82)
    • Son of Rana Hammir
    • Conquered back, Mandalgarh, Ajmer, Mandsore & area of Chappan.
    • Obtained victory over Sultan of Delhi at Bakrole.
    • The Kumbalgarh inscription says that “he captured Zafar Khan.- Sultan of Gujarat.
  • Rana Lakha (1382- 1421)
    • Defeated the imperial army of Delhi at Badnor
    • Had two Sons – Elder – Rana Choonda – who took oath not to claim throne of mewar – in the exchange of his father’s marriage to Rani Hansa Bai.
    • In compensation – his symbol Lance (Bhala) was superadded to autograph of prince in all grants to vassals. Hence, Lance of Saloombra still precedes monogram of Rana.
    • In line with promise, Rana Mokul (Son from Hansa Bai) succeeded throne.
  • Rana Mokul/Mokal Singh (1421-1433)
    • After Rana Lakha, as Rana Mokul was minor, Rana Choonda started taking care of administration.
    • But Rani Hansa bai, did not like and asked Rana choonda to leave. He left.
    • Rani seek help of father Ranmal of Marwar but later understood intentions of Ranmal.
    • Rani called back Choonda, who came in and rescued Mokul Singh.
    • Had 3 sons = Rana Kumbha + 2 & daughter Lal Bae.
  • Rana Kumbha (1433-68)
    • In 1433, defeated Sultan of Malwa, Mahmud Khilji, in Battle of Mandalgarh and Banas.
    • Erected Vijay Stambh (victory tower) – 37 meter/9 floors.
    • Erected 32 Forts in defense of Mewar. Including highest fort in Rajasthan (MRL 1075m) – Kumbhalgarh
    • Additionally he also costructed, the Ranakpur Trailokya-dipaka Jain temple with its adornments, the Kumbhasvami and Adivarsha temples of Chittor and the Shantinatha Jain temple.
    • Credited with writing the Samgita-raja, the Rasika-priya commentary on the Gitagovinda, the Sudaprabandha, and the Kamaraja-ratisara.
    • Sangita-ratnakara and Sangita-krama-dipaka (two books on music by Rana Kumbha.
    • During his reign, scholar Atri and his son Mahesa wrote the prashasti (edict) of the Chittor Kirti-stambha and Kahana Vyasa wrote the Ekalinga-mahamatya.
    • Rana kumbha successfully defended Mewar and expanded his territory at a time when he was surrounded by enemies like Mahmud Khilji of Malwa, Qutbuddin of Gujrat, Shams Khan of Nagaur and Rao Jodha of Marwar.
  • Rana Udai Singh I ( 1468-73)
    • A In a patricide, Rana Kumbha was killed by his son Udaysimha (Udai Singh I) or Ooda Singh
    • Defeated by his brother – Raemul in battles of Jawar, Darimpur and Pangarh
  • Rana Raemul (1473- 1508)
    • Other Son – Raemul finally succeeded Khumbha
    • By marrying Sringardevi (daughter of Rao Jodha), Raimal ended the conflict with the Rathores.
  • Rana Sanga ( Sangram Singh ) (1508-1528)
    • Battle of Gagron: defeated Sultan of Malwa
    • Battles of Idgar: 3 battles: fought between Bhar Mal & Rae Mal two princes of Idar, Rana Sanga supported Rae mal.
    • Battle of Khatoli & Dholpur: Sanga defeated Ibrahim Lodhi
    • Gujarat Invasion: laid seize at Ahmadnagar (Himmatnagar) – defeated Sultan.
    • Battle of Khanwa: was defeated by Babur
  • Ratan Singh II (1528–1531)
  • Vikramaditya Singh (1531–1536)
    • During his reign, Sultan of Gujarat Bahadur Shah sacked Chittor in 1534, Udai Singh was sent to Bundi for safety.
    • Rana Sanga’s wife Karnavati –send Rakhi to Humayun.
    • But Humayun late – 2nd Jauhar of Chittor
  • Vanvir Singh (1536–1540)
    • Vanvir killed Vikramaditya Singh, and was about to kill Udai Singh II, when Panna Dhai, rescued him with sacrifice of her won child.
  • Udai Singh II (1540–1572)
    • 1540, he was crowned in Kumbhalgarh by the nobles of Mewar.
    • Maharana Pratap born in same year (9th May-1540)
    • In 1562, he gave refuge to Baz Bahadur of Malwa. Using this as a pretext, Akbar attacked Mewar in October 1563.
    • Udai Singh retired to Gogunda.
    • Rao Jaimal & Patta – fought with Valor – even Akbar impressed – statute erected at Fatehpur Sikri
    • Jauhar- 3rd Jauhar of chittor (1568)
    • Founded city of Udaipur. This became the capital of Mewar from here on.

Historical Places of Chittorgarh:

Chittorgarh Fort:chittorgarh_fort

Chittorgarh Fort is the largest fort in Asia. The Fort of Chittorgarh is strategically located on the top of a high hilly outcrop of the Aravallis about 180 mabove the plains of the valley drained by the Berach River.  The fort also contains Gaumukh Reservoir, which is a deep tank  fed by a spring. The spring emerges from a rock formation resembling a Gaumukh or ‘cow’s mouth’. The tank is considered sacred by the locals.

Nagri:

One of the most important townships of the Mauryan era in Rajasthan, situated on the banks of river Bairach.  It  was formerly known as Madhyamika, which flourished from the Maurya to Gupta era. The excavations  overhere have  unearthed many interesting facts and have showed signs of strong Hindu and Buddhist influence.

Barolo:vijay_stambhchittorgarh_fort

The ruins of the famous temples of babaroli, near Rawatbhata. This town is worth visiting, because of the  group of  ancient temples situated here.

Vijaya Stambh:

Vijaya Stambh is a huge nine storey tower which was built by Maharana Kumbha to commemorate his victory over the Muslim rulers of Malwa and Gujarat in 1440, the tower signifies the victorious spirit of the Rajput Kingdom after securing a victory over the intruder Mohammed Khilji.The towers stands at a height of 37 meters and compromises of 9 floors offer a great view of the city of Chittorgarh and the Chittorgarh Fort.

Kirti Stambh:Kirti Stambh

Kirti Stambh or the tower of fame is part of the two popular stumbhs or pillars inside the Chittorgarh Palace. Kriti Stambh is a 12th-century tower situated at Chittorgarh fort in Rajasthan, india. Dedicated to the first Jain teethankar Adinath, the stambh is a 22 meter high seven storied tower having a sculpture of Adinath in the second floor.Kirti Stambh is older than another tower in the same fort, known as the Vijaya Stambh(Tower of Victory). The topmost floor of the pillar offers a panoramic view of the whole Chittorgarh city and attracts a large number of travelers, historians and photography enthusiasts.

Padmini’s Palace: Padmini Mahal

The Padmini palace is Amazing place to visit in Chittorgarh. It was the residence of Rani Padmini who was known for her gorgeous beauty. The palace is a popular tourist attraction because of its rich architecture and association with the Rajput heritage and history.There is a lotus pond near this palace.Ala-ud-din saw the reflection of Queen Padmini in this pool. He was so captivated and entranced by her that he fought a furious battle with Maharana Ratan Singh (husband of Maharani Padmini). This battle changed the history of Chittorgarh.

Rana Kumbha Palace: chittorgarh-rana_kumbha_palace-05-20131014

Rana Kumbha palace is 15th century palace where Rana Kumbha lived and spent his royal life. This historic monument is very popular among tourists due to its charming and artistic architecture.The founder of Udaipur, Maharana Udai Singh was born in this same palace. Rana Kumbha palace have the cellar where brave Rani Padmini performed an act of jauhar along with other women during an attack of Khilji.

Meerabai Templetemple_of_mirabai_in_the_fort

Meerabai, an ardent devotee of Lord Krishna’s, worshipped him at this temple. The structure is designed in the classic North Indian style of temples. It rises from a raised plinth and its conical roof can be seen from far. The temple houses a beautiful shrine surrounded by an open porch with four small pavilions in four corners.

Bhainsrorgarh Fort

bhainsBhainsrorgarh is an impregnable fort, inhabited from at least the 2nd century BC. It is dramatically positioned between two rivers, the Chambal and Bamani. It had passed through the hands of several clans before becoming the seat of a premier noble of Mewar, the large region around Udaipur and Princely State of the Sisodia clan. It contains five tanks, temples to Devi Bhim Chauri,Shiva, and Ganesh. The present fort is around 260 years old and was built in the 1740s.

Fairs & Festivals of Chittorgarh:

Maharana Pratap Jayantimaharana

Maharana was born on May 9th 1540 in Kumbhalgarh in Rajsamand district of Rajasthan to Maharana Udai Singh II and Rani Jeevant Kanwar. Maharana Pratap is respected and revered as an epitome of valor, heroism, pride, patriotism and the spirit of independence.His birth anniversary (Maharana Pratap Jayanti) is celebrated as full fledged festival every year on 3rd day of Jyestha Shukla phase.

Jauhar Mela:

The fort and the city of Chittorgarh host the biggest Rajput festival called the “Jauhar Mela”. It takes place annually to commemorate Rani padmini’s Jauhar, which is most famous. This festival is held primarily to commemorate the bravery of Rajput ancestors and all three jauhars which happened at Chittorgarh Fort. A huge number of Rajputs,which include the descendants of most of the princely families, hold a procession to celebrate the Jauhar.

Meera Mahotsavmeera

Meera Bai (1498 – 1547) was a devout follower of Lord Krishna. Meera Bai was Rajput princess born in about 1498 in Metra, Rajasthan. Her father, Ratan Singh, was the youngest son of Rao Duda, ruler of Merta, and son of Rao Duda ruler and founder of Jodhpur. Ratan Singh belonged to the Rathore clan. She was married to Bhoj Raj, ruler of Chittor.

Meera Smrithi Sansathan (Meera Memorial Trust) along with the district government, organise Meera Mahotsav every year on Sharad Purnima day (On Mirabai’s birth anniversary) for 3 days. The celebrations also bhajan singing, puja’s, discussions, dances, fire works etc.

Teej

Teej is one of the major festivals in Chittorgarh and is also called as the festival of swings. It marks the advent of the monsoon month of Shravan (August). Swings are hung from trees and decorated with flowers. Young girls and women dressed in green clothes sing songs in celebration of the advent of the monsoon. This festival is dedicated to the Goddess Parvati,commemorating her union with Lord Shiva.

Gangaur

The Gangaur Festival is the colourful and most important festival of Rajasthan celebrated throughout the State with great fervour and devotion by womenfolk to worship Goddess Gauri, the consort of Lord Shiva during July-Aug. Gan is a synonym for Shiva and Gaur which stands for Gauri or Parvati who symbolises saubhagya (marital bliss). Gauri is the embodiment of perfection and conjugal love which is why the unmarried women worship her for being blessed with good husbands, while married women do so for the welfare, health and long life of their spouses and a happy married life.

Rang Teras – The Tribal Fair

Rang Teras is a popular tribal fest of Mewar celebrated on the 13th moon night of the month of Chaitra.  Since 15th century, the festivals is being organized where Tribals rejoice the harvest of wheat. Farmers pay their honor to Mother Earth for providing them food for next year.As a part of Celebrations , young men in village perform their valiant skills while dancing.It is also celebrated is Sri Krishna Temples all around North India and ISKCON Temples.

Geography of Chittorgarh:

Topographically the district is undulating with scattered hills of the Aravalli ranges. The western southern and northern parts of the district are somewhat plain. A series of hills run North­South forming parallel valleys to the east of Chittorgarh. Bhainsrorgarh area is practically hilly. The district comprises rocks of Bhilwara Supergroup, Vindhyan Supergroup and Deccan Traps.

The main rivers flowing through this district are Chambal, Banas, Berach, Gambhiri, Jakham with smaller rivers like Wagon, Gungali etc. The annual average rainfall is 90cms.

The district of Chittorgarh is good in forest resources as the percentage of total area under forest including hills is reported to be 2407 square kilometers which is 22.17% of total geographical area of the district.The forest coverage is above the state average of above 9% under forest. The major species available in the forest area is salar,teak wood, bamboos, katha etc.

Natural Places of Chittorgarh:

Bassi Wildlife Sanctuary:

A sanctuary near Bassi, covering an area of 50 Sq km with panthers, wild boars, antelopes, mongoose and migratory birds. The Sanctuary is situated 5 kms from the Fort on the western fringes of Vindhyachal Ranges with series of tableland, gentle slopes and vast streches of large lakes, water channels of which penetrate into the forest. Among the wild animals baghera sar, langur, lakkar bagha, beddia, lomaari, lider etc. with snakes both poisonous and non-poisonous also being found.

Natural Resources in Chittorgarh

The district can be identified as a limestone district of Rajasthan, since the district is endowed with large deposits of cement grade limestone as well as splittable lime stone and sand stone which is used for flooring purposes. Besides these, small deposits of china clay, red ochre, blockable marble etc. are also found in the district.

