October 17, 2018 | Hindigk50k

नदी की आत्मकथा पर निबंध-Essay On River Biography In Hindi

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नदी की आत्मकथा पर निबंध-Essay On River Biography In Hindi

नदी की आत्मकथा पर निबंध (Essay On River Biography In Hindi) :

भूमिका : नदी प्रकृति के जीवन का एक महत्व पूर्ण अंग है। इसकी गति के आधार पर इसके बहुत नाम जैसे – नहर , सरिता , प्रवाहिनी , तटिनी , क्षिप्रा आदि होते हैं। जब मैं सरक-सरक कर चलती थी तब सब मुझे सरिता कहते थे। जब मैं सतत प्रवाहमयी हो गई तो मुझे प्रवाहिनी कहने लगे।

जब मैं दो तटों के बीच बह रही थी तो तटिनी कहने लगे और जब मैं तेज गति से बहने लगी तो लोग मुझे क्षिप्रा कहने लगे। साधारण रूप से तो मैं नदी या नहर ही हूँ। लोग चाहे मुझे किसी भी नाम से बुलाएँ लेकिन मेरा हमेशा एक ही काम होता है दुसरो के काम आना। मैं प्राणियों की प्यास बुझती हूँ और उन्हें जीवन रूपी वरदान देती हूँ।

नदी का जन्म : मैं एक नदी हूँ और मेरा जन्म पर्वतमालाओं की गोद से हुआ है। मैं बचपन से ही बहुत चंचल थी। मैंने केवल आगे बढना सिखा है रुकना नहीं। मैं एक स्थान पर बैठने की तो दूर की बात है मुझे एक पल रुकना भी नहीं आता है। मेरा काम धीरे-धीरे या फिर तेज चलना है लेकिन मै निरंतर चलती ही रहती हूँ।

मैं केवल कर्म में विश्वास रखती हूँ लेकिन फल की इच्छा कभी नहीं करती हूँ। मैं अपने इस जीवन से बहुत खुश हूँ क्योंकि मैं हर एक प्राणी के काम आती हूँ , लोग मेरी पूजा करते हैं , मुझे माँ कहते हैं , मेरा सम्मान करते हैं। मेरे बहुत से नाम एखे गये हैं जैसे :- गंगा , जमुना , सरस्वती , यमुना , ब्रह्मपुत्र , त्रिवेणी। ये सारी नदियाँ हिन्दू धर्म में पूजी जाती हैं।

नदी का घर त्यागना : मेरे लिए पर्वतमालाएं ही मेरा घर थी लेकिन मैं वहाँ पर सदा के लिए नहीं रह सकती हूँ। जिस तरह से एक लडकी हमेशा के लिए अपने माता-पिता के घर पर नहीं रह सकती उसे एक-न-एक दिन माता-पिता का घर छोड़ना पड़ता है उसी तरह से मैं इस सच्चाई को जानती थी और इसी वह से मैंने अपने माँ-बाप का घर छोड़ दिया।

मैंने माता-पिता का घर छोड़ने के बाद आगे बढने का फैसला किया। जब मैंने अपने पिता का घर छोड़ा तो सभी ने मेरा पूरा साथ दिया मैं पत्थरों को तोडती और धकेलती हुई आगे बढती ही चली गई। मुझसे आकर्षित होकर पेड़ पत्ते भी मेरे सौन्दर्य का बखान करते रहते थे और मेरी तरफ आकर्षित होते थे।

जो लोग प्र्वर्तीय देश के होते हैं उनकी सरलता और निश्चलता ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मैं भी उन्हं की तरह सरल और निश्चल बनी रहना चाहती हूँ। मेरे रास्ते में बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों ने मुझे रोकने की पूरी कोशिश की लेकिन वो अपने इरादे में सफल नहीं हो पाए।

मुझे रोकना उनके लिए बिलकुल असंभव हो गया और मैं उन्हें चीरती हुई आगे बढती चली गई। जब भी मैं तेजी से आगे बढने की कोशिश करती थी तो मेरे रास्ते में वनस्पति और पेड़-पौधे भी आते थे ताकि वो मुझे रोक सकें लेकिन मैं अपनी पूरी शक्ति को संचारित कर लेती थी जिससे मैं उन्हें पार करके आगे बढ़ सकूं।

नदी का मैदानी भाग में प्रवेश : शुरू में मैं बर्फानी शिलाओं की गोद में बेजान , निर्जीव और चुपचाप पड़ी रहती थी। मुझे मैदानी इलाके तक पहुंचने के लिए पहाड़ और जंगल पर करने पड़े थे। जब मैं पहाड़ों को छोडकर मैदानी भाग में आई तो मुझे अपने बचपन की याद आने लगी।

मैं बचपन में पहाड़ी प्रदेशों में घुटनों के बल सरक-सरक कर आगे बढती थी और अब मैदानी भाग में आकर सरपट से भाग रही हूँ। मैंने बहुत से नगरों को ख़ुशी और हरियाली दी है। जहाँ-जहाँ से होकर मैं गुजरती गई वहाँ पर तट बना दिए गये। तटों के आस-पास जो मैदानी इलाके थे वहाँ पर छोटी-छोटी बस्तियां स्थापित होती चली गयीं।

बस्तियों से गाँव बनते चले गये। मेरे पानी की सहायता से लोग खेती करने लगे। जिन दिनों वर्षा होती है उन दिनों मेरा रूप बहुत विकराल हो जाता है। जिसकी वजह से मैं अपने मार्ग को छोडकर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश कर जाती हूँ।

नदी खुशहाली का कारण : सिर्फ मैं ही समाज और देश की खुशहाली के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करती आ रही हूँ। मुझ पर बांध बनाकर नहरे निकली गयीं। नहरों से मेरा निश्चल जल दूर-दूर तक ले जाया गया। मेरे इस निश्चल जल को खेतों की सिचाई , घरेलू काम करने , पीने के लिए और कारखानों में प्रयोग किया गया।

मेरे इस निश्चल जल से प्रचंड बिजली को बनाया गया। इस बिजली को देश के कोने -कोने में रोशनी करने , रेडियो , दूरदर्शन चलाने में प्रयोग किया गया। मेरा रोज का काम होता है कि मैं जहाँ भी जाती हूँ वहाँ के पशु-पक्षी , मनुष्य , खेत-खलियानों और धरती की प्यार रूपी प्यास को बुझाती हूँ और उनके ताप को कम करके उन्हें हर-भरा बना देती हूँ।

इन्हीं के कारण नदी की सरलता और सार्थकता सिद्ध होती है। लोग मेरे जल से अपनी प्यास बुझाते हैं और अपने शरीर को शीतल करने के लिए भी मेरे जल का प्रयोग करते हैं। मेरे जल के प्रयोग से किसान अपनी आजीविका चलते हैं।

नदी का शून्य घमंड : नदी हमें अपना इतना सब कुछ देती है फिर भी उसमे शून्य के बराबर भी घमंड नहीं होता है। नदी कहती है कि मैं अपने प्राणों की एक बूंद भी समज के प्राणियों के हित के लिए अर्पित कर देती हूँ। मैं उन पर अपना सब कुछ लुटा देती हूँ इसका मुझे बहुत संतोष है।

मुझे इस बात से बहुत ही प्रसन्नता होती है कि मेरा एक-एक अंग समाज के कल्याण में लगा है। ‘ वसुधैव कुटुम्बकम ’ ही मेरे इस जीवन का मूल मंत्र है। मैं सदैव इसी भावना को अपने ह्रदय में लिए यात्रा पर आगे बढती रहती हूँ। दुनिया का हर एक जीव मेरे ऊपर निर्भर होता है लेकिन मैं हमेशा बहती रहती है।

जब बरसात होती है तो मेरे विशाल रूप की वजह से लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पर जाना पड़ता है और जो पुल मेरे ऊपर बने होते हैं वे भी बरसात की वजह से भर जाते हैं जिससे लोग उसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। मेरे ऊपर बने हुए पुलों से तरह-तरह के लोग निकलते हैं जिनमें से कुछ अच्छे लोग होते हैं ओ मुझे प्रणाम करते हैं ऐसे लोगों को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता होती है।

मेरे पुल पर कुछ लोग ऐसे भी आते हैं जो हानिकारक पदार्थों को पुल से मेरे ऊपर गेर देते हैं जिसकी वजह से मेरे जल अशुद्ध हो जाता है। इतना होने के बाद भी मैं हमेशा बहती रहती हूँ और अपने अणि को साफ करती चली जाती हूँ। कोई मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करे लेकिन में पलटकर कुछ नहीं कहती हूँ।

मैं चुपचाप लोगों की बुराईयों और अच्छाईयों को सहती ही रहती हूँ। मेरे जल को भगवान की पूजा करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। मैं खुद को बहुत ही खुशकिस्मत समझती हूँ क्योंकि मेरा जल भगवान को अर्पित किया जाता है।

मेरे जल का प्रयोग करने से अशुद्ध वस्तु को शुद्ध किया जाता है। मेरा हर प्राणी के इवन में इतना महत्व है फिर भी मेरे अंदर बिल्कुल भी घमंड नहीं है।

उपसंहार :-नदी का कहना है कि मेरा लक्ष्य तो समुद्र नदी की प्राप्ति है। इस बात को मैं कभी भी नहीं भूल पायी हूँ। जब मेरे ह्रदय में समुद्र के मिलन की भावना जागृत हुई तो मेरी चल में और भी तेजी आ गई। जब मैंने समुद्र के दर्शन कर लिए तो मेरा मन प्रसन्नता से भर गया।

मैं अब समुद्र में समाकर उसी का एक रूप बन गई हूँ। मैं इतनी सारी बाधाओं को पार करते-करते ठक चुकी हूँ और अब सागर में मिलने जा रही हूँ। नदी अपने जीवनकाल में अनेक घटनाओं को घटते हुए देखती है।

मैंने अनेक सेनापतियों , सैनिकों , राजा-महाराजाओं को पुलों से गुजरते हुए देखा है। पुराणी बस्तियों को बहते और नई बस्तियों को बनते हुए देखा है। मैंने सब कुछ धीरज से सुना और सहा है।

नदी की आत्मकथा पर निबंध-Essay On River Biography In Hindi

Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi for Class 1,2,3,4,5


मैं नदी हूं आज मैं मेरी आत्मकथा सुनाने जा रही हूं मेरा उद्गम स्थान ऊंचे पहाड़ झरने और हिमालय से बर्फ पिघलने के कारण मैं अस्तित्व में आती हूं.

मैं जब हिमालय से चलती हूं तब मैं बहुत ही पतली और मुझ में पानी भी बहुत कम होता है लेकिन जैसे-जैसे में मैदानी क्षेत्रों की तरफ बढ़ती हुई मेरे पानी का स्तर बढ़ जाता है और मैं चोड़ी भी होती जाती हूं.

Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

भारत में मेरे जैसी कई नदियां बहती हैं जैसे गंगा, यमुना,सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी,नर्मदा आदि है यह मेरे जैसी ही विशाल है.

मैं जहां से भी निकलती हूं उस क्षेत्र को हरा-भरा बना देती हूं और वहां अगर बंजर भूमि भी है तो उसको भी उपजाऊ बना देती हूं.

 

मैं जब बहना शुरू करती हूं तब मेरे आगे कई कठिनाइयां आती हैं जैसे ऊंचे पहाड़ बड़े-बड़े पेड़-पौधे आदि लेकिन मैं उन सबको काटते हुए निरंतर बहती रहती हूं मैं कभी हार नहीं मानती हूं.

मैं कई सालों तक निरंतर अपने पथ पर बहती रहती हूं लेकिन कभी-कभी धरती में भूकंप आने के कारण कुछ स्थान ऊंचे हो जाते हैं तो मैं भी अपना रास्ता बदल लेती हैं लेकिन यह हजारों सालों में एक बार ही होता है.

मैं जहां से भी बैठी हूं उसके आसपास इंसानी बस्तियां और जंगली जीव जंतु अपना घर बना लेते हैं क्योंकि मेरे जैसे ही उनका जीवन चलता है.

मैं हमेशा सभी प्राणियों का भला करती हूं लेकिन बदले में मुझे इंसानों द्वारा सिर्फ प्रदूषण ही मिलता है इस बात का मुझे बहुत दुख होता है क्योंकि मेरा पवित्र और शुद्ध जल प्रदूषित हो जाता है जिसके कारण कई मूक प्राणियों की मृत्यु हो जाती है.

मुझमें कहीं जल अधिक होता है तो कहीं कम होता है वर्षा के मौसम में मुझ में अधिक पानी होता है और मैं उस समय बहुत तेजी से बहती हूं. मैं बहती हुई अंत में समुंदर में जा कर मिल जाती हूं.

Nadi ki Atmakatha for Class 6 to 12


मैं नदी हूं आज मैं आपको मेरे उद्गम से लेकर अत तक के सफर की आत्मकथा सुनाने जा रही हूं. मेरे उद्गम के कई स्थान है मैं कभी हिमालय से बहती हूं तो कभी पहाड़ों से, झरनों से तो कभी मैं वर्षा के जल से अस्तित्व में आती हूं. मैं जब बहना चालू करती हूं तब मैं बहुत कम स्थान घेरती हूँ.

लेकिन जैसे-जैसे मैं मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ती हूं वैसे-वैसे मेरा आकार भी बड़ा होता जाता है और मैदानी क्षेत्रों में पहुंचने के बाद मेरा आकार इतना बड़ा हो जाता है कि मेरे एक तट से दूसरे तट पर जाने के लिए नाव या पुल का सहारा लेना पड़ता है.

यह उसी प्रकार है जिस प्रकार मनुष्य जन्म लेता है तो छोटा होता है और जैसे-जैसे समय बीतता है वह बड़ा होता चला जाता है उसी प्रकार जब मेरा जन्म होता है तो मैं बहुत छोटी होती हूं लेकिन दूरी बढ़ने के साथ मैं भी बड़ी होती जाती हूं.

मैं जब बहना शुरू करती हूं तब मेरे सामने कई प्रकार की बाधाएं आती हैं जैसे कभी कोई बड़ा पहाड़ आ जाता है तो मैं डरती नहीं हूं मैं उसे काट कर आगे बढ़ जाती हूं. मुझ में बहुत शक्ति होती है मैं किसी भी कठोर से कठोर वस्तु को काट सकती हूं चाहे वो बड़ा पहाड़ी क्यों ना हो.

 

मैं जब बहती हुई पहाड़ों से गिरती हूं तब मैं बहुत तेज गति से मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ती हूं इस समय मेरे आगे कुछ भी आ जाए मैं उसे अपने साथ बहा ले जाती हूं. और जब मैं मैदानी क्षेत्रों में पहुंची हूं तब भूमि समतल होने के कारण मेरा बहाव भी कम हो जाता है फिर मैं सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी बहती हूं इसी स्थान पर मुझ में सबसे ज्यादा जल समाया हुआ होता है.

मैं जब वहां बहना चालू करती हूं तब मैं अकेली नहीं होती हूं मेरी जैसी कई नदियां और भी होती है वह बीच रास्ते में मुझसे मिलती है और मुझ में समा जाती हैं जिससे मैं और विशालकाय हो जाती हूं.

मैं बहती हुई जिस भी क्षेत्र से गुजरती हूं वहां की भूमि को हरा-भरा कर देती हूं वहां पर सुख और शांति ला देती हूं. और जब मैं किसी बंजर भूमि पर पहुंचती हूं तो मैं साथ में उपजाऊ मिट्टी भी साथ लेकर चलती हूं और वहां पर छोड़ देती हूं उसके बाद वहां पर कोई कमी नहीं रहती है वहां पर भी फसलें लहराती हैं चारों और हरियाली छा जाती है.

मेरा जल पीकर जंगल की सभी प्राणी खुश हो जाते हैं उन्हें नया जीवन मिल जाता है मैं पूरे जंगल को हरा-भरा रखती हूं. जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती गई इंसानों ने मेरे ऊपर पुल बना दिए और मेरे तटो के पास आकर बस गए.

गर्मियों के दिनों में जब बारिश नहीं होती है और अकाल पड़ जाता है तो सभी लोग मेरे ऊपर निर्भर होते हैं मेरे जन्म से ही उनको सभी प्राणियों को नया जीवन मिलता है. मैं अकाल के समय में भी मेरे ऊपर निर्भर प्राणियों का साथ नहीं छोड़ती हूँ.

मैंने इस पृथ्वी को बदलते देखा है मैंने कई राजाओं को रंक बनते देखा है मैंने कई बड़ी-बड़ी लड़ाईयां देखी है मैंने किसी वीर को इतिहास रचते देखा है.

कुछ लोग मुझे देवी की समान पूजते है यह देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता है लेकिन जब वे ही लोग मुझ में गंदगी फैलाते हैं तो मुझे बहुत ही बुरा लगता है क्योंकि मेरे जल में कई और प्राणी भी अपना जीवन जीते हैं और गंदगी फैलने के कारण मेरा जल प्रदूषित हो जाता है जिस कारण मुझमें समाए हुए प्राणी जैसे मछली, कछुए, मगरमच्छ आदि का जीवन संकट में पड़ जाता है.

साथ ही मनुष्य भी मेरा ही जल पीते हैं इसलिए उनका स्वास्थ्य दिन खराब हो जाता है यह देखकर मुझे बहुत ही दुख होता है पीड़ा महसूस होती है लेकिन मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती हूं बस निरंतर बहती रहती हूं.

 

कुछ लोग मुझे एक जगह से दूसरे जगह पर पहुंचने के लिए यात्रा के साधन के रुप में भी काम में लेते हैं वे लोग मुझ पर लकड़ी की नाव चलाकर एक जगह से दूसरी जगह बड़ी तेजी से पहुंच जाते है मुझे अच्छा लगता है कि मैं किसी के यात्रा के काम में भी आती हूं.

मैं बहती हुई कई गांव कई शहरों से गुजरती हूं मैं जब गांव से गुजरती हूं तो वहां के लोग मुझे आदर पूर्वक प्रणाम करते है यह देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता है और वह मुझ में से छोटी-छोटी नहरे निकालकर अपने खेतों में ले जाते है और फसलों को पानी देते है मेरे जल से उनकी फसलें लहरा उठती है और किसानों के चेहरे पर एक अलग ही खुशी आ जाती है.

और जब मैं शहरों से निकलती है तब आसपास के लोग मुझे देखने आते हैं लेकिन शहरों के विस्तार के कारण मेरे तर्क छोटे हो गए है जिस कारण जब वर्षा का मौसम आता है

तो मैं उफान पर होती हूं तो मेरे तटों पर बनाए हुए मकान बह जाते है और लोगों के जान माल की भी हानि होती है. लेकिन इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है वे लोग मेरे रास्ते में आते है तो मैं इसमें कुछ भी नहीं कर सकती हूं.

शहरों के लोग मुझ में कई प्रकार के प्रदूषित केमिकल और कूड़ा करकट डाल देते है जिससे मेरा जल प्रदूषित हो जाता है और फिर जो भी मेरा जल पीता है वह बीमार पड़ जाता है. यह देख कर मुझे बहुत कष्ट होता है लेकिन फिर भी मैं निरंतर बहती रहती हूं.

अंत में मैं बहती हुई मेरे लक्ष्य समुंदर तक पहुंच जाती हूं और उसमें समा जाती हूँ. इस समय मैं बहुत खुश रहती हूं.

मैं अंत में यही कहना चाहती हूं कि वर्तमान समय में बहुत अधिक प्रदूषित किया जा रहा है आप सभी से निवेदन है कि आप मुझे साफ सुथरा रखें जिससे मैं निरंतर बहती रहा हूं और सभी को जीवन देती रहू.

नदी की आत्मकथा से शिक्षा – Nadi ki Atmakatha se Siksha

नदी हमें सीख देती है कि हमेशा मुश्किलों से डरने की वजह हमें लड़ना चाहिए तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है.

