October 15, 2018 | Hindigk50k

कुसंगति के दुष्परिणाम पर निबंध

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कुसंगति के दुष्परिणाम पर निबंध

कुसंगति के दुष्परिणाम :

कुसंगति का अर्थ होता है – बुरी संगत। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। जब तक वो समाज में संबंध नहीं प्राप्त कर सकते वो अपने जीवन को आगे नहीं बढ़ा पाते हैं। समाज में कई तरह के लोग होते हैं। कुछ अच्छे लोग होते हैं तो कुछ बुरे लोग होते हैं।

जब व्यक्ति की संगत अच्छी होती है तो उससे उसकी जड़ता को दूर किया जाता है। सत्संगति से मनुष्य की वाणी , आचरण में सच्चाई आती है। मनुष्य के अंदर से पापों का नाश होता है। इससे मनुष्य के अंदर की बुराईयाँ खत्म हो जाती है।

लेकिन कुसंगति सत्संगति की बिलकूल उल्टी होती है यह मनुष्य के अंदर बुराईयाँ पैदा करती है। कुसंगति मनुष्य को बुरे रास्ते पर ले जाता है। जो व्यक्ति सत्संगति के विरुद्ध होता है वह कुसंगति के अधीन होता है।

यह कभी भी नहीं हो सकता है कि मनुष्य कुसंगति के प्रभाव से बच सकता है। जी व्यक्ति दुष्ट और दुराचारी व्यक्तियों के साथ रहते हैं वे व्यक्ति भी दुष्ट और दुराचारी बन जाते हैं। इस संसार में व्यक्ति या तो भगवान की संगत पाता है या फिर बुरे व्यक्ति की संगत में पड़ जाता है क्योंकि मानव का समाज के अभाव में अस्तित्व नहीं है।

आचरण की पहचान :

किसी भी व्यक्ति के आचरण को जानने के लिए उसके दोतों के आचरण को जानने की जरूरत होती है। यह इसलिए करना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति के दोस्त दुष्ट और दुराचारी होते हैं वह भी दुष्ट और दुराचारी ही होगा। व्यक्ति पर संगती का असर जाने -अनजाने में पड़ ही जाता है।

बचपन से व्यक्ति अपने आस-पडोस और परिवार से जो कुछ भी सीखता है वह उन सब को ही दोहराता है। जब व्यक्ति गाली को सुनता है तभी तो उसे गाली देने की आदत पडती है। सत्संगति का किसी भी मनुष्य के चरित्र में बहुत बड़ा हाथ होता है। अगर व्यक्ति अच्छी पुस्तकें पढ़ता है तो वह भी सत्संगति होती है।

जो लेखक विद्वान होता ही वो अपनी पुस्तकों से ही हमारे साथ रहता है। अच्छी पुस्तक और महान लोग हमारे मित्र होते हैं और हमें रास्ता दिखाते हैं इनके बताये हुए रास्ते पर चलने से व्यक्ति का जीवन कंचन के समान हो जाता है। दुष्टों और दुराचारियों का संग देने से मनुष्य का जीवन भी उसी की तरह का बन जाता है। ऐसे लोग व्यक्ति को पतन की तरफ ले जाते हैं। मनुष्य को विवेक प्राप्त करने के लिए सत्संगति को अपनाना चाहिए।

कुसंगति के दुष्परिणाम :

कुसंगति का मनुष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। किसी भी व्यक्ति को अच्छी बातें सिखने में थोडा समय लग जाता है लेकिन व्यक्ति बुरी बातों को सिखने में बिलकुल भी समय नहीं लगता है। जो व्यक्ति जिस तरह के व्यक्तियों के साथ बैठता है वो उन्ही की तरह का बन जाता है।

जब अच्छे व्यक्ति बुरे व्यक्तियों के साथ रहने लगता है तो अच्छा व्यक्ति भी बुरा बन जाता है। अगर हमे किसी भी व्यक्ति के बारे में यह पता लगानाहै कि उसका चरित्र कैसा है तो सबसे पहले उसके दोस्तों से बात चीत करनी चाहिए। एक व्यक्ति के व्यवहार से ही उसके चरित्र का पता लग जाता है।

जो व्यक्ति कुसंगति के शिकार होते हैं वे किसी की बात नहीं सुनते हैं वे सभी को गलत समझते हैं। वे जिन लोगों को अपना दोस्त समझते हैं उनसे बढकर उन्हें कोई भी अपना नहीं लगता है लेकिन वे लोग ही उसको दोखा देते हैं।

वह अपने घर वालों की नजरों में भी बुरा बन जाता है और समाज भी उसे बुरा मानता है। मनुष्य अपने जीवन में कहीं का भी नहीं रहता है। ऐसा व्यक्ति न ही तो अपने परिवार का कल्याण कर पाता है और न ही अपने देश और समाज के लिए अपने कर्तव्य को निभा पाता है।

अच्छी संगती की आवश्यकता :

किसी व्यक्ति के लिए उन्नति का मार्ग सिर्फ सत्संगति से ही खुलता है। सत्संगति से सत्य और भगवान के प्रति हमारी जिज्ञासा बढ़ जाती है। आगे आने वाले समय में लोगों को बुरी संगत से बचाने के लिए अच्छी संगत की बहुत जरूरत होती है। बच्चों को अच्छी संगत पर चलाने से उसका चरित्र पुरे समाज में प्रसिद्ध होता है लेकिन जो बच्चे बुरी संगत को अपनाते हैं समाज में उनका कोई भी सम्मान नहीं करता है।

जो लोग सत्संगति को अनते हैं वे अपने बल पर कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं लेकिन जो कुसंगति को अपनाते हैं उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जो लोग कुसंगति को अपनाते हैं वो लोग बुरे रास्ते पर चल देते हैं लेकिन जो लोग अच्छी संगत को अपनाते हैं वो कभी भी अपने रास्ते से भटकते नहीं हैं।

जो बुरी संगत को अपनाते हैं उन्हें अपने परिवार पर भरोसा नहीं होता है इसी वजह से अच्छी संगत की बहुत जरूरत होती है। जिनमें अच्छी संगत होती है वे अपने परिवार पर हमेशा भरोसा करते हैं। जिस प्रकार अगर एक पुत्र अच्छी संगत का हो तो वह अपने जवन में हमेशा उन्नति के शिखर पर रहेगा।

सज्जन और दुर्जन का संग :

कुसंगति की अनेक हानियाँ होती है। संसार में गुण और दोष दोनों ही होते हैं। जो मनुष्य दुराचार, पापाचार , दुश्चरित्रता गुण से ग्रस्त होता है वह कुसंगति के वश में होता है। आक के समय में विद्यार्थियों को कुसंगति के प्रभाव से बिगड़ते हुए सभी ने देखा होगा।

जो विद्यार्थी कभी प्रथम श्रेणी पर आते थे वे फ़ैल होने लग जाते हैं यह सब कुसंगति का प्रभाव होता है। इसी कुसंगति से बहुत से घर नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति बुद्धिमान से भी बुद्धिमान होता है उस पर कुसंगति का बहुत प्रभाव पड़ता है।

एक महान कवि ने कहा था की सज्जन और दुर्जन दोनों ही व्यक्तियों का साथ ही हमेशा अनुचित होता है | यह कुछ नहीं बस विषमता को ही जन्म देता है। हम अक्सर देखते हैं कि बुरा व्यक्ति तो बुराई छोड़ नहीं पाता हैं लेकिन उसकी संगत से अच्छा व्यक्ति भी बुरा बन जाता है। कभी भी बुरा व्यक्ति अपनी बुराई को छोड़ नहीं पाता है वह कुछ भी कर ले लेकिन उसका साथ नहीं छोड़ पाता है।

कुसंगति से बचने के उपाय :

सत्संगति मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर मनुष्य को जीवन में उन्नति और सफल होना है तो उसे सत्संगति के मार्ग को अपनाना होगा। सत्संगति के मार्ग पर चलकर ही वो अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है। सत्संगति का अर्थ होता है अच्छे व्यक्तियों की संगत।

जो व्यक्ति अच्छे व्यक्तियों की संगत में रहते हैं उनके उन्नति के रास्ते में कभी भी कोई बाधा नहीं आती है। वे हमेशा उन्नति की तरफ चलते रहते हैं। जब मनुष्य बुद्धिमान ,विद्वान् ,और गुणवान लोगों की संगत को अपनाते हैं तो उस व्यक्ति में अच्छे गुणों का बहुत ही तेजी से विकास होता है और वह सत्संगति से परिचित हो जाता है।

सत्संगति से व्यक्ति के अंदर जो दुर्गुण होते हैं वो नष्ट हो जाते हैं। सत्संगति से मनुष्य की बुराईयाँ दूर हो जाती हैं और उसका मन बहुत ही पवित्र या पावन हो जाता है। वह सभी प्रकर की बुराईयों से मुक्त हो जता है।

सत्संगति के प्रकार :

सत्संगति का अर्थ होता है -अच्छी संगत। सत्संगति दो तरह की होती है। एक तो जब कोई व्यक्ति किसी बुद्धिमान , विद्वान् व्यक्ति के साथ रहकर उसकी संगती को प्राप्त करता है और दूसरी तरफ कोई व्यक्ति किताबों और सत्संगों से संगत प्राप्त करता है।

एक में कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से सीखता है और दूसरे में कोई व्यक्ति किताबों और सत्संगों से सीखता है। सत्संगति को अपनाने से मनुष्य के अंदर के ज्ञान में वृद्धि होती है। जो व्यक्ति सत्संगति को अपनाते हैं उन पर कुसंगति का कोई असर नहीं पड़ता है।

जिस तरह से मधुमक्खियाँ शहद को बनती है लेकिन खुद उस शहद को कभी नहीं खाती हैं। उसी तरह चन्दन के पेड़ से साँप लिपटे रहते हैं लेकिन चन्दन में कभी भी विष व्याप्त नहीं होता है।

उपसंहार :

किसी भी व्यक्ति के जीवन में संगति का बहुत महत्व होता है। किसी भी जीवन की विजय और पराजय उसकी संगति पर निर्भर करते है। जो व्यक्ति बुरा होकर भी विद्वान् होता है उसका जीवन व्यर्थ होता है। अगर हमें जीवन में सफलता और उन्नति प्राप्त करनी है तो अपने जीवन की संगति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।

