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राजस्थान के प्राचीन नगरों के वर्तमान नाम

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राजस्थान के प्राचीन नगरों के वर्तमान नाम 

1. रामनगर  – गंगानगर।
2. अजयमेरु – अजमेर ।
3. कोंकण तीर्थ – पुष्कर ।
4. श्रीपंथ – बयाना ।
5. सत्यपुर – साँचोर ।
6. विराट – बैराठ ।
7. अहिछत्रपुर – नागौर ।
8. कोठी – धोलपुर ।
9. माध्यमिका – नगरी ।
10. उपकेश पट्टन – औसियां ।
11. ब्रज नगर – झालरा पाटन ।
12. कुरूक्षेत्र, शाल्व जनपद, आलोर – अलवर ।
13. कांठल, छप्पन का मेदान – प्रतापगढ़ ।
14. मांड प्रदेश , दुंगल – जेसलमेर ।
15. ताम्रवती नगरी – आहङ ।
16. खिज्राबाद – चितौड़गढ़ ।
17. भटनेर – हनुमानगढ़ ।
18. गोपालापाल – करोली ।
19. जयनगर -जयपुर ।
20. चन्द्रावती- सिरोही।
21. जबालिपुर जालोर
22. कोठी- धोलपुर
23. विज्यावाली- बिजोलिया
24. रतिघाती- बिकानेर
25. आभनगरी- आभानेरी
26. मलाणी – बाढमेर
27. चाटसु- चाकसू
28. मेवानगर- नाकोडा
29. गढ़ बोर – चारभुजा
30. रुनेचा- रामदेवरा
31. धुलेव- केसरियाजी
32. सिहाड़- नाथद्वारा
33. केलाशपुरी- एकलिंगजी
34. मंड फिया- सवलिया जी
35. जाल्हुर- जालोर
36. ब्रजनगर- झालरापाटन ।
37. चान्दन- श्री महावीर जी
38. लोयाणागढ़- जसवंतपुरा

राजस्थानी कला Rajasthan GK

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राजस्थानी कला Rajasthan GK

इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।

राजस्थानी स्थापत्य कला

राजस्थानी स्थापत्य कला

राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दु, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेष के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है। इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में वैष्णव, बौद्ध तथा जैन धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, बौद्ध, स्तूप, विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला “गरुड़ स्तम्भ’ यहां भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में अकबर द्वारा चित्तौड़ आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन “सूर्य मन्दिर’ इसी जिले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियां तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ जिले में स्थित मेनाल, डूंगरपुर जिले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की शिव, पार्वती, विष्णु, महावीर, भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।

सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर जिले में स्थित आमानेरी का मन्दिर (हर्षमाता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं।

उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। तेरहवीं शताब्दी के पश्चात स्थापत्य प्रतीक का अद्वितीय उदाहरण चित्तौड़ का “कीर्ति स्तम्भ’ है, जिसमें उत्कीर्म मूर्तियां जहां हिन्दू धर्म का वृहत संग्रहालय कहा जा सकता है। वहां इसकी एक मंजिल पर खुदे फारसी-लेख से स्पष्ट होता है कि स्थापत्य में मुस्लिम लक्ष्ण का प्रभाव पड़ना शुरु होने लगा था।

सत्रहवीं शताब्दी के पश्चात भी परम्परागत आधारों पर मन्दिर बनते रहे जिनमें मूर्ति शिल्प के अतिरिक्त भित्ति चित्रों की नई परम्परा ने प्रवेश किया जिसका अध्ययन राजस्थानी इतिहास के लिए सहयोगकर है।

मुद्रा कला

मुद्रा कला

राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल कनिंघम को आगरा में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है। राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण वि.सं. 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों “”श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य ’ ’ , “”श्री एकलिंगस्य प्रसादात ’ ’ और “”श्री ’ ’ के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें “टका’ पुकारा जाता था। यह प्रबाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात शनै: शनै: मुगलकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर “”सुल्तान विन सुल्तान ’ ’ का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में स्वास्तिक, सूर्य और चन्द्र प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुगल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।

परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रही वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का “कलदार’ भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा मारवाड़ प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में “पंचमार्क’ मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहां बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा “द्रम’ का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। बांसवाड़ा जिले के सरवानियां गांव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में “फदका’ या “फदिया’ मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।

राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुगलकाल या उसके पश्चात स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुगल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, प्रतापगढ़ के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा – “डोडिया’ अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं।

मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।

 

Mudra Kala Rajasthan Ke Pracheen Pradesh Mewad Me Majjhamika Madhyamika naamdhari Chittaud Paas Sthit Nagri Se Prapt ताम्रमुद्रा Is Shetra Ko शिविजनपद Ghosit Karti Hai Tatpaschat Chhathi – 7 th Satabdi Ki Swarna Hui General Kaningham Agra Sansthapak Shashak Guhil Sikke Hue Aise Hee औझाजी Bhi Mile Iske उर्ध्वपटल Tatha अधोवट Chitrann Rajvansh शैवधर्म Prati Aastha Ka Pata Chalata Ranna कुम्भाकालीन 1433 1468 Ee Sikkon Tamra Mudraain

 

मूर्ति कला

राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर जिले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर “”बनजारे की छतरी ’ ’ नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, आभानेरी, कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।
गुप्तोतर काल के पश्चात राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया।

15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियां है। सोलहवी शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात भी मूर्तियां बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरूप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।

Murti Kala Rajasthan Me Kaale Safed Bhure Tatha Halke सलेटी Hare Gulabi Patthar Se Bani Murtiyon Ke Atirikt Peetal Ya Dhatu Ki Murtiyan Bhi Prapt Hoti Hain Ganga Nagar Jile Kaalibanga Udaipur Nikat Aahad – Sabhyata Khudai Paki Hui Mitti Banai खिलौनाकृति Milti Kintu आदिकाल शास्रोक्य Drishti Eesa Poorv Pehli Doosri Satabdi Madhy Nirmit Jaipur Lalsot Naam Sthan Par Banjare Chhatri ’ Prasidh Char Vedica Stambh Ka Lakshann द्रष्टत्य

धातु मूर्ति कला

धातु मूर्ति कला

धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहां बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही जिले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के जिले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है।

अठाहरवी शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अतः इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरूप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।

Dhatu Murti Kala Ko Bhi Rajasthan Me Prayapt Prashray Mila Poorv Madhy Tatha उत्तरमध्य Kaal Jain Murtiyon Ka Yahan Bahutayat Nirmann Hua Sirohi Jile वसूतगढ़ Pindwada Namak Sthan Par Kai Pratimaein Prapt Hui Hain Jisme Sharda Ki Shilp Drishti Se द्रस्टव्य Hai Bharatpur Jaisalmer Udaipur Ke Is Tarah Udaharan Paripurn अठाहरवी Satabdi Murtikala ne Shanai Ek Udyog Roop Lena Shuru Kar Diya Tha Atah Inme Kalatmak Shailiyon व्यवसायिकृत

धातु एवं काष्ठ कला

धातु एवं काष्ठ कला

इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएं प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियां, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबुल, कुर्सियां, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।

Dhatu Aivam Kashth Kala Iske Antargat Top Banduk Talwar Myan Chhuri Katari Aadi अस्र – शस्र Bhi Itihas Ke Strot Hain Inki Banavat In Par Ki Gayi Khudai Sath Prapt Year Abhilekh Hamein RajNeetik Suchanayein Pradan Karte Aisi Hee Ka Udaharan Jodhpur Durg Me Dekhne Ko Mila Jabki Rajasthan संग्रहालयों Wali Kai तलवारें प्रदर्शनार्थ Rakhi Hui Palki काठियां BailGadi Rath Lakadi टेबुल कुर्सियां कलमदान सन्दूक Manushya Abhivritiyon Digdar

लोककला

लोककला

अन्ततः: लोककला के अन्तर्गत बाध्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।

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राजस्थानी चित्रकला राजस्थान की चित्रकारी Rajasthani ChitraKala Rajasthan Ki Chitrakari Rajasthan GK

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राजस्थानी चित्रकला राजस्थान की चित्रकारी Rajasthani ChitraKala Rajasthan Ki Chitrakari Rajasthan GK

भारतीय चित्रकला में राजस्थानी चित्रकला का विशिष्ट स्थान है, उसका अपना एक अलग स्वरूप है। यहाँ की इस सम्पन्न चित्रकला के तरफ हमारा ध्यान सर्वप्रथम प्रसिद्ध कलाविद आनन्दकंटक कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक राजपूत पेन्टिंग’ के माध्यम से दिलाया। कुछ उपलब्ध चित्रों के आधार पर कुमारस्वामी तथा ब्राउन जैसे विद्वानों ने यह धारणा बनाई कि राजस्थानी शैली, राजपूत शैली है तथा नाथद्वारा शैली के चित्र उदयपुर शैली के हैं। परिणामस्वरूप राजस्थानी शैली का स्वतंत्र अस्तित्व बहुत दिनों तक स्वीकार नहीं किया जा सका। इसके अलावा खंडालवाला की रचना ठलीवस फ्रॉम राजस्थान (मार्ग, भाग-त्ध्, संख्या 3, 1952) ने पहली बार विद्वानों का ध्यान यहाँ की चित्रकला की उन खास पहलुओं की तरफ खींचा जो इन पर स्पष्ट मुगल प्रभावों को दर्शाता है।

वास्तव में राजस्थानी शैली, जिसे शुरु में राजपूत शैली के रुप में जाना गया, का पादुर्भाव 15 वीं शती में अपभ्रंश शैली से हुआ। समयान्तर में विद्वानों की गवेषणाओं से राजस्थानी शैली के ये चित्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने लगे।

इन चित्रकृतियों पर किसी एक वर्ग विशेष का समष्टि रुप में प्रभाव पड़ना व्यवहारिक नहीं जान पड़ता। धीरे-धीरे यह बात प्रमाणित होती गई कि राजस्थानी शैली को राजपूत शैली में समावेशित नहीं किया जा सकता वरण इसके अन्तर्गत अनेक शैलियों का समन्वय किया जा सकता है। धीरे-धीरे राजस्थानी चित्रकला की एक शैली के बाद दूसरी शैली अपने कुछ क्षेत्रीय प्रभावों व उनपर मुगलों के आंशिक प्रभावों को लिए, स्वतंत्र रुप से अपना पहचान बनाने में सफल हो गयी। इनको हम विभिन्न नामों जैसे मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, बीकानेर शैली, नाथ द्वारा शैली आदि के रुप में जाना जाता है। उणियारा तथा आमेर की उपशैलियाँ भी अस्तित्व में आयी जो उसी क्षेत्र की प्रचलित शैलियों का रूपान्तरण है।

राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ

राजस्थानी चित्रकला अपनी कुछ खास विशेषताओं की वज़ह से जानी जाती है।

प्राचीनता

प्राचीनकाल के भग्नावशेषों तथा तक्षणकला, मुद्रा कला तथा मूर्तिकला के कुछ एक नमूनों द्वारा यह स्पष्ट है कि राजस्थान में प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से ही चित्रकला का एक सम्पन्न रुप रहा है। वि. से. पूर्व के कुछ राजस्थानी सिक्कों पर अंकित मनुष्य, पशु, पक्षी, सूर्य, चन्द्र, धनुष, बाण, स्तूप, बोधिद्रम, स्वास्तिक, ब्रज पर्वत, नदी आदि प्रतीकों से यहाँ की चित्रकला की प्राचीनता स्पष्ट होती है। वीर संवत् 84 का बाड़ली-शिलालेख तथा वि. सं. पूर्व तीसरी शताब्दी के माध्यमिक नगरी के दो शिलालेखों से भी संकेतित है कि राजस्थान में बहुत पहले से ही चित्रकला का समृद्ध रुप रहा है। बैराट, रंगमहल तथा आहड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली, रेखावली तथा रेखाओं का अंकन इसके वैभवशाली चित्रकला के अन्य साक्ष्य है।

कलात्मकता

राजस्थान भारतीय इतिहास के राजनीतिक उथल-पुथल से बहुत समय तक बचा रहा है अतः यह अपनी प्राचीनता, कलात्मकता तथा मौलिकता को बहुत हद तक संजोए रखने में दूसरे जगहों के अपेक्षाकृत ज्यादा सफल रहा है। इसके अलावा यहाँ का शासक वर्ग भी सदैव से कला प्रेमी रहा है। उन्होने राजस्थान को वीरभूमि तथा युद्ध भूमि के अतिरिक्त ठकथा की सरसता से आप्लावित भूमि’ होने का सौभाग्य भी प्रदान किया। इसकी कलात्मकता में अजन्ता शैली का प्रभाव दिखता है जो नि:संदेह प्राचीन तथा व्यापक है। बाद में मुगल शैली का प्रभाव पड़ने से इसे नये रुप में भी स्वीकृति मिल गई।

रंगात्मकता

चटकीले रंगो का प्रयोग राजस्थानी चित्रकला की अपनी विशेषता है। ज्यादातर लाल तथा पीले रंगों का प्रचलन है। ऐसे रंगो का प्रयोग यहाँ के चित्रकथा को एक नया स्वरूप देते है, नई सुन्दरता प्रदान करते है।

विविधता

राजस्थान में चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ अपना अलग पहचान बनाती है। सभी शैलियों की कुछ अपनी विशेषताएँ है जो इन्हे दूसरों से अलग करती है। स्थानीय भिन्नताएँ, विविध जीवन शैली तथा अलग अलग भौगोलिक परिस्थितियाँ इन शैलियों को एक-दूसरे से अलग करती है। लेकिन फिर भी इनमें एक तरह का समन्वय भी देखने को मिलता है।

विषय-वस्तु

इस दृष्टिकोण से राजस्थानी चित्रकला को विशुद्ध रुप से भारतीय चित्रकला कहा जा सकता है। यह भारतीय जन-जीवन के विभिन्न रंगो की वर्षा करता है। विषय-वस्तु की विविधता ने यहाँ की चित्रकला शैलियों को एक उत्कृष्ट स्वरूप प्रदान किया। चित्रकारी के विषय-वस्तु में समय के साथ ही एक क्रमिक परिवर्तन देखने को मिलता है। शुरु के विषयों में नायक-नायिका तथा श्रीकृष्ण के चरित्र-चित्रण की प्रधानता रही लेकिन बाद में यह कला धार्मिक चित्रों के अंकन से उठकर विविध भावों को प्रस्फुटित करती हुई सामाजिक जीवन का प्रतिनिधित्व करने लगी। यहाँ के चित्रों में आर्थिक समृद्धि की चमक के साथ-साथ दोनों की कला है। शिकार के चित्र, हाथियों का युद्ध, नर्तकियों का अंकन, राजसी व्यक्तियों के छवि चित्र, पतंग उड़ाती, कबूतर उड़ाती तथा शिकार करती हुई स्त्रियाँ, होली, पनघट व प्याऊ के दृश्यों के चित्रण में यहाँ के कलाकारों ने पूर्ण सफलता के साथ जीवन के उत्साह तथा उल्लास को दर्शाया है।

बारहमासा के चित्रों में विभिन्न महीनों के आधार पर प्रकृति के बदलते स्वरूप को अंकित कर, सूर्योदय के रक्तिमवर्ण राग भैरव के साथ वीणा लिए नारी हरिण सहित दर्शाकर तथा संगीत का आलम्बन लेकर मेघों का स्वरूप बताकर कलाकार ने अपने संगीत-प्रेम तथा प्रकृति-प्रेम का मानव-रुपों के साथ परिचय दिया है। इन चित्रों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि कथा, साहित्य व संगीत में कोई भिन्न अभिव्यक्ति नहीं है। प्रकृति की गंध, पुरुषों का वीरत्व तथा वहाँ के रंगीन उल्लासपूर्ण संस्कृति अनूठे ढंग से अंकित है।