नदी की आत्मकथा पर निबंध-Essay On River Biography In Hindi

नदी की आत्मकथा

मै नदी हूँ | मेरे कितने ही नाम है जैसे नदी , नहर , सरिता , प्रवाहिनी , तटिनी, क्षिप्रा आदि | ये सभी नाम मेरी गति के आधार पर रखे गए है | सर- सर कर चलती रहने के कारण मुझे सरिता कहा जाता है | सतत प्रवाहमयी होने के कारण मुझे प्रवाहिनी कहा गया है | इसी प्रकार दो तटो के बीच में बहने के कारण तटिनी तथा तेज गति से बहने के कारण क्षिप्रा कहलाती हूँ | साधारण रूप में मै नहर या नदी हूँ | मेरा नित्यप्रति का काम है की मै जहाँ भी जाती हूँ वहाँ की धरती , पशु- पक्षी , मनुष्यों व खेत – खलिहानों आदि की प्यार की प्यास बुझा कर उनका ताप हरती हूँ तथा उन्हें हरा- भरा करती रहती हूँ | इसी मेरे जीवन की सार्थकता तथा सफलता है |

आज मै जिस रूप में मैदानी भाग में दिखाई देती हूँ वैसी में सदैव से नही हूँ | प्रारम्भ में तो मै बर्फानी पर्वत शिला की कोख में चुपचाप , अनजान और निर्जीव सी पड़ी रहती थी | कुछ समय पश्चात मै एक शिलाखण्ड के अन्तराल से उत्पन्न होकर मधुर संगीत की स्वर लहरी पर थिरकती हुई आगे बढती गई | जब मै तेजी से आगे बढने पर आई तो रास्ते में मुझे इधर – उधर बिखरे पत्थरों ने , वनस्पतियों , पड़े – पौधों ने रोकना चाहा तो भी मै न रुकी | कई कोशिश करते परन्तु मै अपनी पूरी शक्ति की संचित करके उन्हें पार कर आगे बढ़ जाती |

इस प्रकार पहाडो , जंगलो को पार करती हुई मैदानी इलाके में आ पहुँची | जहाँ – जहाँ से मै गुजरती मेरे आस-पास तट बना दिए गए, क्योकि मेरा विस्तार होता जा रहा था | मैदानी इलाके में मेरे तटो के आस-पास छोटी – बड़ी बस्तियाँ स्थापित होती गई | वही अनेको गाँव बसते गए | मेरे पानी की सहायता से खेती बाड़ी की जाने लगी | लोगो ने अपनी सुविधा की लिए मुझे पर छोटे – बड़े पुल बना लिए | वर्षा के दिनों में तो मेरा रूप बड़ा विकराल हो जाता है |

इतनी सब बाधाओ को पार करते हुए चलते रहने से अब मै थक गई हूँ तथा अपने प्रियतम सागर से मिलकर उसमे समाने जा रही हूँ | मैंने अपने इस जीवन काल में अनेक घटनाएँ घटते हुए देखी है | सैनिको की टोलियाँ , सेनापतियो , राजा – महाराजाओ , राजनेताओं , डाकुओ , साधू-महात्माओं को इन पुलों से गुजरते हुए देखा है | पुरानी बस्तियाँ ढहती हुई तथा नई बस्तियाँ बनती हुई देखी है | यही है मेरी आत्मकथा |

मैंने सभी कुछ धीरज से सुना और सहा है | मै आप सभी से यह कहना चाहती हूँ की आप भी हर कदम पर आने वाली विघ्न-बाधाओ को पार करते हुए मेरी तरह आगे बढ़ते जाओ जब तक अपना लक्ष्य न पा लो |

 

Nadi ki Atmkatha par laghu nibandh

जन्म– मैं नदी हूँ। मेरा जन्म पर्वतमालाओं की गोद से हुआ है। बचपन से ही मैं चंचल थी। एक स्थान पर टिक कर बैठना तो मुझे आता ही नहीं। निरन्तर चलते रहना, कभी धीरे धीरे और कभी तेजी से मेरा काम है। मैंने आगे बढ़ना सीखा है रूकना नहीं। कर्म में ही मेरा विश्वास रहा है। फल की इच्छा मैंने कभी नहीं की।

Short Hindi Essay on Nadi ki Atmkathaगृह त्याग- पर्वतमालाएँ मेरा घर हैं पर मैं सदा वहाँ कैसे रह सकती हूँ? भला लड़की कभी अपने माता पिता के घर सदा रहती है। उसे माता पिता का घर तो छोड़ना ही होता है।

मैं भी इस सच्चाई को जानती हूँ। इसलिए मैंने भी अपने पिता का घर छोड़ आगे बढ़ने का निश्चय कर लिया।

जब मैंने अपने पिता का घर छोड़ा तो सभी ने मुझे अपनाना चाहा। प्रकृति ने भी मेरा पूरा पूरा साथ दिया। मैं बड़े बड़े पत्थरों को तोड़ती, उन्हें धकेलती आगे बढ़ी। पेड़ों के पत्ते तक मुझ से आकर्षित हुए बिना नहीं रहे। पर्वतीय प्रदेश के लोगों की सरलता और निश्चतता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैं भी उन्हीं के समान सरल और निश्छल बनी रही।

मार्ग में बड़े बड़े पत्थरों और चटृानों ने मेरा रास्ता रोकना चाहा। पर वे अपने उदेश्य में सफल नहीं हो पाए। मेरी धारा को रोकना  उनके लिए असंभव बन गया। मैं चीरती आगे बढ़ चली।

मैदानी भाग में प्रवेश– पहाड़ों को छोड़ मैं मैदानी भाग में पहुँची। यहाँ पहुँचते ही मुझे बचपन की याद आने लगी। पहाड़ी प्रदेश में घुटनों के बल सरक सरक कर आगे बढ़ती रही थीं, और अब मैदान में पहुँच कर सरपट भागती दिखाई देने लगी। मैंने बहुत से नगरों को हँसी दी है। बहुत से क्षेत्रों में हरियाली मेरे ही कारण हुई है।

खुशहाली का कारण– मैं ही समाज और देश की खुशहाली के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करती रही हूँ। मुझ पर बाँध बनाकर कर नहरें निकाली गईं। उनसे दूर दूर तक मेरा निर्मल जल ले जाया गया। यह जल पीने, कल कारखाने चलाने और खेतों को सींचने के काम में लाया गया।

मेरे पानी को बिजली पैदा करने के लिए काम में लाया गया। यह बिजली देश के कोने कोने से प्रकाश करने और रेडियो, टी.वी. आदि चलाने के लिए काम में लाई गई।

अहंकार शून्य-यह सब कुछ होते हुए भी मुझ में अहंकार का लेषमात्र भी नहीं है। मैं अपने प्राणों की एक एक बूंद समाज और प्राणि जगत के हित के लिए अर्पित कर देती हूँ। अपना सर्वस्व लुटा देती हूँ, इसका मुझे सन्तोष है। मुझे प्रसन्नता है कि मेरा अंग अंग समाज के हित में लगा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ ही मेरे जीवन का मूल मन्त्र है। मैं इस भावना को अपने हदय में संजोए यात्रा पथ पर बढ़ती रहती हूँ।

उपसंहार– मेरा (नदी का) लक्ष्य तो प्रियतम समुद्र नदी की प्राप्ति है। इसे मैं कभी नहीं भूल पाई। प्रियतम के मिलन की भावना जागृत होते ही मेरी चाल में तेजी आ गई। प्रियतम के दर्शन कर मैं प्रसन्न हो उठी। मैं अपने प्रियतम की बांहों में समाकर उसी का रूप हो गई।

इस प्रकार अपने पिता के घर से प्रस्थान कर अपने प्रियतम सागर से मिलने तक की यात्रा मेरे लिए बहुत आनंददायक रही।

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यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

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यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi 

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध :

भूमिका : व्यक्ति जब भी अपने जीवन से संतुष्ट होता है तो वह अपने संतुष्टि के कारणों को मिटाने की कोशिश करता है। इसी इच्छा से मनुष्य की उन्नति के भेद का पता चलता हैं। मैं एक विद्यार्थी हूँ तो मेरी ज्यादातर इच्छाएँ मेरी शिक्षा से संबंधित हैं इसलिए मैं कई बार शिक्षा में ऐसे परिवर्तन लाने की कोशिश करता हूँ जिससे हमारी शिक्षा सही अर्थों में उपयोगी बन जाये। जब तक मैं शिक्षा मंत्री नहीं बन जाता तब तक मैं अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता इसलिए कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि – काश! मैं शिक्षा मंत्री होता।

पाठ्य पुस्तकों का बोझ कम करने : यदि मैं शिक्षा मंत्री होता तो सबसे पहले ये आदेश जारी करता कि पाठ्यक्रमों में किताबों का बोझ कम कर दिया जाये। आज के समय में एक ही विषय की चार-चार किताबें होती हैं विद्यार्थी उन्हें देखकर ही घबरा जाता है और उसे कुछ भी समझ में नहीं आता। विद्यार्थी उन्हें देखकर असमंजस में पड़ जाते हैं कि वे कौन सी पुस्तक को अपनाएं। विद्यार्थियों पर पाठ्यपुस्तकों का बहुत भार होता हमें ज्यादा से ज्यादा बोझ को कम करने की कोशिश करनी चाहिए।

व्यवसाय से जुडी शिक्षा :- शिक्षा को व्यवसायिक बनाना जरूरी होता है। आज की वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमे किताबी कीड़ा बनाती है और बाद में बेकार नौजवानों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर देती है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए मेहनत और साहस की जरूरत होती है। लेकिन मुझे भरोसा है कि जब मैं शिक्षा मंत्री बन जाउँगा तब मैं अपनी मन की इच्छा को पूरा जरुर करूंगा।

जब मैं शिक्षा मंत्री का पद ग्रहण करता तो सरकारी अध्यापकों को प्राईवेट ट्यूशन देने से मना कर देता। जो अध्यापक ट्यूशन पढ़ाते हैं वे कक्षा में तो कुछ नहीं पढ़ाते हैं पर स्कूल का समय खत्म होते ही उनके घरों पर विधिवत स्कूल खुल जाते हैं। जो विद्यार्थी प्राईवेट ट्यूशन के लिए तैयार नहीं होते हैं उन्हें अपमानित और दंडित किया जाता है।

बहुमुखी विकास : शिक्षा अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान होता है। छात्रों के बहुमुखी विकास में खेलों, भ्रमण और सांस्कृतिक कार्यक्रम का अहिक महत्व होता है। गांधी जी ने भी शिक्षा दी थी कि गर्मी की छुट्टियों में गाँव में जाकर गाँव के सुधार के काम किये जाने चाहिएँ , अनपढ़ों को पढाना , किसानों को कृषि करने के नए ढंग सिखाने चाहिएँ , गरीब बच्चों को स्वास्थ्य के नियम बताने चाहिएँ , सफाई का महत्व समझाना चाहिए। विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास के लिए मैं ज़रुरतमंद कदम उठाऊंगा।

माध्यम :- शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए ? वर्तमान समय में हमारी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा बनी हुई है। इस विदेशी भाषा को समझने और जानने के लिए हमारी पूरी बौद्धिक शक्ति नष्ट हो जाती है। शिक्षा मंत्री के रूप में मैं अपने अपने कर्तव्य को पूरी तरह समझूंगा और मैं बच्चों और माता-पिता को स्वंय भाषा को चुनने की आज्ञा दूंगा मुझे पूरा विश्वास है की वो हिंदी भाषा को ही चुनेंगे।

हम शिक्षा की तरफ बहुत कम ध्यान देते हैं। हमारे स्कूलों में जब अध्यापक होते हैं वहाँ पर विद्यार्थी नहीं होते हैं और जहाँ पर विद्यार्थी होते हैं वहाँ पर योग्य अध्यापकों की कमी होती है। कहीं-कहीं पर तो विद्यालय के भवन ही नहीं होते और खेल के मैदान किसी-किसी विद्यालय के साथ ही दिखाई देते हैं। मैं स्कूलों और कॉलेजों से राजनीति को साफ कर दूंगा। मैं योग्य छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करूंगा।

उपसंहार : शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करने से देश की हालत को बदला जा सकता है। जापान जैसा देश अपनी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था की वजह से ही इतने कम समय में आज उन्नति के शिखर पर पहुंच गया है। मैं भी संसार को बता देता की भारत के विद्यार्थी भी देश के निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अभी तो बस यही दोहराना पड़ता है कि – काश! मैं शिक्षा मंत्री होता।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता- Yadi Main Shiksha Mantri Hota Essay In Hindi

भूमिका- मनुष्य कल्पनाशील प्राणी है। जीवन के प्रति उसकी उमंगे और लालसाएं कल्पना का सहारा लेकर पंख पसार कर उड़ने लगती है और नीले आकाश की ऊंचाई तथा विस्तार को भी छू जाती है। कल्पना का जन्म उस समय भी होता है जबकि मनुष्य किसी वस्तु का अभाव झेलता है। अभाव के कारण ही दु:ख जन्म लेते हैं और दु:खों से छुटकारा पाने की कामना प्रत्येक व्यक्ति करता है। कल्पना के मधुर क्षणों में व्यक्ति कुछ समय के लिए दु:खों से मुक्ति पा लेता है। रात्रि में जब व्यक्ति नींद में सोते हुए स्वप्न देखता है तो कभी-कभी इन स्वप्नों में भी वह अपनी मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर लेता है अथवा उसी रूप को प्राप्त कर लेता है। कल्पना कवियों और कलाकारों के लिए आवश्यक सोपान मानी जाती है। मैं एक विद्यार्थी हूँ और शिक्षा की वर्तमान दशा को देखकर मेरे मन में इसमें कुछ परिवर्तन करने की कामना हुई। मैं सोचने लगा-काश ! मैं शिक्षा मन्त्री होता।

शिक्षा और शिक्षा मन्त्री- यदि मैं शिक्षा मन्त्री बन गया तो सबसे पहले मैं अपने अधिकार और कर्तव्य को जानता। राजनीति के दाव-पेचों से अलग रहकर मैं पवित्र मन से शिक्षा को ही समर्पित हो जाता। मैं इस घमण्ड से न भरा होता कि मैं शिक्षा मन्त्री हूं। मैं शिक्षक, शिक्षा, और शिक्षार्थियों का सेवक स्वयं को समझता, जिसे बहुत बड़ा कर्तव्य निभाना होता है। शिक्षकों के प्रति मैं अत्यंत सम्मान की भावना रखने वाला शिक्षा मन्त्री हूं और सभी बातों में उनकी राय तथा उनके विचार जानता हूं। उनको शिक्षा से अलग रखकर मैं शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने की कल्पना कैसे कर सकता हूं ? स्कूल और कॉलेजों में नियमित रूप से जाने का भी प्रयास करता हूं और शिक्षकों तथा विद्यार्थियों से व्यक्तिगत सम्पर्क करता हूं। मैं यह भी जानता हूं कि हमारा देश निर्धन है तथा बहुत गरीब घर के विद्यार्थी हमारे स्कूलों में आते हैं जिनके पास पहनने के लिए उचित वस्त्र तथा पुस्तकें आदि खरीदने के लिए भी साधन नहीं हैं, उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए मैं यथाशक्ति उनकी सहायता करता हूं।

शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन- अब मैं शिक्षा मन्त्री हूं और मैंने यह जाना है कि शिक्षा के किन क्षेत्रों में क्या परिवर्तन करने अनिवार्य हैं। आज के युग में शिक्षकों का मान समाज में गिर रहा है। मैं उन्हें पूर्ण सम्मान दिलाने के लिए कृत-संकल्प हूं। इसके लिए मैं अध्यापक बनने के लिए इच्छुक व्यक्तियों का चयन करते हुए बहुत सावधानी ध्यान में रखने के लिए आदेश देता हूं। उनके चरित्र तथा नैतिकता के प्रति मैं सजग हूं। अत: समर्पित व्यक्ति ही अब ट्रेनिंग में चुने जाएंगे और ट्रेनिंग में भी उनके व्यवहारों का अध्ययन कर ही उन्हें उत्तीर्ण माना जायेगा। मैं जानता हूं कि टीचर्स अपनी यूनियन बनाते हैं और कुछ अध्यापक यूनियन के डर और भय के द्वारा शिक्षा संस्थानों में मनमाना व्यवहार करते हैं। ऐसे अध्यापकों के प्रति मैं अब जागरूक हूं। अध्यापक को सबसे पहले सही अर्थों में अध्यापक होना आवश्यक है। अब मैं अध्यापकों को सभी सुविधाओं को दिलाने के लिए भी प्रयास कर रहा हूं अर्थात् उनके वेतन में पर्याप्त वृद्धि कर रहा हूं ताकि उन्हें ट्यूशन के लिए बिल्कुल भटकना न पड़े। दूसरी ओर उन्हें मकान, चिकित्सा, उनके बच्चों की शिक्षा, उचित छुट्टियाँ तथा देश भ्रमण की सुविधा दिलाने का ध्यान रखता हूं।

विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम के प्रति सतर्क रहना भी आवश्यक है। मैं समझता हूं कि विज्ञान, गणित जैसे विषय सभी विद्यार्थी समझ नहीं पाते हैं। अत: मैं अध्यापकों की सहायता से उनकी रुचियों और प्रतिभा को देख कर ही उन्हें अलग-अलग विषयों की शिक्षा दिलाने के पक्ष में हूं। वे दसवीं कक्षा के बाद अपनी प्रतिभा के अनुसार विषय ले सकें, इसकी अपेक्षा मैं नौवीं कक्षा में प्रवेश के समय ही ऐसी व्यवस्था कर रहा हूं। अब कालेजों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए केवल वे ही विद्याथीं जा सकेंगे जो वास्तव में इसके योग्य हैं, अधिक परिश्रमी हैं तथा ऊंची शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक भी हैं। इस प्रणाली के साथ कालेजों में भीड़ कम होगी और अध्यापक विद्यार्थियों के प्रति अधिक ध्यान दे सकेंगे तथा उनके साथ न्याय भी कर पायेंगे। विद्यार्थी अब खुश होंगे क्योंकि उनके भारी-भारी बस्ते अब छोटे हो जायेंगे। इसी दिशा में मैं एक महत्वपूर्ण परिवर्तन करने पर आजकल गम्भीरता से विचार कर रहा हूं। हम जानते हैं कि आजकल विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता उत्पन्न हो रही है। वे अध्यापकों के प्रति, समाज के प्रति तथा देश के प्रति, माता-पिता के प्रति अपना उत्तरदायित्व नहीं निभाते हैं, इसलिए उनमें नैतिक, चारित्रिक शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न करना आवश्यक है। अब मैं सोचता हूं कि इसके लिए अध्यापकों का ही सहयोग अनिवार्य है, क्योंकि अध्यापकों की सभी समस्याओं को मैं सुलझा चुका हूं, वे मुझे सहयोग अवश्य देगे क्योंकि इससे उनका सम्मान करना भी विद्याथीं जानेंगे। स्कूल में चरित्र को व्यवहार के आधार पर देखा जाएगा। विनम्र और सुशील विद्यार्थियों की, आज्ञापालन करने वाले को और शिक्षा के प्रति ईमानदार, गंभीर तथा समर्पित विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष पुरस्कार दिये जाएंगे। इसके अलावा इसके लिए अलग से सौ अंकों की व्यवस्था होगी। इन अंकों में से प्रत्येक विद्याथों को कम से कम अस्सी अंक प्राप्त करने अनिवार्य ही होंगे और जो विद्याथीं इतने अंक प्राप्त न कर पायेगा उसे उनुप्तीर्ण घोषित कर दिया जाएगा। यदि कोई अध्यापक इन अंकों में अनियमित करता हुआ पाया जाएगा उसे भी दण्डित किया जाएगा।

मुझे इस बात का भी ज्ञान है कि परीक्षा के समय में बोर्ड में भी तथा परीक्षा केन्द्रों में भी अनियमितताओं का प्रयोग होता है। परीक्षक पर अनेक प्रकार के दबाव डाले जाते हैं। इसके लिए मुझे अब कठोर निर्णय लेने हैं तथा उन्हें कठोरता से ही लागू करना है। जो माता-पिता ऐसा करने का प्रयास करेंगे उन्हें निश्चय ही अब कम से कम दो महीने की कैद की सज़ा दी जाएगी। जो अध्यापक ऐसा करेंगे या इसमें सहायक होंगे उन्हें उनकी नौकरी से अलग किया जाएगा तथा जो बोर्ड के कर्मचारी इस कार्य में भाग लेते हुए पाए जायेंगे उन्हें भी नौकरी से तुरन्त अलग किया जाएगा। इसी प्रकार जो विद्यार्थी ऐसा करता हुआ पाया जाएगा उसका शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार समाप्त कर दिया जाएगा और उसे कठोर सजा भी देने की व्यवस्था होगी।

शिक्षा में चरित्र, नैतिकता के अतिरिक्त खेलों के प्रति भी विद्यार्थियों को आकर्षित करवाने की व्यवस्था होगी और जो विद्यार्थी अच्छे खिलाड़ी बनने के योग्य होंगे उन्हें सभी प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जायेगी।

स्त्री शिक्षा- मैं जानता हूँ कि वर्तमान युग में स्त्री शिक्षा का भी विशेष महत्व है। अत: इस ओर ध्यान देना आवश्यक है। स्त्री शिक्षा के विषय में मेरा दृष्टिकोण है कि दसवीं कक्षा तक सभी लड़कियों को अनिवार्य रूप से शिक्षा दी जाय। इसके बाद जो प्रतिभावान् तथा मेहनती लड़कियाँ हों उन्हें ही उच्च शिक्षा के अवसर और सुविधाएं प्रदान की जाएं। स्त्रियों के लिए जो महत्वपूर्ण शिक्षा गृह विज्ञान से संबंधित है तथा बच्चों के मनोविज्ञान से जुड़ी है, उनकी व्यवस्था अत्यावश्यक है। आज समाज में नारी का विशेष योगदान है। उनकी शिक्षा के प्रति भी मैं विशेष ध्यान देना चाहता हूं ; उनके लिए भी नैतिक चारित्रिक और धार्मिक शिक्षा की विशेष व्यवस्था करने का पक्षपाती हूं। सहशिक्षा के अनुकूल मैं अपनेदेश में वातावरण नहीं देखता हूं। केवल उच्च शिक्षा के समय ही सहशिक्षा का मैं पक्ष लूगा। इस प्रकार स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मैं अथक प्रयास करूंगा।

उपसंहार- आप शायद मेरी कल्पना के प्रति गम्भीर नहीं होंगे और इस पर हँसेगे लेकिन मैं इसमें आपका सहयोग चाहता हूं। आप इसकी हँसी न उड़ाइए बल्कि अपना सहयोग दीजिए तो यह सभी कुछ संभव हो जाएगा और जब मैं सबसे पहले अपना चरित्र और कार्य स्वच्छ रखूगा तब आप मेरी बातों पर विश्वास क्यों नहीं करेंगे। तो हम सब ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह मुझे शिक्षा मन्त्री बनने का अवसर दें ताकि मैं आपकी सेवा कर सकूं।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षामंत्री होता (निबंध ) | Essay on If I were the Education Minister in Hindi!