जो व्यक्ति बुरे व्यक्तियों के साथ रहता है वह भी बुरा बन जाता है। सब लोगों को पता होता है की सच सच को जन्म देता है , अच्छाई अच्छाई को जन्म देती है और बुराई बुराई को जन्म देती है। अगर मनुष्य कुसंगति से बच रहे तो उसी में उसकी भलाई होती है।

कुसंगति के दुष्परिणाम पर निबंध

Kusangati Essay in Hindi- कुसंगति के दुष्परिणाम पर निबंध

कुसंगति का शाब्दिक अर्थ है- बुरी संगति। अच्छे व्यक्तियों की संगति से बुद्धि की जड़ता दूर होती है, वाणी तथा आचरण में सच्चाई आती है, पापों का नाश होता है और चित निर्मल होता है लेकिन कुसंगति मनुष्य में बुराइयों को उत्पन्न करती है। यह मनुष्य को कुमार्ग पर ले जाती है। जो कुछ भी सत्संगति के विपरीत है, वह कुसंगति सिखलाती है। एक कवि ने कहा भी है

काजल की कोठरी में कैसे हू सयानो जाय,

एक लीक काजल की लागि हैं, पै लागि हैं ।

यह कभी नहीं हो सकता कि परिस्थितियों का प्रभाव हम पर न पड़े। दुष्ट और दुराचारी व्यक्ति के साथ रहने से सज्जन व्यक्ति का चित्त भी दूषित हो जाता है।

कुसंगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है। एक कहावत है-अच्छाई चले एक कोस, बुराई चले दस कोस । अच्छी बातें सीखने में समय लगता है। जो जैसे व्यक्तियों के साथ बैठेगा, वह वैसा ही बन जाएगा। बुरे लोगों के साथ उठने-बैठने से अच्छे लोग भी बुरे बन जाते है। यदि हमें किसी व्यक्ति के चरित्र का पता लगाना हो तो पहले हम उसके साथियों से बातचीत करते है। उनके आचरण और व्यवहार से ही उस व्यक्ति के चरित्र का सही ज्ञान हो जाता है।

कुसंगति की अनेक हानियाँ हैं। दोष और गुण सभी संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य में जितना दुराचार, पापाचार, दुश्चरित्रता और दुव्यसन होते हैं, वे सभी कुसंगति के फलस्वरूप होते हैं। श्रेष्ठ विद्यार्थियों को कुसंगति के प्रभाव से बिगड़ते हुए देखा जा सकता है। जो विद्यार्थी कभी कक्षा में प्रथम आते थे, वही नीच लोगों की संगति पाकर बरबाद हो जाते हैं। कुसंगति के कारण बड़े-बड़े घराने नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। बुद्धिमान्-से-बुद्धिमान् व्यक्ति पर भी कुसंगति का प्रभाव पड़ता है। कवि रहीम ने भी एक स्थल पर लिखा है

बसि कुसंग चाहत कुसल, यह रहीम जिय सोच।

महिमा घटी समुद्र की, रावन बस्यौ पड़ोस ॥

सज्जन और दुर्जन का संग हमेशा अनुचित है बल्कि यह विषमता को ही जन्म देता है। बुरा व्यक्ति तो बुराई छोड़ नहीं सकता, अच्छा व्यक्ति ज़रूर बुराई ग्रहण कर लेता है। अन्यत्र रहीम कवि लिखते हैं-

कह रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग ॥

अर्थात् बेरी और केले की संगति कैसे निभ सकती है ? बेरी तो अपनी मस्ती में झूमती है लेकिन केले के पौधे के अंग कट जाते हैं। बेरी में काँटे होते हैं और केले के पौधे में कोमलता। अत: दुर्जन व्यक्ति का साथ सज्जन के लिए हानिकारक ही होता है।

हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो हमें दुर्जनों की संगति छोड़कर सत्संगति करनी होगी। सत्संगति का अर्थ है-श्रेष्ठ पुरुषों की संगति। मनुष्य जब अपने से अधिक बुद्धिमानू, विद्वान् और गुणवान लोगों के संपर्क में आता है तो उसमें अच्छे गुणों का उदय होता है। उसके दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। सत्संगति से मनुष्य की बुराइयाँ दूर होती हैं और मन पावन हो जाता है। कबीरदास ने भी लिखा है-

कबीरा संगति साधु की, हरे और की व्याधि।

संगति बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।

सत्संगति दो प्रकार से हो सकती है। पहले तो आदमी श्रेष्ठ, सज्जन और गुणवान व्यक्तियों के साथ रहकर उनसे शिक्षा ग्रहण करे। दूसरे प्रकार का सत्संग हमें श्रेष्ठ पुस्तकों के अध्ययन से प्राप्त होता है। सत्संगति से मनुष्यों की ज्ञान-वृद्धि होती है। संस्कृत में भी कहा गया है- सत्संगति : कथय कि न करोति पुसामू। रहीम ने पुनः एक स्थान पर कहा है

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग ।

चंदन विषा व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ॥

अर्थात् यदि आदमी उत्तम स्वभाव का हो तो कुसंगति उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती। यद्यपि चंदन के पेड़ के चारों ओर साँप लिपटे रहते हैं तथापि उसमें विष व्याप्त नहीं होता। महाकवि सूरदास ने भी कुसंगति से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा है

तज मन हरि-विमुखनि को संग ।

जाकै संग कुबुधि उपजति है, परत भजन में भंग ॥

बुरा व्यक्ति विद्वान् होकर भी उसी प्रकार दुखदायी है, जिस प्रकार मणिधारी साँप । मनुष्य बुरी संगति से ही बुरी आदते सीखता है। विद्यार्थियों को तो बुरी संगति से विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। सिगरेट-बीड़ी, शराब, जुआ आदि बुरी आदते व्यक्ति कुसंगति से ही सीखता है। अस्तु, कुसंगति से बचने में ही मनुष्य की भलाई है।

Kusangati essay in hindi

हेलो दोस्तों कैसे हैं आप सभी,दोस्तों आज का हमारा आर्टिकल Kusangati essay in hindi आपको जीवन में काफी आगे बढ़ाएगा दोस्तों कुसंगति यानी गलत संगत.दोस्तों इस दुनिया में बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो कुसंगति में फंसकर कुछ गलत करते हैं और वो गलत लोगो की संगत करके खुद भी एक गलत इंसान बनते हैं हमें कुसंगति से बचना चाहिए क्योकि कुसंगति वाकई में एक ऐसी बड़ी गलती है जिससे हम अगर दूर रहे तो ही अच्छा है यानी हम अगर संगति करना चाहे तो अच्छे लोगों की करें कुसंगति करने वाला जीवन में हमेशा पछताता है,उसके जीवन में पछताने के अलावा और कुछ भी नहीं होता क्योंकि कहते हैं जैसी संगत वैसी रंगत.

Kusangati essay in hindi
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अगर आप अपने जीवन में बुरी संगत करते हो तो आपको इसका परिणाम बुरा ही मिलता है.कुसंगति अगर एक इंसान करें तो वह भी धीरे धीरे उस दूसरे इंसान की तरह बन जाता है यानी बुरे इन्सान के बुरे गुण उसमें समा जाते हैं क्योंकि लोगों को अच्छी संगति में डालना या जिंदगी में अच्छी सलाह देना और देकर मानना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन कुसंगति अपनाकर गलत रास्ते पर चलना बहुत ही सरल होता है लेकिन बाद में सिर्फ मुसीबतें आती हैं.अगर हम जीवन में खुश रहना चाहे तो हमको अच्छी संगति अपनाना चाहिए.कुसंगति से किसी का भी लाभ नहीं होता.

कुसंगति करने से हमारा ही नहीं बल्कि हमारे पूरे परिवार का नुकसान होता है अक्सर देखा जाता है कि लोग बुरी संगति में फंसकर शराब पीने लगते हैं या फिर वह गलत कामों की तरफ अग्रसर हो जाते हैं लेकिन जब ये बात उनके परिवार वालों को पता लगती है तो परिवार वाले उससे इस तरह के गलत कामो को खत्म करने का कहते हैं लेकिन वह इतनी आसानी से बुरी आदतों को नहीं छोड़ पाता क्योंकि यह आदत लगती हैं कुसंगति के वजह से.अगर आप भी इसी तरह की कुसंगति में फंसे हुए हैं तो आप भी कुसंगति से दूर हो जाइये और जीवन में आगे बढ़ने का प्रयत्न कीजिए.अच्छी संगति जीवन के हर क्षेत्र में काम करती है चाहे आप पढ़ाई करते हो या कोई नौकरी.कुसंगति हमेशा हमारे जीवन के लिए नुकसानदायक है इसका प्रभाव बुरा ही होता है.अगर आप अच्छे लोगों के साथ में रहते हो तो आप भी अच्छी संगति में फंसकर जीवन में कुछ अच्छा करते हैं वही कुसंगति में फंसकर यानी बुरे लोगों के साथ में रहकर आपको बुरी आदतें लग जाती हैं.

एक विद्यार्थी जो सुबह स्कूल जाता है अच्छी तरह पढ़ाई करता है अगर वह ऐसा कर पाता है तो सबसे बड़ा कारण संगति भी है लेकिन अगर आपके बच्चे कुसंगति अपनाते हैं और आप उसे मना नहीं करते तो वाकई में आपके साथ आपके बच्चों की भी जिंदगी बर्बाद हो सकती है इसलिए जीवन में हमें कुसंगति से बचना चाहिए.हेलो दोस्तों अगर जीवन में हमारी संगति अच्छी नहीं होती तो हमें जीवन में बहुत पछतावा होता है और लोग भी हमारी बुराई करते हैं.हम कितने भी अच्छे हों लेकिन लोग हमारी कुसंगति को देखकर हमें बुरा इंसान समझते हैं.जीवन में कोई भी हमारी मदद करने के लिए आगे नहीं आता और हम कुछ भी खास नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर अगर हम जीवन में अच्छे लोगों की संगत करते हैं तो जीवन में लोग हमारा सपोर्ट करते हैं अरे बताए हुए रास्ते पर चलते हैं उनको जीवन में परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ता इसके अलावा यह भी है कि अगर हम कुसंगति में फंसते हैं तो कहीं ना कहीं ना चाहते हुए भी धीरे-धीरे बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं और कहते की अगर एक इंसान की आदत ही बेकार है तो वह जिंदगी में सबसे पीछे रह जाता है इसलिए भी हमें जीवन में कुसंगति को त्यागना चाहिए और संगति की ओर अग्रसर होना चाहिए.

