उत्तर प्रदेश का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान (Contribution to Uttar Pradesh’s Indian Independence) UP GK in Hindi

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उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) प्राचीन काल से ही भारतीय राजनीति एवं शासन सत्ता का केन्द्र बिन्दु रहा है। भारतीय इतिहास में उत्तर प्रदेश का महत्त्वपूर्ण योगदान है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश के बिना भारतीय इतिहास की कल्पना अधूरी है। इलाहाबाद, आगरा, फतेहपुर सीकरी, कन्नौज आदि विभिन्न कालों में विभिन्न राजाओं की राजधानी रही है। इन प्रदेश के निवासियों ने सदैव ही कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इसी प्रकार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (Freedom Struggle) के विभिन्न आन्दोलनों में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का योगदान अवस्मिरणीय है।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका रही हैं। सन् 1857 में हुए प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन की शुरूआत उत्तर प्रदेश से ही हुई जिससे भारतीय इतिहास काफी प्रभावित हुआ तथा भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त हुआ।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में सन् 1857 ई० के विद्रोह की शुरुआत मेरठ से हुई। इस आन्दोलन के माध्यम से आजादी की क्रान्ति का जो बिगुल बजा उसमें योगदान हेतु उत्तर प्रदेश की समस्त जनता उत्साहित थी। उत्तर प्रदेश की जनता अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की आर्थिक शोषण नीति से पहले से ही दुःखी थी, बाद में अंग्रेजों द्वारा देश की राजनीति में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया गया। सन् 1840 एवं 1853 के मध्य झाँसी, जालौन एवं हमीरपुर के राजा की बिना उत्तराधिकारी घोषित किए मृत्यु हो गई, तब डलहौजी की विलय-नीति के अनुसार उनके राज्य भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में सम्मिलित कर लिए गए जिससे स्थानीय जनता में काफी रोष व्याप्त था।uttar pradesh general knowledge book in hindi

जब 1856 में अवध को ब्रिटिश शासन में मिला लिया गया तब उत्तर प्रदेश में उमड़े जनाक्रोश ने विस्फोटक रूप ले लिया, जिसकी परिणति सर्वप्रथम 10 मई, 1857 को मेरठ में हुए विद्रोह से हुई। जब अंग्रेजी सेना में सर्वप्रथम सैनिक महाविद्रोह आरंभ हो गया बाद में यह सैनिक विद्रोह शनैः-शनैः प्रदेश के झांसी, कालपी, कानपुर, लखनऊ, बिठूर, अवध, वाराणसी, बलिया एवं आजमगढ़ आदि स्थानों में फैल गया।
23 मई  – को इटावा व मैनपुरी,
25 मई  – को रुड़की (वर्तमान उत्तराखण्ड में) में,
27 मई  – को एटा में,
30 मई को  – मथुरा एवं लखनऊ,
31 मई को  – बरेली एवं शाहजहाँपुर में,
1 जून को  – मुरादाबाद व बदायूँ,
3 जून को  – आजमगढ़ एवं सीतापुर,
4 जून को  – जालौन, मौहमदी, वाराणसी एवं कानपुर,
6 जून को  – झाँसी व इलाहाबाद,
7 जून को  – फैजाबाद,
9 जून को  – दरियाबाद एवं फतेहपुर,
18 जून को  – फतेहगढ़,
1 जुलाई को  – हाथरस आदि स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गये।
अंग्रेजी सेना द्वारा भी विद्रोह के दमन का यथासम्भव प्रयास किया गया जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में अनेक वीर स्वतन्त्रता सेनानियों का उदय हुआ जिनमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बिठुर के नाना साहब एवं तात्यां टोपे एव उनके सहायक अजीमुल्ला खाँ व अवध की बेगमें, राणा बेनीमाधव एवं मौलवी अहमदुल्ला शाह आदि मुख्य थे।