Population:

According to the 2011 census, Chittorgarh district has a population of 15,44,392 of which 50.76 percent are males & 49.24 percent are females.  Its population growth rate over the decade 2001-2011 was 16.09%.  Chittaurgarh has a sex ratio of 970 females for every 1000 males, and a literacy rate of 62.51%. The district has a population density of 193 inhabitants per square kilometer.

 

Chittorgarh District GK in Hindi चित्तौड़गढ़ जिला Rajasthan GK in Hindi

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Jhalawar District GK in Hindi झालावाड़ जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

झालावाड राजस्थान राज्य के दक्षिण-पूर्व में स्थित झालावाड़ जिला का मुख्यालय है। यह झालावाड के हाडौती क्षेत्र का हिस्सा है। झालावाड के अलावा कोटा, बारां एवं बूंदी हाडौती क्षेत्र में आते हैं।

राजस्थान के झालावाड़ ने पर्यटन के लिहाज से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। राजस्थान की कला और संस्कृति को संजोए यह शहर अपने खूबसूरत सरोवरों, किला और मंदिरों के लिए जाना जाता है। झालावाड़ की नदियां और सरोवर इस क्षेत्र की दृश्यावली को भव्यता प्रदान करते हैं। यहां अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल भी हैं, जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचने में कामयाब होते हैं।

झालावाड़ मालवा के पठार के एक छोर पर बसा जनपद है। इस जनपद के अंदर झालावाड़ और झालरापाटन नामक दो पर्यटन स्थल है। इन दोनों शहरों की स्थापना 18वीं शताब्दी के अन्त में झाला राजपूतों द्वारा की गई थी। इसलिए इन्हें ‘जुड़वा शहर’ भी कहा जाता है। इन दोनों शहरों के बीच 7 किमी की दूरी है। यह दोनों शहर झाला वंश के राजाओं की समृद्ध रियासत का हिस्सा था।

राजनीति

झालावाड़ जिले में 4 विधानसभा क्षेत्र हैं

  1. मनोहरथाना
  2. [[khanpur]
  3. डग
  4. झालरापाटन

झालावाड लोकसभा सीट से दुष्यंत सिंह जिले का प्रतिनिधित्व संसद में करते हैं। झालरापाटन सीट से राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं।

प्रमुख आकर्षण

गढ़ महल

गढमहल झाला वंश के राजाओं का भव्य महल था। शहर के मध्य स्थित इस महल के तीन कलात्मक द्वार हैं। महल का अग्रभाग चार मंजिला है, जिसमें मेहराबों, झरोखों और गुम्बदों का आनुपातिक विन्यास देखने लायक है।

परिसर के नक्कारखाने के निकट स्थित पुरातात्विक संग्रहालय भी देखने योग्य है। महल का निर्माण 1838 ई. में राजा राणा मदन सिंह ने शुरू करवाया था जिसे बाद में राजा पृथ्वीसिंह ने पूरा करवाया। 1921 में राजा भवानी सिंह ने महल के पिछले भाग में एक नाट्यशाला का निर्माण कराया। इसके निर्माण में यूरोपियन ओपेरा शैली का खास ध्यान रखा गया है।

कृष्ण सागर

शहर से करीब 6 किलोमीटर दूर कृष्ण सागर नामक विशाल सरोवर है। यह सरोवर एकांतप्रिय लोगों को बहुत पसंद आता है। सरोवर के किनारे पर लकड़ियों से निर्मित एक इमारत है। इस इमारत को रैन बसेरा कहा जाता है। यह इमारत महाराजा राजेन्द्र सिंह ने ग्रीष्मकालीन आवास के लिए बनवाई थी। पक्षियों में रूचि रखने वालों को यह स्थान बहुत भाता है। वर्तमान में यह जल गया है

गागरोन किला

काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित गागरोन फोर्ट झालावाड़ की एक ऐतिहासिक धरोहर है। यह शहर से उत्तर में 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। किले के प्रवेश द्वार के निकट ही सूफी संत मीठेशाह की दरगाह है। यहां हर वर्ष तीन दिवसीय उर्स मेला भी लगता है।

सूर्य मंदिर

झालावाड़ का दूसरा जुड़वा शहर झालरापाटन को घँटियों का शहर भी कहा जाता है। शहर में मध्य स्थित सूर्य मंदिर झालरापाटन का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। वास्तुकला की दृष्टि से भी यह मंदिर अहम है। इसका निर्माण दसवीं शताब्दी में मालवा के परमार वंशीय राजाओं ने करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान है। इसे पद्मनाभ मंदिर भी कहा जाता है।

शान्तिनाथ मंदिर

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यह मंदिर सूर्य मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित है। ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित इस जैन मंदिर के गर्भगृह में भगवान शांतिथ की सौम्य प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा 11 फुट ऊंची है और काले पत्थर से बनी है। मुख्य मंदिर के बाहर विशालकाय दो हाथियों की मूर्तियां इस प्रकार स्थित हैं, मानो प्रहरी के रूप में खड़ी हों।

Rajasthan Gk In Hindi Series 105

Rajasthan Gk In Hindi Series 104

Rajasthan Gk In Hindi Series 103

Rajasthan Gk In Hindi Series 102

गोमती सागर

झालरापाटन का यह विशाल सरोवर गोमती सागर के नाम से जाना जाता है। इसके तट पर बना द्वारिकाधीश मंदिर एक प्रमुख दर्शनीय स्थान है। झाला राजपूतों के कुल देवता द्वारिकाधीश को समर्पित यह मंदिर राजा जालिम सिंह द्वारा बनवाया गया था। शहर के पूर्व में चन्द्रभागा नदी है। जहां चन्द्रावती नगरी थी। उस काल के कुछ मंदिर आज भी यहां स्थित हैं, जिनका निर्माण आठवीं शताब्दी में मालवा नरेश ने करवाया था। इनमें शिव मंदिर प्रमुख हैं। यह मंदिर नदी के घाट पर स्थित है।

नौलखा किला

शहर के एक छोर पर ऊंची पहाड़ी पर नौलखा किला एक अन्य पर्यटन स्थल है। इसका निर्माण राजा पृथ्वीसिंह द्वारा 1860 में शुरू करवाया गया था। इसके निर्माण में खर्च होने वाली राशि के आधार पर इसे नौलखा किला कहा जाता है। यहां से शहर का विहंगम नजारा काफी आकर्षक लगता है।

बौद्ध और जैन मंदिर

झालावाड़ और झालरापाटन शहरों के बाहर जैन धर्म और बौद्ध धर्म से जुड़े मंदिर भी पर्यटकों को खूब लुभाते हैं। इसमें चांदखेड़ी का दिगंबर जैन मंदिर और कोलवी स्थित बौद्ध धर्म के दीनयान मत की गुफाएं काफी प्रसिद्ध हैं। झालावाड़ शहर से 23 किमी की दूरी पर भीमसागर बांध स्थित है तथा 65 किमी की दूरी पर भीमगढ किला है। यह स्‍थल भी पर्यटन के लिहाज से घूमा जा सकता है।

आवागमन

झालावाड राष्ट्रीय राजमार्ग १२ (जयपुर-जबलपुर) पर स्थित है। निकटतम बड़ा शहर कोटा है जो ८५ किलोमीटर दूर है। jhalawar has a newly conducted railway sattion jhalawar city.झालावाड़ का निकटतम एयरपोर्ट कोटा विमानक्षेत्र है। यह शहर से 87 किलोमीटर दूर स्थित है। नजदीकी रेलवे स्टेशन भी कोटा ही है। कोटा से झालावाड़ जाने के लिए बस या टैक्सी की सेवा ली जा सकती है। इसके अलावा जयपुर, बूंदी, अजमेर, कोटा, दिल्ली, इंदौर आदि शहरों से बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

Jhalawar District GK in Hindi झालावाड़ जिला Rajasthan GK in Hindi

Jhalawar: History, Geography, Places

Location, Area and Administration of Jhalawar:

The word Jhalawar, literally means “land of the Jhalas” this being the name of the ruling clan of the former state. Jhala­war district lies in the south eastern corner of Rajasthan between 23° 4′ to 24° 52′ North Latitude &  75° 29′ to 76° 56′ East Longitude. It is bounded in the north, north-east and north-west by Kota district and by Madhya Pradesh in the rest of the district.

Jhalawar District has an area of 6219 Sq. Kms which has been divided into 8 tehsils namely Aklera, Asnawar, Gangdhar, Jhalrapatan, Khanpur, Manoharthana, Pachpahar, Pirawa.

Imagesource: MapsofIndia Tehsil of Asnawar not on Map
Imagesource: MapsofIndia
Tehsil of Asnawar not on Map

History of Jhalawar

Jhala Zalim Singh , the dewan of Kota, developed Jhalawar (then Chaoni Umedpura ) as cantonment & township, to isolate Kota from Maratha invaders. In 1838, British rulers separated Jhalawar state from Kota state and gave it to Jhala Madan Singh, grandson of Jhala Zalim Singh.

Rulers of Jhalawar:

  • Madan Singh (1838–1845)
    • 1st independent ruler of Jhalawar.
  • Pirthi Singh (1845–1875)
  • Bakht or Zalim Singh (1875–1897)
  • HH Sh. Bhawani Singh (1897–1929)
  • HH Sh. Rajendra Singh (1929–1943)
  • HH Sh. Harish Chandra (1943-till merger of Jhalawar State in Rajasthan.)

Historical Places of Jhalawar

Gagron Fort:

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Gagron FortGagron Fort is an example of ‘Jal Durg’, or Water Fort surrounded by waters of  Ahu, Kali and Sindh rivers on three sides. It is included in the list of the UNESCO World Heritage Site. The foundation of this impregnable, magnificent fort was laid in the 7th century. Outside the fort is a Durgah of Sufi Saint Mitheshah, where a fair is held every year during the islamic month of Moharram. Nearby is a monastery of Saint Pipa, a contemporary of Saint Kabir.

Jhalawar Fort:garh-palace-jhalawar3

Situated in the centre of the town, the Jhalawar fort or Garh Palace,  was built by Maharaj Rana Madan Singh and his successors added beautiful paintings inside the rooms. The Zenana Khas or the ‘Women’s Palace’ has some excellent frescoes on both, walls and mirrors and they are prime examples of the Hadoti school of art.

Bhawani Natyashala:bhawani

The Bhawani Natyashala is one of the most unusual theaters in India, constructed in 1921 A.D where Parsi plays and cultural events would take place. This architectural wonder gives one an excellent insight into the world of theatre and art and is known to have an underground passage which allowed horses and chariots to appear on stage.

Jhalarapatan:

madanvilas-palace-jhalrapatan1-2Jhalrapatan, known as the city of bells, is an ancient walled town, founded by Jhala Zalim Singh in 1796 A.D. It is at the same place where the ancient town of Chandrawati was founded by Parmar Raja Chandrasen and later on ravaged by invaders. The entire town lived within the confines of a wall to protect the trade caravans from Pindaris, as Jhalrapatan happened to be one of the junctions of the caravan route.  The 10th century Sun Temple (Padma Nabh Temple) is the pride of Jhalrapatan. It is one of the best examples of temple architecture with lovely sculptures. Inside the temple, there is idol of Lord Vishnu.

Fairs & Festivals of Jhalawar

Chandrabhaga Fair

chandrabhagaEvery year, the Chandrabhaga Fair in Rajasthan attracts travelers, pilgrims and explorers alike with rituals and traditions practiced in this region. Named after the river Chrandrabhaga, it is considered very sacred by the people of Rajasthan.On the full moon night of Kartik purnima devotees take a holy dip in the near by river. A group “Deep Daan” (Offering of lamps) event and cultural programs are of special interest and help tourists acquaint themselves with the people and their culture.

Geography of Jhalawar

The topography of the area is highly undulatory comprising continuous ridges and broad valleys of Vindhyan sandstones and shales, extensive wide plateau, flat topped conical and isolated hills and cultivated plains of Deccan Traps and the alluvial plains.

As a result the district falls in the following physical divisions:

South part of Jhalawar district has the characteristics of the Malwa Plateau, an area of rounded bare hills interspersed by plains. Jhalawar district is an expanse of fertile plain having rich black-cotton soil. The Jhalawar plains stretches in a wide belt from Bhawani Mandi in the west almost up to Asnawar in the east and is bounded on the northern, eastern and southern sides by the Mukandara hills. This is fertile, well watered region crossed by the Ahu and Kalisindh rivers and a number of lesser streams.

Jhalrapatan stands on Vindhyan strats at the northern edge of the great spread of basaltic rocks known as Deccan trap formation, the northern area of which is also called the Malwa trap.