मनुष्य के मन की उड़ान ही उसे ऊँचाई की ओर प्रेरित करती है । मनुष्य पहले कल्पनाएँ करता है उसके बाद उन्हें साकार करने की चेष्टा करता है । यदि मनुष्य ने हजारों वर्ष पूर्व कल्पना न की होती तो आज वह अंतरिक्ष में विचरण नहीं कर रहा होता । वह कभी चंद्रमा पर विजय पताका फहराने में सक्षम नहीं हो पाता ।

बचपन से ही मनुष्य बड़ा होकर कुछ बनने या करने का स्वप्न देखता है । इसी प्रकार मैं भी प्राय: अपनी कल्पना की उड़ान में शिक्षा जगत् में अपना योगदान देना चाहता हूँ । मैं भी लाल बहादुर शास्त्री, पं॰ जवाहरलाल नेहरू व डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद की तरह राजनेता बनना चाहता हूँ ।

ये सभी राजनेता साथ-साथ महान विद्‌वान भी थे । इन्हें देश की समस्याओं की बड़ी गहरी समझ थी । मेरा विचार है कि कोई भी राजनेता यदि शिक्षामंत्री बनना चाहता है तो उसे अच्छा शिक्षाशास्त्री भी होना चाहिए । इसी स्थिति में वह राष्ट्र की उचित सेवा कर सकता है ।

बड़े होकर मैं भी चुनाव में भाग लूँगा । मेरी मंजिल संसद भवन है । लोकसभा सदस्य का चुनाव लड़ने के पश्चात् यदि मैं मंत्रिमंडल का सदस्य बना और मुझे मंत्रिपद के चुनाव के लिए कहा गया तब मैं निश्चित रूप से शिक्षामंत्री का ही पद ग्रहण करूँगा । देश का शिक्षामंत्री बनना मेरे लिए गौरव की बात होगी । मैं इस गौरवान्वित पद की प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और लगन से अपने दायित्व का निर्वाह करूँगा ।

राष्ट्र के माननीय राष्ट्रपति जी से पद और गोपनीयता की शपथ लेने के पश्चात् मैं पदभार ग्रहण करूँगा । इसके पश्चात् मैं अपने शिक्षा सचिवों से शिक्षा जगत के ताजा हालात के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करूँगा ।

इसके अतिरिक्त मैं शिक्षा क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं के बारे में जानना चाहूँगा तथा इसकी पूर्ण जानकारी लूँगा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए पूर्व मंत्रियों द्‌वारा क्या-क्या कदम उठाए गए हैं । पूर्व मंत्रियों द्‌वारा लिए गए निर्णयों का गहन अवलोकन भी मेरे लिए नितांत आवश्यक होगा ताकि उनमें वांछित संशोधनों का पता लगाया जा सके ।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का अवलोकन उस राष्ट्र के शिक्षा स्तर से लगाया जा सकता है । देश की शिक्षा का स्तर प्रायोगिक न होने से बेरोजगारों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती है । शिक्षा का उद्‌देश्य तब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता जब तक मनुष्य में आत्मचिंतन की धारा प्रवाहित नहीं होती है ।

 

अत: शिक्षा जगत की वास्तविक जानकारी ग्रहण करने के उपरांत शिक्षामंत्री के अपने अधिकार से मैं देश में शिक्षा का एक ऐसा प्रारूप तैयार करवाऊँगा जो हमारी शिक्षा को प्रायोगिक रूप दे सके । देश के नवयुवक पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कर सकें ।

नौकरियाँ न मिलने की स्थिति में हताश होने के बजाय स्वरोजगार की ओर प्रेरित हों । जीवन पथ पर महान आदर्शों व नैतिक मूल्यों को ग्रहण कर एक उत्तम चरित्र का निर्माण कर सकें । शिक्षा के उक्त प्रारूप के निर्धारण के लिए शिक्षा जगत की समस्त महान विभूतियों व आधुनिक शिक्षा-शास्त्रियों का मार्गदर्शन अवश्य ही मेरे इस महत्वपूर्ण कार्य में सहयोग करेगा ।

मैं शिक्षा में सुधार के अपने उपायों में प्रयास करूँगा कि शिक्षा जगत का राजनीतिकरण न हो सके । मैं एक ऐसी व्यवस्था कायम करूँगा जिससे शिक्षा क्षेत्र से भाई-भतीजावाद व क्षेत्रवाद जैसी विषमताएँ दूर हो सकें क्योंकि जब तक शिक्षा जगत में भ्रष्टाचार व्याप्त है तब तक उद्‌देश्यों की प्राप्ति नहीं की जा सकती ।

हमारी शिक्षा की दूसरी प्रमुख कमी यह है कि इसका प्रारूप अभी भी लार्ड मैकाले के प्रारूप पर आधारित है जो हमें स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व प्राप्त हुआ था । आज की बदलती परिस्थितियों व समय को देखते हुए इसमें अनेक मूलभूत परिवर्तनों की आवश्यकता है । शिक्षा का वर्तमान प्रारूप रोजगारपरक नहीं है ।

इस समस्या के निवारण के लिए सर्वप्रथम विभिन्न शिक्षा शास्त्रियों के सहयोग से मैं शिक्षा का नीवन प्रारूप तैयार करवाऊँगा जो रोजगारपरक एवं प्रायोगिक होगा । साथ ही साथ देश भर में ऐसे नियमों को लागू करवाऊँगा जिससे रोजगार अथवा उच्च शिक्षा के लिए चयन योग्यता के आधार पर हो सके ।

मनुष्य के जीवन में अनुशासन का विशेष महत्व है । बाल्यकाल से ही अनुशासन के महत्व को स्वीकार करने पर ही उत्तम चरित्र का निर्माण संभव है । मैं विद्‌यालयों में अनुशासन भंग करने वाले समस्त कारणों के निवारण हेतु उचित कार्यवाही करूँगा ।

इस प्रकार शिक्षा जगत में अब तक जो कमियाँ रह गईं हैं, जिसके कारण शिक्षा के मूल उद्‌देश्य की प्राप्ति नहीं हो रही है, मैं उन्हें अपने प्रयासों से दूर करने का प्रयास करूँगा ताकि हमारे देश की गणना विश्व के अग्रणी देशों में हो सके ।

मैं शिक्षा जगत की रीढ़ की हड्‌डी शिक्षकों का क्षीण होता सम्मान लौटाने की पुरजोर चेष्टा करूँगा । आजकल शिक्षकों की नियुक्ति का मापदंड केवल उनका ज्ञान होता है, उनमें पढ़ाने की योग्यता है या नहीं, इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है । शिक्षक यदि चरित्रवान तथा शिक्षण कार्यक्रमों में रुचि लेने वाले न हों तो किसी भी तरह के शिक्षा अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता, यह मेरी यथार्थ सोच है ।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षामंत्री होता

कल्पना करना और अपने भावी जीवन के लिए मधुर स्वप्न संजोना मानव की सहज प्रवृत्ति है। एक विद्यार्थी होने के कारण जब आज मैं देश में चल रही शिक्षा पद्धिति पर नजर डालता हूँ तो मन खिन्न हो उठता है। मुझे लगता है कि आज देश में जितनी दुर्दशा शिक्षा की हो रही है, उतनी संभवत: किसी अन्य वस्तु की नहीं। लार्ड मैकाले ने भारत में स्वार्थवृत्ति के कारण जिस शिक्षा पद्धिति की शुरुआत की, वाही आज तक चल रही है। मैंने पढ़ा है कि शिक्षा पद्धिति में सुधर के लिए न जाने कितने आयोग बने, कितनी ही समितियां बनी, पर इनके मूल ढांचे में कोई परिवर्तन ही नहीं हुआ। इसीलिए मेरे मन में एक विचार आया कि यदि मैं देश का शिक्षा मंत्री बन जाऊँ, तो इन दोषों को सुधारने में कोई कसार नहीं छोड़ूगा।

आजकल देश में दो तरह के विद्दालय चल रहे हैं। एक वे पब्लिक स्कूल जिनमें अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं तथा जहाँ शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। जिसमे प्रवेश के लिए पचास हजार से लेकर दो-तीन लाख रूपये तक का डोनेशन देना पड़ता है और दुसरे वे सरकारी विद्द्यालय जिनमे समाज के माध्यम या निर्धन परिवारों के पढ़ते हैं, जो पब्लिक स्कूलों में पढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते। देश का शिक्षा मंत्री बनने पर मेरा सर्वप्रथम काम होगा। इन पब्लिक स्कूलों की व्यापारिक मनोवृत्ति पर अंकुश लगाना। मैं पूरे देश में एक ही प्रकार के विद्द्यालयों की स्थापना के लिए प्रयास करूँगा। मैं जनता हूँ कि एसा करना आसन नहीं होगा क्योंकि समाज के उच्च तथा धनाढ्य वर्ग एसा कभी नहीं चाहेंगे। यदि मैं इसमें सफल न हुआ, तो इतना तो अवश्य करूँगा कि पब्लिक स्कूलों में 50 प्रतिशत स्थान छात्रों के लिए आरक्षित जरूर करवाऊंगा।

शिक्षा मंत्री बनने पर मेरा ध्यान पाठ्य पुस्तकों पर भी होगा। मैंने यह स्वयं अनुभव किया है कि प्राथमिक, मिडिल तथा उच्च सभी श्रेणियों में बालकों को न तो खेलने-कूदने का समय है और न मनोरंजन का। छोटे बालकों के बसते का वजन भी उनके अपने बोझ के बराबर होता है। मैं पाठ्यपुस्तकों के इस बोझ को निश्चय ही कम कराऊंगा।

मैं, देश में चल रही वर्तमान प्रणाली में अमूल चूल परिवर्तन करूँगा। जो परीक्षा पद्धिति तीन घंटों में विद्द्यार्थी की योग्यता का मूल्यांकन करती हो, मेरी दृष्टि में वह किसी भी भांति सही नहीं हो सकती। मैं शिक्षा में सत् एवं समग्र मूल्यांकन पद्धति को शुरू करूँगा जिसे छात्रों की योग्यता तथा क्षमता का उचित मूल्यांकन किया जा सके।

आज के अध्यापकों द्वारा विद्द्यालयों में ठीक से न पढ़ाने और ट्यूशन को बढ़ावा देने के विरुद्ध मैं कठोर कदम उठाऊंगा। मेरी योजना होगी कि अध्यापकों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाये तथा उनका वार्षिक वेतन वृद्धि का आधार भी उनका परीक्षा फल हो। जिस अध्यापक की परीक्षाफल ठीक नहीं होगा, उसके विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दूँगा।

मैं शिक्षा को धर्म तथा राजनीति से अलग रखने के लिए कनून बनाऊंगा। जो शिक्षण संस्था इस कानून का उल्लंघन करेगी उसके विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करने से भी नहीं हिचकूंगा। इसी प्रकार जिन निजी शिक्षण संस्थाओं में अध्यापकों का शोषण किया जाता है, उन्हें कम वेतन दिया जाता है। और हस्ताक्षर पूरे वेतन पर करवाए जाते हैं, उनकी खुफिया जांच करवाकर उनके विरुद्ध सख्त कार्यवाही कराऊंगा। ऐसे विद्यालयों की मान्यता ही रद्द कर दी जाएगी या उन्हें सरकारी अधिकार मिल जाने के लिए कानून पास कराऊंगा। मैं जनता हूँ कि शिक्षा में सुधर में मेरी उपर्युक्त योजनाए साकार करना, अत्यधिक कठिन है पर किसी ने ठीक कहा है –

‘जहाँ चाह वहाँ रहा’। यदि किसी बात को मन में ठान लिए जाये, तो उसे प्राप्त करना असंभव नहीं होता। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि एक बार मुझे शिक्षा मंत्री बनने का सुअवसर प्रदान करें तथा मेरी योजनाओं को सफल करने में सहायक हों।

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अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

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अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

अभ्यास का महत्व :

अभ्यास का किसी भी मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व होता है। अभ्यास करने से विद्या प्राप्त होती है और अनभ्यास से विद्या समाप्त हो जाती है। अभ्यास की कोई सीमा नहीं होती जब व्यक्ति निरंतर अभ्यास करता है तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है। अभ्यास के बल पर असंभव काम को भी संभव किया जा सकता है।

कठिन अभ्यास व्यक्ति को सफलता या उन्नति की ऊँची से ऊँची सीढी तक ले जाता है। अभ्यास करने से ही जडमति सुजान बनता है , सुजान कुशल बनता है और कुशल अपनी कला को पूर्ण कर लेता है। इस संसार में कोई भी जन्म से विद्वान् नहीं होता है वह अभ्यास से ही विद्वान् और महान बनता है। आज के समय में जो व्यक्ति विद्वान् और प्रतिष्ठित है वो किसी समय में बहुत ही दुर्बल और गुमनाम थे।

इस पद को प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत ही परिश्रम करना पड़ा था। जिस तरह से जब कुए से पानी निकलते समय रस्सी के आने जाने से कुए की शिला पर निशान पड़ जाते हैं उसी तरह से अभ्यास करने से दुर्बल व्यक्ति भी विद्वान् हो जाता है। जिस प्रकार कोई साधु जगह-जगह से शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभ्यास करना पड़ता है उसी तरह से कोई भी व्यक्ति बिना अभ्यास के कुछ नहीं सीख सकता है।

आत्म -विकास का साधन :- सभी लोगों को पता होता है कि इस संसार में लाखों लोग जन्म लेते हैं। ये लोग जन्म से ही विद्वान् नहीं होते हैं। ये भी निर्बल , जडमति और गुमनाम होते है। जो अपने जीवन में अत्यधिक अभ्यास करता है उसका जीवन अपने आप ही सफल हो जाता है। जो लोग अपने जीवन में अभ्यास नहीं करते हैं वे अपने जीवन में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

अभ्यास को आत्म-विकास का सर्वोत्तम साधन माना जाता है। यदि मनुष्य एक बार जीवन में असफल भी हो जाता है तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि वह कभी भी सफल नहीं हो पायेगा। यदि वह बार-बार अभ्यास करे तो उसे सफलता अवश्य प्राप्त होगी। जिस प्रकार कोई बच्चा गिर-गिरकर चलना सीखता है वह उसका अभ्यास होता है। जब कोई मनुष्य गलती करके सीखता है वह भी उसका अभ्यास होता है।

कोई बच्चा तुतला-तुतला कर साफ बोलना सीखता है। जब कोई सवार गिरगिर कर सीखता है तो वह उसका अभ्यास होता है इसी तरह अभ्यास के बिना मनुष्य जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता है। जिस तरह से शरीर का कोई अंग काम करने से बलवान हो जाता है और जिस अंग से काम नहीं लिया जाता है वह कमजोर हो जाता है उसी तरह से अभ्यास के बिना मनुष्य आलसी हो जाता है। जब मनुष्य एक बार किसी भी काम में असफल हो जाता है तो उसे बार-बार उस काम में श्रम और साधना करनी चाहिए। शरीर का विकास प्रकृति क्र द्वारा दी गयीं शक्तियों का सदुपयोग करने से होता है।

इतिहास से उदाहरण :- मनुष्य जीवन में अभ्यास का बहुत महत्व है। इतिहास में अनेक लोगों ने कठिन परिश्रम से जीवन में सफलता प्राप्त की थी। पुराने समय में बहुत से ऋषि -मुनियों ने कठिन परिश्रम करके अनेक सिद्धियाँ प्राप्त किया करते थे। बहुत से राक्षसों ने और बहुत से राजाओं ने अपने कठिन परिश्रम के बल पर भगवानों से अनेक प्रकार के वरदान भी प्राप्त किये थे।

मोहम्मद गौरी ने सत्रह बार युद्ध में पृथ्वीराज से असफलता प्राप्त की थी लेकिन उन्होंने अपना साहस नहीं खोया था। उन्होंने लगातार अभ्यास से 18वीं बार में पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया था। उसे लगातार अभ्यास से सफलता मिली थी। एक कविता जिसका नाम ‘ किंग ब्रूस एंड स्पाइडर ‘ था उसमें राबर्ट ब्रूस निरंतर असफल होने की वजह से एक गुफा में जाकर छिप गया था।

उस गुफा में उसने एक मकड़ी को देखा वो लगातार ऊपर चढने की कोशिश कर रही थी लेकिन वो बार-बार असफल हो जाती थी। लगातार अभ्यास करने के बाद एक बार वह ऊपर चढ़ गई और उसने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। राबर्ट ब्रूस ने उस मकड़ी से प्रेरणा ली और एक बार फिर से युद्ध किया वे उस युद्ध में सफल हुए थे।

तुलसीदास जी भी कविता बनाने में निपुण नहीं थे लेकिन उन्होंने लगातार परिश्रम और अभ्यास किया जिससे वे एक सफल और प्रसिद्ध कवि बन गये थे। सभी लोगों को पता है कि गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण को शिक्षा देने से इंकार कर दिया था लेकिन उसके कठिन परिश्रम और अभ्यास से वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुरधारी बना था। इसी तरह से अनेक वैज्ञानिक अपने जीवन में अभ्यास के कारण ही अनेक खोज कर पाए थे।

सफलता की कुंजी :- अगर किसी को किसी भी क्षेत्र में सफलता चाहिए तो उसे लगातार अभ्यास करने की जरूरत पडती है। किसी भी काम में सफल होने के लिए अभ्यास और परिश्रम करना जरूरी भी होता है। जो मनुष्य अपने अंदर से आलस्य को त्याग देता है और परिश्रम करता है तो उसके उन्नति के मार्ग में कोई भी बाधा नहीं आती है। जो मनुष्य परिश्रम से दूर भागता है उसे कभी भी सफलता प्राप्त नहीं होती है।

किसी भी तरह से काम मनोरथ की अपेक्षा परिश्रम से सिद्ध किया जाता है। संसार में अभ्यास को जीवन में सफलता का मूल मन्त्र माना जाता है। आज के समय में जो लोग बड़े , बल , विद्या , प्रतिष्ठा के क्षेत्र में ऊँचे पदों पर बैठे हैं वे एकदम उस स्थान पर नहीं पहुँचे होंगे। उन्हें लगातार बहुत श्रम और साधना करनी पड़ी होगी तभी उन्हें उच्च सफलता की कुँजी मिली होगी।

लगातार अभ्यास करके मनुष्य अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अभ्यास को करने से वह किसी भी काम में कुशल हो सकता है। जो लोग अभ्यास करते हैं उनके लिए मुश्किल से भी मुश्किल काम आसान हो जाता है। इससे व्यक्ति के समय की भी बचत होती है। अगर कोई मनुष्य किसी काम को आठ घंटे में करेगा तो बार-बार उस काम को करने से उसे काम के छोटे-छोटे गुण-दोषों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उस व्यक्ति में काम को करने की दक्षता उत्पन्न हो जाती है और वो विशेषज्ञ बन जाता है।

अभ्यास एक वरदान :- अभ्यास को केवल एक व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि एक सामूहिक वरदान के रूप में भगवान द्वारा दिया गया है। अभ्यास देश के उत्थान और समाज सुधार का मूल मन्त्र माना जाता है। देश को विकसित करने के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का अभ्यास नहीं चाहिए होता है। देश को विकसित करने के लिए पुरे राष्ट्र का अभ्यास , श्रम , साधना की जरूरत पडती है।

देश को विकसित करने के लिए एक दिन की योजनाओं से कुछ नहीं होता है वर्षों की योजनाओं की जरूरत पडती है। जब तक हमारा देश उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंच जाता है हमे परिश्रम और अभ्यास करते रहना चाहिए। इसी से हमारा देश उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है। संसार में जल्दबाजी और उतावलेपन को अभ्यास का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है।

जिन लोगों में धैर्य होता है वे कभी भी असफलता का मुंह नहीं देखते हैं। अगर कोई किसान आज बिज बोटा है और कल फसल को काटने की कामना करता है तो यह बात असंभव रूप में होती है। अभ्यास एक वरदान है जिससे मनुष्य अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है। अभ्यास से ही निपुणता आती है।

विद्यार्थी जीवन में महत्व :- विद्यार्थी जीवन में अभ्यास का बहुत अधिक महत्व होता है। विद्यार्थी जीवन अभ्यास करने की पहली सीढी होती है। विद्यार्थी जीवन से ही मनुष्य करना आरंभ करता है। जब विद्यार्थी एक बार परीक्षा में असफल हो जाता है तो बार-बार अभ्यास करके वह परीक्षा में विजय प्राप्त करता है। abhyas ka mahatva kahani in hindi,

शिक्षा को कोई भी विद्यार्थी एक दिन में प्राप्त नहीं कर सकता है। शिक्षा को प्राप्त करने के लिए लगातार कई वर्षों तक परिश्रम ,अभ्यास और लगन की जरूरत पडती है। अगर किसी विद्यार्थी को विद्वान् बनना है तो उसके लिए उसे रातों की नींद बेचनी पडती है और दिन का चैन बेचना पड़ता है।

कभी-कभी विद्यार्थी अपने रास्ते से भटक जाते हैं इसी वजह से उनसे लगातार परिश्रम और अभ्यास करवाया जाता है जिससे वे अपने रास्ते से भटकें नहीं। पुराने समय में विद्यार्थियों को अपने घरों से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त करनी पडती थी जिससे वे सांसरिक सुखों से दूर रक सकें और उनका ध्यान भी न भटके।

अभ्यास की आवश्यकता :- किसी भी व्यक्ति के लिए अभ्यास की बहुत आवश्यकता होती है। अगर किसी मनुष्य को शिक्षा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करनी है तो अभ्यास बहुत ही आवश्यक है। किसी भी कार्य का अभ्यास करने से उसमे दक्षता आती है। उसकी कठिनाईयां भी आसान हो जाती हैं। ऐसा करने से समय की भी बचत होती है। अभ्यास करने से अनुभ बढ़ता है।

जब कोई व्यक्ति एक काम को बार-बार करता है तो उसके लिए मुश्किल काम भी आसान हो जाता है। उसे काम के छोटे से छोटे गुण-दोषों के बारे में पता चल जाता है। जिस काम को अभ्यासी आधे घंटे में पूरा कर लेता है उसी काम को कोई और व्यक्ति आठ घंटे में भी बहुत मुश्किल से कर पाता है। बार-बार अभ्यास करने से वह उस काम में निपुण हो जाता है और वह अपनी ही कला का विशेषज्ञ बन जाता है। फिर विश्व की सभी विभूतियाँ उसके कदम चूमती हैं।

उपसंहार :- अभ्यास किसी भी मनुष्य के जीवन में दो तरह का होता है अच्छा और बुरा। अगर किसी को अपना जीवन संवारना है तो अच्छे अभ्यास की जरूरत पडती है। हमें सदा यही कोशिश करनी चाहिए कि हम बुरे अभ्यास से बच सकें और अच्छे अभ्यास को अपना सकें।

हमें हमेशा जडमति से सुजान बनना चाहिए न कि सुजान से जडमति बनना चाहिए। इसके लिए निरंतर अच्छे अभ्यास की जरूरत पडती है। अच्छे अभ्यास से आप किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

 

अभ्यास एक व्यक्ति के लिए किसी भी चीज को संभव बना सकता है और नियमित अभ्यास उन्हें किसी भी क्षेत्र में पूर्ण बना सकता है। हमें विशेषरुप से विद्यार्थियों को, हमारे दैनिक जीवन में अभ्यास के महत्व को अवश्य जानना चाहिए। आजकल, शिक्षकों के द्वारा स्कूल और कॉलेजों में विद्यार्थियों के ज्ञान और लेखन क्षमता को बढ़ाने के लिए निबंध लेखन को रणनीति के रुप में प्रयोग किया जाता है। किसी भी विषय के बारे में विद्यार्थियों के हिन्दी ज्ञान और हिन्दी लेखन क्षमता को बढ़ाने के लिए निबंध लेखन सबसे अच्छा उपकरण है। abhyas ka mahatva par anuched lekhan,

निबंध लेखन किसी भी विषय के बारे में छात्रों के दृष्टिकोण, नए विचार और सकारात्मक सुझावों को जानने का सबसे अच्छा तरीका है। हम यहाँ, “अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंधों की कुछ श्रृंखला उपलब्ध करा रहे हैं, जो छोटे निबंध, बड़े निबंध आदि के रुप में वर्गीकृत किए गए हैं। “अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है”, विषय पर लिखे गए सभी निबंध सरल और साधारण शब्दों का प्रयोग करके आसान वाक्यों के रुप में लिखे गए हैं; जिनमें से आप कोई भी अपनी जरुरत और आवश्यकता के अनुसार चुन सकते हैं।