स्त्री -सुन्दरता

राजस्थानी चित्रकला में भारतीय नारी को अति सुन्दर रुप में प्रस्तुत किया गया है। कमल की तरह बड़ी-बड़ी आँखे, लहराते हुए बाल, पारदर्शी कपड़ो से झाक रहे बड़े-बड़े स्तन, पतली कमर, लम्बी तथा घुमावदार उंगलियां आदि स्त्री-सुन्दरता को प्रमुखता से इंगित करते है। इन चित्रों से स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त विभिन्न उपलब्ध सोने तथा चाँदी के आभूषण सुन्दरता को चार चाँद लगा देते है। आभूषणों के अलावा उनकी विभिन्न भंगिमाएँ, कार्य-कलाप तथा क्षेत्र विशेष के पहनावे चित्रकला में एक वास्तविकता का आभास देते है।

 

मारवाड़ी शैली

मारवाड़ी शैली

इस शैली का विकास जोधपुर, बीकानेर, नागौर आदि स्थानों में प्रमुखता से हुआ। मेवाड़ की भाँति, उसी काल में मारवाड़ में भी अजन्ता परम्परा की चित्रकला का प्रभाव पड़ा। तारानाथ के अनुसार इस शैली का सम्बन्ध श्रृंगार से है जिसने स्थानीय तथा अजन्ता परम्परा के सामंजस्य द्वारा मारवाड़ शैली को जन्म दिया।

मंडोर के द्वार की कला तथा 687 ई. के शिवनाग द्वारा निर्मित धातु की एक मूर्ति जो अब पिंडवाड़ा में है यह सिद्ध करती है कि चित्रकला तथा मूर्तिकला दोनों में मारवाड़ इस समय तक अच्छी प्रगति कर चुका था। लगभग 1000 ई. से 1500 ई. के बीच इस शैली में अनेक जैन ग्रंथों को चित्रित किया गया। इस युग के कुछ ताड़पत्र, भोजपत्र आदि पर चित्रित कल्प सूत्रों व अन्य ग्रंथों की प्रतियाँ जोधपुर पुस्तक प्रकाश तथा जैसलमेर जैन भंडार में सुरक्षित हैं।

इस काल के पश्चात कुछ समय तक मारवाड़ पर मेवाड़ का राजनीतिक प्रभुत्व रहा। महाराणा मोकल के काल से लेकर राणा सांगा के समय तक मारवाड़ में मेवाड़ी शैली के चित्र बनते रहे। बाद में मालदेव का सैनिक प्रभुत्व (1531-36 ई.) इस प्रभाव को कम कर मारवाड़ शैली को फिर एक स्वतंत्र रुप दिया। यह मालदेव की सैनिक रुचि की अभिव्यक्ति, चोखेला महल, जोधपुर की बल्लियों एवं छत्तों के चित्रों से स्पष्ट है। इसमें ठराम-रावण युद्ध’ तथा सप्तशती’ के अनेक दृश्यों को भी चित्रित किया गया है। चेहरों की बनावट भावपूर्ण दिखायी गई है। 1591 में मारवाड़ शैली में बनी उत्तराध्ययनसूत्र का चित्रण बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित है।

जब मारवाड़ का सम्बन्ध मुगलों से बढ़ा तो मारवाड़ शैली में मुगल शैली के तत्वों की वृद्धि हुई। 1610 ई. में बने भागवत के चित्रण में हम पाते है कि अर्जुन कृष्ण की वेषभूषा मुगली है परन्तु उनके चेहरों की बनावट स्थानीय है। इसी प्रकार गोपियों की वेषभूषा मारवाड़ी ढंग की है परन्तु उसके गले के आभूषण मुगल ढंग के है। औरंगजेब व अजीत सिंह के काल में मुगल विषयों को भी प्रधानता दी जाने लगी। विजय सिंह और मान सिंह के काल में भक्तिरस तथा श्रृंगाररस के चित्र अधिक तैयार किये गये जिसमें ठनाथचरित्र’ ठभागवत ’ , शुकनासिक चरित्र, पंचतंत्र आदि प्रमुख हैं।

इस शैली में लाल तथा पीले रंगो का व्यापक प्रयोग है जो स्थानीय विशेषता है लेकिन बारीक कपड़ों का प्रयोग गुम्बद तथा नोकदार जामा का चित्रण मुगली है। इस शैली में पुरुष व स्त्रियाँ गठीले आकार की रहती है। पुरुषों के गलमुच्छ तथा ऊँची पगड़ी दिखाई जाती है तथा स्त्रियों के वस्त्रों में लाल रंग के फुदने का प्रयोग किया जाता है। 18 वीं सदी से सामाजिक जीवन के हर पहलू के चित्र ज्यादा मिलने लगते है। उदाहरणार्थ पंचतंत्र तथा शुकनासिक चरित्र आदि में कुम्हार, धोबी, मजदूर, लकड़हारा, चिड़ीमार, नाई, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि का चित्रण मिलता है। इन चित्रों में सुनहरे रंगों को प्रयोग मुगल शैली से प्रभावित है।

 

किशनगढ़ शैली

जोधपुर से वंशीय सम्बन्ध होने तथा जयपुर से निकट होते हुए भी किशनगढ़ में एक स्वतंत्र शैली का विकास हुआ। सुन्दरता की दृष्टि से इस शैली के चित्र विश्व-विख्यात हैं। अन्य स्थानों की भाँति यहाँ भी प्राचीन काल से चित्र बनते रहे। किशनगढ़ राज्य के संस्थापक किशन सिंह कृष्ण के अनन्योपासक थे। इसके पश्चात सहसमल, जगमल व रूपसिंह ने यहाँ शासन किया। मानसिंह व राजसिंह (1706-48) ने यहाँ की कलाशैली के पुष्कल सहयोग दिया। परन्तु किशनगढ़ शैली का समृद्ध काल राजसिंह के पुत्र सामन्त सिंह (1699-1764) से जो नागरीदारा के नाम से अधिक विख्यात हैं, से आरम्भ होता है। नागरीदारा की शैली में वैष्णव धर्म के प्रति श्रद्धा, चित्रकला के प्रति अभिरूचि तथा अपनी प्रेयसी ठवणी-ठणी’ से प्रेम का चित्रण महत्वपूर्ण है। कविहृदय सावन्त सिंह नायिका वणी-ठणी से प्रेरित होकर अपना राज्य छोड़ ठवणी-ठणी’ को साथ लेकर वृन्दावन में आकर बस गये और नागर उपनाम से नागर सम्मुचय की रचना की। नागरीदास की वैष्णव धर्म में इतनी श्रद्धा थी और उनका गायिका वणी ठणी से प्रेम उस कोटि का था कि वे अपने पारस्परिक प्रेम में राधाकृष्ण की अनुभूति करने लगे थे। उन दोनों के चित्र इसी भाव को व्यक्त करते है। चित्रित सुकोमला वणी-ठणी को भारतीय मोनालिसा’ नाम से अभिहित किया गया। काव्यसंग्रह के आधार पर चित्रों के सृजन कर श्रेय नागरी दास के ही समकालीन कलाकार निहालचन्द को है। ठवणी-ठणी’ में कोकिल कंठी नायिका की दीर्घ नासिका, कजरारे नयन, कपोलों पर फैले केशराशि के सात दिखलाया गया है। इस प्रकार इस शैली में हम कला, प्रेम और भक्ति का सर्वांगीण सामंजस्य पाते है। निहालचन्द के अलावा सूरजमल इस समय का प्रमुख चित्रकार था। अन्य शैलियों की तरह इस शैली में भी गीत-गोविन्द’ का चित्रण हुआ।

इस शैली के चेहरे लम्बे, कद लम्बा तथा नाक नुकीली रहती है। नारी नवयौवना, लज्जा से झुका पतली व लम्बी है। धनुषाकार भ्रू-रेखा, खंजन के सदृश नयन तथा गौरवर्ण है। अधर पतले व हिगुली रंग के हैं। हाथ मेहन्दी से रचे तथा महावर से रचे पैर है। नाक में मोती से युक्त नथ पहने, उच्च वक्ष स्थल पर पारदर्शी छपी चुन्नी पहने रुप यौवना सौदर्य की पराकाष्ठा है। नायक पारदर्शक जामे में खेत 9 मूंगिया पगड़ी पहने प्रेम का आहवान से करता है। मानव रुपों के साथ प्रकृति भी सफलता से अंकित है। स्थानीय गोदोला तालाब तथा किशनगढ़ के नगर को दूर से दिखाया जाना इस शैली की अन्य विशेषता है। चित्रों को गुलाबी व हरे छींटदार हाशियों से बाँधा गया है। चित्रों में दिखती वेषभूषा फर्रुखसियर कालीन है। इन विशेषताओं को हम वृक्षों की घनी पत्रावली अट्टालिकाओं तथा दरबारी जीवन की रात की झांकियों, सांझी के चित्रों तथा नागरीदास से सम्बद्ध वृन्दावन के चित्रों में देख सकते है।

 

बीकानेर शैली

बीकानेर शैली

मारवाड़ शैली से सम्बंधित बीकानेर शैली का समृद्ध रुप अनूपसिंह के शासन काल में मिलता है। उस समय के प्रसिद्ध कलाकारों में रामलाल, अजीरजा, हसन आदि के नाम विशेषत रुप से उल्लेखनीय हैं। इस शैली में पंजाब की कलम का प्रभाव भी देखा गया है क्यों कि अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बीकानेर उत्तरी प्रदेशों से प्रभावित रहा है। लेकिन दक्षिण से अपेक्षतया दूर होने के बावजूद यहाँ फव्वारों, दरबार के दिखावों आदि में दक्षिण शैली का प्रभाव मिलता है क्यों कि यहाँ के शासकों की नियुक्ति दक्षिण में बहुत समय तक रही।

 

हाड़ौती शैली/बूंदी व कोटा शैली

हाड़ौती शैली/बूंदी व कोटा शैली

राजस्थानी चित्रकला को बूंदी व कोटा चित्रशैली ने भी अनूठे रंगों से युक्त स्वर्मिण संयोजन प्रदान किया है। प्रारंभिक काल में राजनीतिक कारणों से बूंदी कला पर मेवाड़ शैली का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। इस स्थिति को स्पष्ट व्यक्त करने वाले चित्रों में रागमाला (1625 ई.) तथा भैरवी रागिनी उल्लेखनीय है।

इस शैली का विकास राव सुरजन सिंह (1554-85) के समय के आरम्भ हो जाता है। उन्होने मुगलों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था अतः धीरे-धीरे चित्रकला की पद्धति में एक नया मोड़ आना शुरु हो जाता है। दीपक राग तथा भैरव रागिनी के चित्र राव रतन सिंह (1607-31) के समय में निर्मित हुए। राव रतन सिंह चूंकि जहाँगीर का कृपा पात्र था, तथा उसके बाद राव माधो सिंह के काल में जो शाहजहाँ के प्रभाव में था, चित्र कला के क्षेत्र में भी मुगल प्रभाव निरन्तर बढ़ता गया। चित्रों में बाग, फव्वारे, फूलों की कतार, तारों भरी राते आदि का समावेश मुगल ढंग से किया जाने लगा। भाव सिंह (1658-81) भी काव्य व कला प्रेमी शासक था। राग- रागिनियों का चित्रण इनके समय में हुआ। राजा अनिरुद्ध के समय दक्षिण युद्धों के फलस्वरुप बूंदी शैली में दक्षिण कला के तत्वों का सम्मिलित हुआ। बूंदी शैली के उन्नयन में यहाँ के शासक राव राजाराम सिंह (1821-89) का अभूतपूर्व सहयोग रहा। बूंदी महल के ठछत्र महल’ नामक प्रकोष्ठ में उन्होने भित्ति-चित्रों का निर्माण करवाया।

बूंदी चित्रों में पटोलाक्ष, नुकीली नाक, मोटे गाल, छोटे कद तथा लाल पीले रंग की प्राचुर्यता स्थानीय विशेषताओं का द्योतक है जबकि गुम्बद का प्रयोग और बारीक कपड़ों का अंकन मुगली है। स्त्रियों की वेशगुषा मेवाड़ी शैली की है। वे काले रंग के लहगे व लाल चुनरी में हैं। पुरुषाकृतियाँ नील व गौर वर्ण में हृष्ट-पुष्ट हैं, दाढ़ी व मूँछो से युक्त चेहरा भारी चिबुक वाला है। वास्तुचित्रण प्रकृति के मध्य है। घुमावदार छतरियों व लाल पर्दो से युक्त वातायन बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं। केलों के कुज अन्तराल को समृद्ध करते हैं।

बूंदी चित्रों का वैभव चित्रशाला, बड़े महाराज का महल, दिगम्बर जैन गंदिर, बूंदी कोतवाली, अन्य कई हवेलियों तथा बावड़ियों में बिखरा हुआ है।

कोटा में भी राजनीतिक स्वतंत्रता से नवीन शैली का आरम्भ होता है। वल्लभ सम्प्रदाय जिसका प्रभाव यहाँ 18 वीं शती के प्रारम्भिक चरण में पड़ा, में राधा कृष्ण का अंकन विशेष रुप से हुआ। परन्तु कोटा शैली अपनी स्वतंत्र अस्तित्व न रखकर बूंदी शैली का ही अनुकरण करती है। उदाहरणार्थ जालिम सिंह की हवेली में चित्रित नायिका हूँ-ब-हूँ बूंदी नायिका की नकल कही जा सकती है। आगे चलकर भी कोटा शैली बूंदी शैली से अलग न हो सकी। कोटा के कला प्रेमी शासक उम्मेद सिंह (1771-1820) की शिकार में अत्यधिक रुचि थी अतः उसके काल में शिकार से सम्बद्ध चित्र अधिक निर्मित हुए। आक्रामक चीता व राजा उम्मेद सिंह का शिकार करते हुए चित्र बहुत सजीव है। चित्रों में प्रकृति की सधनता जंगल का भयावह दृश्य उपस्थित करती है। कोटा के उत्तम चित्र देवताजी की हवेली, झालाजी की हवेली व राजमहल से प्राप्त होते हैं।

 

ढूँढ़ाड शैली / जयपुर शैली

ढूँढ़ाड शैली / जयपुर शैली

जयपुर शैली का विकास आमेर शैली से हुआ। मुगल शैली के प्रभाव का आधिपत्य इस शैली की विशेषता है। जयपुर के महाराजाओं पर मुगल जीवन तथा नीति की छाप विशेष रुप से रही है। अकबर के आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाहोपरान्त सम्बन्धों में और प्रगाढ़ता आयी।