Rivers of Jhalawar:

The rivers and streams of the district belong to the Chambal river system. Except in Gangdhar tehsil, the general flow is from south to north. For the sake of convenience, the rivers of Jhalawar may be divided into two groups — the western group and the eastern group.

  • The western rivers are Ahu Piplaj, Kyasri, Kantali, Rawa, Kalisindh and Chandrabhaga. T
  • The eastern rivers are Parwan, Andheri, Newaj, Ghar and Ujar. There are artificial lakes Kadila and Mansarovar.

Generally speaking, the Jhalawar rivers have deep beds with the result that water level is below that of the surrounding countryside and hence canals cannot be dug for irrigation.

Natural Resources/ Minerals in Jhalawar:

Due to absence of metamorphic rocks to which most of the metallic minerals are associa­ted, no major metallic mineral of economic importance is found in Jhalawar district. A brief description of minerals found in Jhalawar can be found as under:

Copper:

  • There are few old workings of copper just 1 Km. north of Jhalawar town where Malachiteand Azurite are present in Jhalrapatan sandstone of Lower Vindhyans.

Bentonite:

  • Bentonite is a variety of clay possessmg inherent bleaching properties.
  • It is of great commercial importance specially in chemical industries, oil drilling, decolourising, vegetable oils, rubber industry, foundries etc.
  • There are large number of occurrences spread over in Pirawa, Pachpahar and Jhalra­patan tehsils.
    • Mathniya-Bhandar Tehsil Pirawa.
    • Khetakheda, Tehsil Pirawa.
    • Chandi kheri, Teh. Jhalrapatan
    • Karodiya-Quadir nagar-Chhoti sunel, Teh.

Limestone:

A. High Grade Limestone:

  • There are patches scattered in different parts of the district and have been located near Jhalawar road, Jhinkhriya, Kotri, Kishanpura, Karmakheri, Napaniya etc.
  • However few patches are promising which have compara­tively less amount of chert and have reasonably good extent. These are near Jhalawar road, Kotri-Gardhankheri, Jhinkhriya and Kotrikhurd.

B. LOW Grade Limestone:

  • The low grade limestone belonging to Suket shales of lower Vindhyans and Sirbhu shales of upper Vindhyans is widespread near Gagraun and Sarola kalan respectively.
  • The limestone is generally of low grade siliceous, dolomitic and shaly contents.

 Laterite:

  • Laterite occurs as capping over Deccan­ trap hills in south western part of Jhalawar district.
  • Extensive deposits are found near sarod, Mishroli, Kolvi, Gunavi, Binayaga, Kysara and around Dag, varying in thickness from less than a meter to over 10 mts.
  • This rock was excavated locally due to its soft nature to buildt emples and caves during the Buddhist period such constructions arc seen in Kolvi, Binayaga etc

Gypsum:

  • Indications of gypsum were seen in Khanpur.  

Chert, Agate Chalcedony:

Rajasthan Gk In Hindi Series 43

Rajasthan Gk In Hindi Series 42

Rajasthan Gk In Hindi Series 41

Rajasthan Gk In Hindi Series 40 (400 Questions)

Rajasthan Gk In Hindi Series 39

  • In Jhalawar district occurrences of agate and associated crypto-crystalline silica products are found spread in many localities.
  • They are found scattered in plains as well as in hill slopes.
  • Important occurre­nces are:-
    • Near village Nasirabad on Richwa-Bakani road.
    • Mundlya Kheri south of Jhalarapatan.
    • Diwallkhera, Borband, Donda, Semli Bhawani etc. Thesil Pirwa.
    • Mariavada Goverdhanpura, Khokhariya etc, between-Bhawanimandi and Dag.
    • Near Garnawad.

Lithomergic Clays:

  • The lithomergic clays associated with laterite cappings are found near Sarod, Dag, Gunavi etc. villages but the draw back with these clays is higher iron content which in not separable by washing and electromagnetic separation.

Building Stones:

A. Flaggy Limestone ( Kotahstone )

  • Flaggy limestone yielding slabs similar to that of Ramganjmandi has been located in Jhalawar district
  • The flaggy limestone of greenish grey colour has been encountered  near Kishanpura, Mangal.

B. Flaggy Sandstone:

  • Sandstone in the form of slabs and pillars are mined ,on large scale in Jhalawar district.
  • There it is associated with two horizons with
    • (i) Jhalrapatan sandstone of lower Vindhyans and
    • (ii) Lower Bhahder sandstone of upper Vindhyans.
  • The important mining areas are: Loharia-ki-Dhani, Manak chauk, Bagdhar, Bakaspura, Asnawar Bhanwrasa, Bhalta, etc. all belonging to Jhalrapatan sandstone. The Bhander sandstone quarries exist near Ambala and Laxmipura.

C. Masonary Stones:

  • There are huge deposits of sandstone in the district.
  • The non flaggy sandstone is quarried and used as masonary stone at number of places around Jhalawar,Asnawar,Jhalrapatan etc.

Population:

  • The district has a population density of 227 inhabitants per square kilometer.

Jhalawar District

Jhalawar district is a district of the Indian state Rajasthan in western India. The town Jhalawar is the district headquarters. Jhalawar district has a rich history and natural wealth. It features ancient forts and pre-historic cave paintings. Jhalawar has seven tehsils which are Aklera, Gangdhar, Jhalara Patan, Khanpur, Manohar Thana, Pachpahar and Pirawa.

Jhalawar district is a former princely state which was created from Kota in 1838. The name of the district comes from the Jhalas, a clan of Rajputs who were the rulers of the princely state.

District Jhalawar
Headquater Jhalawar
Area (km2) 6,219
Population(2011) 1,411,327
Division Kota
Official Website http://www.jhalawar.nic.in

Tourist Places In Jhalawar District

  • Jhalawar Fort (Garh Palace)
  • Government Museum
  • Bhawani Natya Shala
  • Ren Basera
  • Jhalara Patan
  • Sun temple
  • Chandrabhaga temple
  • Shantinath jain temple
  • Gagron Fort
  • Buddhist Caves and Stupas
  • Atishay Jain Temples, Chandkheri, Khanpur
  • Bhimsagar Dam
  • Dalhanpur, Chhapi Dam
  • Bhimgarh Kakuni
  • Manohar Thana Fort
  • Jain Swetambar Nageshwar Parshwanath Temple
  • Fort of Gangdhar

Jhalawar District Location

Jhalawar district is located in South-Eastern Rajasthan with boundaries of Madhya Pradesh to its East and South- West and the Mukandra mountains on the North.

Jhalawar District Climate

Summers are extremely hot in Jhalawar while monsoons and winters are quite pleasant for sight-seeing. Temperature ranges from 42 C in summers to 10 C in winters.

Transportation In Jhalawar District

Nearest airport is at Kota which is at a distance of 80 km from Jhalawar. Jhalawar is well linked to other cities by rail. It has Ramganj Mandi railway station which is at a 25 km distance from Jhalawar city. Jhalawar has good road network to other major cities .

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bhilwara District GK in Hindi भीलवाड़ा जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

भीलवाड़ा राजस्थान का एक प्रमुख जिला है जो अपने इतिहास के साथ ही अपने उद्योग धंधों की वजह से भी राज्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है हालांकि विकास के मामले में अभी इस जिले में काफी काम करना बाकि है. प्राकृतिक और भौगोलिक विषमताएं और पानी की कमी की वजह से इस जिले में वैसा विकास नहीं हो पाया है जैसी इसको जरूरत है। इसके बावजूद यहां वस्त्र उद्योग बहुत फला—फूला है।

भीलवाड़ा (Bhilwara)— ऐतिहासिक तथ्य

➤ प्राचीन अभिलेखों तथा अवशेषों से भीलवाड़ा जिले के इतिहास की गाथा का पता चलता है।
➤ पाषाण युगीन सभ्यता के अवशेष पुरानी नदियों के किनारे बिखरे हुए हैं।
➤ इनमें आंगूचा, ओझियाणा एवं हुरड़ा मुख्य हैं।
➤ जिले के बागोर गांव में हुई खुदाई में पाषाण युगीन सभ्यता का पता चलता है।
➤ बागोर भारत का सबसे सम्पन्न पाषाणीय सभ्यता स्थल है।
➤ वैदिक काल में सम्पन्न किये जाने वाले धार्मिक कार्यों कर जानकारी नान्दशा में पाए जाने वाले यूप स्तम्भ से होती है।
➤ नवीं से बारहवीं शताब्दी के प्राचीन मंदिरों से यह जिला परिपूर्ण है।
➤ बिजौलिया, तिलस्वा एवं माण्डलगढ़ मध्यकालीन मंदिर कला एवं स्थापत्य के अनूठे नमूने हैं। ➤ मन्दाकिनी मंदिर एवं वहां के शिलालेख भी पुरातत्व की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
➤ यह क्षेत्र गुहील एवं चौहान राजपूतों के राज्य का एक भाग रहा है।
➤ भीलवाड़ा जिले के कई क्षेत्र मुगलकाल मे मेवाड़ राज्य एवं शाहपुरा ठिकाने के भाग रहे।
➤ मेवाड़ राज्य एवं शाहपुरा ठिकाने के संयुक्त राजस्थान में विलय के बाद सन् 1949 में एक अलग जिला ‘भीलवाड़ा’ अस्तित्व में आया।
➤ सन् 1951 से 1961 के मध्य दो ग्राम चित्तौड़गढ़ जिले से इस जिले में सम्मिलित किये गए और इसके साथ ही चार तहसीलें बदनौर, करेड़ा, फूलिया व अरवड़ समाप्त कर दी गई।
➤ जिले के माण्डलगढ़, माण्डल व अन्य क्षेत्रों का मुगलकालीन आक्रमण के दौरान रक्षा चौकियों के रूप में इस्तेमाल ऐतिहासिक तथ्य है।

भीलवाड़ा (Bhilwara)— भौगालिक स्थिति

➤ इस जिले के भौगोलिक, भूगर्भ, जलनिकास, ढलान एवं उच्चावय गुणों के आधार पर 13 भू-आकृतिक क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है।
➤ पश्चिमी भाग को छोड़कर सामान्यतः जिला आयताकार है। पूर्व भाग की तुलना में पश्चिमी भाग अधिक चौड़ा है।
➤ जिले का भू-भाग सामानयतः एक उठा हुआ पठार हैं, जिसके पूर्वी भाग में कहीं-कहीं पहाड़िया हैं।
➤ अरावली श्रेणियां जिले में कई स्थानों पर दृष्टिगोचर होती हैं, जो अधिकांशतः दक्षिणी भाग माण्डलगढ़ तहसील में हैं।
➤ एक अलग पहाड़ी उत्तरी-पूर्वी भाग में जहाजपुर कस्बे तक फैली हुई है।
➤ जिले में बहने वाली प्रमुख नदियां बनास एवं उसकी सहायक बेडच, कोठारी व खारी हैं।
अन्य छोटी नदियां मानसी, मेनाली, चन्द्रभाग एवं नागदी हैं।
➤ बनास नदी अरावली पर्वत श्रेणियों में से उदयपुर जिले के उत्तरी भाग से निकलकर भीलवाड़ा जिले में दूड़िया गांव के पास प्रविष्ठी होती है।
➤ यह नदी उत्तर एवं तत्पश्चात् उत्तरी—पूर्वी दिशा की ओर बहती हुई जहाजपुर तहसील के पश्चिमी क्षेत्र से टोंक जिले में प्रवेश कर जाती है।
➤ जिले में कोई प्राकृतिक झील नहीं है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — जलवायु

➤ जिले की जलवायु सम एवं स्वास्थ्यवर्द्धक है। गर्मियों में तेज गर्मी पड़ती है।
➤ सर्दियां बहुत कड़काने वाली होती हैं। जिले के उत्तरी-पूर्वी भाग की जलवायु पूर्वी भाग की जलवायु से भिन्न है।
➤ सामान्यतः सर्दी का मौसम होता है जो मार्च से जून तक रहता है।
➤ वर्षा का मौसम जून से आधे सितम्बर तक रहता है।
➤ तापमान लगातार मार्च से जून तक बढ़ता जाता है जबकि यह मध्य नवम्बर से जनवरी तक घटता जाता है।
➤ जिले की सामान्य वर्षा 60.35 से.मी. है।
➤ मौसम से संबंधित एक मौसम केन्द्र भीलवाड़ा शहर में स्थापित है। कुल मिलाकर जिले में वर्षा मापने के 12 केन्द्र हैं।
➤ जिले के पूर्वी भाग में सामान्यतः वर्षा शेष भाग की अपेक्षा अधिक होती है। कुल वार्षिक वर्षा 94 प्रतिशत मानसून की अवधि में होती है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — दर्शनीय स्थल