यद्यपि सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत मेरठ से हुई थी, लेकिन इस विद्रोह का सर्वाधिक बड़ा केन्द्र कानपुर बना, जहाँ नाना साहब के दत्तक पुत्र को अंग्रेजों ने मान्यता देने से इनकार कर दिया था। तब धोन्धू पन्त के नेतृत्व में नाना साहब एवं उनके दत्तक पुत्र बाजीराव द्वितीय, तात्यां टोपे आदि ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कानपुर में अंग्रेज अफसर को मार दिया 4 मई – 25 मई, 1857 तक चले इस संघर्ष में नाना साहब की सेना की विजय हुई तथा 30 जून 1857 को उन्हें बिठूर का पेशवा बना दिया गया।

कानपुर के बाद यह संघर्ष प्रदेश के दक्षिण में स्थित झाँसी में पहुँच गया जहाँ पर रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोह का नेतृत्व किया। 5-8 जून के मध्य यह संग्राम पूरे झाँसी में फैल गया। अंग्रेजी अफसरों पर हिंसक हमले किए गए।

झांसी से यह संग्राम बरेली पहुंचा जहाँ रोहिला शासक खान बहादुर खान के नेतृत्व में शुरू हुआ जिन्होंने अंग्रेजी सेना को हरा कर स्वयं को वहाँ का शासक घोषित किया। लगभग एक वर्ष रोहिलखण्ड अंग्रेजी शासन से मुक्त रहा। 18 जून, 1857 को फतेहगढ़ छावनी में हुए विद्रोह के उपरान्त नवाब तफज्जुल हुसैन खान ने स्वयं को फर्रुखाबाद का शासक घोषित किया।

मई माह में अवध अपेक्षाकृत शान्त रहा, लेकिन माह के अन्तिम दिन यहाँ भी विद्रोह की शुरूआत हो गयी जिसके फलस्वरूप अवध में उपस्थित अंग्रेज अफसरों को भागना पड़ा। इस विद्रोह का प्रारम्भ तब हुआ जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह की मृत्यु के बाद उसकी विधवा रानी बेगम हजरत महल ने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का शासक घोषित कर दिया। अनेक जमींदारों तथा ताल्लुकदारों ने इस समारोह में भाग लिया, परन्तु अंग्रेजों ने डलहौजी के द्वारा प्रतिपादित विलयीकरण की नीति के अन्तर्गत अवध को अपने अधीन कर लिया तथा उसे अपनी रेजीडेन्सी घोषित कर वहाँ पर अंग्रेज रेजीडेन्ट अफसर की नियुक्ति कर दी। ऐसी स्थिति में अवध की रानी तथा जनता में रोष फैलना स्वाभाविक था। फलस्वरूप 30 जून, 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध यहाँ पर भी विद्रोह प्रारम्भ हो गया। अवध शहर से 15 किलोमीटर दूर स्थित चिनाहट में अंग्रेजी रेजीडेन्ट हेनरी लॉरेन्स ने इस विद्रोहियों को हराने का प्रयास किया, लेकिन अवध की बेगम हजरत महल एवं फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला के नेतृत्व में स्वतन्त्रता संग्रामियों ने अंग्रेजी सेना को हरा कर दिया। रेजीडेन्ट हेनरी लॉरेन्स को वापस लौटना पड़ा। इस स्थिति को देखकर इलाहाबाद से जनरल हैव लॉक को हेनरी लॉरेन्स की मदद के लिए भेजा गया, लेकिन अपने प्रथम प्रयास में वह भी असफल रहा। जुलाई एवं अगस्त में अवध अंग्रेजों के नियन्त्रण से बाहर रहा, लेकिन 25 सितम्बर, 1857 को जनरल हैव लॉक एवं आउट्रॉम ने पुनः अवध पर आक्रमण कर दिया। अन्ततः 6 दिसम्बर, 1857 को सर कोलिन कैम्पवेल के निर्देशन में अवध पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया। जब नाना साहब के चचेरे भाई राव साहब एवं तात्या टोपे को अंग्रेजों ने हरा दिया। इसी माह में फतेहगढ़ पर भी अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया। वर्ष 1858 के आरम्भ में ही अंग्रेजों ने नेपाल से गोरखाओं को युद्ध हेतु भारत भेजना आरम्भ कर दिया तथा लखनऊ पर आक्रमण कर गोरखा सेना की मदद से 21 मार्च, 1887 को उस पर पूर्णरूपेण अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। विद्रोहियों की सेना को अवध की ओर खदेड़ दिया गया।uttar pradesh general knowledge book in hindi

