Jyoti singh, Author at Hindigk50k | Page 2 of 138

मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

कुत्ते का एक छोटा-सा पिल्ला अपने माता-पिता के साथ जंगल के पास रहता था।

एक दिन उसके माता-पिता खाना ढूंढने के लिए निकले। शाम होने लगी लेकिन वे वापिस नहीं आए।

पिल्ले को डर लगने लगा। बाद में पता चला कि किसी किसी गाड़ी से टकराकर दोनों की मृत्यु हो गई थी।

पिल्ले को बहुत रोना आया। उसे मम्मी -पापा की याद आ रही थी। रोता-रोता वह जंगल की ओर चल पड़ा।

तभी उसे एक हिरन मिला। हिरन को उस पर दया आ गई और वह पिल्ले को अपने साथ ले गया।

रात हुई तो उसने पिल्ले को सोने के लिए जगह दी। लेकिन पिल्ले को नींद नहीं आ रही थी। हर छोटी -सी आवाज पर वह बाहर निकलकर भौंकने लगता था।

हिरन को इस बात पर गुस्सा आया। उसने कहा, अगर तुम ऐसे ही बार-बार बाहर जाकर भौंकोगे तो शेर को पता हमारे बारे में पता चल जाएगा।

वह आकर हम दोनों को मार देगा। पिल्ला चुप तो हो गया लेकिन उसके मन में एक हु विचार आ रहा था, हिरन शेर से डरता है, इसलिए मुझे शेर के ही पास रहना चाहिए।

अगले दिन वह शेर के पास पहुँचा। उसने शेर को अपनी कहानी सुनाई। उसने शेर से प्रार्थना की कि वह उसे अपने साथ रहने दे।

शेर को पिल्ले पर दया आ गई। वह राजी हो गया।

रात को फिर वही हुआ। पिल्ला बार-बार भौंकने लगता था। शेर को गुस्सा आ गया।

वह जोर से दहाड़कर बोला, अगर तुम इस तरह भौंकोगे तो मनुष्य को हमारे बारे में पता चल जाएगा।

वह चुपके से आकर हम दोनों को पकड़ लेगा।

पिल्ले को आश्चर्य हुआ कि शेर भी किसी से डरता है। लेकिन उसने तय किया कि वह अगले ही दिन मनुष्य के पास जाएगा।

सुबह होते ही वह शहर की ओर चल पड़ा। उसे जो पहला मनुष्य मिला वह उससे बोला, मैं अकेला हूँ, क्या आप मुझे अपने साथ रहने देंगे ?

मनुष्य ने जब उसके माता-पिता के बारे में सुना तो उसे पिल्ले पर दया आ गई।

वह पिल्ले को अपने घर ले गया। रात हुई और पिल्ला अपनी आदत के अनुसार बाहर जाकर भौंकने लगा।

लेकिन मनुष्य नाराज नहीं हुआ।

बल्कि वह खुश हुआ। वह अब निश्चिंत था कि यदि कोई चोर उसके घर में आएगा तो कुत्ते से डरकर भाग जाएगा साथ ही कुछ गड़बड़ होगी तो कुत्ता भौंकेगा और उसकी नींद भी खुल जाएगी।

इस तरह मनुष्य और कुत्ता दोस्त बन गए। यह दोस्ती आज भी वैसी ही चल रही है।

मनुष्य और कुत्ता ऐसे बने दोस्त | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

जब सोना को दो-दो दिखाई देने लगे | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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जब सोना को दो-दो दिखाई देने लगे | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक दिन सोना जब सोकर उठी तो उसे थोड़ा धुँधला-सा दिखाई दे रहा था।

उसने अपनी आँखे को अच्छी तरह धोया। तब यह धुँधलापन कुछ कम हुआ। लेकिन उसे लग रहा था कि आँखों में कुछ हो गया है।

वह स्कूल जाने के लिए तैयार हुई।

नाश्ता करने के लिए जब वह खाने की मेज पर आकर बैठी तो एक अजीब बात हुई। सामने दूध का गिलास लिए हुए दो मम्मियाँ खड़ी थी।

उसने अपनी आँखों को मला। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। वह दूध पीकर जल्दी से दौड़ गई।

स्कूल में सब कुछ ठीक-ठाक था। सोना ने चैन की साँस ली। गणित की क्लास में उसकी दोस्त रूपा ने उससे कहा, सोना, मेरी नोटबुक दे दो।

तुम कल घर ले गई थी न! मुझे काम करना है, लाओ दे दो।

सोना को अचानक ध्यान आया कि वह तो रूपा की नोटबुक लाना भूल गई है।

वह बोली, रूपा मैं नोटबुक कल दूँगी। मेरा काम अभी बाकी है।

लेकिन अब मैं क्या करूँ ? रूपा परेशान होकर बोली।

अरे भूल गई तो मैं क्या करूँ ? सोना बेफिक्री से बोली।

लेकिन तुम्हें ध्यान रखना चाहिए था न सोना ! रूपा फिर भी धीरे से ही बोल रही थी।

गलती सोना की थी। लेकिन वह ही रूपा पर गुस्सा करने लगी, रूपा क्या तुम एक दिन पेपर पर काम नहीं कर सकती ? ऐसे कह रही हो जैसे मैं तुम्हारी नोटबुक कभी दूँगी ही नहीं।

काम पूरा हो जाएगा तो दे दूँगी न ! वह मुँह बनाकर बोली।

रूपा बेचारी ने एक पेपर पर काम उतार लिया। तभी खाने की छुट्टी हो गई। सोना और रूपा खाने का डिब्बा लेकर बाहर आकर बैठीं।

सोना ने देखा कि रूपा बिलकुल शांत थी। रूपा उसकी बहुत प्यारी दोस्त थी। उसने पूछा, नाराज हो गई क्या ?