शुरुआती चित्र परम्परा भाऊपुरा रैनबाल की छंवरी, भारमल की छंवरी (कालियादमन, मल्लयोद्धा), आमेर महल व वैराट की छतरियों में भित्तियों पर (वंशी बजाते कृष्ण) तथा कागजों पर प्राप्त होती है। बाद में राजा जयसिंह (1621-67) तथा सवाई जयसिंह (1699-1743) ने इस शैली को प्रश्रय दिया। राजा सवाई जयसिंह ने अपने दरबार में मोहम्मद शाह व साहिबराम चितेरो को प्रश्रय दिया। इन कलाकारों ने सुन्दर व्यक्ति, चित्रों व पशु-पक्षियों की लड़ाई संबंधी अनेक बड़े आकार के चित्र बनाए। सवाई माधो सिंह प्रथम (1750-67) के समय में अलंकरणों में रंग न भरकर मोती, लाख व लकड़ियाँ की मणियों को चिपकाकर चित्रण कार्य हुआ। इसी समय माधोनिवास, सिसोदिनी महल, गलता मंदिर व सिटी पैलेस में सुन्दर भिति चित्रों का निर्माण हुआ। सवाई प्रताप सिंह (1779-1803) जो स्वयं पुष्टि मार्गी कवि थे, के समय में कृष्ण लीला, नायिका भेद, राग-रागिनी, ऋतुवर्णन, भागवतपुराण, दुर्गासप्तशती से सम्बंधित चित्र सृजित हुए। महाराज जगतसिंह के समय में पुण्डरीक हवेली के भित्ति चित्र, विश्व-प्रसिद्ध कृष्ण का गोवर्धन-धारण’ नामक चित्र रासमण्डल के चित्रों का निर्माण हुआ। पोथीखाने के आसावरी रागिणी के चित्र व उसी मंडल के अन्य रागों के चित्रों में स्थानीय शैली की प्रधानता दिखाई देती है। कलाकार ने आसावरी रागिणी के चित्र में शबरी के केशों, उसके अल्प कपड़ों, आभूषणों और चन्दन के वृक्ष के चित्रण में जयपुर शैली की वास्तविकता को निभाया है। इसी तरह पोथीखाना के 17 वीं शताब्दी के ठभागवत’ चित्रों में जो लाहोर के एक खत्री द्वारा तैयार करवाये गये थे, स्थानीय विशेषताओं का अच्छा दिग्दर्शन है। 18 वीं शताब्दी की ठभागवत’ में रंगों की चटक मुगली है। चित्रों में द्वारिका का चित्रण जयपुर नगर की रचना के आधार पर किया गया है और कृष्ण-अर्जुन की वेषभूषा मुगली है। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जयपुर शैली पर पाश्चात्य प्रभाव पड़ना शुरु हो जाता है। जयपुर शैली के चित्र गतिमय रेखाओं से मुक्त, शान्तिप्रदायक वर्ण में अंकित है। आकृतियाँ की भरमार होते हुए भी चेहरे भावयुक्त है। मुगल प्रभाव से चित्रों में छाया, प्रकाश व परदा का मुक्त प्रयोग हुआ है। आकृतियाँ सामान्य कद की हैं। आभूषणों में मुगल प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। स्त्रियों की वेशभूषा में भी मुगल प्रभाव स्पष्ट है। उनके अधोवस्त्र में घेरदार घाघरा ऊपर से बाँधा जाता है और पायजामा तथा छोटी ओढ़नी पहनाई जाती है जो मुगल परम्परा के अनुकूल है। पैरों में पायजेब व जूतियाँ है। चेहरों को चिकनाहट और गौरवर्ण फारसी शैली के अनुकूल है। वह अपने भाव मोटे अधरों से व्यक्त करती है। पुरुष के सिर पर पगड़ी,घेरदार चुन्नटी जामा, ढ़ीली मोरी के पाजामें, पैरों में लम्बी नोक की जूतियाँ हैं।

आज भी जयपुर में हाथी-दाँत पर लघु चित्र व बारह-मासा आदि का चित्रण कर उसे निर्यात किया जाता है। भित्ति चित्रण परंपरा भी अभी अस्तित्व में है।

 

अलवर शैली

अलवर शैली

यह शैली मुगल शैली तथा जयपुर शैली का सम्मिश्रण माना जा सकता है। यह चित्र औरंगजेब के काल से लेकर बाद के मुगल कालीन सम्राटों तथा कम्पनी काल तक प्रचुर संख्या में मिलते हैं। जब औरंगजेब ने अपने दरबार से सभी कलात्मक प्रवृत्तियों का तिरस्कार करना शुरु किया ते राजस्थान की तरफ आने वाले कलाकारों का प्रथम दल अलवर में आ टिका, क्योंकि कि मुगल दरबार से यह निकटतम राज्य था। उस क्षेत्र में मुगल शैली का प्रभाव वैसे तो पहले से ही था, पर इस स्थिति में यह प्रभाव और भी बढ़ गया।

इस शैली में राजपूती वैभव, विलासिता, रामलीला, शिव आदि का अंकन हुआ है। नर्त्तकियों के थिरकन से युक्त चित्र बहुतायक में निर्मित हुए। मुख्य रुप से चित्रण कार्य स्क्रोल व हाथी-दाँत की पट्टियों पर हुआ। कुछ विद्वानों ने उपर्युक्त शैलियों के अतिरिक्त कुछ अन्य शैलियों के भी अस्तित्व को स्वीकार किया है। ये शैलियाँ मुख्य तथा स्थानीय प्रभाव के कारण मुख्य शैलियाँ से कुछ अलग पहचान बनाती है।

 

राजस्थानी चित्रकला आमेर शैली उणियारा शैली डूंगरपूर उपशैली देवगढ़ उपशैली

राजस्थानी चित्रकला आमेर शैली उणियारा शैली डूंगरपूर उपशैली देवगढ़ उपशैली

आमेर शैली 
अन्य देशी रियासतों से आमेर का इतिहास अलग रहा है। यहाँ की चित्रकारी में तुर्की तथा मुगल प्रभाव अधिक दिखते है जो इसे एक स्वतंत्र स्थान देती है।

उणियारा शैली
अपनी आँखों की खास बनावट के कारण यह शैली जयपुर शैली से थोड़ी अलग है। इसमें आँखे इस तरह बनाई जाती थी मानो उसे तस्वीर पर जमा कर बनाया गया हो।

डूंगरपूर उपशैली 

इस शैली में पुरुषों के चेहरे मेवाड़ शैली से बिल्कुल भिन्न है और पगड़ी का बन्धेज भी अटपटी से मेल नहीं खाता। स्त्रियों की वेषभूषा में भी बागड़ीपन है।

देवगढ़ उपशैली
देवगढ़ में बडी संख्या में ऐसे चित्र मिले हैं जिनमें मारवाड़ी और मेवाड़ी कलमों का समावेश है। यह भिन्नता विशेषत: भौगोलिक स्थिति के कारण देखी गई है।

 

 

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राजस्थान में खनिज संसाधन Minerals In Rajasthan GK

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राजस्थान में खनिज संसाधन Minerals In Rajasthan GK

राजस्थान में खनिज संसाधन
खनिज संसाधनों में राजस्थान एक समृद्ध राज्य है क्योंकि यहाँ अनेक प्रकार के खनिज उपलब्ध है। इसी कारण भूगर्भवेत्ताओ ने इसे ‘खनिजों का संग्रहालय‘ कहा है। यहाँ की प्राचीन एवं विविधतापूर्ण भूगर्भिक संरचना ने खनिज संसाधनों में भी विविधता को जन्म दिया है।

भारत में राजस्थान का खनिज उत्पादन में विशेष महत्व है। जेस्पार, गार्ने ट, वोलस्टोनाइट और पन्ना का राजस्थान देश का एकमात्र उत्पादक राज्य है। देश में उत्पादित जस्ता का 99 91प्रतिशत, जिप्सम का 93 प्रतिशत, ऐस्बस्टोस का 89 प्रतिशत, घिया पत्थर (सोप स्टोन) का 85 प्रतिशत, सीसा का 77 प्रतिशत, रॉक फास्फेट का 75 प्रतिशत, फेल्सपार का 70 प्रतिशत, बुल्फेमाइट का 50 प्रतिशत, तांबा का 36 प्रतिशत तथा अभ्रक का 22 प्रतिशत भाग राजस्थान का है। इसके अतिरिक्त इमारती पत्थर विषेषकर संगमरमर के उत्पादन में भी राजस्थान का विशेष महत्व है।

राज्य के खनिजों को तीन श्रेणियो में विभक्त किया जाता है-
1. धात्विक खनिज ; डमजंससपब डपदमतंसेद्ध
2. अधात्विक खनिज ; छवद दृ उमजंससपब डपदमतंसे द्ध
3. ऊर्जा उत्पादक खनिज ; च्वूमत च्तवकनबपदह डपदमतंसेद्ध
1. धात्विक खनिज: राजस्थान के धात्विक खनिजों में लोहा-अयस्क, मैंगनीज, तांबा, सीसा, जस्ता, चांदी, बैरेलियम, टंगस्टन तथा केडमियम प्रमुख है। राज्य के धात्विक

राजस्थान के प्रमुख धात्विक खनिज
राज्य के प्रमुख धात्विक खनिजों के उत्पादन क्षेत्रों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- लौह अयस्क – लौह अयस्क में राजस्थान महत्वपूर्ण नहीं है। राज्य में जयपुर, सीकर के कुछ क्षेत्रों में बूंदी से भीलवाड़ा, कांकरोली, उदयपुर, डूँगरपुर होती हुई बांसवाड़ा की पेटी में लोहा अयस्क के भण्डार है, किन्तु राज्य में व्यापारिक स्तर पर इसका खनन लाभकारी नहीं है। मैंगनीज – राजस्थान में बांसवाड़ा जिले के लीलवानी, नरडिया, सिवोनिया, कालाखूंटा, सागवा, इटाला, काचला, तलवाड़ा आदि में निकाला जाता है। जयपुर, उदयपुर, और सवाई माधोपुर में भी मैंगनीज पाया जाता है। सीसा और जस्ता – राजस्थान सीसा-जस्ता उत्पादन में अग्रणी है। सीसा-जस्ता उत्पादक क्षेत्रोंमें चाँदी भी मिलती है। राज्य के प्रमुख सीसा-जस्ता के साथ ही चाँदी भी मिलती है। राज्य के प्रमुख सीसा-जस्ता उत्पादक क्षेत्र दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में उदयपुर, राजसमंद, डँूगरपुर, बाँसवाड़ा और भीलवाड़ा में स्थित है। प्रमुख जस्ता-सीसा उत्पादक क्षेत्र है- जावर, राजपुरा-दरीबा एवं आगूचा-गुलाबपुरा।

ताँबा- ताँबा राजस्थान के कई स्थानों पर मिलता है, इनमें झुंझुंनू जिले में खेतड़ी, सिंघाना तथा अलवर जिले में खो-दरीबा क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। खेतडी क्षेत्र में लगभग 8 करोड़ टन ताँबे के भण्डार का अनुमान है। अलवर में खो-दरीबा के अतिरिक्त थानागाजी, कुषलगढ़, सेनपरी तथा भगत का बास में भी ताँबे की खाने मिली है।

टंगस्टन- राज्य में डेगाना (नागौर जिला) क्षेत्र में टंगस्टन के भण्डार है। डेगाना स्थित खान देश में एक मात्र खान है, जहाँ टंगस्टन का उत्पादन हो रहा है। चाँदी- राजस्थान में सीसा-जस्ता के साथ मिश्रित रूप में चाँदी का उत्पादन होता है। उदयपुर तथा भीलवाड़ा जिलो की सीसा-जस्ता खदानो से चाँदी प्राप्त होती है, वार्षिक उत्पादन लगभग तीस हजार किलोग्राम है।

अधात्विक खनिज
राजस्थान अधात्विक खनिजों के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इन्हे निम्न श्रेणियो में विभक्त किया जा सकता है-

उर्वरक खनिज- जिप्सम, रॉक फास्फेट, पाईराइट
बहुमूल्य पत्थर- पन्ना, तामड़ा, हीरा
आणविक एवं विद्युत उपयोगी- अभ्रक, यूरेनियम
ऊष्मारोधी, उच्चताप सहनीय एवं मृतिका खनिज- एस्बेटास, फेल्सपार, सिलिका सेण्ड, क्वाटर्टज,
मेगनेसाइट, वरमेकुलेट, चीनी मिट्टी, डोलोमाइट आदि।
रासायनिक खनिज- नमक, बेराइट, ग्रेनाइट, स्लेट आदि।
अन्य खनिज- घीया पत्थर, केल्साइट, स्टेलाइट आदि।

राजस्थान के प्रमुख अधात्विक खनिज
प्रमुख अधात्विक खनिजों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है-
ऐस्बेस्टॉस- राजस्थान ऐस्बेस्टास का प्रमुख उत्पादक है और भारत का 90 प्रतिशत भाग उत्पादित करता है। ऐस्बेस्टास के प्रमुख उत्पादक जिले उदयपुर, डूँगरपुर है तथा अजमेर, उदयपुर तथा जोधपुर में सीमित उत्पादन होता है।
फेल्सपार- राजस्थान भारत का 60 प्रतिशत फेल्सपार का उत्पादन करता है। राज्य का अधिकांष फेल्सपार अजमेर जिले से प्राप्त होता है। जयपुर, पाली, टोंक, सीकर, उदयपुर, और बाँसवाड़ा में भी सीमित मात्रा में फेल्सपार मिलता है।
अभ्रक- राजस्थान में अभ्रक उत्पादन की तीन पेटियाँ-जयपुर-टोंक पेटी, भीलवाड़ा-उदयपुर पेटी और अन्य में सीकर में तोरावाटी तथा अजमेर, राजसमंद, अलवर तथा पाली जिलो में हैं।
जिप्सम- राजस्थान भारत का 90 प्रतिशत जिप्सम उत्पादित करता है। इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रहै- बीकानेर, हनुमानगढ़, चूरू क्षेत्र, नागौर क्षेत्र, जैसलमेर-बाड़मेर, पाली- जोधपुर क्षेत्र हैं।
रॉक फास्फेट- राजस्थान देश का लगभग 56 प्रतिशत रॉक फास्फेट उत्पादित करता है। इसके उत्पादक जिले उदयपुर, बाँसवाड़ा, जैसलमेर और जयपुर है।
डोलोमाइट- राज्य के बाँसवाड़ा, उदयपुर और राजसमंद जिलो में प्रमुखता से तथा अलवर, झुंझुनूं, सीकर, भीलवाड़ा, नागौर जिलो में सीमित उत्पादन होता है।
घिया पत्थर- राजस्थान में देश का 90 प्रतिशत घिया पत्थर उत्पादित होता है। राज्य में राजसमंद, उदयपुर, दौसा, अजमेर, अलवर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, करौली एवं भीलवाड़ा जिलो से घिया पत्थर का उत्पादन होता है।
इमारती पत्थर- राजस्थान इमारती पत्थर के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का संगमरमर प्रसिद्ध है। इसके लिए मकराना भारत भर में प्रसिद्ध है। संगमरमर के अन्य उत्पादक क्षेत्र किशनगढ़, अलवर, सीकर, उदयपुर,राजसमंद, बाँसवाड़ा में है। जालौर, पाली, बूंदी, अजमेर में भी संगमरमर सीमित खनन हो रहा है।

चूना पत्थर सिराही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, कोटा, जैसलमेर, बाँसवाड़ा, अजमेर, अलवर, जयपुर, नागौर और जोधपुर जिलो में मिलता है। सेण्ड स्टोन अर्थात बालुआ पत्थर जोधपुर, कोटा, बूंदी, भीलवाड़ा, जिलो में प्रमुखता से मिलता है। अन्य इमारती पत्थरो में ग्रेनाइट, सिस्ट, क्वार्टजाइट, स्लेट, कॉजला भी राजस्थान में मिलता है।