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध (प्रैक्टिस मैक्स अ मैन परफेक्ट एस्से)

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

You can get below some essays on Practice makes a Man Perfect in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध 1 (100 शब्द)

नियमित आधार पर किसी भी चीज का अभ्यास करना, एक व्यक्ति की बौद्धिकता और सौंदर्य क्षमताओं को इंगित करता है। अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण करता है, क्योंकि यह पूर्णता लाता है, जो एक व्यक्ति को विशेष विषय या क्षेत्र में उत्कृष्ठता प्राप्त करने की ओर ले जाता है। कार्यों को उचित योजना और अभ्यास के अनुसार करना एक व्यक्ति का पूर्ण प्रदर्शन की ओर नेतृत्व करता है। अभ्यास किसी भी कार्य को करने में गुणवत्ता लाने के साथ ही एक व्यक्ति को अन्य गुणों के लिए भी तैयार करता है।

अभ्यास कमियों को नजरअंदाज करके कार्य को पूर्णता के साथ पूरा करने में मदद करता है। अभ्यास बहुत ही महत्वपूर्ण वस्तु है, जिसे हमें अपने जीवन में अवश्य अपनाना चाहिए। यदि इसे अभिभावकों और शिक्षकों की मदद से बचपन में ही विकसित किया जाए, तो यह और भी अच्छा होता है।

अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है

अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण करता है पर निबंध 2 (150 शब्द)

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण करता है, यह कहावत हमें किसी भी विषय में कुछ भी सीखने के नियमित अभ्यास के महत्व को बताती है। कठिन परिश्रम और सफलता का कोई भी विकल्प नहीं है। हमें विशेष क्षेत्र, जिसमें हम सफल होना चाहते हैं, में नियमित आधार पर अभ्यास करना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में; जैसे- व्यापार, कला, खेल, शैक्षणिक गतिविधियाँ आदि में महारत हासिल करने का कोई भी छोटा रास्ता नहीं है। केवल नियमित अभ्यास ही हमें किसी भी क्षेत्र में पूर्णता के साथ सफलता प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। ज्ञान बहुत ही बड़ी वस्तु है, लेकिन अकेले यह हमें हमारे लक्ष्य तक नहीं ले जा सकती है, हमें अपने ज्ञान को कार्य रुप में बदलने की आवश्यकता है, जिसके लिए नियमित अभ्यास जरुरी है।

अभ्यास ही इकलौता तरीका है, जिसके माध्यम से हम किसी भी क्षेत्र में महारत प्राप्त कर सकते है, क्योंकि यह कार्यों में पूर्णता लाता है। कुछ विषयों का उदाहरण लेते हैं; जैसे- भौतिक विज्ञान और गणित, जो पूरी तरह से अभ्यास पर आधारित है, क्योंकि हम बिना अभ्यास के सभी नियमों को भूल जाते हैं। यदि हमें कुछ भी सीखने; जैसे-संगीत, नृत्य, अंग्रेजी बोलना, खेल, कम्प्यूटर, पेंटिंग करना आदि में पूर्णता को लाना है, तो इसके लिए हमें नियमित अभ्यास की आवश्यकता है।

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध 3 (200 शब्द) abhyas ka mahatva story in hindi,

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है”, कहावत का अर्थ है कि, किसी भी विशेष क्षेत्र या विषय में सफल होने के लिए एक व्यक्ति को पूरी प्रतिबद्धता और रणनीति की योजना के साथ नियमित अभ्यास की आवश्यकता होती है। सफलता प्राप्त करना कोई आसान कार्य नहीं है: इसके लिए ज्ञान, कौशल, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण नियमित अभ्यास की आवश्यकता होती है। यदि आप की इच्छा विश्व प्रसिद्ध संगीतज्ञ बनने की है, तो इसके लिए आपको संगीत के उपकरण, अच्छे शिक्षक की व्यवस्था, और इसे सीखने के लिए आवश्यक घंटों तक नियमित रुप से अभ्यास करना होगा। ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है, जो एक ही रात में क्रिकेट के बारे में आपके सहज ज्ञान और कौशल के माध्यम से आपकों कपिल देव या सचिन तेंदुलकर बना दे। आप प्रतिबद्ध अभ्यास के बिना लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते हैं। आपको क्रिकेट सीखने के लिए क्रिकेट के मैदान में उच्च कौशल वाले अच्छे कोच के मार्गदर्शन में प्रतिदिन कई घंटों तक क्रिकेट का अभ्यास करना पड़ता है।

आपको जो कार्य आप कर रहे हैं, उसमें पूर्णता लाने के लिए बहुत छोटी-छोटी गलतियों का ध्यान रखने के साथ ही अपने मार्गदर्शक की आज्ञा का सम्मान के साथ पालन करना पड़ता है। यदि हम सफल लोगों की सूची देखते हैं, तो हम देखते हैं कि, वे अपने कार्य के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्धता के साथ नियमित अभ्यास को शामिल करते थे। वे विद्यार्थी, जो बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक या पद प्राप्त करते हैं, वे पूरे वर्ष योजनाबद्ध तरीके से और खुली आँखों के माध्यम से पढ़ाई करते हैं। वे अपने पाठ्यक्रम को दोहराते हैं और पुनः दोहराते हैं और खुद को प्रत्येक विषय में बहुत अच्छा बना लेते हैं। नियमित अभ्यास का कोई भी विकल्प नहीं है, जो किसी को भी पूर्ण बना सके। बिना अभ्यास के आप केवल औसत प्रदर्शन कर सकते हैं, परन्तु किसी भी कार्य में पूर्ण प्रदर्शन नहीं दे सकते हैं।


 

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध 4 (250 शब्द)

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है”, कहावत है जो यह इंगित करती है कि, किसी भी कार्य को जो हम कर रहे हैं; चाहे वह खेल हो या शैक्षणिक, उसमें नियमित अभ्यास ही पूर्णता लाता है। नियमित अभ्यास हमारी सभी गलतियों और दोषों को ठीक करके सफलता की ओर ले जाता है। प्रत्येक और सभी लक्ष्य, चाहे वे खेल में हो या शिक्षा में ताकत के साथ ही गलतियों को हटाकर पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण के विभिन्न तरीकों की आवश्यकता पड़ती है। एक निर्णय निर्माता, जो सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसे योजना के अनुसार आवश्यक घंटों के लिए नियमित अभ्यास करना होता है। उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ नियमित कठिन परिश्रम में विश्वास करना चाहिए। नियमित अभ्यास के साथ कार्य के लिए लगन हमें लक्ष्य की प्राप्ति कराती है।

एक टीम का नेतृत्व करने के लिए अधिक से अधिक कठिन अभ्यास की आवश्यकता होती है, जो टीम को संभालने और उसका नेतृत्व करने के लिए अनुभव देता है। एक टीम का नेतृत्वकर्त्ता होने के नाते, किसी को भी इस विषय को, पढ़ने, लिखने, या खेलने, नवीनता लाने के लिए नए विचारों का प्रयोग करने के कौशल के बारे में अच्छा जानकार होने की आवश्यकता है और उसे अपने टीम के सदस्यों के कौशल और ज्ञान के बारे में जानकर उसे टीम के लिए प्रयोग करना चाहिए। और सबसे अधिक महत्वपूर्ण, इन सभी चीजों को करने के लिए, टीम के नेता को प्रतिदिन कई घंटों तक कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता होती है, और इसके बाद वह अच्छा और सफल टीम का नेता बन सकेगा। यह कहावत कई तरीकों से हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों में सही उतरती है। कुछ समय बुरी परिस्थितियाँ बहुत से लोगों को कुछ प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करना सिखा देती है हालांकि, कुछ लोग बचपन से ही अपने माता-पिता के कारण लक्ष्य पर आधारित होते हैं। वे लोग जो भविष्य में अच्छा कैरियर चाहते है, वे स्वंय को सभी आवश्यक वस्तुओं के अभ्यास की ओर ले जाते हैं। कुछ लोग लगन की कमी के कारण अभ्यास करने में विफल हो जाते हैं।

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध 5 (300 शब्द)

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है”, एक अच्छी कहावत है, जो हमें हमारे जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए नियमित अभ्यास के महत्व के बारे में सीखाती है। अभ्यास के साथ बुद्धिमत्ता और सौंदर्य की शक्तियों का प्रयोग करके संभावित दोषों को सही करके एक व्यक्ति को पूर्णता की ओर ले जाता है। अभ्यास प्रदर्शन में पूर्णता और उत्कृष्ठता लाता है। पर्याप्त योजना के साथ किया गया अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्णता के साथ प्रदर्शन का बढ़ावा देता है। लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अच्छे मार्गदर्शक या प्रशिक्षण के मार्गदर्शन में सही दिशा में अभ्यास करना बहुत ही आवश्यक है। अभ्यास का अर्थ है, सही दिशा में गतिविधियों को दोहराना है, जो योग्यता को आकार प्रदान करता है।

प्रत्येक गतिविधि (जैसे-अच्छी आदतें, स्वच्छता, समयनिष्ठता, अनुशासन, नैतिकता, पढ़ना, लिखना, बोलना, खाना बनाना, नृत्य करना, गाना गाना, आदि) में गुणवत्ता और पूर्णता लाने के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। कठिन परिश्रम, धैर्य, विश्वास, दृढ़ इच्छा शक्ति, सहनशीलता, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, लगन और समर्पण के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। अभ्यास एक व्यक्ति को अन्य गुणों को रखने के लिए तैयार करता है। एक व्यक्ति को उस समय तक अभ्यास करना नहीं रोकना चाहिए, जब तक कि वह पूर्णता प्राप्त न कर ले।

पूर्णता प्राप्त करने के लिए अभ्यास सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि जितना अधिक व्यक्ति अभ्यास करता है, वह उतना ही अधिक दोषरहित और आत्मविश्वासी बनता है। अभ्यास के माध्यम से हम पहले की गई गलती को दुबारा नहीं करते और नई चीजों को सीखते हैं। कोई भी अभ्यास की आदत को किसी भी आयु में विकसित कर सकता है, हालांकि: इसे अन्य गतिविधियों, जैसे- घूमना, बात करना, लिखना, पढ़ना, खाना, खेलना, खाना बनाना आदि का बचपन से ही अभ्यास करके विकसित करना अच्छा होता है। एक स्कूल जाने वाला बच्चा पत्र लिखने का अभ्यास करने से पहले शब्द, वाक्य और अन्त में पैराग्राफ और बड़े लेख लिखने का अभ्यास करता है: जो उन्हें पूर्णता की ओर ले जाता है, चाहे वह लिखना हो, पढ़ना हो या बोलना हो। इस तरह से, एक बच्चा नियमित अभ्यास से एक योग्य और कुशल प्रतिभा को विकसित कर लेता है। abhyas ka mahatva par anuched in hindi,


 

“अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” पर निबंध 6 (400 शब्द) essay on abhyas ka mahatva in hindi,

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

यदि हम अपने दैनिक दिनचर्या पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो हम “अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है” कहावत के बहुत से उदाहरण पाएगें। प्रकृति स्वंय में बहुत से रुपों में पूर्ण है। मनुष्य के साथ ही अन्य जीवित प्राणियों को अपनी आजीविका को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। मनुष्य को किसी भी वस्तु को पूर्णता के साथ सीखने के लिए नियमित अभ्यास करना पड़ता है। मनुष्य को स्वंय के लिए लक्ष्यों को निर्धारित करने पड़ते हैं और उसके बाद सफल जीवन के लिए उसी के अनुसार अभ्यास करना पड़ता है। नियमित अभ्यास करने के लिए, किसी को भी बहुत अधिक धैर्य, लगन, और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। अभ्यास लोगों के गुणों को बेहतर गुणों में बदल सकता है। कुछ निश्चित गतिविधियों का अभ्यास करने के लिए, मनुष्य को अपना मस्तिष्क, आत्मा, और शरीर को एक स्थान पर सुचारु रुप से अधिक सहजता और सन्तुष्टि के साथ निश्चित आवश्यक उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए एकाग्रता की आवश्यकता है।

बिना दृढ़ निश्चय के, कोई भी सफलता के साथ अभ्यास में सलग्न नहीं हो सकता है. आशाहीन व्यक्ति कभी भी अभ्यास नहीं करते हैं, क्योंकि वे पर्याप्त परिणाम की प्राप्ति से पहले ही आसानी से अपना अभ्यास छोड़ देते हैं। अभ्यास को नियमित रखने के लिए, एक व्यक्ति को सकारात्मक सोच के साथ आशा, विश्वास और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें, तो हम देखते हैं कि, एकलव्य को गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या सीखाने से मना कर दिया था हालांकि, उसके दृढ़ निश्चय ने उसकी मदद की और वह अपने गुरु की मूर्ति के सामने किए गए कुछ वर्षों के नियमित अभ्यास से तीरअंदाजी बहुत अच्छे से सीख गया था।

अभ्यास हमारे लिए व्यायाम और मंत्र की तरह है, जो शारीरिक और मानसिक संस्थाओं को आवश्यक आवृत्ति के साथ एक रास्ते पर लाती है और धीरे-धीरे लेकिन निश्चितता के साथ हमें पूर्णता की ओर ले जाती है। विश्वास के साथ नियमित अभ्यास एक एकजुट ताकत का निर्माण करता है, जो शारीरिक और मानसिक संस्थाओं को आवश्यक आवृत्ति के साथ कार्य करने के लिए एक-दूसरे से जोड़ता है। यदि योजनाबद्ध तरीके से अभ्यास किया जाए, तो कोई भी अपना लक्ष्य धीरे-धीरे से लेकिन निश्चय ही प्राप्त कर सकता है। महत्वाकांक्षी लोग अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं, परन्तु कभी भी हारने के बारे में नहीं सोचते हैं। अभ्यास सबसे अच्छा उपकरण है, जिसे हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए क्षमताओं से परे, अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं को तेज करने प्रयोग कर सकते हैं। अभ्यास हमारा सबसे अच्छा दोस्त होता है, जो हमें सफलता की ओर ले जाता है और सदैव ज्ञान को हमारे साथ रहने देता है।

यह आत्मविश्वास के स्तर को बढ़ाकर सुस्त उत्प्रेरणाओं को जगाने में लोगों की मदद करता है। यह हमारे मस्तिष्क को शान्त करता है और खुशी प्रदान करता है, क्योंकि किसी भी वस्तु का अभ्यास ध्यान की तरह होता है। हम किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास के माध्यम से दुर्गम ऊँचाईयों तक पहुँच सकते हैं। यह हमें सही दिशा में जाने और चुनौतियों का सामना करके जीतने की क्षमता प्रदान करने के लिए तैयार करता है। अभ्यास नियमित गतिविधि है, जो दृढ़ इच्छाशक्ति को बढ़ाने और मजबूत पूर्णता के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में प्रोत्साहित करता है।practice makes a man perfect essay in hindi,

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

बुद्धिहीन व्यक्ति को बुद्धिमान बनने के लिए निरतंर ‘अभ्यास’ करते रहना चाहिए। अभ्यास यानी निरंतरता बनाए रखें। किसी भी काम को लगातार करते रहने से उस काम में दक्षता हासिल हो जाती है।इस दोहे से समझ सकते हैं अभ्यास का महत्वकरत-करत अभ्यास के जङमति होत सुजान। रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान।।

इस दोहे का अर्थ यह है कि जब सामान्य रस्सी को भी बार-बार किसी पत्थर पर रगड़ने से निशान पड़ सकता है तो निरंतर अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है।लगातार अभ्यास करने के लिए आलस्य को छोड़ना पड़ेगा और अज्ञान को दूर करने के लिए पूरी एकाग्रता से मेहनत करनी होगी।महाकवि कालिदास ऐसे बने विद्वानमहाकवि कालिदास सूरत से सुंदर थे और राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ और मूर्ख थे।

कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। उनका विवाह विद्योत्तमा नाम की सुंदर और बुद्धिमान राजकुमारी से हुआ था। vidyarthi jeevan mein abhyas ka mahatva,

विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो पुरुष उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो अपमान से दुखी कुछ विद्वानों ने कालिदास से उसका शास्त्रार्थ कराया।कालिदास से शास्त्रार्थ के समय विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। विद्योत्तमा को लगता था कि कालिदास गूढ़ प्रश्न का गूढ़ जवाब दे रहे हैं।

उदाहरण के लिए विद्योत्तमा ने प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। इसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया। ये देखकर विद्योत्तमा को लगा कि वह कह रहा है कि पांचों इन्द्रियां भले ही अलग हों, सभी एक मन के द्वारा संचालित हैं। इस प्रकार शास्त्रार्थ से विद्योत्तमा प्रभावित हो गई और उनका विवाह कालिदास से हो गया।

विवाह के बाद विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चला कि कालिदास अनपढ़ और मूर्ख हैं तो उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कह कर घर से निकाल दिया कि सच्चे पंडित बने बिना घर वापिस नहीं आना।इसके बाद कालिदास ने सच्चे मन से काली देवी की आराधना की। ज्ञान हासिल करने के लिए लगातार अभ्यास किया। माता के आशीर्वाद और लगातार अभ्यास से वे ज्ञानी हो गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा- कपाटम् उद्घाट्य सुंदरी (दरवाजा खोलो, सुंदरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)। कालिदास ने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक गुरु माना। कालिदास ने कई महान काव्यों की रचना की। अभिज्ञानशाकुंतलम् और मेघदूतम् कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाएं हैं।

अभ्यास का महत्व पर निबंध-Essay On Importance Of Practice In Hindi

Essay on abhyas ka mahatva in hindi

दोस्तों आज की हमारी पोस्ट essay on abhyas ka mahatva in hindi एक बेहतरीन आर्टिकल है दोस्तों आज दुनिया में हर इंसान सफल होना चाहता है और ये सफलता उसे तब ही मिलती है जब वह लगातार अभ्यास करे,जब इंसान की जिंदगी शुरू होती है

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तब वह एक स्टूडेंट के तौर पर सपना देखता है जिंदगी में सफलता पाने का और सफलता उसको बार-बार अपने द्वारा किए गए प्रयासों से मिलती है,दरअसल जब हम किसी काम को बार-बार करते हैं तो हम उसमें महारत हासिल कर लेते हैं और हम उसके द्वारा जीवन में सफलता अर्जित करते हैं.

दोस्त दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो पहले कुछ भी नहीं थे लेकिन आज वह अपने द्वारा किए गए बार-बार प्रयासों से उस सफलता की ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं जहां पर पहुंचना मुश्किल ही नहीं बल्कि बहुत मुश्किल होता है बात करें हम उस महान इंसान थॉमस एडिसन की जिसने आज हमें उजाला दिया जिन्होंने बल्ब का अविष्कार किया,आज अगर वह बार बार लगातार लगभग 9999 बार प्रयास नहीं करते तो हम कभी भी उजाले की रोशनी में नहीं रह पाते उन्होंने बार-बार प्रयास कर बल्ब बनाना सीख लिया,इसी तरह और भी कुछ लोग हैं जिन्होंने बार बार प्रयास करके एक बहुत बड़ी सफलता हासिल की है हम बात करें एक महान वैज्ञानिक गैलिलियो की तो उन्होंने अपने बार-बार प्रयासों के जरिए बहुत से अविष्कार किए हैं और एक सफलता हासिल की है हम बात करें हमारे देश के राष्ट्रपति और एक महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जिन्होंने अपनी बार-बार प्रयासों से बहुत कुछ सीखा है और जीवन में सफलता अर्जित की है.

लोग कहते हैं कि थॉमस एडिसन बचपन में स्कूल से सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि उनकी बुद्धि कमजोर है थी लेकिन आज वह दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक और सबसे बड़े बुद्धिमान व्यक्ति माने जाते हैं अगर किसी व्यक्ति की बुद्धि कमजोर हो या वह शरीर से अपंग हो तो वाकई में अपने द्वारा किए गए प्रयास से सफलता अर्जित कर सकता है क्योंकि जब भी हम किसी चीज को किसी काम को बार-बार करते हैं लगातार करते हैं तो हम उस में परफेक्शन हासिल कर लेते हैं और सफलता हमारे कदम चूमती है,दोस्तों में जितने भी नाम आपको बताऊंगा नाम कम पड़ेंगे क्योंकि ऐसे दुनिया में बहुत सारे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने अपनी कमियों को ना देखते हुए खूबियों को देखा और जिंदगी में एक बड़ी सफलता हासिल की है,अगर हम कोई भी काम बार-बार करते हैं तो ये पक्का है कि उसमें हम परफेक्ट हो जाते हैं और फिर हमारा मुकाबला करने वाला कोई नहीं है. abhyas ka mahatva par hindi mein nibandh,

दोस्तों अभ्यास का जीवन में बड़ा ही महत्व होता है अगर आपको किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित करना है तो अभ्यास निरंतर जारी रखना होगा चाहे आप कौन सी भी पढ़ाई कर रहे हैं या फिर कोई सा बिजनेस कर रहे हैं या किसी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं या कोई काम कर रहे हैं,अगर आपको सफलता अर्जित करना है तो बार बार प्रयास करना होगा.

दोस्तों दरअसल हम जब भी कोई काम बार-बार करते हैं तो हम उसमें परफेक्ट हो जाते हैं यानी जब हम काम करते हैं तो बहुत सारी गलतियों से हमें गुजारना होता है और जब हमको पता लग जाता है कि कोन सी गलती करने से हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं और उस गलती को हमारे जीवन से हम हमारे काम से निकाल देते हैं और जीवन में सफल हो जाते हैं,दोस्तों बार बार अभ्यास करने से जिंदगी में कुछ भी पाया जा सकता है,आप सभी दशरथ मांझी को भी जानते होंगे जिन्होंने बार बार लगातार प्रयास करके यानी लगातार 22 सालों तक प्रयास करके पर्वत को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया,दोस्तों हमको जिंदगी में कभी भी हार नहीं मानना चाहिए और बार बार अभ्यास कर जिंदगी में सफलता पाने के लिए अग्रसर होना चाहिए.