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➤ भीलवाड़ा मे पर्यटन की दृष्टि से प्राचीन बड़ा मंदिर अपनी प्रसिद्धि लिये हुए है। इस मंदिर में विष्णु लक्ष्मी की प्रतिमायें दर्शनीय हैं।
➤ इसके अतिरिक्त प्राचीन तालाब धर्म तलाई (धांधालाई) के किनारे नगर विकास न्यास द्वारा निर्मित सेन्ट्रल पार्क नगर वासियों के लिए पिकनिक का अच्छा स्थल है।
➤ गांधीनगर बस्ती में स्थित मंदिर भी देखने योग्य है।
➤ भीलवाड़ा से 6 कि.मी. दूर प्रसिद्ध पर्यटन एवं धार्मिक स्थल हरणी महादेव में पत्थर की झुकी हुई चट्टान के नीचे शिवजी का मंदिर बना हुआ है।
➤ यहां एक सरोवर एवं उनके छोटे-बड़े मंदिर, पार्क एवं धर्मशालाएं हैं।
➤ हरणी महादेव में प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर मेला लगता है।
➤ इसी प्रकार भीलवाड़ा में 10 कि.मी. दूर पुल के निकट अधरशिला नामक पर्यटन स्थल है।
➤ यहां उड़न छतरियाँ, पाताला महादेव और जैन मंदिर भी दर्शनीय है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — माण्डल

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➤ भीलवाड़ा से 14 कि.मी. दूर स्थित माण्डल कस्बे में प्राचीन स्थल मिंदारा पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
➤ हाल ही में इस मिंदारे के जीर्णोद्धार से इसके आकर्षण में अभिवृद्धि हुई है।
➤ यहां से कुछ ही दूर मेजा मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ खचवाह की बत्तीस खम्भों की विशाल छतरी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का स्थल है।
➤ 6 किलोमीटर दूर भीलवाड़ा का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मेजा बाँध है।
➤ बरसात में लबालब जल राशि से भरा रहने वाला यह बांध पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता है। यहां हरे-भरे पार्क भी हैं।
➤ माण्डल में होली के तेरह दिन पश्चात् रंग तेरस पर आयोजित नाहर नृत्य अपने आप में विशेष स्थान रखता है।
➤ इस नृत्य को देखने के लिए हजारों नर-नारी उपस्थित होते हैं।
➤ कहते हैं कि शाहजहां के शासनकाल से ही यहां यह नृत्य होता चला आ रहा है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — माण्डलगढ़

➤ भीलवाड़ा से 51 कि.मी. दूर माण्डलगढ़ नामक अति प्राचीन विशाल दुर्ग है।
➤ त्रिभुजाकार पठार पर स्थित यह दुर्ग बारी-बारी से मुगलों व राजपूतों के आधिपत्य में रहा।
➤ यह दुर्ग कई प्रसिद्ध युद्धों का प्रत्यक्ष गवाह रहा।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — मेनाल

➤ माण्डलगढ़ से 20 किलोमीटर दूर चित्तौड़गढ़ की सीमा पर स्थित पुरातात्विक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य स्थल मेनाल में 12वीं शताब्दी के चैहान काल के लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिर, रूठा रानी का महल, हजारेश्वर देखने योग्य हैं।
➤ यहां के मन्दिरों पर उत्कीर्ण विभिन्न प्रतिमायें अजन्ता एलोरा की प्रतिमाओं की याद ताजा कर देती है।
➤ हरी-भरी वादियों के बीच सैंकड़ों फुट ऊँचाई से गिरता मेनाली नदी का जल प्रपात भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — तिलस्वां

➤ माण्डलगढ़ से 40 किलोमीटर दूर है प्रसिद्ध धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल तिलस्वां महादेव।
➤ यहां प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर विशाल मेला लगता है।
➤ यहां वर्ष भर देश के कोने-कोने से कुष्ठ व चर्म रोग से पीड़ित रोगी स्वास्थ्य लाभ के लिए आते हैं।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — बिजोलिया

➤ माण्डलगढ़ से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित बिजोलिया में प्रसिद्ध मंदाकिनी मंदिर एवं बावड़ियां हैं।
➤ ये मंदिर भी 12वीं शताब्दी के बने हुए हैं।
➤ लाल पत्थरों से बने हुए मंदिर पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों में से एक हैं।
यहां नगर परकोटा बना हुआ है।
➤ इतिहास प्रसिद्ध किसान आंदोलन के लिए भी बिजोलिया प्रसिद्ध रहा है।
➤ यहां के मंदिर एवं चट्टानों पर बने शिलालेख भी गौरवशाली इतिहास के साक्षी है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — शाहपुरा

➤ भीलवाड़ा से 50 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन नगर शाहपुरा अन्तर्राष्ट्रीय रामस्नेही समुदाय के लोगों का तीर्थस्थल है।
➤ यहां रामस्नेही संतों की कलात्मक छतरियों से बना रामद्वारा दर्शनीय है।
➤ यहां प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारेठ की प्रसिद्ध हवेली एक स्मारक के रूप में विद्यमान है।
➤ शाहपुरा के लगभग 250 वर्ष पुराने कलात्मक राजमहल भी यहां के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थलों में से एक हैं।
➤ यहां पर होली के दूसरे दिन प्रसिद्ध फूलडोल मेला लगता है।
➤ उम्मेदसागर यहां का प्राकृतिक पर्यटन स्थल हैं एवं नगर के बीच बना कमल सागर भी अपने सौन्दर्य से आकर्षित करता है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — आसींद

➤ भीलवाड़ा-ब्यावर मार्ग पर भीलवाड़ा से 40 किलोमीटर दूर आसीन्द में सवाई भोज का प्राचीन मंदिर गुर्जरों का तीर्थ स्थल है।
➤ यहां प्रतिवर्ष भादो माह में विशाल मेला लगता है।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — गंगापुर

➤ भीलवाड़ा-उदयपुर मार्ग पर 45 किलोमीटर दूर गंगापुर गंगाबाई की प्रसिद्ध छतरी पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
➤ इस छतरी का निर्माण सिंधिया महारानी गंगाबाई की याद में महादजी सिंधिया ने करवाया था।
➤ गंगाबाई मंदिर की कलात्मक वास्तुकला सहज ही आकर्षित करती है।
➤ इसके अतिरिक्त जिले में अमरगढ़ की छतरियां एवं दुर्ग, बनेड़ा के महल, बदनोर के महल, मंगरोप एवं हमीरगढ़ का दुर्ग एवं माताजी का मंदिर आदि भी पर्यटन, पुरातत्व व ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं।

भीलवाड़ा (Bhilwara) — कला व संस्कृति

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Rajasthan Gk In Hindi Series 63

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➤ भीलवाड़ा जिला फड़ एवं लघु चित्रशैली के लिये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
➤ फड़ चित्रकला के क्षेत्र में जहां शाहपुरा निवासी दुर्गेश जोशी एवं शांतिलाल जोशी तथा भीलवाड़ा निवासी श्रीलाल जोशी को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जा चुका है।
➤ वहीं लघु चित्रशैली में भीलवाड़ा के वयोवृद्ध चित्रकार बदरीलाल सोनी भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।
➤ शंकरलाल सोनी चांदी की कलात्मक वस्तुओं पर लघु चित्रकारी करने में दक्ष हैं।
➤ ‘अंकन’ नामक कला संस्था से जुड़े करीब 30-35 युवा चित्रकारों द्वारा समय-समय पर तैयार की जाने वाली कलाकृतियों की चित्र प्रदर्शनियां भी कला प्रेमियों को आकर्षित करती हैं।
➤ चित्रकला के अलावा यहां की अन्य लोककलाओं में गैर नृत्य, घूमर नृत्य, भवाई नृत्य, कालबेलिया नृत्य आदि प्रसिद्ध हैं।
➤ माण्डल, चांदरास आदि ग्रामीण क्षेत्रों के गैर नृत्य दलों में शामिल कलाकार हर वर्ष देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करते हैं।
➤ यहां के भवाई नृत्य कलाकारों में स्व. छोगा भवाई का नाम सबसे पहले लिया जाता है।
➤ अन्तर्राष्ट्रीय बहरूपिया कलाकार जानकीलाल का तो कोई सानी नहीं।
➤ इसके अलावा लाख की चूड़ी बनाना, पीतल के बर्तन बनाना, धातु की कलात्मक वस्तुएं व मूर्तियां, चमड़े की जूतियां बनाने संबंधी हस्तशिल्प भी यहां खूब पनपे।

भीलवाड़ा (Bhilwara)— औद्योगिक विकास

➤ वस्त्र उद्योग ​भीलवाड़ा में सबसे ज्यादा विकसित हुआ है।
➤ अपने इसी उद्योग की वजह से इस जिले को राजस्थान का मैनचेस्टर भी कहा जाता है।

bhilwara District GK in Hindi भीलवाड़ा  जिला Rajasthan GK in Hindi

Bhilwara: History, Geography, Places

Location, Area & Administration:

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Bhilwara is located at an altitude of 421 meters from sea-level with coordinates 25.35°N Latitude and  74.63°E Longitude. Bhilwara is bounded by Ajmer district from north, Bundi district from east, Udaipur, Chittorgarh, Madhya Pradesh from South and Rajsamand district from west.

Bhilwara has an area of 10508 Square Km. and for administration has been divided into 16 tehsils namely Asind, Banera, Badnore, Bhilwara, Beejoliya, Hameergarh, Hurda, Jahazpur, Kareda, Kotri, Mandal, Mandalgarh, Phuliya Kalan, Raipur, Shahpura and Sahada.

Imagesource: MapsofIndia
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History of Bhilwara:

In Indian mythology, Bhilwara finds mention in Mahabharata where Arjuna, while going to Dwarika with all Gopis, is said to have fought here during the Mahabharata period. Bhilwara’s cultural history can be traced back to the Nagar Brahmins mentioned in the Skanda Purana.

In ancient times the Bhilwara was part of Guhil and Chouhan rulers of the state. According to the ancient Chronological description, it is believed that Bhilwara town was found at some stage in 11th century, at the same time when a “Bhil” tribe constructed a shrine for Lord Shiva at the region of the “Jataun ka Mandir”.

During the Mughal period Bhilwara was part of the kingdom of Mewar under the Shahpura principality. Historical records show that Mandal served as the military base of the Mughals when they had attacked Chittaurgarh. A watch tower that was built on a small mound in Mandal is now a Devi temple.

Mewar state had also set up a mint (Taksal) in Bhilwara, where coins known as ‘BHILADI‘ were minted and from this denomination was derived the name of the district.

In 1858, a fierce battle was fought at the Sanagner village in Bhilwara, between renowned revolutionist Tantya Tope and the British.

The Mewar State and Shahpura Riyasat merged in “Syunkt Rajasthan”and district of Bhilwara came into existence in 1949.

Historical Places of Bhilwara:

Mandalgarh Fort:mandalgarh-fort

Mandalgarh Fort Bhilwara is believed to have been built by Rana Kumbha and is the 3rd fort of Mewar region, the other two being Chittoragrh and Kumbhalgarh.However, According to Veer Vinod, the fort had been constructed by Mandiya Bhil and Chanana Gurjar. The fort is located on a part of Aravali hill range along confluence of Banas, Berach & Menali,

Badnore Fort:

Badnore Fort  is situated at asind road and distance is 70 km from Bhilwara.

Ramniwas Dhamramnivas-dham-shahpura

Bhilwara has the famous Ramdwara of Ramsnehi Sampraday. The founder Guru of the sampraday was Swami Ramcharanji Maharaj, who preached his followers here later, he moved to Shahpura, 50 km from Bhilwara, where the present headquarters of Ram Snehi Sampraday known as Ram Niwas Dham is located.

Other Places:

  • Battis Khambon ki Chhatri.  This place is situated in Mandal far 16 km from Bhilwara city. It has chhatri made of sandstone with 32 pillars.
  • Pur Udan Chatri

Famous temples of Bhilwara:

  • Harni Mahadev – Founded by the ancestors of the Darak family, a Shivling lies under the mountain, built into a Shiva temple is 8 km from the city.Near this place a very nice garden “Samriti Van” is situated.
  • Chamunda mata Mandir located on the same hill of Harni Mahadev
  • Adhar Sheela Mahadev- where a huge rock is resting on a small one, is located at Pur.
  • Tilesva Mahadev Mandir – is located in Bijauliya tehsil.
  • Mandakini Mandir – Bijauliya- There are three temples and one pond. The “Lkulish” statue at the entrance of main gate of this temple. On the main gate there are two statue of Parvati and Ganesh are situated. The temples are “Hajareshwar Mahadev” and “Undeshwar” also situated here.
  • Swaibhoj Temple: This temple is situated in Asind tehsil and is famous religious place of “Gurjar” community. The place where this place is situated is called “Gosth Dadawat”. A small pond is exist with the name of “Rathora Talab” or “Prem Sagar”. The fair is held on “Bhadrapad Chhath” in a year.
  • Dhanop Mataji: This famous temple of “Maa Durga” is Approximately 85 km far away from Bhilwara  in shahpura tehsil.
  • Bagore Sahib is Sh. Guru Govind Singh Ji stayed here when he was on journey to Punjab. This historical Gurdwara is situated at a distance of 20 km from town Mandal in Village Bagore of Tehsil Mandal, District Bhilwara, Rajasthan. This holy place has been blessed by the visit of the Tenth Sikh Guru, Shri Guru Gobind Singh Ji.
  • Kyara ke Balaji has a natural image of Lord Hanuman. It is said that the image spontaneously appeared on the rock. Patola Mahadev Temple,Ghata Rani Temple, Beeda ke Mataji Temple and Neelkanth Mahadev Temple are nearby attractions situated on the beautiful hills of the Aravali mountain range.