नहीं, रूपा ने मुस्कुराकर कहा।

तभी सोना के साथ फिर वही अजीब बात हुई। सामने दो रूपा दिखाई देने लगी। ये क्या हो गया दोबारा से ? उसने सोचा।

सोना ने ध्यान से देखा। दोनों रूपा में एक अंतर था। एक रूपा मुस्कुरा रही थी, लेकिन दूसरी दुखी थी।

उसे समझ नहीं आया कि इसका क्या मतलब है ?

छुट्टी के बाद वह घर आ गई। आकर तुरंत टी. वि. खोला और कार्टून देखने बैठ गई। मम्मी ने कहा, बेटा पहले कपड़े बदलो। हाथ-मुहँ धोकर दूध पी लो।

लेकिन सोना को जैसे सुनाई ही नहीं दिया।

मम्मी फिर बोली, सोना, बेटा कार्टून बाद में देखना। अभी उठो और कपड़े बदलो।

जब सोना ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया तो उन्हें बहुत गुस्सा आ गया। वो डाँटकर बोली, सोना उठो।

सोना चौंक गई। नाराजगी से मुहँ बनाकर अपने कमरे में गई।

कपड़े बदलकर दूध पिने आ गई। तभी रूपा का फोन आया। मम्मी ने फोन उठाया।

रूपा बोली, आंटी नमस्ते। मैंने सोना को यह याद दिलाने के लिए फोन किया था कि आज वह गणित का काम जरूर पूरा कर ले।

आज वह मेरी नोटबुक लाना भूल गई थी। आप उससे कह दीजिएगा। मम्मी को बड़ा गुस्सा आया।

वे सोना पर गुस्सा होने लगी, सोना मैंने तुमसे हजार बार कहा है कि अपना स्कूल बैग रात को ही लगा लिया करो।

रूपा की नोटबुक भूल गई थी न, और गणित का काम पूरा क्यों नहीं किया ? बोलो।

सोना पहले से नाराज थी। मम्मी ने दोबारा डाँटा तो उसे रोना आ गया।

वह बोली आप मुझे हमेशा डाँटती ही रहती हैं। आप मुझे बिलकुल प्यार नहीं करती।

उसने मम्मी की ओर देखा तो फिर वही हुआ। एक की जगह फिर दो मम्मियाँ सामने थी।

सोना ने आँसू भरी आँखों से देखा – एक के चेहरे पर गुस्सा था और दूसरी के चेहरे पर ढेर सारा प्यार था।

वे इसलिए गुस्सा थी क्योंकि वे उसकी भलाई चाहती थी। उसे याद आया की स्कूल में रूपा के दो चेहरों में से भी एक मुस्कुरा रहा था और दूसरा दुखी था।

मतलब मैंने जो कुछ रूपा से कहा, उसके कारण उसका मन बहुत दुखी हुआ होगा। सोना ने सोचा।

वह फौरन उठकर मम्मी के पास आई और उनसे माफी माँगी मम्मी ने प्यार से उसे गले से लगा लिया।

फिर उसने रूपा को फोन किया और उससे भी अपनी गलती के लिए सॉरी कहा।

रूपा खुश थी कि सोना को उसकी गलती समझ आ गई थी।

सोना ने जल्दी से दूध पिया और रूपा की नोटबुक से गणित का काम पूरा किया।

अपना स्कूल बैग लगाया और फिर कार्टून देखने बैठी। मम्मी ने अब उसे नहीं टोका। उस्सने अपना काम जो पूरा कर लिया था।

सोना को समझ आ गया था कि यह दूसरा चेहरा मन की बात बताता था।

उसने तय किया कि अब सोच-समझकर ही सबके साथ व्यवहार करेगी, जिससे किसी का मन दुखी न हो। और पता है उस दिन के बाद उसे वे दो-दो चेहरे कभी भी दिखाई नहीं दिए !

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छोटी चीज का काम बड़ा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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छोटी चीज का काम बड़ा | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक हाथी गहरी नींद में सो रहा था। वह जोर-जोर से खर्राटे ले रहा था।

खर्राटों की आवाज सुनकर पास के बिल से एक चूहा बाहर आया।

उसने देखा कि सामने पहाड़ जैसा हाथी सो रहा था। खर्राटे के कारण उसका बड़ा-सा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था।

चूहे को यह देखकर बड़ा मजा आया। वह धीरे से उसकी सूँड़ से चढ़कर पेट तक पहुँच गया। हाथी के पेट पर बैठकर वह झूलने लगा।

ऊपर-नीचे, ऊपर नीचे, बड़ा मजा आ रहा था। तभी हाथी की नींद खुली। एक छोटे-से चूहे को अपने पेट पर आराम से बैठ देखकर उसे बहुत गुस्सा आया।

उसने अपने पेट को जोर से हिलाया चूहा नीचे गिर गया। हाथी बोला -बेवकूफ चूहे, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे पेट पर चढ़ने की ?