दोस्तों जब हम किसी काम में सफलता अर्जित कर लेते हैं तो लोग हमारी तारीफ करते हैं और हमारा स्वागत करते हैं क्योंकि बार-बार प्रयास करने से हम उस काम में परफेक्शन हासिल कर लेते हैं जिस काम में परफेक्ट होना बहुत मुश्किल होता है दोस्तों वाकई में अगर आप बार बार लगातार प्रयास करो निरंतर अभ्यास करो तो दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है आप कुछ भी कर सकते हैं,दोस्तों जब हम किसी काम को बार बार-बार करते हैं तो हमें बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं क्योंकि हम एक ही काम को बार-बार करते हैं लेकिन अगर हमने लोगों की सुनी तो हम जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाएंगे.

हर सफल व्यक्ति जो बहुत बार प्रयास करने से सफल होता है उसका लोगों ने मजाक उड़ाया है लेकिन सफलता अर्जित करने के बाद वही मजाक उड़ाने वाले व्यक्ति आपका साथ देने लगते हैं यही दुनिया का नियम होता है इसलिए आप कभी भी बार-बार प्रयास,अभ्यास करने से पीछे मत होइए और अपने लक्ष्य के लिए हमेशा प्रयास कीजिए क्योंकि दुनिया में वही जाना जाता है जो किसी  काम में परफेक्ट होता है.

दोस्तों निरंतर अभ्यास करने के लिए आपको एक टाइम टेबल बनाना होगा और ऐसे लोगों से मिलना होगा जो अच्छी सोच और पॉजिटिव सोच रखते हैं क्योंकि अगर आप निगेटिव सोच रखने वाले लोगों के बीच में रहते हो तो कहीं ना कहीं आप पर उसका असर गलत पड़ता है इसलिए निरंतर प्रयास करते रहिए और अभ्यास करते रहिए.

 

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परिश्रम का महत्व पर निबंध-Importance Of Hard Work Essay In Hindi

परिश्रम का महत्व (Importance Of Hard Work In Hindi) :

भूमिका : मनुष्य के जीवन में परिश्रम का बहुत महत्व होता है। हर प्राणी के जीवन में परिश्रम का बहुत महत्व होता है। इस संसार में कोई भी प्राणी काम किये बिना नहीं रह सकता है। प्रकृति का कण-कण बने हुए नियमों से अपना-अपना काम करता है। चींटी का जीवन भी परिश्रम से ही पूर्ण होता है। मनुष्य परिश्रम करके अपने जीवन की हर समस्या से छुटकारा पा सकता है| सूर्य हर रोज निकलकर विश्व का उपकार करता है।

वह कभी भी अपने नियम का उल्लंघन नहीं करता है। वह पर्वतों को काटकर सडक बना सकता है ,नदियों पर पुल बना सकता है , जिन रास्तों पर काँटे होते हैं उन्हें वह सुगम बना सकता है। समुन्द्रों की छाती को चीरकर आगे बढ़ सकता है। नदियाँ भी दिन-रात यात्रा करती रहती हैं। वनस्पतियाँ भी वातावरण के अनुसार परिवर्द्धित होती रहती हैं। कीड़े ,पशु,पक्षी अपने दैनिक जीवन में व्यस्त रहते हैं।

ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो परिश्रम से सफल न हो सकें। जो पुरुष दृढ प्रतिज्ञ होते हैं उनके लिए विश्व का कोई भी कार्य कठिन नहीं होता है। वास्तव में बिना श्रम के मानव जीवन की गाड़ी चल नहीं सकती है। श्रम से ही उन्नति और विकास का मार्ग खुल सकता है। परिश्रम और प्रयास की बहुत महिमा होती है। अगर मनुष्य परिश्रम नहीं करता तो आज संसार में कुछ भी नहीं होता। आज संसार ने जो इतनी उन्नति की है वह सब परिश्रम का ही परिणाम है।

परिश्रम और भाग्य :- कुछ लोग परिश्रम की जगह भाग्य को अधिक महत्व देते हैं। ऐसे लोग केवल भाग्य पर ही निर्भर होते हैं। वे भाग्य के सहारे जीवन जीते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता है कि भाग्य जीवन में आलस्य को जन्म देता है और आलस्य जीवन मनुष्य के लिए एक अभिशाप की तरह होता है। वे लोग यह समझते हैं कि जो हमारे भाग्य में होगा वह हमें अवश्य मिलेगा। वे परिश्रम करना व्यर्थ समझते हैं।

भाग्य का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है लेकिन अलसी बनकर बैठे हुए असफलता के लिए भगवान को कोसना ठीक बात नहीं है। अआलसी व्यक्ति हमेशा दूसरों के भरोसे पर जीवन यापन करता है। वह अपने हर काम को भाग्य पर छोड़ देता है। हमारे इसी भाव की वजह से भारत देश ने कई वर्षों तक गुलामी की थी। परिश्रम से कोई भी मनुष्य अपने भाग्य को भी बदल सकता है।

जो व्यक्ति आलसी होते हैं वे केवल भगवान के लिखे हुए पर आश्रित होते हैं। हम सभी के मन में हीनता की भावना पैदा हो गई है लेकिन जैसे-जैसे हमने परिश्रम के महत्व को समझा तो हमने पराधीनता की बेड़ियों को तोडकर स्वतंत्रता की ज्योति जलाई थी। कायर व्यक्ति हमेशा कहते रहते हैं कि हमें भगवान देगा। अगर परिश्रम करने के बाद भी हमें सफलता नहीं मिलती है तो हमे इस पर विचार करना चाहिए कि हमारे परिश्रम में क्या कमी थी।

परिश्रम का महत्व : परिश्रम का बहुत अधिक महत्व होता है। जब मनुष्य के जीवन में परिश्रम खत्म हो जाता है तो उसके जीवन की गाड़ी रुक जाती है। अगर हम परिश्रम न करें तो हमारा खुद का खाना- पीना , उठना-बैठना भी संभव भी नहीं हो पायेगा। अगर मनुष्य परिश्रम न करे तो उन्नति और विकास की कभी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। आज के समय में जितने भी देश उन्नति और विकास के स्तर पर इतने ऊपर पहुंच गये हैं वे भी परिश्रम के बल पर ही ऊँचे स्तर पर पहुँचे हैं।

परिश्रम से अभिप्राय होता है वो परिश्रम जिससे विकास और रचना हो। इसी परिश्रम के बल पर बहुत से देश ने अपने देश को उन्नति और विकास के शिखर पर पहुँचा दिया है। जिस परिश्रम व्यर्थ में किया जाता है उसका कोई अर्थ नहीं होता है। जिन व्यक्तियों के जीवन में आलस भरा होता है वे कभी भी जीवन में उन्नति नहीं कर सकते हैं। आज मनुष्य ने परिश्रम से अपने जीवन को उन्नति और विकास के शिखर पर पहुँचा लिया है। परिश्रम के बिना किसी भी प्राणी का जीवन व्यर्थ होता है।

परिश्रम की विजय : किसी भी तरह से परिश्रम की ही विजय होती है। संस्कृत में एक उक्ति है – सत्यमेव जयते। इसका अर्थ ही होता है परिश्रम की विजय होती है। मनुष्य मानव प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होते है। मनुष्य खुद ही भगवान का स्वरूप माना जाता है। जब मनुष्य परिश्रम करते हैं तो उनका जीवन उन्नति और विकास की तरफ अग्रसर होता है लेकिन उन्नति और विकास के लिए मनुष्य को उद्यम की जरूरत पडती है। उद्यम ही मनुष्य अपने कार्य को सिद्ध करता है वह केवल इच्छा से अपने कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं।

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जिस तरह से बिल्ली के मुंह में चूहे खुद ही आकर नहीं बैठते है उसी तरह से मनुष्य के पास बिना परिश्रम के उन्नति और विकास खुद ही नहीं हो जाते हैं। परिश्रम के बिना कभी भी मनुष्य का काम सफल नहीं हो सकता है। जब मनुष्य किसी काम को करने के लिए परिश्रम करता है तभी मनुष्य को सफलता मिलती है। मनुष्य कर्म करके अपना भाग्य खुद बनाता है। जो व्यक्ति कर्मशील और परिश्रमी होता है केवल वही अपने जीवन में आने वाली बाधाओं और कठिनाईयों पर परिश्रम से विजय प्राप्त कर सकता है।

परिश्रम के लाभ :- परिश्रम से मनुष्य के जीवन में अनेक लाभ होते हैं। जब मनुष्य जीवन में परिश्रम करता है तो उसका जीवन गंगा के जल की तरह पवित्र हो जाता है। जो मनुष्य परिश्रम करता है उसके मन से वासनाएं और अन्य प्रकार की दूषित भावनाएँ खत्म हो जाती हैं। जो व्यक्ति परिश्रम करते हैं उनके पास किसी भी तरह की बेकार की बातों के लिए समय नहीं होता है। जिस व्यक्ति में परिश्रम करने की आदत होती है उनका शरीर हष्ट-पुष्ट रहता है। परिश्रम करने से मनुष्य का शरीर रोगों से मुक्त रहता है।

परिश्रम करने से जीवन में विजय और धन दोनों ही मिलते हैं। अक्सर ऐसे लोगों को देखा गयाहै जो भाग्य पर निर्भर नहीं रहते हैं और थोड़े से धन से काम करना शुरू करते हैं और कहाँ से कहाँ पर पहुंच जाते है। जिन लोगों के पास थोडा धन हुआ करता था वे अपने परिश्रम से धनवान बन जाते हैं। जो व्यक्ति परिश्रमी होते हैं उन्हें जीवित रहते हुए भी यश मिलता है और मरने के बाद भी। परिश्रमी व्यक्ति ही अपने राष्ट्र और देश को ऊँचा उठा सकता है। जिस देश के लोग परिश्रमी होते है वही देश उन्नति कर सकता है। जिस देश के नागरिक आलसी और भाग्य पर निर्भर होते हैं वह देश किसी भी शक्तिशाली देश का आसानी से गुलाम बन जाता है।

महापुरुषों के उदाहरण :- हमारे सामने अनेक ऐसे महापुरुषों के उदाहरण हैं जिन्होंने अपने परिश्रम के बल पर अनेक असंभव से संभव काम किये थे। उन्होंने अपने राष्ट्र और देश का ही नहीं बल्कि पुरे विश्व का नाम रोशन किया था। अब्राहिम लिकंन जी एक गरीब मजदूर परिवार में हुए थे बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था लेकिन फिर भी वे अपने परिश्रम के बल पर एक झोंपड़ी से से निकलकर अमेरिका के राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गये थे।

बहुत से ऐसे महापुरुष थे जो परिश्रम के महत्व को अच्छी तरह से समझते हैं। लाला बहादुर शास्त्री , महात्मा गाँधी और सुभाष चन्द्र जैसे महापुरुषों ने अपने परिश्रम के बल पर भारत को स्वतंत्र कराया था। डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्ण जी अपने परिश्रम के बल पर ही राष्ट्रपति बने थे। ये सभी अपने परिश्रम से ही महान व्यक्ति बने थे।

आलस्य से हानियाँ :- आलस्य से हमारा जीवन एक अभिशाप बन जाता है। अलसी व्यक्ति ही परावलम्बी होता है। आलसी व्यक्ति कभी भी पराधीनता से मुक्त नहीं हो पाता है। हमारा देश बहुत सालों तक पराधीन रह चुका है। इसका मूल कारण हमारे देश के व्यक्तियों में आलस और हीन भावना का होना था। जैसे -जैसे लोग परिश्रम के महत्व को समझने लगे वैसे-वैसे उन्होंने अपने अंदर से हीन भावना को खत्म कर दिया और आत्मविश्वास को पैदा किया। ऐसा करने से भारत देश एक दिन पराधीन से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गया और लोग एक -दूसरे के प्रति प्रेम भाव रखने लगे।

परिश्रम से ही कोई व्यक्ति छोटे से बड़ा बन सकता है। अगर विद्यार्थी परिश्रम ही नहीं करेगा तो वह परीक्षा में कभी भी सफल नहीं हो सकता है। मजदूर भी परिश्रम से ही संसार के लिए उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करता है वह संसार के लिए सडकों, भवनों , मशीनों और डैमों का निर्माण करता है। बहुत से कवि और लेखकों ने परिश्रम के बल पर हिन् अणि रचनाओं से देश को वशीभूत किया है। अगर आज देश के लोग आलस करते तो आज हमे जो विशेष उपलब्धियां प्राप्त हैं वे कभी प्राप्त नहीं होते।

उपसंहार :- जो व्यक्ति परिश्रमी होते हैं वे चरित्रवान , ईमानदार , परिश्रमी , और स्वावलम्बी होते हैं। अगर हम अपने जीवन की , अपने देश और राष्ट्र की उन्नति चाहते हैं तो आपको भाग्य पर निर्भर रहना छोडकर परिश्रमी बनना होगा। जो व्यक्ति परिश्रम करता है उसका स्वास्थ्य भी ठीक रहता है।

आज के देश में जो बेरोजगारी इतनी तेजी से फैल रही है उसका एक कारण आलस्य भी है। बेरोजगारी को दूर करने के लिए परिश्रम एक बहुत ही अच्छा साधन है। मनुष्य परिश्रम करने की आदत बचपन या विद्यार्थी जीवन से ही डाल लेनी चाहिए। परिश्रम से ही किसान जमीन से सोना निकालता है। परिश्रम ही किसी भी देश की उन्नति का रहस्य होता है।

परिश्रम का महत्व पर निबंध-Importance Of Hard Work Essay In Hindi

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परिश्रम का महत्व पर निबंध |Essay on Importance of Hard Work in Hindi!

परिश्रम का मनुष्य के लिए वही महत्व है जो उसके लिए खाने और सोने का है । बिना परिश्रम का जीवन व्यर्थ होता है क्योंकि प्रकृति द्‌वारा दिए गए संसाधनों का उपयोग वही कर सकता है जो परिश्रम पर विश्वास करता है ।

परिश्रम अथवा कर्म का महत्व श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को गीता के उपदेश द्‌वारा समझाया था । उनके अनुसार:

”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन: ।”

परिश्रम अथवा कार्य ही मनुष्य की वास्तविक पूजा-अर्चना है । इस पूजा के बिना मनुष्य का सुखी-समृद्‌ध होना अत्यंत कठिन है । वह व्यक्ति जो परिश्रम से दूर रहता है अर्थात् कर्महीन, आलसी व्यक्ति सदैव दु:खी व दूसरों पर निर्भर रहने वाला होता है।

परिश्रमी व्यक्ति अपने कर्म के द्‌वारा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं । उन्हें जिस वस्तु की आकांक्षा होती है उसे पाने के लिए रास्ता चुनते हैं । ऐसे व्यक्ति मुश्किलों व संकटों के आने से भयभीत नहीं होते अपितु उस संकट के निदान का हल ढूँढ़ते हैं। अपनी कमियों के लिए वे दूसरों पर लांछन या दोषारोपण नहीं करते ।

दूसरी ओर कर्महीन अथवा आलसी व्यक्ति सदैव भाग्य पर निर्भर होते हैं । अपनी कमियों व दोषों के निदान के लिए प्रयास न कर वह भाग्य का दोष मानते हैं । उसके अनुसार जीवन में उन्हें जो कुछ भी मिल रहा है या फिर जो भी उनकी उपलब्धि से परे है उन सब में ईश्वर की इच्छा है । वह भाग्य के सहारे रहते हुए जीवन पर्यंत कर्म क्षेत्र से भागता रहता है । वह अपनी कल्पनाओं में ही सुख खोजता रहता है परंतु सुख किसी मृगतृष्णा की भाँति सदैव उससे दूर बना रहता है ।

किसी विद्‌वान ने सच ही कहा है कि परिश्रम सफलता की कुंजी है । आज यदि हम देश-विदेश के महान अथवा सुविख्यात पुरुषों अथवा स्त्रियों की जीवन-शैली का आकलन करें तो हम यही पाएँगे कि जीवन में इस ऊँचाई या प्रसिद्‌धि के पीछे उनके द्‌वारा किए गए सतत अभ्यास व परिश्रम का महत्वपूर्ण योगदान है ।

 

अमेरिका, चीन, जापान आदि विकसित देश यदि उन्नत देशों में हैं तो इसलिए कि वहाँ के नागरिकों ने अथक परिश्रम किया है। द्‌वितीय विश्वयुद्‌ध में भारी नुकसान के बाद भी आज यदि जापान न विश्व जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है तो उसका प्रमुख करग यही है कि वहाँ के लोगों में दृढ़ इच्छाशक्ति व अथक परिश्रम की भावना कूट-कूटकर भरी हुइ है ।

परिश्रमी व्यक्ति ही किसी समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना पाते हैं । अपने परिश्रम के माध्यम से ही कोई व्यक्ति भीड़ से उठकर एक महान कलाकार, शिल्पी, इंजीनियर, डॉक्टर अथवा एक महान वैज्ञानिक बनता है ।

परिश्रम पर पूर्ण आस्था रखने वाले व्यक्ति ही प्रतिस्पर्धाओं में विजयश्री प्राप्त करते हैं । किसी देश में नागरिकों की कर्म साधना और कठिन परिश्रम ही उस देश व राष्ट्र को विश्व के मानचित्र पर प्रतिष्ठित करता है ।

“विश्वास करो,

यह सबसे बड़ा देवत्व है कि –

तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो

और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका ।”

अत: उन्नति विकास एवं समृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि सभी मनुष्य परिश्रमी बनें । परिश्रम वह कुंजी है जो साधारण से साधारण मनुब्ध को भी विशिष्ट बना देती है । परिश्रमी लोग सदैव प्रशसा व सम्मान पाते हैं । वास्तविक रूप में उन्नति व विकास के मार्ग पर वही व्यक्ति अग्रसर रहते हैं जो परिश्रम से नहीं भागते ।

भाग्य का सहारा वही लोग लेते हैं जो कर्महीन हैं । अत: हम सभी को परिश्रम के महत्व को स्वीकारना एवं समझना चाहिए तथा परिश्रम का मार्ग अपनाते हुए स्वयं का ही नहीं अपितु अपने देश और समाज के नाम को ऊँचाई पर ले जाना चाहिए ।

परिश्रम का महत्व पर निबंध-Importance Of Hard Work Essay In Hindi

परिश्रम का महत्त्व पर लेख | Importance (Mahatva) of efforts Article in hindi

सफतला की पहली कुंजी श्रम है, इसके बिना सफलता का स्वाद कभी भी नहीं चखा जा सकता है. जिंदगी में आगे बढ़ना है, सुख सुविधा से रहना है, एक मुकाम हासिल करना है, तो इन्सान को श्रम करना होता है. भगवान ने श्रम करने का गुण मनुष्यों के साथ साथ सभी जीव जंतुओं को भी दिया है. पक्षी को भी सुबह उठकर अपने खाने पीने का इंतजाम करने के लिए बाहर जाना पड़ता है, उसे बड़े होते ही उड़ना सिखाया जाता है, ताकि वह अपना पालन पोषण खुद कर सके. दुनिया में हर जीव जंतु को, अपने पेट भरने के लिए खुद मेहनत करती पड़ती है. इसी तरह मनुष्यों को भी बचपन से बड़े होते ही, श्रम करना सिखाया जाता है. चाहे वह पढाई के लिए हो, या पैसे कमाने के लिए या नाम कमाने के लिए. मेहनत के बिना तो रद्दी भी हाथ नहीं आती.

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परिश्रम का महत्त्व पर लेख 

Importance of efforts Article in hindi

देश दुनिया के प्रसिध्य लोगों ने अपनी मेहनत परिश्रम के बल से ही दुनिया को ये अद्भुत चीजें दी है. आज हमारे महान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को ही देखिये, ये हफ्ते में सातों दिन 17-18 घंटे काम  करते है, ये न कभी त्योहारों, न पर्सनल काम के लिए छुट्टी लेते है. देश का इतना बड़ा आदमी जिसे किसी को छुट्टी के लिए जबाब न देना पड़े, वह तक परिश्रम करने से पीछे नहीं हटता है. देश को आजादी दिलाने के लिए महात्मा गाँधी ने जी जान रात दिन एक करके मेहनत की और आज इसका फल है कि हम आजाद है. कड़ी मेहनत एक कीमत है, जो हम सफलता पाने के लिए भुगतान करते है और जिससे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ आती है.

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क्या है परिश्रम (What is parishram )?

शारीरिक व मानसीक रूप से किया गया काम परिश्रम कहलाता है. ये काम हम अपनी इच्छा के अनुसार चुनते है, जिसे लेकर हम अपने उज्जवल भविष्य की कामना करते है. पहले श्रम का मतलब सिर्फ शारीरिक श्रम होता था, जो मजदूर या लेबर वर्ग करता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है, श्रम डॉक्टर, इंजिनियर, वकील, राजनैतिज्ञ, अभिनेता-अभिनेत्री, टीचर, सरकारी व प्राइवेट दफ्तरों में काम करने वाला हर व्यक्ति श्रम करता है.

परिश्रम की परिभाषा (definition of parishram)- कामयाब व्यक्ति के जीवन से हम परिश्रम के बारे में अधिक जान सकते है, उनके जीवन से हमें इसकी सही परिभाषा समझ आती है. तो चलिए हम आज आपको कुछ बातें बता रही है, जो मेहनती व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है, और सफलता का स्वाद चखता है. यही बातें/आदर्श हम अपने जीवन में उतार कर सफल हो सकते है.

