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एक थी नीना। थोड़ी भोली, थोड़ी-सी बुद्धू और थोड़ी-थोड़ी पगली।

एक दिन वह घर में किसी को बिना बताए जंगल में घूमने गई। उसे छोटे-छोटे खरगोश बहुत अच्छे लगते थे। थोड़ी-देर खेलने के बाद वह थक गई। जंगल में एक छोटी-सी नदी थी।

नीना नदी के किनारे पर आकर बैठ गई। उसने पानी में अपनी परछाई देखी और बोली वह नीना, तुम कितनी प्यारी हो। अपने-आपसे बातें करते-करते वह सो गई।

उसे पता ही नहीं चला की वह कहाँ सो रही है। जब उसकी नींद खुली तो अँधेरा हो गया था।

उसने पानी में झाँका। वहां कोई परछाई ही दिखाई नहीं दी। उसने फिर देखा, पर अँधेरे के आलावा कुछ नजर नहीं आया। वह घबराकर बोली, अरे मेरी परछाई पानी में दिखाई नहीं दे रही है, इसका मतलब क्या हुआ ? मैं यहां हूँ भी या नहीं ?

उसने सोचा कि वह घर जाकर पता करेगी।

अपने घर पहुंचकर उसने बाहर से आवाज लगाई, नीना घर पर है क्या ?

नीना किसी को भी बताकर नहीं गई थी। इसलिए उसकी मम्मी को पता नहीं था कि वह कहाँ है। उसकी मम्मी बोली अपने कमरे में सो रही होगी।

तन बाहर खड़ी नीना ने सोचा, अगर नीना घर में सो रही है तो मैं कौन हूँ ?

इसका मतलब है मैं नीना नहीं हूँ……… हे भगवान, कौन हूँ मैं…… कौन हूँ….. कौन हूँ ?

ऐसा कहते-कहते नीना वापिस जाने लगी। वह तो अच्छा हुआ कि तभी नीना की मम्मी ने दरवाजा खोलकर देखा। वह बोली, अरे नीना, तू बाहर क्यों खड़ी है ? बिना बताए तू कहाँ गई थी। मई तो सोच रही थी तू अपने कमरे में है।

नीना ने देखा माँ उसे पहचानकर अपने पास बुला रही है। तब उसकी जान-में-जान आई। अगर माँ बाहर न आती तो क्या होता ?

नीना को कौन बताता कि वह कौन है ? हो जाती न गड़बड़।

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