Fairs & Festivals of Bhilwara:

Bhilwara Festivals

Geography of Bhilwara:

The district of Bhilwara is situated on an elevated plateau. The eastern part of the district has a cluster of hills. The district is intersected by the Aravali ranges at several places. The hill ranges in North-East corner of the district extend upto jahajpur tehsil. The ranges are also predominant in the south east in Mandalgarh tehsil. Occasional inselberg, low-lying hillocks and chains of ridges break the monotony of peneplained tract. The area of the district generally slopes gently except in western & northwestern part where slope is high.

Soils of Bhilwara:

The soil of the district varies from sandy loam to heavy loams. Soils of the district are classified as follows:

  • Clay loam or medium black: This type of soil is found in the hilly areas in the central parts of the district.
  • Loam: This type of soil is found in the entire district.
  • Sand and sandy loam: This type of soil is found mostly near the banks of rivers and nallahs.
  • Loam pebbly & stony: These types of soils are met within the hilly areas of the eastern blocks of the district.

Climate of Bhilwara:

The district has a hot dry summer and bracing cold winter. The cold season is from December to February and is followed by hot summers from March to the last week of June. The south-west monsoon season which follows, last till about mid September. The period from mid September to about the end of November constitutes the post monsoon season.

Rivers of Bhilwara:

Though there is no natural lake in Bhilwara but there are number of ponds and dams. Many rivers meander their way through the Bhilwara district of Rajasthan. Bhilwara district falls in the Banas (9157.2 sq km), Chambal (1164.9 sq km) & Luni basins (133.0 sq km). Major River of the district is Banas, which flows in northeast to easterly direction. It enters near village Doodiya in Bhilwara tehsil in the west flowing towards east and takes an abrupt turn towards north-northeastern direction near Bigod downstream of the confluence with Berach River and again takes an easterly turn near Kanti and finally flows towards northeast till it enters Tonk district. Total length of the Banas River is 142 km in Bhilwara district. Channel pattern of Banas is sinuous and changes to more or less straight between Bigod and Rajamahal indicating structural control on the drainage pattern. Important tributaries are Berach, Kothari, Unli, Mendi, Nakadi, Chandrabhaga and Khari River. All these are ephemeral.

Imagesource:MapsofIndia
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Bhilwara is famous for its textile & minerals industries. There are more than 850 manufacturing units in the town.

Natural Places of Bhilwara:

  • Meja Dam: The Meja dam is one of the biggest dam of the district and famous for green mount park.
  • Triveni Sangam: This is holy place where many people worship here. It is the Sangam of  three rivers Banas, Bedach, Menali. At this place the ship temple is also situated.
  • Hameergarh Eco-Park: This Eco-park is situated at Hills of Hameergarh far 18 km from Bhilwara. The park is famous for “Chinkara”. You can see Blue Bulls, Jackles, Foxes, Vultures and many other wild animals. The “Mansha Mahadev” famous Shiv Temple is situated here.
  • Samriti Van

Natural Resources of Bhilwara:

Bhilwara district was well known for mica mining in the country for considerable long period but after the discovery of huge deposit of lead-zinc near village Rampura-Agucha by state department, this district has attained national importance. Other important minerals available in the district are copper ore, soapstone, clay, quartz, feldspar, garnet, dolomite, clacite, limestone, silica sand, marble, granite and sandstone.

Population of Bhilwara:

According to the 2011 census Bhilwara district has population of 24,10,459  out of which 78.72 percent belong to rural areas & 21.28 percent belong to urban areas. The decadal growth rate of population from 2001-2011 has been 19.60 percent. The district has a population density of 230 inhabitants per square kilometer. Bhilwara has sex ratio of 969 females for every 1000 males, and overall literacy rate of 62.71%.

 

Bhilwara District

Rajasthan Gk In Hindi Series 43

Rajasthan Gk In Hindi Series 42

Rajasthan Gk In Hindi Series 41

Rajasthan Gk In Hindi Series 40 (400 Questions)

Rajasthan Gk In Hindi Series 39

Bhilwara is a well-known district in the state of Rajasthan in India. The district has its headquarters in the Bhilwara town. Bhilwara district is a renowned tourist destination and a major trading hub. A large number of cloth mills are located in the region.There are 15 Tehsils in Bhilwara district which are: Bhilwara, Banera, Mandal, Mandalgarh, Beejoliya, Kotri, Shahpura, Jahazpur, Sahada, Raipur, Asind, Hurda. Fulyakalan, Sahada, Badnor.

District Bhilwara
Headquater Bhilwara
Area (km2) 10,455
Population(2011) 2,410,459
Division Ajmer
Official Website http://bhilwara.rajasthan.gov.in

Important Places In Bhilwara

  • Bagore
  • Badnore Fort
  • Asind
  • Mandalgarh
  • Shahpura

Bhilwara District Location

Bhilwara is located in South-East Rajasthan, Ajmer in the North, Chittaurgarh to its South, Udaipur to its in West and Bundi on its East.

Bhilwara District Climate

Bhilwara district in Rajasthan has a dry climate. The summer season is hot while the winter season is cold. The ideal time for Bhilwara travel is between the months of October and March.

Transportation In Bhilwara District

Bhilwara is situated on National Highway No. 4. Direct buses are available from Delhi, Jaipur, Ajmer, Udaipur, Chittorgarh, Jodhpur, Kota, Ahmedabad etc. Bhilwara railway station is stutes in Jaipur Mumbai Broad guage. Nearest Airport are at Dabok,Udaipur which is about 160 km. and Sangner(Jaipur) which is 260 Km. away from Bhilwara.

 

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Baran District GK in Hindi बारां जिला Rajasthan GK in Hindi

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

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Baran: History, Geography, Places

Location, Area & Administration:

The district of Baran extends from 24-25′ to 25-25′ North latitudes, 76-12′ to 77-26′ east longitudes and is located at altitude of 265 meters from sea-level. Baran is located on south-east corner of rajasthan and touches Shoepur, Shivpuri and Guna Districts of Madhya Pradesh along east side. Further, Baran is bordered in north-west by Kota and south-west by Jhalawar District of Rajasthan State.

Baran has an area of 6,955 Sq. Kms and is divided into 8 tehsils for purpose of administration namely Anta, Atru, Baran, Chhabra, Chipabarod, Kishanganj, Mangrol & Shahbad.

Source:MapsofIndia
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History of Baran:

Baran city was under Solanki Rajputs in the 14th -15th century. The area was named ‘Baran’ owing to the twelve villages under Solanki’s.. There are also saying that since the soils of the area is mostly ‘Barani’ so it is called ‘Baran’.

Before Indian independence in 1947, most of present-day Baran District was part of the princely state of Kota, although Shahabad tehsil was a discontinuous portion of Jhalawar princely state, and Chhabra tehsil was a discontinuous portion of Tonk princely state.

Post Independence, the rulers of the princely states acceded to the Government of India .On 31 March’ 1949, Rajasthan was reconstituted and Baran was converted into Sub Division headquarters of Kota district.

The present district Baran was carved out of erstwhile Kota District on 10th April 1991.

Historical Places of Baran:

Shahbad Fortshahbad-fort

Shahabad fort is one of the strongest fort in Hadoti area. It is located at about 80 km. from Baran. Shahbad fort was constructed by the Chauhan Vanshi Dhandhel Rajput Mukutmani Dev in the 1521 A.D. (Samvat 1577). This is situated in the dense forest area on the high mountain ranges and is surrounded by Kundakoh valley, waterfalls and a lake. The Topkhana (artillery) has Nawalbaan tope(cannon), Barudkhana and some temples in the forts are still secure.

Shergarh Fort

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shergarh

Shergarh fort is situated in Atru tehsil, about 65 km. from Baran district headquaters. The fort is located atop a hillock on the bank of Parban river. Shershan named the fort as Koshvardhan. A stone edict of 790 AD proves the antiquity of the place.

Sitabari

Rajasthan Gk In Hindi Series 105

Rajasthan Gk In Hindi Series 104

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sitabari

Sitabari is situated in Kelwara kasba on National Highway road connecting Shivpuri- Gwalior. The place has mythological significance and worshipped as the area where ‘Sita mata’ lived after being left-out by Lord Rama. This place is also known as the birthplace of Lav & Kush. There are several Kunds in Sitabari namely Balmiki Kund, Sita Kund, Laxman Kund, Surya Kund, Lav-Kush Kund. Sita-Kuti is also situated in the forest area near the temple. The tribal Sahariya fair is held at this place in the May/June every year.

Bhand Devara

bhand_devraRamgarh-Bhand Devra temples are situated about 40 km. from Baran. The Shiv Mandir of Ramgarh was built in 10th century on the Khajuraho style. Due to the Maithun Statues, the place is named as Bhand Devra. This temple is situated on the bank of pond and is now under the Archaeological department. This temple is known as Rajasthan’s mini Khajuraho. the best way to reach the temple is by a jeep or car.

Nahar Garh Fort

The fort is about 73 km. from Baran in Kishanganj tehsil. Fort is an impressive structure in red stone and a fine example of the Mughal architecture.

Kanya Dah- Bilas Garh

Bilasgarh is situated in Kishanganj tehsil. Bilasgarh was the big city during the Khechi kingdom which was destroyed to ruins by the order of Aurangazeb.

It is said that the daughter of the king Khechi was very beautiful and for her Aurangazeb send his force and ruined the city Bilasgarh. The princess ended her life in the ‘Bilasi’ river, the spot is now known as Kanyadeah. The ruins of the Bilasgarh is still situated in the lonely place inside dense forest area.

Festivals & Fairs of Baran:

Dol Meladol_mela

Dolmela is organised at the Dol Talab (Pond) in the Baran city from Jaljhulni Akadshi. The main attraction of this festival is a big Shobha Yatra (procession) which have about 54 Dev Viman (The Holy Statue Carriers) which is also known as DOL, of all the major temples of the city. In this procession some Akhadas also demonstrates their Kartab (type of physical exercise). The procession started from Shreeji temple comes to the Dol Talab where all the Dev Vimans are worshiped and then these are sent back to the respective temples. This fair is organised for 15 days which is very popular among the local residents as well as the residents from the Rajasthan state. People from adjoining Madhya Pradesh also visit for this fair. This fair is the symbol of communal harmony in the area.

Sita Bari Mela

Sitabri is located near Kelwara kasba, about 45 km from the Baran city. A tribal fair is organised here on Jeshta Amavasya and is attended by Sahariya tribe in large numbers. Hence, it is also considered as Kumbh in the Sahariya tribe. The Swyambar (marriage function) of Sahariya tribes is organised in this fair where people comes from all over Rajasthan state and adjoining Madhya Pradesh A Sahariya boy drops the handkerchief for proposing Sahariya girl in the fair, if the Sahariya girl accepts the Handkerchief, it is said that they are agreed for marriage. The bride and grooms take the 7 rounds (sat phere) of the Barnawa tree and after the blessings of their parents they are accepted as married couple. This fair is also called animal fair where good varieties of Cow, Buffalo etc. selling-purchasing are made.

Phuldol Festival

Phuldol is the one of the oldest folk festival of the Rajasthan state. The festival is organized yearly in the Kishanganj town on the occasion of Holi.  As a part of tradition groom visits in-laws home with his friends to play Holi.  On the day of Holi-Dulandi, lots of Swang (type of drama) is played. Some of the famous swangs are Gidh-Rawan-Yudh, Band-Bandi swang etc. In the night big ‘Shobhayatra’ known as ‘PhulDolo’ is taken out in the town. Lots of people from nearby places come to witness the festival.

Brahmani Mataji Mela

Brahmani Mata fair is organized in the old fort near Sorsan. The fair is organized on Magh-Shukla-Saptmi and is the only Donkey fair in the Hadoti region where donkey and kachhar are bought-sold in large numbers.

Piplod Christmas fair

This fair is organised in the only Church of the Baran district in the village Piplod in Atru tehsil. This fair is organised on 25 December every year. Though the fair belongs to christians, but locals belonging to hindu & muslim faiths also participate equally.