चूहा घबरा गया। माफी माँगले लगा। हाथी से बोला, दादा मुझे माफ कर दो। ऐसी गलती कभी नहीं होगी।

हाथी को उस पर दया आ गई। उसने चूहे को जाने दिया। जाते समय चूहे ने कहा, दादा, कभी मेरी जरूरत हो तो बताना।

आप बहुत अच्छे हैं तभी आपने मुझे छोड़ दिया। मैं भी आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहूँगा। अच्छा, नमस्ते।

चूहे की बात सुनकर हाथी जोर-से हँसने लगा। चूहा चुपचाप वहाँ से चला गया।

कुछ दिनों बाद एक शिकारी जंगल में आया। चूहे ने उसे देख लिया था। उसके पास बहुत सारा सामान था।

लगता है कई दिन रुकने वाला है जंगल में। चूहे ने सोचा।

अगले दिन सुबह जोर की आवाज सुनकर चूहे की नींद खुली। यह को किसी हाथी की आवाज लगती है। उसने सोचा।

जब कई बार ‘बचाओ-बचाओ’ की आवाजें आई तो चूहा वाहन पहुँचा।

सामने देखा तो वही हाथी दादा खड़े थे। एक बड़ा-सा जाल उनके ऊपर पड़ा था, जिससे वे बाहर नहीं निकल पा रहे थे।

चूहे ने दादा को नमस्ते की। फिर वह अपने तेज दाँतों से जाल काटने लगा। वह बहुत तेजी से काम कर रहा था।

थोड़ी ही देर में जाल में एक बड़ा-सा छेड़ हो गया। हाथी उससे बाहर आ गया। अब उसे समझ आया कि छोटी चीज भी कभी-कभी बड़ा काम कर जाती है।

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जंगल में आया इंटरनेट | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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जंगल में आया इंटरनेट | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

हरे-भरे जंगल में चारों ओर एक ही चर्चा थी – जंगल में इंटरनेट आया है।

सब इसी बारे में बात कर रहे थे। हालाँकि आधे से ज्यादा जानवरों को यह पता नहीं था कि इंटरनेट कौन से नए जानवर का नाम है।

फिर भी वे यह पता लगाने की कोशिश लगातार कर रहे थे कि यह नया जानवर खतरनाक तो नहीं है।

अनेक सवाल थे उनके मन में। कैसा दीखता होगा यह इंटरनेट ?

उसकी पूँछ होगी या नहीं ? अरे नहीं भाई, यह जानवर का नाम नहीं है।

तो फिर क्या है ?

यह एक चिड़िया का नाम है।

ओह, अच्छा-अच्छा, चिड़िया होती है यह !

इस तरह की बातें पूरे जंगल में हो रही थी। शाम को राजा शेर ने सभी जानवरों को अपनी गुफा के सामने बुलाया है। तब वे हमको इस इंटरनेट से मिलवाएँगे।

वे एक-दूसरे को बता रहे थे। शाम को ठीक 6 बजे सभी जानवर, पक्षी और जंगल के बाकी सब प्राणी शेर की गुफा के सामने इकट्ठे हुए।

राजा शेर की गुफा के सामने इकट्ठे हुए। राजा शेर एक अजीब-सी चीज के साथ बाहर निकले।

ये क्या है ? फिर फुसफुसाहट होने लगी। तब शेर ने कहा, दोस्तों, यह है कंप्यूटर।

कंप्यूटर ? और एक जानवर ? सबने सोचा। यह एक मशीन है और इंटरनेट का प्रयोग करने के लिए हमारे पास कंप्यूटर होना बहुत जरूरी है। शेर ने कहा।

सभी ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे।

इंटरनेट के माध्यम से हम दूर-दूर रहने वाले अपने दोस्तों और संबंधियों से घर बैठे बात कर सकते हैं।

उन्हें हम पत्र भी भेज सकते हैं। पत्र भेजने के इस तरीका को ई-मेल कहते हैं।

यदि हम पत्र डाक विभाग के माध्यम से भेजते हैं तो उसे पहुँचने में दो-तीन दिन लगते हैं, लेकिन ई-मेल भेजने में बस कुछ सेकंड ही लगते हैं और सबसे बढ़िया बात है कि इसमें खर्चा न के बराबर आता है। शेर समझा रहा था।

और क्या फायदे हैं इंटरनेट के ? जानवरों ने उत्सुकता से पूछा।

बहुत से फायदे हैं। आप किसी भी समय दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकते हो। हर तरह की जानकारी इसमें है। शेर ने बताया।

वाह, ये तो कमाल की वस्तु है। सबने कहा। लेकिन कोई था जो इस सबसे खुश नहीं था और वह था कबूतर, खबरी।

