आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद पर निबंध (Essay On Terrorism In Hindi) :

भूमिका : विविधता में एकता भारत की प्रमुख विशेषता है। उक्त विविध जनों को हमारे संविधान ने अपने में समान रूप से समाहित किया है। लेकिन विवध संस्कृतियों के इस अद्भुत सामंजस्य को देखकर बहुत से देश निस्तबद्ध रह जाते हैं। वे इस देश के एकीकरण को तोडकर देश को बिखेरना चाहते हैं।

वे हमारे देश को मिलकर रहता हुआ नहीं देख सकते हैं। वे अपने दलालों को भेजकर हमें तोडना चाहते हैं। हमारे समाज में विविध प्रकार से विघटन करके जनसाधारण को अपने कुकृत्यों से आतंकित कर देते हैं जिसकी वजह से समाज में आतंकवाद छा जाता है। आतंकवाद आधुनिक युग की सबसे भयंकर समस्या है।

आतंकवाद की समस्या सिर्फ हमारे ही देश की नहीं सभी देशों की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। आतंकवादी अपने-अपने गिरोह बनाकर रखते हैं वे किसी भी देश की क़ानूनी व्यवस्था को स्वीकार नही करते हैं। अपनी इच्छा से लोगों की हत्या करते हैं। आज के समय में जब हम विभिन्न समस्याओं के बारे में सोचते हैं तो हमें यह पता चलता है कि हमारा देश अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ है।

एक तरफ भुखमरी , दूसरी तरफ बेरोजगारी, कहीं पर अकाल पड़ रहा है तो कहीं पर बाढ़ अपना प्रकोप दिखा रही है। इन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद की समस्या जो देश रूपी वृक्ष को धीरे-धीरे खोखला करती जा रही है। भारत देश की कुछ अलगाववादी शक्तियाँ और पथ-भ्रष्ट नवयुवक हिंसात्मक रूप से देश के बहुत से क्षेत्रों में दंगा-फसाद कराकर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं।

आतंकवाद का अर्थ :-आतंकवाद दो शब्दों से मिलकर बना होता है – आतंक + वाद। आतंक का अर्थ होता है – भय या डर और वाद का अर्थ होता है – पद्धति। आतंकवाद शब्द आतंक से बनता है। समाज को अपने कुकृत्यों से भयभीत कर देना आतंकवाद कहलाता है। जो उन्हें भयभीत करते हैं वो आतंकवादी कहलाते हैं।

आतंकवादियों का केवल एक ही उद्देश्य होता है सरकार और देश के लोगों में भय उत्पन्न करके अपनी अनुचित बातों को मनवाना। आतंकवादियों का कोई देश , धर्म तथा जाति नहीं होते हैं। आतंकवादी भोले-भले बच्चों , स्त्रियों , बूढों और जवानों की बहुत ही बेरहमी से हत्या कर देते हैं। क़ानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर आतंकवादी देश में आराजकता फैलाते हैं।

इनके कार्यों का विरोध करने वाले व्यक्तियों या उनके विरुद्ध कार्यवाई करने वाले अधिकारीयों को हताहत करके भगा देते हैं जिससे आगे आने वाले उनका विरोध न कर सकें। वे ऐसा करने के बाद किसी समुचित स्थान पर छिप जाते हैं। भारतवर्ष में इस तरह का आतंकवाद कई जगहों पर छाया हुआ है।

आतंकवाद दो प्रकार के होते हैं – राजनितिक आतंकवाद और आपराधिक आतंकवाद। राजनितिक आतंकवाद वह होता है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जनता में डर फैलाता है और आपराधिक आतंकवाद वह होता है जो अपहरण करके पैसे की मांग करता है।

भारत में आतंकवाद की समस्या : भारत में आतंकवाद का मतलब है भारत में आतंक की स्थिति का उत्पन्न होना। भारत में आतंकवाद के लिए देश के कई क्षेत्रों में हिंसात्मक तरीके अपनाये जाते हैं जिससे सरकार देश के विकास के लिए कोई कार्य नहीं कर पाती है। जब भारत निरंतर विकास करने लगता है तो कुछ विदेशी शक्तियाँ भारत के विकास से जलने लगती हैं।

वे भारत के लालची लोगों को पैसा देकर उनसे दंगे-फसाद करवाती हैं जिसकी वजह से देश विकास न कर सके। अधिकतर आतंकवादी रेल पटरियों को उखाडकर , बस के यात्रयों को मारकर , बैंकों को लूटकर , सार्वजनिक स्थानों पर बम्ब फेंककर आदि इन कामों से आतंकवाद फ़ैलाने में सफल हो जाते हैं।

छठे और सातवें दशक में बंगाल , उड़ीसा , आंद्रप्रदेश , बिहार में नक्सलवादी लोग जनता में आतंक फ़ैलाने का काम करते थे , अब नक्सलवादियों का आतंक अन्य प्रान्तों से हटकर आंध्र और मध्यप्रदेश में पहुंच गया है। इस समय में पंजाब और कश्मीर दो ऐसे स्थान है जहाँ पर अब आतकवाद ज्यादा है।

जनता को आतंकवादियों से मुक्ति दिलाने के लिए हमारी सरकार प्रयत्नशील है। कुछ बड़ी शक्तियाँ और पड़ोसी देश हमारे देश में अव्यवस्था को फैलाना चाहते हैं। अगर हमारा देश दो भागों में विभक्त हो जाता है तो उन्हें बहुत प्रसन्नता होगी।

आतंकवादियों की गतिविधियाँ : सशक्त सैन्य शक्ति से सुदृढ सरकार का मुकाबला प्रत्यक्ष सामने आकर करना बिलकुल असंभव है। इसीलिए आतंकवादी किसी भी सरकार व जनता का सामना छिपकर , आतंक दिखाकर , आतंक फैलाकर करते हैं। हमारे यहाँ आतंकवादी किसी सार्वजनिक जगह पर अचानक पहुंचकर अँधा-धुंध गोली-बारी कर देते है।

पटरी पर सोये हुए मजदूर भी आतंकवादियों की गोली के शिकार होते हैं। प्रमुख राजनेताओं , अधिकारीयों , सामाजिक कार्यकर्ताओं को वे अवसर पाकर गोली मारकर मौत के घाट उतार देते हैं। उनके विरोध करने वालों को वे कोई-न-कोई अवसर पाकर या कोई षड्यंत्र रचकर मृत्यु को प्राप्त करा देते हैं।

कई बार आतंकवादी चलती बस को रोककर उसमें बैठे हुए यात्रियों को चुन-चुनकर मार देते हैं जिसकी वजह से लोग बसों में यात्रा करने से घबराते हैं। विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर टाइम बम्ब आदि रखकर आतंक का वातावरण फैलाए रखते हैं।

आतंकवाद के मूल कारण : भारत में आतंकवाद के विकसित होने के अनेक कारण हैं। आतंकवाद की समस्या पिछले एक दशक से शुरू हुई है। आज से दस साल पहले छोटे-छोटे लूटपाट के मामले सामने आते थे लेकिन आज के समय में यह समस्या बहुत बढ़ गयी है आज यह छोटी लूटपाट से मारकाट पर उतर आये हैं।

आतंकवाद के उत्पन्न होने के मूल कारण हैं गरीबी , बेरोजगारी , भुखमरी , और धार्मिक उन्माद। आतंकवाद की गतिविधियों को सबसे अधिक प्रोत्साहन धार्मिक कट्टरता से मिलता है। लोग धर्मों के नाम पर एक-दुसरे का गला काटने से भी पीछे नहीं हटते हैं। धर्म के विपक्षी लोग धर्म मानने वाले लोगो को सहन नहीं कर पाते हैं।

इसी के फल स्वरूप हिन्दू-मुस्लिम , हिन्दू-सिक्ख , मुस्लिम , ईसाई आदि धर्मों के नाम पर बहुत से दंगे-फसाद भड़का दिए जाते हैं। बहुत से अलगाववादी धर्म के नाम पर अलग राष्ट्र की भी मांग करने लगते हैं। इसकी वजह से देश की एकता भी खतरे में पड़ जाती है। कुछ विदेशी ताकतें भारत को कमजोर बनाना चाहती हैं इसलिए वे भारत में अक्सर आतंकवाद को बढ़ावा देती रहती हैं।

आतंकवादियों को बाहर से हथियार भेजे जाते हैं। उनका प्रयोग करके आतंकवादी देश में आतंक का वातावरण पैदा करते हैं। लेकिन अगर अपनी नीति स्पष्ट हो , सुदृढ हो , राष्ट्रिय भावना बलवती हो तो बाहर की कोई शक्ति भारत में हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं कर सकती है इसलिए हमारे देश के नेताओं की ढुलमुल नीति ही हमें आतंकवाद का शिकार बना रही है।

आजकल हिन्दू आतंकवाद भारत में एक नए सिरे से सिर उठा रहा है जिसे कुछ सिरफिरे नेता लोग हवा देकर भारत की एकता और अखण्डता को खतरा पैदा कर रहे है। कश्मीरी आतंकवादियों ने नेहरु जी की कमजोर एवं गलत नीति के कारण सहारा पाया , तो सिख आंतकवादियों का जन्म भी इंदिरा जी की कुटिल नीति से हुआ। जो देशभक्त व निष्ठ्वन थे उन्हें आतंकवाद का शिकार होना पड़ता था। कुछ नेता और अधिकारी अंदर से आतंकवादियों से मिले रहते हैं और दिखावे के लिए उनका विरोध करते हैं।

आतंकवाद पर नियंत्रण : भारत सरकार को आतंकवादी गतिविधियों को खत्म करने के लिए कठोर कदमों को उठाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सबसे पहले कानून व्यवस्था को सुदृढ बनाना चाहिए। जहाँ-जहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा हमारे देश की सीमा को छू रही है, उन समस्त क्षेत्रों की नाकाबंदी की जानी चाहिए जिसकी वजह से आतंकवादी सीमा पार से हथियार , गोला-बारूद और प्रशिक्षण प्राप्त करने में असफल हो जाएँ।

जो युवक और युवतियां अपने रास्ते से भटक चुके हैं उन्हें समुचित प्रशिक्षण देकर उनके लिए रोजगार के बहुत से पर्याप्त अवसर ढूंढने चाहियें। अगर युवा वर्ग को व्यस्त रखने तथा उनकों उनकी योग्यता के अनुरूप कार्य दे दिए जाएँ तो वे कभी भी रास्ते से नहीं भटकेंगे। इसकी वजह से आतंकवादियों को अपने षड्यंत्रों को पूरा करने के लिए जन शक्ति नहीं मिल पायेगी और वे खुद ही समाप्त हो जायेंगे।

साम्प्रदायिकता का जहर : साम्प्रदायिकता आतंकवाद का एक प्रमुख कारण होता है। हमारे देश में कुछ ऐसे लोगों का वर्ग रहता है जो 61 साल की स्वतंत्रता के बाद भी संकीर्ण और कट्टर धार्मिक विचारधारा के शिकार बने हुए हैं। ऐसे लोग ही दुसरे धर्मों के प्रति असहज हो जाते हैं।

ये लोग पुन: धर्म और राजनीति को मिलाने की कोशिश करते हैं। ये सभी धर्म के नाम पर अलग राज्य बनाना चाहते हैं। जो लोग उनकी धार्मिक पद्धति में नहीं आते हैं उनके प्रति वे सभी नफरत की भावना को फैलाते हैं। इस तरह से साम्प्रदायिकता की भावना ही आतंकवाद को जन्म देती है। जो लोग एक सम्प्रदाय के प्रति समर्पित होते हैं वे दूसरे सम्प्रदायों के लोगों से नफरत करते हैं।

जनता का सहयोग : जनता को भी सरकार से सहयोग करना चाहिए। कहीं-भी किसी भी संदिग्ध व्यक्ति अथवा वस्तु को देखते ही उसकी सूचना पुलिस को देनी चाहिए। बस अथवा रेलगाड़ी में बैठते समय यह देख लेना चाहिए कि आस-पास कोई लावारिस वस्तु तो नहीं पड़ी है अथवा रखी है।

जिन व्यक्तियों को आप जानते न हों उनसे कभी भी कोई उपहार नहीं लेना चाहिए। सार्वजनिक स्थल पर भी संदिग्ध आचरण वाले व्यक्ति से हमेशा ही बचकर रहना चाहिए। हम सभी जागरूक रहकर भी आतंकवादियों को आतंक फ़ैलाने से रोक सकते हैं।

दूषित राजनीति : आज के समय में देश असंख्य समस्याओं के लिए हमारी दूषित राजनीति जिम्मेदार होती है। हमारे देश के राजनीतिज्ञ और राजनीति पार्टियाँ देश में धर्म और जाति के नाम पर लोगों को भडकाते हैं और अपनी वोटों को पक्का कर लेते हैं। आज के समय में भी धर्म और जाति के नाम पर उम्मीदवारों को खड़ा किया जाता है।

कालान्तर में जो लोग संकीर्ण और कट्टर बन जाते हैं वही लोग आतंकवादी बन जाते हैं। 11 सितम्बर , 2001 को आतंकवादियों ने न्यूयार्क में स्थित विश्व व्यापर संगठन कार्यालय के दो टावरों और अमेरिका में अमेरिकी रक्षा वभाग के प्रमुख कार्यालय पेंटागन के कुछ क्षेत्रों को विमान द्वारा टक्कर मारकर ध्वस्त कर दिया था।

अमेरिका की यह सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है जिसमें हजारों बेगुनाह लोगों की हत्या हो गयी थी। अमेरिका सरकार इस दुर्घटना के लिए ओसामा बिन लादेन को दोषी मानती है। हमारे देश के 55 हजार लोग पिछले 20 सालों से आतंकवादियों के आतंकवाद के शिकार बन चुके हैं।

सरकार के कदम : कोई भी धर्म किसी की भी निर्मम हत्या की आज्ञा नहीं देता है। हर धर्म मानव से ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र से भी प्यार करना सिखाता है। अत: जो लोग धर्मिक संकीर्णता से ग्रस्त व्यक्तियों का समाज से बहिष्कार किया जाना चाहिए और धार्मिक स्थानों की पवित्रता को अपने स्वार्थ के लिए नष्ट करने वाले लोगों के विरुद्ध सभी धर्मावलम्बियों को एक साथ मिलकर प्रयास करना चाहिए। इसकी वजह से धर्म की ओट में आतंकवाद फ़ैलाने वाले लोगों पर अंकुश लग सकेगा। सरकार को भी धार्मिक स्थलों के राजनीतिक उपयोगों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

विषयों की गंभीरता : अगर आतंकवाद की समस्या को गंभीरता से समाप्त नहीं किया गया तो देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। इस प्रकार से लड़कर सभी समाप्त हो जायेंगे। जिस आजादी को प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया था हम उस आजादी को आपसी वैर भाव की वजह से समाप्त करके अपने ही पैरों पर कुलाढ़ी मार लेंगे। देश फिर से परतंत्रता के बंधन में बंध जायेगा। आतंकवादी हिंसा के बल से हमारा मनोबल तोड़ रहे हैं।

युवकों में बेरोजगारी : जितने भी लोग आतंकवादी बनते हैं वे सभी या तो बेरोजगार होते हैं या फिर आधे पढ़े-लिखे होते हैं। जो लोग आतंकवाद की नीति चलाते हैं वे इन बेरोजगार युवकों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। जब भी कोई युवक अपराधी बन जाता है तो उसका आतंकवाद से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

युवकों का मन और मस्तिष्क अपरिपक्व होते हैं उन्हें किसी भी सांझे में ढाला जा सकता है। युवक जिस प्रकार के लोगों के पास रहते हैं वे खुद भी वैसे ही बन जाते है। पंजाब में जितने भी आतंकवादियों को पकड़ा गया था उन्होंने बेरोजगारी से परेशान होकर इस रास्ते को अपनाया था।

आतंकवाद रोकने के उपाय : आतंकवाद मानवता के नाम पर एक कलंक होता है। आतंकवाद किसी के लिए भी लाभकारी नहीं होता है खुद आतंकवादियों के लिए भी नहीं। आतंकवाद से मानवता को बहुत हानि हो चुकी है। आतंकवाद ने पता नहीं कितने बच्चों को अनाथ बना दिया , कितनी औरतों को विधवा कर दिया और कितने ही लोगों को बेसहारा बना दिया।

सबसे पहले सरकार को आतंकवादियों के साथ बहुत कठोरता से कार्यवाई करनी चाहिए। देश की सीमा पर बहुत ही कड़ी निगरानी रखने की जरूरत है। जों युवक आतंकवाद के जाल में फंस गये हैं उन्हें सही रास्ते पर लाकर किसी रोजगार में लगा देना चाहिए। इसी तरह से लोगों में देशभक्ति की भावना को उत्पन्न करना चाहिए।

स्कूलों और कॉलेजों में भी राष्ट्रिय एकता की भावना को उत्पन्न करने की शिक्षा दी जानी चाहिए। देश की बढती हुई आर्थिक विषमता को भी समाप्त करना चाहिए। देश में आतंकवादियों के अड्डे सफेदपोश धूर्त नेताओं के संरक्षण में सुरक्षित होते हैं उनको समाप्त किया जाये। जब तक इन धूर्त सफेदपोशों का देश से नाश नहीं होता तब तक देशों की कोई भी समस्या नहीं सुलझ सकती। बिना उनके संरक्षण व संकेतों के कोई भी देश के अंदर गलत कदम नहीं बढ़ा सकता है।

उपसंहार : हमारा देश शांति और अहिंसा की जन्म भूमि है। इस देश में महात्मा गाँधी जी जैसे मानवता प्रेमियों का जन्म हुआ था। हमें महान संतों , ऋषियों , मुनियों , गुरुओं की वाणी का पुरे देश में प्रचार करना चाहिए। हमें संगठित होकर ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए।

जिससे उनका मनोबल समाप्त हो जाए तथा वे जान सके कि उन्होंने अपने गलत मार्ग पर पैर रख दिया है। जब वे आत्मग्लानी से वशीभूत होकर जब अपने किए पर पश्चाताप करेंगें तभी उन सभी को देश की मुख्य धारा में सम्मिलित किया जा सकता है। हमें आतंकवादी समस्या का समाधान जनता और सरकार दोनों के मिले-जुले प्रयासों से ही संभव हो सकता है।

हिन्दू , सिख , मुसलमान , ईसाई सब भारत के सपूत हैं। इन सभी को आतंकवाद को खत्म करने के लिए प्रयास करना चाहिए। भारत देश सभी सम्प्रदायों की अमूल्य निधि है। जिस प्रकार से आतंकवाद का विस्तार हो रहा है उसको समय रहते नहीं रोका गया तो यह भारत और अन्य देशों के लिए बहुत बड़ी समस्या बन जायेगा।