बहुमूल्य पत्थर
राजस्थान बहुमूल्य पत्थरों के उत्पादन के लिये भी प्रसिद्ध है। यहाँ पन्ना और तामड़ा प्रमुख रूप से उत्पादित होते हैं। पन्ना एक सुन्दर हरे रंग का चमकीला रत्न होता है। पन्ना मुख्यत: उदयपुर जिले के उत्तर में एक पेटी में मिलता है जिसका विस्तार देवगढ़ से कॉकरोली, राजसमंद जिले तक है। अजमेर के राजगढ़ से क्षेत्र में भी पन्ना मिलता है। तामड़ा भी एक बहुमूल्य पत्थर है जो लाल, गुलाबी रंग का पारदर्षी रत्न है। राजस्थान में टांेक, अजमेर, भीलवाड़ा, सीकर तथा चित्तोड़गढ़ में तामड़ा निकाला जाता है। तामड़ा उत्पादन में राजस्थान का एकाधिकार है। अन्य अधात्विक खनिजों में राजस्थान में केल्साइट, बेण्टोनाइट, नमक, पाइराइट आदि का उत्पादन होता है। ऊर्जा संसाधनों में कोयला बीकानेर के पलाना में और खनिज तैल बाड़मेर, जैसलमेर में निकाला जाता है। इनका विवरण अगले अध्याय में किया जायेगा।

खनिज संरक्षण
राजस्थान में जिस गति से खनिजों का शोषण हो रहा है, वह दिन दूर नहीं, जब ये खनिज समाप्त हो जाएंगे। खनिज एक प्राकृतिक सम्पदा है, यदि इसे अनियन्त्रित और अनियोजित तरीके से निकाला गया तो यह समाप्त हो सकता है। जब एक बार खनिज समाप्त हो जाते है तो इन्हे पुन: प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि लोखो वर्षों की प्रक्रिया से खनिज अस्तित्व में आते है। अतः खनिजों का संरक्षण अति आवश्यक है। खनिज संरक्षण हेतु प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) खनिज का बहुउद्देषीय उपयोग
(2) उत्खतित खनिजों से अधिकतम धातु प्राप्त करना
(3) खनिजों के विकल्पों की खोज
(4) खनिजों का नियोजित खनन
(5) धातु का बारम्बर प्रयोग
(6) गहराई तक खनन
(7) भूगर्भिक सर्वेक्षण एवं दूर संवेदन तकनीक से नए खनिजों की खोज
(8) खनिज खनन पर सरकारी नियन्त्रण
(9) उचित खनिज प्रबन्धन के अन्तर्गत निम्न कार्य किये जाने आवश्यक हैं –
सर्वेक्षण
खनिज उपयोग प्राथ्मिकता का निर्धारण
अनियन्त्रित खनन पर रोक
खनन में उन्नत तकनीक का प्रयोग
सामरिक एवं अल्प उपलब्ध खनिजों के उपयोग पर नियन्त्रण
दीर्घकालीन योजना द्वारा खनिजों के उचित उपयोग
आधुनिक तकनीको के माध्यम से नवीन खनिज भण्डारो का पता लगाना
खनिज खनन से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव न हो इसके लिये आवश्यक व्यवस्था करना आदि।

Rajasthan Me Khanij Sansadhan Sansadhano Ek Samridhh Rajya Hai Kyonki Yahan Anek Prakar Ke Uplabdh Isi Karan भूगर्भवेत्ताओ ne Ise Khanijon Ka संग्रहालय Kahaa Ki Pracheen Aivam विविधतापूर्ण BhuGarbhik Sanrachana Bhi Vividhata Ko Janm Diya Bhaarat Utpadan Vishesh Mahatva Jespar गार्ने ट Volastonite Aur Panna Desh Ekmatra Utpadak Utpadit Jasta 99 91प्रतिशत Gypsum 93 Pratishat ऐस्बस्टोस 89 घिया Patthar soap Stone 85 Seesa 77 Rock Phosp

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राजस्थान में कृषि Agriculture in Rajasthan GK

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राजस्थान में कृषि Agriculture in Rajasthan GK

राजस्थान में कृषि
राजस्थान का कुल क्षेत्रफल 3 लाख 42 हजार 2 सौ 39 वर्ग कि.मी. है। जो की देश का 10.41 प्रतिशत है। राजस्थान में देश का 11 प्रतिशत क्षेत्र कृषि योग्य भूमि है और राज्य में 50 प्रतिशत सकल सिंचित क्षेत्र है जबकि 30 प्रतिशत शुद्ध सिंचित क्षेत्र है।

राजस्थान का 60 प्रतिशत क्षेत्र मरूस्थल और 10 प्रतिशत क्षेत्र पर्वतीय है। अतः कृषि कार्य संपन्न नहीं हो पाता है और मरूस्थलीय भूमि सिंचाई के साधनों का अभाव पाया जाता है। अधिकांश खेती राज्य में वर्षा पर निर्भर होने के कारण राज्य में कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है।

रबी की फसल      अक्टूबर, नवम्बर व जनवरी -फरवरी
खरीफ की फसल      जून, जुलाई व सितम्बर-अक्टूबर
जायद की फसल      मार्च-अप्रैल व जून-जुलाई
खरीफ को उनालु कहा जाता है।

रबी को स्यालु/सावणु कहा जाता है।

रबी – गेहूं जौ, चना, सरसो, मसूर, मटर, अलसी, तारामिरा, सूरजमुखी।

खरीफ – बाजरा, ज्वार, मूंगफली, कपास, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, चांवल आदि।

जायद – खरबूजे, तरबूज ककडी

फसलों का प्रारूप

खाद्यान्न फसले (57 प्रतिशत)       नकदी/व्यापारिक फसले (43 प्रतिशत)
गेहूं,जो,ज्वार, मक्का      गन्ना, कपास, तम्बाकू
बाजरा,चावंल,दहलने      तिलहन, सरसों, राई
मोड,मंूग,अरहर उड्द      तारामिरा, अरण्डी, मूंग
मसूर चांवल इत्यादि      तिल, सोयाबीन, (जोजोबा)
नोट- राज्य में कृषि जाति का औसत आकार 3.96 हैक्टेयर है। जो देश में सर्वाधिक है। कुल क्षेत्र का 2/3 भाग (65 प्रतिशत) खरीफ के मौसम में बोया जाता है।

खाद्यान्न फसले
1. गेहूं

राजस्थान में सर्वाधिक खाया जाने वाला और सर्वाधिक उत्पन्न होने वाला खाद्यान्न गेहंू है। देश में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर-प्रदेश में होता है। राजस्थान का गेहूं उत्पादन में देश में चौथा स्थान है। राजस्थान का पूर्वी भाग गेहूं उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। जबकि श्रीगंगानगर जिला राज्य में गेहंू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। गेहंू के अधिक उत्पादन के कारण गंगानगर को राज्य का अन्न भंण्डार और कमाऊपूत कहा जाता है। राजस्थान में गेहूं की प्रमुख किस्में सोना-कल्याण, सोनेरा, शरबती, कोहिनूर, और मैक्सिन बोयी जाती है।

2.जौ

देश में जौ का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। यू.पी. के पश्चात राजस्थान जौ उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र में जौ सर्वाधिक होता है और जयपुर जिला जौ उत्पादन में राज्य का प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में जौ कि प्रमुख किस्मों में ज्योति राजकिरण और आर.एस.-6 प्रमुख है। जौ माल्ट बनाने में उपयोगी है।

3.ज्वार (सोरगम/गरीब की रोटी)

ज्वार को खाद्यान्न के रूप में प्रयोग किया जाता है। देश में सर्वाधिक ज्वार महाराष्ट्र में होता है। जबकि राजस्थान में देश में चौथा स्थान रखता है। राजस्थान में मध्य भाग में ज्वार का सर्वाधिक उत्पादन होता है। जबकि अजमेर जिला ज्वार उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। ज्वार की राज्य में प्रमुख किस्म पी.वी.-96 है।

राजस्थान में ज्वार अनुसंधान केन्द्र वल्लभनगर उदयपुर में स्थापित किया गया है।

4.मक्का

दक्षिणी राजस्थान का प्रमुख खाद्यान्न मक्का है। देश में सर्वाधिक मक्का का उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। जबकि राजस्थान का मक्का के उत्पादन में देश में आठवां स्थान है। राजस्थान का चितौड़गढ़ जिला मक्का उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में मक्के की डब्ल्यू -126 किस्म बोई जाती है जबकि कृषि अनुसंधान केन्द्र बांसवाडा द्वारा मक्का की माही कंचन व माही घवल किस्म तैयार की गई है।

5.चांवल

देश में सर्वाधिक खाया जाने वाला खाद्यान्न चावंल है। देश में इसका सर्वाधिक उत्पादन पश्चिमी बंगाल में है। राजस्थान में चावंल का उत्पादन नाममात्र का आधा प्रतिशत से भी कम है। राजस्थान में हुनमानगढ़ जिले के घग्घर नदी बहाव क्षेत्र (नाली बैल्ट) में “गरडा वासमती” नामक चावंल उत्पन्न किया जाता है। जबकि कृषि अनुसंधान केन्द्र बासवांडा ने चावंल की माही सुगंधा किस्म विकसित की है।

चांवन के लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सीयस तापमान व 200 सेंटी मीटर वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। जो कि राजस्थान में उपलब्ध नहीं है। अतः यहां जापानी पद्वति से चांवन उत्पन्न किया जाता है। देश में प्रति हैक्टेयर अधिक उत्पादन में पंजाब राज्य का प्रथम स्थान रखता है।

6. चना

यह एक उष्णकटिबधिय पौधा है। इसके लिए मिट्टी की आवश्यकता होती है। देश में उत्तर-प्रदेश के पश्चात राजस्थान चना उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान में चुरू जिला चने के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। गेहूं और जो के साथ चने को बोने पर उसे गोचनी या बेझड़ कहा जाता है।

7.दलहन

चने के पश्चात विभिन्न प्रकार की दालो में मोठ का प्रथम स्थान राजस्थान का पश्चिमी भाग दालों में अग्रणी स्थान रखता है। राजस्थान का नागौर जिला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में कुल कृषि भूमि का 18 प्रतिशत दाले बोयी जाती है। उड्द की दाल भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक है। पौधों को नाइट्रोजन नाइट्रेट के रूप में प्राप्त होती है। जबकि राइजोबियम नामक बैक्टीरिया नाइट्रोजन को नाइट्रेट के रूप में परिवर्तित करता है।

8.बाजरा

देश में सर्वाधिक बाजरे का उत्पादन राजस्थान में होता है। राजस्थान में सर्वाधिक बोया जाने वाला खाद्यान्न बाजरा है। राजस्थान का पश्चिमी भाग बाजरा उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है जबकि जयपुर जिला बाजरा उत्पादन में प्रथम स्थान पर हैं राजस्थान में बाजरे की साधारण किस्म के अतिरिक्त Raj-171 प्रमुख किस्म है। राजस्थान के पूर्वी भाग में संकर बाजरा होता है। उसे सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। राजस्थान में बाजरा अनुसंधान केन्द्र बाडमेर में स्थित है।

नगदी/व्यापारिक फसले
9.गन्ना

भारतीय मूल का पौधा (Indian Origine) है। अर्थात् विश्व में सर्वप्रथम गन्ने का उत्पादन भारत में ही हुआ। दक्षिणी भारत में सर्वप्रथम गन्ने की खेती आरम्भ हुई। वर्तमान में विश्व में गन्ने का सर्वाधिक उत्पादन भारत में ही होता है। भारत में उत्तर प्रदेश राज्य गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान पर है (देश का 40 प्रतिशत)। राजस्थान में गन्ने का उत्पादन नाम मात्र का होता है (0.5 प्रतिशत)। राजस्थान में बूंदी जिला गन्ना उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। गन्ने का कम उत्पादन होने के कारण राजस्थान में मात्र तीन शुगर मिले है।

1.      दा मेवाड शुगर मिल      भूपाल सागर (चित्तौड़) 1932 निजी
2.      गंगानगर शुगर मिल      गंगानगर (1937 निजी -1956 में सार्वजनिक)
3.      द केशोरायपाटन शुगर मिल      केशोरायपाटन (बूंदी) 1965 सहकारी
10.कपास

कपास देशी कपासअमेरिकन कपासमानवी कपास गंगानगरगंगानगरकोट (हडौती क्षेत्र) उदयपुरहनुमानगढ़बू चित्तौडगढ़बांसवाड बारां
कपास भारतीय मूल का पौधा है। विश्व में सर्वप्रथम कपास का उत्पादन सिंधु घाटी सभ्यता में हुआ। वर्तमान में विश्व में सर्वाधिक कपास भारत में उत्पन्न होती है। जबकी भारत में गुजरात राज्य कपास में प्रथम स्थान रखता है। राजस्थान देश में चौथे स्थान पर है। राजस्थान में कपास तीन प्रकार की होती है।

वर्तमान में राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला कपास उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। जबकि जैसलमेर व चरू में कपास का उत्पादन नाम मात्र का होता है। कपास को “बणीया” कहा जाता है। कपास से बिनौला निकाला जाता है उससे खल बनाई जाती है। कपास की एक गांठ 170 किलो की होती है।

11.तम्बाकू

भारतीय मूल का पौधा नहीं। पूर्तगाली 1508 ईं. में इसको भारत लेकर आये थे। मुगल शासक जहांगीर ने सर्वप्रथम भारत में 1608 ई. में इसकी खेती की शुरूआत की किन्तु कुछ समय पश्चात इसके जब दुशपरीणाम आने लगे तब जहांगीर ने ही इसे बंद करवा दिया। वर्तमान में भारत का आंधप्रदेश राज्य तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में पूर्व भाग में तम्बाकू का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अलवर जिला तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में तम्बाकू की दो किस्में बोयी जाती है।

(अ) निकोटिना टेबुकम

(ब) निकोटिना रास्टिका

12.तिलहन (तिलहन विकास कार्यक्रम 1984-85)

सरसो, राई, तारामीरा, तिल, मूंगफली, अरण्डी, सोयाबीन, होहोबा राजस्थान में उत्पन्न होने वाली प्रमुख तिलहन फसले है। तिलहन उत्पादन में राजस्थान का तीसरा स्थान है। तिलहन उत्पादन में उत्तर प्रदेश प्रथम है। किन्तु सरसों व राई के उत्पादन में राजस्थान प्रथम स्थान रखता है।

सरसों

राजस्थान का भरतपुर जिला सरसों के उत्पादन में राज्य में प्रथम स्थान पर है। केन्द्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र सेवर भरतपुर की स्थापना 1983 में की गयी।

मूंगफली

विश्व में मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत में होता है। भारत में गुजरात राज्य मूंगफली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। राजस्थान का देश में मंूगफली के उत्पादन में चौथा स्थान है। राज्य का जयपुर जिला मूंगफली के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। बीकानेर का लूणकरणसर क्षेत्र उत्तम मंूगफली के लिए प्रसिद्ध है अतः उसे ? ? राजस्थान का राजकोट भी कहा जाता है।

तिल सोयाबीन अरण्डी

राज्य में तिल पाली जिले में अरण्डी जालौर जिले में, सोयाबीन झालावाड़ में उत्पन्न होती है। सोयाबीन राजस्थान राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग (हडौती) में होती है। इसमें सर्वाधिक प्रोटीन होती है। भारत में सर्वाधिक सोयाबीन मध्यप्रदेश में होता है।

हो होबा (जोजोबा)