जब अंग्रेजों ने अवध, लखनऊ, फतेहगढ़ एवं कानपुर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तब उन्होंने प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित झाँसी की तरफ ध्यान दिया, क्योंकि सन् 1857 के विद्रोह में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सेना का जमकर सामना किया था तथा अपनी वीरता एवं कुशल नेतृत्व के बल पर अंग्रेजों को उस क्षेत्र से बाहर खदेड़ दिया था। 1 अप्रैल, 1858 को सर ह्यूज रोज के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने तात्याँ टोपे को हरा दिया। 7 मई, 1858 को बरेली एवं रोहिलखण्ड पर भी अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया हालांकि उन्हें इन स्थानों को हस्तगत करने में मोहमदी के मौलवी अहमद उल्ला के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा था।

1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख व नेतृत्वकर्ता केन्द्र नेतृत्वकर्ता

केन्द्र नेतृत्वकर्ता
लखनऊ बेगम हजरत महल
फैजाबादup gk in hindi 2018 मौलवी अहमदुल्लाह
कानपुर नाना साहेब
काल्पी तात्या टोपे
बरेली खान बहादुर खान
मथुरा देवी सिंह
झाँसी रानी लक्ष्मीबाई
मेरठ कदम सिंह
इलाहाबाद लियाकत अली

जब स्वतन्त्रता संग्रामियों की हर जगह पर पराजय होने लगी। उनकी सेना एवं हथियारों को भी काफी क्षति पहुँची तथा ब्रिटिश फौजों ने संगठित होकर विद्रोहों को दबाना शुरू कर दिया तब विद्रोहियों ने गुरिल्ला युद्ध की शुरूआत की तथा जंगलों में छिपकर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी अफसरों पर आक्रमण करने लगे। 1 जून, 1858 को झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई एवं तात्याँ टोपे ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया। इसे दबाने हेतु कालपी से सर सुरोज को आना पड़ा। रानी ने काफी वीरता से ब्रिटिश फौजों का सामना किया। अंततः युद्ध में लड़त-लड़ते 17 जून को वह वीरगति को प्राप्त हो गई। प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की एक वीर योद्धा एवं कुशल सेनापति का अन्त हो गया जिससे सन् 1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों को काफी मदद प्राप्त हुई। विद्रोह के अन्य कर्णधार बेगम हजरत महल, नाना साहब एवं बाला साहब ब्रिटिश फौजों का सामना न कर पाये और नेपाल की सीमा के पास छिप गए जहाँ पर लॉर्ड क्लायड के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों ने उन्हें नेपाल की सीमा में शरण लेने हेतु मजबूर कर दिया। फिर भी इन स्वतन्त्रता सेनानियों का उत्साह अपूर्व था तथा उनके संघर्ष ने अंग्रेजी सेना के पुनः संगठित करने की ओर एकाएक ब्रिटिश शासकों का ध्यान आकर्षित किया। 30 दिसम्बर, 1858 तक फर्रुखाबाद के नवाब तफज्जुल हुसैन, मेंहदी हसन आदि की सेनाओं ने भी ब्रिटिश फौजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया

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उपर्युक्त सभी विद्रोहों से अलग हटकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुँवर सिंह द्वारा किया गया विद्रोह था जब उसने 26 मार्च, 1858 को ब्रिटिश कर्नल मिलमैन को आजमगढ़ में हरा कर मिर्जापुर, बाँदा, आजमगढ़ आदि पूर्वी उत्तर प्रदेश के भागों पर अपना कब्जा कर लिया। कुँवर सिंह की वीरता एवं कुशल युद्ध कौशल का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह अपनी मुट्ठी भर सेना के साथ 15 अप्रैल तक ब्रिटिश फौजों से जमकर टक्कर लेता रहा, लेकिन उसने हार न मानी। अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते कुँवर सिंह 9 मई, 1858 को वीरगति को प्राप्त हो गया। तब कहीं जाकर अंग्रेज इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा पाए। इसके साथ ही स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम का अन्त हो गया। इस प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में आमूल परिवर्तन किया। जिन लोगों ने विद्रोह को दबाने में सरकार का साथ नहीं दिया था उन्हें सैनिक तथा अन्य सरकारी नौकरियों के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया तथा शासन का पुनः संगठन किया। सन् 1861 में सागर एवं नर्मदा के जिलों को उत्तर प्रदेश से अलग कर दिया गया। धीरे-धीरे दिल्ली, अजमेर एवं मारवाड़ को भी पृथक कर दिया गया। फिर बाकी बचे क्षेत्र को सन् 1902 में पुनर्गठित कर ‘आगरा एवं अवध का संयुक्त प्रान्त’ नाम दिया गया। सन् 1919 में इस प्रान्त का शासक गवर्नर कहलाने लगा। इसके उपरान्त इस संयुक्त प्रान्त से आगरा एवं अवध नामों को हटाकर केवल ‘संयुक्त प्रान्त’ नाम ही रहने दिया।

 