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

हिंसापूर्वक आम लोगों को सीधे डराने के लिये आतंकवाद एक गैर-कानूनी कृत्य है। आज के दिनों में हर समय वास्तव में लोग आतंकवाद और आतंकवादी हमलों से डरते रहते हैं। ये सभी देशों के लिये एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका है क्योंकि ये एक सामाजिक मुद्दा है। यहाँ पर विद्यार्थियों के लिये आतंकवाद के संदर्भ में आधारभूत समझ बनाने के लिये बेहद सरल शब्दों में कुछ निबंध प्रस्तुत किया जा रहा है जो इन्हें विभिन्न परीक्षाओं और निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में उपयोगी साबित होगा।

आतंकवाद पर निबंध (टेररिज्म एस्से)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

Get here some essays on Terrorism in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

आतंकवाद पर निबंध 1 (100 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद हिंसा का एक गैर-कानूनी तरीका है जो लोगों को डराने के लिये आतंकवादियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। आज, आतंकवाद एक सामाजिक मुद्दा बन चुका है। इसका इस्तेमाल आम लोगों और सरकार को डराने-धमकाने के लिये हो रहा है। बहुत आसानी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये विभिन्न सामाजिक संगठन, राजनीतिज्ञ और व्यापारिक उद्योगों के द्वारा आतंकवाद का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोगों का समूह जो आतंकवाद का समर्थन करते हैं उन्हें आतंकवादी कहते हैं। आतंकवाद को परिभाषित करना बहुत आसान नहीं है क्योंकि इसने अपनी जड़ें बहुत गहराई तक जमायी हुयी है। आतंकवादियों के पास कोई नियम और कानून नहीं है; ये समाज और देश में आतंक के स्तर को बढ़ाने और उत्पन्न करने के लिये केवल हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेते हैं।

आतंकवाद

आतंकवाद पर निबंध 2 (150 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

पूरे विश्व के लिये आतंकवाद एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुका है। ये एक वैश्विक समस्या है जिसने लगभग सभी राष्ट्रों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित किया हुआ है। हालाँकि बहुत सारे देशों के द्वारा आतंकवाद का सामना करने की कोशिश की जा रही है; लेकिन कुछ लोगों के द्वारा इसे आज भी समर्थन दिया जा रहा है। आम लोगों को किसी भी समय ख़ौफनाक तरीके से डराने का एक हिंसात्मक कुकृत्य है आतंकवाद। आतंकवादियों के बहुत सारे उद्देश्य होते हैं जैसे कि समाज में हिंसा के डर को फैलाना, राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति आदि। इनके निशाने पर हर वक्त देश का आम नागरिक होता है।

एक खास देशों की सरकार से अपनी माँगों को पूरा करवाना ही आतंकवादियों का मुख्य लक्ष्य होता है। लोगों और सरकार तक अपनी आवाज को पहुँचाने के लिये वो ऑनलाइन सोशल मीडिया, समाचारपत्र या पत्रिकाओं से संपर्क करते हैं। कई बार आतंकवादी हमले अपने वैचारिक और धार्मिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिये होते है।

आतंकवाद पर निबंध 3 (200 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

भारत एक विकसित देश है जिसने पूर्व और वर्तमान में बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया है, आतंकवाद उनमें से एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या है। भारत ने भूखमरी से होने वाली मृत्यु, अशिक्षा, गरीबी, असमानता, जनसंख्या विस्फोट और आतंकवाद जैसी चुनौतियों का सामना किया है जिसने इसकी विकास और वृद्धि को बुरी तरह प्रभावित किया है। आतंकवादियों के धर्म, मातृभूमि और दूसरे गैर-तार्किक भावनाओं के उद्देश्यों के लिये आम लोगों और सरकार से लड़ रहा आतंकवाद एक बड़ा खतरा है। आतंकवादी अपने आप को एक बहादुर सैनिक बताते हैं हालाँकि, वो वास्तविक सैनिक नहीं होते हैं। सच्चे सैनिक कभी-भी आम लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं और वो केवल दुश्मनों से अपने देश को बचाने के लिये ही लड़ते हैं। वास्तव में असली सैनिक वो होते हैं जो राष्ट्रहित के लिये लड़ते हैं। जबकि आतंकवादी अपने खुद के गलत उद्देश्यों के लिये लड़ते हैं।

एक राष्ट्रीय सैनिक अपनी सभी जिम्मेदारियों को समझता है जबकि एक आतंकवादी कभी-भी ऐसा नहीं करता। आतंकवादियों को उनका नाम आतंक शब्द से मिला है। पूर्व में, आतंकवाद केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था जैसे जम्मू- कश्मीर हालाँकि; आज के दिनों में, ये लगभग सभी क्षेत्रों में फैल चुका है खासतौर से भारत के उत्तरपूर्वी इलाकों में। हाल ही में, भारत में आतंकवादी हमला मुम्बई में नरीमन हउस और ताज होटल में हुआ था। उस हमले ने भारत में कई जिन्दगियों को लील लिया था और बहुत आर्थिक हानि पहुँचायी थी।


 

आतंकवाद पर निबंध 4 (250 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है जो पूरी जीत के लिये मानव दिमाग का इस्तेमाल कर रहा है। लोगों को कमजोर बनाने के लिये उन्हें डरा रहा है जिससे वो दुबारा से राष्ट्र पर राज कर सकें। इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने की जरुरत है। हमें इसे जड़ से खत्म करने के बारे में सोचना होगा। मानव मस्तिष्क से असाधारण आतंक को हटाने के साथ ही इसके साम्राज्य को पूरी तरह से नेस्तानाबूद करने के लिये हमें एक मजबूत नीति बनानी चाहिये। आतंकवाद अपने सकारात्मक परिणामों को पाने के लिये हिसांत्मक तरीका अपनाता है।

आतंकवाद एक हिंसात्मक कुकृत्य है जिसको अंजाम देने वाले समूह को आतंकवादी कहते हैं। वो बहुत साधारण लोग होते हैं और दूसरों के द्वारा उनके साथ घटित हुये कुछ गलत घटनाओं और या कुछ प्राकृतिक आपदाओं के कारण वो किसी तरह अपने दिमाग पर से अपना नियंत्रण खो देते हैं जो उनकी इच्छाओं को सामान्य या स्वीकृत तरीके से पूरा करने के में अक्षम बना देता है। धीरे-धीरे वो समाज के कुछ बुरे लोगों के प्रभाव में आ जाते हैं जहाँ उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करने का वादा किया जाता है। वो सभी एक साथ मिलते हैं और एक आतंकवादी समूह बनाते हैं जो कि अपने ही राष्ट्र, समाज और समुदाय से लड़ता है। आतंकवाद, देश के सभी युवाओं के विकास और वृद्धि को प्रभावित करता है।

ये राष्ट्र को उचित विकास से कई वर्ष पीछे ढकेल देता है। आतंकवाद देश पर अंग्रेजों की तरह राज कर रहा है, जिससे हमें फिर से आजाद होने की जरुरत है। हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि आतंकवाद हमेशा अपने जड़ को गहराई से फैलाता रहेगा क्योंकि अपने अनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये राष्ट्र के कुछ अमीर लोग अभी-भी इसको समर्थन दे रहें हैं।

 

आतंकवाद पर निबंध 5 (300 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

भारत ढ़ेर सारी चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे गरीबी, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता, असमानता आदि बहुत कुछ, फिर भी आतंकवाद इन सबसे ज्यादा खतरनाक है जो पूरी मानव जाति को प्रभावित कर रहा है। ये बहुत ही डरावनी बीमारी है जो लोगों को मानसिक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित कर रही है। चाहे ये छोटे देशों में होता हो (आयरलैंड, इज़रायल आदि) या बड़े देशों (यूएसए, रुस आदि) में; ये दोनों ही जगह चुनौती के रुप में है। अपने कुछ राजनीतिक, धार्मिक या व्यक्तिगत लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आतंकवादी अर्थात् परेशान लोगों के समूह के द्वारा हिंसात्मक तरीकों का प्रयोग आतंकवाद है। आज ये दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

आतंकवाद का कोई नियम कानून नहीं होता वो केवल अपनी माँगों को पूरा करने के लिये सरकार के ऊपर दबाव बनाने के साथ ही आतंक को हर जगह फैलाने के लिये निर्दोष लोगों के समूह या समाज पर हमला करते हैं। उनकी माँगे बेहद खास होती हो, जो वो चाहते हैं केवल उसी को पूरा कराते हैं। ये मानव जाति के लिये एक बड़ा खतरा है। वो कभी-भी अपने दोस्त, परिवार, बच्चे, महिला या बूढ़े लोगों के लिये समझौता नहीं करते हैं। वो केवल लोगों की भीड़ पर बम गिराना चाहते हैं। वो लोगों पर गोलियाँ चलाते हैं, विमानों का अपहरण करते हैं और दूसरी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

कम से कम समय में अपने मुख्य क्षेत्रों या देशों में आतंक फैलाने के लिये आतंकवादी लक्ष्य बनाते हैं। पूर्व में, ऐसा माना जाता है कि आतंकवादी गतिविधियाँ केवल जम्मू और कश्मीर तक ही सीमित थी लेकिन अब ये अपनी जड़ें देश के दूसरे क्षेत्रों में भी फैला रहा है। देश में अलग-अलग नामों के साथ कई सारे आतंकवादी समूह सक्रिय हैं। अपने कार्य के अनुसार राजनीतिक और आपराधिक आतंकवाद के दो मुख्य प्रकार हैं। कुछ खास लक्ष्यों को पूरा करने के लिये प्रशिक्षित लोगों का समूह है आतंकवाद। विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने के लिये एक से ज्यादा आतंकी समूह प्रशिक्षित किये जाते हैं। ये एक बीमारी की तरह है जो नियमित तौर पर फैल रही है और अब इसके लिये कुछ असरदार उपचार की जरुरत है।


 

आतंकवाद पर निबंध 6 (400 शब्द)

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवादी कहे जाने वाले प्रशिक्षित लोगों के समूह के द्वारा अन्यायपूर्ण और हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देने की प्रक्रिया को आतंकवाद कहते हैं। वहाँ केवल एक मालिक होता है जो समूह को किसी भी खास कार्य को किसी भी तरीके से करने का सख्त आदेश देता है। अपने अन्यायी विचारों की पूर्ति के लिये उन्हें पैसा, ताकत और प्रचार की जरुरत होती है। ऐसी परिस्थिति में, ये मीडिया होती है जो किसी भी राष्ट्र के समाज में आतंकवाद के बारे में खबर फैलाने में वास्तव में मदद करती है। अपनी योजना, विचार और लक्ष्य के बारे में लोगों तक पहुँच बनाने के लिये आतंकवाद भी मीडिया का सहारा लेता है।

अपने उद्देश्य और लक्ष्य के अनुसार विभिन्न आतंकी समूह का नाम पड़ता है। आतंकवाद की क्रिया मानव जाति को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है और लोगों को इतना डरा देती है कि लोग अपने घरों से बाहर निकलने में डरते हैं। वो सोचते हैं कि आतंक हर जगह है जैसे घर के बाहर रेलवे स्टेशन, मंदिर, सामाजिक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय कार्यक्रमों आदि में जाने से घबराते हैं। लोगों के दिमाग पर राज करने के साथ ही अपने कुकृत्यों कों प्रचारित और प्रसारित करने के लिये अधिक जनसंख्या के खास क्षेत्रों के तहत आतंकवादी अपने आतंक को फैलाना चाहते हैं। आतंकवाद के कुछ हालिया उदाहरण अमेरिका का 9/11 और भारत का 26/11 हमला है। इसने इंसानों के साथ ही बड़े पैमाने पर देश की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुँचायी है।

राष्ट्र से आतंकवाद और आतंक के प्रभाव को खत्म करने के लिये, सरकार के आदेश पर कड़ी सुरक्षा का प्रबंध किया गया है। वो सभी जगह जो किसी भी वजह से भीड़-भाड़ वाली जगह होती या बन जाती है जैसे सामाजिक कार्यक्रम, राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, मंदिर आदि को मजबूत सुरक्षा घेरे में रखा जाता है। सभी को सुरक्षा नियमों का पालन करता पड़ता है और ऑटोमैटिक बॉडी स्कैनर मशीन से गुजरना पड़ता है। इस तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करने के द्वारा सुरक्षा कर्मियों को आतंकवादी की मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिलती है। इस तरह की कड़ी सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी हम लोग अभी-भी आतंकवाद का खिलाफ प्रभावशाली रुप से नहीं खड़े हो पा रहें हैं।

आतंकी समूह को खत्म करने के साथ ही आतंक के खिलाफ लड़ने के लिये हर साल हमारा देश ढ़ेर सारे पैसे खर्च करता है। हालाँकि, ये अभी-भी एक बीमारी की तरह बढ़ रही है क्योंकि रोजाना नये आतंकवादी तैयार हो रहें हैं। वो हमारी तरह ही बहुत सामान्य लोग हैं लेकिन उन्हें अन्याय करने के लिये तैयार किया जाता है और अपने एक समाज, परिवार और देश के खिलाफ लड़ने के लिये दबाव बनाया जाता है। वो इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि उन्हें अपने जीवन से भी प्यार नहीं होता, वो लड़ते समय हमेशा अपना कुर्बान होने के लिये तैयार रहते हैं। एक भारतीय नागरिक के रुप में, आतंकवाद को रोकने के लिये हम सभी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं और ये तभी रुकेगा जब हम कुछ बुरे और परेशान लोगों की लालच भरी बातों में कभी नहीं आयेंगे।

आतंकवाद पर निबंध | Terrorism in Hindi!

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद किसी एक व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र विशेष के लिए ही नहीं अपितु पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है । हमारे देश मे ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे इसका जहर इतनी तीव्रता से फैल रहा है कि यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया तो यह पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है ।

शाब्दिक अर्थों में आतंकवाद का अर्थ भय अथवा डर के सिद्‌धांत को मानने से है । दूसरे शब्दों में, भययुक्त वातावरण को अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति हेतु तैयार करने का सिद्धांत आतंकवाद कहलाता है । विश्व के समस्त राष्ट्र प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हैं । रावण के सिर की तरह एक स्थान पर इसे खत्म किया जाता है तो दूसरी ओर एक नए सिर की भाँति उभर आता है ।

यदि हम अपने देश का ही उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि अथक प्रयासों के बाद हम पंजाब से आतंकवाद का समाप्त करने में सफल होते है तो यह जम्यू-कश्मीर, आसाम व अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रारंभ हो जाता है । पड़ोसी देश पाकिस्तान द्‌वारा भारत में आतकवाद को समर्थन देने की प्रथा तो निरंतर पचास वर्षो से चली आ रही है ।

हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है । यहाँ अनेक धर्मो के मानने वाले लोग निवास करते हैं । हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ब्रहम समाजी, आर्य समाजी, पारसी आदि सभी धर्मो के अनुयाइयों को यहाँ समान दृष्टि से देखा जाता है तथा सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं ।

वास्तविक रूप में धर्मो का मूल एक है । सभी ईश्वर पर आस्था रखते है तथा मानव कल्याण को प्रधानता देते हैं । सभी धर्म एक-दूसरे को प्रेमभाव व मानवता का संदेश देते है परंतु कुछ असामाजिक तत्व अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए धर्म का गलत प्रयोग करते है ।

धर्म की आड़ में वे समाज को इस हद तक भ्रमित कर दैत है कि उनमें किसी एक धर्म के प्रति घृणा का भाव समावेशित हो जाता है । उनमें ईर्ष्या, द्वेष व परस्पर अलगाव इस सीमा तक फैल जाता है कि वे एक पूँक्षर कह खून बहच सं भी नहीं चूकते हैं ।

 

देश में आतंकवाद के चलते पिछले पाँच दशकों में 50,000 से भी अधिक परिवार प्रभावित हो चुके हैं । कितनी ही महिलाओं का सुहाग उजड़ गया है । कितने ही माता-पिता बेऔलाद हो चुके हैं तथा कितने ही भाइयों से उनकी बहनें व कितनी ही बहनें अपने भाइयों से बिछुड़ चुकी हैं । पिछले दशक के हिंदू-सिख में कितने ही लोग जिंदा जला दिए गए । इसी आतंकवाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी ।

हमारे भूतपूर्व युवा प्रधानमंत्री स्व॰ राजीव गाँधी इसी आतंक रूपी दानव की क्रूरता का शिकार बने । अनेक नेता जिन्होंने अपने स्वार्थों के लिए आतंकवाद का समर्थन किया बाद में वे भी इसके दुष्परिणाम से नहीं बच सके । पाकिस्तान के अंदर बढ़ता हुआ आतंकवाद इसका प्रमाण है । वहाँ के शासनाध्यक्षों पर लगातार आतंकी हमले हो रहे है ।

पूरी दुनिया में छोटी-बड़ी आतंकवादी घटनाओं का एक सिलसिला सा चल पड़ा है । धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तो खून की नदियाँ बहना आम बात हो गई है । प्राकृतिक सौंदर्य का यह खजाना आज भय और आतंक का पर्याय बन रहा है । खून-खराबा, मार-काट, बलात्कार आदि घटनाओं से ग्रस्त यह प्रदेश पाँच दशकों से पुन: अमन-चैन की उम्मीदें लिए कराह रहा है ।

आतंकवाद के कारण यहाँ का पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है । हजारों की संख्या में लोग वहाँ से पलायन कर चुके हैं । विगत वर्षो में इस आतंकवाद ने जितनी जाने ली हैं कितने सैनिक शहीद हुए हैं इसका अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है । चूँकि यह आतंकवाद एक सुनियोजित अभियान के तहत चलाया जा रहा है, इसलिए इसकी समाप्ति उतनी सरल नहीं है ।

आतंकवाद के चलते खलनायकों को नायक के रूप में देखा जा रहा है । ऐसा नहीं है कि केवल निरीह लोग ही इसकी गिरफ्त में आते हैं । आतंकवाद ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भी नहीं छोड़ा जिसके फलस्वरूप हजारों लोग मौत के मुँह में समा गए तथा अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा ।

आतंकवाद मानव सम्यता के लिए कलंक है । उसे किसी भी रूप में पनपने नहीं देना चाहिए । विश्व के सभी राष्ट्रों को एक होकर इसके समूल विनाश का संकल्प लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक सुनहरा भविष्य प्रदान कर सकें ।