यह एक प्रकार का तिलहन है इसे भारत में इजराइल से मगाया गया। इसका जन्म स्थान एरिजोना का मरूस्थल है। भारत में इसकी खेती की शुरूआत सर्वप्रथम सी.ए.जे.आर.आई संस्थान जोधपुर द्वारा की गयी। इसकी खेती इन क्षेत्रों में की जाती है जहां सिंचाई के साधनों का अभाव पाया जाता है। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, बडी-2 मशीनरियो व हवाई जहाजों में लुब्रिकेण्टस के रूप में किया जाता है।

राजस्थान में होहोबा के तीन फार्म है –

ढण्ड (जयपुर)
फतेहपुर (सीकर) सहकारी
बीकानेर (नीजी)
CAZRI (काजरी)

आस्ट्रेलिया व यूनेस्को के सहयोग से TITUTE (केन्द्रिय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केन्द्र) स्थापना 1959 इसका मुख्यालय जोधपुर में है। काजरी का प्रमुख कार्य मरूस्थलीय प्रसार को रोकना, वृक्षा रोपण को बढावा देना और मरूस्थलीय क्षेत्र की समस्याओं का निवारण करना है। इसके 5 उपकेन्द्र – बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज, लदाख।

नोट- 1998 में राजस्थान के सभी जिलों में काजरी संस्थान में ही विज्ञान सेवा केन्द्रो की स्थापना की गयी।

उत्पादन क्रान्तियां

1      हरित क्रांति      खाद्यान्न
2      श्वेत क्रांति      दुग्ध
3      पीली क्रांति      तिलहन (सरसों)
4      नीली क्रांति      मत्स्य
5      गुलाबी क्रांति      झींगा
6      काली (कृष्ण)       पेट्रोलियम (पैट्रोल, डीजल, केरोसीन)
7      लाल क्रांति      टमाटर
8      सुनहरी क्रांति      देशी अण्डा
9      रजत क्रांति      फार्मी अण्डा
10      भूरी क्रांति      खाद्य प्रसंस्करण
11      बादामी क्रांति      मसाला उत्पादन
12      स्लेटी क्रांति      सीमेण्ट
13      गोल क्रांति      आलू
14      इन्द्रधनुष क्रांति      सभी कृषि उत्पादन
खस का उत्पादन

सवाई माधोपुर, भरतपुर, टोंक

मसाला उत्पादन

विश्व में मसाला उत्पादन में भारत प्रथम स्थान रखता है। भारत में राजस्थान मसाला उत्पादन में प्रथम है। किन्तु गरम मसालों के लिए केरल राज्य प्रथम स्थान पर है। केरल को भारत का स्पाइस पार्क भी कहा जाता है। राज्य में दक्षिण-पूर्व का बारां जिला राज्य में मसाला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान का प्रथम मसाला पार्क -झालावाड़ में है।

मसाले      सर्वाधिक उत्पादक जिला
मिर्च      जोधुपर
धनियां      बारां
सोंफ      कोटा
जिरा, इसबगोल      जालौर
हल्दी, अदरक      उदयपुर
मैथी      नागौर
लहसून      चित्तैडगढ़

फल उत्पादन      गंगानगर
फल      सर्वाधिक उत्पादक जिला
अंगूर      श्री गंगानगर
कीन्नू      श्री गंगानगर
माल्टा      श्री गंगानगर
मौसमी      श्री गंगानगर
संतरा      झालावाड़ (राजस्थान का नागपुर)
चीकू      सिरोही
सेब      माउन्ट आबू (सिरोही)
नींबू      धौलपुर
आम      भरतपुर
केला      बांसवाडा
नाशपति      जयपुर
मतीरा      टोंक/बीकानेर
पपीता/खरबूजा      टोंक
केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान -दुर्गापुरा (जयपुर)

यांत्रिक कृषि फार्म

सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म – गंगानगर

क्षेत्रफल -12410 वर्ग हैक्टेयर

स्थापना- 15 अगस्त 1956

एशिया का सबसे बड़ा यांत्रिक कृषि फार्म है। सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित किया। इसका मुख्य कार्य कृषि क्षेत्र में यंत्रों को बढ़ावा देना, अच्छी नस्ल के पशुओं का कृषि कार्य में उपयोग करना है।

जैतसर यांत्रिक कृषि फार्म – श्रीगंगानगर

स्थापना -26 जनवरी 1962 (कनाडा)

क्षेत्रफल -12140 वर्ग हेक्टेयर

एशिया का दूसरा सबसे बडा यांत्रिक फार्म

कृषि से संबंधित योजनाऐं

1.भागीरथ योजना

कृषि संबंधित इस योजना के अन्तर्गत स्वयं ही खेती में ऐसे लक्ष्य निर्धारित करता है। जो कठिन होता हैं और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रयत्न भी करते है। इसके लिए जयपुर में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

2.निर्मल ग्राम योजना

गांवो में कचरे का उपयोग कर कम्पोस खाद तैयार करने हेतु शुरू की गई।

राजस्थान की मंडिया

जीरा मंडी      मेडता सिटी (नागौर)
सतरा मंडी      भवानी मंडी (झालावाड)
कीन्नू व माल्टा मंडी      गंगानगर
प्याज मंडी      अलवर
अमरूद मंडी      सवाई माधोपुर
ईसबगोल (घोडाजीरा) मंडी      भीनमाल (जालौर)
मूंगफली मंडी      बीकानेर
धनिया मंडी      रामगंज (कोटा)
फूल मंडी      अजमेर
मेहन्दी मंडी      सोजत (पाली)
लहसून मंडी      छीपा बाडौद (बारां)
अखगंधा मंडी      झालरापाटन (झालावाड)
टमाटर मंडी      बस्सी (जयपुर)
मिर्च मंडी      टोंक
मटर (बसेडी)       बसेड़ी (जयपुर)
टिण्डा मंडी      शाहपुरा (जयपुर)
सोनामुखी मंडी      सोजत (पाली)
आंवला मंडी      चोमू (जयपुर)
राजस्थान में प्रथम निजी क्षेत्र की कृषि मण्डी कैथून (कोटा) में आस्ट्रेलिया की ए.डब्लू.पी. कंपनी द्वारा स्थापित की गई है।

राजस्थान में सर्वाधिक गुलाब का उत्पादन पुष्कर (अजमेर) में होता है। वहां का ROSE INDIA गुलाब अत्यधिक प्रसिद्ध है। राजस्थान में चेती या दशमक गुलाब की खेती खमनौगर (राजसमंद) में होती है।

रतनजोत- सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा

अफीम- चितौड़गढ़, कोटा, झालावाड

सोयाबीन – झालावाड़, कोटा, बारां

हरित क्रांति

नारमन. ए. बोरलोग नामक कृषि वैज्ञानिक ने शुरू की 1966 में भारत में इसकी शुरूआत एम.एस. स्वामीनाथन ने की।

श्वेत क्रांति

भारत में इसकी शुरूआत वर्गीज कुरियन द्वारा 1970 में की गई। इस क्रांति को “ऑपरेशन फ्लड” भी कहते है। डॉ वर्गीज कुरियन अमूल डेयरी के संस्थापक भी है। जिसका मुख्यालय गुजरात को आनंद जिला है।

राज्य में संविदा खेती 11 जून 2004 में प्रारम्भ हुई

जालौर -समग्र मादक पदार्थो उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है।

कृषि के प्रकार

श्शुष्क कृषि
सिचित कृषि
मिश्रित कृषि
मिश्रित खेती

1.शुष्क कृषि

ऐसी कृषि जो रेगिस्तानी भागों में जहां सिंचाई का अभाव हो शुष्क कृषि की जाती है। इसमें भूमि में नमी का संरक्षण किया जात है।

(अ) फ्वारा पद्धति

(ब) ड्रिप सिस्टम

इजराइल के सहयोग से। शुष्क कृषि में इसका उपयोग किया जाता है।

2.सिचित कृषि

जहां सिंचाई के साधन पूर्णतया उपलब्ध है। उन फसलों को बोया जाता है जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

3.मिश्रित कृषि

जब कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है तो उसे मिश्रित कृषि कहा जाता है।

4.मिश्रित खेती

जब दो या दो से अधिक फसले एक साथ बोई जाये तो उसे मिश्रित खेती कहते है।

5.झूमिग कृषि

इस प्रकार की कृषि में वृक्षों को जलाकर उसकी राख को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में इस प्रकार की खेती को वालरा कहा जाता है। भील जनजाति द्वारा पहाडी क्षेत्रों में इसे “चिमाता” व मैदानी में “दजिया” कहा जाता है। इस प्रकार की खेती से पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान पहुंचता है। राजस्थान में उदयपुर, डूंगरपुर, बारां में वालरा कृषि की जाती है।


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राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

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राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन

भारत में पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है। ऐतिहासिक ग्रन्थों के अनुसार ईसा पूर्व से ही हमें पंचायतों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। उस समय ग्राम पंचायत का प्रमुख ‘ग्रामणी’ से होता था अथर्ववेद में ‘ग्रामणी’ शब्द का उल्लेख मिलता है। यहॉ गठित महासभा विस: कहलाती थी बौद्धकाल में शासन की ईकाई ‘ग्राम’ थी जिसका मुखिया ‘ग्रामयोजक’ होता था जो ग्रामसभा द्वारा चुना जाता था ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा कहा जाता था मौर्यशासन में भी पंचायतों को सुदृढ बनाने में महत्वपूर्ण भूमि का का निर्वहन किया गया मुगलकाल में प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई गांव ही थी जिसका प्रबंध पंचायतों द्वारा किया जाता था तथा जिसका मुखिया मुकद्दम कहलाता था आधुनिक भारत में निर्वाचित एवं जनता के प्रति जवाबदेह स्वायत व्यवस्था का प्रथम बीजारोपण ब्रिटिश शासनकाल में सन् 1667 में मद्रास नगर परिषद में हुआ गवर्नर जनरल व वायसराय लॉर्ड रिपन ( (1880-1884)) ने सर्वप्रथम 1882 ई. में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत एवं न्याय पंचायत का प्रस्ताव कर देश में स्थानीय स्वशासन की ठोस बुनियाद रखी इस कारण रिपन को देश में ‘स्थानीय स्वशासन का पिता’ कहा जाता है। सन् 1919 में ‘माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारो’ के तहत स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया सर्वप्रथम 1919 में बंगाल में ‘स्थानीय सरकार अधिनियम, 1919’ पारित किया गया उसके पश्चात सभी प्रान्तों में अधिनियम पारित कर पंचायतों की स्थापना की गई परन्तु उनमें पंचों का चुनाव जनता द्वारा न होकर सरकार द्वारा मनोनयन किया जाता था राजस्थान में बीकानेर पहली देशी रियासत थी जहां 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम पारित कर ग्राम पंचायतों को वैधानिक दर्जा दिया गया जयपुर रियासत में 1938 में ग्राम पंचायत अधिनियम लागू किया गया था ।

महात्मा गाँधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी पंचायती राज ग्राम स्वराज्य का आधार है। उन्होनें पंचायती राज व्यवस्था का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘ माइ पिक्चर ऑफ फ्री इण्डिया’ में किया गया है। उन्होने गाँवों से सर्वांगीण विकास का सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम ग्राम पंचायतों को बताया था पंचायती राज व्यवस्था के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 40 में भी इसका प्रावधान है। इसके अनुसरण में विभिन्न राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के लिए अधिनियम पारित कर इन्हें साकार रूप प्रदान किया है।
ग्रामीण विकास में जनस‍हभागिता प्राप्त करने एवं अधिकार व शक्तियों के प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण हेतु सलाह देने के उद्देश्य से जनवरी 1957 में श्री बलवंतराय मेहता समिति की स्थापना की गई इस समिति ने 24 नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देते हुए देश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की सिफारिश की गई इन सिफारिशों की क्रियान्वित में 2 अक्टूम्बर 1959 को सर्वप्रथम राजस्थान में नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया इस प्रकार ‘पंचायती राज’ के बापू के स्वप्न को पूरा करने की ओर कदम उठाया गया उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री स्व. श्री मोहनलाल सुखाड़िया लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थक थे राजस्थान के बाद 11 अक्टूम्बर 1959 को आंध्रप्रदेश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समितियां व जिला स्तर पर जिला परिषदें गठित की गई पंचायतों की व्यवस्था के लिए तो पहले से ही राजस्थान पंचायत समिति और जिला परिषद अधिनियम, 1959 बनाया गया।
 2 अक्टूम्बर, 2009 को पंचायती राज प्रणाली के 50 वर्ष पूर्ण हुए हैं अतः इसकी स्वर्ण जयंती है। इस उपलक्ष में नागौर में 02-10-2009 को इसका स्वर्णजयन्ती समारोह मनाया गया ।
1965 के बाद पंचायती राज व्यवस्था में गिरावट आने लगी तथा ये संस्थाएं लगभग निष्प्रभावी सी होने लगी जिसका मुख्य कारण अधिकांश राज्यों में उनके चुनावों का बार बार स्थगित होना उनको अधिकारों का विकेन्द्रीकरण बहुत कम मात्रा में होना तथा वितीय साधनों की कमी होना था ।पंचायती राज व्यवस्था का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए समय समय पर विभिन्न समितियों का गठन किया गया ।
सादिक अली अध्ययन दल पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा 1964 में यह अध्ययन दल गठित किया गया। इसकी महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायत समिति के प्रधान तथा जिला परिषद के प्रमुख का चुनाव इन संस्थाओं के सदस्यों द्वारा किये जाने के स्थान पर वृहतर निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें ग्राम पंचायत के अध्यक्ष तथा सदस्य सभी सम्मिलित हों।
गिरधारीलाल व्यास समिति – 1973 में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति जिसने प्रत्येक क पंचायत के लिए ग्राम सेवक तथा सचिव नियु‍क्त करने तथा पंचायतीराज संस्थाओं को पर्याप्त वितीय संसाधन दिये जाने पर बल दिया।
अशोक मेहता समिति  पंचायतीराज व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए 1977-78 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति ने जिला स्तर और मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश की थी। इन्होने मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का केन्द्र बिन्दु बनाने का सुझाव दिया।
एल.एम. सिंघवी समिति – 1986 में गठित इस समिति द्वारा पंचायतीराज संस्थाओं को स्थानीय शासन की आधारभूत ईकाई के रूप में मान्यता देने, ग्रामसभा को महत्व देने आदि की सिफारिश यह थी कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान के अन्तर्गत सरकार का तृतीय स्तर घोषित किया जाना चाहिए और इस हेतु संविधान में एक नया अध्याय जोड़ा जाना चाहिए 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में नया अध्याय जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को सरकार का तीसरा स्तर प्रदान कर इन्हें संवैधानिक मान्यता कर दी है।