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  • समय की बर्बादी न करें – कई लोग आलस का दामन थामे रहते है, वे लोग परिश्रम करने की जगह आराम से धीरे-धीरे काम करके जीवन बिताना चाहते है. परिश्रमी व्यक्ति कभी भी समय की बर्बादी में विश्वास नहीं रखता, वह निरंतर काम करते रहने में विश्वास रखता है. समय की बर्बादी आलसी, लोगों की निशानी है. कई बार ऐसा भी होता है कि परिश्रम करते रहने से भी मन मुताबित फल नहीं मिलता है, या फल मिलने में देरी होती है. लेकिन इस बात से हार मानकर नहीं बैठना चाहिए. परिश्रम व काम पर विश्वास से सही समय पर सही चीज मिल ही जाती है.
  • धन के पीछे न भागें – परिश्रम का ये मतलब नहीं है कि, पैसा कमाने की होड़ में लगे रहें. धन हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा है, लेकिन धन ही ज़िन्दगी नहीं होती है. धन के पीछे परिश्रम करने से दुनिया की सुख सुविधा तो मिलती है, लेकिन कई बार मन की शांति नहीं मिलती. परिश्रम का ये मतलब नहीं कि आप ज़िन्दगी जीना छोड़ दें, और पैसे कमाने में लग जाएँ. परिश्रम करते हुए, अपने लोगों को साथ लेकर जीवन में आगे बढ़े. ज़िन्दगी जीने का नाम है, यहाँ हर वक्त खुश, मौज मस्ती करते रहें|
  • इच्छा अनुसार ही काम चुने – कुछ लोग बेमन से काम करते है, जिससे वे अपना 100% उस काम में नहीं देते है. ऐसे लोग किसी और की इच्छा के अनुसार ये काम चुन लेते है, जिससे उन्हें एक दबाब महसूस होता है, और वे लोग काम में परिश्रम करने की जगह बस नाम के लिए ऐसे ही काम करते है. हमें अपनी इच्छा के अनुसार ही काम करना चाहिए, तभी उसे पुरे मन व लगन से कर पायेंगें. काम में मन लगेगा तभी हम खुद से परिश्रम करने की भी इच्छा रखेंगें.
  • असफलता से हार न माने – सफल व्यक्तियों के जीवन को देखें तो जानेगें, उन्हें पहली बार में ही सफलता नहीं मिली थी. निरंतर प्रयास से वे अपने मुकाम तक पहुंचे थे. उदाहरण के तौर पर अगर शाहरुख़ खान फिल्मों में आने से पहले ही ये सोच लेता कि उसे यहाँ काम मिलेगा ही नहीं तो वह आज इतना बड़ा स्टार न बनता. अगर धीरुभाई अम्बानी उस छोटी सी कुटिया में बस बैठे रहते, मेहनत न करते तो आज इतना बड़ा अम्बानी का कारोबार न होता. अगर अब्राहम लिंकन परिश्रम न करता, स्ट्रीट लाइट में बैठकर पढाई न करते तो वे अमेरिका के राष्ट्रपति कभी न बन पाते. नरेंद्र मोदी जी परिश्रम न करते तो आज चाय की ही दुकान में बैठे होते.

ये महान हस्तियाँ हमें यही सिखाती है कि हार कर घर नहीं बैठो, बल्कि उठो आगे बढ़ो, क्यूंकि हर सुबह उम्मीद की एक नयी किरण लाती है. हमें नया दिन मिला है, मतलब परमेश्वर के पास अभी भी हमारे लिए एक अच्छी योजना है, जो हमारे भलाई के लिए है, न कि हमें नष्ट करने के लिए. परिश्रम के बल पर दुनिया में हर चीज संभव है.

  • परिश्रम से एक न एक दिन सफलता जरुर मिलती है – आज हम अगर विज्ञान के इतने चमत्कार देख पा रहे है, तो ये मानव जाति के परिश्रम का ही फल है. विज्ञान की तरक्की की वजह से आज हम चाँद में अपना कदम रख चुके है, व मंगल गृह पर अपना घर बसाने वाले है. देश विदेश में तरक्की भी वहां रहने वाले नागरिकों की वजह से होती है. पूरी दुनिया में विकसित व विकासशील देश है. ये सब परिश्रमी व्यक्तियों की वजह से ही यहाँ तक पहुँच पायें है. अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों के साथ आज हमारे भारत का नाम भी लिया जाता है, जो जल्द ही विकसित देशों की लिस्ट में आने लगेगा. जापान में हुए परमाणु बम विस्फोट के बाद, कुछ साल पहले आये विशाल भूकंप के बाद उसके अपने आप को फिर खड़ा किया, ये सब परिश्रम की वजह से संभव हो सका है.

परिश्रम के फायदे/लाभ (Parishram benefits)–

  • आपको जीवन की सारी सुख सुविधा मिलेंगी, लक्ष्मी की प्राप्ति होगी. आज के समय में धन जिसके पास है, वो दुनिया की हर सुख सुविधा खरीद सकता है.
  • परिश्रम से मानसिक व शारीरिक चुस्ती मिलती है. आज के समय में परिश्रम नहीं करने पर बहुत सी बीमारियाँ शरीर में घर  कर लेती है. इसलिए फिर तंदरुस्ती, स्फूर्ति के लिए शारीरिक श्रम करने को बोला जाता है, जिस वजह से लोग फिर जिम में भी समय बिताने लगते है. मानसिक विकास के लिए उसका परिश्रम करते रहना बहुत जरुरी है, इसी के द्वारा लोगों ने नए नए अनुसन्धान दुनिया में किये है.
  • परिश्रम से हमारे जीवन में व्यस्ता रहती है, जिससे किसी भी तरह की नकारात्मक बातें हमारे जीवन में नहीं आ पाती, व इससे मन अंदर से शांति महसूस करता है.
  • परिश्रमी व्यक्ति हमेंशा सफलता की ओर अग्रसर रहता है, और समय समय पर उसे सफलता का स्वाद भी चखने को मिलता है.

आलसी व्यक्ति हमेंशा दुखी, परेशान होता है, वह अपने जीवन को कोसता ही रहता है. वह यहाँ वहां की शैतानी बातें सोचकर दुखी रहता है. वह अपने हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पसंद करता है, उसे लगता है, कोई और उसकी जगह मेहनत कर दे. लेकिन ये दुनिया का सबसे बढ़ा सच है कि अपना बोझ व्यक्ति को स्वयं उठाना पड़ता है, उसे अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद ही परिश्रम करना होगा, इसमें उसकी मदद कोई भी नहीं सकता. परिश्रमी के जीवन में प्रसन्नता, शांति, सफ़लता बनी रहती है.

परिश्रम का महत्व पर अनुच्छेद | Paragraph on Importance of Labor in Hindi!

परिश्रम मानव जीवन का वह हथियार है जिसके बल पर भारी से भारी संकटों पर भी जीत हासिल की जा सकती है । परिश्रम वह गुण है जिसे अपना लेने पर व्यक्ति के दु:ख मिट जाते हैं । परिश्रम सफलता का मूल मंत्र है । यह कभी भी बेकार नहीं जाता । संसार परिश्रमी व्यक्तियों का लोहा मानता है । परिश्रमी लोगों ने संसार में बड़े-बड़े कारनामे कर दिखाए हैं । वे बाधाओं से लड़ते हुए अपने जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति कर ही लेते हैं । किसान और मजदूर अनथक श्रम करते हुए संसार को भोजन , वस्त्र और आवास प्रदान करते हैं । व्यापारियों और पूंजीपतियों के श्रम से दश में रोजगार के नए-नए अवसर प्राप्त होते हैं । जिन लोगों ने परिश्रम को पूजा माना है संसार ने उनकी पूजा की है । जीवन की दौड़ में श्रम करनेवाला विजयी होता है लेकिन आलसी लोगों को हार का मुँह देखना पड़ता है । इसलिए हमें परिश्रमशील और कर्मठ बनना चाहिए । परिश्रम से भाग्य को भी बदला जा सकता है ।

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परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi

परिश्रम का महत्व पर निबंध। Parishram ka Mahatva Essay in Hindi
विश्व में कोई भी कार्य बिना परिश्रम के सफल या संपन्न नहीं हो सकता। वस्तुतः परिश्रम की सफलता की कुंजी है। जिस प्रकार सूरज अपने प्रकाश से अंधकार को दूर भगा दैता है ठीक उसी प्रकार परिश्रम से मानव-जीवन सुखमय हो जाता है और परिश्रमी व्यक्ति का भविष्य उच्चवल हो जाता है।
कठिन परिश्रम किए बिना किसी की उन्नति नहीं हो सकती और न किसी को सुख-समृद्धि ही प्राप्त हो सकती है। यदि सामने भजन हो तो भी उसे ग्रहण करने का परिश्रम किए बिना हम उसका स्वाद भला कैसे ले कतेहैं। परिश्रम के द्वारा कठिन से कठिन कार्य संपन्न करना संभव हो जाता है। सभ्यता के विकास की कथा का निचोड़ भी यही है कि आज की विकसित मानव-सभ्यता प्राचीन पूर्जों के परिश्रम का फल है। संसार के सब विकसित देशों की विकास-यात्रा उनके देशवासियों के कठिन परिश्रम से संपन्न हुई है। विश्व के सफलतम वय्कतियों की जीवन-कथा का यही संदेश है कि उन्होंने जीवन में हर चुनौती का डटकर सामना रतहुए अथक परिश्रम किया। आलस्य उनके पास भी नहीं फटकने पाता था। वे कभी किसी के भरोसे नहीं बैठे और अपने परिश्रम के द्वारा उन्होंने असंभव को भी संभव कर दिखाया।
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खम ठोक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाँव उखड़-राष्ट्रकवि की ये पंक्ति सचमुच यथार्थ का वर्णन करती है। श्रमशील मनुष्य के आगे पहाड़ भी नहीं ठहर पाते। कठिन से कठिन झंजावातों से गुजरता हुआ 8मशील मानव अपना रास्ता ढूँढं लेता है। जिस व्यक्ति में कुछ विशेष प्रतिभा नहीं होती है वह भी केवल धैर्यपूर्वक कठिन परश्रम करता हुआ अपने लश्र्य को पा लेता है।
परिश्रमी हमेसा जीवन-युद्ध में विजयी होता है। परिश्रमी विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं और इसी प्रकार कठिन परिश्रम तथा लगन से कार्य करने .वाला हर व्यक्ति चाहे वह मजदूर  हो नौकरी पेशा हो या व्यापारी ही क्यों नहीं हो अवस्य ही उद्देश्य में सफल होता है। संसार के और देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों की जीवन-कथा से ज्ञात होता है कि उनका औद्योगिक साम्राज्य खाक से लाख और फिर अरब और खरब में केवल उनके लगन और परिश्रम के चलते पहुँचा। अपने देश में टाटा बिड़ला या धीरूभाई अंबानी सब परिश्रम से ही बड़े बने।
सच्ची लगन और निरंतर परिश्रम से सफलता बी अवश्य मिलती है। भाग्य के भरोसे बैटने वाले जीवन की हर दौड़ में पिछड़ जाते हैं और परिश्रमी अपना जीवन धन्य करते तथा सफलता का आनंद प्राप्त करते हैं। काहिल का जीवन सुख-सुविधाओं के अभाव में ही बीत जाता है  और वे अपनी काहिली के चलते तरक्की का हर अवसर गँवा देते हैं।
वयक्ति अपनी सुविधा साम्रर्थ्य तथा रूचि के अनुसार साहित्य संगीत कला विज्ञान व्यवसाय आदि कोई भी क्षेत्र चुने परन्तु सफलता के लिए लगन और कठिन परिश्रम आवश्यक है। कहावत है कि मेहनत का फल मीठा होता है।आज सचिन हो चाहे सानिया मिर्जा या फिर राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ही क्यों न हों सबने अपना-अपना स्थान कटिन परिश्रम करके बनाया है।परिश्रम के महत्व पर जितना भी लिखा जाए थोड़ा ही होगा।
धरती सब कागद करौं लेखनि सब बनराई।
सात समद की मसि करौं हरिगुण लिखा न जाई।
स्वयं भगवान् कृष्ण ने गीता में कर्म का उपदेश दिया है। गंगावतरण की पौराणिक कथा के नायक भगीरथ के श्रम की तासीर ऐसी है कि कठिन परिश्रम से संपन्न हुए या होने वाले किसी महान् कार्य के लिए भगीरथ प्रयत्न शब्दों का विशेषण प्रयुक्त किया जाता है। हमें याद रखना चाहिए- श्रमएव जयते।

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समय के महत्व पर निबंध (Samay Ka Mahatva Essay In Hindi) :

भूमिका : मानव जीवन नदी की धारा के समान होता है। जिस तरह से नदी की धारा ऊँची नीची भूमि को पार करती हुई लगातार आगे बढती है उसी प्रकार जीवन की धारा सुख-दुःख रूपी जीवन के अनेक संघर्षों को सहते-भोगते आगे बढती रहती है। जीवन का उद्देश्य लगातार आगे बढना होता है इसी में सुख है , आनन्द है।

आगे बढने में जो मदद करता है वह समय कहलाता है। जो भागते हुए समय को पकडकर इसके साथ-साथ चल सकते हैं , जिस किसी ने भी समय के महत्व को पहचाना है और उसका सदुपयोग किया है , वह उन्नति की सीढियों पर चढ़ता चला गया है। लेकिन जिसने इसका तिरस्कार किया है समय ने उसे बर्बाद कर दिया है।

समय का सदुपयोग ही विकास और सफलता की कुंजी है। मानव जीवन में समय का बहुत महत्व होता है। जब समय के मूल्य को पहचान लिया जाता है तो वही समय का सदुपयोग होता है। बीता हुआ समय कभी भी वापस लौट कर नहीं आता है। समय किसी का भी दास नहीं होता है। समय किसी पर भी निर्भर नहीं होता है वह अपनी गति से चलता है। जो व्यक्ति समय के महत्व को नहीं समझ पाता है वह कभी भी अपने जीवन को सफल नहीं बना सकता है।

समय सिमित : भगवान ने प्रत्येक मनुष्य को एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित समय के साथ पृथ्वी पर भेजा है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में नपा-तुला समय होता है। जब हम ज्यादातर समय को बेकार के कामों में व्यतीत कर देते हैं तब हमें होश आता है। समय के महत्व पर एक कहावत भी कही गई है – अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

इसी वजह से हर बुद्धिमान व्यक्ति समय के महत्व को समझता है। हमारा जीवन समय से जुड़ा हुआ होता है। भगवान ने हमें जितना भी समय दिया है उसमे एक पल की भी वृद्धि होना असंभव है। जिस राष्ट्र के व्यक्ति समय के महत्व को समझ जाते हैं वही राष्ट्र समृद्ध हो सकता है। समय के सदुपयोग से ही मनुष्य निर्धन, अमीर , निर्बल , सबल , मुर्ख और विद्वान् बन सकता है।

समय अमूल्य वस्तु : समय एक अमूल्य वस्तु के साथ-साथ अमूल्य धन भी होता है। समय की कीमत धन से बहुत अधिक होती है इसीलिए समय अमूल्य होता है। धन आज है कल नष्ट हो जाएगा परसों वापस आ जाएगा लेकिन एक बार समय अतीत की गर्त में समा जाता है तो वह चाहकर भी वापस नहीं आता है।

हमारा कर्तव्य होता है कि हमें दिन में जो भी काम करना है उसे सुबह ही निश्चित कर लेना चाहिए। दिन में उस काम को करके समाप्त कर देना चाहिए। विद्यालय से जो भी समय बचता है उसका प्रयोग अन्य कलाओं को सीखने में करना चाहिए। बेकार की बातों में समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए लेकिन जीवन में थोडा मनोरंजन भी होना चाहिए। आज के काम को कभी भी कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।

मनुष्य के जीवन का हर पल उसकी दुर्लभ संपत्ति होती है क्योंकि अगर धन-दौलत न रहे तो उसे दुबारा परिश्रम करके प्राप्त किया जा सकता है लेकिन समय वह संपत्ति होती है जो एक बार चले जाने से दुबारा नहीं आता है। इसी वजह से समय का सदुपयोग मनुष्य के लिए बहुत जरूरी होता है।

जब सही समय पर सही काम किया जाता है तभी समय का सदुपयोग होता है। समय बहुत बलवान होता है यह किसी के लिए नहीं रुकता और न ही किसी का इंतजार करता है यह लगातार चलता ही रहता है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कोई-न-कोई लक्ष्य होता है जीवन में लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें समय के महत्व को जानना होगा।

जो मनुष्य आज के काम को कल पर छोड़ देता है वह कभी भी सफल नहीं हो पाता है। लेकिन जो मनुष्य आज के काम को आज ही समाप्त कर देता है वह मनुष्य जीवन में हमेशा सफलता प्राप्त करता है। भाग्य भी ऐसे मनुष्यों का साथ देता है वे अपने जीवन में उच्च से उच्चतर लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं।

समय का महत्व : समय के सदुपयोग का बहुत महत्व होता है। अगर समय पर काम नहीं होता है तो समय का सदुपयोग नहीं हो पाता है जिससे जीवन अभिशाप बन जाता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति करने की इच्छा रखता है। वह हमेशा अपने जीवन में धनवान , बलवान और विद्वान् बनना चाहता है। जब मनुष्य ऐसी इच्छा रखता है तो उस के समय के महत्व को समझना बहुत जरूरी होता है।

जिस किसी ने भी समय के सदुपयोग को समझा है वह उन्नति के शिखर पर पहुंच चूका है। बहुत से महान पुरुषों ने भी समय के महत्व को समझकर ही सफलता प्राप्त की थी। जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है समय भी उसका सम्मान करता है। जो समय को बर्बाद करता है समय उसे बर्बाद कर देता है।

गाँधी जी ने भी बहुत ही सावधनी और बुद्धिमानी से समय का सदुपयोग किया था इसी वजह से वे महान पुरुष बने थे। महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन अपने बचपन में सब्जी बेचकर पैसे कमाते थे। उनके अध्यापक उन्हें बहुत बुद्धिमान समझते थे। वे जीवन में कठोर से कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए डटे रहते थे। उन्होंने समय के महत्व को समझ लिया था इसलिए समय को व्यर्थ नहीं गंवाते थे।

वे लगातार परिश्रम करते रहे जिसकी वजह से आज वे एक महान वैज्ञानिक बन गए। उन्होंने रेडियम की खोज करके पूरे जगत को रोशन किया है। प्रत्येक मनुष्य को समय के सही मूल्य को पहचानना चाहिए समय निकलने पर काम करने वालों को अक्सर पछताना ही पड़ता है।

एक-एक बूंद के एकत्रित रूप विशाल सागर को देखा जा सकता है और जब एक-एक बूंद टपकती है तो बड़े-से-बड़ा बर्तन भी खली हो जाती है। कुछ इसी तरह से जीवन भी पल और क्षण के मिलने से बना होता है। जितने भी पल और क्षण बीत जाते हैं वे कभी वापस लौटकर नहीं आते हैं।

समय बीतते हुए अनुमान नहीं होता है लेकिन इन क्षणों के बीतने से दिन , सप्ताह , मास और साल बीतते जाते हैं। समय के बीतने के साथ ही जीवन के दिन भी बीत जाते हैं। जो लोग समय की गति को नहीं जानते और इसके महत्व को नहीं समझते हैं , समय को नष्ट करते हैं समय भी ऐसे लोगों को नष्ट कर देता है।

सुखों की प्राप्ति : जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है केवल वही सभी सुखों को प्राप्त कर पाता है। जो व्यक्ति अपने काम को समय पर कर लेता है उसे कोई भी व्यग्रता नहीं होती है। जो व्यक्ति अपने काम को समय पर करता है वह केवल अपना ही भला नहीं करता है बल्कि अपने परिवार गाँव , और राष्ट्र की उन्नति का कारण भी बनता है।

जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है वह धनवान , बुद्धिमान और बलवान बन सकता है। माता लक्ष्मी भी उसकी सखी भी बन सकती हैं। ऐसे व्यक्ति की सन्तान कभी भी पैसे की वजह से दुखी नहीं होती है। अगर हम बहुत ही ध्यानपूर्वक देखते हैं तो हमें पता चलता है कि आज तक जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं वे सभी समय के सदुपयोग को जानते थे इसी वजह से महान कहलाए थे।

कार्य की सफलता : समय का हर पल , हर क्षण और हर साँस ही जीवन होता है। जो अपने जीवन के एक-एक पल का सदुपयोग करता है उसका जीवन सफल हो जाता है लेकिन जो एक पल भी व्यर्थ कर देता है उसका जीवन निरर्थक बन जाता है। कार्य की सफलता कार्य की कुशलता से अधिक कार्य की तत्परता पर निर्भर करती है। समय ही सत्य होता है।

समय का सदुपयोग ही सफलता और समृद्धि के प्रतीक और परिचायक होते हैं। समय का सदुपयोग करने के लिए मनुष्य को नियमित जीवन जीना चाहिए। हमारे देश में समय का बहुत अधिक दुरूपयोग होता है। बेकार की बातों में समय को बेकार किया जाता है। समय का सबसे अधिक दुरूपयोग मनोरंजन के नाम पर किया जाता है। समय को खोकर कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता है।

आलस्य का त्याग : जब समय बीत जाता है तब हमें समय के महत्व का एहसास होता है। जब समय का दुरूपयोग किया जाता है तब दुःख और दरिद्रता के अलावा कुछ प्राप्त नहीं होता है। समय का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य होता है। आलस्य जीवन का एक कीड़ा होता है। अगर वह जीवन में लग जाता है तो जीवन नष्ट हो जाता है। जब लखपति समय से चूक जाता है तो वह भी निर्धन हो जाता है।

अगर हमें स्टेशन पहुंचने में 5 मिनट देरी हो जाती है तो ट्रेन हाथ से छूट जाती है। अगर छात्र को परीक्षा के लिए देरी हो जाती है तो उसकी परीक्षा छूट जाती है। आज के समय में बहुत से युवक अवकाश के दिनों में व्यर्थ घर में बैठे रहते हैं अथवा बुरी संगती में पड़कर समय को बर्बाद करते रहते हैं। समय का दुरूपयोग एक पाप के समान होता है और जो भी इस पाप के कीच में गिर जाता है उसका कभी भी उद्धार नहीं हो सकता है। हमें सदैव समय के दुरूपयोग से बचना चाहिए।

छात्रवास में समय का महत्व : छात्रवास में समय का बहुत अधिक महत्व होता है। किसान अपने खेत में अलग-अलग ऋतुओं में अलग-अलग प्रकार की फसल उगाता है। अगर बीज बोने का निश्चित समय किसी प्रकार से बीत जाता है तो वह फसल पैदा नहीं हो सकती है। ठीक यही दशा छात्रों के जीवन की भी होती है। विद्यार्थी जीवन वह समय होता है जब मनुष्य सारे जीवन भर के लिए तैयार होता है।

इसीलिए इस अवस्था में उसे समय के महत्व को जानना और उसका उपयोग करना उसके लिए बहुत आवश्यक होता है। छात्र की जीवन रूपी भवन की नींव भी इसी समय पर बनती है। जिस तरह से एक बहुत बड़ी पुस्तक को लिखने के लिए एक-एक अक्षर लिखना पड़ता है और तब एक पुस्तक लिखी जाती है इसी तरह विद्यार्थियों को एक-एक सैकेंड का उपयोग करके इतनी बड़ी किताबों को पढना पड़ता है केवल तभी वह उसके ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