स्वतन्त्रता आन्दोलन का द्वितीय चरण

सन् 1857 में देश के विभिन्न भागों में हुए संगठित एवं असंगठित विद्रोहों को देश की स्वतन्त्रता के आन्दोलन का प्रथम चरण माना जाता है। इसके उपरान्त इस दिशा में किये गये प्रयासों को इस आन्दोलन का द्वितीय चरण माना जाता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के इस चरण में भी उत्तर प्रदेश की क्रान्तिकारी परम्परा पहले की भाँति कायम रही। इस चरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज़ अधिकारी श्री ए० ओ० ह्यूम के प्रयासों से हुई। श्री झूम उस समय उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के कलेक्टर थे। कांग्रेस की स्थापना के बाद स्वतन्त्रता आन्दोलन की अधिकांश घटनाएँ इसी के इर्द-गिर्द सम्पन्न हुईं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम बैठक में प्रवेश से सम्मिलित होने वाले प्रमुख नेताओं में पं० मदन मोहन मालवीय एवं अवध के निकट स्थित कालाकांकर की रियासत के राजा रामपाल सिंह थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश में पं० मोतीलाल नेहरू, मौलाना शौकत अली, मौलाना मुहम्मद अली, तेजबहादुर समू, पुरुषोत्तम दास टण्डन, सी० वाई० चिन्तामणि, गणेश शंकर विद्यार्थी, पं० गोविन्द बल्लभ पंत, रफी अहमद किदवई, आचार्य नरेन्द्र देव, सम्पूर्णानन्द, पं० जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री आदि अनेक राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख नेताओं का उदय हुआ जिन्होंने केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देश में चल रहे स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन का नेतृत्व किया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध किये गये असहयोग आन्दोलन एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन में इस प्रदेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। 1 जून, 1920 को प्रदेश के हिन्दू एवं मुस्लिम नेताओं की एक बैठक इलाहाबाद में हुई जिसमें केन्द्रीय खिलाफत कमेटी द्वारा पारित असहयोग आन्दोलन को चलाये जाने की पुष्टि की गयी। इस सभा में महात्मा गाँधी, लाला लाजपत राय, पं० मोतीलाल नेहरू, तेजबहादुर सपू, वी० सी० पाल, सत्यमूर्ति, महामना मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचरी, पं० जवाहरलाल नेहरू एवं चिन्तामणि जैसे प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया था। इस प्रस्ताव के पारित होने के पश्चात् देशभर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विभिन्न स्तरों पर असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया गया जिसका उद्देश्य शान्तिपूर्वक विरोध कर अंग्रेजों को उनकी नीतियों के कारण जनसाधारण में उत्पन्न रोष से अवगत कराना था। यह असहयोग आन्दोलन उस समय अपनी चरम स्थिति में पहुँच गया जब महात्मा गाँधी ने 7000 व्यक्तियों की मदद से गुजरात में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरूआत की, लेकिन तभी 5 फरवरी, 1922 को प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित चौरी-चौरा नामक स्थान पर इस आन्दोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया जिसमें आन्दोलनकारियों ने पुलिस थाने को आग लगाकर ब्रिटिश पुलिस के 22 अफसरों एवं सिपाहियों को जान से मार दिया था। ऐसी स्थिति देखकर महात्मा गाँधी ने आन्दोलन को तुरन्त स्थगित करने का निर्देश दिया, क्योंकि वे असहयोग आन्दोलन को किसी भी स्थिति में हिंसक रूप धारण नहीं करने देना चाहते थे। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारतीय जनता द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया यह प्रथम संगठित अहिंसक आन्दोलन था जिसमें उत्तर प्रदेश अग्रणी राज्य बनकर रहा था फिर भी प्रदेश में कई स्थानों पर हिंसा की वारदातें हुई थीं, क्योंकि जनमानस में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध तीव्र असन्तोष व्याप्त था तथा वह किसी भी प्रकार से ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना चाहती थी। रायबरेली एवं फैजाबाद जिले में जनता ने अविवेकपूर्ण ढंग से लगाये गए करों का विरोध किया एवं जमींदारों के विरुद्ध हिंसक व अहिंसक आन्दोलन चलाया। 2 से 7 जनवरी के मध्य पुलिस व जनता के बीच मुन्शीगंज जेल में संघर्ष हुआ जिसमें दस हजार से भी अधिक स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों ने पुलिस से संघर्ष किया। इसके उपरान्त बद्द खान में दंगा हुआ जहाँ पर अनेक सिपाहियों को मार डाला गया। इसी आन्दोलन के समय फैजाबाद के गोसाईगंज नामक स्थान पर हजारों लोगों ने रेलवे लाइन पर धरना दिया। इस पर पुलिस को गोली चलानी पड़ी। रायबरेली के आस-पास इतनी अधिक उल्लेखनीय घटनाओं का कारण जमींदारों तथा ताल्लुकेदारों द्वारा किसानों एवं जनता का बुरी तरह शोषण किया जाना था तथा जनता किसी भी तरह इस जमींदारी व्यवस्था को बदलना चाहती थी। फलस्वरूप पण्डित जवाहरलाल नेहरू तथा रफी अहमद किदवई के नेतृत्व में इस प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर कई बार बड़े आन्दोलन किये गये। सन 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के द्वितीय चरण में इसने काफी जोर पकड़ लिया लेकिन महात्मा गाँधी एवं इरविन के मध्य हुए समझौते के उपरान्त यह आन्दोलन पुनः स्थगित कर दिया गया। सन् 1921 से 1930 के मध्य उत्तर प्रदेश के अनेक क्रान्तिकारी नेताओं का उदय हुआ, फलस्वरूप यहाँ पर काकोरी षड्यन्त्र केस, मेरठ षड्यन्त्र केस, मैनपुरी षड्यन्त्र केस तथा बनारस षड्यन्त्र केस आदि हुए। तत्कालीन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन सेना के सेनानी चन्द्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश पुलिस को काफी परेशान कर रखा था। फलस्वरूप इलाहाबाद के निकट एल्फ्रेड पार्क में वीर चन्द्रशेखर आजाद ब्रिटिश पुलिस कप्तान नॉट बाबर तथा पुलिस दल से संघर्ष करते हुए अमर शहीद हो गये।