इतने वर्षों से व्ही था, जो सारे समाचार और पत्र दूर-दूर के जंगलों तक पहुँचता था।

पर उसे लग रहा था कि अब उसकी कोई जरूरत नहीं थी। वह बहुत उदास था।

उसने शेर से इस बारे में बात की। शेर ने कहा, देखो खबरी तुमने सबकी बहुत सेवा की है। लेकिन जंगल की तरक्की के लिए कंप्यूटर को जंगल में लाना बहुत जरूरी था। तुम किसी और काम के बारे में सोचों। कबूतर उदास मन से अपने घर लौट गया।

जंगल में धीरे-धीरे सभी ने कंप्यूटर सीखना शुरू कर दिया। की महीने ऐसे ही बीत गए। सब जानवर आजकल ई-मेल भेजने लगे थे।

इसीलिए खबरी के लिए ज्यादा काम नहीं होता था। बच्चे किताबों से ज्यादा इंटरनेट पर पढ़ाई करना चाहते थे। पूरा जंगल जैसे कंप्यूटर पर निर्भर हो गया था।

एक दिन बहुत तेज बारिश हुई। तेज हवा चली और बहुत सारे पेड़ टूट गए। उस गड़बड़ में जंगल के कम्प्यूटरों का इंटरनेट से संबंध टूट गया।

जंगल के जानवर न तो किसी को ई-मेल भेज पा रहे थे और न ही उनके बच्चे ठीक से पढ़ाई कर पा रहे थे।

जानवर अब तक इतने आलसी हो चुके थे कि पत्र लिखना उन्हें अच्छा ही नहीं लगता था। तभी एक दुर्घटना हुई।

हिरन का बच्चा दौड़ रहा था, वह एक पेड़ से टकराया और उसके सर पर गहरी चोट लगी।

जंगल के डॉक्टर साहब उल्लू जी किसी का इलाज करने दूसरे जंगल में गए हुए थे। समस्या थी कि उन्हें कैसे बुलाया जाए। इससे पहले तो उन्हें ई-मेल भेजकर सन्देश दे दिया जाता था।

लेकिन अभी तो सारी व्यवस्था टूटी हुई थी। हिरन के माता-पिता रोते हुए राजा शेर के पास पहुँचे। राजा भी असहाय था, करे तो क्या करे ?

तब खबरी ने कहा, मैं बुलाकर लाऊँगा डॉक्टर को। आखिर पहले भी तो मैं ही यह सब काम करता था।

सबको बहुत तसल्ली हुई की खबरि आज भी उनकी मदद करने को तैयार था।

तो खबरी उड़ा और कुछ ही देर बाद डॉक्टर उल्लू जी वहाँ पहुंच गए।

खबरी के कारण ही हिरन के बच्चे की जान बच पाई। अब खबरी की बारी थी सबको समझाने की। वह बोला, मैं मानता हूँ कि जंगल का विकास जरूरी है, लेकिन हमें अपने पुराने तरीकों को भूलना नहीं चाहिए।

हम सभी टी. वी. में समाचार सुनते हैं, लेकिन अखवार में समाचार पढ़ने का मजा ही कुछ और है। ऐसे ही कंप्यूटर का प्रयोग करें, लेकिन हमें उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहिए।

क्योंकि मशीन तो मशीन ही होती है, क्यों ठीक कहा न मैंने ?

जवाब में सबने बस ‘हाँ’ में सिर हिलाया। वे समझ गए थे अपनी गलती को।

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अक्षर करते कूद-फाँद | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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अक्षर करते कूद-फाँद | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

मीतू स्कूल से आई और सबसे पहले अपनी सभी नोटबुक्स निकालकर बैठ गई।

आज गणित और अंग्रेजी दोनों में दो-दो पेज होमवर्क मिला था। मीतू पहली कक्षा में पढ़ती थी।

उसके लिए चार पेज लिखना काफी बड़ा काम था।

वह सोच रही थी कि आज खेलने के लिए कैसे जा पाएगी।

उसने मम्मी से कहा, मम्मी, आज खाना खाकर मैं पहले होमवर्क करुँगी। नहीं तो शाम को खेलने जाऊँगी तो आकर थक जाऊँगी। फिर चार पेज कैसे लिख पाऊँगी ?

मम्मी खुश थी की मीतू को आज होमवर्क की चिंता तो हुई।

मीतू ने जल्दी-जल्दी खाना और फटाफट होमवर्क करने बैठ गई।

पहले गणित का काम किया। फिर अंग्रेजी के दो पेज पुरे कर दिए। आधे घंटे में सब खत्म।

अरे वाह, मम्मी बोली आज तो कमाल हो गया। लेकिन जब बाद में उन्होंने मीतू की नोटबुक देखि तो पाया कि उसने जल्दबाजी में गलतियाँ की हैं।

लेख भी अच्छा नहीं लिखा था, उसने। मम्मी ने मीतू को बहुत समझाया , मीतू पहले ये गलतियाँ ठीक कर लो।

फिर खेलने जाना।

लेकिन मीतू ने मम्मी की बात पर ध्यान ही नहीं दिया।

शाम को जब वह खेलकर लौटी तो बहुत थक गई थी। उसने खाना खाया। फिर किसी तरह गलतियाँ ठीक की और सोने के लिए चली गई।