पंचायती राज हेतु संविधान संशोधन

16 सितम्बर 1991 को पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पंचायती राज के संबंध में 72 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा ने इस विधेयक की समीक्षा हेतु श्री नाथूराम मिर्धा (राजस्थान) की अध्यक्षता में संयुक्त प्रवर समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 22 दिसम्बर 1992 को लोकसभा द्वारा तथा अगले दिन राज्यसभा में 73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित किया गया। 17 राज्यों के अनुमोदन के पश्चात राष्ट्रपति ने इसे 20 अप्रेल 1993 को अपनी स्वीकृति प्रदान की तथा एक अधिसूचना द्वारा 24 अप्रेल 1993 का यह अधिनियम मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, जम्मू कश्मीर, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र व मणिपुर के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर संपूर्ण देश में लागू हो गया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243 को नवें भाग के रूप में जोड़ा गया तथा 11 वीं अनुसूची में जोड़ी गई। जिसमें पंचायती राज संस्थाओं के 29 कार्यो को सूचीबद्ध किया गया है। इस अधिनियम के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो गई है। इस अधिनियम द्वारा यह अपेक्षा की गई थी कि देश की सभी राज्य सरकारें इस अधिनियम के लागू होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपने पुराने प्रचलित पंचायती राज अधिनियमों को निरस्त कर 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में नए पंचायती राज अधिनियम तैयार कर लागू करें। इन्हीं निर्देशों की अनुपालना में राजस्थान सरकार ने अपने पुराने दोनों अधिनियमों को निरस्त कर एक नया पंचायती राज अधिनियम तैयार कर 23 अप्रेल 1994 से लागू कर दिया जिसे हम ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994’ के नाम से पुकारते हैं। इस अधिनियम के संदर्भ में ‘राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996’ बनाए गए हैं जो 30 दिसम्बर 1996 से लागू कर दिए गए हैं।
राज्य में वर्तमान में 249 पंचायत समितियां, 9177 ग्राम पंचायतें व 33 जिला परिषदें हैं।

73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 प्रमुख प्रावधान 

 
ग्राम सभा: प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र के लिए एक ग्राम सभा होगी जिसके सदस्य उस पंचायत के अन्तर्गत आने वाले गांव या गांवों से संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्ति होंगे।
प्रत्येक राज्य में पंचायती राज की त्र‍िस्‍तरीय व्यवस्था होगी जिसमें ग्राम , मध्यवर्त व जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा परन्तु 20 लाख तक की आबादी वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन करना आवश्यक नहीं है।
कार्यकाल पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से 5 वर्ष तक होगा।
कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व ही चुनाव कराने आवश्यक होंगे किसी संस्था का विघटन किये जाने की स्थिति में विघटन से 6माह के भीतर उसके चुनाव कराने आवश्यक होंगे।
चुनाव
ग्राम व मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत के सभी सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा तथा जिला पंचायत के सभी सदस्य राज्य विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि के अनुसार चुनें जाएंगे।
अध्यक्षों का चुनाव ग्राम स्तर पर राज्य विधानमण्डल द्वारा विहित रीति से एवं मध्यवर्ती व जिला स्तर पर निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से होगा।

किसी भी पंचायती राज संस्था का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होगी।
आरक्षण
सभी पंचायतों में सभी पदों पर (अध्यक्ष पद सहित) अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गो के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें सुरक्षित होगी सभी पदों पर सभी वर्गो में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।
ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न भिन्न निर्वाचित क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आवंटित किए जाएंगे। केन्द्र सरकार ने अब पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को 27.08.09 को मंजूरी दे दी।
राज्य के विधानमंडल को यह छूट होगी कि पंचायतों में पिछड़े वर्गो के लिए भी स्थान सुरक्षित रखें।
निर्वाचन आयोग प्रत्येक राज्य में इन संस्थाओं के चुनाव निष्पक्ष व समय पर करवाने हेतु पृथक से चुनाव आयोग की स्थापना की जाएगी, जिसका प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा इसकी निुयक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी तथा उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही राष्ट्रपति द्वारा संसद् में महाभियोग प्रस्ताव पास होने के बाद हटाया जाएगा।
वित आयोग पंचायती राज संस्थाओं की वितीय स्थिति सुदृढ करने तथा पर्याप्त मात्रा में वितीय संसाधन उपलब्ध कराने हेतु सुझाव देने के लिए प्रत्येक राज्य के राज्यपाल द्वारा हर 5 साल में राज्य वित आयोग का गठन किया जाएगा जो अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को देगा।

ग्यारहवीं अनुसूची अनुच्छेद 243 छ

ग्यारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 छ)
कृषि
भूमिसुधार व मृदा संरक्षण
लघु सिंचाई, जल प्रबंध और जलग्र‍हण विकास
पशुपालन, डेयरी व मुर्गीपालन
मत्स्य पालन
सामाजिक वानिकी व कृषि वानिकी
लघु वनोपज
लघु उद्योग, खाध प्रसंस्करण उद्योग समेत
शिक्षा, प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों समेत
तकनीक प्रशिक्षण व व्यावसायिक शिक्षा
प्रौढ व अनौपचारिक शिक्षा
पुस्तकालय
सांस्कृतिक गतिवधियां
हाट व मेले
स्वास्थ्य व साफ सफाई, अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र व डिस्पेंसरियां समेत
खादी व ग्रामीण कुटीर उद्योग
ग्रामीण आवास
पेयजल
ईंधन व चारा
सड़कें व नालियां पुल जलमार्ग व अन्य साधन
ग्रामीण विद्युतीकरण, विद्युत विवरण समेत
गैर परम्परागत उर्जा स्त्रोत
गरीबी उन्मूलन
परिवार कल्याण
महिला व बाल विकास
समाज कल्याण, विकलांगों व विमंदित के कल्याण समेत
कमजोर वर्गो का कल्याण खासकर अनुसूचित जाति व जनजाति
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
सामुदायिक संपदा का रखरखाव

 

राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था

राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था
(73 वें संविधान संशोधन अधि., राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 व पंचायती राज नियम, 1996 के अधीन)

विवरण ग्राम स्‍तर (निम्‍नतम स्‍तर (9177 ग्राम पंचायतें) खंड स्‍तर (मध्‍य स्‍तर) कुल 249 ग्राम पंचायतें जिला स्‍तर (शीर्ष स्‍तर) (33 जिला परषिद्)
संस्‍था का नाम ग्राम पंचायत पंचायत समिति जिला परषिद्
क्षेत्राधिकार व गठन गॉव या गॉवों का समूह सरपंच, उपसरपंच व पंच विकास खण्‍ड ब्‍लॉक प्रधान, उपप्रधान व सदस्‍य जिला परिषद् ए‍क जिला जिला प्रमुख, उप जिला प्रमुख व सदस्‍य
सदस्‍य ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित पंच (प्रत्‍येक वार्ड से एक पंच) निर्वाचित सदस्‍य पदेन सदस्‍य सभी पंचायतों के सरपंच संबंधित क्षेत्र के राज्‍य विधानसभा सदस्‍य निर्वाचित सदस्‍य पदेन सदस्‍य, जिले की सभी लोकसभा, जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रधान, जिले की सभी लोकसभा राज्‍य सभा, व विधान सभा सदस्‍य
सदस्‍यों का निर्वाचन प्रत्‍येक वार्ड में पंजीकृत वयस्‍क सदस्‍यों द्वारा प्रत्‍यक्षः निर्वाचित पंचायत समिति क्षेत्र से प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित जिला परिषद क्षेत्र के निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित
निर्वाचित सदस्‍यों की योग्‍यता न्‍यूनतम आयु 21 वर्ष आयु 21 वर्ष आयु 21 वर्ष
निर्वाचित सदस्‍य सख्‍या न्‍यूनतम पंच 9 तीन हजार से अधिक जनसंख्‍या पर प्रति एक हजार या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त पंच न्‍यूनतम 15 एक लाख से अधिक जजसंख्‍या होने पर प्रत्‍येक अतिरिक्‍त 15 हजार या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त सदस्‍य न्‍यूनतम 17 4 लाख से अधिक जनसंख्‍या होने पर अतिरिक्‍त 1 लाख या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त सदस्‍य
निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को प्रधान जिला प्रमुख
अध्‍यक्ष का पदनाम सरपंच प्रधान जिला प्रमुख
ग्राम सभा के सभी वयस्‍क सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन
अध्‍यक्ष द्वारा त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को जिला प्रमुख को संभागीय आयुक्‍त को
उपाध्‍यक्ष उपसरपंच उपप्रधान उप जिला प्रमुख
उपाध्‍यक्ष का चुनाव निर्वाचित पंचों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन
उपाध्‍यक्ष द्वारा पद से त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को जिला प्रमुख को संभागीय आयुक्‍त को
बैठकें प्रत्‍येक 15 दिन में कम से कम एक बार प्रत्‍येक माह में कम से कम एक बार प्रत्‍येक तीन माह में कम से कम एक बार
सरकारी अधिकारी ग्राम सचिव (ग्राम सेवक ) खंड विकास अधिकारी (( )) मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी (( ))
आय के साधन राज्‍य सरकार से प्राप्‍त अनुदान कर एवं शस्तियों द्वारा प्राप्‍त आय राज्‍य सरकार से प्राप्‍त वितीय सहायता एवं अनुदान विभिन्‍न करों से प्राप्‍त आय (यथा मकान व जमीन कर, शिक्षा उपकर मेंलों पर कर आदि राज्‍य सरकार से प्राप्‍त वितीय सहायता एवं अनुदान पंचायत समितियों की आय से प्राप्‍त अंशदान जन सहयोग से प्राप्‍त धनराशि
कार्य सफाई, पेयजल व स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की व्‍यवस्‍था करना, सार्वजनिक स्‍थानों पर प्रकाश की व्‍यवस्‍था करना जन्‍म मृत्‍यु का पंजीकरण वन व पशुधन का विकास व संरक्षण मेलों/उत्‍सवो/मनोरंजन के साधनो की व्‍यवस्‍था करना भू आवंटन करना ग्रामोधोग व कुटीर उधोंगो को बढावा ग्राम पंचायत द्वारा किये कार्यो की देखरेख करना पंचायत समिति क्षेत्र में प्रारम्भिक शिक्षा की व्‍यवस्‍था किसानों के लिए उतम किस्‍म के बीज तथा खाद उपलब्‍ध कराना उतम स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराना पंचयत समिति मुख्‍यालय से गांवों तक सड़कों व पुलों का निर्माण व रखरखाव ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों के बीच समपन्‍वय करना व उन्‍हें परामर्श देना ग्राम पंचायतों व राज्‍य सरकार के बीच कड़ी का कार्य विकास कार्यो के बारे मे राज्‍य सरकार को सलाह देना पंचायत समितियों के क्रियाकलापों की सामान्‍य देखरेख करना विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करना

Rajasthan Me Panchayati Raaj Vyavastha

 

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राजस्थान की जलवायु एवं मृदा Rajasthan GK

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राजस्थान की जलवायु एवं मृदा Rajasthan GK

जलवायु परिचय

जलवायु किसी भू भाग पर लम्बी समयावधि के दौरान विभिन्न समयों में विविध वायुमण्डलीय दशाओं की औसत अवस्था को उस भू भाग की जलवायु कहते हैं। तापक्रम, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा, वायुवेग आदि जलवायु के निर्धारित घटक हैं धरातल पर विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और प्राणियों के वितरण को जलवायु ही निर्धारित करती है। यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मनुष्य के क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। कृषि, सिंचाई, वनप्रबन्धन, भवन निर्माण, भूमि उपयोग, परिवहन तथा अन्य अनेक आर्थिक कार्यक्रम जलवायु की दशाओं से बहुत ज्यादा प्रभावित होते है। अतः मनुष्य के लिए जलवायु का विशेष महत्व है।
राजस्थान देश का सबसे बडा राज्य है। इसकी जलवायु मानसूनी जलवायु का ही एक अभिन्न अंग है। राज्य के पश्चिमी भाग (61 प्रतिशत भू भाग) में मरूस्थलीय जलवायु की दशाएं पाई जाती है। राज्य का अधिकांश भाग कर्क रेखा के उत्तर में उपोष्ण कटिबन्ध में स्थित है। केवल डूँगरपुर एवं बांसवाड़ा जिले का कुछ भाग ही उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। सहारा, अरब, दक्षिण पश्चिम संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया भी इसी कटिबन्ध में स्थित है। यहॉ शुष्क जलवायु पाई जाती है। जिसमें वाष्पीकरण की मात्रा वर्षण से अधिक होती है। और जल का अभाव हमेशा बना रहता है। राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियों ने जलवायु की दृष्टि से राजस्थान को दो भागो में विभक्त किया गया है। अरावली के पश्चिम में तापक्रम में अतिशयताएं, ग्रीष्मकालीन तीव्र प्रचण्ड धूल भरी आंधियां, शुष्क गर्म झुलसा देने वाली, हवाएं आर्द्रता की कमी एवं अकाल की अवस्थाएं ग्रीष्मकालीन तीव्र प्रचण्ड धूल भरी आंधियां, शुष्क गर्म झुलसा देने वाली हवाएं आर्द्रता की कमी एवं अकाल की अवस्थाएं मिलती है। यहॉ वर्षा की मात्रा केवल अत्यंत कम ही नहीं होती बल्कि बड़ी अनियमित होती है। मेघरहित आ‍काश और कम नमी के कारण सौर विकिरण दिन के समय अधिक मात्रा में जमीन पर पहुँचता है। और रात के समय भौमिक विकिरण भी तेज होता है। फलस्वरूप यहॉ अधिकतम दैनिक तापान्तर पाए जाते है। जिनकी मात्रा 15 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक होता है। दिन अत्यधिक गर्म व रात अत्यधिक ठंडी होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 38 डिग्री सेल्सियस होता है। अरावली पर्वत श्रृँखलाएं मानसूनी हवाओं के चलन की दिशाओं के अनुरूप होने के कारण मार्ग में बाधा नहीं बन पाती अतः मानसूनी पवन घाटियों से होकर सीधी निकल जाती है। और वर्षा नहीं कर पाती इस प्रकार पश्चिम क्षेत्र अरावली का वृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण अत्यल्प वर्षा प्राप्त करता है। अरावली के पूर्वी भाग में तापक्रम में प्राय: एकरूपता, अपेक्षाकृत अधिक आर्द्रता एवं सामयिक वर्षा देखने को मिलती है। इस प्रकार इस पूर्वी भाग में आर्द्र जलवायु पाई जाती है।

राजस्थान की जलवायु की विशेषताएं

राज्य की लगभग समस्त वर्षा (90 प्रतिशत से भी अधिक) गर्मियों में (जून के अंत से जुलाई, अगस्त व मध्य सितम्बर तक) दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाओं से होती है। शीतकाल (दिसम्बर जनवरी) में बहुत कम वर्षा उतरी पश्चिमी राजस्थान में भूमध्य सागर से उत्पन्न पश्चिमी विक्षोभों से होती है। जिसे मावठ कहते है। राज्य में वर्षा का वार्षिक औसत लगभग 58 सेमी है।
वर्षा की मात्रा व समय अनिश्चित व अनियमित
वर्षा की अपर्याप्तता वर्षा के अभाव में आए वर्ष अकाल सूखे का प्रकोप रहता है।
वर्षा का असमान वितरण है। दक्षिणी पूर्वी भाग में जहां अधिक वर्षा होती है। वहीं उतरी पश्चिमी भाग में नगण्य वर्षा होती है।
राजस्थान में जलवायु के आधार पर शुष्क, उपआर्द्र, आर्द्र अति आर्द्र चारों प्रकार की जलवायु की स्थितियाँ पाई जाती हैं
तापमान की अतिशयताएँ, ग्रीष्म ऋतु का औसत तापमान 35 डिग्री से 40 डिग्री से सेल्सियस रहता है। जबकि सर्दी में 12 डिग्री से 17 डिग्री सेल्सियस रहता है। क्षेत्रवार तापमान में अधिक अंतर देखने को मिलते हैं ग्रीष्म ऋतु में दोपहर तापमान कुछ स्थानों पर कई बार 48 डिग्री से 50 डिग्री तक पहुँच जाता है। जबकि सर्दियों में हिमांक बिंदु से नीचे चला जाता है।