आतंकवाद पर निबंध। Terrorism Essay in Hindi

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

आतंकवाद पर निबंध। Terrorism Essay in Hindi
प्रस्तावना : आतंकवाद वर्तमान समय की एक गंभीर समस्या है। आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो अपना स्वार्थ पाने के लिए लोगों में भय फैलाता है। सामान्यतः दो प्रकार के आतंकवाद होते है। एक तो राजनीतिक आतंकवाद जो अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ती के लिए भय फैलाते हैं और दूसरा आपराधिक आतंकवाद जो अपहरण करके रूपए मांगते हैं।
राजनीतिक आतंकवाद : राजनीतिक आतंकवाद बहुत खतरनाक है। राजनीतिक आतंकी सुसंगठित और प्रशिक्षित होते हैं। यह पुलिस के लिए भी कठिन होता है की इनको समय से गिरफ्तार कर पाए। राजनीतिक आतंकवादी बड़े पैमाने पर हिंसा कर सकते हैं। इनका उद्देश्य जनता और सरकार को भयभीत करना होता है। वे हवाईजहाजों को बंधक बनाते हैं, डकैती करते हैं, बैंक लूटते हैं। वे मासूम लोगों की ह्त्या करते हैं। भय फैलाने के लिए वे बेम विस्फोट करते है और अफवाहें फैलाते हैं।
आतंकी और आतंकवाद : सामान्यतः आतंकी युवा होते हैं और उनके पीछे जिनका समर्थन होता है वे वृद्ध होते हैं। वे आतंकी क्रियाकलापों को संगठित करते हैं। आतंकी उग्रवादी होते हैं जो अपना कार्य महान उत्साह के साथ करते हैं लेकिन वे लोगों को गलत सलाह देते हैं जो कभी-कभी यह नहीं समझ पाते हैं की वे वास्तव में क्या कर रहे हैं। कभी-कभी विदेशी एजेंसियां देश के भीतर भय फैलाने के लिए आतंकियों की सहायता करती हैं। ऐसे मामलों में, आतंकियों को जटिल हथियारों से प्रशिक्षण दिया जाता है। विदेशी एजेंसियां उन्हें हथियार और धन भी देती हैं।
भारत और आतंकवाद : भारत लम्बे समय से आतंकवाद का सामना कर रहा है। नागा विद्रोहियों की समस्या भारत में चिंता का विषय है। देश में नक्सल आंदोलन भी चल रहा है। वर्तमान में आतंकवाद पंजाब और अन्य स्थानों तक फ़ैल चुका है।  कुछ बड़ी शक्तियां और पड़ोसी देश हमारे देश में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यदि हमारा देश दो भागों में विभक्त हो गया तो वे बहुत प्रसन्न होंगे। कुछ समस्याएँ जम्मू-कश्मीर की हैं जिन्हे शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हत्याएं जारी हैं। हमें आशा है की राजनीतिक शक्तियां इस समस्या का समाधान निकालेंगी।
शान्ति के लिए खतरा : फिलिस्तीन की समस्या अभी तक हल नहीं हुई है और यह आतंकवाद और हिंसा को बढ़ा रही है। इंग्लैण्ड में आइरिश आतंकी देश की शान्ति को भांग करने में लगे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों में आतंकवाद एक बड़ी समस्या है। पाकिस्तान और श्रीलंका भी हिंसा की चपेट में हैं। आतंकवाद अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से हल किया जा सकता है। संसार के देशों को अन्य देशों के विरुद्ध आतंकी क्रियाकलापों की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता और मणनवीय मूल्यों में कोई विश्वास भी नहीं होता है। यूं. एन. ओ. ने इस समस्या को हल करने की अनुमति दे दी है। हमें आशा है की भारत और सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही इस भयावह स्वप्न से बाहर आ पाने में सफल होंगे।
प्रमुख आतंकवादी घटना : 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जो की अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित है पर बंधक हवाई जहाजों द्वारा हमला किया गया। इसमें लगभग 7000 लोगों की मृत्यु हुई। वर्तमान में सीरिया और उसके आस-पास के क्षेत्र भी आतंकवाद से ग्रसित हैं। इन इलाकों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति व्याप्त है। बमों और मिसाइलों के हमलों में हजारों की संख्या में निर्दोष और मासूम लोग मारे जा रहे हैं। भारज के मुंबई शहर में ताज होटल में हुए आतंकी हमले में भी कई लोग मारे गए। इसके अलावा रोज कहीं न कहीं छोटे-बड़े आतंकी हमले होते ही रहते हैं। आतंकवाद में आज सम्पूर्ण विश्व को युद्ध की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
उपसंहार : आतंकवाद का जिस ढंग से विस्तार हो रहा है यदि उसको समय रहते नहीं रोका गया तो भारत सहित सभी देशों के लिए यह एक विकत समस्या बन जाएगा। दुनिया की सभी देशों को मिलकर ऐसी आपराधिक प्रवृत्ति पर रोक लगाने के प्रयास करने चाहिए। लेकिन दुःख इस बात का है की दुनिया के बड़े देश इस समस्या से मुकाबला करने में भी अपने हितों पर अधिक ध्यान देते हैं।

आतंकवाद पर निबंध 2018,

आतंकवाद पर निबंध pdf,

आतंकवाद पर निबंध रूपरेखा सहित,

आतंकवाद पर निबंध 2017,

वैश्विक आतंकवाद पर निबंध,

आतंकवाद पर निबंध प्रस्तावना,

आतंकवाद पर निबंध in english,

आतंकवाद की समस्या पर निबंध,

essay on terrorism in hindi pdf,

hindi aatankwad ki samasya essay,

short essay on aatankwad in hindi,

aatankwad essay in hindi pdf,

quotes on aatankwad in hindi,

aatankwad ek samasya nibandh,

aatankwad essay in gujarati,

aatankwad ke karan,

आतंकवाद पर निबंध-Essay On Terrorism In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध :

भूमिका : बेरोजगारी उन्नति के रास्ते में बहुत बड़ी समस्या है। बेरोजगारी का अर्थ होता है काम करने की इच्छा करने वाले को काम न मिलना। आज भारत को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन सभी समस्याओं में से बेरोजगारी की समस्या प्रमुख है। प्राचीनकाल में हमारा भारत पूर्ण रूप से संपन्न देश था इसी वजह से इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था।

बहुत सालो से इस समस्या को दूर करने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन अभी तक किसी को भी सफलता नहीं मिल पायी है। इसकी वजह से बहुत से परिवार आर्थिक दशा से खोखले हो चुके हैं। आर्थिक योजनाओं में यह सबसे बड़ी रुकावट है। हमारे देश में आर्थिक योजनाएँ तब तक सफल नहीं हो पाएंगी जब तक बेरोजगारी की समस्या खत्म नहीं हो जाती।

आज हम स्वतंत्र तो हैं लेकिन अभी तक आर्थिक दृष्टि से सक्षम नहीं हुए हैं। हम चारों तरफ से चोरी ,छीना-छपटी , खून और लूटमार की बातें सुनते रहते हैं। आज के समय में सभी जगह पर हड़तालें की जा रही हैं। आजकल हर किसी को अपने परिवार के पेट को भरने की चिंता रहती है।

वो लोग अपने परिवार का पेट अच्छाई के मार्ग पर चलकर भरें या बुराई के मार्ग पर चलकर इस बात का कोई मूल्य नहीं है। बेरोजगारी सामाजिक और आर्थिक समस्या है। यह समस्या गांवों और शहरों में समान रूप से फैली हुई है।

जनसंख्या में वृद्धि : हमारे देश की बेरोजगारी में रोज वृद्धि हो रही है। हमारी सरकार इस समस्या का हल ढूंड रही है पर लगातार बढती जनसंख्या इसका हल नहीं ढूंढने देती है। हर साल जितने व्यक्तियों को काम दिए जाते हैं उनसे कई गुना लोग बेरोजगार हो जाते हैं। सरकार ने जनसंख्या को कम करने के कई अप्राकृतिक उपाय खोजे हैं लेकिन इसके बाद भी जनसंख्या लगातार बढती ही जा रही है।

जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण शिक्षा के साधनों में कमी होने लगी जिससे लोग अशिक्षित रह गये। हमारे देश में अशिक्षित पुरुष और स्त्रियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही है। बढती जनसंख्या बेरोजगारी का बहुत ही बड़ा कारण है। जनसंख्या में वृद्धि के कारण देश का संतुलन बिगड़ रहा है। जनसंख्या में वृद्धि के अनुपात की वजह से रोजगारों की कमी और अवसर में बहुत कम वृद्धि हो रही है इसी वजह से बेरोजगारी बढती जा रही है।

अधूरी शिक्षा प्रणाली : हजारों सालों से हमारी शिक्षा पद्धति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारी शिक्षा प्रणाली के अधुरा होने की वजह से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। अधूरी शिक्षा प्रणाली को अंग्रेजी सरकार ने परतंत्र के समय में भारतियों को क्लर्क बनाने के लिए शुरू की थी। आगे चलकर जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे परेशानियाँ भी बदलने लगीं। इस शिक्षा प्रणाली से सिर्फ ऐसे लोग तैयार होते हैं जो बाबु बनते हैं।

जवाहरलाल नेहरु जी ने कहा था कि हर साल लाखों लोग शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिए तैयार होते हैं लेकिन हमारे पास नौकरियां बहुत ही कम होती हैं। ऐसे लोगों को नौकरी न मिलने की वजह से ये बेकार हो जाते है। आजकल किसी को भी एम० ए० या बी० ए० किये लोग नहीं उन्हें सिर्फ विशेषज्ञ और वैज्ञानिक चाहिएँ। इसी कारण से लोग बहुत कम लोग शिक्षा ग्रहण करते हैं।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में रोजगारोन्मुख शिक्षा की व्यवस्था नहीं होती है जिससे बेरोजगारी और अधिक बढती है। इसी वजह से जो व्यक्ति आधुनिक शिक्षा ग्रहण करते हैं उनके पास नौकरियां ढूंढने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता है। शिक्षा पद्धिति में परिवर्तन करने से विद्यार्थी शिक्षा का समुचित प्रयोग कर पाएंगे।

विद्यार्थियों को तकनीकी और कार्यों के बारे में शिक्षा देनी चाहिए ताकि वे अपनी शिक्षा के बल पर नौकरी प्राप्त कर सकें। सभी सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों में व्यवसाय के ऊपर शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज के युग में शिक्षित और कुशल लोगों की जरूरत होती है जिन लोगों के पास शिक्षा नहीं होती है उन लोगों को रोजगार प्राप्त नहीं होता है।

हमारी शिक्षा प्रणाली में साक्षरता को अधिक महत्व दिया जाता है। तकनीकी शिक्षा में केवल सैद्धांतिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है इसमें व्यावहारिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है इसी वजह से लोग मशीनों पर काम करने से कतराते है। साधारण शिक्षा से हम सिर्फ नौकरी करने के योग्य बनते हैं इसमें मेहनत का कोई काम नहीं होता है।

उद्योग धंधों की अवनति : उद्योग धंधो की अवनति के कारण भी बेरोजगारी बढती जा रही है। प्राचीनकाल में बेरोजगारी की समस्या ही नहीं थी उस समय हर व्यक्ति के पास काम था। कुछ लोग चरखा चलाते थे , कुछ गुड बनाते थे और कुछ लोग खिलौने बनाते थे। जब अंग्रेजी हुकुमत आई तो उन लोगों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए इस सब कामों को नष्ट कर दिया था।

अंग्रेजों ने लोगों में से आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया था। रोजगारों के दस्तावेजों के हिसाब से हर साल लाखों लोग बेरोजगार होते थे लेकिन अब इनकी संख्या करोंड़ों से भी ऊपर हो गई है। हमें बेरोजगार लोगों की पूरी संख्या का निश्चित पता नहीं होता क्योंकि बहुत से लोग रोजगार कार्यालय में अपना नाम ही दर्ज नहीं करवाते हैं।

पढ़े लिखे लोग भूखा मरना तो पसंद करते हैं पर मजदूरी करना पसंद नहीं करते हैं। वे लोगों के सामने छोटे काम को करने में संकोच करते हैं। वे यह सोचते हैं कि लोग कहेंगे कि पढ़ा-लिखा होकर भी मजदूरी कर रहा है। यही बात लोगों को कुछ नहीं करने देते हैं। लेकिन शिक्षा उन्हें यह तो नहीं कहती है कि तुम मजदूरी मत करो।

सरकारी नीतियाँ : बेरोजगारी की समस्या शहर और गाँव दोनों में उत्पन्न हो रही है। जिससे धन की ठीक व्यवस्था न होने की वजह से बड़े-बड़े कारीगर भी बेकार होते हैं। गांवों में किसान खेती के लिए वर्षा पर आश्रित रहता है। उसे अपने खाली समय में कुटीर उद्योग चलाने चाहिएँ। इस वजह से उसकी और देश की हालत ठीक हो जाती है।

आजकल गाँव के लोग शहरों में आकर बसने लगे हैं जिसकी वजह से बेरोजगारी बढती जा रही है। गांवों में लोग कृषि करना पसंद नहीं करते जिसकी वजह से गांवों की आधी जनसंख्या बेरोजगार रह जाती है। पुराने समय में वर्ण व्यवस्था में पैतृक व्यवसाय को अपना लिया गया था जिस वजह से बेरोजगारी कभी पैदा ही नहीं होती थी।

जब वर्ण-व्यवस्था के भंग हो जाने से पैतृक व्यवसाय को नफरत की नजर से देखा जाता है तो बेटा पिता के व्यवसाय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता है। आज के युवाओं की ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उन्हें रोजगार दिलाने में सहायता करे। औद्योगिक शिक्षा की तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिए ताकि शिक्षित लोगों की बेरोजगारी को कम किया जा सके।

शिक्षा से लोग स्वालम्बी होते हैं। उन लोगों में हस्तकला की भावना पैदा नहीं होती है। आधे से भी ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में भटकते रहते हैं और बेरोजगारों की लाइन और लम्बी होती चली जाती है। हमारे देश में बहुत अधिक जनसंख्या है जिस वजह से उद्योग धंधों में उन्नति की बहुत अधिक आवश्यकता है।

उद्योग धंधों को सार्वजनिक क्षेत्रों में ही स्थापित किया गया है , जब तक घरेलू दस्तकारों को प्रोस्ताहन नहीं दिया जाएगा तब तक बेरोजगारी की समस्या ठीक नहीं हो सकती है। सरकार कारखानों की संख्या में वृद्धि कर रही है। उद्योग धंधों की स्थापना की जा रही है। उत्पादन क्षेत्रों को विकसित किया जा रहा है।

सामाजिक और धार्मिक मनोवृत्ति और सरकारी विभागों में छंटनी : सामाजिक और धार्मिक मनोवृत्ति से भी बेरोजगारी की समस्या बढती जा रही है। आज के समय में ऋषियों और साधुओं को भिक्षा देना पुण्य की बात मानी जाती है। जब स्वस्थ लोग दानियों की उदारता को देखते हैं को देख कर भिक्षावृत्ति पर उतर आते हैं। इस प्रकार से भी बेरोजगारी की परेशानी बढती जा रही है।

हमारे यहाँ के सामाजिक नियमों के अनुसार वर्ण-व्यवस्था के अनुसार विशेष-विशेष वर्गों के लिए बहुत विशेष-विशेष कार्य होते हैं। सरकारी विभागों में वर्ण-व्यवस्था के अनुसार काम दिए जाते हैं। अगर उन्हें काम मिलता है तो करते हैं वरना हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इस तरीके की सामाजिक व्यवस्था से भी बेरोजगारी बढती है।

बेकारी की वजह से युवाओं में असंतोष ने समाज में अव्यवस्था और अराजकता फैला रखी हैं। हमें सरकारी नौकरियों के मोह को छोडकर उस काम को करना चाहिए जिसमें श्रम की जरूरत होती है। लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय को छोडकर रोजगार की खोज में इधर-उधर घूमते रहते हैं।

जनसंख्या वृद्धि पर रोक और शिक्षा : जनसंख्या वृद्धि को रोककर बेरोजगारी को नियंत्रित किया जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए विवाह की आयु का नियम कठोरता से लागु किया जाना चाहिए। साथ ही शिक्षा-पद्धिति में भी सुधार करना चाहिए। शिक्षा को व्यावहारिक बनाना चाहिए। विद्यार्थियों में प्रारंभ से ही स्वालंबन की भावना को पैदा करना होगा।

देश के विकास और कल्याण के लिए पंचवर्षीय योजना को चलाया गया जिससे किसी भी राष्ट्र की पहली शर्त सब लोगों को रोजगार देना होता है। लेकिन पहली पंचवर्षीय योजना से बेरोजगारी की समस्या और अधिक बढ़ गई थी। बेरोजगारी की समस्या को सुलझाने के लिए मन की भावना को बदलना बहुत जरूरी है।

मन की भावना को बदलने से किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा चाहिए। डिग्री लेना ही ज्यादा जरूरी नहीं होता है जरूरी होता है अपनी कुशलता और योग्यता को प्राप्त करना।

उपसंहार : बरोजगारी देश की एक बहुत बड़ी समस्या है। सरकार के द्वारा बेरोजगारी को खत्म करने के लिए बहुत से कदम उठाये जा रहे हैं। बेरोजगारी उस संक्रामक बीमारी की तरह होती है जो अनेक बिमारियों को जन्म देती है। लोगों का कहना है कि अभी सरकार को बेरोजगारी से छुटकारा नहीं मिल पाया है पर वो इतने साधन जुटा रही है जिससे भविष्य में बेरोजगारी की समस्या को खत्म किया जा सके।

बेरोजगारी व्यक्ति की सच्चाई , ईमानदारी और दया का गला घोट देती है। बेरोजगारी लोगों को अनेक प्रकार के अत्याचार करने के लिए मजबूर करती है। सरकार बेरोजगारी को दूर करने के लिए बहुत से कदम उठा रही है। भविष्य में एक समय ऐसा होगा जिसमे हर एक व्यक्ति के पास काम होगा। नव युवकों को उद्यम लगाने के लिए ऋण दे रही है और उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी साथ दे रही है।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध | Essay on The Problem of Unemployment in Hindi!