 

इसके अलावा आपने एक कहावत जरूर सुनी होगी कि गेहूं के साथ घुन जरूर करता है इस विषय पर बहुत सारी कहानियां भी हैं जिनसे हम सीख ले सकते हैं कहने का आशय यह है कि अगर हम बुरी संगत करते हैं तो हम भले ही अच्छे हैं,कुछ भी गलत नहीं करते लेकिन हो सकता है कभी आप भी घुन की तरह किसी मुसीबत में फंस जाओ इसलिए हमें जहां तक हो सके कुसंगति से बचना चाहिए इसी में हम सभी का लाभ है.कुसंगति करने से हमारी बुद्धि का नाश हो जाता है अक्सर यह बात बहुत सी जगह देखने को मिलती है.हम बात करें रामायण की तो रामायण हम सभी ने देखी है रामायण में हमने देखा की के कैकई जो श्री रामचंद्र की माता थी वह श्री राम से कौशल्या की तरह ही बहुत प्यार करती थी लेकिन वह मंथरा की कुसंगति मैं फस गई और इस वजह से उन्होंने अपने सबसे प्यारे लड़के राम को वनवास दे दिया इसलिए कहते हैं की कुसंगति का हमारे जीवन पर बहुत ही दुष्प्रभाव होता है जहां तक हो सके हमें कुसंगति से बचना चाहिए ऐसे लोगों से बात नहीं करना चाहिए.

आज हम हमारे देश के सफल उद्यमियों की बात करें तो सबसे पहला नाम आता है धीरूभाई अंबानी.धीरूभाई अंबानी एक गरीब फैमिली से थे लेकिन आज वह भारत के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं अब धीरुभाई अंबानी जी की कामयाबी का राज क्या है वैसे तो इस बारे में बहुत सी बाते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण यही है कि उनकी संगति अच्छी थी.अगर उनकी संगति बड़े-बड़े लोगों के बीच में ना होती तो उनका जीवन में इतने आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल होता.धीरूभाई अंबानी जी बचपन में फाइव स्टार रेस्टोरेंट में चाय पीने के लिए जाते थे वह गरीब थे लेकिन फिर भी फाइव स्टार होटल में चाय पीने के लिए जाते थे क्योंकि वह अमीरों की संगत करना चाहते थे,उनकी बातें वह बड़े ही गोर से सुना करते थे.अगर इसी तरह हम भी अच्छे लोगों के साथ में रहें,उनकी संगत अपनाएं तो जीवन में आगे बढ़ सकते हैं लेकिन अगर कुसंगति अपनाएंगे तो वाकई में हमारे साथ बहुत बुरा हो सकता है.

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परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध :

भूमिका : हर वर्ष करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा देते हैं। स्कूलों व् कोलेजों में बहुत प्रकार की परीक्षाएं आयोजित करवाई जाती हैं। अगर किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी प्रकार की नौकरी प्राप्त करनी हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी कोर्स का दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षाओं के अनेक रूप होते हैं। लेकिन हम केवल एक ही परीक्षा से परिचित हैं जो की लिखित रूप से कुछ प्रश्नों के उत्तर देने से पूरी होती है। खुदा ने अब्राहम की परीक्षा ली थी। परीक्षा के नाम से फरिश्ते घबराते हैं पर मनुष्य को बार-बार परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षा क्या है : परीक्षा को वास्तव में किसी की योग्यता, गुण और सामर्थ्य को जानने के लिए प्रयोग किया जाता है। शुद्ध -अशुद्ध अथवा गुण-दोष को जांचने के लिए परीक्षा का प्रयोग किया जाता है। हमारी शिक्षा प्रणाली का मेरुदंड परीक्षा को माना जाता है। सभी स्कूलों और कॉलेजों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसका उद्देश्य विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल कराने के लिए किया जाता है।

स्कूलों में जो सामान्य रूप से परीक्षा ली जाती हैं वह वार्षिक परीक्षा होती है। जब वर्ष के अंत में परीक्षाएं ली जाती हैं तब उनकी उत्तर पुस्तिका से उनकी क्षमता का पता चलता है। विद्यार्थियों की योग्यता को जांचने के लिए अभी तक कोई दूसरा उपाय नहीं मिला है इस लिए वार्षिक परीक्षा से ही उनकी योग्यता का पता लगाया जाता है। परीक्षाओं से विद्यार्थियों की स्मरन शक्ति को भी जांचा जा सकता है।

परीक्षा का वर्तमान स्वरूप : तीन घंटे से भी कम समय में विद्यार्थी पूरी साल पढ़े हुए और समझे हुए विषय को हम कैसे जाँच -परख सकते हैं ? जब प्रश्न -पत्रों का निर्माण वैज्ञानिक तरीके से नहीं होता तो विद्यार्थियों की योग्यता को जांचना त्रुटिपूर्ण रह जाता है। जब परीक्षा के भवन में नकल की जाती है तो परीक्षा-प्रणाली पर एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है। प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना आजकल आम बात हो गई है। हमारी परीक्षा -प्रणाली की विश्वसनीयता लगातार कम होती जा रही है।

नकल क्यूँ : जिस प्रकार राम भक्त हनुमान को राम का ही सहारा रहता था उसी तरह कुछ बच्चों को बस नकल का ही सहारा रहता है। पहले समय में बच्चों को नकल करने के लिए कला का सहारा लेना पड़ता था लेकिन आजकल तो अध्यापक ही बच्चों को नकल करवाने के लिए चारों तरफ फिरते रहते हैं।

नकल करना और करवाना अब एक पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। अगर नकल करवानी है तो माता-पिता के पास धन होना जरूरी हो गया है। कुछ विद्यार्थी दूसरों के लिए आज भी नकल करवाने और चिट बनाने का काम करते रहते हैं। बहुत से विद्यार्थी तो ब्लू-टूथ और एस० एम० एस० के द्वारा भी नकल करते रहते हैं। बच्चों के मूल्यांकन में भी बहुत गडबडी होने लगी है।

नकल के लिए सुझाव : कोई भी परीक्षा प्रणाली विद्यार्थी के चरित्र के गुणों का मूल्यांकन नहीं करती है। जो लोग चोरी करते हैं हत्याएँ करते हैं वे भी जेलों में बैठकर परीक्षा देते और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हैं। जो परीक्षा प्रणाली केवल कंठस्थ करने पर जोर देती है वो विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती। सतत चलने वाली परीक्षा प्रणाली की स्कूलों और कॉलेजों में विकसित होने की जरूरत है। विद्यार्थी के ज्ञान , गुण और क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उपसंहार : आजकल बहुत से लोगों को परीक्षाएं देनी पडती हैं। अगर आपको कोई भी कार्य करना है तो पहले आपको परीक्षा देनी पडती है | कुछ लोग परीक्षा देने के परिश्रम से बचने के लिए नकल करते हैं तो कुछ लोग पैसे देकर नकल करते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। आगे चलकर जब उन्हें कोई व्यवसायिक कार्य या फिर नौकरी पाने के लिए फिर भी परीक्षा देनी ही पड़ेगी।

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

यूँ तो प्रत्येक परीक्षा केंद्र के बाहर बड़े-बड़े इश्तिहार लगाए जाते हैं, जिन पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता है- ‘परीक्षा में नकल करना पाप है/ सामाजिक बुराई है।’ फिर भी ‘रघुकुल रीत सदा चली आई’ की तर्ज पर परीक्षाओं में नकल है कि चलती ही आ रही है। यदि किसी रोज इस अपील का ऐसा असर हो जाए कि परीक्षाओं में नकल होना बिलकुल ही बंद हो जाए तो इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
मसलन ऐसे कई प्राइवेट स्कूलों को अपना बोरिया-बिस्तर गोल करना पड़ सकता है, जिनमें विद्यार्थी दाखिला ही इस आश्वासन के बाद लेते हैं कि उन्हें ‘शर्तिया पास’ करवाया जाएगा और इस गारंटी को पूरा करने के लिए ‘परीक्षा केंद्र अधीक्षक’ नामक प्राणी की ‘पेड’ सेवाएँ ली जाती हैं। दूसरी तरफ नकल बंद होने के कारण आए खराब परीक्षा परिणामों के मद्देनजर गुस्साए अभिभावकों द्वारा सरकारी स्कूलों पर, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, ताले जड़े जा सकते हैं।
सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों के इस प्रकार धड़ाधड़ बंद होने से पूरी शिक्षा व्यवस्था ही चरमरा सकती है और विद्या के इन मंदिरों में तैयार होने वाले समाज के भावी नागरिकों का प्रोडक्शन यकायक बंद हो सकता है।

यही नहीं, प्राइवेट स्कूलों में अपना शोषण करवाकर भी जैसे-तैसे अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे शिक्षक सड़कों पर आ जाएँगे, जिससे कि बेरोजगारी के सेंसेक्स में अभूतपूर्व उछाल आ सकता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को खराब परीक्षा परिणाम के कारण खराब हुई अपनी एसीआर को सुधरवाने के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जेबें गर्म करनी पड़ सकती हैं, जिससे कि भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से ऊपर की ओर जाने लगेगा। 