Geography of Baran:

The land in Baran slopes gently northward beginning from the high table land of Malwa in Madhya Pradesh. The land is generally fertile. There are hills in the South, North and Eastern portion of the district. The hills in the east of Shahabad tehsil, have the highest point, named as Mamooni (546 meters above mean sea level) in the district. These hills form part of Aravali Ranges. Their slopes are gently and steep and they are mostly covered by woods. The land of the district slopes gently from South to North and the drainage is through tributaries of Chambal, Parbati & Parwan.

Parbati or Parvati rises in Sehor area of Vindhyas and flows in North-West direction to enter Baran near Karayahat. It flows through Baran & Kota and meets Chambal at paliya village near Kota border.

Natural Places:

Sorsan Wildlife Sanctuarysorsan_wls

Sorasan Wildlife Sanctuary is located on a a flat stony plateau of uninhabitable scrub land with a number of small water bodies that can sustain variety of birds, animals, and reptiles. The sanctuary has area of 41 sq. km and lies between river Parwan, running on its western limit and villages with fertile, irrigated, arable land on the east.

Baran Population:

According to the 2011 census, Baran has a population of around 12,23,921 of which 79.21 percent is rural & 20.79 percent is urban. Baran has a sex ratio of 926 females for every 1000 males, and a literacy rate of 67.38%. Further, Baran has a population density of 175 inhabitants per square kilometer.

 

Baran District

District Baran was earlier a part of Kota district and carved out on 10th April 1991.The district got the name from the town Baran . It is also the district headquater. Baran district comes under parliamentry constituency Jhalawar-Baran. It is divided into four assembly constutuencies namely Anta, Kishanganj, Baran-Atru & Chhabra. Hadoti is the main dialect of Baran district. There are eight tehsils in the district namely Baran, Anta, Atru, Mangrol, Chhabra, Chhipabarod, Kishanganj & Shahabad. For administrative purposes, the district has been divided into three sub-division viz., Baran, Shahbad and Chhabra consisting altogether of seven tehsils.

District Baran
Headquater Baran
Area (km2) 6,955
Population(2011) 1,223,921
Division Kota
Official Website http://baran.rajasthan.gov.in

Tourist Places In Baran District

The district has a number of tourist destinations like Sitabari, Kakoni, Shahabad Fort, Shergarh Fort, Kanyadeah – Bilas garh, Brahmani Mataji Temple, Shahi Jama Masjid, Manihara Mahadevji Mandir, Kapildhara, Ramgarh – Bhand Devra and Tapasviyo ki Bagechi. It is also famous for Sitabari Fair.

Baran District Location

Baran’s North-Western and Northern boundaries are manned by Kota, Bundi and Jhalawar, Chittaurgarh forms its western borders.

Baran District Climate

Baran district has hot and dry climate during summers but winters has enjoyable climate. The mean daily maximum temperature is 42.6 degrees celsius and the mean daily minimum temperature is 29.7 degrees celsius.

Transportation In Baran District

The district is well connected to all district headquarters of the State. The total road length in the district was 1,491 kms as on 31 March 2000. The nearest airport is at Jaipur (239 kms). The Baran Railway Station is connected to major parts of the country by frequent trains. Trains for Bhopal, Jaipur, Jodhpur, and Kota are regularly available from this railway station.

 

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

स्वर्णगिरि के चारों ओर स्थित जालोर जिला अरब सागर के रेगिस्तानी तट पर धूप स्नान करती हुई उस मछली के समान प्रतीत होता है जिसने अपना मुख समुद्र में डाल रखा हो। सदियों से दूर सरकता हुआ समुद्र अपने पीछे दलदल का असीम विस्तार छोड़ गया है, जिसे आज नेहड़ के नाम से जाना जाता है।

जालोर (jalore)— ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

➤ महर्षि जाबालि की तपोभूमि होने के कारण जिले के प्रमुख नगर का नाम जाबालिपुर तथा कालान्तर में जालोर हुआ।
➤ यहां के प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय ने अपनी राज्य सीमाओं का विस्तार अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी (सिन्ध से बंगाल) तक किया।
➤ अपनी राष्ट्रभक्ति और आन-बान के लिए समरांगण में मर-मिटने वाले सोनगरा चैहानों ने परमारों से छीनकर इसे अपनी राजधानी बनाया।
➤ जिले के तीन प्रमुख नगरों-जालोर, भीनमाल तथा सांचोर पर प्राचीन क्षत्रियों के प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान, खिलजी, पठान, मुगल और राठौड़ राजवंशों ने शासन किया।
➤ स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व वर्तमान जालोर जिला तत्कालीन जोधपुर रियासत(मारवाड़) का एक भाग था।
➤ प्रशासनिक दृष्टि से यह तीन परगनों या हुकूमतों-जालोर, जसवंतपुरा तथा सांचोर मेें विभक्त था।
➤ 30 मार्च, 1949 को राजस्थान निर्माण के समय जोधपुर रियासत के साथ ही इसका राजस्थान राज्य में विलय हो गया तथा जोधपुर संभाग का हिस्सा बना।
➤ विभिन्न जिलों का निर्माण हुआ तब वर्तमान जालोर जिला अपने अस्तित्व में आया।

जालोर (jalore)— भौगोलिक स्थिति

➤ जालोर जिला राजस्थान राज्य के दक्षिण-पश्चिम भाग में 24.45’’5’ उत्तरी अक्षांश से 25.48’’37’ उत्तरी अक्षांश तथा 71.7’ पूर्वी देशान्तर से 75.5’’53’ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है।
➤ जिले का कुल क्षेत्रफल 10,564.44 वर्ग किलोमीटर है तथा राज्य का 3.11 प्रतिशत क्षेत्र घेरे हुए है।
➤ इस दृष्टि से राज्य में जिले का 13वां स्थान है।
➤ जिले की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बाड़मेर जिला, उत्तर पूर्वी सीमा पर पाली जिला, दक्षिण-पूर्वी सीमा पर सिरोही जिला तथा दक्षिण में गुजरात राज्य की सीमा लगती है।
➤ भूगर्भिक संरचना की दृष्टि से जिले का अधिकांश भाग चतुर्थ युगीन व अभिनूतन कालीन जमावों से आच्छादित है।
➤ ये जमाव वायु परिवहित रेत (बालु), नवीन कछारी मिट्टी, प्राचीन कछारी मिट्टी तथा ग्रिट के रुप में जिले के अधिकांश धरातल पर दृष्टिगोचर होते हैं।
➤ चट्टानों में मालानी ज्वालामुखीय तथा जालोर ग्रेनाइट प्रमुख हैं।
➤ भीनमाल तहसील के दक्षिण-पूर्वी भाग में जिले की सबसे ऊंची पहाड़ियां जसवंतपुरा की पहाड़ियां हैं।
➤ इसकी सबसे ऊंची चोटी सुन्धा 977 मीटर(3252) ऊंची है।
➤ यही इस जिले की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है।
➤ सम्पूर्ण जिला लूनी बेसिन का एक भाग है।
➤ अतः लूनी तथा उसकी सहायक जवाई, सूकड़ी, खारी, बाण्डी तथा सागी नदियां जिले के प्रवाह तन्त्र का निर्माण करती हैं।
➤ सभी नदियां बरसाती है।
➤ शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क जलवायु वाला जिला होने के कारण यहां वार्षिक एवं दैनिक तापांतर अधिक रहता है।
➤ वार्षिक वर्षा का औसत 43.4 सेन्टीमीटर है।
➤ जनवरी सबसे ठण्डा महीना होता है और न्यून्तम तापमान 1 या 2 डिग्री सेन्टीग्रेड से नीचे चला जाता है।
➤ मई-जून में तापमान सर्वाधिक ऊंचाई पर रहता है।
➤ औसत दैनिक उच्चतम तापमान 41 या 42 डिग्री सेन्टीग्रड रहता है।
➤ कुछ दिन तो तापमान 48 डिग्री सेन्टीग्रेड को भी पार कर जाता है।

जालोर (jalore)— तोपखाना

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➤ जालोर का तोपखाना वस्तुतः परमार राजा भोज द्वारा बनवाई गई संस्कृत पाठशाला है।
➤ यह धार की भोजशाला की अनुकृति जान पड़ती है जिसे सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला के नाम से जाना जाता है।
➤ ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कारणवश भोज इसका निर्माण पूरा नहीं करवा सका।
➤ रियासतकाल में इसमें जोधपुर राज्य की तोपें रखी जाती थीं और तब से इसका नाम तोपखाना पड़ा।
➤ इसी की अनुकृति जान पड़ता एक मन्दिर खण्डहर रूप में रानीवाड़ा के पास रतनपुर गांव में स्थित है।

जालोर (jalore)— सुन्धा मन्दिर

➤ अरावली पर्वत श्रृंखला में 1220 मीटर की ऊंचाई के सुन्धा पर्वत पर चामुण्डा देवी का प्रख्यात मन्दिर जालोर जिले का प्रमुख धार्मिक स्थल है।
➤ राजस्थान एवं गुजरात से लाखों यात्री प्रतिवर्ष इस मन्दिर में दर्शनार्थ आते हैं।
➤ यहां का वातावरण अत्यन्त रमणीय है। वर्ष भर झरना बहता है जिससे प्राकृतिक वनावलि की छटा देखते ही बनती है।
➤ कलात्मक ढंग से अंकित की गई विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां एवं मण्डप की कलाकृतियां पर्यटकों को देलवाड़ा के जैन मन्दिरों की याद दिलाती हैं।
➤ यहां स्थित सुन्धा अभिलेख भारतीय इतिहास का अनोखा दस्तावेज है।
➤ वस्तुतः प्रयाग का हरिषेण प्रशान्ति लेख या दिल्ली का महरौली स्तंभ लेख भारतीय इतिहास पर जितना महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है, उतना ही महत्वपूर्ण योगदान सुन्धा अभिलेख का भारतीय इतिहास के संकलन में रहा है।

जालोर (jalore)— भीनमाल का वराह मन्दिर

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Rajasthan Gk In Hindi Series 42

Rajasthan Gk In Hindi Series 41

Rajasthan Gk In Hindi Series 40 (400 Questions)

Rajasthan Gk In Hindi Series 39

➤ भीनमाल स्थित वराह श्याम का मन्दिर भारत के अति प्राचीन व गिने-चुने वराह श्याम मन्दिरों से एक है।
➤ यहां स्थापित नर वराह की मूर्ति जैसलमेर के पीले प्रस्तर से निर्मित है जो सात फीट ऊंची तथा अढ़ाई फीट चैड़ी है।
➤ मंदिर के बाहरी चैक में स्थान-स्थान पर भूमि की खुदाई से प्राप्त मूर्तियां स्थापित की गई हैं।
➤ इसमें भगवान श्याम की चतुर्भुज मूर्तियां पुरातात्विक महत्त्व की हैं, जो तत्कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास की अन्यत्र स्थानों से मिली जानकारियों की पुष्टि करती हैं।

जालोर (jalore)— आशापुरी मंदिर (मोदरा)

➤ समदड़ी-भीलड़ी रेल मार्ग पर महोदरी माता का अति प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
➤ मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती नामक भाग में भगवती दुर्गा का महोदरी अर्थात् बड़े पेट वाली नाम वर्णित है।
➤ यहां स्थापित मूर्ति लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन है। उत्तरी गुजरात के खेरालू नामक ग्राम के एक भाजक से प्राप्त कर स्थापित की गई है।
➤ विक्रम संवत् 1532 के एक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का प्राचीन नाम आशापुरी मंदिर था।
➤ जालोर के सोनगरा चैहानों की जो शाखा नाडोल से उठकर जालोर आई थी, आशापुरी देवी उनकी कुलदेवी थी।
➤ कहा जाता है कि आशापुरी देवी ने राम लक्ष्मण को स्वप्न में दर्शन देकर नाडोल का राज दिया था।
➤ इस बात की चर्चा मूथा नैणसी के ख्यात में है। यहां नवरात्रि के विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से लोग देवी के दर्शनों के लिए आते हैं।

जालोर (jalore)— सिरे मंदिर

➤ जालोर दुर्ग की निकटवर्ती पहाड़ियों में स्थित सिरे मंदिर नााि सम्प्रदाय के प्रसिद्ध जालन्धर नाथ की तपोभूमि है।
➤ वर्तमान मंदिर का निर्माण मारवाड़ रियासत के तत्कालीन शासक राजा मानसिंह ने करवाया था। ➤ अपनी विपत्ति के दिनों में उन्होंने यहां शरण प्राप्त की थी।
➤ यहां रत्नेश्वर महादेव, झालरा, जलकूप, भंवर गुफा, तालाब, भव्य हस्ति प्रतिमा, मंदिर का अभेद्या परकोटा, जनाना व मर्दान महल, भुल-भुलैया, चन्दर कूप आदि बड़े दर्शनीय एवं आकर्षक स्थल हैं