प्राचीन काल में भारत आर्थिक दृष्टि से पूर्णत: सम्पन्न था । तभी तो यह ‘ सोने की चिड़िया ‘ के नाम से विख्यात था । किन्तु, आज भारत आर्थिक दृष्टि से विकासशील देशों की श्रेणी में है । आज यहाँ कुपोषण और बेरोजगारी है । आज हमारे देश में जो अव्यवस्था व्याप्त है, उसकी जड़ में बेरोजगारी की समस्या विकराल है । लूट-खसोट, छीना-झपटी, चोरी-डकैती, हड़ताल आदि कुव्यवस्थाएँ इसी समस्या के दुष्परिणाम हैं । बेरोजगारी का अभिप्राय है – काम करने योग्य इच्छुक व्यक्ति को कोई काम न मिलना । भारत में बेरोजगारी के अनेक रूप हैं । बेरोजगारी में एक वर्ग तो उन लोगों का है, जो अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित हैं और रोजी-रोटी की तलाश में भटक रहे हैं । दूसरा वर्ग उन बेरोजगारों का है जो शिक्षित हैं, जिसके पास काम तो है, पर उस काम से उसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह उसकी आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं है । बेरोजगारी की इस समस्या से शहर और गाँव दोनों आक्रांत हैं ।

देश के विकास और कल्याण के लिए 1951 – 52 में पंचवर्षीय योजनाओं को आरंभ किया गया था । योजना आरंभ करने के अवसर पर आचार्य विनोबा भावे ने कहा था किसी भी राष्ट्रीय योजना की पहली शर्त सबको रोजगार देना है । यदि योजना से सबको रोजगार नहीं मिलता, तो यह एकपक्षीय होगा, राष्ट्रीय नहीं । आचार्य भावे की आशंका सत्य सिद्ध हुई । प्रथम पंचवर्षीय योजनाकाल से ही बेरोजगारी घटने के स्थान पर निरंतर बढ़ती चली गयी । आज बेरोजगारी की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है ।

हमारे देश में बेरोजगारी की इस भीषण समस्या के अनेक कारण हैं । उन कारणों में लॉर्ड मैकॉले की दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति, जनसंख्या की अतिशय वृद्धि, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के कारण कुटीर उद्योगों का ह्रास आदि प्रमुख हैं । आधुनिक शिक्षा प्रणाली में रोजगारोन्मुख शिक्षा व्यवस्था का सर्वथा अभाव है । इस कारण आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के सम्मुख भटकाव के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह गया है । बेरोजगारी की विकराल समस्या के समाधान के लिए कुछ राहें तो खोजनी ही पड़ेगी । इस समस्या के समाधान के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए ।

भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल आसान नहीं है, फिर भी प्रत्येक समस्या का समाधान तो है ही । इस समस्या के समाधान के लिए मनोभावना में परिवर्तन लाना आवश्यक है । मनोभावना में परिवर्तन का तात्पर्य है – किसी कार्य को छोटा नहीं समझना ।

इसके लिए सरकारी अथवा नौकरियों की ललक छोड्‌कर उन धंधों को अपनाना चाहिए, जिनमें श्रम की आवश्यकता होती है । इस अर्थ में घरेलू उद्योग- धंधों को पुनर्जीवित करना तथा उन्हें विकसित करना आवश्यक है । शिक्षा नीति में परिवर्तन लाकर इसे रोजगारोम्मुखी बनाने की भी आवश्यकता है । केवल डिग्री ले लेना ही महत्त्वपूर्ण नहीं, अधिक महत्त्वपूर्ण है योग्यता और कार्यकुशलता प्राप्त करना ।

युवा वर्ग की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होनी चाहिए कि वह शिक्षा प्राप्त कर स्वावलंबी बनने का प्रयास करे । सरकार को भी चाहिए कि योजनाओं में रोजगार को विशेष प्रश्रय दिया जाए । भारत सरकार इस दिशा में विशेष प्रयत्नशील है । परन्तु सरकार की तमाम नीतियाँ एवं कार्यान्वयण नाकाफी ही साबित हुए हैं । मतलब साफ है कि सरकार की नीतियों में कहीं न कहीं कोई व्यावहारिक कठिनाई अवश्य है । अत: सरकार को चाहिए कि वह इसके निराकरण हेतु एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए और समस्या को और अधिक बढ़ने न दे ।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध | Essay on Unemployment in Hindi!

बेरोजगारी देश के सम्मुख एक प्रमुख समस्या है जो प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरुद्‌ध करती है । यहाँ पर बेरोजगार युवक-युवतियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है । स्वतंत्रता के पचास वर्षों बाद भी सभी को रोजगार देने के अपने लक्ष्य से हम मीलों दूर हैं ।

बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है । हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं । अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है । देश के 90% किसान अपूर्ण या अर्द्ध बेरोजगार हैं जिनके लिए वर्ष भर कार्य नहीं होता है । वे केवल फसलों के समय ही व्यस्त रहते हैं ।

शेष समय में उनके करने के लिए खास कार्य नहीं होता है । यदि हम बेरोजगारी के कारणों का अवलोकन करें तो हम पाएँगे कि इसका सबसे बड़ा कारण देश की निरंतर बढ़ती जनसंख्या है । हमारे संसाधनों की तुलना में जनसंख्या वृद्‌धि की गति कहीं अधिक है जिसके फलस्वरूप देश का संतुलन बिगड़ता जा रहा है ।

इसका दूसरा प्रमुख कारण हमारी शिक्षा-व्यवस्था है । वर्षो से हमारी शिक्षा पद्‌धति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है । हमारी वर्तमान शिक्षा पद्‌धति का आधार प्रायोगिक नहीं है । यही कारण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी हमें नौकरी नहीं मिल पाती है ।

बेरोजगारी का तीसरा प्रमुख कारण हमारे लघु उद्‌योगों का नष्ट होना अथवा उनकी महत्ता का कम होना है । इसके फलस्वरूप देश के लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय से विमुख होकर रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं ।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ । इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा ।

यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा पद्‌धति में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ । उन्हें आवश्यक व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सकें । विद्‌यालयों में तकनीकी एवं कार्य पर आधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्‌योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें ।

 

इस दिशा में सरकार निरंतर कार्य कर रही है । अपनी पंचवर्षीय व अन्य योजनाओं के माध्यम से लघु उद्‌योग के विकास के लिए वह निरंतर प्रयासरत है ।

सभी सरकारी एवं गैर सरकारी विद्‌यालयों में तकनीकी तथा व्यवसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है । बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रण में लेने हेतु विभिन्न परिवार कल्याण योजनाओं को लागू किया गया है । सभी बड़े शहरों में रोजगार कार्यालय खोले गए हैं जिनके माध्यम से युवाओं को रोजगार की सुविधा प्रदान की जाती है ।

परंतु विभिन्न सरकारों ने यह स्वीकार किया है कि रोजगार कार्यालयों के माध्यम से बहुत थोड़ी संख्या में ही बेराजगारों को खपाया जा सकता है क्योंकि सभी स्थानों पर जितने बेकार हैं उसकी तुलना में रिक्तियों की संख्या न्यून है । इस कारण बहुत से लोग असंगठित क्षेत्र में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने के लिए विवश हैं ।

वर्तमान में सरकार इस बात पर अधिक बल दे रही है कि देश के सभी युवक स्वावलंबी बनें । वे केवल सरकारी सेवाओं पर ही आश्रित न रहें अपितु उपयुक्त तकनीकी अथवा व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर स्वरोजगार हेतु प्रयास करें ।

नवयुवकों को उद्‌यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान कर रही है तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी सहयोग कर रही है । हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि बदलते परिपेक्ष्य में हमारे देश के नवयुवक कसौटी पर खरे उतरेंगे और देश में फैली बेरोजगारी जैसी समस्या से दूर रहने में सफल होंगे ।

बेरोजगारी की समस्या पर निबंध-Berojgari Ki Samasya Essay In Hindi

( बेरोजगारी की समस्या पर निबंध |Unemployment Essay in Hindi) :-आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारा देश भारत कई प्रकार की समस्याओं से उभर नहीं पाया है। इन समस्याओं में एक सबसे बड़ी समस्या है – बेरोजगारी की समस्या। बेरोजगारी का अर्थ है कार्य सक्षम होने के बावजूद एक व्यक्ति को उसकी आजीविका के लिए किसी रोज़गार का न मिलना| रोज़गार के अभाव में व्यक्ति मारा-मारा फिरता है|

ऐसे में तमाम तरह के अवसाद उसे घेर लेते हैं, फिर तो न चाहते हुए भी कई बार वह ऐसा कदम उठा लेता है, जिनकी कानून इजाजत नहीं देता| राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन ने बेरोजगारी को इस प्रकार से परिभाषित किया है यह वह अवस्था है, जिसमें काम के आभाव में लोग बिना कार्य के रह जाते है|

यह कार्ययत व्यक्ति नहीं है, किंतु रोजगार कार्यालयों, मध्यस्थो, मित्रों, संबंधियों आदि के माध्यम से या संभावित रोज़गारदाताओं का आवेदन देकर या वर्तमान परिस्थितियों और प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने की इच्छा प्रकट कर कार्य तलाशते है|

बेरोजगारी के कारण नवयुवक नौकरी की तलाश में प्रतिदिन दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं तथा अखबारों, इन्टरनेट आदि में दिए गए विज्ञापनों द्वारा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की खोज में लगे रहते हैं, परन्तु उन्हें रोजगार की प्राप्ति नहीं होती। केवल निराशा ही उनके हाथ लगती है।

देश में उद्योगों का विकास करना चाहिये ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें। देश में विदेशी पूँजी व उन्नत तकनीक को आकर्षित करना चाहिये जिससे रोजगार में वृद्धि होती है तथा बेरोजगारी कई समस्याओं को जन्म देती हैं जैसे भ्रष्टाचार, आतकंवाद, अराजकता इत्यादि। युवा वर्ग की शक्ति एवं ऊर्जा के प्रयोग के लिये उन्हें सही शिक्षा और उसके बाद उचित मार्गदर्शन मिलना जरूरी है, वरना युवक भटक जाते हैं और समाज में बुराईया फैलती हैं।

आज पढ़ा लिखा व्यक्ति रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत में माँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योग स्थापित नहीं हो रहे हैं, वहीं उत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है।

हमारा देश अधिक जनसंख्या वाला है । इसलिए यहां पर बड़े उद्योगों तथा घरेलू उद्योगों का विकसित किया जाना परमावश्यक है । जहां तक बड़े उद्योगों का सम्बन्ध है वह तो निजी सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित हुए है, परन्तु इससे हमारी बेकारी की समस्या का समाधान नहीं निकल सकता जब तक कि घरेलू दस्तकारी को प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा । हमारे गांवों में कृषक वर्ष में छ: मास तक बेकार रहते हैं ।

इन गांवों में कुटीर एवं लघु उद्योगों का पतन होने के कारण बेकारी भी बढ़ गई है । प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में पैतृक व्यवसाय को अपना लिया जाता था जिससे बेकारी उत्पन्न ही नहीं होती थी । लेकिन अब शिक्षा के प्रसार तथा वर्ग-व्यवस्था के भंग हो जाने से पैतृक व्यवसाय को साधारणतया मृणा की दृष्टि से देखा जाता है तो पुत्र पिता के व्यवसाय को अपनाने के लिए तैयार नहीं होता ।

आजकल पढ़ा लिखा व्यक्ति भी रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत में माँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योग स्थापित नहीं हो रहे हैं, वहीं उत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है।

बेरोजगारी धीरे धीरे एक अभिशाप बनते चले जा रहा। एक बड़ी कहावत है – खाली मन शैतान का घर होता है। इसीलिए तो नौजवानों के लिए करियर के अच्छे अवसर और बेरोजगारी न होने के कारण ही समाज में लूट-पाट, चोरी-चकारी, दंगा-फसाद, और नशा जैसी बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो रही है।

अन्य शिक्षा और स्वच्छ भारत अभियान की तरह ही बेरोजगारी की समस्या का भी हल निकालने की बहुत आवश्यकता है। जब तक देश में सभी नागरिकों को उनकी योग्यता व आवश्यकता के अनुसार काम नहीं मिलता तब तक एक स्वच्छ, सुखी और उन्नत देश का निर्माण असंभव है।

भारत में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से चली आ रही है; किंतु वर्तमान समय में इसने विकराल रूप धारण कर लिया है । द्वितीय महायुद्ध के पूर्व भी बेरोजगारी की समस्या थी । महायुद्ध के समय अधिकांश व्यक्तियों को उनके अनुरूप काम मिल गया । सबको पेट भर खाना मिलने लगा; किंतु युद्ध की समाप्ति के पश्चात् बेकारी की समस्या दोगुनी हो गई ।

देश में वस्तुओं और नौकरियों का अभाव होते हुए भी बड़ी मात्रा में श्रमिक-शक्ति शून्य पड़ी है । एक ओर तो देश में सभी प्रकार के उत्पादन की कमी है तथा दूसरी ओर मानव-संसाधन अब तक अप्रयुक्त खड़े हैं । स्पष्टतया पूंजी और साहस की कमी ही बेरोजगारी का प्रमुख कारण है ।

उत्तरी भारत में किसानों को वर्ष में सात महीने बेकार रहना पड़ता है । भूमिहीन श्रमिकों की दशा और भी दयनीय है । इनकी संख्या कुल ग्रामीण जनता का 20 प्रतिशत है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ ।

इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा । यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा पद्धति में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ । उन्हें आवश्यक व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सकें । विद्‌यालयों में तकनीकी एवं कार्य पर आधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें ।

बेरोजगारी कई समस्यों को जन्म देती है जैसे भ्रष्टाचार, आतंकवाद ,अराजकता वादी इत्यदि।  युवा वर्ग की शक्ति एवं ऊर्जा के प्रयोग के लिए उन्हें  सही शिक्षा और उसके पश्चात उचित मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है ,वरन युवक भटक जाते हैं और समाज में बुराइयाँ फैलती है।

हमारे देश में जनसंख्या में दिन-प्रतिदिन अत्यधिक वृद्धि हो रही है । वर्ष भर में जितने व्यक्तियों को काम- धन्धों में लगाया जाता है उससे कई गुणा अधिक और बेकारों की संख्या को बढ़ा देते हैं । लेकिन जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि इस समस्या को हल नहीं होने देती । इसलिए जनसंख्या की इस वृद्धि को हर हालत में रोकना चाहिए ।

 बेरोजगारी को दूर करने का उपाय:-

बेरोज़गारी दूर करने के लिए हमें जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, कुटीर उद्योगों का विकास, औद्योगीकरण, सहकारी खेती, सहायक उद्योगों का विकास, राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी विभिन्न कार्य आदि करने चाहिए। नवयुवकों को उद्यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान किये जाए तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम लगाए जाए जिससे व्यक्ति स्वयं रोजगार उत्पन्न कर सके। प्रत्येक समस्या का समाधान उसके कारणों में छिपा रहता है |

अतः यदि ऊपर-कथित कारणों प्र प्रभावी रोक लगाई जाए तो बेरोज़गारी की समस्या का काफी सीमा तक समाधान हो सकता है | हम भारतीयों को स्वयं को ज्ञान और नए आविष्कारों के माध्यम से इतना सक्षम बनाना होगा जिससे विश्व भर के बड़ी कंपनियों को हमारी ताकत का पता चल सके और वह भारत में निवेश करें तथा अपनी कंपनियां शुरू करें।

इससे हमारे देश के लोगों को करियर के नए अवसर प्राप्त होंगे और हमारे देश को विकसित होने में मदद मिलेगी। हाल ही में सरकार ने भी भारत के नौजवानों को आगे ले जाने के लिए कई प्रकार के योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुद्रा लोन योजना, आवास योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, सुकन्या समृद्धि योजना शुरू किया है।लोगों को सरकार की इन योजनाओं से जुड़ना चाहिए और इन योजनाओं के माध्यम से अपने आने वाली पीढ़ी को शिक्षित बनाना चाहिए जिससे वह हमारे देश भारत का भविष्य बन सकें।

व्यवसिक शिक्षा, लघु उद्योगों को प्रोत्साहन, मशिनिकरण प्र नियंत्रण, कंप्यूटरीकरण पर नियंत्रण, रोज़गार के नए अवसरों की तलाश, जनसंख्या पर रोक आदि उपायों को शीघ्रता से लागु किया जाना चाहिए |

हमारे समाज की एक और सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर युवा अपनी शिक्षा के बाद नौकरी करने के विषय में बहुत सोचते हैं। जबकि हमारे युवाओं को सोचना चाहिए कि वह अपनी शिक्षा के बाद अपने ज्ञान की मदद से कोई  लघु उद्योग शुरू करें जिससे  उन्हें नौकरी की जरूरत ना पड़े।

उद्योग शुरू करने का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह स्वयं तो सफल बनेंगे साथ ही उनके उद्योग के माध्यम से और भी नौजवानों और देश के नागरिकों को नौकरी के नए अवसर प्राप्त होंगे। चाहे गांव हो या शहर, हर जगह एक छोटे से व्यापार को शुरू कर सकते हैं और अगर शुरू करने के लिए पूंजी नहीं है तो बैंक से लोन लेकर भी शुरू कर सकते हैं।

बेरोजगारी समाज में विभिन्न समस्याओं का मूल कारण है। हालांकि सरकार ने इस समस्या को कम करने के लिए पहल की है लेकिन उठाये गये उपाय पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। इस समस्या के कारण विभिन्न कारकों को प्रभावी और एकीकृत समाधान देखने के लिए अच्छी तरह से अध्ययन किया जाना चाहिए।

यह समय है कि सरकार को इस मामले की संवेदनशीलता को पहचानना चाहिए और इसे कम करने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाने चाहिए। बेरोजगारी बेकारी देश की एक विकट समस्या है । यह उस बीमारी के समान है जो अनेक बीमारियों को जन्म देती है । यह अपराधों तथा अनेक प्रकार के अत्याचार करने के लिए विवश करती है ।

यह व्यक्ति की सच्चाई, उसकी ईमानदारी, दया और सहानुभूति का गला घोंटती है । अतः केन्द्र तथा राज्य सरकारों का यह कर्तव्य है कि बेरोजगारी को दूर करने का सफल प्रयत्न करें ।तो दोस्तों हम उम्मीद करते हैं की आपको ( बेरोजगारी की समस्या पर निबंध |Unemployment Essay in Hindi) पर निबंध  काफी पसंद आयी होगी और इसे आप अपने दोस्तों के साथ शेयर करना चाहेंगे