 

राज्य की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

राज्य की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
राज्य की अक्षांशीय स्थिति: कर्क रेखा राज्य के दक्षिणी भाग से हो कर गुजरती है। अतः राज्य का अधिकांश भाग उपोष्ण कटिबंध में आने के कारण यहॉ तापान्तर अधिक पाये जाते हैं
समुद्र तट से दूरी समुद्र तट से दूरी: समुद्र तट से दूरी अधिक होने के कारण यहॉ की जलवायु पर समुद्र की समकारी जलवायु का प्रभाव नहीं पडता अतः तापमान में महाद्वीपीय जलवायु की तरह विषमताएं पाई जाती है।
धरातल राज्य का लगभग 60-61 प्रतिशत भू-भाग मरूस्थलीय है। जहां रेतीली मिट्टी होने के कारण दैनिक व मौसमी तापांतर अत्यधिक पाये जाते है। गर्मी में गर्म व शुष्क ‘लू’ व धूलभरी हवाएं चलती है। तथा सर्दी में शुष्क व ठण्डी हवाएँ चलती है। जो रात के तापमान को हिमांक बिन्दु से नीचे ले जाती है।
अरावली पर्वत श्रेणी की स्थिति अरावली पर्वतमाला की स्थिति दक्षिणी पश्चिमी मानूसनी पवनों के समानान्तर होने के कारण पवनें यहॉ बिना वर्षा किए आगे उतरी भाग में बढ जाती है। फलत: राज्य का पश्चिमी भाग प्राय: शुष्क रहता है। जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
समुद्र तल से ऊँचाई राज्य के दक्षिणी एवं दक्षिणी पश्चिमी भाग की ऊँचाई समुद्र तल से अधिक है। अतः इस भू-भाग में गर्मियों में भी शेष भागों की तुलना में तापमान कम पाया जाता है। माउण्ट आबू पर ऊँचाई के कारण गर्मी में भी तापमान अधिक नहीं हो पाता तथा सर्दी में जमाव बिन्दु से भी नीचे पहुँच जाता है। इसके विपरीत मैदानी भागों की समुद्र तल से ऊँचाई कम होने के कारण वहाँ तापमान में अंतर अधिक पाये जाते है।

जलवायु के आधार पर मुख्य ऋतुएँ

जलवायु के आधार पर मुख्यत: तीन ऋतुएं पाई जाती है।
ग्रीष्म ऋतु – मार्च से मध्य जून
शीत ऋतु – नवम्बर से फरवरी तक
वर्षा ऋतु – मध्य जून से सितम्बर तक

ग्रीष्म ऋतु (Summer)

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण (कर्क रेखा की ओर) होने के कारण मार्च में तापमान बढने के साथ ही ग्रीष्म ऋतु प्रारम्भ होता हैं जून में सूर्य के कर्क रेखा पर लम्बवत होने के कारण तापमान उच्चतम होते हैं इस समय सम्पूर्ण राजस्थान में औसत तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के लगभग होता है। परन्तु राज्य के पश्चिमी भागों जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी तथा पूर्वी भाग में धौलपुर में उच्चतम तापमान 45-50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाते है। इससे यहॉ निम्न वायुदाब का केन्द्र उत्पन्न हो जाता है। परिणामस्वरूप यहॉ धूलभरी आंधियां चलती है। धरातल के अत्यधिक गर्म होने एवं मेघरहित आकाश में सूर्य की सीधी किरणों की गर्मी के कारण तेज गर्म हवायें जिन्हें ‘लू’ कहते हैं, चलती है। यहॉ चलने वाली आँधियों से कहीं कहीं वर्षा भी हो जाती है। अरावली पर्वतीय क्षेत्र में ऊँचाई के कारण अपेक्षाकृत कसम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस रहता है। रा‍त में रेत के शीघ्र ठण्डी हो जाने के कारण तापमान 14-15 डिग्री सेल्सियस तक रह जाता है। अतः मरूस्थलीय क्षेत्र में तापांतर अधिक 32-33 डिग्री सेल्सियस तक पाये जाते हैं ग्रीष्म ऋतु में राज्य में आर्द्रता कम पाई जाती है। दोपहर के समय यह लगभग 10 डिग्री तक या उससे भी कम रह जाती है।
वर्षा एवं पवनें तीव्र गर्मी के कारण राजस्थान के उतरी व पश्चिमी क्षेत्रों में आगे चली जाती है। इसी कारण राज्य के पश्चिमी भाग में औसतन 20 सेमी वर्षा हो पाती है। राज्य में सर्वाधिक वर्षा (75 से 100 सेमी वार्षिक) दक्षिणी पूर्वी पठारी भाग में होती है। राज्य के पूर्वी मैदानी भाग में वर्षा का सामान्य औसत 50 से 75 सेमी वार्षिक होता है।

वर्षा ऋतु

मध्य जून के बाद राजस्थान में मानसूनी हवाओं के आगमन से वर्षा होने लगती है। फलस्वरूप तापमान में कुछ कमी हो जाती है। परन्तु आर्द्रता के कारण मौसम उमस भरा हो जाता है। इस समय राज्य के अधिकांश भागों का सामान्य तापमान 18 से 30 डिग्री से. ग्रेड हो जता है। वायुदाब कम होने के कारण हिन्द महासागर के उच्च वायुदाब क्षेत्र से मानसूनी पवनें बंगाल की खाडी की मानसून हवाएं एवं अरब सागरीय मानसूनी हवाएं राज्य में आती है। जिनसे यहॉ वर्षा होती है। ये मानसूनी हवाएं दक्षिणी पश्चिमी हवाऐं कहलाती है। राज्य की लगभग अधिकांश वर्षा इन्ही मानसूनी पवनों से होती हैं। यहॉ आने वाली बंगाल की खाडी की मानसूनी पवनें गंगा यमुना के सम्पूर्ण मैदान को पार कर यहॉ आती है। अतः यहॉ आते आते उनकी आर्द्रता बहुत कम रह जाती है। इस कारण राजस्थान में वर्षा की कमी रह जाती है। अरावली पर्वत होने के कारण ये राज्य के पूर्वी व दक्षिणी पूर्वी भाग में ही वर्षा करती है। तथा राज्य के उतर व पश्चिमी भाग में बहुत कम वर्षा कर पाती है। इस मानसूनी हवाओं को यहॉ पुरवाई (पुरवैया) कहते है। अरब सागर की मानसूनी हवाएं अरावली पर्वत के समानान्तर चलने के कारण अवरोधक के अभाव में यहॉ बहुत कम आगे बढ जाती है। राज्य में अधिकांश वर्षा जुलाई-अगस्त माह में ही होती है। सितम्बर में वर्षा की मात्रा कम होती है।
राजस्थान को अरावली पर्वतमाला की मुख्य जल विभाजक रेखा के सहारे सहारे गुजरने वाली 50 सेमी समवर्षा रेखा लगभग दो भिन्न भिन्न जलवायु प्रदेशों में विभक्त करती है। इस समवर्षा (50 सेमी) रेखा के पश्चिमी भाग में वर्षा का अभाव न्यूनता, सूखा, आर्द्रता की कमी, वनस्पति की न्यूनता एवं जनसंख्या घनत्व में कमी पाई जाती है। इसके विपरीत इस समवर्षा रेखा के पूर्वी भाग में आर्द्रता अधिक, अधिक वर्षा, कृषि की अपेक्षाकृत ठीक स्थिति एवं आबादी की गहनता आदि विशेषताएं पाई जाती है। वर्षा की मात्रा राज्य में उतर पूर्व से उतर पश्चिम एवं पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है। पिछले कुछ वर्षो से कभी कभी पश्चिमी भाग में भी वर्षा की मात्रा बढ गई हैं।

शीत ऋतु

22 दिसम्बर को सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा पर लम्बवत चमकने लगता है। फलस्वरूप उतरी गोलार्द्ध में तापमान में अत्यधिक कमी हो जाती है। राजस्थान के कुछ रेगिस्तानी क्षेत्रों में रात का तापमान शून्य या इससे भी कम हो जाता हैं दिन के तापमान भी बहुत कम हो जाते है। कई बार तापमान शून्य या इससे भी कम हो जाने पर फसलों पर पाला पड जाने से वे नष्ट हो जाती है। शीत ऋतु में राजस्थान में कभी कभी भूमध्य सागर से उठे पश्चिमी वायु विक्षोभों के कारण वर्षा हो जाती है। जिसे मावट कहते है। यह वर्षा रबी की फसल के लिए लाभदायक होती है। इस ऋतु में कभी कभी उतरी भाग से आने वाली ठण्डी हवाएं शीत लहर का प्रकोप डालती है। यहॉ जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पडती है। वायुमण्डल में इस समय आर्द्रता कम पाई जाती है।
अक्टूम्बर नवम्बर में राज्य में मानसूनी हवाओं के प्रत्यावर्तन का समय (Winter) होता है। सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ ही तापमान धीरे धीरे गिरने लगता है। एवं इन माहों में राज्य में 20-30 से. ग्रेड तापमान हो जाता है। इस अवधि में यहॉ वर्षा भी नहीं होती है।

राज्य में कम वर्षा के कारण

राज्य में कम वर्षा के कारण
बंगाल की खाड़ी का मानसून राजस्थान में प्रवेश करने से पूर्व गंगा के मैदान में अपनी आर्द्रता लगभग समाप्त कर चुका होता है।
अरब सागर से आने वाली मानसून हवाओं की गति के समानान्तर ही अरावली पर्वत श्रेणियां हैं, अतः हवाओं के बीच अवरोध न होने से वे बिना वर्षा किये आगे बढ जाती हैं
मानसूनी हवाएं जब रेगिस्तानी भाग पर आती है। तो अत्यधिक गर्मी के कारण उनकी आर्द्रता घट जाती है। जिससे वे वर्षा नहीं कर पाती

राजस्थान के जलवायु प्रदेश

जलवायु प्रदेश 
तापक्रम, वर्षा व आर्द्रता के आधार पर राज्य को निम्न जलवायु प्रदेशों में बांटा जा सकता हैः-

शुष्क जलवायु प्रदेश – क्षेत्र जैसलमेर उतरी बाड़मेर, दक्षिणी गंगानगर, हनुमानगढ तथा बीकानेर व जोधपुर का पश्चिमी भाग ।

औसत वर्षा 0-20 से. मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 34-40 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12 से 16 डिग्री सेल्सियस पाया जाता है। गर्मियों में दिन का तापमान 48-49 सेल्सियस तथा सर्दियों में रात में न्यूनतम तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। अतः दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर अधिक पाये जाते है। यह प्राकृतिक वनस्पति रहित प्रदेश है। गर्म शुष्क जलवायु के कारण रेत भरी आंधियां व लू चलती हैं ।

अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश: क्षेत्र- चुरू, गंगानगर, हनुमानगढ, द. बाड़मेर, जोधपुर, व बीकानेर का पूर्वी भाग तथा पाली, जालौर, सीकर, नागौर व झुन्झुनू का पश्चिम भाग ।
औसत वर्षा 20-50 से.मी. व औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 30-36 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 10-17 डिग्री सेल्सियस होता है।
कांटेदार झाड़ियाँ व घास की प्रधानता कृषि व पशुपालन मुख्य कार्य । वनस्पति के रूप में आक, खेजडी, रोहिडा, बबूल, कंटीली झाड़ियाँ, फोग आदि वृक्ष, सेवण व लीलण घास आदि पाई जाती है।

उपआर्द्र जलवायु प्रदेश: 
क्षेत्र अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर, व झुन्झुनू का पूर्वी भाग तथा टोंक, भीलवाड़ा व सिरोही का उतरी पश्चिमी भाग ।
औसत वर्षा 40-60 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 28-34 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12-18 डिग्री सेल्सियस रहता है।
पतझड़ वाली वनस्पति जैसे नीम, बबूल, आम, आँवला, खेर, हरड़, बहड़ आदि वृक्ष पाए जाते है।

आर्द्र जलवायु प्रदेश 
क्षेत्र भरतपुर,धौलपुर, कोटा, बून्दी, सवाईमाधोपुर, उ.पू. उदयपुर, द.पू. टोंक तथा चितौड़गढ ।
औसत वर्षा 60-80 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 32-35 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 14-17 डिग्री सेल्सियस होता है।
सघन वनस्पति पाई जाती है। नीम, इमली, आम, शहतूत, गुलाब, गुग्गल, जामुन, पीपल, बरगद, बेर, धोकड़ा आदि वृक्ष बहुतायत में पाए जाते है।
इसी जलवायु क्षेत्र में प्रसिद्ध रणथम्भौर अभयारण्य व केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य है।

अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र द.पू. कोटा, बारां, झालावाड़, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, डूँगरपुर, द.पू. उदयपुर व माउन्ट क्षेत्र
औसत वर्षा 80-150 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 30-34 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12-18 डिग्री सेल्सियस रहता है।
मानसूनी सवाना प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। आम, शीशम, सागवान, शहतूत, बॉस, जामुन, खेर आदि वृक्षों को बहुतायत है।

 

जलवायु महत्वपूर्ण तथ्य

जलवायु महत्वपूर्ण तथ्य
सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – माउण्ट आबू
राजस्थान का सबसे वर्षा वाला जिला – झालावाड़
सबसे ठंडा महीना – जनवरी
सबसे गर्म महीना – जमन
न्यूनतम वर्षा वाला स्थान जैसलमेर
आर्द्रता वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते है। आपेक्षिक आर्द्रता मार्च-अप्रेल में सबसे कम व जुलाई- अगस्त में सर्वाधिक होती है।
मरूस्थल में चलने वाली अति गर्म व शुष्क हवाएँ लू कहलाती है।
समुद्र तल से ऊँचाई बढने के साथ तापमान घटता है। इसके घटने की यह सामान्य दर 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 सेंटीग्रेड हैं
राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग से दक्षिणी पूर्वी भाग की ओर तापमान में कमी दृष्टिगोचर होती जाती है।
टांका राजस्थान में मारवाड़ व शेखावाटी क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्र‍ित करने हेतु घरों में बनाये गए जलकुण्ड इस पानी को वर्षभर प्रयोग में लिया जाता है। यह पानी पालर पानी कहलाता है।

 

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राजस्थान पशु सम्पदा 19वीं पशु गणना Rajasthan GK

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राजस्थान पशु सम्पदा 19वीं पशु गणना Rajasthan GK

पशु सम्पदा
राजस्व मण्डल अजमेर- प्रत्येक 5 वर्ष में पशुगणना करता है।

19 वीं पशुगणना 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर 2012 तक की गई।

18 वीं पशुगणना 2007 में आयोजित की गई जो नस्ल के आधार पर प्रथम गणना थी।

भारत में प्रथम पशुगणना 1919 में आयोजित की गई। तब राज्य की कुछ रियासतों ने भी पशुगणना करवाई।