जो छात्र अपनी रोज की पढाई को पूरा नहीं कर पाता है उस छात्र को परीक्षा के समय में अपनी पढाई एक विशाल पहाड़ की तरह लगती है। जब परीक्षा की तैयारी पूरी नहीं होती है तो वे गलत तरीकों से परीक्षा को उत्तीर्ण करने की कोशिश करते हैं। इन गलत तरीकों से उन्हें असफलता मिलती है और इन कामों से उनका समाज में सिर नीचा हो जाता है।

उन्हें बाद में बहुत पछतावा होता है लेकिन बाद में पछताने से कोई फायदा नहीं होता है। समय का सदुपयोग करने वाला छात्र अपने जीवन में एक सफल नागरिक बन जाता है लेकिन जो विद्यार्थी समय को बातों में या इधर-उधर घूमने-फिरने में व्यर्थ करता है , वह अंत में रोता है पछताता है लेकिन वह चाहकर भी उस समय को वापस नहीं ला सकता है। भगवान एक बार में केवल एक ही पल देते हैं तथा दुसरे पल से पूर्व पहले पल को छीन लेते हैं।

उपसंहार : अगर हम समय के महत्व को समझकर समय का सदुपयोग करते हैं तो सफलता हमसे कभी भी दूर नहीं होती है। हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपने बचे हुए समय का सदुपयोग करें और अपने राष्ट्र के भविष्य को उन्नति की ओर ले जाएँ। हमे हमेशा अपने काम को निश्चित रूप से समय पर ही पूरा करना चाहिए।

हम सभी भारत देश के निर्माता हैं। हमें हमेशा अपने देश की उन्नति के लिए अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए। अगर हम काम को निश्चित समय पर पूरा करते हैं तो इससे समय भी बच जाता है जिसका प्रयोग हम समाज के कल्याण के लिए भी कर सकते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि कभी भी समय व्यर्थ न हो सके। समय का पूरा उपयोग करना चाहिए और समय के महत्व को समझाना चाहिए।

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय कीमती है और हर किसी के लिए अमूल्य है, इसलिए हमें कभी समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमें सकारात्मक ढंग से सही तरीके से समय का उपयोग करना चाहिए। हमें अपने बच्चों को बचपन से ही समय के महत्व या मूल्य के बारे में बताना चाहिए। आप बच्चों को समय की महत्ता या समय का मूल्य समझाने के लिए इस तरह के साधारण और सरल भाषा में लिखे गए समय के मूल्य पर निबंध या समय के महत्व पर निबंध का प्रयोग कर सकते हैं। हम स्कूल के विद्यार्थियों के प्रयोग के लिए भी बहुत से समय के मूल्य पर निबंध या समय के महत्व पर निबंध उपलब्ध करा रहे हैं।

समय के मूल्य पर निबंध या समय के महत्व पर निबंध (वैल्यू ऑफ़ टाइम एस्से)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

Get here some essays on Value of Time in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

समय के महत्व पर निबंध 1 (100 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय धन से भी ज्यादा कीमती है; क्योंकि यदि धन को खर्च कर दिया जाए तो यह वापस प्राप्त किया जा सकता है हालांकि, यदि हम एक बार समय को गंवा देते हैं, तो इसे वापस प्राप्त नहीं कर सकते हैं। समय के बारे में एक सामान्य कहावत है कि, “समय और ज्वार-भाटा कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते हैं।” यह बिल्कुल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व की तरह ही सत्य है, अर्थात्, जिस तरह से पृथ्वी पर जीवन का होना सत्य है, ठीक उसी तरह से यह कहावत भी बिल्कुल सत्य है। समय बिना किसी रुकावट के निरंतर चलता रहता है। यह कभी किसी की प्रतिक्षा नहीं करता है।

इसलिए, हमें जीवन के किसी भी दौर में कभी भी अपने कीमती समय को बिना किसी उद्देश्य और अर्थ के व्यर्थ नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा समय के अर्थ को समझना चाहिए और उसी के अनुसार, इसे सकारात्मक ढंग से कुछ उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। हमें इससे निरंतर कुछ ना कुछ सीखते रहना चाहिए यदि यह बिना किसी रुकावट के चलता रहता है, तो फिर हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते।

समय के महत्व

समय के महत्व पर निबंध 2 (150 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय हम सभी के लिए अमूल्य है। हमें समय की प्रत्येक छोटी सैकेंड का मूल्य समझने के साथ ही इसके महत्व का सम्मान करना चाहिए। हमें जीवन के अन्त तक समय के एक पल को भी बर्बाद नहीं करना चाहिए। समय इस संसार में सभी से बहुत ही ताकतवर और शक्तिशाली है। यह एक आलसी व्यक्ति को नष्ट कर सकने के साथ ही कठिन परिश्रम करने वाले व्यक्ति को ताकत देता है। यह किसी को भी बहुत सी खुशियाँ, आनंद और समृद्धि देता है हालांकि, यह किसी का सबकुछ छीन भी सकता है।

हमें हर पल समय से नियमितता, निरंतरता और प्रतिबद्धता सीखनी चाहिए। यह बिना किसी अवरोध के निरंतर चलता रहता है। हमें भी जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त करने के लिए समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बारे में सही कहा जाता है कि, “यदि हम समय को बर्बाद करेंगे तो समय हमें और हमारे जीवन को बर्बाद कर देगा।” हमें समय के मूल्य को समझना चाहिए और इसके साथ चलना चाहिए, क्योंकि समय किसी के लिए नहीं रुकता है।

समय के महत्व पर निबंध 3 (200 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय सभी के लिए अनमोल है; समय सभी के लिए निःशुल्क है हालांकि, कोई भी इसे न तो खरीद सकता है और न ही बेच सकता है। कोई या तो समय को बर्बाद कर सकता या फिर इसका सदुपयोग कर सकता है हालांकि, यह सत्य है कि, जो समय को बर्बाद करता है, उसे निश्चित ही समय के द्वारा नष्ट कर दिया जाता है और जो इसका सदुपयोग करता है, निश्चित ही वह समय के द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति समय को खो देता है, वह उसे कभी वापस प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि हम समय पर भोजन नहीं करेंगे या समय पर अपनी दवाईयाँ नहीं लेगें, तो समय हमारे स्वास्थ्य को नष्ट कर सकता है। समय बहती हुई नदी की तरह होता है, जो लगातार आगे बढ़ता है और कभी वापस नहीं आता।

हमें समय के अनुसार समयनिष्ठ रहना चाहिए और सभी कामों को समय के साथ करना चाहिए। हमें सही समय पर उठना, सुबह पानी पीना, तरोताजा होना, ब्रश करना, नहाना, सुबह का नाश्ता करना, स्कूल जाने के लिए तैयार होना, कक्षा का कार्य करना, दोपहर का खाना, घर आना, गृह कार्य करना, रात को पढ़ना, रात का खाना खाकर सही समय पर सोना चाहिए। यदि हम अपनी दैनिक दिनचर्या को सही समय पर नहीं करेंगे, तो हम जीवन में दूसरे लोगों से पीछे रह जाएगें। यदि हम जीवन में कुछ बेहतर करना चाहते हैं, तो इसके लिए उचित प्रतिबद्धता, लगन और समय के पूरे उपयोग की आवश्यकता है।


 

समय के महत्व पर निबंध 4 (250 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय पृथ्वी पर सबसे कीमती वस्तु है, इसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। यदि एकबार यह चला जाए, तो कभी वापस नहीं आता। यह हमेशा आगे की ओर सीधी दिशा में चलता है और न कि पीछे की ओर। इस संसार में सब कुछ समय पर निर्भर करता है, समय से पहले कुछ भी नहीं होता है। कुछ भी करने के लिए कुछ समय की आवश्यकता होती है। यदि हमारे पास समय नहीं है, तो हमारे पास कुछ भी नहीं है। समय को नष्ट करना इस पृथ्वी पर सबसे बुरी चीज मानी जाती है क्योंकि, समय की बर्बादी हमें और हमारे भविष्य को बर्बाद करती है। हम कभी भी बर्बाद किए हुए समय को फिर से प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यदि हम अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, तो हम सब कुछ नष्ट कर रहे हैं।

कुछ लोग समय से ज्यादा अपने धन को महत्व देते हैं हालांकि, सत्य तो यही है कि समय से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं है। यह समय ही है, जो हमें धन, समृद्धि और खुशी प्रदान करता है हालांकि, इस संसार में कुछ भी समय को नहीं दे सकता। समय का केवल उपयोग किया जा सकता है; कोई भी समय को खरीद या बेच नहीं सकता। बहुत से लोग अपना जीवन अर्थहीन ढंग से जी रहे हैं। वे समय का उपयोग केवल अपने दोस्तों के साथ खाने, खेलने या अन्य आलसी क्रियाओं को करने में करते हैं। इस तरह से वे दिन और वर्षों को व्यतीत करते हैं। वे कभी भी नहीं सोचते कि, वे क्या कर रहे हैं, किस तरीके से कर रहें हैं, आदि। यहाँ तक कि, उन्हें गलत तरीके से समय को बर्बाद करने का भी पश्चाताप भी नहीं होता और कभी उसके लिए अफसोस महसूस नहीं करते हैं। अप्रत्यक्ष रुप से, वे अपना बहुत सा धन और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण समय खो देते हैं, जिसे वे कभी भी वापस प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

हमें दूसरों की गलतियों से सीखने के साथ ही दूसरों की सफलता से प्रेरित होना चाहिए। हमें अपने समय का उपयोग कुछ उपयोगी कामों को करने में करना चाहिए ताकि, हमें समय समृद्धि दे, न कि नष्ट करे।

समय के महत्व पर निबंध 5 (300 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

एक आम और सही कहावत है कि, “समय और ज्वार-भाटा किसी का इंतजार नहीं करते हैं”, जिसका अर्थ है कि, समय किसी का भी इंतजार नहीं करता है, सभी को समय के साथ-साथ चलना चाहिए। समय आता है और हमेशा की तरह चला जाता है पर कभी भी रुकता नहीं है। समय सभी के लिए निःशुल्क होता है, लेकिन कोई भी इसे कभी भी न तो बेच सकता है, न ही खरीद सकता है। यह अबंधनीय है, अर्थात् कोई भी इसकी सीमा निर्धारित नहीं कर सकता है। यह समय ही है, जो सभी को अपने चारों ओर नचाता है। अपने जीवन में कोई भी न तो इसे हरा सकता है, और न ही इससे जीत सकता है। समय को इस संसार में सबसे ताकतवर वस्तु कहा जाता है, जो किसी को भी नष्ट या सुधार सकता है।

समय बहुत ही शक्तिशाली होता है; कोई भी इसके सामने घुटने टेक सकता है, लेकिन इसे हरा नहीं सकता। हम इसकी क्षमता को मापने में सक्षम नहीं है, क्योंकि कभी-कभी जीतने के लिए एक पल ही काफी होता है और कभी-कभी जीतने के लिए पूरा जीवन लग जाता है। कोई भी एक पल में अमीर हो सकता है और कोई भी एक ही पल में गरीब भी हो सकता है। जीवन और मृत्यु के बीच में अन्तर के लिए केवल एक ही पल काफी होता है। सभी पल हमारे लिए स्वर्णावसर लाते हैं, हमें तो केवल समय के संकेत को समझ कर उसका प्रयोग करने की आवश्यकता है।

हर पल जीवन में नए अवसरों का एक बड़ा भंडार है। इसलिए, हमें इस कीमती समय को जाने नहीं देना चाहिए और हमेशा इसका पूरा उपयोग करना चाहिए। यदि हम समय के मूल्य और संकेत को समझने में देर करते हैं, तो हम अपने जीवन से स्वर्णावसर और सबसे महत्वपूर्ण समय को खो देंगे। यह जीवन का सबसे आधारपूर्ण सत्य है कि, हमें कभी भी अपने स्वर्ण अवसर को अनावश्यक समझते हुए अपने से दूर जाने नहीं देना चाहिए। हमें सकारात्मक और लाभकारी रुप में समय का प्रयोग करते हुए, अपने गन्तव्य तक जाना चाहिए। समय का सदुपयोग करने के उद्देश्य से सभी कामों को सही समय पर करने के लिए समय-सारणी बनानी चाहिए।


 

समय के महत्व पर निबंध 6 (400 शब्द)

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय इस संसार में जीवन में अन्य सभी वस्तुओं यहाँ तक कि, धन से भी अधिक शक्तिशाली और अमूल्य वस्तु है। यदि एकबार कीमती समय चला जाता है, तो यह हमेशा के लिए चला जाता है और लौटकर कभी भी वापस नहीं आता है; क्योंकि यह हमेशा आगे की ओर चलता है और न कि पीछे की दिशा में। यह बिल्कुल सत्य है कि, यदि कोई व्यक्ति समय की अहमियत को नहीं समझता, तो समय भी उस व्यक्ति की अहमियत को नहीं समझता है। यदि हम अपने समय को नष्ट करेंगे, समय भी हमें बहुत बुरी तरह से नष्ट करेगा। यह सत्य है कि, “समय कभी भी किसी की प्रतिक्षा नहीं करता।” एक समय पर, समय केवल एक ही मौका देता है, यदि हम इसे एकबार खो देते हैं, तो इसे कभी भी वापस नहीं पा सकते हैं।

यह बहुत ही आश्चर्यजनक वस्तु है, जिसकी न तो कोई शुरुआत है, न ही कोई अन्त। यह बहुत ही शक्तिशाली वस्तु है, जिसके साथ वस्तुएं जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, घटती हैं और नष्ट हो जाती हैं। इसकी कोई भी सीमा नहीं है, इसलिए यह अपनी ही गति से निरंतर चलता रहता है। हम में से कोई भी जीवन के किसी भी स्तर पर समय पर शासन नहीं कर सकता है। न तो इसकी आलोचना कर सकते हैं और न ही इसका विश्लेषण कर सकते हैं। आमतौर पर, सभी समय के मूल्य और महत्व के बारे में जागरुक होते हैं हालांकि, हम में से बहुत से लोग जीवन के बुरे दौर में अपना धैर्य खो देते हैं और समय नष्ट करना शुरु कर देते हैं। समय किसी के लिए भी नहीं रुकता और न ही किसी के लिए दयालुता दिखाता है।

यह कहा जाता है कि, समय ही धन है हालांकि, इससे हम धन की तुलना समय से नहीं कर सकते हैं क्योंकि, यदि हम धन को एकबार खो देते हैं, तो इसे किसी भी साधन के द्वारा दुबारा प्राप्त कर सकते हैं हालांकि, यदि हमने समय को एक बार खो दिया, तो इसे किसी भी साधन के द्वारा दुबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। समय धन और ब्रह्माण्ड की अन्य सभी वस्तुओं से ज्यादा कीमती है। हमेशा बदलता हुआ समय, प्रकृति की अनूठी संपत्ति को दिखाता है कि, “बदलाव प्रकृति का नियम है।” इस संसार में सबकुछ समय के अनुसार चलता है। इस संसार में सबकुछ समय के अनुसार बदलता है क्योंकि, समय से कुछ भी स्वतंत्र नहीं है। लोग सोचते हैं कि, जीवन कितना लम्बा है हालांकि, सत्य तो यह है कि, जीवन बहुत ही छोटा है और हमारे पास जीवन में करने के लिए बहुत सी चीजें हैं। हमें अपने जीवन का हरेक पल सही तरीके से और अर्थपूर्ण ढंग से, समय को नष्ट किए बिना उपयोग करना चाहिए।

हमारी दैनिक दिनचर्या; जैसे- स्कूल का कार्य, गृह कार्य, सोने के घंटे, जागने का समय, व्ययाम, भोजन करना आदि योजना अनुसार और समय के अनुसार आयोजित होनी चाहिए। हमें कठिन परिश्रम करने का आनंद लेना चाहिए और कभी भी अपनी अच्छी आदतों को बाद में करने के लिए टालना नहीं चाहिए। हमें समय के महत्व को समझना चाहिए और इसी के अनुसार रचनात्मक ढंग से प्रयोग करना चाहिए, ताकि हम समय से धन्य हो न कि नष्ट हो।

समय के महत्व पर निबंध-Value Of Time Essay In Hindi

समय का महत्व पर निबंध। Samay ka Mahatva par Nibandh

समय समर्थ है समय सर्वशक्तिमान है अतः शायद समय ही ईश्वर है और अगर नहीं है तो फिर ईश्वर से कुछ कम भी नहीं है। समय राजा को रंक और फकीर को सम्राट बना देता है समय गतिशील है और निरंतर बीत रहा है। गुजरा हुआ वक्त यानी समय फिर कभी नहीं लौटता। अतः जो समय की उपेक्षा करते हैं वे कदापि सफल नहीं हो सकते समय उन्हें ठुकराकर आगे बढ़ जाता है। सुख और दुःख भी समय के साथ आते-जाते हैं।

जो समय का मूल्य समझकर उसका सम्मान करते हैं समय उनका मित्र बन जाता है। एक-एक भी क्षण कीमती है और समय नष्ट करना स्वयं की बरबादी को न्योता देने के समान है। उन्नति के इच्छुक कभी अपना समय व्यर्थ नहीं जाने देते अपितु वे एक-एक क्षण का सदुपयोग करते हैं। व्यर्थ के झगड़ो में कीमती वक्त बरबाद करने से बढ़कर मूर्खता कोई और नहीं है सीलिए किसी कवि ने कहा है-

तूने रात गँवाई सोय के दिवस गँवाया खाय के।

हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदला जाय रे।

हमें अपना हर कार्य करने के लिए एक सुनिश्चित कार्यक्रम बना लेना चाहिए और फिर उसी के अनुरूप अपने कार्यों को संपन्न करने की कोशिश करनी चाहिए। कुछ लोग कभी भी अपना काम समय पर पूरा नहीं कर पाते हर वक्त वे समय की कमी का रोना रोते रहते हैं। यदि ऐसे लोगों की दिनचर्या पर ध्यान दिया जाए तो पता चलेगा कि वे अपना अधिकांश समय यूँ ही गप्पें हाँकने में बरबाद कर देते हैं। ऐसे लोग हमेशा लेट-लतीफ होते हैं। ये कभी भी अपने दफ्तर में समय से नहीं पहुँचते और हाँफते-काँपते दौड़ते-भागते इनके सबकाम हुआ करते हैं। इन्हें यात्रा पर जाना हो तो तैयारी में ही इतनी देर हो जाती है कि लगता है कि ट्रेन छूटकर ही रहेगी। कहीं किसी के घर किन्हीं से मिलना होतो ऐसे लोग देर से पहुँचकर दूसरों से नाहक प्रतीक्षा करवाते और उनका भी समय बरबाद करते हैं। ये यदि किसी को अपने यहाँ आमंत्रित करते हैं तो अतिथि के पहुँचने पर स्वयं नदारद होते हैं और बेचारे आगंतुक को मेजबान के आने का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे लोग अपना आदर सम्मान गँवाकर समाज में अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य होते हैं। प्रकृति स्वयं समयबद्ध है। सूर्योदय और सूर्यास्त तक का समय निश्चित है। ऋतु-चक्र भी निश्चित है। उपग्रहों और ग्रहों की चाल और सीमाएँ तय हैं। संसार के किसी भी महापुरूष की जीवनी का अध्ययन करें तो हम पाएँगे कि उन्होंने हमेशा समय का सदुपयोग किया। विश्व के महानतम वैज्ञानिकों कलाकारो और साहित्यकारों की सफलता का रहस्य यही था कि समय के हर पल का उन्होंने सदुपयोग किया।

हमें समय का सम्मान करना चाहिए। जो समय पर चुक जाते हैं वह बाद में हाथ मल-मलकर पछताने के सिवा और कुछ नहीं कर पाते। फिर पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत जैसी कहावते तथा गोस्वामी तुलसीदासकी पंक्ति का वर्षा जब कृषि सुखानी समय चूकि पुनि का पछतानी हमें चेतावनी देती-सी लगती है कि समय का सचेष्ट रहकर सदुपयोग करें।

समय पर सोना समय पर जागना समय पर अध्ययन करना और समय पर खेलना यानी नियमत दिचर्या का पालन करना जीवन में सफलता के लिए आवश्यक है। आज का काम कल पर टालने वाले जीवन में असफल हो जाते हैं क्योंकि कल कभी नहीं आता।

काल करै से आज कर आज करै सो अब।

पल में प्रलय होएगी हुरी करैगा कब।।

कुछ छात्र आवारगी और बदमाशियों में वक्त गुजारते एवं अश्लील पुस्तकों में ध्यान लगाते हैं तथा समय बीत जाने पर परीक्षा के भूत से डरे-घबराए फिरते हैं। कुछ तो ऐसे आलसी होते हैं कि उनके लिए नहाना-धोना सोना-जागना या खाना-पीना कुछ भी समय पर करना कठिन होता है। ऐसे लोगों में किस्म-किस्म की बीमारियाँ घर कर लेती हैं और उनका जीवन नर्क बन जाता है।
समय का सदुपयोग पर निबंध भी देखें।
कुछ लोग अति उत्साही होते है और एक ही साथ कई कामों को करने की जिम्मेदारी उठा लेते हैं। नतीजा ये होता है कि उनका कोई काम नहीं सधता और वे अपमानित होते हैं। सफलता के लिए जरूरी है कि आप एक बार में एक ही काम हाथ में लें और उसे पूरे मनोयोग से पूरा करने की कोशिश करें। इस प्रकार एक-एक करके एक ही व्यक्ति कई सारे कामों को करने में सफल हो जाता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन में असफलता पास नहीं फटकती।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कामचोर कहा जा सकता है। ऐसे लोग काम से जी चुराते हैं। और यदि काम सिर पर आ जाए तो उससे कन्नी कटाना चाहते हैं। काम से बचने के लिए वे बहाने ढूँढते रहतेहैं। सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों में भी ऐसे बहुत –से कर्मचारी है। इनके टाल-मटोल के कारण फाईलों का ढेर बढ़ता चला जाता है। फलस्वरूप महत्वपूर्ण निर्णय समय पर नहीं लिए जा पाते हैं। इससे देश का नुकसान होता है सरकार की किरकिरी होती है और आम जनता परेशान होती है।

 