जैसे ही रात के बारह बजे, अचानक मीतू का बस्ता खुला और उसमें से उसकी सारी नोटबुक निकलकर बाहर आ गई।

उनके पन्ने अपने आप खुल रहे थे और अंदर लिखे हुए अक्षर नाच रहे थे।

अचानक जैसे उसके बस्ते के अंदर की दुनिया में जान आ गई थी।

तभी उसका पैमाना बाहर कूदा और जोर से बोलै, शांत!! लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

अक्षर धीरे-धीरे नोटबुक के पन्नों से कूदकर मेज पर आ गए। ये सारे टेढ़े-मेढ़े अक्षर थे। मीतू ने आज आज टेढ़ा-मेढ़ा लेख लिखा था। इसलिए ये सारे टेढ़े-मेढ़े शैतान अक्षर बाहर निकलकर उछल-कूद मचा रहे थे।

उसकी नोटबुक के बाकी के पन्नों पर बहुत सुंदर अक्षर लिखे हुए थे। वे सरे अक्षर परेशान होकर यह सब कुछ देख रहे थे।

मेज पर ही मीतू के रंगों का डिब्बा रखा था। एक-एक करके सरे अक्षर रंगों में कूद गए। फिर मेज पर आए और पूरी मेज रंगों से गंदी कर दी ।

अब तक पैमाने को बहुत गुस्सा आ गया था। उसने एक-एक करके सभी अक्षरों को डाँटा।

अक्षर ही-ही करते हुए नोटबुक पर चढ़े और अपनी पुरानी जगह जाकर बैठ गए। लेकिन उस सारी शैतानी मैं मीतू की नोटबुक बहुत गंदी हो गई थी।

अक्षरों के रंगवाले पैरों के निशान सारे पन्नों पर छप गए थे। हे भगवान ! ये क्या हो गया ?

टीचर बहुत गुस्सा करेंगी। कहते हुए मीतू चौंककर उठी। तब उसे पता चला की वह सपना देख रही थी।

उसने चैन की साँस ली। कितना खराब सपना था। सोचते हुए वह वापिस लेट गई। सुबह मीतू जल्दी उठी।

और सबसे पहले उसने होमवर्क का गन्दा लेख ठीक किया। अब उसके टेढ़े-मेढ़े अक्षर शैतान नहीं रहे थे।

बल्कि सुंदर बन गए थे। उस दिन के बाद मीतू हमेशा काम सफाई से और सुंदर ढंग से करती है। जल्दबाजी कभी नहीं करती। कहीं किसी दिन उसका सपना सच हो गया तो !

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अत्यधिक ज्ञान जाए बेकार | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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अत्यधिक ज्ञान जाए बेकार | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक छोटा लड़का था आशु। उसे नई-नई बातें सीखना बहुत अच्छा लगता था।

वह सभी लोगों से तरह-तरह के प्रश्न पूछता था और अपना ज्ञान बढ़ाता था।

कोई साधु बाबा उसे मिल जाते तो वह उनके पास घंटों बैठकर ज्ञान की बातें सुना करता था।

अपने आसपास के सभी विद्यालयों के शिक्षकों के पास जाकर वह ज्ञान प्राप्त कर चूका था।

उस इलाके में अब कोई नहीं बचा था, जिसके पास जाकर उसने सीखा न हो।

इसलिए उसने निश्चय किया कि वह दूर देशों में रहने वाले शिक्षकों के पास जाएगा।

उसने विजयनगर के एक शिक्षक के विषय में बहुत सुना था। बस वह विजयनगर के लिए निकल पड़ा।

लंबी यात्रा के बाद वह विजयनगर पहुँचा। वहाँ जाकर उसने शिक्षक को प्रणाम किया।

शिक्षक ने उसे अपने पास बैठाया और पूछा कि उसने क्या-क्या सीखा है ?

सब सुनने के बाद उन्होंने अपने एक शिष्य से कहाँ, आशु के लिए पानी लेकर आओ। बोल-बोलकर थक गया होगा।

उनका शिष्य एक खाली गिलास और पानी से भरा लोटा रख गया।

तब शिक्षक ने लोटे से गिलास में पानी डालना शुरू किया। आशु देख रहा था। शिक्षक पानी डालते जा रहे थे।

धीरे-धीरे गिलास भर गया लेकिन उन्होंने पानी डालना बंद नहीं किया। पानी गिलास से निकलकर बाहर गिरने लगा।

आशु को आश्चर्य हुआ। आखिर जब पानी जमीन पर बहने लगा तब उसने पूछा, गिलास तो पूरा भर गया है।

अब आप पानी क्यों डाल रहे हैं, देखिये न, पानी यूँ ही बेकार हो रहा है।

यही मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ बेटा। शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा।

तुम इस गिलास की तरह हो और तुम्हारा ज्ञान इस पानी की तरह। तुमने पहले ही इतना सीख लिया है कि गिलास पूरा भर गया है।