बेरोजगारी की समस्या का समाधान पर निबंध,

शिक्षित बेरोजगारी की समस्या,

बेरोजगारी पर निबंध हिंदी में,

बेरोजगारी पर निबंध इन हिंदी,

बेरोजगारी की परिभाषा,

बेरोजगारी की समस्या short essay,

बेरोजगारी की समस्या और समाधान pdf,

बेरोजगारी एक समस्या निबंध मराठी,

bekari ki samasya essay in hindi,

essay on berojgari in hindi for class 6,

bharat me berojgari ki samasya,

berojgari ki samasya par anuched,

berojgari essay in english,

berojgari ki samasya essay in punjabi,

berojgari ke karan in hindi,

berojgari ki samasya par nibandh hindi mein,

solution of unemployment in hindi,

types of unemployment in hindi,

bekari ki samasya essay in hindi,

essay on berojgari in hindi for class 6,

berojgari essay in english,

bharat me berojgari ki samasya,

rural unemployment in hindi,

berojgari ke karan in hindi,

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध :

भूमिका : भारत में सबसे बड़ा लोकतंत्र है और कई जातियों और धर्मों में विभाजित है। छुआछूत भारत के हिन्दू समाज से जुडी हुई एक बहुत ही गंभीर समस्या है। छुआछूत हमारे देश के लिए एक ऐसी बीमारी है जो दूसरी समस्याओं को पैदा करती है। छुआछूत दीमक की तरह होती है जो हमारे देश को अंदर से खोखला कर रही है।

हमारे देश में अनेक समस्याएँ हैं लेकिन छुआछूत बहुत ही भयंकर और घातक सिद्ध होने वाली समस्या है। किसी विद्वान् ने कहा था कि छुआछूत इन्सान और भगवान दोनों के प्रति एक पाप है। छुआछूत एक ऐसा कलंक है जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि मेरा कोई अपना देश ही नहीं है जिसे मैं अपना देश कहता हूँ उस देश में हमारे साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता है।

छुआछूत का अर्थ : छुआछूत का अर्थ होता है – जो स्पर्श करने योग्य न हो। जब किसी व्यक्ति के समूह या समुदाय को अस्पर्शनीय माना जाता है और उसके हाथ की छुई हुई वस्तु को कोई नहीं खाता उसे छुआछूत कहते हैं। उन लोगों के साथ कोई भी मिलजुल कर नहीं रहता और न ही उनके साथ कोई खाना खाता है।

जिन लोगों से निचली जाति का काम करवाया जाता है उन्हें अछूत कहा जाता है। प्राचीनकाल में महाराजाओं के द्वारा किसी व्यक्ति के व्यवसाय क देखकर ही उसके धर्म की स्थापना की गई थी। उस समय पर हर किसी ने अपने धर्म को खुद चुना था। ब्राह्मण लोगों को शिक्षा देते थे , क्षत्रिय देश और समाज की रक्षा किया करते थे।

वैश्यों का काम व्यापार और वाणिज्य की देखभाल करना और शूद्रों का काम ऊपर की तीन जातियों की सेवा करना था। लेकिन कालान्तर में ये विभाजन रूढ़ हो गया था। एक वेद में भी कहा गया है कि मैं एक शिल्पी हूँ। मेरे पिता वैश्य हैं और मेरी माँ उपले थापने का काम करती हैं। प्राचीनकाल में एक ही परिवार के लोग अलग-अलग काम करते थे फिर भी वे ख़ुशी से रहते थे। उन लोगों में उंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं था।

भारत के अछूत लोग : हमारे भारत में हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के अनुसार चार जातियाँ हैं – ब्राह्मण , क्षत्रिय , सैनिक , शुद्र आदि। जो लोग हरिजन जाति मतलब दबी हुई जाति के होते हैं उन्हें अछूत कहते हैं। अछूत लोगों को हिन्दू की वर्ण-व्यवस्था की जातियों में नहीं गिना जाता हैं। अछूत लोगों को बहिष्कृत जाति का व्यक्ति समझा जाता है।

अछूतों को हिन्दू की जाति व्यवस्था में नहीं गिना जाता है। अछूत वर्ण एक अलग पांचवां वर्ण स्थापित किया गया है। प्राचीनकाल में जो लोग घटिया स्तर का काम करते थे या निचली जाति के लोग जो नौकरों का काम करते थे वे अपराधी होते थे और जिन लोगों को छूत की बीमारी होती थी वे लोग देश से बाहर ही रहते थे।

जो लोग सभ्य होते थे वो लोग उन लोगों को ही अछूत कहते थे। ऐसे लोगों से दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया जाता था क्योंकि यह बीमारी छूने से होती थी। उस समय पर छूत बीमारी वाले लोग दूसरे लोगों के लिए बहुत ही हानिकारक होते थे।

उस समय इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं था इसी वजह से छूत लोगों को दूसरे लोगों को स्वस्थ रखने के लिए उस राज्य से दूर भेज दिया जाता था ताकि यह बीमारी किसी और को ना हो। छुआछूत एक तरह का दंड होता है जो उन लोगों को दिया जाता था। जो लोग राज्य के बनाए हुए कानूनों को तोड़ता था और समाज की व्यवस्था में एक बाधा पैदा करता था।

जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें दलित कहा जाता है। उन्हें इस नाम से इसलिए बुलाया जाता है क्योंकि जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें भी अछूत ही माना जाता है। सफाई , चमडा ,स्वच्छता , मृत शरीरों को हटाने वाले लोगों को अछूत माना जाता है।

छुआछूत को दूर करने के प्रयत्न : छुआछूत को एक बुराई के रूप में समाज ने स्वीकार किया है जिसको दूर करने के लिए प्राचीनकाल से ही कोशिशें की जा रही हैं। बहुत से महापुरुषों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन फिर भी यह समस्या वैसी की वैसी बनी रही। महात्मा बुद्ध ने इसके खिलाफ सशक्त आवज उठाई थी।

रामायण को दिखाकर इस भेदभाव को समाप्त करने की भी कोशिश की गई। उन्हें श्री राम के गुहराज , शबरी और भीलों के संग मेल-मिलाप की बातें बताई गयीं। सबसे पहले तो दयानन्द जी ने छुआछूत को खत्म करने की जिम्मेदारी ली थी। एक तरफ तो उन्होंने मूल हिन्दुओं को हिन्दू बनाया था दूसरी तरफ उन्हें अछूत कहकर गले से लगाया था।

आर्य समाज में भी अछूतोद्धार शब्द का प्रयोग किया गया था। वे खुद जाकर हरिजन बस्ती में रहे थे जिसका अर्थ होता है भगवान का प्यारा व्यक्ति। हरिजन में रहने वाले लोगों के लिए भीम राव अंबेडकर ने बहुत ही उत्थान काम किया था उससे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।

युवाओं के विचारों को बदला जा रहा है और भी चीजों में धीरे-धीरे परिवर्तन किये जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा और वैश्वीकरण से भी युवाओं की सोच को बदला जा रहा है इसे धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से सोच को बदला नहीं गया है।

जब संविधान का निर्माण किया गया था तब यह निर्धारित किया गया था कि समाज में फैली बुराईयों का उन्मूलन करने के लिए पिछड़ी जातियों के उत्थान में संविधान में प्रावधान किये जायेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान में अनुच्छेद 17 बनाया गया था।

अछूतों के साथ भेदभाव : भारत के दलितों के साथ एन.सी.डी.एच.आर.के अनुसार बहुत भेदभाव किया जाता है। अछूत लोगों के साथ कोई भी भोजन नहीं कर सकता। कोई भी किसी अलग जाति के सदस्य से शादी नहीं कर सकता। गांवों में चाय की दुकानों पर अछूत लोगों के लिए अलग बर्तन होते हैं।

अछूत लोग मंदिरों में नहीं जा सकते। अछूत लोगों को सार्वजनिक रास्ते पर चलना मना होता है। अछूत बच्चों को स्कूलों में अलग बैठाया जाता है। अछूतों के लिए होटलों में बैठने के लिए और खाने के लिए अलग बर्तनों की व्यवस्था होती है। अछूतों के लिए गांवों के कार्यक्रम या त्यौहारों में बैठने और खाने के लिए अलग व्यवस्था होती है।

जब अछूत लोग अपना काम करने से मना कर देते हैं तो समाज से उनका बहिष्कार कर दिया जाता है। अछूत लोगों को उच्च जाती के लोगों के सामने छाता लगाना और चप्पल पहनना मना है। अछूत लोगों के लिए अलग शमशान बनाया गया है। उनसे कोई अन्य जाति का सदस्य दोस्ती नहीं कर सकता।

वर्तमान युग में छुआछूत के बने रहने के कारण :- आज भी हमारे समाज में जाति और जन्म के बीच आज भी भेदभाव किया जाता है। आज भी हम देख सकते हैं कि गाँव और कस्बों के लोगों में छुआछूत का व्यवहार किया जाता है। आज के युग में भी अछूत लोगों को पनघटों और मन्दिरों में जाने से रोका जाता है। उनके रहने के लिए जगह भी अलग दी जाती है।

आख़िरकार ये कुप्रथा अब तक किस प्रकार से बनी हुई है ? शहरों में जो लोग कूड़ा बीनते हैं उन लोगों को भी अछूतों की नजर से देखा जाता है। बुराई हिन्दू समाज के लोगों में बहुत ही गहराई तक पहुंच गई है इसी वजह से आजादी के बाद भी आज तक ये समस्या अलग-अलग तरह से समाज में बनी हुई है।

जो लोग छुआछूत में विश्वास रखते हैं उनके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाई की जाती है क्योंकि छुआछूत के खलिफ कानून बनाए गये हैं। ऐसा करने से भी छुआछूत की समस्या खत्म नहीं हो रही है। इस प्रथा के अब तक बने रहने का सबसे बड़ा कारण हमारे देश में उचित शिक्षा का न होना है। जो लोग अछूत समझे जाते हैं वे लोग आज भी अशिक्षित और रूढ़ग्रस्त होते हैं।

उन के पास अभी तक अन्य ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुँचा है। हम लोग प्राय देखते हैं कि जो हरिजन लोग शिक्षा को प्राप्त करते हैं वे अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार लेते हैं और उन्हें अछूत नहीं माना जाता है। अछूतों की आर्थिक स्थिति भी एक प्रकार से छुआछूत की समस्या का एक बहुत ही मुख्य कारण है।

छुआछूत के दुष्परिणाम : सारे जगत में छुआछूत के सामाजिक , राजनितिक , धार्मिक और संस्कृतिक दुष्परिणाम बहुत ही प्रचलित हैं। आज के युग में हमारा देश आगे तो बढ़ रहा है पर फिर भी छुआछूत की समस्या की वजह से देश के एक बहुत बड़ा भाग को सुख-सुविधाओं से अभी तक परिचित नहीं कराया गया है।

जो हरिजन गाँव में रहते हैं उनके पास जीवन को जीने के लिए सुविधाएँ बहुत ही कम होती हैं। हमारे देश में गरीबी का एक कारण छुआछूत भी है। जब तक अच्चुत लोगों को समाज की मुख्यधारा में स्थान नहीं मिल जाता तब तक देश का समुचित विकास कभी नहीं हो सकता है।

हमारा देश कई साल पहले आजाद हो चूका है लेकिन हरिजन वर्ग आज तक राजनितिक ,आर्थिक और सामाजिक रूप से आजाद नहीं हो पाया है। हम लोगों से समय यह मांग करता है कि छुआछूत को समाप्त कर दिया जाये। प्राचीनकाल में लोग यह मानते थे की अगर अछूत लोग उन्हें छू लेते या फिर उनकी परछाई भी उन पर पड़ जाती थी तो वे अपवित्र हो जाते हैं और दोबारा से पवित्र होने के लिए उन्हें गंगा जल से स्नान करना पड़ता है।

उपसंहार :- आज के युग में भी छुआछूत की समस्या हमारे लोगों के बीच की दीवार बनी हुई है। आज के समय में भी कुछ लोग अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ , उच्च और योग्य समझते हैं। हरिजन वर्ग के लोगों पर आज भी अत्याचार किया जाता है उनके साथ जानवरों से भी बुरा बरताब किया जाता है।

जब चुनाव होते हैं तो लोगों को अपने मत को स्वंय चुनने का अधिकार नहीं दिया जाता है। आज भी बंधुआ मजदूर के रूप में बहुत से लोग अमीरों के दास बने हुए हैं। हमारी सरकार अछूतों की आर्थिक स्थिति को सुधरने के लिए अनेक प्रयास कर रही है। जो लोग अछूत माने जाते हैं उन्हें भी अपनी तरफ से कुछ प्रयास करने चाहिए। जब तक वे शिक्षित नहीं हो जाते तब तक उनका सुधार होना असंभव है।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

अस्पृश्यता या छूआछूत परम्परागत हिन्दू समाज से जुड़ी सामाजिक बुराई और एक गंभीर खतरा है। ये बहुत से समाज सुधारकों के विभिन्न प्रयासों के बाद भी जैसे डॉ. भीमराव अंबेडकर और उनके द्वारा निर्मित संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन के बावजूद ये अति प्राचीन समय से प्रचलित प्रथा आज भी प्रचलन में है।

छूआछूत (अस्पृश्यता) क्या है?

अस्पृश्यता या छूआछूत एक सामान्य शब्द है जिसे अभ्यास द्वारा समझा जा सकता है जहाँ एक विशेष जाति या वर्ग के व्यक्ति को निम्न जाति में जन्म लेने या उस निचली जाति समूह से संबंध रखने के कारण उस समूह से निचले स्तर के कार्यों को कराकर भेदभाव किया जाता है। उदाहरण के लिये; तथाकथित ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उच्च जाति के लोग भंगी के साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते।

ये मान्यता है कि अस्पृश्य या अछूत लोगों से छूने, यहाँ तक कि उनकी परछाई भी पड़ने से उच्च जाति के लोग अशुद्ध हो जाते है और अपनी शुद्धता वापस पाने के लिये उन्हें पवित्र गंगा-जल में स्नान करना पड़ता है।

भारत में अस्पृश्य या अछूत कौन है?

हिन्दूओं की परंपरागत प्राचीन “वर्ण-व्यवस्था” के अनुसार, एक व्यक्ति का जन्म कर्म और ‘शुद्धता’ के आधार पर चारों में से किसी एक जाति में होता है। जिनका जन्म ब्राह्मण वर्ण में होता है वो पुजारी या शिक्षक होता है, क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाला शासक या सैनिक; वैश्य वर्ण में जन्म लेने वाला व्यापारी और शूद्र वर्ण में जन्म लेने वाला मजदूर होता है।

अछूत सचमुच बहिष्कृत जाति है। वो किसी भी हिन्दूओं की परंपरागत “वर्ण व्यवस्था” में सीधे रुप से गिनती में नहीं आते। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार, अछूत पूरी तरह से नया वर्ग है उदाहरण के तौर पर पहले से स्थापित चार वर्णों से अलग पांचवां नया वर्ण है। इस प्रकार, अछूत हिन्दूओं की जाति व्यवस्था में पहचाने नहीं जाते।

हांलाकि, ऐतिहासिक रुप से निचले स्तर के व्यक्ति जो घटिया निम्न स्तर के नौकर-चाकर वाले कार्य करते थे, अपराधी, व्यक्ति जो छूत (छूने से फैलने वाली बीमारी) की बीमारी से पीड़ित होते थे, वो समाज से बाहर रहते थे, उन्हें ही सभ्य कहे जाने वाले नागरिकों द्वारा अछूत माना जाता था। उस समय उस व्यक्ति को समाज से निष्काषित इस आधार पर किया जाता था कि वो समाज के अन्य लोगों के लिये हानिकारक है, उसकी बीमारी छूने से किसी को भी हो सकती है और उस समय में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं था जिसकी वजह से उसे समाज से बाहर अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा के लिये रखा जाता था।

अस्पृश्यता दंड़ के रुप में भी दी जाने वाली प्रथा थी जो उन व्यक्तियों को दी जाती थी जो समाज के बनाये हुये नियमों को तोड़कर समाजिक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करते थे।

दलित कौन है?