विभिन्न परीक्षा केंद्रों के आसपास ‘फोटोस्टेट’ की दुकान वालों, जो कि मात्र परीक्षाओं के दिनों में ही अपनी-अपनी जीरोक्सिंग मशीन की पूरी लागत से भी कहीं अधिक रकम वसूल कर लेते हैं, को नकल न होने की स्थिति में अभूतपूर्व गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। नकल करवाने वाले परीक्षा केंद्र अधीक्षकों एवं इस सुकृत्य में उनके सहयोगी चपरासियों, क्लर्कों, सुपरवाइजरी स्टाफ आदि को मिलने वाले सुविधा शुल्क एवं उपहारों का सिलसिला बंद होने की स्थिति में अपना सोशल स्टेटस बनाए रखने में काफी दिक्कतें पेश आ सकती हैं।
इतना ही नहीं, नकल न होने की स्थिति में पर्चियाँ बनाने जैसी उच्चकोटि की प्राचीनकाल से चली आ रही कला का दम घुट जाएगा। नकल बंद होने के फलस्वरूप विभिन्न राज्यों के अथवा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालयों आदि के परीक्षा परिणामों में भारी गिरावट आने पर, शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर विधानसभा, लोकसभा अथवा राज्यसभा में धरना, विरोध, प्रदर्शन, हंगामा जैसी अप्रिय स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं और मीडिया कवरेज के चलते, देश की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बट्टा लग सकता है।
कहीं भी नकल न होने की स्थिति में परीक्षाओं में फेल होने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के चलते युवा वर्ग में बेचैनी, निराशा एवं कुंठा जैसे नकारात्मक भाव जागृत हो सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हो सकती है और अंततोगत्वा संपूर्ण सामाजिक वातावरण तनावग्रस्त हो सकता है। परीक्षाओं में नकल न होने के फलस्वरूप उपरोक्त दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चाहिए कि वह इस मामले में यथास्थिति बनाए रखे और परीक्षाओं में नकल रोकने जैसे अभियान को, जैसा कि अब तक होता आया है, ‘औपचारिकता मात्र’ बनाकर सिर्फ कागजों तक ही सीमित रखा जाए।

 

परीक्षाओं को नकलमुक्त करने के लिए शिक्षा बोर्ड प्रत्येक वर्ष काफी प्रतिबद्धता का ढिंढोरा पीटता है, परंतु परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’ वाला ही रहा है। मेरा ऐसा कहने का तात्पर्य यह नहीं कि पूर्व में किए गए बोर्ड द्वारा प्रयत्न संदेहास्पद थे। बोर्ड ने विगत वर्षों में अपनी क्षमता के अनुसार विद्यार्थियों में नकल की प्रवृत्ति को रोकने के लिए भरसक प्रयत्न किए। इसके लिए बोर्ड ने सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शिक्षा अधिकारियों तथा अध्यापकों तथा बोर्ड के अधिकारी वर्ग और अन्य कर्मचारियों को भी परीक्षाओं के दौरान निरीक्षण पर लगाया, परंतु परिणाम इतने उत्साहवर्धक नहीं रहे। बोर्ड इस बार भी काफी होम वर्क कर रहा है, देखते हैं परिणाम कैसे रहते हैं। बोर्ड की अब तक की असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण सभी स्कूलों में परीक्षा केंद्रों का होना है, जबकि 80 प्रतिशत परीक्षा केंद्रों के भवन इतने घटिया स्तर के हैं कि वहां पर परीक्षा केंद्र रखना नकल को बढ़ावा देना है। बोर्ड ने काफी संख्या में परीक्षा केंद्रों को इस बार बंद किया है। बोर्ड का यह पग अति सराहनीय है, परंतु और भी परीक्षा केंद्र ऐसे हैं, जिनको बंद करना भी अनिवार्य है। इन परीक्षा केंद्रों के दो कमरे एक जगह हैं और दो या तीन कमरे दूसरी जगह हैं। इनकी खिड़कियां और दरवाजे भी टूटे हैं। अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर भी सही नहीं हैं। न ही इन कमरों के बाहर कोई कांटेदार तार लगी है, जिससे कि बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सके। एक आदर्श परीक्षा केंद्र के लिए एक बड़ा हाल जिसमें 200 से 300 बच्चों के बैठने का प्रावधान हो, होना चाहिए। यदि कमरों को परीक्षा केंद्र बनाया गया है, तो वे अंदर से एक दूसरे के साथ जुडे़ होने चाहिए, ताकि परीक्षार्थियों का ठीक ढंग से निरीक्षण किया जा सके। बोर्ड अधिकारियों को समय रहते इन सभी परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करना चाहिए और जो परीक्षा केंद्र बोर्ड के मापदंडों के अनुसार नहीं हैं उन्हें तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए। परीक्षाओं के संचालन में केवल, स्वच्छ छवि, ईमानदार और चरित्रवान अध्यापकों को ही लगाया जाना चाहिए। बहुत से ऐसे पेशेवर अध्यापक हैं जो अपनी ड्यूटी परीक्षाओं में बोर्ड कर्मचारियों के साथ मिलीभगत से प्रतिवर्ष लगवा लेते हैं, ऐसे अध्यापकों को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। परीक्षा अधीक्षक केवल स्कूलों के प्रिंसीपल और मुख्याध्यापक ही लगाए जाने चाहिए तथा इस ड्यूटी को मैनडेटरी किया जाना चाहिए। यदि प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक किसी कारण इस ड्यूटी पर नहीं जा सकते तो सीनियर पीजीटी को इस ड्यूटी पर भेजा जाना चाहिए। सीबीएससी केवल प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक या सीनियर पीजीटी को ही परीक्षा अधीक्षक की ड्यूटी पर लगाता है और दूसरे इसके परीक्षा केंद्र कम होते हैं और यही कारण है कि  सीबीएससी की परीक्षाओं में नकल का नामोनिशान नहीं है। यदि हिमाचल बोर्ड भी इस नीति का अनुसरण करता है तो मुझे पूरा भरोसा है कि नकल पर काबू पाया जा सकता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पुस्तकों तक ही सीमित है। इसको ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए अध्यापक को स्वयं रोल मॉडल बनना चाहिए, ताकि बच्चों में अच्छे संस्कार बने और वे उचित और अनुचित में भेद कर सकें और नकल को पास होने का अनुचित ढंग समझ कर इसे त्याग दें। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अध्यापकों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। यदि अध्यापक नकल को समाप्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है तो समझ लो कि नकल समाप्त हो गई। ऐसी मानसिकता बनाने के लिए बोर्ड को समय-समय पर ऐसी समस्याओं पर गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए। नकल रोको अभियान में अध्यापकों को अग्रणी किया जाना चाहिए और नकल को समाप्त करने का पूरा श्रेय उन्हीं को दिया जाना चाहिए। स्कूली स्तर जहां परीक्षा केंद्र हैं, वहां पर नकल को रोकने के लिए स्थानीय विशिष्ट व्यक्तियों की एक कमेटी बनाई जानी चाहिए। इसमें सेवानिवृत्त प्रिंसीपल मुख्याध्यापक, अध्यापक तथा अन्य विभागों के सेवानिवृत्त अधिकारी होने चाहिएं जो परीक्षाओं के दौरान नकल रोकने के लिए रणनीति बनाएं तथा उस पर कार्य करें।

 

क्या कभी परीक्षा के दौरान क्लास के दूसरे बच्चों के पेपर में झाँकने का आपका मन किया है? अगर हाँ, तो ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं हुआ। बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाली जॆना, अपनी क्लास के कई बच्चों के नकल करने के बेशर्म रवैए के बारे में इस तरह कहती है: “वे शेखी बघारते हुए बताते हैं कि उन्होंने नकल कैसे की। अगर आप नकल नहीं करते तो वे आपको अजीब निगाहों से देखते हैं!”

अमरीका में किए एक सर्वे से पता चला कि अपनी क्लास में सबसे ज़्यादा नंबर लानेवाले 80 प्रतिशत किशोरों ने कबूल किया कि उन्होंने नकल की थी और इन “सबसे अच्छे नंबर” लानेवालों में से 95 प्रतिशत विद्यार्थी कभी नहीं पकड़े गए। पाँचवीं से बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाले 20,000 से भी ज़्यादा बच्चों का सर्वे लेने के बाद जोसेफसन इंस्टिट्यूट ऑफ एथिक्स इस नतीजे पर पहुँचता है: “ईमानदारी और खराई के मामले में स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है।” नकल करना हर कहीं इतना आम हो गया है कि शिक्षक भी हक्के-बक्के रह जाते हैं! स्कूल के निर्देशक गैरी जे. नील्स ने यहाँ तक कहा: “अब नकल न करनेवालों की संख्या बहुत कम है।”

ज़्यादातर माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई के मामले में ईमानदार रहें। मगर अफसोस कि कई नौजवान नकल करने के लिए अपनी ईमानदारी को ताक पर रख देते हैं। वे कौन-से नए तरीके अपनाते हैं? कुछ नौजवान नकल क्यों करते हैं? आपको इससे दूर क्यों रहना चाहिए?

आधुनिक तकनीक के ज़रिए नकल करना

नए ज़माने के नकल करनेवाले कई धूर्त तरीके अपनाते हैं। किसी का होमवर्क नकल करना या परीक्षा के दौरान चुपके से परचे में से नकल करना, ये सारे तरीके तो आज की आधुनिक तकनीकों और तरकीबों के आगे बिलकुल फीके पड़ जाते हैं। आधुनिक तकनीक में पेजर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से परीक्षा में आए सवालों के जवाब दूसरे व्यक्‍ति से लिए जा सकते हैं; कैलकुलेटर में ऐसे प्रोग्राम बनाए गए हैं, जिसमें “अतिरिक्‍त” जानकारी मिलती है; कपड़ों में बिलकुल छोटे कैमरे छिपे होते हैं जिससे दूसरी जगह मौजूद मददगार तक परीक्षा में आए सवाल पहुँचाए जाते हैं; कुछ आधुनिक कैलकुलेटर ऐसे हैं जो इंफ्रारॆड रेडिएशन के ज़रिए क्लास में बैठे दूसरे विद्यार्थी तक संदेश पहुँचाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी इंटरनॆट साइट्‌स भी हैं, जिनमें किसी भी विषय पर पूरा-का-पूरा जवाबों का परचा पाया जा सकता है!