महात्मा गांधी के प्रथम राउण्ड टेबल कॉन्फ्रेन्स में लन्दन चले जाने के पश्चात् पं० जवाहरलाल नेहरू एवं पुरुषोत्तम दास टण्डन ने जनसाधारण एवं किसानों को विभिन्न ब्रिटिश कानूनों से हो रही परेशानी से सरकार को अवगत कराया लेकिन सरकार ने उनकी माँगें रद्द कर दी। इस पर नेहरूजी ने अहिंसात्मक आन्दोलन आरम्भ कर दिया तब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में बन्द कर दिया। बाद में प्रथम राउण्ड टेबल कॉन्फ्रेंस के अन्तर्गत हुए समझौते पर उन्हें रिहा कर दिया गया।

पं० जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में आरम्भ किया गया। द्वितीय किसान आन्दोलन ने स्वतन्त्रता संग्राम में काफी सहयोग दिया, क्योंकि इस आन्दोलन से प्रेरित होकर गरीब, मजदूर एवं किसान कांग्रेस के झण्डे तले एकत्र हो गये थे, फलस्वरूप सन् 1942 में महात्मा गाँधी द्वारा आरम्भ किये गये ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में उत्तर प्रदेश सर्वाधिक प्रभावशाली राज्य के रूप में उभरकर सामने आया। प्रदेश के अधिकांश भागों में विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, आजमगढ़, बस्ती, मिर्जापुर, गाजीपुर फैजाबाद, सुल्तानपुर, गोरखपुर, जौनपुर, बनारस आदि जिलों में इस आन्दोलन की व्यापकता काफी बढ़ गयी थी। बलिया जिले में चिट्टू पाण्डे के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार की स्थापना कर दी गयी। बनारस में स्थित हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपने स्वतन्त्र शासन की घोषणा कर दी थी। धीरे-धीरे यह आन्दोलन पहाड़ी जिलों में फैलता गया। फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी के साथ-साथ लखनऊ, कानपुर, फर्रुखाबाद आदि स्थानों पर फैल गया। इससे पूर्व सचीन्द्र सान्याल एवं रामप्रसाद बिस्मल ने 25 अगस्त, 1925 को काकोरी में रेल लूटकर सनसनी फैला दी, क्योंकि इस रेल में सरकारी कोष को ले जाया जा रहा था। रामप्रसाद बिस्मल, रोशनलाल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी आदि को इस मामले में गिरफ्तार किया गया तथा फाँसी पर लटका दिया गया। क्रान्तिकारियों की इस श्रृंखला में राजा महेन्द्र प्रताप, लाल हरदयाल, पं० परमानन्द, बटुकेश्वर दत्त, विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा जैसे क्रान्तिकारी पैदा हुए। प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सरदार भगतसिंह ने भी कानपुर एवं आगरा में रहकर क्रान्तिकारी कार्यकलापों की शुरूआत की।

सन् 1942 के उपरान्त ‘भारत छोड़ो आन्दोलन तीव्र गति पकड़ता गया, फलस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा। 8 अगस्त, 1946 प्रदेश की विधानसभा ने जमींदारी प्रथा को हटाने के लिए समिति की घोषणा की, क्योंकि इसी प्रथा के खिलाफ जनसाधारण कांग्रेस के समर्थन में एकत्र होकर आन्दोलनरत हो गया था। 26 जनवरी, 1951 को उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम के लागू होने पर इसका व्यापक स्वागत किया गया। उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति की दिशा में किये गये सन् 1857 के प्रथम आन्दोलन से लेकर इसकी प्राप्ति तक प्रदेश की जनता ने अपना सक्रिय योगदान दिया।

उत्तर प्रदेश ने स्वतंत्र भारत के एक राज्य होते हुए भी अब तक देश को 13 में से 8 प्रधानमंत्री क्रमशः सर्वश्री पं० जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, श्रीमती इन्दिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर एवं अटल बिहारी वाजपेयी दिए हैं। साथ ही पीताम्बर दास, दीनदयाल उपाध्याय, राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या), आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ० राममनोहर लोहिया, गोविन्द वल्लभ पन्त, नारायण दत्त तिवारी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवतीनन्दन बहुगुणा, मुलायम सिंह यादव एवं मायावती जैसे राजनीतिज्ञ भी दिए हैं, जोकि देश की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रूप से छाए रहे हैं।

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