दबी हुई जाति (दबाब में जीने वाले), हरिजनों आदि को अस्पृश्य या अछूत के रुप में जाना जाता है; लेकिन आज उन्हें दलित कहा जाता है। आधुनिक समय में, दलित, एक व्यक्ति के स्तर की अपेछा उसकी जाति को संबोधित किया जाता है। ऐसा उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अस्पृश्य कहे जाने वाले, घटिया काम करने वाले व्यक्ति के घर या उससे संबंधित किसी भी सदस्य के घर में पैदा होते है। ऐसा सिर्फ इसलिये कहा या किया जाता है कि उनके परिवार का सदस्य अछूत था तो पंपरागत रुप से उससे जुड़ा हर व्यक्ति या समुदाय भी उसी श्रेणी में आयेगा। वो अपवित्र और दूषित माने जाते है जिसके कारण शारीरिक और सामाजिकता से बाकि के समाज से निष्काषित करके पृथक या अलग रखे जाते है।

आजकल अनुसूचित जाति या जनजाति (एस.सी/एस.टी.) के सदस्यों को ‘दलित’ माना जाता है और उन्हें समाज में विभिन्न प्रकार के भेदभावों का विषय बनाया जाता है। विशेषरुप से अनुसूचित जाति जैसे चमार, पासी और भंगी को दलित के रुप में माना जाता है, ये लोग सामान्यतः निकृष्ट (निचले स्तर के काम) कामों जैसे गंदगी साफ करना, चमड़े से चीजें बनाने का काम करना, झाड़ू लगाना, कूड़े या कचरे से काम की चीजें खोजकर बेचना आदि को करते है।

 

दलित या अस्पृश्यों के साथ भेदभाव के प्रकार

नेशनल कैंपेन ऑफ दलित ह्यूमैन राइट्स (एन.सी.डी.एच.आर.) के अनुसार, भारत में दलितों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के भेदभावों को किया जाता है जो निम्न है:

  • अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करना निषेध।
  • किसी अन्य जाति के सदस्य के साथ शादी करना निषेध।
  • गाँवों में चाय के ठेलो पर दलितों के लिये चाय के अलग गिलास।
  • होटलों में बैठने की व्यवस्था में भेदभाव और खाने के लिये अलग बर्तन।
  • गाँवों में त्यौहारों और कार्यक्रमों में बैठने और खाने की अलग व्यवस्था।
  • मन्दिरों में प्रवेश पर निषेध।
  • शासित जाति के व्यक्तियों के सामने पैरों में चप्पल पहनने और छाता लगाने पर निषेध।
  • गाँवों में सार्वजनिक रास्ते पर चलना निषेध।
  • अलग शमशान (जहाँ मरे हुये व्यक्तियों को जलाया जाता है।)।
  • स्कूलों में दलित बच्चों के लिये अलग बैठने की व्यवस्था।
  • अपने कामों को करने से मना कर देने पर शासित जातियों द्वारा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन

भारत को 100 वर्षों के लम्बे दर्दनाक संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। ये संघर्ष केवल विदेशी ब्रिटिश शासन के ही खिलाफ नहीं था बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक बुराईयों जैसे छूआछूत के खिलाफ भी था। आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम के महान नेताओं ने संविधान का निर्माण करते समय निर्धारित किया कि समाज में फैली बुराईयों के उन्मूलन के संदर्भ में और पिछड़ी जातियों के उत्थान आदि के लिये संविधान में प्रावधान किया जाये।

इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुये अनुच्छेद 17 को संविधान में जोड़ा गया, जिसमें निम्न प्रावधान किये गये थे:

“अस्पृश्यता” का उन्मूलन हो और किसी भी तरह से इसे व्यवहार में लाने की अनुमति नहीं है। “अस्पृश्यता” के नाम पर किसी भी तरह का भेदभाव को अपराध मानते हुये कानून के अन्तर्गत दंड दिया जायेगा।”

इस प्रकार, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन करते हुये किसी भी रुप में अपनाने की अनुमति नहीं देता। साथ ही, ये इसे एक अपराध मानते हुये संसद में बनाये गये कानूनों के अन्तर्गत दंड का भी प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 17 को संविधान में मान्यता प्रदान करने के लिये संसद में अस्पृश्यता अधिनियम 1955 पारित किया गया था। ये अधिनियम हर तरह से भेदभावों को करने पर दंड का प्रावधान करता है, यद्यपि इसके लिये निर्धारित किया गया दंड कम होने के साथ ही इसका वास्तविकता में बहुत कम ही प्रयोग किया जाता है।

 

अस्पृश्यता या छूआछूत अधिनियम 1955 के क्रियान्वयन में बहुत की कमियाँ और बचने के तरीके थे जिसके कारण सरकार ने इसमें 1976 में संशोधन करके इसके दंड को और भी अधिक कठोर कर दिया। ये अधिनियम नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम में परिवर्तित कर दिया।

हांलाकि, अस्पृश्यता का खतरा लगातार बना हुआ है और दलितों के साथ आज भी भेदभाव किया जा रहा है, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सोचनीय है, उन्हें बहुत से नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं है और इसके साथ ही वो अनेक अपराधों, अपमान और तिरस्कार के विषय है।

इसके साथ ही समाज के दलित वर्ग के साथ हिंसा को रोकने के लिये संसद ने ‘अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम 1989 (हिंसात्मक निषेधता)’ को पारित किया। ये अधिनियम दलितों के साथ भेदभाव व हिंसा को रोकने के लिये और भी अधिक विस्तृत व दंडात्मक साधन उपलब्ध कराता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य दलितों को भारतीय समाज में सम्मान के साथ शामिल करना था।

ये ऊपर वर्णित अधिनियम दलितों/अस्पृश्यों के साथ होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिये अच्छे लक्ष्य और सकारात्मक उद्देश्य के साथ बनाये गये थे लेकिन वास्तविकता में ये अधिनियम उम्मीदों पर खरे उतरने में फेल हुये है।

अस्पृश्यता या छूआछूत: वर्तमान परिदृश्य

हमारे समाज में जाति और जन्म की श्रेष्ठा की भावना आज भी उपस्थित है। हम अपने जीवन में प्रतिदिन चारों तरफ के वातावरण में विशेषरुप से ग्रामीण और कस्बों में छूआछूत के व्यवहार का अनुभव करते है। यहाँ तक कि बड़े शहरों में भी कूड़े बीनने वालों से आज भी अमानवता का व्यवहार किया जाता है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पी.टी.आई.) की 3 जनवरी 2014 की सूचना के अनुसार, कर्नाटक पुलिस ने 4 चाय विक्रेताओं को छूआ-छूत को व्यवहार में लाने के लिये गिरफ्तार किया, वो हिन्दू और एस.सी. और एस.टी. जाति के लोगों को चाय देते समय अलग-अलग तरह के कपों का प्रयोग करते थे। ये घटना दिखाती है कि ये बुराई हिन्दू समाज में इतनी गहराई तक पहुँची हुई है कि आजादी के 67 साल के बाद भी अलग-अलग रुपों में उपस्थित है।

हांलाकि, ये कहा जाता है कि चीजें धीरे धीरे बदलती है; आधुनिक युवाओं की सोच में भी परिवर्तन हुआ है। आज के युवाओं की आधुनिक शिक्षा और वैश्विकरण के परिदृश्य ने सामाजिक स्तर पर समानता के विभिन्न आयामों पर सोच को बदला है और न कि धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से।

उम्मीद यही है कि अस्पृश्यता या छूआछूत की दुष्ट प्रथा समाज से बहुत जल्द खत्म हो जायेगी जिसके बाद हमारा देश सामाजिक समानता और भाईचारे के नये युग का प्रतिनिधिकर्ता होगा जो गाँधी और अंबेडकर का वो सच्चा भारत होगा जिसकी कल्पना उन्होंने आजादी और संविधान का निर्माण करने के समय की थी।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने पिछले दिनों मंदिरों में दलितों के प्रवेश निषेध को उचित ठहराते हुए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बयान का समर्थन किया है। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पिछले कुछ समय से मंदिरों में साई बाबा की पूजा-अर्चना का विरोध कर रहे हैं। वे मंदिरों से साई बाबा की मूर्तियों को हटाने की मुहिम में जुटे हैं। अब पुरी के शंकराचार्य का कहना है कि मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। ऐसी मानसिकता की प्रेरणा क्या है? द्वारका पीठ के शंकराचार्य जहां लोगों की आस्थाओं को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं पुरी के शंकराचार्य इस सनातनी राष्ट्र की बहुलतावादी मान्यताओं को कलंकित करने का प्रयास कर रहे हैं।

8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर आदि अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। हिन्दू परम्परा, दर्शन और चिंतन के प्रचार-प्रसार में चार पीठों, उत्तर में जोशी मठ, दक्षिण में शृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारका पीठ का अत्यंत महत्व है। स्वाभाविक प्रश्न है कि जिन संतों पर समाज को आध्यात्मिक राह दिखाने की जिम्मेदारी है, वे किस काल खंड में जी रहे हैं? वे किस शास्त्र के आधार पर 21वीं सदी के समाज को संचालित करने का प्रयास कर रहे हैं? ऐसा यदि किसी शास्त्र और स्मृति में है भी तो वह कालबद्ध है और उसकी कोई प्रासंगिकता शेष नहीं रह गई है।

यह सही है कि भारतीय समाज में अनेक कुरीतियां रही हैं, किन्तु उन कुरीतियों को दूर करने के लिए अनेकों सुधारवादी सद्प्रयास हुए। रामायण के रचयिता वाल्मीकि दलित थे। आज उनके द्वारा सृजित रामायण और उसके साथ तुलसीकृत रामायण हर हिन्दू परिवार में पूर्ण आस्था और श्रद्धा के साथ पढ़ी जाती है। समाज में जातिपात और छुआछूत के लिए मनुस्मृति का उदाहरण दिया जाता है। कितने हिन्दुओं ने मनुस्मृति का अध्ययन किया होगा या कितने हिन्दू घरों में मनुस्मृति रखी जाती है? मनुस्मृति का उदाहरण देकर यह कहा जाता है कि परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैर से शूद्र की उत्पत्ति हुई। फिर सारे मांगलिक अनुष्ठानों में भगवान के चरणों में ही जल, पुष्प, नैवेद्य क्यों अर्पित किया जाता है? वास्तव में देखा जाए तो हिन्दू समाज में जो कुरीतियां थीं, उसे पोषित कर समाज को तोडऩे का काम विधर्मियों ने किया। ब्रिटिश शासकों ने उसे ही अपना गुरुमंत्र बनाया और समाज को जातियों में बांटकर अपने शत्रुओं को निस्तेज करने का काम किया।

जिस पुरी के स्वामी निश्चलानंद सरस्वती पीठाधीश हैं, उसी पुरी के जगन्नाथ धाम को विधर्मियों ने 18 बार लूटा है। इसमें से 17 हमले 14वीं सदी से 18वीं सदी में हुए। स्वाभाविक रूप से उस पुरी के पीठाधीश को समाज को जोडऩे का काम करना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है। इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्वित है। इसे लेकर मंदिर प्रबंधन की लंबे समय से आलोचना भी होती रही है। संत कबीर को भी पुजारी ने मुस्लिम मानते हुए उनके मंदिर-प्रवेश की मनाही की थी। गुरु नानक देव तीर्थाटन करते हुए जब पुरी पहुंचे तो उनके साथ भी पहले यही व्यवहार हुआ क्योंकि उनके साथ मुस्लिम शिष्य मर्दाना थे। कहा जाता है कि बाद में पुरी के गजपति राजा को स्वप्न आया जिसमें स्वयं भगवान ने कहा कि दोनों मेरे परम भक्त हैं तो संत कबीर और गुरु नानक देव जी को पूर्ण सम्मान के साथ प्रभु दर्शन के लिए ले जाया गया।

ब्रितानियों ने अपने साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए भारतीय समाज को जाति और वर्गों में बांटने की नीति अपनाई। पुरी मंदिर की इस विकृति के बारे में जब ब्रितानियों को खबर लगी तो उन्होंने फौरन इसे वैधानिक स्वीकृति दे दी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेस्ले ने अपने कमांडिंग अफसर कर्नल कैंपबेल को पुरी कूच करने से पूर्व ‘ब्राह्मणों के धार्मिक पूर्वाग्रहों’ का पूर्ण ध्यान रखने के कड़े निर्देश दिए थे। उनकी कूटनीति काम कर गई। ब्रिटिश फौज जब पुरी पहुंची तो उसे कहीं से किसी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति पर चलते हुए उन्होंने गैर-हिन्दुओं के मंदिर प्रवेश पर निषेध की जो परम्परा थी, उसे 1809 में कानूनी जामा पहना दिया।

आजादी के बाद परिस्थितियां बदलनी चाहिएं थीं किन्तु न केवल पुरी, बल्कि कई अन्य जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं। सभ्य समाज के लिए इस तरह का सामाजिक भेदभाव कलंक है। किन्तु हमारे यहां स्वयं समाज के अंदर से ही सुधार की आवाजें समय-समय पर उठती रही हैं। सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने के लिए गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, गांधी जी, डा. केशव बलिराम हेडगेवार, वीर सावरकर, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, संघ परिवार आदि करते आए हैं। मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर डा. भीमराव अम्बेदकर और वीर सावरकर ने सार्थक आंदोलन किए। सावरकर ने रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर की स्थापना की। नारायण गुरु और ज्योतिबा फूले आदि दलित थे और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुखर रहे।

हिन्दू समाज में भेदभाव और अलगाववाद का फायदा विधर्मियों को होता रहा है। जब अपने ही समाज में तिरस्कार और भेदभाव के शिकार व्यक्ति को छलावा या अन्य प्रलोभन के बल पर दूसरे मत के प्रचारक सम्मान देने का भरोसा देते हैं तो स्वाभाविक रूप से उस मत के प्रति प्रताडि़त व्यक्ति का आकर्षण भी बढ़ता है। शोषित और वंचित आदिवासी समाज में चर्च की दखल सामाजिक कार्य के लिए नहीं है। वह समाज में फैले भेदभाव का फायदा उठाकर अपने विस्तार और अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने में अपना ध्यान केन्द्रित रखे हुए है। निश्चलानंद सरस्वती जैसे विचारक वस्तुत: चर्च के मतांतरण अभियान में परोक्ष रूप से सहायक ही बनते हैं।

निश्चलानंद सरस्वती को आदि शंकराचार्य से जुड़ी एक घटना याद होगी। काशी में आदि शंकराचार्य स्नान व मंदिर जाने को निकले तो रास्ते में एक अछूत अपनी पत्नी और 4 कुत्तों के साथ खड़ा मिला। शंकराचार्य के शिष्य उनसे रास्ते से हटने को कहने लगे तो उसने कहा, ‘‘मैं कहां जाऊं? तुम्हारे अद्वैत सिद्धांत के अनुसार हर जीवात्मा परमात्मा है। मैं भला अपने से दूर कैसे जा सकता हूं?’’ आदि शंकराचार्य समझ गए। स्वयं भोलेनाथ उन्हें पाठ देने आए थे।

छुआछूत और भेदभाव का कभी कोई समर्थन नहीं कर सकता और न ही ग्रंथों में कहीं इसका उल्लेख है। उलटे सैंकड़ों प्रेरणादायक प्रसंग हैं। भगवान राम को अपनी नौका में सवार कराने वाला केवट कोई ब्राह्मण नहीं था। वह समाज के उपेक्षित वर्ग से था, किन्तु प्रभु राम ने क्या उसे दुत्कार दिया? नहीं, बल्कि उसे गले लगाया और कहा, ‘‘तुम संग सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।’’ श्री राम के हृदय में जो स्थान भरत के लिए था, वही स्थान केवट को दिया। वनवास काल में श्रीराम का तो अधिकांश समय कोलभीलों, वानरों के साथ गुजरा। उन्होंने गिद्धराज से मित्रता की, जो मांसाहारी था। ‘‘गीध अधम खग आमिश भोगी। गति दीन्हि जेहि याचत योगी,’’ उन्होंने गिद्धराज का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया।

शबरी के आश्रम में जब श्रीराम गए तो उसने अपना परिचय देते हुए कहा कि एक तो मैं कोलभील आदिवासी, ऊपर से अभागी नारी हूं। मैं बुद्धिहीन हर तरह से अधम हूं, किन्तु श्रीराम न केवल उसके भक्ति भाव से प्रसन्न हुए, बल्कि उसके जूठे बेर भी खाए। साधु-संतों का काम समाज को सही दिशा में प्रेरित करना है। इस बात में दो राय नहीं कि भारतीय समाज में अभी भी कई बुराइयां हैं और उसे दूर करने में साधु-संत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

छुआछूत की समस्या एक मानसिक विकृति,

छुआछूत wikipedia,

छुआछूत की कहानी,

अस्पृश्यता पर भाषण,

छुआछूत पर शायरी,

छुआछूत की बीमारी,

अस्पृश्यता निबंध,

अस्पृश्यता का अर्थ,

untouchability in hindi wikipedia,

short speech on untouchability in hindi,

how to remove untouchability in hindi,

chuachut par essay in hindi,

chuachut ek samajik bedi,

chuachut meaning in hindi,

how to remove untouchability in india in hindi,

short story on untouchability in hindi,

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi

नशा मुक्ति पर निबंध :

भूमिका : संघर्ष को मानव जीवन का दूसरा नाम कहा जाता है। इसी संघर्ष से व्यक्ति कुंदन की तरह शुद्ध और पवित्र बन जाता है जिन लोगों का ह्रदय कमजोर होता है या जिनका निश्चय सुदृढ नहीं होता है वे संघर्ष के आगे घुटने टेक देते हैं। वे अपनी सफलता से बचने के लिए नशे को सहारा बनाते हैं।

कहने का क्या है वे लोग तो कह देते हैं कि हम गम को भुलाने के लिए पीते हैं। इसी से हमारे मन को शांति मिलती है। नशा करने से दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है लेकिन क्या सचमुच नशा करने से व्यक्ति दुखों से मुक्त हो जाता है ? अगर ऐसा होता तो पुरे विश्व में कोई भी दुखी और चिंताग्रस्त नहीं होता।

सद्वृत्तियाँ बनाम दुष्प्रवृत्तियाँ : मानव जीवन बहुत ही निर्मल होता है। मानव जीवन में सात्विकता , सज्जनता , उदारता और चरित्र का उत्कर्ष होता है। वह खुद का ही नहीं बल्कि अपने संपर्क में आने वाले का भी उद्धार करता है। इसके विरुद्ध तामसी वृत्तियाँ मनुष्य को पतनोन्मुखी करती हैं उनका मजाक करती हैं।

एक पतनोन्मुख व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए भी बहुत ही घातक सिद्ध होता है। इसलिए समाज सुधारक और धार्मिक नेता समय-समय पर दुष्प्रवृत्तियों की निंदा करते हैं और उन से बचने के लिए भी प्रेरणा देते हैं। मदिरापान और नशा सब बुराईयों की जड़ होते हैं।

मदिरापान बुराईयों की जड़ : किसी विद्वान् ने यह बात बिलकुल सत्य कही है कि मदिरापान सब बुराईयों की जड़ होती है। मदिरा मनुष्य को असंतुलित बनाती है। शराबी व्यक्ति से किसी भी समाज की बुराई की अपेक्षा की जा सकती है। इसी कारण से हमारे शास्त्रों में मदिरापान को पाप माना जाता है।

शुरू में तो व्यक्ति शौक के तौर पर नशा करता है। उसके दोस्त उसे मुफ्त में शराब पिलाते हैं। कुछ लोग ये बहाना बनाते हैं कि वे थोड़ी-थोड़ी दवाई की तरह शराब को लेते हैं लेकिन बाद में उन्हें लत पड़ जाती है। जिन लोगों को शराब पीने की आदत पड़ जाती है उनकी शराब की आदत फिर कभी भी नहीं छूटती।

शराबी व्यक्ति शराब को पीकर विवेकशून्य हो जाता है और बेकार ,असंगत और अनिर्गल प्रलाप करने लगता है। उसकी चेष्टाओं में अशलीलता का समावेश होने लगता है। वह शिक्षा , सभ्यता , संस्कार और सामाजिक मर्यादा को तोडकर अनुचित व्यवहार करने लगता है। गाली -गलोंच और मारपीट उसके लिए आम बात हो जाती है।

मदिरापान पारिवारिक बरबादी का कारण : कहने को तो कम मात्रा में शराब दवाई का काम करती है। डॉ और वैद्य भी इसकी सलाह देते हैं लेकिन ज्यादा तो प्रत्येक वस्तु का बुरा है। ज्यादा पीने से ये शराब जहर बन जाती है। नशे की लत से हमने बड़े-बड़े घरों को उजड़ते हुए देखा है।