कार्य में सन्नद्ध होकर हम अपना भी भला कर सकते हैं और देश का भी। देश की युवाशक्ति निरर्थक आंदोलनों के जरिए धरना प्रदर्शन जुलूस और रैलियों का आयोजन करने में अपना समय व्यर्थ करती रहती है। तोड़-पोड़ और आगजनी के द्वारा राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान तो अब आम बात बनकर रह गई है। यदि यही शक्ति रचनात्मक कार्यों में लग जाए तो देशकी काया पलट जाए और हर ओर खुशहाली का साम्राज्य छा-जाएय़ यही प्रगति का मंत्र है। यदि देशका हर नगरिक कर्मठ हो और समय का सदुपयोग करे तो भारत को विकसित होने में अधिक समय नहीं लगेगा।

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परोपकार पर निबंध-Essay On Paropkar In Hindi

परोपकार पर निबंध (Essay On Paropkar In Hindi) :

भूमिका : मानव जीवन में परोपकार का बहुत महत्व होता है। समाज में परोपकार से बद कोई धर्म नहीं होता है। ईश्वर ने प्रकृति की रचना इस तरह से की है कि आज तक परोपकार उसके मूल में ही काम कर रहा है। प्रोकर प्रकृति के कण-कण में समाया हुआ है। जिस तरह से वृक्ष कभी भी अपना फल नहीं खाती है , नदी अपना पानी नहीं पीती है , सूर्य हमें रोशनी देकर चला जाता है।

इसी तरह से प्रकृति अपना सर्वस्व हमको दे देती है। वह हमें इतना कुछ देती है लेकिन बदले में हमसे कुछ भी नहीं लेती है। किसी भी व्यक्ति की पहचान परोपकार से की जाती है। जो व्यक्ति परोपकार के लिए अपना सब कुछ त्याग देता है वह अच्छा व्यक्ति होता है। जिस समाज में दूसरों की सहायता करने की भावना जितनी अधिक होगी वह समाज उतना ही सुखी और समृद्ध होगा। परोपकार की भावना मनुष्य का एक स्वाभाविक गुण होता है।

परोपकार का अर्थ : परोपकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – पर+उपकार। परोपकार का अर्थ होता है दूसरों का अच्छा करना। परोपकार का अर्थ होता है दूसरों की सहयता करना। जब मनुष्य खुद की या ‘स्व’ की संकुचित सीमा से निकलकर दूसरों की या ‘ पर’ के लिए अपने सर्वस्व का बलिदान दे देता है उसे ही परोपकार कहा जाता है। परोपकार की भावना ही मनुष्यों को पशुओं से अलग करती है नहीं तो भोजन और नींद तो पशुओं में भी मनुष्य की तरह पाए जाते हैं।

दूसरों का हित्त चाहते हुए तो ऋषि दधिची ने अपनी अस्थियाँ भी दान में दे दी थीं। एक कबूतर के लिए महाराज शिवी ने अपने हाथ तक का बलिदान दे दिया था। गुरु गोबिंद सिंह जी धर्म की रक्षा करने के लिए खुद और ब्छोंके साथ बलिदान हो गये थे। ऐसे अनेक महान पुरुष हैं जिन्होंने लोक-कल्याण के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया था ।

मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म : मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म परोपकार होता है। मनुष्य के पास विकसित दिमाग के साथ-साथ संवेदनशील ह्रदय भी होता है। मनुष्य दूसरों के दुःख को देखकर दुखी हो जाता है और उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो जाती है। वह दूसरों के दुखों को दूर करने की कोशिश करता है तब वह परोपकारी कहलाता है।

परोपकार का संबंध सीधा दया , करुणा और संवेदना से होता है। हर परोपकारी व्यक्ति करुणा से पिघलने की वजह से हर दुखी व्यक्ति की मदद करता है। परोपकार के जैसा न ही तो कोई धर्म है और न ही कोई पुण्य। जो व्यक्ति दूसरों को सुख देकर खुद दुखों को सहता है वास्तव में वही मनुष्य होता है। परोपकार को समाज में अधिक महत्व इसलिए दिया जाता है क्योंकि इससे मनुष्य की पहचान होती है।

मानव का कर्मक्षेत्र : परोपकार और दूसरों के लिए सहानुभूति से ही समाज की स्थापना हुई है। परोपकार और दूसरों के लिए सहानुभूति से समाज के नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठा होती है। जहाँ पर दूसरों के लिए किये गये काम से अपना स्वार्थ पूर्ण होता है वहीं पर समाज में भी प्रधानता मिलती है।

मरनेवाले मनुष्य के लिए यही समाज उसका कर्मक्षेत्र होता है। इसी समाज में रहकर मनुष्य अपने कर्म से आने वाले अगले जीवन की पृष्ठ भूमि को तैयार करता है। संसार में 84 लाख योनियाँ होती है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार ही इनमे से किसी एक योनी को अपने अगले जन्म के लिए इसी समाज में स्थापित करता है। भारतीय धर्म साधना में जो अमरत्व का सिद्धांत होता है उसे अपने कर्मों से प्रमाणित करता है।

लाखों-करोड़ों लोगों के मरणोपरांत सिर्फ वहीं मनुष्य समाज में अपने नाम को स्थायी बना पाता है जो इस जीवन काल को दूसरों के लिए अर्पित कर चुका होता है। इससे अपना भी भला होता है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करते हैं वक्त आने पर वे लोग उनका साथ देते हैं। जब आप दूसरों के लिए कोई कार्य करते हैं तो आपका चरित्र महान बन जाता है।

परोपकार से अलौकिक आनन्द और सुख का आधार : परोपकार में स्वार्थ की भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता है | परोपकार करने से मन और आत्मा को बहुत शांति मिलती है। परोपकार से भाईचारे की भावना और विश्व-बंधुत्व की भावना भी बढती है।

मनुष्य को जो सुख का अनुभव नंगों को कपड़ा देने में , भूखे को रोटी देने में , किसी व्यक्ति के दुःख को दूर करने में , और बेसहारा को सहारा देने में होता है वह किसी और काम को करने से नहीं होता है। परोपकार से किसी भी प्राणी को आलौकिक आनन्द मिलता है। जो सेवा बिना स्वार्थ के की जाती है वह लोकप्रियता प्रदान करती है। जो व्यक्ति दूसरों के सुख के लिए जीते हैं उनका जीवन प्रसन्नता और सुख से भर जाता है।

परोपकार का वास्तविक स्वरूप : आज के समय में मानव अपने भौतिक सुखों की और अग्रसर होता जा रहा है। इन भौतिक सुखों के आकर्षण ने मनुष्य को बुराई-भलाई की समझ से बहुत दूर कर दिया है। अब मनुष्य अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए काम करता है। आज के समय का मनुष्य कम खर्च करने और अधिक मिलने की इच्छा रखता है।

आज के समय में मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र को व्यवसाय की नजर से देखता है। जिससे खुद का भला हो वो काम किया जाता है उससे चाहे दूसरों को कितना भी नुकसान क्यों न हो। पहले लोग धोखे और बेईमानी से पैसा कमाते हैं और यश कमाने के लिए उसमें से थोडा सा धन तीरथ स्थलों पर जाकर दान दे देते हैं। यह परोपकार नहीं होता है।

ईसा मसीह जी ने कहा था कि जो दान दाएँ हाथ से किया जाये उसका पता बाएँ हाथ को नहीं चलना चाहिए वह परोपकार होता है। प्राचीनकाल में लोग गुप्त रूप से दान दिया करते थे। वे अपने खून-पाशिने से कमाई हुई दौलत में से दान किया करते थे उसे ही वास्विक परोपकार कहते हैं।

पुरे राष्ट्र और देश के स्वार्थी बन जाने की वजह से जंग का खतरा बना रहता है। आज के समय में चारों तरफ स्वार्थ का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। प्रकृति हमे निस्वार्थ रहने का संदेश देती है लेकिन मनुष्य ने प्रकृति से भी कुछ नहीं सिखा है। हजारों-लाखों लोगों में से सिर्फ कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो दूसरों के बारे में सोचते हैं।

परोपकार जीवन का आदर्श : जो व्यक्ति परोपकारी होता है उसका जीवन आदर्श माना जाता है। उसे कभी भी आत्मग्लानी नहीं होती है उसका मन हमेशा शांत रहता है। उसे समाज में हमेशा यश और सम्मान मिलता है। हमारे बहुत से ऐसे महान पुरुष थे जिन्हें परोपकार की वजह से समज से यश और सम्मान प्राप्त हुआ था।

ये सब लोक-कल्याण की वजह से पूजा करने योग्य बन गये हैं। दूसरों का हित चाहने के लिए गाँधी जी ने गोली खायी थी , सुकृत ने जहर पिया था और ईसा मसीह सूली पर चढ़े थे। किसी भी देश या राष्ट्र की उन्नति के लिए परोपकार सबसे बड़ा साधन माना जाता है। जो दूसरों के लिए आत्म बलिदान देता है तो वह समाज में अमर हो जाता है। जो व्यक्ति अपने इस जीवन में दूसरे लोगों के जीवन को जीने योग्य बनाता है उसकी उम्र लम्बी होती है।

वैसे तो पक्षी भी जी लेते हैं और किसी-न-किसी तरह से अपना पेट भर लेते हैं। लोग उसे ही चाहते हैं जिसके दिल के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले रहते हैं। समाज में किसी भी परोपकारी का किसी अमीर व्यक्ति से ज्यादा समान किया जाता है। दूसरों के दुखों को सहना एक तप होता है जिसमें तप कर कोई व्यक्ति सोने की तरह खरा हो जाता है। प्रेम और परोपकार एक व्यक्ति के लिए एक सिक्के के दो पहलु होते हैं।

मानवता का उद्देश्य : मानवता का उद्देश्य यह होना चाहिए की वह अपने साथ-साथ दूसरों के भी कल्याण के बारे में भी सोचे। मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिए कि खुद संभल जाये और दूसरों को भी संभाले। जो व्यक्ति दूसरों के दुखों को देखकर दुखी नहीं होता है वह मनुष्य नहीं होता है वह एक पशु के समान होता है।

जो गरीबों और असहाय के दुखों को देखकर और उनकी आँखों से आंसुओं को बहता देखकर जो खुद न रो दिया हो वह मनुष्य नहीं होता है। जो भूखों को अपने पेट पर हाथ फेरता देखकर अपना भोजन उनको न दे दे वह मनुष्य नहीं होता है। अगर तुम्हारे पास धन है तो उसे गरीबों का कल्याण करो।

अगर तुम्हारे पास शक्ति है तो उससे कमजोरो का अवलंबन दो। अगर तुम्हारे पास शिक्षा है तो उसे अशिक्षितों में बांटो। ऐसा करने से ही तुम एक मनुष्य कहलाने का अधिकार पा सकते हो। तुम्हारा कर्तव्य सिर्फ यही नहीं होता है कि खाओ पियो और आराम करो। हमारे जीवन में त्याग और भावना बलिदान करने की भी भावना होनी चाहिए।

मानव जीवन की उपयोगिता : मानव जीवन में लोक सेवा , सहानुभूति , दयालुता प्राय: रोग , महामारी सभी में संभव हो सकती है। दयालुता से छोटे-छोटे कार्यों , मृदुता का व्यवहार , दूसरों की भावनाओं को ठेस न पहुँचाना , दूसरों की दुर्बलता के लिए आदर होना , नीच जाति के लोगों से नफरत न करना ये सभी सहानुभूति के चिन्ह विद्यमान होते हैं।

मानव की केवल कल्याण भावना ही भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि में निहित होती है। यहाँ पर जो भी कार्य किये जाते थे वे बहुजनहिताय और सुखाय की नजरों के अंतर्गत किये जाते थे। इसी संस्कृति को भारत वर्ष की आदर्श संस्कृति माना जाता है।

इस संस्कृति की भावना ‘ वसुधैव कटुम्बकम् ‘ के पवित्र उद्देश्य से पर आधारित थी। मनुष्य अपने आप को दूसरों की परिस्थिति के अनुकूल ढाल लेता है। जहाँ पर एक साधारण व्यक्ति अपना पूरा जीवन अपना पेट भरने में लगा देता है वहीं पर एक परोपकारी व्यक्ति दूसरों की दुखों से रक्षा करने में अपना जीवन बिता देता है।

उपसंहार :- परोपकार मानव समाज का आधार होता है। परोपकार के बिना सामाजिक जीवन गति नहीं कर सकता है। हर व्यक्ति का धर्म होना चाहिए कि वह एक परोपकारी बने। दूसरों के प्रति अपने कर्तव्य को निभाएं। कभी भी दूसरों के प्रति हीन भावना नहीं रखनी चाहिए।

 

परोपकार पर निबंध-Essay On Paropkar In Hindi

परोपकार पर निबंध। Paropkar par Nibandh in Hindi

प्रस्तावना : संसार में परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। संत-असंत और अच्छे-बुरे व्यक्ति का अंतर परोपकार से प्रकट होता है। जो व्यक्ति परोपकार के लिए अपना सब-कुछ त्याग करता है, वह संत या अच्छा व्यक्ति होता है। अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर मानव जाती की निस्वार्थ सेवा करना ही मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। जो व्यक्ति जितना पर-कल्याण में लगा रहता है, वह उतना ही महान बनता है। जिस समाज में दूसरों की सहायता करने की भावना जितनी अधिक होती है, वह समाज उतना ही सुखी और समृद्ध होता है। इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है की –

परहित सरिस धरम नहीं भाई। पर पीड़ा सैम नहिं अधमाई।।

परोपकार का अर्थ : परोपकार से तात्पर्य दूसरों की सहायता करने से है। जब हम अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर दूसरों की सहायता करते हैं तो वह परोपकार नहीं होता है। परोपकार स्वार्थपूर्ण मन से नहीं हो सकता है। उसके लिए ह्रदय की पवित्रता और शुद्धता आवश्यक है। परोपकार क्षमा, दया, बलिदान, प्रेम, ममता आदि गुणों का ही रूप है।

परोपकार एक स्वाभाविक गुण : परोपकार की भावना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यह भावना मनुष्य में ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों, वृक्षों और नदियों तक में पायी जाती है। प्रकृति का स्वभाव भी परोपकारी ही होता है। मेघ वर्षा का जल स्वयं नहीं पीते, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ भी निस्वार्थ बहती हैं। इसी प्रकार सूर्य का प्रकाश भी सबके लिए है, चन्द्रमा अपनी शीतलता सबको देता है। फूल भी अपनी सुगंध से सबको आनंदित करते हैं। इस प्रकार परोपकार एक स्वाभाविक गुण है इसीलिए कवि रहीम जी ने कहा है की –

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं नहिं पान।

कहि रहीम परकाज हित, सम्पति संचहिं सुजान।।

परोपकार-सच्चा मानव धर्म : परोपकार मनुष्य का धर्म है। भूखे को अन्न, प्यासे को जल, वस्त्रहीन को वस्त्र, बूढ़े-बुजुर्गों की सेवा ही मानव का परम धर्म है। संसार में ऐसे व्यक्तियों के नाम अमर हो जाते हैं जो अपना जीवन दूसरों के हित के लिए जीते हैं। परोपकार को इतना महत्त्व इसलिए भी दिया गया है क्योंकि इससे मनुष्य की पहचान होती है। इस प्रकार सच्चा मनुष्य वाही है जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहता है।

स्वयं के उत्थान का मूल : मनुष्य क्षुद से महान और विरल से विराट तभी बन सकता है जब उसके उंदर परोपकार की भावना जन्म लेती है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है की उसने प्राणी मात्र के हित को मानव जीवन का लक्ष्य बताया है। एक धर्म प्रिय व्यक्ति की दिनचर्या पक्षियों को दाना और पशुओं को चारा देने से प्रारम्भ होती है। ज्यों-ज्यों परोपकार की भावना तीव्र होती है, उतनी ही अधिक आनंद की प्राप्ति होती है। एक परोपकारी व्यक्ति से ईश्वर भी हमेशा प्रसन्न रहते है इसीलिए परोपकार से सबकी और स्वयं की उन्नति होती है।

परोपकारी महापुरुषों के उदाहरण : महर्षि दधिची ने राक्षसों के विनाश के लिए अपनी हड्डियां देवताओं को दे दीं। राजा शिवी ने कबूतर की रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर से मांस का टुकड़ा काटकर दे दिया। गुरु गोविन्द सिंह हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने बच्चों सहित बलिदान हो गए।लोकहित के लिए ईसामसीह सूली पर चढ़ गए और सुकरात ने विष का प्याला पी लिया। महात्मा गांधी ने देश के लिए अपने सीने पर गोलियां खायीं। इस प्रकाल इतिहास का एक-एक पन्ना परोपकारी महापुरुषों की गाथाओं से भरा पड़ा है।

प्रेम ही परोपकार : प्रेम और परोपकार एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। प्राणिमात्र के प्रति स्नेह और वात्सल्य की भावना परोपकार से ही जुडी है। प्रेम में बलिदान और त्याग की भावना प्रधान होती है। जो पुरुष परोपकारी होता है, वह दूसरों के हित के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने हेतु तत्पर रहता है। परोपकारी व्यक्ति कष्ट उठाकर, तकलीफ सहकर भी परोपकार करना नहीं छोड़ता है। जिस प्रकार मेहंदी लगाने वाले के हाथ में भी अपना रंग रचा लेती है, उसी प्रकार परोपकारी व्यक्ति की संगती सदा सबको सुख देने वाली होती है।

उपसंहार : परोपकार मानव समाज का आधार है। समाज में व्यक्ति एक-दुसरे की सहायता और सहयोग का सदा लालायित रहता है। परोपकार सामाजिक जीवन की धुरी है, उसके बिना सामाजिक जीवन गति नहीं कर सकता है। परोपकार मानव का सच्चा आभूषण है। इसलिए कहा भी गया है की “परोपकाराय संतां विभूतयः “ अर्थात सत्पुरूषों का अलंकार तो परोपकार ही है। हमारा कर्तव्य है कि हम परोपकारी महात्माओं से प्रेरित होकर अपने जीवन–पथ को प्रशस्त करें और कवि मैथिलीशरण गुप्त के इस लोक-कल्याणकारी पावन सन्देश को चारों दिशाओं में प्रसारित करें।

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। 

परोपकार पर निबंध। Paropkar par Nibandh in Hindi

परोपकार पर निबंध | Essay on Philanthropy in Hindi!

परोपकार शब्द ‘पर+उपकार’ इन दो शब्दों के योग से बना है । जिसका अर्थ है नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना । अपनी शरण में आए मित्र, शत्रु, कीट-पतंग, देशी-परदेशी, बालक-वृद्ध सभी के दु:खों का निवारण निष्काम भाव से करना परोपकार कहलाता है ।

ईश्वर ने सभी प्राणियों में सबसे योग्य जीव मनुष्य बनाया । परोपकार ही एक ऐसा गुण है जो मानव को पशु से अलग कर देवत्व की श्रेणी में ला खड़ा करता है । पशु और पक्षी भी अपने ऊपर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञ होते हैं । मनुष्य तो विवेकशील प्राणी है उसे तो पशुओं से दो कदम आगे बढ़कर परोपकारी होना चाहिए ।

प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की शिक्षा देता है- नदियाँ परोपकार के लिए बहती है, वृक्ष धूप में रहकर हमें छाया देता है, सूर्य की किरणों से सम्पूर्ण संसार प्रकाशित होता है । चन्द्रमा से शीतलता, समुद्र से वर्षा, पेड़ों से फल-फूल और सब्जियाँ, गायों से दूध, वायु से प्राण शक्ति मिलती है।

पशु तो अपना शरीर भी नरभक्षियों को खाने के लिए दे देता है । प्रकृति का यही त्यागमय वातावरण हमें नि:स्वार्थ भाव से परोपकार करने की शिक्षा देता है । भारत के इतिहास और पुराण में परोपकार के ऐसे महापुरुषों के अगणित उदाहरण हैं जिन्होंने परोपकार के लिए अपना सर्वस्व दे डाला ।

राजा रंतिदेव को चालीस दिन तक भूखे रहने के बाद जब भोजन मिला तो उन्होंने वह भोजन शरण में आए भूखे अतिथि को दे दिया । दधीचि ऋषि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ दे डालीं । शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान किया, कर्ण ने कवच और कुण्डल याचक बने इन्द्र को दे डाले ।

राजा शिवि ने शरण में आए कबूतर के लिए अपने शरीर का मांस दे डाला । ईसा मसीह सूली पर चढ़े और सुकरात ने लोक कल्याण के लिए विष का प्याला पिया । सिक्खों के गुरू गुरू नानक देव जी ने व्यापार के लिए दी गई सम्पत्ति से साधु सन्तों को भोजन कराके परोपकार का सच्चा सौदा किया ।

 

परोपकार के अनेक रूप हैं जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों की सहायता कर आत्मिक आनन्द प्राप्त करता है जैसे-प्यासे को पानी पिलाना, बीमार या घायल व्यक्ति को हस्पताल ले जाना, वृद्धों को बस में सीट देना, अन्धों को सड़क पार करवाना, अशिक्षित को शिक्षित करना, भूखे को रोटी, वस्त्रहीन को वस्त्र देना, गोशाला बनवाना, मुक्त चिकित्सालयों में अनुदान देना, प्याऊ लगवाना, छायादार वृक्ष लगवाना, शिक्षण केन्द्र और धर्मशाला बनवाना परोपकार के रूप हैं ।

आज का मानव दिन प्रतिदिन स्वार्थी और लालची होता जा रहा है दूसरों के दु:ख से प्रसन्न और दूसरों के सुख से दु:खी होता है । मित्र की सहायता करने के स्थान पर संकट के समय भाग खड़ा होता है ।

सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को देखकर अनदेखा कर देता है । उस व्यक्ति के करुण-क्रन्दन से उसका दिल नही पसीजता । दूसरे की हानि में उसे अपना लाभ दिखाई देता है ।

मानव जीवन बड़े पुण्यों से मिलता है उसे परोपकार जैसे कार्यों में लगाकर ही हम सच्ची शान्ति प्राप्त कर सकते हैं । यही सच्चा सुख और आनन्द है । परोपकारी व्यक्ति के लिए यह संसार कुटुम्ब बन जाता है- ‘वसुधैव व्युटुम्बकम्’ महर्षि व्यास ने भी कहा है कि परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को दु:ख देना पाप ।

परोपकार: पुण्याय: पापाय पर पीडनम्

मानव को तुच्छ वृत्ति छोड़ कर परोपकारी बनना चाहिए । उसे यथा-शक्ति दूसरों की सहायता करनी चाहिए ।

Essay on Philanthropy in Hindi

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