यदि मैं और अधिक सिखाऊँगा तो ज्ञान का दुरूपयोग होगा। इसलिए जो कुछ सीखा है, उसका सही ढंग से उपयोग करो।

जाओ बेटा और अपने ज्ञान को खर्च करो। उन्होंने आशु को समझाया।

आशु समझ गया और संतुष्ट होकर अपने घर लौट आया।

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कम बोलो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कम बोलो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक छोटी-सी बच्ची थी – आँचल। आँचल बहुत प्यारी थी।

उसे चित्र बनाना बहुत अच्छा लगता था। सभी उसकी चित्रकला की प्रशंसा करते थे।

पढ़ने में भी वह बहुत तेज थी। अपने सभी काम खुद करती थी।

यहाँ तक कि रोज जब माँ दूध का गिलास उसे देती थी तो वह गट-गट पी जाती थी।

खूब सब्जियाँ खाती थी और माँ का कहना मानती थी। लेकिन वह बोलती बहुत थी और उसकी इस बात से माँ अक्सर परेशान हो जाती थी।

एक बार माँ ने उससे कहा कि आँचल ‘म’ अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्द लिखो और उनके चित्र बनाओ। आँचल ने तीन शब्द लिखे –

‘म’ से मेढक

‘म’ से मुर्गा

‘म’ से माँ

वह माँ के पास आई और उन्हें चित्र दिखाए। माँ ने उससे पूछा

आँचल बेटा, तुम्हें इस तीनों में से सबसे अच्छा कौन लगता है ?

‘माँ।’ आँचल बोली।

माँ मुस्कुराईं और बोली, उसके बाद।

उसके बाद मुर्गा और फिर मेढक। आँचल बोली।

अच्छा अब ये बताओ कि ऐसा क्यों है ? माँ ने आगे पूछा।

आँचल ने उत्तर दिया, वह इसलिए की सभी की सबसे प्यारी होती है, क्योंकि वह बहुत प्यार करती है, बिलकुल आपकी तरह।

फिर मुर्गा, क्योंकि वह सुबह-सुबह बाँग देकर सबको जगाती है।

और मेढक तो बिलकुल पसंद नहीं है मुझे, क्योंकि वह दिन-रात बस टर्र-टर्र करता रहता है।

ओफ्फोह! कितनी आवाज करता है !

माँ ने आँचल से कहाँ, बेटा, मैं यही तुम्हें समझाना चाहती हूँ।

देखो, मुर्गा बीएस सुबह सही समय पर बोलता है, इसलिए सब उसकी आवाज ध्यान से सुनते हैं और जाग जाते हैं।

लेकिन मेढक हमेशा टर्र-टर्र करता रहता है, इसलिए सब उससे ऊब जाते है।

कोई उसकी बात नहीं सुनता, न ही कोई उसे पसंद करता है।

इसलिए बस उतना ही बोलना चाहिए जितना जरूरी हो। समझी!

आँचल समझ गई कि माँ उससे क्या कहना चाहती हैं।

कम बोलो | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

 

कमाल नाम का | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कमाल नाम का | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

दस वर्ष की अनुपमा चंद्रलतिका को संसार में दो बातें सबसे ज्यादा नापसंद थी ।

एक थी उसके छोटे भाई का उसकी चोटी खींचकर भाग जाना और दूसरा था, उसका लंबा नाम ।

‘अनुपमा चंद्रलतिका’ हुँ, ये भी कोई नाम हुआ । वह हमेशा अपने-आपसे कहती थी ।

सिर्फ अनुपमा होता या फिर सिर्फ लतिका होता तो भी ठीक ही लगता ।

लेकिन अनुपमा चंद्रलतिका और साथ में मिश्रा भी तो है । बोलने में ही इतना समय लग जाता है कि आप बाजार से सब्जी लेकर आ जाएँ ।

क्यों रखा ऐसा नाम आपने ? वह हमेशा अपने मम्मी-पापा से पूछती थी ।

और मम्मी-पापा से हमेशा वही जवाब मिलता, जब तुम बड़ी हो जाओगी तब बदल लेना अपना नाम ।

पता नहीं तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ?

कितना सुंदर नाम है अनुपमा चंद्रलतिका । और अनुपमा चुप रह जाती थी ।

एक बार वह अपने मम्मी-पापा के साथ घूमने मेले में गई ।

उसने मम्मी-पापा से पहले ही कह दिया था कि किसी के सामने उसे उसके पूरे नाम से न बुलाएँ ।

सिर्फ अनु कहकर बुलाएँ । मेले में एक जगह बड़ी भीड़ थी । बच्चे एक-दूसरे के ऊपर कूद-कूदकर अंदर झाँकने की कोशिश कर रहे थे ।

अनु यानि कि हमारी अनुपमा चंद्रलतिका ने भी अंदर झाँककर देखा ।

और बस वह देखती ही रह गई । अंदर उसका सबसे पसंदीदा कलाकार, जो उसका हीरो था, स्टेज पर अभिनय कर रहा था ।

‘करणकुमार!’ वह खुशी के मारे चिल्ला उठी ।

बाहर एक काउंटर था, जिस पर एक लड़की बैठकर कुछ लिख रही थी ।

उसने जाकर पूछा तो पता चला कि बच्चों के लिए एक पुरस्कार की योजना है, जो भी बच्चे चाहें अपना नाम यहाँ आकर लिखा दें ।