जिस पैसे को व्यक्ति खून-पसीना एक करके सुबह से लेकर शाम तक कमाता है जिसके इंतजार में पत्नी और बच्चे बैठे होते हैं वह नशे की हालत में लडखडाता हुआ घर पहुंचता है। पड़ोसी उसे देखकर उसका मजाक उड़ाते हैं ,मोहल्ले वाले उसकी बुराई करते हैं लेकिन बेचारी पत्नी कुछ नहीं कह पाती है। वह केवल एक बात से डरती रहती है कि उसका शराबी पति उसे आकर बहुत पीटेगा। इसलिए वह बेचारी दिल पर पत्थर रखकर जीवन को गुजार देती है।

विषैली शराब के दुष्परिणाम : विषैली शराब के दुष्परिणाम को रोज अख़बारों में पढ़ा जा सकता है। आर्थिक संकट होने की वजह से वह घटिया शराब पीने लगता है। शराब वाले भी ज्यादा पैसे कमाने के लिए शराब में मिलावट कर देते है। इस तरह की मिलावटी शराब हजारों की जान ले चुकी है तब भी यह प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई है।

पुलिस और सरकार की आँखों के नीचे यह काम बहुत ही तेजी से चल रहा है। लोग शराब पी रहे हैं और मर रहे हैं। समाचार पत्र छप रहे हैं और सब कुछ हो रहा है। सिनेमा में भी बार-बार इस बात को बताया जा रहा है लेकिन सरकार इसके विरुद्ध कदम ही नहीं उठा रही है। इसका कारण यह है की शराब बेचने वालों को राजनेताओं का संरक्षण मिला हुआ है।

नशाबन्दी कानून के लाभ : पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण ने शराब सेवन को बहुत ही बढ़ावा दिया है। शराब को पश्चिमी राष्ट्र के लोगों के लिए अनुकूल माना गया है क्योंकि वहाँ पर सर्दी अधिक पडती है। हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है। शराब को यहाँ के वातावरण के प्रतिकूल माना जाता है।

प्राचीन काल में मदिरालयों के सामने धरने दिए जाते थे। गाँधी जी ने इसके विरुद्ध रोजगार अभियान चलाया था। नशे से होने वाली हानियों को सामने रखकर भारत सरकार ने नशाबन्दी कानून बनाया था। इस कानून के अनुसार सिर्फ वो लोग शराब बेच सकते थे जिनके पास लाईसेंस होते थे। मद्य-निषेध के लिए समय-समय पर अनेक प्रयास किये गये है।

उपसंहार : देश में नशाबन्दी के बहुत से लाभ हो सकते हैं। हमारे बहुत से बड़े-बड़े नेता चारित्रिक पतन के लिए बार-बार चीखते-चिल्लते हैं। नशाबन्दी कानून के लागु होने से उन्हें रोना नहीं पड़ेगा। देश खुद सुधरने लगेगा और हजारों घर उजड़ने से बच जायेंगे।

देश सामूहिक शक्ति प्राप्त कर लेगा। इससे लोग चरित्रवान और बलवान बनेंगे। तामसी वृत्ति समाप्त हो जाएगी और सात्विक वृत्ति बढने लगेगी। इससे धर्म और कर्तव्य की भावना विकसित होगी।

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi

Short Essay on Nasha Mukti in Hindi Language – नशा मुक्ति पर निबंध ( 200 words )

आज के युवाओं में नशे के सेवन का प्रचलन बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। वह शराब, गुटखा , सीगरेट आदि नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। युवाओं का जीवन अंधकार में है। नशे में रहने वाला व्यक्ति अस्थाई रूप से असंवेदनशील रहता है। जिस व्यक्ति को नशे की लत लग जाती है वह अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक छवी को खो बैठता है। आज के युवा नशा करने को फैशन और बड़े गर्व की बात समझते हैं। नशे में धुत व्यक्ति अपने ही घर में चोरी तक कर बैठते हैं। नशा बहुत से संगीन अपराधों को जन्म देता है।

युवाओं और देश के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए लोगों को नशे के जाल से निकालना होगा। इसके लिए बहुत से नशा मुक्ति केंद्र भी खोले गए हैं। टीवी, पत्रिका आदि के माध्यम से लोगों को नशे से होने वाली हानियों के प्रति जागरूक करना होगा। नशा कर रहें लोगो और नशीले पदार्थ खरीदने और बेचने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए। देश को नशा मुक्त करने के लिए परिवार, समाज और देश को मिलकर कोशिश करनी होगी और नशे में फँस चुके व्यक्ति को प्यार और सहानुभूति से ही नशे से मुक्ति दिलानी होगी।

Essay on Nasha Mukti in Hindi Language – नशा मुक्ति पर निबंध ( 400 words )

आज के आधुनिक समस में लोग नशा करने के आदि होते जा रहें हैं। वह शराब, सिगरेट, तंबाकू, चरस आदि नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। नशे ने हमारे पूरे देश को घेर लिया है और लोगों की जिंदगी में अंधकार कर दिया है। ज्यादातर नशे का सेवन युवाओं में देखा जाता है क्योंकि वह विदेशों की संस्कृति को अपनाना चाहते हैं। वह नशा करने को फैशन समझते है और गर्व महसूस करते हैं। नशे के वजह से देश के युवा अंधकार में है और देश का भविष्य भी सुरक्षित नहीं है।

नशा करने वाला व्यक्ति अपना मान सम्मान सब कुछ खो देता है। वह अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को खराब कर लेता हैं। नशे की लत में पड़कर यह लोग पहले धन देकर नशीले पदार्थ खरीदते हैं। बाद में घर के सामान आदि भी बेचने लगते है। नशे की लत में पड़ा हुआ मनुष्य अस्थाई रूप से असंवेदनशील हो जाता है। नशे की लत के चलते लोग बहुत से अपराधों को भी अंजाम देते हैं। वह चोरी छिपे भी विदेशों से नशीले पदार्थ मंगवाते है। नशा बहुत सी गंभीर बिमारियों को जन्म देता है। इसकी वजह से लीवर और अमाशय कमजोर होता है। कैंसर जैसी गंभीर बिमारियाँ भी इसी से उत्पन्न होती है।

लोगों को नशे से मुक्त करना उनके और देश के भविष्य के लिए बहुत ही जरूरी है। इसके लिए बहुत से नशा मुक्ति केंद्र भी खोले गए है। देश को नशा मुक्त बनाने के लिए हमें और सरकार को मिलकर प्रयास करना होगा। लोगों को नशे से होने वाली हानियों के बारे में जागरूक करना होगा। संचार माध्यम जैसे की टीवी, अखबार और पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। नशीले पदार्थों का आयात भारत में बंद किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

यदि कोई फिर भी नशा करता हुआ या नशीले पदार्थ बेचता या खरीदता हुआ पाया जाता है तो उसे सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए। अगर देश के युवा नशा मुक्त होंगे और उनका भविष्य उज्जवल होगा तभी तो देश की उन्नति होगी। नशे में पड़े हुए व्यक्ति को प्यार और सहानुभूति से ही नशे से मुक्ति दिलाई जा सकती है। परिवार, समाज और देश के लोग मिलकर ही देश को नशा मुक्त बनाने में सहायता कर सकते हैं। सभी अवैध ठेके बंद किए जाने चाहिए। देश की सबसे बड़ी संपति उसके युवा होते है और उसकी समृद्धि के लिए युवा नशे से मुक्त होने चाहिए।

हम आशा करते हैं कि आप इस निबंध ( Essay on Nasha Mukti in Hindi – नशा मुक्ति पर निबंध ) को पसंद करेंगे।

 

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi

जीवन दो विपरीत ध्रुवों के बीच गतिमान रहता है। सुख और दुख, लाभ और हानि, यश और अपयश तथा जीवन और मृत्यु। ये कभी अलग न होने वाले दो किनारे हैं। सुख के समय में आनंद और उल्लास, हँसी और कोलाहल जीवन (essay on nasha mukti in hindi) में छा जाते हैं तो दुख में मनुष्य निराश होकर रूदन करता है। नैराश्य के क्षणों में बोझ और दुख को भुलाने के लिए वह उन मादक द्रव्यों का सहारा लेता है, जो उसे दुखों की स्मृति से दूर बहा ले जाते हैं। ये मादक द्रव्य ही नशा कहे जाते हैं। मादक द्रव्यों को लेने के लिए आज केवल असफलता और निराशा ही कारण नहीं बने हैं, अपितु रोमांच, पाश्चात्य दुनिया की नकल और नशे के व्यापारियों की लालची प्रवृत्ति भी इसमें सहायक होती है।

नशाखोरी : Essay on Nasha Mukti in Hindi

नशीले पदार्थ वे मादक और उत्तेजक पदार्थ होते हैं। जिनका प्रयोग करने से व्यक्ति अपनी स्मृति और संवेदन-शीलता अस्थायी रूप में खो देता है। नशीले पदार्थ स्नायु तंत्र को प्रभावित करते हैं और इससे व्यक्ति उचित-अनुचित, भले-बुरे की चेतना खो देता है। उसके अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं, वाणी लड़खड़ाने लगती है, शरीर में कंपन होने लगता है। आँखें असामान्य हो जाती हैं। नशा किए हुए व्यक्ति को सहजता से पहचाना जाता है। नशीले पदार्थों में आज तंबाकू भी माना जाता है, क्योंकि इससे शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। लेकिन विशेष रूप से जो नशा आज के युग में व्याप्त है, उसमें- चरस, गांजा, भांग, अफीम, स्मैक हेरोइन जैसी ड्रग्स उल्लेखनीय हैं। शराब भी इसी प्रकार का जहर है, जो आज भी सबसे अधिक प्रचलित है।

शराब जैसे नशीले पदार्थ का प्रचलन तो समाज में बहुत पहले से ही था, लेकिन आधुनिक युग में पाश्चात्य संस्कृति से नशे को नए रूप मिले हैं। मारफीन, हेरोइन तथा कोकीन जैसे संवेदन मादक पदार्थ इनके उदाहरण हैं। इस नशे के व्यवसाय के पीछे आज अनेक राष्ट्रों की सरकार का सीधा संबंध होता है, जिनसे बड़े-बड़े अधिकारी वर्ग भी सम्मिलित होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैले नशे के व्यवसायियों का जाल बहुत ही संगठित होता है। पाश्चात्य देशों में ‘हिप्पी वर्ग‘ का उदय इस नशे के सेवन करने वाले लोगों के रूप में हुआ है। आज के भौतिकवादी जीवन में नशाखोरी के अनेक कारण हैं। आज के व्यस्त मशीनी जीवन में घर में बच्चों को परिवार का साथ और प्यार न मिलने से अकेलेपन की प्रवृत्ति ने इस नशे को अपनाया। स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों में होस्टल में रहने वाले विद्यार्थी इसके शिकार बन जाते हैं। इसके पीछे या तो नशे के व्यापारीयों का जाल होता है या अपने व्यक्तिगत कारणों से ये लोग नशे की ओर आकर्षित होते हैं। धनी परिवार के लड़कों को इस जाल में फँसाया जाता है और वे कभी-कभी धन के आधिक्य से भी तथाकथित झूठी शान दिखाने के लिए इस ओर मुड़ जाते हैं। उच्च संपन्न वर्ग में शराब का नशा तो प्रायः उनके स्तर का द्योतक और प्रतीक बन जाता है। भारत जैसे देश में शराब प्रमुख नशा माना जाता है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी इन नशे के नए रूपों के जाल में भी फँस गई है। युवा-वर्ग इस ओर अपनी बेकारी और असफलता के कारण भी आकर्षित हुआ है। दुखी और निराश युवक नशे का सहारा लेकर अपराधी प्रकृति के हो जाते हैं। आरंभ में ये दूसरे लोगों को नशा बेचकर धन भी कमाते हैं, लेकिन जब इस घेरे में घिरकर असहाय हो जाते हैं तो घर का सामान चुराकर, चोरी और अन्य साधनों से धन जुटाकार अपनी नशे की लत बुझाते हैं। संपन्न वर्ग के युवक भी इस अपराध में सम्मिलित हो जाते हैं।

शराब की लत पारिवारिक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक सभी स्तरों पर अपना कु-प्रभाव दिखाती है। इससे व्यक्ति के स्नायु संस्थान प्रभावित होते हैं, निर्णय और नियंत्रण शक्ति कमजोर होती है। आमाशय, लीवर और हृदय प्रभावित होते हैं। शराबी चालक सड़क पर हत्यारा बनकर निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारता है। पत्नी के आभूषण बेचता है, बच्चों की परवरिश और शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं कर पाता है और नशे की हालत में सड़कों और नालियों में गिरकर आत्मसम्मान भी बेचता है तथा दिवालिया भी बन बैठता है। लज्जा को त्याग कर अनैतिक और असामाजिक कर्मों की ओर भी उन्मुख होता है। संवेदन मादक पदार्थ हृदय, मस्तिष्क, श्रवण शक्ति, स्नायु, आँख आदि पर अपना प्रभाव दिखाते हैं और संवेदन क्षमता को अस्थायी रूप में मंद तथा विकृत कर देते हैं। एक बार इस नशे का लत पड़ने पर वे निरंतर इसमें धँसते चले जाते हैं और इसकी माँग बढ़ती ही चली जाती है। इस माँग को पूरा करने के लिए वह अपराधी कार्यों में भी भाग लेने लगता है। अनेक घर और परिवार इस भयावह नशे से उजड़ गए हैं और कई युवक जीवन से ही हाथ धो बैठते हैं। इन युवकों का प्रयोग अनेक असामाजिक संगठन भी करते हैं। आज के आतंकवाद फैलाने में, विनाशकारी हथियारों की खरीदारी में भी इनका हाथ रहता है। बड़े पैमाने पर ये हत्याएँ, लूट-पाट, आगज़नी तथा दंगे-फसाद करवा कर राष्ट्र की एकता के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न करते हैं।

इस दुष्प्रवृत्ति को रोकने के लिए (nasha mukti upay) सरकार और जनता दोनों का सक्रिय सहयोग ही सफल हो सकता है। सरकार में भ्रष्ट लोगों और अधिकारियों, जो इस अपराध में भागीदार होते हैं, को यदि कड़ी सजा दी जाए तो जनता के लिए यह एक उदाहरण और भय का कारण बन जाएगा। बड़े से बड़े गिरोह और व्यापारियों को भी कड़े दंड दिए जाने आवश्यक हैं। कठोर कानून बनाना और कठोरता से उनका पालन करना भी नितांत आवश्यक है। दोषी व्यक्ति को किसी भी रूप में, चाहे वह कोई भी हो, क्षमा नहीं करना चाहिए। संचार माध्यम, टी.वी., सिनेमा, पत्र-पत्रिकाएँ आदि भी इसके प्रति जनमत तैयार कर सकते हैं और लोगों की मानसिकता बदल सकते हैं। इसके लिए अनेक समाज सेवी संस्थाएँ, जो सरकारी और गौर-सरकारी रूप में कार्य करती हैं, महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। इस नशे में प्रवृत्त लोगों को, सहानुभूति और प्यार के द्वारा ही सही धीरे-धीरे रास्ते पर लाया जा सकता है। उनकी मनः स्थिति को बदलना और उन्हें सबल बनाकर तथा नशा विरोधी केंद्रों में उनकी चिकित्सा करवा कर उन्हें नया जीवन दिया जा सकता है।

भारत जैसे विकासशील देशों में इस प्रकार की प्रवृत्ति देशघाती होती है (nasha mukt bharat) और इससे युवाशक्ति को रचनात्मक कार्यों के प्रति प्रोत्साहित करना कठिन हो जाता है। अतः परिवार, देश और समाज सभी के सहयोग से ऐसे दिशाहीन युवकों को सुमार्ग पर लाया जा सकता है। इसके लिए विद्यालयों में इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए, ताकि इस आत्मधाती प्रवृत्ति से युवा पीढ़ी को परिचित कराया जाए और इसके विनाश को सम्मुख रख कर उन्हें इससे दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा सके। व्यक्ति, समाज, सरकार और अधिकारियों के सहयोग से ही यह संभव हो सकता है।

मित्रों, अगर आपको यह essay – essay on nasha mukti in hindi, अच्छा लगा तो अपनी राय कॉमेंट के माध्यम से जरूर बताएँ।

 

नशा मुक्ति पर निबंध-Essay on Nasha Mukti In Hindi

नशाखोरी का देश व उसके युवाओं पर दुष्परिणाम, तंबाकू मुक्ति दिवस व विश्व तंबाकू निषेध दिवस 2018 (Nashakhori ka samaj and yuva par prabhav | World No Tobacco Day (WHO) theme, activities in hindi)

पश्चिमी सभ्यता ने हमारे देश किस तरह अपनी ओर आकर्षित किया, इससे सभी भलीभांति परिचित है. इसकी ओर देश के युवा सबसे अधिक आकर्षित होते है, और अपनी भारतीय संस्कृति छोड़ पाश्चात्य संस्कृति के पीछे भागते है. नशाखोरी भी इसी का उदाहरण है. भारत देश की बड़ी मुख्य समस्याओं में से एक युवाओं में फैलती नशाखोरी भी है. देश की जनसँख्या आज 125 करोड़ के पार होते जा रही है, इस जनसँख्या का एक बड़ा भाग युवा वर्ग का है. नशा एक ऐसी समस्या है, जिससे नशा करने वाले के साथ साथ, उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है. और अगर परिवार बर्बाद होगा तो समाज नहीं रहेगा, समाज नहीं रहेगा तो देश भी बिखरता चला जायेगा. इन्सान को इस दलदल में एक कदम रखने की देरी होती है, जहाँ आपने एक कदम रखा फिर आप मजे के चलते इसके आदि हो जायेगें, और दलदल में धसते चले जायेगें. नशे के आदि इन्सान, चाहे तब भी इसे नहीं छोड़ पाता, क्युकी उसे तलब पड़ जाती है, और फिर तलब ही उसे नशा की ओर और बढ़ाती है.“नशा नाश है”

तंबाकू मुक्ति दिवस व विश्व तंबाकू निषेध दिवस कब मनाया जाता है? (World No Tobacco Day or WHO  Day 2018 Date)

देश के लोगो को नशे से मुक्ति के लिए जागरूक करने व देश के युवा वर्ग को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करने के लिए हर साल देश में 31 मई को तंबाकू मुक्ति दिवस व विश्व तंबाकू निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है.

इस साल 2018 में भी इसे 31 मई, दिन गुरुवार को मनाया जायेगा.

हर रोज नशा के सेवन से मरने वालों लोगों की संख्या –

क्रमांक प्रदेश का नाम मरने वालों की संख्या
1. तमिलनाडु 205
2. पंजाब 186
3. हरियाणा 76
4. केरल 64
5. मध्यप्रदेश 40

नशा की अधिकता से मरने वालों की संख्या में तमिलनाडु सबसे आगे है.