नकल करने के इस खतरनाक चलन को रोकने और उस पर काबू पाने के लिए शिक्षक काफी कोशिश कर रहे हैं, मगर यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि नकल करने के मतलब के बारे में सभी विद्यार्थियों या शिक्षकों की राय अलग-अलग है। मसलन, जब किसी प्रॉजॆक्ट पर विद्यार्थियों का समूह काम करता है तो इसमें मिलकर ईमानदारी से किए काम और साँठ-गाँठ से बेईमानी के काम के बीच की रेखा, साफ-साफ नज़र नहीं आती। ऐसे भी कुछ विद्यार्थी होते हैं जो समूह का फायदा उठाते हुए सारा काम दूसरों पर छोड़ देते हैं। सरकारी कॉलेज में पढ़नेवाला युजी कहता है, “कुछ विद्यार्थी तो बेहद आलसी होते हैं। वे कुछ भी नहीं करते! फिर भी उन्हें उनके बराबर अंक मिलते हैं जिन्होंने असल में सारी मेहनत की थी। मेरे हिसाब से यह भी नकल करना ही है!”

वे नकल क्यों करते हैं?

एक सर्वे से पता चला कि नकल करने का सबसे बड़ा कारण है, विद्यार्थियों का तैयारी करके न जाना। कुछ मामलों में, स्कूल में एक-दूसरे से होड़ लगाने का माहौल या माता-पिताओं की ऊँची उम्मीदों पर खरे उतरने का दबाव विद्यार्थियों पर इतना ज़्यादा होता है कि वे कहते हैं, उनके पास नकल करने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता। तेरह साल का सैम कहता है: “मेरे मम्मी-पापा के लिए ज़्यादा नंबर लाना ही सब कुछ था। वे मुझसे पूछते थे: ‘तुम्हें गणित में कितने नंबर मिले? तुम अँग्रेज़ी के पेपर में कितने नंबर लाए हो?’ और इन सवालों से मुझे नफरत थी!”

कुछ लोगों पर अच्छे नंबर लाने का लगातार दबाव रहता है इसलिए वे नकल करने लगते हैं। किताब अमरीकी किशोरों की निजी ज़िंदगी (अँग्रेज़ी) कहती है: “जिस व्यवस्था में विद्यार्थियों पर इतना दबाव होता है कि उन्हें किसी विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज़्यादा चिंता अच्छे नंबर लाने की लगी रहती है, और वह भी इतनी कि वे कभी-कभी ईमानदारी को भी ताक पर रख देते हैं, तो ऐसी व्यवस्था में बिलकुल संतुलन नहीं है।” यह बात कई विद्यार्थी मानते हैं। आखिर कौन परीक्षा में फेल होना चाहेगा या खासकर कौन फिर से उसी क्लास में बैठना चाहेगा। हाई स्कूल का एक विद्यार्थी जिमी कहता है, “कुछ बच्चे तो फेल होने से इतना डरते हैं कि सही जवाब मालूम होने पर भी वे नकल करते हैं, सिर्फ यह तय करने के लिए कि उनके जवाब गलत ना जाएँ।”

आज ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग ईमानदारी के स्तर को छोड़कर नकल कर रहे हैं तो ऐसा लग सकता है कि नकल करने में कोई नुकसान नहीं है। कभी-कभी तो शायद इसके फायदे ही फायदे नज़र आएँ। सत्रह साल का ग्रेग कहता है, “कल मैंने अपनी एक क्लास में एक बच्चे को नकल करते देखा। आज जब हमें अपना-अपना पेपर मिला तो उसको मुझसे ज़्यादा नंबर मिले थे।” कई लोग अपने दोस्तों की देखा-देखी नकल करने लगते हैं। युजी कहता है, “कुछ बच्चे सोचते हैं कि ‘अगर दूसरे करते हैं तो मुझे करने में क्या हर्ज़ है?’” लेकिन क्या ऐसी सोच सही है?

ऐसी लत जो एक धोखा है

ज़रा नकल करने की तुलना चोरी से कीजिए। आज चोरी करना आम हो गया मगर क्या यह बात चोरी करने को जायज़ ठहराती है? ‘हरगिज़ नहीं।’ आप शायद ऐसा कहें, खासकर तब जब आपका पैसा चुराया गया हो! दरअसल नकल करके हम उस बात का श्रेय ले रहे होते हैं, जिसके हम हकदार नहीं। यहाँ तक कि हम उस इंसान का भी नाजायज़ फायदा उठा रहे होते हैं, जिसने ईमानदारी से काम किया था। हाल ही में हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म करनेवाला टॉमी कहता है, “नकल करना बिलकुल सही नहीं है। ऐसा करके दरअसल आप कह रहे होते हैं कि ‘मुझे उन विषयों की अच्छी जानकारी है’ जबकि हकीकत में आप कुछ नहीं जानते। तो यह एक झूठ ही हुआ।” इस मामले में बाइबल का नज़रिया में बिलकुल साफ बताया गया है: “एक दूसरे से झूठ मत बोलो।”

नकल करना एक ऐसी लत बन सकती है, जिसे छुड़ाना बहुत मुश्‍किल हो सकता है। जॆना कहती है: “नकल करनेवाले यह सीख लेते हैं कि पास होने के लिए उन्हें पढ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए वे पूरी तरह से नकल करने पर निर्भर रहते हैं। लेकिन ज़िंदगी में जब उन्हें अपने बलबूते कुछ करना पड़ता है, तो वे ठीक से काम नहीं कर पाते।”

में दिया गया सिद्धांत वाकई गौर करने लायक है: “मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।” स्कूल में नकल करनेवालों को ये अंजाम भुगतने पड़ सकते हैं, जैसे उनका विवेक उन्हें कचोटने लगे, दोस्तों का उन पर से भरोसा उठ जाए और पढ़ने की क्रिया को टालने की वजह से उनकी पढ़ने-लिखने की क्षमता कमज़ोर पड़ जाए। जिस तरह कैंसर शरीर में फैलकर जानलेवा हो जाता है, उसी तरह धोखाधड़ी करने की आदत ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं पर असर कर सकती है, और यह अच्छे-से-अच्छे रिश्‍तों में भी ज़हर घोल सकती है। लेकिन इसका सबसे बुरा असर परमेश्‍वर के साथ आपके रिश्‍ते पर पड़ेगा क्योंकि उसे धोखाधड़ी से सख्त नफरत है।—

नकल करनेवाले दरअसल खुद को ही धोखा देते हैं। अपने काम से वे दिखाते हैं कि वे प्राचीन नगर यरूशलेम के उन भ्रष्ट शासकों की तरह हैं: “हम ने झूठ की शरण ली और मिथ्या की आड़ में छिपे हुए हैं।”  लेकिन यह हकीकत है कि नकल करनेवाला अपना काम, परमेश्‍वर की नज़रों से छिपा नहीं सकता।

नकल मत कीजिए!

कई मामलों में नौजवान नकल करने के लिए बहुत दिमाग लड़ाते और मेहनत करते हैं। इसके बजाए वे ईमानदारी से पढ़ाई करने में उतना ही दिमाग लगाएँ और मेहनत करें तो ज़्यादा फायदा पा सकते हैं। जैसा कि 18 साल की ऐबी कहती है, “अगर वे नकल करने के बजाय पढ़ाई करने में खुद को लगाएँ तो ज़्यादा अच्छे नंबर ला सकते हैं।”

यह सच है कि नकल करने का प्रलोभन ज़बरदस्त होता है। लेकिन गलत राह की ओर ले जानेवाले ऐसे फँदे से दूर रहिए! आप यह कैसे कर सकते हैं? सबसे पहले, याद रखिए कि आप स्कूल क्यों जाते हैं—सीखने के लिए। बेशक, ऐसा लग सकता है कि उन सारी बातों को सीखने का क्या फायदा, जिनका आप शायद ही कभी इस्तेमाल करें। मगर जो इंसान पढ़ाई करने से जी चुराता है और नकल करता है, वह नयी-नयी बातों को सीखने और ज्ञान का व्यावहारिक तरीके से इस्तेमाल करने की अपनी काबिलीयत को कमज़ोर कर देता है। सचमुच की समझदारी बिना मेहनत के हासिल नहीं की जा सकती; उसे पाने के लिए कोशिश करनी पड़ती है। बाइबल कहती है: “सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।” जी हाँ, आपको अपनी पढ़ाई और उसकी तैयारी को गंभीरता से लेना चाहिए। जिमी सलाह देता है: “परीक्षा से पहले पढ़ाई करनी ही चाहिए। इससे आपमें आत्म-विश्‍वास बढ़ेगा कि आप सवालों के जवाब जानते हैं।”

बेशक कभी-कभी हो सकता है कि आप सभी जवाब न जानते हों, जिसकी वजह से आपको नंबर कम मिले। लेकिन अगर आप अपने सिद्धांतों से समझौता न करें तो आप देख सकेंगे कि सुधरने के लिए आप और क्या कर सकते हैं।—

युजी, जिसका पहले भी ज़िक्र किया गया है, एक यहोवा का साक्षी है। वह बताता है कि जब नकल करने के लिए क्लास के बच्चों की मदद करने का उस पर दबाव आता है तो वह क्या करता है: “सबसे पहले मैं उन्हें बता देता हूँ कि मैं एक साक्षी हूँ। और इससे मुझे काफी मदद मिली है क्योंकि वे जानते हैं कि यहोवा के साक्षी ईमानदार हैं। अगर कोई मुझसे परीक्षा के दौरान किसी सवाल का जवाब पूछता है तो मैं साफ मना कर देता हूँ। फिर बाद में उसे समझाता हूँ कि मैंने क्यों ऐसा किया।”

युजी, इब्रानियों को कहे प्रेरित पौलुस के कथन से सहमत है: “हम सब बातों में अच्छी चाल [या “ईमानदारी से,” NW] चलना चाहते हैं।” (इब्रानियों 13:18) अगर आप ईमानदारी के ऊँचे स्तर पर टिके रहते हैं और नकल करने से इनकार करके समझौता नहीं करते तो इससे आप जो अच्छे नंबर हासिल करेंगे, उन नंबरों की असली कीमत होगी। उस समय आप अपने माता-पिता को सबसे बेहतरीन तोहफा दे रहे होंगे और वह है, मसीही खराई का सबूत। (3 यूहन्‍ना 4) इसके अलावा, आप एक शुद्ध विवेक बनाए रखते हैं और इस बात से खुश रहते हैं कि आपने यहोवा परमेश्‍वर के दिल को खुश किया है।