जालोर (jalore)— सेवाड़ा मंदिर

➤ रानीवाड़ा-सांचोर मार्ग पर अत्यन्त प्राचीन शिव मंदिर आज जीर्णशीर्ण अवस्था में है।
➤ शिल्पकला एवं कारीगरी में इसे भारत के किसी भी मंदिर के समकक्ष रखा जा सकता है।
➤ इस मंदिर को सर्वप्रथम खिलजी शासक ने दिल्ली से गुजरात जाते समय तोड़ा था।
➤ बाद में इस मंदिर का जीर्णाेद्धार करवाया गया।
➤ तेरहवीं शताब्दी में कराए गए जीर्णाेद्धार का शिालेख मंदिर में आज भी उपलब्ध है।
➤ बाद में पालनपुर के नवाब द्वारा भी इस पर आक्रमण कर इसे तोड़ा गया।
➤ आज यह ऊपर से लगभग आधा उतार हुआ प्रतीत होता है।
➤ मंदिर के चारों ओर कलात्मक खुदाई वाले प्रस्तर खण्ड बिखरे हुए है।

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जालोर (jalore)— जागनाथ महादेव

➤ प्राचीन आश्रम व्यवस्था का युगों के व्यतीत होने के बाद आज के युग में प्रतिनिधित्व करने वाले आश्रमों में से यह एक अत्यन्त मनोहर स्थान है।
➤ अरावली पर्वतमाला में बना यह आश्रम चारों ओर रेत के टीलों से घिरा हुआ है जो कि वर्ष भर बहने वाले झरने के लगभग चरणों में स्थित है।
➤ यह झरना मंदिर से कुछ ही आगे चलकर बालू रेत में विलीन हो जाता है।
➤ यहां स्थित शिवलिंग इतना प्राचीन है कि इसे श्वेत स्फटिक प्रस्तर पट्टिकाओं से ढक दिया गया है ताकि जलाघात से लिंग को बचाया जा सके।
➤ शिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।
➤ मंदिर की महत्ता के कारण यहां जागनाथ रेलवे स्टेशन भी स्थापित किया गया है।

जालोर (jalore)— आपेश्वर महादेव

➤ तेरहवीं शताब्दी में बना भगवान अपराजितेश्वर शिव मंदिर आज आपेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
➤ कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल में यहां रात्रि विज्ञाम किया था।
➤ इस कारण इस स्थान का नाम राम शयन पड़ा जो कालान्तर में बिगड़ कर रामसीन हो गया। ➤ यहां स्थापित शिव प्रतिमा पांच फीट ऊंची है और श्वेत स्फटिक से निर्मित है।
➤ आदिदेव भगवान भोलेनाथ समाधिस्थ मुद्रा में विराजित हैं, कंठ में मालाएं, कानों में कुण्डल, भुजाओं में बाजूबन्द, पैरों में नूपुर, कटि में नागपाश धारण किए हैं।
➤ समझा जाता है कि जीर्णाेद्धार कार्य के दौरान पुरातात्विक महत्व की कुछ मूर्तियां खण्डित हो गई जिनमें प्राचीन गणपति मूर्ति भी सम्मिलित है।
➤ मंदिर के बाई ओर गोमती कुण्ड नामक बावड़ी है जिसका जल खारा है।
➤ मंदिर में श्वेत-श्याम वर्ण की दो मूर्तियां स्थापित हैं जिन्हें कुछ लोग काले एवं भैरव तथा कुछ लोग ब्रह्मा एवं विष्णु की मूर्तियां बताते हैं।
➤ इन मंदिरों के अतिरिक्त किले की प्राचीर में स्थित सोमनाथ महादेव मंदि, जोगमाया का मंदिर, जालोर से कुछ दूरियों पर स्थित कानीवाड़ा हनुमानजी, स्वरूपपुरा महादेव मंदिर, संकराना का सोमनाथ मंदिर, भीनमाल के पास आडेश्वर महादेव का मंदिर और जिले का यत्र-तत्र स्थापित छोटे-बड़े अनेक शिवालयों के देखते हुए यहां की भूमि को शंकर-पार्वती की रमण स्थली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

जालोर (jalore)— जैन मंदिर

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Rajasthan Gk In Hindi Series 60

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➤ अत्यन्त प्राचीकाल से ही मण्डल जैन मत की साधना स्थली रहा है।
➤ कहा जाता है कि स्वयं भगवान महावीर इस क्षेत्र में पधारे थे।
➤ आठवीं शताब्दी के कुवलयमाला ग्रंथ से भी तत्कालीन जैन सम्प्रदाय की समृद्धि का परिचय मिलता है।

जालोर (jalore)— माण्डोली का गुरू मंदिर

➤ गुरूवर शान्ति सूरीश्वर का यह मंदिर भारत भर के जैन मतावलम्बियों के लिए अत्यन्त श्रद्धा एवं विश्वास का केन्द्र है।
➤ सम्पूर्ण रूप से श्वेत स्फटिक से निर्मित यह विशाल, भव्य एवं आकर्षक गुरु मंदिर जालोर जिले की अनुपम धरोहर है।
➤ प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहां गुरुवर के दर्शनों के लिए आते हैं।

जालोर (jalore)— नन्दीश्वर तीर्थ

➤ जालोर कचहरी परिसर के ठीक सामने स्थित नन्दीश्वर तीर्थ भी पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं के विशष आकर्षण का केन्द्र रहा है।
➤ मंदिर में बना कीर्तिस्तंभ कलात्मक दृष्टि से अनूठा है।
➤ मंदिर परिसर में स्थित विशाल धर्मशाला एवं भोजनशाला में तीर्थ यात्रियों के लिए आवास एवं भोजन की सुविधा उपलब्ध है।
➤ इनके अतिरिक्त भाण्डपुर का जैन मंदिर भी विख्यात एवं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र है।
➤ खगोल के प्रकाण्ड पण्डित ब्रह्मगुप्त इस जिले की महान विभूति थे जिन्होंने ब्रह्मस्फुट सिद्धन्त की रचना की थी।
➤ यमकालीन साहित्यकारों में मुनि कल्याण विजय, नैनमल जैन, रामेश्वर दयाल श्रीमाली, डा. देवदत्त नाग तथा लालदास राकेश के नाम उल्लेखनीय हैं।

जालोर (jalore)— हस्तकला

➤ जिलें में मिट्टी व लकड़ी के खिलौने बनाने की कला अपनी विकसित अवस्था में है।
➤ हरजी गांव में बने मिट्टी के सवार सहित घोड़े ‘मामाजी के घोड़े’ कहलाते हैं।
➤ ये लोक देवता के रुप में एक खुले चबूतरे पर स्थापित कर पूने जाते हैं।
➤ इसी प्रकार लकड़ी खिलौनों में विविध प्राचीन एवं नवीन अनुेकृतियां बनाई जाती हैं, जिनका निर्यात होता है। लकड़ी के खिलौने बनाने वाले कारीगरों की माली हालत अच्छी है।

जालोर (jalore)— शिवरात्रि मेला

➤ जालोर जिले में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर सिरे मंदिर, जागनाथ मंदिर, रामसीन स्थित आपेश्वर महादेव, ऊण ग्राम में ऊणेश्वर महादेव मंदिर आदि स्थानों पर धार्मिक मेलों का आयोजन होता है जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालु भक्तजन एकत्रित होते हैं। रामसीन में यह मेला सप्ताह पर्यन्त चलता है।

जालोर (jalore)— शीतला माता का मेला

➤ यह मेला वर्ष में एक बार चैत्र शुक्ला सप्तमी को जालोर, रणोदर, मूंगथलासिली आदि स्थानों पर आयोजित होता है।
➤ जालोर मुख्यालय पर आयोजित मेले में विभिन्न जाति की महिलाएं आंचलिक गीत गाती हैं।
➤ विभिन्न ग्रामों की टोलियां ढपली पर फागुन के मस्ताने गीत गाती हुई आती हैं।
➤ यह मेला जालेर से कोई 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शीतला माता के मंदिर पर आयोजित होता है। पारम्परिक वेशभूषा में ग्रामीणों का मेले के प्रति उत्साह देखते ही बनता है।

जालोर (jalore)— आशापुरी माताजी का मेला

➤ जालोर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित मोदरा ग्राम में प्रतिवर्ष होली के दूसरे दिन आशापुरी माताजी के मंदिर में मेला लगता है।
➤ श्रद्धालु ग्र्रामीणजनों ने जन सहयोग से मंदिर में नवनिर्माण के अनेक कार्य कराएं हैं, जिससे मंदिर की शोभा बढ़ गई है।

जालोर (jalore)— सुन्धा माताजी का मेला

➤ जिले के जसवन्तपुरा पंचायत समिति क्षेत्र में दांतलावास ग्राम के समीप स्थित पहाड़ियों के मध्य सुन्धा माता का मंदिर भक्तों का श्रद्धास्थल है।
➤ यहां पर वैशाख तथा भादों में शुक्ल पक्ष की तेरस से पूनम तक मेला लगता है तथा प्रति माह पूर्णिमा को भी मेले का सा वातावरण रहता है।

जालोर (jalore)— सेवाड़ियां पशु मेला

➤ रानीवाड़ा रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर आयोजित होने वाले इस पशु मेेलें में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में कांकरेज नस्ल के बैल एवं मुर्रा नस्ल के भैंसों का क्रय-विक्रय होता है।
➤ यह मेला चैत्र शुक्ला एकादशी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलता है जिसमें राजस्थान के अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा एवं गुजरात आदि राज्यों से व्यापारी आते हैं।

जालोर (jalore)— सांचोर का पशु मेला

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➤ संवाड़ियां पशु मेले के समय ही सांचोर में भी पशु मेला प्रारम्भ हो जाता है।
➤ मेले का आयोजन पंचायत समिति सांचोर द्वारा किया जाता है।
➤ यह पशु मेला राज्य स्तर का मेला है जिसमें समीपवर्ती प्रान्तों से भारी संख्या में पशु एवं व्यापारी भाग लेते हैं।
➤ मेले में पहुंचने के लिए रानीवाड़ा तक रेलमार्ग एवं रानीवाड़ा से सांचोर तक 47 किलोमीटर सड़क मार्ग की दूरी तय करनी पड़ती है।
➤ इस मेले में प्रतिवर्ष विभिन्न इकाइयों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम, फिल्म प्रदर्शन, आकर्षक प्रदर्शनी आदि का आयोजन किया जाता है।

जालोर (jalore)— पीरजी का उर्स

➤ ऐतिहासिक स्वर्णगिरि दुर्ग की सर्वोच्च चोटी पर मलिक शाह पीर के उर्स का आयोजन होता है जो धर्मिक एकता एवं हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के समन्वय का प्रतीक है।
➤ नाथ सम्प्रदाय के महन्त शंतिनाथजी द्वारा मलिकशाह पीर की मजार पर चादर चढ़ाने का निर्णय धार्मिक एकता का अद्वितीय प्रतीक है।
➤ इस अवसर पर आयोजित हुए जुलूस में हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों के सभी वर्गों के नर-नारी व बालक उत्साह से भाग लेते हैं।
➤ रात्रि मेें कव्वाली कार्यक्रम के साथ-साथ भगवान श्री राम, कृष्ण, शिव की अर्चना व मीरा के भजनों का गायन हिन्दू और मुस्लमानों में परस्पर आत्मीयता उत्पन्न कर देता है।

जालोर (jalore)— औद्योगिक परिदृश्य

➤ जालोर जिले में ग्रेनाइट, इमारती पत्थर, बजरी, चूना एवं ईट निर्माण हेतु मिट्टी आदि खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
➤ मांग एवं आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए जिले में आॅयल एक्सपैलर रिफाइनरी, लकड़ी फर्नीचर, लैदर-प्रोसेसिंग(बैग्स, पर्स, जूतियां) अगरबत्ती, आॅटो रिपेयर्स, आरा मशीन, प्लास्टर आॅफ पेरिस, ऊन प्रोसेसिंग मिल, टायर रिट्रेड़िंग, मसाला पिसाई, ईसबगोल पर आधारित प्रोसेसिंग तथा गोंद बनाने जैसे उद्योगों के विकास की पर्याप्त संभावनांए हैं।