सभी नाम करणकुमार को दिखाए जाएँगे । करणकुमार एक बच्चे को चुनेंगे और आज की शाम वह उस बच्चे के साथ बिताएँगे ।

सभी बच्चे चिल्ला-चिल्लाकर अपना नाम लिखा रहे थे ।

अनु की मम्मी बोली, जाओ अपना नाम लिखाओ, तुम्हारा तो सपना है करणकुमार से मिलने का।

अनु से साफ मना कर दिया, कभी नहीं, मैं अपना मजाक नहीं बनवा सकती।

नहीं माँ कभी नहीं । और तब माँ खुद आगे गईं, अनु के मना करने के बाद भी ।

लिखिए मेरी बेटी का नाम, अनुपमा चंद्रलतिका मिश्रा, वे बोली ।

क्या ? क्या नाम बताया आपने ? काउंटर पर बैठी लड़की चौंककर बोली। ‘अनुपमा चंद्रलतिका।’

उन्होंने एक-एक शब्द साफ-साफ बता दिया। बोली, ये है मेरी बेटी।

और अचानक सबकी नजरें अनुपमा चंद्रलतिका की ओर घूम गई ।

उसे ऐसा लगा जैसे कि वह वहाँ से कहीं भाग जाए । वह धीरे से मम्मी-पापा के साथ आगे बढ़ गई ।

वे मेले में घूम ही रहे थे, तभी उन्हें लाउस्पीकर पर आवाज सुनाई दी, आज की शाम करणकुमार के नाम पुरस्कार जीता है एक बच्ची ने, जिसका नाम है अनुपमा चंद्रलतिका मिश्रा ।

और अनुपमा चंद्रलतिका को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ ।

घोषणा अभी चल ही रही थी, करणकुमार जी को बच्चों के नामों की पूरी सूची में यही नाम सबसे ज्यादा पसंद आया ।

वे देखना चाहते हैं कि इस अलग-से नाम वाली बच्ची आखिर है कौन ? तो इस नाम की जो भी बच्ची हो वह अंदर आ जाए ।

बस, उसके बाद पूरी शाम अनुपमा चंद्रलतिका के जीवन की सबसे सुंदर शाम बन गई । और यह कमाल था उसके नाम का! मानो या ना मानो!

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कुरूप कौन | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

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कुरूप कौन | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक स्कूल की छठी कक्षा में एक दिन टीचर पर्यायवाची पढ़ा रही थी।

पानी के पर्यायवाची हैं – नीर, जीवन और……

‘जल’ सभी बच्चे एक साथ बोले।

सुंदर के पर्यायवाची हैं – रमणीय, मनोहर…………

‘ खूबसूरत ‘ सभी बच्चों ने कहा।

वो संजयदत्त और उर्मिला वाली…….. एक बच्चा फुसफुसाया।

श ससससस चुप, टीचर सुन लेंगी। दूसरा बोला।

टीचर ने आगे पूछा, असुंदर के पर्यायवाची हैं – कुरूप, भद्दा और………

सभी बच्चे चुप हो गए। तभी एक कोने से आवाज आई ‘ कोमल त्यागी ? ‘

अचानक सभी की नजरें कोमल की ओर गई।

उसे ऐसा लगा जैसे वह शर्म के कारण मर ही जाएगी। टीचर ने बच्चों को खूब डाँटा पर कोमल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी।

वह पढ़ने में काफी तेज थी। सबसे पहले अपना काम पूरा कर लेती थी। यहाँ तक की उसके क्लास के बच्चे कभी-कभी उसकी नोटबुक लेकर काम पूरा करते थे।

वह भी सभी बातों को भुलाकर हमेशा सबकी मदद करती थी। लेकिन जब कभी ऐसा कुछ हो जाता था तो उसे बहुत दुख होता था।

जब वह बहुत छोटी थी, तब एक बार वह और उसकी माँ आग में फँस गए थे। उसी समय उसका चेहरा एक ओर से जल गया था।

यही कारण था कि कोई भी उसके पास नहीं आना चाहता था। उसकी ओर देखकर सब दया दिखाते थे। लेकिन ऐसा कोई नहीं था, जिसे वह अपना दोस्त कह सके।

आज फिर कोमल बहुत उदास थी। घर आकर अपनी पेंसिल कागज और रंग लेकर बैठ गई।

कोमल को चित्र बनाना बहुत अच्छा लगता था।

वह हमेशा सुंदर चित्र बनाती थी। उसके चित्रों में चहचहाते हुए पक्षी होते थे, सूरज की रोशनी होती थी। छोटे-छोटे प्यारे घर होते थे। कोमल को चित्रकला के लिए की पुरस्कार मिल चुके थे।

लेकिन आज वह एक बहुत ही बदसूरत और भद्दा प्राणी बनाना चाहती थी।

ऐसा एक जीव, जो कि उससे ज्यादा कुरूप हो। और फिर उसने एक चित्र बनाया।

एक ऐसा जीव का चित्र, जिसका शरीर मगरमच्छ का था, सर उल्लू का था और पैर गिद्ध के थे, नुकीले नाखून थे और बड़े-बड़े डरावने पंख थे। उसने इसे नाम दिया ‘ कुरूप। ‘

वह चित्र को अपने बिस्तर के सामने वाली दीवार पर लगाकर सो गई। थोड़ी देर बाद वह चौंककर उठी। उसने देखा सामने के चित्र से कुरूप गायब था।

तभी उसने एक धीमी-सी मीठी आवाज सुनी, कोमल, मैं यहां हूँ। उसने देखा सामने की खिड़की से कुरूप झाँक रहा था।

कोमल ने आश्चर्य से पूछा, तुम वहाँ क्या कर रहे ?