राजस्थान में कुल पशु – 5.77 करोड़

सबसे ज्यादा पशुधन -बाडमेर

सबसे कम पशुधन- धौलपुर

वर्ष 2012 की पशु गणना के अनुसार राज्य में पशु घनत्व 169 है।

वर्ष 2012 की पशु गणना में सर्वाधिक पशुघनत्व – डूंगरपुर

वर्ष 2012 की पशु गणना में न्यूनतम पशुघनत्व -जैसलमेर

पशु      कुल पशु      सर्वाधिक      न्यूनतम
बकरी      216 लाख      बाडमेर      धौलपुर
गाय      133 लाख      उदयपुर      धौलपुर
भैंस      129 लाख      अलवर      जैसलमेर
भेड      90.79 लाख      बाड़मेर      धौलपुर
घोडे़      37776      बाडमेर      बांसवाडा
कुक्कुट      80.24 लाख      अजमेर      धौलपुर
गधे-खच्चर      81 हजार      बाडमेर      टोंक
ऊंट      3.25 लाख      बाडमेर      धौलपुर
सूअर      2.37 लाख      भरतपुर      बांसवाडा
भारत में राजस्थान दुग्ध उत्पादन 12 प्रतिशत के साथ दुसरे स्थान पर है।

पशुपालन व पशुपालन प्रसंस्करण से लगभग 9 से 10 प्रतिशत राजस्व की प्राप्ति होती है।

भारत की कुल पशु सम्पदा का 10 प्रतिशत भाग राजस्थान का है।

ऊन उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। तथा सम्पुर्ण राष्ट्र की लगभग 40 प्रतिशत ऊन उत्पादित होती है।

दूध उत्पादन की दृष्टि से हमारे देश का विश्व में प्रथम स्थान है, तथा राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है।

राजस्थान में सर्वाधिक दूध उत्पादन जयपुर, गंगानगर व अलवर जिले में व न्यूनतम दूध उत्पादन बांसवाड़ा में होता है।

राजस्थान में सर्वाधिक पशु मेले आयोजित होने वाले जिले – नागौर (3 मेले), झालावाड़ (2 मेले)।

राजस्थान के पशु मेले
वीर तेजाजी पशु मेला – परबतसर (नागौर)
बलदेव पशु मेला – मेड़ता शहर (नागौर)
रामदेव पशु मेला – नागौर
चन्द्रभागा पशु मेला – झालावाड़
गोमती सागर पशु मेला – झालावाड़
मल्लीनाथ पशु मेला – तिलवाड़ा (बाड़मेर)
गोगामेड़ी पशु मेला – गोगामेड़ी (नोहर)
कार्तिक पशु मेला – पुष्कर (अजमेर)
जसवन्त पशु मेला – भरतपुर
महाशिवरात्री पशु मेला – करौली
पशु प्रजनन केन्द्र
केन्द्रीय भेड़ प्रजनन केन्द्र – अविकानगर, टोंक।
केन्द्रीय बकरी अनुसंधान केन्द्र – अविकानगर,टोंक।
बकरी विकास एवं चारा उत्पादन केन्द्र – रामसर, अजमेर।
केन्द्रीय ऊंट प्रजनन केन्द्र – जोहड़बीड़, बीकानेर (1984 में)।
भैंस प्रजनन केन्द्र – वल्लभनगर, उदयपुर।
केन्द्रीय अश्व प्रजनन केन्द्र –
विलड़ा – जोधपुर
जोहड़बिड़ – बीकानेर।
सुअर फार्म – अलवर।
पोल्ट्री फार्म – जयपुर।
कुक्कड़ शाला – अजमेर।
गाय भैंस का कृत्रिम गर्भधारण केन्द्र (फ्रोजन सिमन बैंक)
बस्सी, जयपुर
मण्डौर, जोधपुर
राज्य भेड़ प्रजनन केन्द्र – चित्तौड़गढ़, जयपुर, फतेहपुर (सीकर), बांकलिया (नागौर)
राज्य गौवंश प्रजनन केन्द्र – बस्सी (जयपुर), कुम्हेर (भरतपुर), डग (झालावाड़), नोहर (हनुमानगढ़), चांदन (जैसलमेर), नागौर।
बकरियां
राजस्थान में सबसे बड़ा पशुधन बकरियां है। 19 वीं पशु गणना के अनुसार इनकी कुल संख्या 80.24 लाख थी।

देश का कुल बकरा मांस उत्पादन में राजस्थान का प्रथम (35 प्रतिशत) स्थान है।

बकरी की नस्ल

जमनापुरी – सर्वाधिक दूध देने वाली बकरी
लोही – सर्वाधिक मांस देने वाली बकरी
जखराना – सर्वाधिक दूध व सांस देने वाली श्रेष्ठ नस्ल – अलवर
बरबरी – सुन्दर बकरी – भरतपुर, सवाई माधोपुर
अन्य बकरी की नस्ल – परबतसरी, सिरोही व मारवाड़ी।

गाय
गौवंश की नस्लें

1. गिर गाय – उद्गम – गिर प्रदेश (गुजरात)।

इसे रेडां/अजमेरा भी कहते हैं।

अजमेर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा।

2. राठी – लालसिंधी एवं साहिवाल की मिश्रण नस्ल।

सर्वाधिक दूध देने वाली गाय की श्रेष्ठ नस्ल।

गंगानगर, जैसलमेर, बीकानेर।

3. थारपारकर – उद्गम – बाड़मेर का मालाणी प्रदेश।

दुसरी सर्वाधिक दूध देने वाली गाय।

उत्तरी – पश्चिमी सीमावर्ती जिले।

4. नागौरी – उद्गम – नागौरी का सुहालक प्रदेश।

इसका बैल चुस्त व मजबुत कद काठी का होता है।

नागौर, बीकानेर, जोधपुर।

5. कांकरेज – उद्गम – कच्छ का रन।

गाय की द्विप्रयोजनीय नस्ल।

जालौर, पाली, सिरोही, बाड़मेर।

6. सांचौरी – जालौर, पाली, उदयपुर।

7. मेवाती – अलवर, भरतपुर,कोठी (धौलपुर)।

8. मालवी – मध्यप्रदेश की सीमा वाले जिले।

9. हरियाणवी – हरियाणा के सीमा वाले जिले।

भैंस
भैंस की नस्ल

1. मुर्रा (कुन्नी) – सर्वाधिक दूध देने वाली भैंस की नस्ल।

जयपुर, अलवर।

2. बदावरी – इसके दूध में सर्वाधिक वसा होती है।

भरतपुर, सवाई माधोपुर, अलवर।

3. जाफाराबादी – भैंस की श्रेष्ठ नस्ल।

कोटा, बारां, झालावाड़।

अन्य नस्ल – नागपुरी, सुरती, मेहसाना।

भेड़

भेड़ की नस्लें

1. चोकला (शेखावटी) – इसका ऊन श्रेष्ठ किस्म का होता है इसे भारत की मेरिनों कहते है। चुरू, सीकर, झुन्झुनू।

2. जैसलमेरी – सर्वाधिक ऊन देने वाली भेड़ की नस्ल।

क्षेत्र – जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर।

3. नाली – इसका ऊन लम्बे रेशे का होता है, जिसका उपयोग कालीन बनाने में किया जाता है।

क्षेत्र – गंगानगर, बीकानेर, चुरू, झुन्झुनू।

4. मगरा – सर्वाधिक मांस देने वाली नस्ल।

क्षेत्र – जैसलमेर, बीकानेर, चुरू, नागौर।

5. मारवाड़ी – इसमें सर्वाधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है।

क्षेत्र – जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर।

6. सोनाड़ी/चनोथर – लम्बे कान वाली नस्ल।

क्षेत्र – उदयपुर, डुंगरपुर, बांसवाड़ा।

7. पूंगला – बीकानेर में।

8. मालपुरी/अविका नगरी – टोंक, बुंदी, जयपुर।

9. खेरी नस्ल – भेड़ के रेवड़ों में पाई जाती है।

ऊंट
अन्य पशुधन में ऊंटों की संख्या सर्वाधिक है। 19 वीं पशुगणना के अनुसार राजस्थान में ऊंट 3.25 लाख थे।

ऊंट की नस्ल

1. नांचना – सवारी व तेज दौड़ने की दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंट।

2. गोमठ – भारवाहक के रूप में प्रसिद्ध ऊंट।

फलौदी (जोधपुर)।

अन्य नस्ल – अलवरी, बाड़मेरी, बीकानेरी, , कच्छी ऊंट, सिन्धी ऊंट।

जैसलमेरी ऊंट – मतवाली चाल के लिए प्रसिद्ध।

रेबारी ऊंट पालक जाती है। पाबू जी राठौड की ऊंटों का देवता भी कहा जाता है। ऊंटों में सर्रा नामक रोग पाया जाता है।

केन्द्रीय ऊंट प्रजनन केन्द्र जोडबीड (बीकानेर) में है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा इस केन्द्र की स्थापना की गई है। राजस्थान में देश के 70 प्रतिशत ऊंट पाये जाते है। विश्व में सर्वाधिक ऊंट आस्ट्रेलिया में है।

राजस्थान का ऊन उत्पादन में देश में प्रथम स्थान है।

केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड – जोधपुर।

केन्द्रीय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला – बीकानेर।

राजस्थान में सर्वाधिक ऊन उत्पादन जोधपुर, बीकानेर, नागौर में व न्यूनतम ऊन उत्पादन झालावाड़ में होता है।
नोट – केन्द्रीय ऊंट प्रजनन केन्द्र जोहडबीड़ बीकानेर की स्थापना -5 जुलाई 1984।

कुक्कुट
पशुगणना के समय मुर्गे मुर्गियों की गणना भी की जाती है। 19 वीं पशुगणना के समय इनकी संख्या 80.24 लाख थी। सर्वाधिक कुक्कुट अजमेर में व देशी कुक्कुट बांसवाडा जिले में है।

अजमेर में मुर्गी पालन प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है। अण्डों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रजत व सुनहरी क्रांतियां आरम्भ की गई है।

“हॉप एण्ड मिलियम जोब प्रोग्राम” अण्डों के विपणन हेतु आरम्भ की गई है।

रानी खेत व बर्डफ्लू मुर्गे व मुर्गियों में पाये जाने वाली प्रमुख बिमारियां है।

राजकीय कुक्कुटशाला – जयपुर।

डुंगरपुर व बांसवाड़ा में दो बतख व चूजा पालन केन्द्र स्थापित किये हैं, जो आदिवासीयों को बतख व कुक्कुट चूजे उपलब्ध करवाता है।

घोड़े
घोड़े की नस्ल

मालाणी – बाड़मेरी, जोधपुर।

मारवाड़ी – जोधपुर, बाड़मेर, पाली, जालौर।

“अश्व विकास कार्यक्रम” पशुपालन विभाग द्वारा संचालित -मालाणी घोडे नस्ल सुधार हेतु।

केन्द्रीय अश्व उत्पादन परिसर- बीकानेर के जोडबीड स्थित इस संस्था में चेतक घोडे के वंशज तैयार किये जाएंगे।

राजस्थान में डेयरी विकास
राजस्थान में विकास कार्यक्रम गुजरात के ‘अमुल डेयरी‘ के सहकारिता के सिद्धान्त पर संचालित किया जा रहा है।

इनका ढांचा त्रिस्तरीय है।(डेयरी संयंत्रों का)

1. ग्राम स्तर – (प्राथमिक दुग्ध उत्पादक) सहकारी समिति

राजस्थान में संख्या – 12600

2. जिला स्तर – जिला दुग्ध संघ

राजस्थान में संख्या – 21

3. राज्य स्तर – राजस्थान सहकारी डेयरी संघ (RCDF)

स्थापना – 1977

मुख्यालय – जयपुर

राजस्थान में प्रथम डेयरी – पदमा डेयरी (अजमेर)।

राजस्थान में औसत दुग्ध संग्रहण – 18 लाख लीटर प्रतिदिन।

राजस्थान में अवशीतन् केन्द्र (कोल्ड स्टोरेज) – 30।

राजस्थान में सहकारी पशु आहार केन्द्र – 4

जोधपुर, झोटवाड़ा (जयपुर), नदबई (भरतपुर), तबीजी (अजमेर)।

जालौर के रानीवाड़ा में सबसे बडी डेयरी है।

गंगमूल डेयरी -हनुमानगढ़

उरमूल डेयरी -बीकानेर

वरमूल डेयरी -जोधपुर


 

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राजस्थान सरकार की योजनायें Schemes Of Rajasthan Government

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राजस्थान सरकार की योजनायें Schemes Of Rajasthan Government

निःसन्तान दम्पतियों के लिए योजना
इस योजना के तहत निः सन्तान दम्पति लाभान्वित होंगे जिनकी वार्षिक आय 1 लाख रुपये से अधिक न हो , महिला साथी की आयु 45 वर्ष से कम हो तथा राजस्थान सरकार से अधिकृत IVF सेन्टर पर ईलाज करा रहा हों , इसके अन्तर्गत दवाईयों पर सरकार द्वारा अधिकतम 20 , 000 रूपये तक की सहायता दी जाएगी।

घाट की गुणी सुरंग का लोकार्पण
19 जनवरी 2013 को डॉक्टर मनमोहनसिंह एवं श्रीमती सोनिया गांधी के कर कमलों द्वारा घाट की गुणी सुरंग ( जवाहर नगर , जयपुर का लोकार्पण किया गया।

जोधपुर मेट्रो :
जयपुर के बाद राजस्थान में अब जोधपुर में मेट्रो स्थापित की जाएगी।

विशेष योग्यजन को मोटराइज्ड ट्राई – साइकिल योजना :
राजस्थान सरकार के विशेष योग्यजनों को स्वरोजगार , रोजगार एवं शिक्षा के कार्यो में सुलभ आवाजाही हेतु निःशुल्क 1000 मोटराइज्ड ट्राई साइकिल उपलब्ध कराई जाएगी।
योजना की पात्रता एवं शर्तें
1 . परिवार की वार्षिक आय 2 . 50 लाख रूपये से अधिक न हो।
2 . विशेष योग्यजन 50 प्रतिशत या उससे अधिक प्रतिशत चलने के निःशक्तताधारी हो।
3 . प्रार्थी राजस्थान राज्य का मूल निवासी हों।
4 . प्रार्थी की आयु 18 वर्ष से कम न हों।

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बछड़ा पालन आपके द्वार Bachhada Paalan Apke Dwaar Rajasthan GK

बछड़ा पालन आपके द्वार Bachhada Paalan Apke Dwaar Rajasthan GK Here we are providing Rajasthan gk in hindi for upcoming exams in rajasthan. rajasthan gk questions with answers in hindi, rajasthan gk hindi, rajasthan gk notes in hindi.

बछड़ा पालन आपके द्वार Bachhada Paalan Apke Dwaar Rajasthan GK

बछड़ा पालन आपके द्वार
इस योजना के तहत राजस्थान(Rajasthan) मे गाय की प्रमुख नस्लों में गीर, राठी, थारपारकर, कांकरेंज तथा मुर्रा भैंसके बछड़ों का उनके प्रजनन क्षेत्रों (गीर- भीलवाड़ा, टोंक एवं अजमेर, राठी- बिकानेर एवं श्रीगंगानगर। थारपारकर जैसलमेर बाड़मेर एवं जोधपुर। कांकरेज जालौर, पाली, एवं सिरोही। मुर्रा भैंस भरतपुर झन्झनु, अलवर व बून्दी ) में कर वयस्क होने तक पशुपालकों के द्वार पर ही इनके पालन पोषण के लिए राशि 10 हजार रूप्ये चार किस्तों मे देने का प्रावधान है। पहली किस्त चयन होन पर (1 से 6 माह पूरे होने तक) राशि 2 हजार रूपये, दूसरी किस्त 12 माह की उम्र पूरी होने पर राशि 3 हजार रूपये, तीसरी किस्त 18 माह की उम्र पूरी होने पर राशि 2 हजार रूपये और चैथी किस्त 24 माह की उम्र पूरी होने पर राशि 3 हजार रूपये का भुगतान किया जाता है।

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