जालोर (jalore)— ग्रेनाइट उद्योग

➤ पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर, जालोर, बाड़मेर, पाली तथा सिरोही जिलों में ग्रेनाइट उद्योग अत्यन्त विकसित अवस्था में है जिनमें जालोर जिला सबसे आगे है।
➤ इस पत्थर की आयल्स बनाने का काम सबसे पहले यहीं आरम्भ हुआ।
➤ भारत सरकार के भू सर्वेक्षण विभाग की एक रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद राजस्थान सरकार का ध्यान इस ओर गया। इस रिपोर्ट में ग्रेनाइट पत्थर के क्षेत्रों को दर्शाया गया था।
➤ वर्ष 1965 में राजस्थान सरकार ने खान एवं भू विभाग के माध्यम से एक ग्रेनाइट इकाई जालोर में स्थापित की जिसमें समस्त काम हाथ से होता था।
➤ वर्ष 1971 में इसे राजस्थान उद्योग एवं खनिज विकास निगम के अन्तर्गत लाया गया।
➤ इस संस्थान की प्रगति देखकर ही हजनी क्षेत्र इस ओर आकर्षित हुआ। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1987 में ग्रेनाइट उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया।
➤ आज जालोर जिले में ग्रेनाइट की 60-70 खानें कार्यरत है लगभग हर खान से निकलने वाला पत्थर अलग रंग तथा मजबूती लिए होता है।
➤ इनमें जालोर, नून, लेटा, पीजोपुरा, रानीवाड़ा, तवाब, खाम्बी, धवला, मेटाला तथा नब्बी की खानों का पत्थर अधिक लोकप्रिय है।
➤ पीलोपुरा खान का पत्थर सबसे मंहगा है जबकि दूसरे नम्बर पर गढ़ सिवाना आता है।
➤ ग्रेनाइट का भाव 40 रुपये प्रति वर्ग फुट से लेकर 150 रुपये प्रति वर्ग फुट तक होता है।
➤ जालोर जिला मुख्यालय की 40 किलोमीटर की परिधि में लगभग सभी रंग के ग्रेनाइट चट्टानें उपलब्ध हैं। फिर भी काला रंग दक्षिण से ही प्राप्त होता है।
➤ वहां से इसके ब्लाॅक्स लाकर जालोर में इनके कटिंग, पाॅलिशिंग का कार्य किया जाता है।

जालोर (jalore)— जूती उद्योग

➤ जिले की भीनमाल पंचायत समिति में जूती उद्योग काफी विकसित है।
➤ यहां की जूतियां राज्य से बाहर निर्यात की जाती हैं, जिनसे अच्छी खासी आमदनी यहां के कारीगरों को प्राप्त होती है।
खेसला उद्योग
➤ जिला मुख्यालय के निकट स्थित लेटा ग्राम में हथकरघा आधारित खेसला उद्योग काफी उन्नत अवस्था में है।
➤ यहां के स्थानीय कारीगर बड़ी सफाई से पक्के रंगों वाली सूती खेस बनाते हैं, जिंन्हे बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त होती है।

जालोर (jalore)— विशिष्ट कृषि उपज

➤ राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र में होने वाली सामान्य फसलों के अतिरिक्त तीन विशिष्ट फसलों के रुप में जिले के कृषक सफलतापूर्वक उगाते हैं।
➤ लगभग 15 हजार हैक्टर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है, जिससे लगभग एक लाख टन सरसों का उत्पादन होता है।
➤ जीरे की खेती लगभग 70 हजार हैक्टर में की जाती है जिससे लगभग 30 हजार टन जीरा उत्पन्न होता है।
➤ पूरे देश का 40 प्रतिशत ईसबगोल जिले में पैदा होता है। यह एक औषधीय फसल है।
➤ लगभग 40-45 हजार हैक्टर में ईसबगोल बोया जाता है तथा 25-30 हजार टन ईसबगोल प्राप्त होता है जिससे करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
➤ सब्जी की फसलों में टमाटर तथा फलों में बेदाना अनार जिले की विशिष्ट फसलें हैं।

jalore District GK in Hindi जालोर जिला Rajasthan GK in Hindi

Jalore: History, Geography, Places

Location, Area & Administration of Jalore:

Jalore district situated in the south western part of Rajasthan, formed out of the erstwhile Jodhpur state after independence. This district is situated between 24.48″ 5′ to 25.48″ 37′ North Latitude and 71.7′ to 75.5″ 53′ East Longitude. The North Western border of Jalore is shared with Barmer, North Eastern boundary is shared with Pali, towards South East lies Sirohi  and in south state of  Gujarat is in contact.

The total area of the district is 10,640 Sq. KMs, which is 3.11% of the State. The district is divided into 7 tehsils of Jalore, Ahore, Bhinmal, Raniwara, Sanchore, Sayla, Bagoda, Bhadrajun, Chitalwana.
Jalore

History of Jalore:

According to mythology, Jalore was called as ‘Drumkulya’ , which stood for the northern part of southern Ocean.  Jalore’s old name was Jabalipur named after a saint- Mahirishi Jabali. By the passage of time the name of mountain Kanchangiri & Swarngiri were also frequently used as names of Jalore.

Prathihar king VatsaRaja was the ruler of Jalore during 8th century.

Towards the end of 12th Century,  Parmars ruled here. Historians believe that the Jalore fort was built by Parmar rulers. It is known from a stone inscription of 1238 A.D. of fort that Parmar King Biral’s-queen Maludevi powered Gold win on Sindhu King.

Nadol king, Arhan’s, youngest son Kirtipala started Chouhan tradition in Jalore. The Chauhan lineage of Jalore is as under:

  • Kirtipala (c. 1160-1182 CE)
  • Samara-simha (c. 1182-1204 CE)
  • Udaya-simha (c. 1204-1257 CE)
  • Chachiga-deva (c. 1257-1282 CE)
  • Samanta-simha (c. 1282-1305 CE)
  • Kanhada-deva (c. 1292-1311 CE)
    • Wrote Kanha-Prabhandha: Epic elaborating war between Kanha Dev & Alaudin Khilji.

Subsequent Rulers:

  • Rathore king Rao Maldev ruled the fort of Jalore in 15th Century.
  • During Akbar’s rule, Abdul Rahim Khan Khana took it infinitely from Gazni Khan.King.
  • Jehangir built the walls of the fort.
  • After the death of Aurangzeb it permanently became a part of Jodhpur.

Historical Places of Jalore:

Jalore Fort:jalore-fort

Jalore Fort is one of the nine castles of the Maru’, under the Paramaras in the 10th century. It  has been known through history as the Sonagir or the ‘golden mount’. The precise year of its construction is not known however it is believed to be built between the 8th and 10th centuries. Jalore fort is located atop a steep and perpendicular hill 336m high, fortified with a wall and bastions with cannon mounted upon them. The fort has four gigantic gates and is approachable only from one side, after a two-mile long serpentine ascent.

Topekhana:

Topekhana or “the cannon foundry” was built by “Ujjain King” Vkramditya as a “sansrut Pathshala” for education for his public. Later, Muslin Emperor Ala ud din Khilji converted it into a Muslim monument. The structure is imposing, with a spacious forecourt and an intricate facade. The colonnade and the ceiling have been tastefully carved.

Sundha Mata:s1

Sundha Mata temple is about 900 years old temple of Mother goddess situated on a hilltop called ‘Sundha’. At 1220 m height in the Aravalli ranges there on Sundha mountain is temple of goddesses Chamunda Devi, a very sacred place for devotees.

Dances of Jalore:

Dandiya Dance:dandiya

This dance start after holi and continues for many days. In the middle of stage the shehnai players, Nagada beaters and singers sit and male Singer sings ‘Folk Lori’ in lengthy song. Dances beating their sticks together dances parallel with this dance various Dhamal & dance oriented holi songs are sung.

Jalore Dhol Dance:

dholThis dance is performed on the occasion of marriage by mali, Dholi, Sargaras and people of Bhil Communities. It is predominantly a male dance and  at start leaders beat drum in ‘Thakna Shaili’. As soon as thakna ends some dancers puts swords in mouth, some with lathis and others taking handkerchief in hands rest only manage body thus the dance starts. Sargaras & Dholis are professional folk singer & drum beaters who are very proficient in the art.

Gair Dance:

gairThis also also involves male, who take long sticks and dances around. Dancers are called ‘Gairiya’. This dance start next day from holi and lasts fifteen days. Drums, Baakiya and Plate(Thaali) are used for playing music. Folk songs influenced by. “Shringar Ras” & “Bhakti Ras” are also used in this dance. Dancers wear white clothes from shoulder to waist, leather belt is tied, there is also a place for keeping sword in it, frills are tied on the turban.

Crafts of Jalore:

  • Handloom work is done at Leta, Jelatara, Degaon, Pur, Vodha, Vasandevda, Lalpura, Bhatip, Khara, Gundau.
  • Bhinmal is famous for its Leather traditional footwear (Juti)

Geography of Jalore:

Physiographically, the district is oblong in shape, extending up to Rann of Kutch (Gujarat). The region is generally plain but for some scattered thickly wooded hills in the north and some hillocks in the centre. The eastern portion of the district is rocky while the western tract is a roughly plain dotted with Sand dunes & sand ridges.

In respect of its geological formation, most part of district is formed of fourth century modern century deposits. These deposits can be seen in Grid pattern formed by sand (Balu), new alluvial and old alluvial Soils. In Bhinmal Teshil’s South Eastern part of Jaswantpur, highest mountains of the district are situated. the highest peak is Sundha (991 meters, 3252 feet).

Luni is the main river in the district with its tributaries Jawai, Sukdi, Khari, Bandi and Sagi.  All the rivers are seasonal.

Natural Places of Jalore:

Sundha Mata Wildlife Sanctuary:sundha-mata

Sundha Mata wildlife sanctuary has an area of 107 square kilometers and is located in jawai forest area. The Sanctuary has Sloth Bear, Nilgai, jungle cat, Desert fox, striped hyena, hanuman langoor, Vulture, owl, Indian porcupine, rock &jungle Bush Quail & Spotted dove and 120 species of birds.

Natural Resources/Minerals of Jalore:

The following are the rocks and mineral resources of Jalore district:

Fluorspar

  • Fluorspar is an important industrial mineral and is the only major source of fluorine.
  • It is chiefly used in the manufacture of hydrofluoric acid, as a flux in steel making, as an opacifier and flux in the ceramic industry.
  • Fairly large deposits of fluorspar have been discovered near village Karada of Tehsil Bhinmal.
  • The main activities of mining are located at Krisna hill, Rekha hill & Santoshi hills.

Granite

  • The granite rocks belong to the Malani System of rocks.
  • The Siwana and Jalor granites provides rocks of high fassinating colours ranging from flesh to pink and light colors .
  • The main activities of mining are located at Khambi, Kavala, Tayab, Bala, Raniwara Khurd etc.

Clay

  • Clay occurrence has bee reported near village Bhadrajun and  Pal.

Saltpetre

  • Village Kanwla in Tehsil Ahor has deposits of saltpetre.
  • Saltpetre which is used for local pottery and fire works and ammunitions industry.

Gypsum

  • Gypsum deposits are located near Ramsin, chawarda in Ahor Tehsil and at number of places in Sanchore Tehsil.
  • Other small deposits are located near Vediya, Chittarwana, Sewada, Hemagura and Haryali area.

Other Minerals:

  • Besides above, building stones and masonary stones, Bajri etc. have been produced in the district for local use since long back.
  • Dolomitic marble is known to occur near village Rupi, 9.5 Kms. south west of Bhinmal.
  • Minor occurrences of graphite and feldspar has also been found in the east of Bhinmal town.

Population:

  • According to the 2011 census Jalore district had a population of 18,30,151.
  • Its population growth rate over the decade 2001-2011 was 26.31%.
  • The district has a population density of 172 inhabitants per square kilometer.

 

jalore District GK in Hindi जालोर जिला Rajasthan GK in Hindi

 

Jalore Fort:

Jalore Fort is the main attraction of Jalore, a town in the Indian state of Rajasthan, one of the nine castles of the Maru’, under the Paramaras in the 10th century. It is one of the most famous and impressive forts in the state and has been known through history as the Sonagir.
Nestled atop a hill nearly 1200 ft in height, the entry gate can only be be reached though a serpentine ascent of around two-miles up the hill. The fort features four gates – Suraj Pol, Dhruv Pol, Bal Pol and Siroh Pol. The typical construction of the Suraj Pol helps the first rays of the rising sun enter through its gateway. The major residential palace inside the fort is now deserted, with only its ruins left to view. The Topekhana or the canon foundry is the most vital structure of the fort. It was built by Ala-ud-din Khilji in the 14th century. A few mosques are found inside the fort, which are believed to be built using the remnants of 84 Hindus and Jain temples. Presently, this fort belongs to the State Government’s archaeological department and has been declared as a protected building since 1956.

Jalore Mahotsav 2018

will be held from 15th February to 17th February 2013 at Jalore stadium in Jalore district of Rajasthan. Jalore Mahotsav showcase the culture of Jalore and the best of the things Jalore district has to offer. Handicrafts, cattle, crops, plants, wild life, dance forms, Academic seminars, singing & dancing, village-life, sports, youth career guidance ,cultural programmes, trade fair, food-stalls,sports for all age-groups, Kavi sammelan, artificial rock-climbing etc.

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