तुम्हें मुझको देखर डर नहीं लगता ? कुरूप ने पूछा। तब कोमल बोली, नहीं, मैं कैसे डर सकती हूँ ? मैं तो खुद ही कितनी कुरूप हूँ।

कुरूप बोला, मैं तुम्हें एक जगह ले जाना चाहता हूँ, तुम्हें वहाँ अच्छा लगेगा।

लेकिन मैं कैसे आऊँगी ?

मेरी पीठ पर बैठ जाओ।

और कोमल कुरूप की पीठ पर बैठ गई। वे उड़कर एक सुंदर नदी के किनारे पहुँचे।

वहाँ सब कुछ बहुत सुखकर था। ठंडी हवा चल रही थी। हरियाली थी। पक्षी चहचहा रहे थे। सब कुछ उसके सुंदर चित्रों जैसा ही था।

तभी उसे याद आया कि कुछ दिन पहले उसने ठीक ऐसा ही एक चित्र बनाया था। अपने चित्र की दुनिया में पहुँचकर वह बहुत खुश थी।

कुरूप ने उसे बताया यह वह जगह है, जहाँ केवल वे लोग ही आ सकते हैं. जो मन से सुंदर हों, जो सबका भला चाहते हों और जिनके मन में हमेशा अच्छे विचार आते हों।

और तभी कोमल चौंककर जाग गई। उसने देखा कि उसकी माँ उसे उठा रही थी, कुरूप वापिस तस्वीर में आ गया था।

कितना अच्छा सपना था! उसने सोचा।

उसे आईने में दिखी अपनी तस्वीर अच्छी तरह याद थी। और उसके बाद उसने अपने आपको कभी असुंदर नहीं समझा।

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आई बात समझ में | हिंदी कहानी | hindi kahani | hindi Stories |

एक चालाक लोमड़ी अक्सर दूसरे जानवरों को बेवकूफ बनाया करती थी ।

उनको अपने घर बुलाकर उनका मजाक उड़ाने में उसे बड़ा मजा आता था । वह इस तरह से बात करती थी कि दूसरे जानवरों को समझ नहीं आता था कि क्या कहें ।

एक बार उसने कुछ मुर्गियों को अपने घर आने का निमंत्रण दिया । लेकिन बेचारी मुर्गियाँ कैसे आती ?

वे तो पिंजरे में कैद थी ।

कुछ दिन बाद उसने एक बंदर को नदी के बीचों-बीचों एक टापू पर खाने के लिए बुलाया ।

बेचारा बंदर क्या करता, उसने मना कर दिया क्यूंकि उसे तैरना ही नहीं आता था ।

ऐसा ही मज़ाक करने के लिए उसने एक दिन एक सारस को अपने घर रात के खाने पर बुलाया ।

सारस ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया । रात को सारस लोमड़ी के घर पहुँचा ।

लोमड़ी ने दो बड़ी प्लेटों में सूप लाकर रख दिया । सारस ने जब यह देखा तो बेचारा दुखी हो गया क्यूंकि वह अपनी लंबी चोंच से सूप पी ही नहीं सकता था ।

लोमड़ी ने मजे ले-लेकर सूप चटा और सारस को बिना खाए-पिए ही अपने घर लौट जाना पड़ा ।

कुछ दिन बाद सारस ने लोमड़ी को अपने घर खाने पर बुलाया ।

लोमड़ी जब सारस के घर पहुँची तो सारस ने उसका खूब प्यार से स्वागत किया ।

उसे बैठाया और बताया कि उसने लोमड़ी के लिए स्वादिस्ट खीर बनाई है । सुनकर लोमड़ी के मुहँ में पानी आ गया ।

तब सारस ने दो लंबी सुराहियों में खीर लाकर रख दी । फिर उसने अपनी लंबी चोंच अंदर डाली और आराम से खीर खाने लगा ।

लोमड़ी ने सुराही को सब तरफ से चाटने की कोशिश की लेकिन खीर की एक बूँद भी नहीं चख पाई ।

बेचारी को निराश होकर भूखा ही लौटना पड़ा ।

जो वह अब तक सबके साथ करती थी, आज उसके साथ हो रहा था ।

सारस ने वापिस लौटते समय उससे सिर्फ इतना ही कहा, क्यों लोमड़ी, आई बात समझ में ?

कोई सताए तो कैसा लगता है यह बात लोमड़ी अच्छी तरह समझ गई थी ।

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