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भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

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भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार पर निबंध (Essay On Corruption In Hindi) :

भुमिका : संसार में जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसकी आत्मा इतनी अधिक सात्विक , उसके विचार इतने कोमल होते हैं और उनकी बुद्धि इतनी निर्मल होती है कि अगर उसे भगवान कहा जाये तो भी कुछ गलत नहीं होता है। इसी वजह से ही तो कुछ लोग बच्चों को बाल-गोपाल भी कहते हैं।

जिस तरह से वह सभी के संपर्क में आता है तो उसके विचारों और बुद्धि में भी परिवर्तन होने लगता है। इसकी वजह होती है कि वह समाज में जो कुछ भी देखता है सुनता है और अनुभव करता है उसी की तरह ढलता चला जाता है। एक दिन वह बालक या तो उच्च स्थान पर पहुंच जाता है या तो दुराचारी बनकर समाज पर एक कलंक बन जाता है।

किसी भी देश के विकास के रास्ते में उस देश की समस्याएं बहुत ही बड़ी बाधाएं होती हैं। इन सभी समस्याओं में सबसे प्रमुख समस्या है भ्रष्टाचार की समस्या। जिस राष्ट्र या समाज में भ्रष्टाचार का दीमक लग जाता है वह समाज रूपी वृक्ष अंदर से बिलकुल खाली हो जाता है और उस समाज व राष्ट्र का भविष्य अंधकार से घिर जाता है।

इस क्षेत्र में भारत बहुत ही दुर्भाग्यशाली है क्योंकि उस पर यह समस्या पूरी तरह से छाई हुई है। अगर उचित समय पर इसका समाधान नहीं ढूंढा गया तो इसके बहुत ही भयंकर परिणाम निकलेंगे। वर्तमान समय में भ्रष्टाचार हमारे देश में पूरी तरह से फैल चुका है। भारत देश में आज के समय लगभग सभी प्रकार की आईटी कंपनियां , बड़े कार्यालय , अच्छी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी आज भारत पूरी तरह से विकसित होने की दौड़ में बहुत पीछे है। इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है।

भ्रष्टाचार का अर्थ : भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ होता है – आचार से अलग या भ्रष्ट होना। अत: यह भी कहा जाता है कि समाज स्वीकृत आचार संहिता की अवहेलना करके दूसरों को कष्ट पहुँचाकर अपने निजी स्वार्थों और इच्छाओं को पूरा करना ही भ्रष्टाचार कहलाता है। अगर दुसरे शब्दों में कहा जाये तो भ्रष्टाचार वह निंदनीय आचरण होता है जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य अपने कर्तव्य को भूलकर अनुचित रूप से लाभ प्राप्त करने का प्रयास करने लगता है।

भाई-भतीजावाद , बेरोजगारी , गरीबी इसके दुष्परिणाम हैं जो लोगों को भ्रष्टाचार की वजह से भोगने पड़ते हैं। जो मनुष्य का दुराचार होता है वहीं अपना व्यापक रूप धारण करके भ्रष्टाचार की जगह को ग्रहण कर लेता है। कुछ लोग भ्रष्टाचार को बहुत ही संकुचित अर्थों में समझाते हैं।

अगर मैं अपने विचारों को व्यक्त करूं तो भ्रष्टाचार वह बुराई होती है जो समाज को अंदर-ही-अंदर खोखला करती रहती है। वास्तव में भ्रष्टाचार की स्थिति भी एक राक्षस की तरह होती है जिसमें काला बाजार उनका दूषित ह्रदय होता है और मिलावट होता है उनका पेट।

रिश्वत भ्रष्टाचार के हाथ हैं और व्यवहार और अनादर इसके पैर हैं , सिफारिश इसकी जीभ है तो शोषण इसके कठोर दांत हैं। यह राक्षस बेईमानी की आँखों से देखता है और कुनबापरस्ती कानों से सभी को सुनता है और अन्याय की नाक से सूँघता है। जब भ्रष्टाचार रूपी राक्षस अपना रूप धारण करके निकलता है तो समाज रूपी देवता भी घबरा जाता है।

भ्रष्टाचार के मूल कारण : हर बड़ी समस्या के पीछे कोई-न-कोई बड़ा कारण अवश्य होता है। इसी तरह से भ्रष्टाचार के पीछे भी बहुत से कारण हैं। वस्तुत: जहाँ पर सुख और एश्वर्य पनपता है वहीं पर भ्रष्टाचार भी पनपता है। भ्रष्टाचार के मूल में मानव का कुंठित अहंभाव , स्वार्थपरता , भौतिकता के प्रति आकर्षण , कुकर्म और अर्थ की प्राप्ति का लालच छुपा हुआ होता है।

आज के मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली इच्छाएं भी भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण होती हैं। इसके आलावा अपनों का पक्ष लेना भी भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण है। किसी कवि ने भी कहा है कि परिजनों में पक्षपात तो होता ही है और यही पक्षपात भ्रष्टाचार का मूल कारण बनता है। भ्रष्टाचार को उत्पन्न करने का कारण एक प्रकार से मनुष्य खुद होता है।

जब अंग्रेज भारत से गये थे तो भारत में भ्रष्टाचार की बहुत कम मात्रा थी। अंग्रेज भारत में कुछ परिक्षण छोड़ गये थे लेकिन भारत को इस बात पर पूरा विश्वास था कि भारत के स्वतंत्र होते ही वे उनका पूरी तरह से नाश कर देंगे लेकिन इसका बिलकुल उल्टा हुआ था। भ्रष्टाचार कम होने की जगह पर और अधिक बढ़ जाता है। भारत के वासी और भारत की सरकार दोनों ने ही स्वतंत्रता के असली अर्थ को नहीं समझा हैं।

भ्रष्टाचार की व्यापकता एवं प्रभाव : भ्रष्टाचार का प्रभाव और क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। आज के समय में कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ पर भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ों को न फैला रखा हो। भ्रष्टाचार की गिरफ्त में व्यक्ति , मनुष्य , समाज , राष्ट्र यहाँ तक की अंतर्राष्ट्रीय भी फंसे हुए हैं। भ्रष्टाचार कण-कण और घट-घट में श्री राम की तरह समाया हुआ है।

ऐसा लगता है जैसे इसके बिना संसार में कोई भी काम नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक क्षेत्र तो पूरी तरह से भ्रष्टाचार का घर ही बन चुका है। आज के समय में चाहे विधायक हो या संसद हो सभी बाजार में रखी वस्तुओं की तरह बिक रहे हैं। आज के समय में भ्रष्टाचार के बल पर ही सरकारे बनाई और गिराई जाती हैं।

आज के समय में तो पुजारी भी भक्तों की स्थिति को देखकर ही फूल डालता है। किसी भी धार्मिक स्थल पर जाकर देखा जा सकता है कि जो लोग धर्मात्मा कहलाते हैं वही लोग भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकियाँ लगाते हैं। भ्रष्टाचार ने आर्थिक क्षेत्र में तो कमाल ही कर दिया है। आज के समाज में करोड़ों की रिश्वत लेने वाला व्यक्ति सीना तान कर चलता है , अरबों का घोटाला करने वाला नेता समाज में सम्मानीय बना रहता है।

चुरहट कांड , बोफोर्स कांड , मन्दिर कांड , मंडल कांड और चारा कांड ये सभी भ्रष्टाचार के ही भाई बन्धु होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। योग्य छात्र को ऊँची कक्षा में दाखिला नहीं मिल पाता है लेकिन अयोग्य छात्र भ्रष्टाचार का सहारा लेकर उपर तक पहुंच जाते हैं लेकिन योग्य छात्र ऐसे ही रह जाते हैं।

जब मनुष्य स्वार्थ में अँधा हो जाता है तो वह अभिमान के नशे में झुमने लगता है , वह कामवासना से वशीभूत होकर उचित और अनुचित में फर्क करना छोड़ देता है , वह धर्म कर्म को छोड़कर नास्तिकता और अकर्मण्यता के संकीर्ण पथ पर आरूढ़ हो जाता है। करुणा और सहानुभूति की भावना को त्यागकर निर्दय और कठोर बन जाता है।

वह धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में फंस जाता है कि जिससे निकलना उसके लिए असंभव हो जाता है। भ्रष्टाचार की वजह से सिर्फ मनुष्य की ही नहीं बल्कि राष्ट्र की भी हानि होती है। भ्रष्टाचार कुछ इस तरह से भारत में दीमक की तरह फैल चुका है कि इसके प्रभाव बता पाना बहुत मुश्किल है।

भले ही कोई ढोंगी बाबा हो या कोई रोड , ईमारत या पुल बनाने वाला कॉन्ट्रेक्टर का काम हो हर जगह भ्रष्टाचार दिख ही जाता है। भारत की बहुत सी जगहों पर धर्म सम्प्रदाय , आस्था और विश्वास के नाम पर लोगों का शोषण किया जा रहा है। सरकारी दफ्तरों में पैसे या घूस न देने पर काम पूरे नहीं होते हैं।

दुकानों में मिलावट का सामान मिल रहा है और कई कंपनियों का सामान खाने के लायक न होने पर भी भ्रष्टाचार के कारण दुकानों पर मिल रहा है। कुछ पैसों के लिए बड़े-बड़े कर्मचारी और नेता गलत चीजों को पास कर देते हैं जिसका प्रभाव अक्सर आम आदमी पर पड़ता है।

भ्रष्टाचार कम इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि भ्रष्टाचार हर किसी की आदत बन चुका है। आज के समय में भ्रष्टाचार होने पर लोगों को लगता है कि यह तो आम बात है। जब तक भारत देश से भ्रष्टाचार मुक्त नहीं होगा तब तक हम भारत को एक विकसित देश नहीं बना सकते हैं। आज के समय में भ्रष्टाचार की वजह से सरकार द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक काम पूरे नहीं हो पाते हैं।

भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय : भ्रष्टाचार को रोकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योंकि जब-जब इसे रोकने के लिए कदम उठाये जाते हैं तब-तब कुछ दिनों तक व्यवस्था ठीक प्रकार से चलती है लेकिन बाद में फिर से व्यवस्था में भ्रष्टाचार आ जाता है। भ्रष्टाचार एक संक्रामक रोग की तरह होता है। यह एक व्यक्ति से शुरू होता है और पूरे समाज में फैल जाता है।

अगर भ्रष्टाचार को रोकना है तो फिर से समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी। जब तक हमारे जीवन में नैतिकता नहीं आएगी तब तक हमारा भौतिकवादी दृष्टिकोण नहीं बदल सकता है। जब तक हमारे जीवन में नैतिकता नहीं आएगी तब तक हमारे जीवन की सारी बातें केवल कल्पना बनकर ही रह जाएँगी।

इसी वजह से हमें हर व्यक्ति के अंदर नैतिकता के लिए सम्मान और श्रद्धा को उत्पन्न करना होगा। समाज से भ्रष्टाचार को कम करने के लिए ईमानदार लोगों को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि उन्हें देखकर दुसरे लोग भी उनकी होड़ करने लगें हैं और ईमानदारी के लिए लोगों के मनों में आस्था जागने लगे।

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सख्ती के कानूनों और दंडों की व्यवस्था की जानी चाहिए। आज के समय में दंड व्यवस्था इतनी कमजोर हो गयी है कि अगर कोई व्यक्ति रिश्वत लेता पकड़ा जाता है तो दंड से बचने के लिए रिश्वत देकर बच जाता है। ऐसी स्थिति में भी भ्रष्टाचार को बहुत बढ़ावा मिलता है।

इसके साथ ही किसी भी नए मंत्री की नियुक्ति के समय चल और अचल संपत्ति का पूरी तरह से ब्योरा करना चाहिए। सरकार को निष्पक्ष समिति का उपयोग करना चाहिए ताकि वे बड़े-बड़े लोगों पर लगे आरोपों की जाँच कर सकें। लगभग सभी केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों को 7 वें वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बहुत हद तक अच्छा वेतन मिल रहा है।

अभी भी राज्य सरकार के कर्मचारियों को ठीक तरह से वेतन नहीं मिल पाया है। लेकिन वेतन ठीक प्रकार से मिलने के बाद भी भ्रष्टाचार अब दफ्तरों में एक आदत बन चुकी है जिसकी वजह से भ्रष्टाचार बढ़ता चला जाता है। इसलिए सोच समझकर और सही समय पर वेतन बढ़ाया जाना चाहिए जिससे कर्मचारियों के मन में भ्रष्टाचार की भावना उत्पन्न न हो सके।

बहुत सारे सरकारी दफ्तरों में जरूरत से बहुत कम कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं जिस वजह से काम करने वाले कर्मचारियों पर भार बढ़ जाता है। इस तरह से दो तरह की असुविधाएं उत्पन्न होती हैं पहले आम आदमी का काम सही समय पर पूर्ण नहीं हो पाता है और दूसरा काम को जल्दी पूर्ण कराने के लिए लोग भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाते हैं।

इस स्थिति में जो लोग घूस देते हैं उनका काम सबसे पहले हो जाता है और जो लोग घूस नहीं देते हैं उनका काम पूरा होने में साल भर का समय लग जाता है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हर विभाग में भ्रष्टाचार के विरुद्ध काम करने वाले आयोग बनाने चाहिए जो ऐसे अनैतिक कार्यों पर ध्यान रख सकें। आज के समय में सभी कार्यालयों में कैमरे लगाए जाते हैं जिससे कार्यालय में निगरानी रखी जा सके।

उपसंहार : भ्रष्टाचार को खत्म करना केवल सरकार का ही नहीं बल्कि हम सब का कर्तव्य बनता है। आज के समय हम सभी को एक साथ मिलकर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए प्रयास करने चाहियें। हर मनुष्य को सिर्फ अपने स्वार्थों तक सिमित नहीं रहना चाहिए बल्कि दुसरे लोगों के सुख को अपना सिद्धांत बनाकर चलना चाहिए तभी हम कुछ हद तक भ्रष्टाचार को कम कर सकेंगे।

यह बात स्पष्ट हैं कि जब तक भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म नहीं किया जायेगा तब तक राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता है। भ्रष्टाचार की वजह से ही आज के समय में अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है। भ्रष्टाचार कभी भी देश की स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकता है। जब भारत से भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा तो भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

अनैतिक तरीको का इस्तेमाल कर दूसरो से कुछ फायदा प्राप्त करना भ्रष्टाचार कहलाता है। देश और व्यक्ति के विकास में ये अवरोध का एक बड़ा कारक बनता जा रहा है। आप इस तरह के निबंधों से अपने बच्चों को घर और स्कूलों में भ्रष्टाचार के बारे में अवगत करा सकते है।

भ्रष्टाचार पर निबंध (करप्शन एस्से)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hin

Find below some essays on Corruption in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, 400 and 500 words.

भ्रष्टाचार पर निबंध 1 (100 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hin

भ्रष्टाचार एक जहर है जो देश, संप्रदाय, और समाज के गलत लोगों के दिमाग में फैला होता है। इसमें केवल छोटी सी इच्छा और अनुचित लाभ के लिये सामान्य जन के संसाधनों की बरबादी की जाती है। इसका संबंध किसी के द्वारा अपनी ताकत और पद का गैरजरुरी और गलत इस्तेमाल करना है, फिर चाहे वो सरकारी या गैर-सरकारी संस्था हो। इसका प्रभाव व्यक्ति के विकास के साथ ही राष्ट्र पर भी पड़ रहा है और यही समाज और समुदायों के बीच असमानता का बड़ा कारण है। साथ ही ये राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुप से राष्ट्र के प्रगति और विकास में बाधा भी है।

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार पर निबंध 2 (150 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार से व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति, शक्ति और सत्ता का गलत इस्तेमाल अपनी आत्म संतुष्टि और निजी स्वार्थ की प्राप्ति के लिये करता है। इसमें सरकारी नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर फायदा पाने की कोशिश होती है। भ्रष्टाचार की जड़े समाज में गहराई से व्याप्त हो चुकी है और लगातार फैल रही है। ये कैंसर जैसी बीमारी की तरह है जो बिना इलाज के खत्म नहीं होगी। इसका एक सामान्य रुप पैसा और उपहार लेकर काम करना दिखाई देता है। कुछ लोग अपने फायदे के लिये दूसरों के पैसों का गलत इस्तेमाल करते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त होते है और साथ ही अपनी छोटी सी की पूर्ति के लिये किसी भी हद तक जा सकते है।


 

भ्रष्टाचार निबंध 3 (200 शब्द

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindiहम सभी भ्रष्टाचार से अच्छे तरह वाकिफ है और ये अपने देश में नई बात नहीं है। इसने अपनी जड़ें गहराई से लोगों के दिमाग में बना ली है। ये एक धीमे जहर के रुप में प्राचीन काल से ही समाज में रहा है। ये मुगल साम्राज्य के समय से ही मौजूद रहा है और ये रोज अपनी नई ऊँचाई पर पहुँच रहा है साथ ही बड़े पैमाने पर लोगों के दिमाग पर हावी हो रहा है। समाज में सामान्य होता भ्रष्टाचार एक ऐसा लालच है जो इंसान के दिमाग को भ्रष्ट कर रहा है और लोगों के दिलों से इंसानियत और स्वाभाविकता को खत्म कर रहा है।

भ्रष्टाचार कई प्रकार का होता है जिससे अब कोई भी क्षेत्र छुटा नहीं है चाहे वो शिक्षा, खेल, या राजनीति कुछ भी हो। इसकी वजह से लोग अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझते। चोरी, बेईमानी, सार्वजनिक संपत्तियों की बरबादी, शोषण, घोटाला, और अनैतिक आचरण आदि सभी भ्रष्टाचार की ही ईकाई है। इसकी जड़े विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में व्याप्त है। समाज में समानता के लिये अपने देश से भ्रष्टाचार को पूरी तरह से मिटाने की जरुरत है। हमें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति निष्ठावान होना चाहिये और किसी भी प्रकार के लालच में नहीं पड़ना चाहिये।

भ्रष्टाचार पर निबंध 4 (250 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

वर्तमान में ‘भ्रष्टाचार’ फैलने वाली बीमारी की तरह हो चुका है जो समाज में हर तरफ दिखाई देता है। भारत के वो महान नेता जिन्होंने अपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराईयों को मिटाने में लगा दिया, लेकिन ये शर्म की बात है कि आज उनके दिखाये रास्तों की अनदेखी कर हम अपनी जिम्मेदारियों से भागते है। धीरे-धीरे इसकी पैठ राजनीति, व्यापार, सरकार और आमजनों के जीवन पर बढ़ती जा रही है। लोगों की लगातार पैसा, ताकत, पद और आलीशान जीवनशैली की भूख की वजह से ये घटने के बजाय दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

पैसों की खातिर हमलोग अपनी वास्तविक जिम्मेदारी को भूल चुके है। हमलोग को ये समझना होगा कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता साथ ही ये एक जगह टिकता भी नहीं है। हम इसे जीवनभर के लिये साथ नहीं रख सकते, ये केवल हमें लालच और भ्रष्टाचार देगा। हमें अपने जीवन में मूल्यों पर आधारित जीवन को महत्व देना चाहिये ना कि पैसों पर आधारित। ये सही है कि सामान्य जीवन जीने के लिये ढ़ेर सारे पैसों की आवश्कता होती है जबकि सिर्फ अपने स्वार्थ और लालच के लिये ये सही नहीं है।


 

भ्रष्टाचार पर निबंध 5 (300 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

जैसा कि हम सभी जानते है कि भ्रष्टाचार बहुत बुरी समस्या है। इससे व्यक्ति के साथ-साथ देश का भी विकास और प्रगति रुक जाता है। ये एक सामाजिक बुराई है जो इंसान की सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक क्षमता के साथ खेल रहा है। पद, पैसा और ताकत के लालच की वजह से ये लगातार अपनी जड़े गहरी करते जा रहा है। अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिये शक्ति, सत्ता, पद, और सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग है भ्रष्टाचार। सूत्रों के मुताबिक, पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान 85वाँ है।

भ्रष्टाचार सबसे अधिक सिविल सेवा, राजनीति, व्यापार और दूसरे गैर कानूनी क्षेत्रों में फैला है। भारत विश्व में अपने लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये प्रसिद्ध है लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से इसको क्षति पहुँच रही है। इसके लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार हमारे यहाँ के राजनीतिज्ञ है जिनको हम अपनी ढ़ेरों उम्मीदों के साथ वोट देते है, चुनाव के दौरान ये भी हमें बड़े-बड़े सपने दिखाते है लेकिन चुनाव बीतते ही ये अपने असली रंग में आ जाते है। हमे यकीन है कि जिस दिन ये राजनीतिज्ञ अपने लालच को छोड़ देंगे उसी दिन से हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा।

हमें अपने देश के लिये पटेल और शास्त्री जैसे ईमानदार और भरोसेमंद नेता को चुनना चाहिए क्योंकि केवल उन्हीं जैसे नेताओं ने ही भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम किया। हमारे देश के युवाओं को भी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये आगे आना चाहिये साथ ही बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये किसी ठोस कदम की आवश्यकता है।

 

भ्रष्टाचार पर निबंध 6 (400 शब्द)

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार समाज में तेजी से फैलने वाली बीमारी है जिसने बुरे लोगों के दिमाग में अपनी जड़े जमा ली है। कोई भी जन्म से भ्रष्ट नहीं होता बल्कि अपनी गलत सोच और लालच के चलते धीरे-धीरे वो इसका आदी हो जाता है। यदि कोई परेशानी, बीमारी आदि कुछ आए तो हमें धैर्य और भरोसे के साथ उसका सामना करना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी बुरा काम नहीं करना चाहिए। किसी के एक गलत कदम से कई सारी जिन्दगीयाँ प्रभावित होती है। हम एक अकेले अस्तित्व नहीं है इस धरती पर हमारे जैसे कई और भी है इसलिये हमें दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए और सकारात्मक विचार के साथ जीवन को शांति और खुशी से जीना चाहिए।

आज के दिनों में, समाज में बराबरी के साथ ही आमजन के बीच में जागरुकता लाने के लिये नियम-कानून के अनुसार भारत सरकार ने गरीबों के लिए कई सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई है। जबकि, सरकारी सुविधाएं गरीबों की पहुँच से दूर होती जा रही है क्योंकि अधिकारी अंदर ही अंदर गठजोड़ बना कर गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं का बंदरबाँट कर रहे है। अपनी जेबों को भरने के लिये वो गरीबो का पेट काट रहे है।

समाज में भ्रष्टाचार के कई कारण है, आज के दिनों में राजनीतिज्ञ सिर्फ अपने फायदे की नीति बनाते है न कि राष्ट्रहित में। वो बस अपने को प्रसिद्ध करना चाहते है जिससे उनका फायदा होता रहे, उन्हें जनता के हितों और जरुरतों की कोई परवाह नहीं। आज इंसानियत का नैतिक पतन हो रहा है और सामाजिक मूल्यों में हरास हो रहा है। भरोसे और ईमानदारी में आयी इस गिरावट की वजह से ही भ्रष्टाचार अपने पाँव पसार रहा है।

भ्रषटाचार को सहने की क्षमता आम जनता के बीच बढ़ चुकी है। इसकी खिलाफत करने के लिये समाज में कोई मजबुत लोक मंच नहीं है, ग्रामीण क्षेत्रों में फैली अशिक्षा, कमजोर आर्थिक ढ़ाचाँ, आदि कई कारण भी जिम्मेदार है भ्रष्टाचार के लिये। सरकारी कर्मचारियों का कम वेतनमान उन्हें भ्रष्टाचार की ओर विमुख करता है। सरकार के जटिल कानून और प्रक्रिया लोगों को सरकारी मदद से दूर ले जाते है। चुनाव के दौरान तो ये अपने चरम पर होता है। चालाक नेता हमेशा गरीब और अनपढ़ों को ख्याली पुलाव में उलझाकर उनका वोट पा लेते है उसके बाद फिर चंपत हो जाते है।


 

भ्रष्टाचार पर निबंध 7 (500 शब्द

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार एक बीमारी की तरह देश में ही नहीं वरन् विदेश में भी फैलता जा रहा है। भारतीय समाज में ये सबसे तेजी से उभरने वाला मुद्दा है। सामान्यतः इसकी शुरुआत और प्रचार-प्रसार मौकापरस्त नेताओं द्वारा शुरु होती है जो अपने निजी स्वार्थों की खातिर देश को खोखला कर रहे है। वो देश की संपदा को गलत हाथों में बेच रहे है साथ ही इससे बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल हो रही है।

वो अपने व्यक्तिगत फायदों के लिये भारत की पुरानी सभ्यता तथा संसकृति को नष्ट कर रहे है। मौजूदा समय में जो लोग अच्छे सिद्धांतों का पालन करते है दुनिया उन्हें बेवकूफ समझती है और जो लोग गलत करते है साथ ही झूठे वादे करते है वो समाज के लिये अच्छे होते है। जबकि, सच ये है कि कदाचारी सीधे, साधारण, और निर्दोष लोगों को धोखा देते है और उनके दिमाग पर हावी भी रहते है।

भ्रषटाचार दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि अधिकारियों, अपराधियों और नेताओं के बीच में सांठगांठ होती है जो देश को कमजोर करते जा रही है। भारत को 1947 में आजादी मिली और वो धीरे-धीरे विकास कर रहा था कि तभी बीच में भ्रष्टाचार रुपी बीमारी फैली और इसने बढ़ते भारत को शुरु होते ही रोक दिया। भारत में एक प्रथा लोगों के दिमाग में घर कर गई है कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं में बिना रिश्वत दिये अपना काम नहीं किया जा सकता और इसी सोच की वजह से परिस्थिति और गिरती ही जा रही है।

कदाचार हर जगह है चाहे वो अस्पताल, शिक्षा, सरकारी कार्यालय कुछ भी हो कोई इससे अछुता नहीं है। सबकुछ व्यापार हो चुका है पैसा गलत तरीके से कमाया जा रहा है शिक्षण संस्थान भी भष्टाचार के लपेटे में है, यहाँ विद्यार्थीयो को सीट देने के लिये पैसा लिया जाता है चाहे उनके अंक इस लायक हो या न हो। बेहद कमजोर विद्यार्थी भी पैसों के दम पर किसी भी कॉलेज में दाखिला पा जाते है इसकी वजह से अच्छे विद्यार्थी पीछे रह जाते है और उन्हें मजबूरन साधारण कॉलेज में पढ़ना पड़ता है।

आज के दिनों में गैर-सरकारी नौकरी सरकारी नौकरी से बेहतर साबित हो रही है। प्राईवेट कंपनीयाँ किसी को भी अपने यहाँ क्षमता, दक्षता, तकनीकी ज्ञान और अचछे अंक के आधार पर नौकरी देती है जबकि सरकारी नौकरी के लिये कई बार घूस देना पड़ता है जैसे टीचर, क्लर्क, नर्स, डॉक्टर आदि के लिये। और घूस की रकम हमेशा बाजार मूल्य के आधार पर बढ़ती रहती है। इसलिये कदाचार से दूर रहे और सदाचार के पास रहें तो भ्रटाचार अपने-आप समाप्त हो जाएगा।

भ्रष्टाचार पर निबंध-Essay On Corruption In Hindi

भ्रष्टाचार अर्थात भ्रष्ट + आचार। भ्रष्ट यानी बुरा या बिगड़ा हुआ तथा आचार का मतलब है आचरण। अर्थात भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है वह आचरण जो किसी भी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो।

जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत आचरण करने लगता है तो वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी कहलाता है। आज भारत जैसे सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश में भ्रष्टाचार अपनी जड़े फैला रहा है।
आज भारत में ऐसे कई व्यक्ति मौजूद हैं जो भ्रष्टाचारी है। आज पूरी दुनिया में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 94वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि।

भ्रष्टाचार के कारण : भ्रष्टाचार के कई कारण है। जैसे 1. असंतोष – जब किसी को अभाव के कारण कष्ट होता है तो वह भ्रष्ट आचरण करने के लिए विवश हो जाता है।

2. स्वार्थ और असमानता : असमानता, आर्थिक, सामाजिक या सम्मान, पद -प्रतिष्ठा के कारण भी व्यक्ति अपने आपको भ्रष्ट बना लेता है। हीनता और ईर्ष्या की भावना से शिकार हुआ व्यक्ति भ्रष्टाचार को अपनाने के लिए विवश हो जाता है। साथ ही रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद आदि भी भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं।

भारत में बढ़ता भ्रष्टाचार : भ्रष्टाचार एक बीमारी की तरह है। आज भारत देश में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है। इसकी जड़े तेजी से फैल रही है। यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया तो यह पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगा। भ्रष्टाचार का प्रभाव अत्यंत व्यापक है।

जीवन का कोई भी क्षेत्र इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है। यदि हम इस वर्ष की ही बात करें तो ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जो कि भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। जैसे आईपील में खिलाड़ियों की स्पॉट फिक्सिंग, नौकरियों में अच्छी पोस्ट पाने की लालसा में कई लोग रिश्वत देने से भी नहीं चूकते हैं। आज भारत का हर तबका इस बीमारी से ग्रस्त है।

भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय : यह एक संक्रामक रोग की तरह है। समाज में विभिन्न स्तरों पर फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दंड-व्यवस्था की जानी चाहिए। आज भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि व्यक्ति रिश्वत के मामले में पकड़ा जाता है और रिश्वत देकर ही छूट जाता है।

जब तक इस अपराध के लिए को कड़ा दंड नही दिया जाएगा तब तक यह बीमारी दीमक की तरह पूरे देश को खा जाएगी। लोगों को स्वयं में ईमानदारी विकसित करना होगी। आने वाली पीढ़ी तक सुआचरण के फायदे पहुंचाने होंगे।

उपसंहार : भ्रष्टाचार हमारे नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। भ्रष्टाचार से जुड़े लोग अपने स्वार्थ में अंधे होकर राष्ट्र का नाम बदनाम कर रहे हैं।

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