नशा कई तरह का होता है, जिसमें शराब, सिगरेट, अफीम, गांजा, हेरोइन, कोकीन, चरस मुख्य है. नशा एक ऐसी आदत है, जो किसी इन्सान को पड़ जाये तो, उसे दीमक की तरह अंदर से खोखला बना देती है. उसे शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से बर्बाद कर देती है. जहरीले और नशीले पदार्थ का सेवन इन्सान को बर्बादी की ओर ले जाता है. आजकल नशा का आदि छोटे बच्चे भी हो रहे है, युवाओं के साथ साथ बड़े बुजुर्ग भी इसकी गिरफ्त में है, लेकिन सबसे अधिक ये युवा पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है. युवा पीढ़ी के अंदर सिर्फ लड़के ही नहीं, लड़कियां भी आती है. नशा करने वाला व्यक्ति घर, देश, समाज के लिए बोझ बन जाता है, जिसे सब नीचे द्रष्टि से देखते है. नशा करने वाले व्यक्ति का न कोई भविष्य होता है, न वर्तमान, उसके अंत में भी लोग दुखी नहीं होते है. देश में जो आज आतंकबाद, नक्सलवाद, बेरोजगारी की समस्या फ़ैल रही है, इसका ज़िम्मेदार कुछ हद तक नशा भी है. नशा के चलते इन्सान अपना अच्छा बुरा नहीं समझ पाता और गलत राह में चलने लगता है.

नशाखोरी का समाज में फैलने का कारण (Nashakhori Reason) –

  • शिक्षा की कमी – देश में शिक्षा की कमी की समस्या आज भी व्याप्त है, सरकार इसकी ओर कड़े कदम उठा रही है. शिक्षा का महत्व हमारे जीवन में बहुत है, लेकिन कई लोग इसे नहीं समझते है, और शिक्षा की कमी के चलते कई दुष्प्रभाव सामने आते है. जो लोग कम पढ़े लिखे होते है, वे इसके दुष्प्रभाव को नहीं समझते है, और इसकी चपेट में आ जाते है. गाँव में कम पढ़े लिखे लोग कई तरह के नशा करते है, जिससे उनका परिवार तक नष्ट हो जाता है.
  • नशा संबधी पदार्थो की खुलेआम बिक्री – हम व हमारे देश की सरकार नशा के दुष्परिणाम को जानती है, लेकिन फिर भी इसकी बिक्री खुलेआम होती है. नशा के पदार्थ आसानी से कही भी मिल जाते है, जिससे इसे देखदेख कर भी लोग इसकी ओर आकर्षित होते है.
  • संगति का असर – स्कूल के बच्चों में ये नशाखोरी संगति के चलते फैलती है. कम उम्र में ये बच्चे भटक जाते है, और ऐसे लोगों के साथ संगती करते है, जो नशा को अपना जीवन समझते है. बच्चों के अलावा युवा को भी कई बार संगति ही बिगाड़ती है. युवा पीढ़ी के कई ऐसे दोस्त होते है, जो नशा करते है, और देखा देखि में वे भी इसे करने लगते है. जो लोग इस नशा को करते है, वे अपने साथ वालों को भी इसे करने के लिए प्रेरित करते है.
  • मॉडर्न बनने के लिए – नशा को कुछ लोग मॉडर्नता का माध्यम मानते है. उनका मानना होता है, नशा करने से लोग उन्हें एडवांस समझेगें, और उनकी वाह वाही होगी. नशा को अमीरों की शान भी माना जाता है, उन्हें लगता है, नशा करने से हमारा रुतवा सबको दिखेगा. जो व्यक्ति शिक्षित है, वो भी नशा से दूर नहीं है, उनका मानना है कि नशा करने से उनकी बुद्धि में विकास, याददाश और आतंरिक शक्ति में विकास होता है.
  • पाश्चात्य संस्कृति – पाश्चात्य सभ्यता में मादक पदार्थ को सामाजिक रूप से स्वीकारा गया है, जिससे यहाँ खुलेआम लोग इसे लेते है और इसकी खपत भी अधिक होती है. इसे देख देख हमारे देश के युवा अपने आप को पाश्चात्य संस्कृति में ढालने के लिए नशा को अपनाते है. उनका मानना होता है, नशा उन्हें पाश्चात्य बनाएगा.
  • सिनेमा का प्रभाव – हमारे सिनेमा जगत का नशाखोरी फ़ैलाने में बहुत बड़ा हाथ है. टीवी, फिल्मों में खुलेआम शराब, सिगरेट, गुटखा खाते हुए लोगों को दिखाया जाता है, जिससे आम जनता विशेषकर बच्चे और युवा प्रभावित होते है, और उसे अपने जीवन में उतार लेते है. टीवी पर तो इसके बड़े बड़े विज्ञापन भी आते है, जिस पर हमारे देश की सरकार भी कोई कदम नहीं उठा रही है. युवा पीढ़ी टीवी पर देखती है, कैसे किसी का दिल टूटने पर जब गर्लफ्रेंड या पत्नी छोड़ कर चली जाती है तो हीरो शराब पीने लगता है, बस वो भी इसे देख अपने जीवन में उतार लेता है. गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप होने पर वो भी देवदास बन शराब पीने लगता है.
  • तनाव, परेशानी – किसी तरह की पारिवारिक परेशानी, समस्या के कारण भी इन्सान नशा का आदि हो जाता है. अपने गम को भुलाने के लिए इन्सान नशा करने लगता है, लेकिन इससे वो नशा के द्वारा दूसरी समस्या को बुलावा दे देता है. बेरोजगारी, गरीबी, कोई बीमारी या किसी पारिवारिक समस्या के चलते इन्सान नशा की ओर रुख करता है. मूड को बदलने के लिए भी लोग नशा करना पसंद करते है, उनके हिसाब से नशा करने के बाद उन्हें अपने दुःख दर्द याद नहीं रहते और उन्हें सुख की अनुभूति होती है.

नशाखोरी का देश व उसके युवाओं पर दुष्परिणाम (Nashakhori ka samaj and yuva par prabhav in hindi)

  • गरीबी बढ़ती है – देश में कई ऐसे परिवार है जो एक वक्त की रोटी के लिए रोते है, उन्हें बिना खाना खाए सोना होता है. नशा का आदि इन्सान भले खाना न खाए, लेकिन उसके लिए नशा बहुत जरुरी होता है. वह अपनी दिन भर की कमाई नशा में गवां देता है, यह तक नहीं सोचता की कि उसके बच्चे भूखे है. जो इन्सान पैसा नहीं कमाता, अपने घर के पैसों को इस नशे में लगा देता है, जिससे घर के दुसरे लोगों के लिए समस्या खड़ी हो जाती है. रोज रोज के इस खर्चे से घर में गरीबी आने लगती है, और घर में खाने पीने तक की समस्या हो जाती है.
  • नशा एक ऐसी समस्या है, जो दूसरी समस्या को न्योता देती है. इससे गरीबी आती है, बेरोजगारी, आतंकवाद फैलता है. देश में अपराधियों की संख्या बढ़ने लगती है|
  • घरेलु हिंसा को बुलावा – नशा करने वाला इन्सान अपना आपा खो देता है, उसे याद नहीं होता है वो कहाँ है, क्या कर रहा है. नशा वाला इन्सान घरेलु हिंसा को दावत देता है, वो आने घर में अपनी बीवी, बच्चों को मारने लगता है.
  • अपराधी बना देता है – नशा एक अपराध से कम नहीं है, और नशा वाला इन्सान एक अपराधी. नशे की तलब को पूरा करने के लिए इन्सान चोरी करने लगता है, और छोटे छोटे अपराध कब बड़े अपराध में बदल जाते है पता ही नहीं चलता. अफीम, चरस, कोकीन का नशा लेने के बाद इन्सान के अंदर उत्तेजना आ जाती है, जिससे वो अपने काबू में नहीं रहता और इस नशे के बाद इन्सान चोरी, मृत्यु, हिंसा, लड़ाई-झगड़े, बलात्कार जैसे कामों को अंजाम देता है, जो उसे एक बड़ा अपराधी बना देता है. घर टूटते है
  • भविष्य नष्ट होता है – नशेबाज को नशे के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता है. मैंने ऐसे कई किस्से सुने है, जहाँ नशा ने अच्छे खासे बने बनाये इन्सान को बर्बाद कर दिया है. नशा का आदि इन्सान अपना भविष्य नष्ट कर लेता है, उसे उससे कोई लेना देना होता है.
  • स्वास्थ्य संबधी समस्या – नशा की लगातार लत से शरीर नष्ट हो जाता है. तम्बाकू, शराब, सिगरेट अधिक पीने से शरीर में फेफड़े, गुर्दा, दिल, और न जाने क्या क्या ख़राब होने लगता है. हम सबको पता है, धुम्रपान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, फिर भी हम इसके आदि हो जाते है. धुम्रपान का धुँआ अगर सामने वाले व्यक्ति के शरीर में भी जाता है, तो उसे नुकसान पहुंचता है. इसी तरह गुटका जिस पर लिखा भी होता है कि इसे खाने से स्वास्थ्य संबधी समस्या होती है फिर भी लोग मजे से इसे खाते है, मुहं का कैंसर, गले का कैंसर सब नशा के कारण होते है. नशा करने से व्यक्ति की उम्र घटती जाती है, और ये कई शोध के द्वारा प्रमाणित हो चूका है.
  • अलग अलग नशा पदार्थ अलग अलग नुकसान देते है. शराब पीने से लीवर, पेट ख़राब होता है, और लीवर कैंसर भी होता है. गुटखा खाने से मुहं में कैंसर, अल्सर की परेशानी होती है. गांजा, भांग से इन्सान का दिमाग खराब होने लगता है, इससे वो पागल भी हो सकता है.
  • परिवार टूट जाते है – नशेबाज इन्सान अपने परिवार से ज्यादा अपने नशे को तवज्जो देते है, जिससे परिवार टूट जाते है. नशाखोरी, आज के समय में परिवार बिखरने की सबसे बड़ी वजह है. नशे के चलते पति पत्नी में झगड़े बढ़ते है, जिसका असर बच्चों पर भी होता है. कई बार तो ये बच्चे बड़े होकर अपने बड़ों की तरह ही काम करते है, और नशा को अपना लेते है.

मादक पदार्थ का सेवन इन्सान को घटक से घटक बना देता है, वो अपनी तलब को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. हमारे देश की सरकार देश की इस बड़ी समस्या की ओर उतनी नजर नहीं की हुई है, जितनी उसे करना चाइये. सरकार को नशामुक्ति के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए,

  • सरकार को खुलेआम मादक पदार्थ का सेवन पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए.
  • सिनेमा, टीवी में इसके प्रयोग को वर्जित करना चाहिए.
  • नशाखोरी की समस्या के बारे में लोगों बताने के लिए कैम्पेन, सभा, आयोजित करनी चाहिए. गाँव, शहर सभी जगह लोगों को इस समस्या के बारे में खुलकर बताना चाइये.
  • नशाखोरी सिर्फ भारत देश की ही नहीं, पुरे विश्व की समस्या है तो इससे निपटने के लिए, सभी देखों को इकठ्ठे होकर काम करना चाहिए.
  • नशामुक्ति केंद्र, समझाइश कार्यालय अधिक से अधिक खोलें जाएँ.

नशा मुक्ति पर निबंध हिंदी में,

नशा मुक्ति पर शायरी,

नशा मुक्ति पर कविता,

नशा मुक्ति पर नारे,

नशा और युवा वर्ग पर निबंध,

नशा मुक्ति अभियान,

नशा एक अभिशाप निबंध,

नशा विनाश का कारण है निबंध,

short essay on nasha mukti in hindi,

nasha ek abhishap in hindi essay,

slogans on nasha mukti in hindi,

nasha mukti par nibandh hindi mein,

nasha mukti poem in hindi,

nasha aur yuva varg essay in hindi,

nasha mukti abhiyan essay in english,

essay on nasha mukti in english,

 

दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध (Dahej Pratha In Hindi) :

भूमिका : मानवीय समाज में विकास और सामाजिक जीवन की शुरुआत के लिए विवाह को एक पावन और अनिवार्य बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है। वैवाहिक जीवन में नर-नारी एक दुसरे के पूरक बनकर जीवन को और मधुर बनाते हैं और भारतीय संस्कृति में जो पितृ ऋण होता है उसे वंश वृद्धि के रूप में बढ़ाते हैं।

एक पुरुष के जीवन में स्त्री के शीतल जल की तरह होती है जो उसके जीवन को अपने प्यार और सहयोग से सुखी और शांतिपूर्ण बनाती है। लेकिन आज भारत के समाज में जो अनेक कुरीतियाँ फैली हुई हैं वो सब भारत के गौरवशाली समाज पर एक कलंक के समान हैं।

जाति , छूआछूत और दहेज जैसी प्रथाओं की वजह से ही विश्व के उन्नत समाज में रहने पर भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। समय-समय से कई लोग और राजनेता इसे खत्म करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इसका पूरी तरह से नाश नहीं हो पाया है। दहेज प्रथा दिन-ब-दिन और अधिक भयानक होती जा रही है।

जब हम समाचार पत्रों को पढ़ते हैं तो हमें ज्यादातर ऐसी खबरे मिलती हैं जैसे – सास ने बहु पर तेल छिडककर आग लगा दी , दहेज न मिलने की वजह से बारात लौटाई , स्टोव फट जाने की वजह से नवविवाहित स्त्री की मृत्यु हो गई। जब हम इन समाचारों को विस्तार से पढ़ते हैं तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कभी-कभी हम यह सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि क्या कोई मनुष्य सच में इतना निर्मम और जालिम हो सकता है ?

दहेज प्रथा : दहेज शब्द अरबी भाषा के जहेज शब्द से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ होता है सौगात। साधारणतया दहेज का अर्थ होता है – विवाह के समय दी जाने वाली वस्तुएँ। जब लडकी का विवाह किया जाता है तो वर पक्ष को जो धन , संपत्ति और सामान दिया जाता है उसे ही दहेज कहते हैं।

हमारे समाज के अनुसार विवाह के बाद लडकी को माता-पिता का घर छोडकर पति के घर जाना होता है। इस समय में कन्या पक्ष के लोग अपना स्नेह दर्शाने के लिए लडकी , लडकों के संबंधियों को भेंट स्वरूप कुछ-न-कुछ अवश्य देते हैं।

दहेज प्रथा का आरम्भ : ऐसा लगता है जैसे की यह प्रथा बहुत ही पुरानी है। प्राचीन काल से हमारे भारत में इस कथा का चलन होता आ रहा है। हमारे भारत में कन्यादान को एक धार्मिक कर्म माना जाता है। दहेज प्रथा का वर्ण हमारी लोक कथाओं और प्राचीन काव्यों में भी देखा जा सकता है।

प्राचीनकाल में बेटी को माता-पिता के आशीर्वाद के रूप में अपनी समर्थ शक्ति के अनुसार वस्त्र , गहने , और उसकी गृहस्थी के लिए सामान भेंट में दिया जाता था। इस दहेज का उद्देश्य वर वधु की गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाना था। प्राचीनकाल में लडकी का मान-सम्मान ससुराल में उसके व्यवहार और संस्कारों के आधार पर तय किया जाता था न कि उसके लाए हुए दहेज पर।

सात्विक रूप : दहेज को एक सात्विक प्रथा माना जाता था। जब पुत्री अपने पिता के घर को छोडकर अपने पति के घर जाती है तो उसके पिता का घर पराया हो जाता है। उसका अपने पिता के घर पर से अधिकार खत्म हो है। अत: पिता अपनी संपन्नता का कुछ भाग दहेज के रूप में विदाई के समय अपनी पुत्री को दे देता है।

दहेज में एक और सात्विक भावना भी है। दहेज का एक सात्विक रूप कन्या का अपने घर में श्री समृद्धि की सूचक बने। उसके खाली हाथ को पतिगृह में अपशकुन माना जाता है। इसी वजह से वः अपने साथ कपड़े , बर्तन , आभूषण और कुछ ऐसे प्रकार के पदार्थों को साथ लेकर जाती है।

विकृत रूप : दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वास्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौन्दर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।

आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली-बोली जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।

इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।

इसी वजह से लडकी की ख़ुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है। आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।

दहेज प्रथा के कारण : एक तरफ जहाँ पर वर पक्ष के लोगों की लोभी वृत्ति ने भी इस कुरीति को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है। दूसरी जगह पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने बहुत कालाधन कमाया जिसकी वजह से वे बढ़-चढकर दहेज देने लगे। उनकी देखा-देख निर्धन माता-पिता भी अपनी बेटी के लिए अच्छे वर ढूंढने लगे और उन्हें भी दहेज का प्रबंध करना पड़ा।

दहेज का प्रबंध करने के लिए निर्धन माता-पिता को बड़े-बड़े कर्ज लेने पड़े , अपनी संपत्ति को बेचना पड़ा और बहुत से कठिन परिश्रम करने पड़े लेकिन फिर भी वर पक्ष की मांगें बढती ही चली गयी । दहेज प्रथा का एक सबसे प्रमुख कारण यह भी है कि लडकी को कभी बराबर ही नहीं समझा गया।

वर पक्ष के लोग हमेशा यह समझते हैं कि उन्होंने कन्या पक्ष पर कोई एहसान किया है। यही नहीं वे विवाह के बाद भी लडकी को पूरे मन से अपने परिवार का सदस्य स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से वे बेचारी सीधी-साधी , भावुक , नवविवाहिता को इतने कठोर दंड देते हैं।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम : दहेज प्रथा की वजह से ही बाल विवाह , अनमेल विवाह , विवाह विच्छेद जैसी प्रथाओं ने फिर से समाज में अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया है। दहेज प्रथा की वजह से कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही हैं इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।

जन्म से पहले ही गर्भ में लडकी और लडकों की जाँच की वजह से लडकियों को गर्भ में ही मरवा देते हैं जिसकी वजह से लडकों और लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है। लडकियों के माता-पिता दूसरों की तरह दहेज देने की वजह से कर्ज में डूब जाते हैं और अपनी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देते हैं।

लडके वाले अधिक दहेज मांगना शुरू कर देते हैं और दहेज न मिलने पर नवविवाहिता को तंग करते हैं और उसे जलाकर मारने की भी कोशिश करते हैं। कभी-कभी लडकी यह सब सहन नहीं कर पाती है और आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती है या फिर तलाक देने के लिए मजबूर हो जाती है।

दहेज न होने की वजह से योग्य कन्या को अयोग्य वर को सौंप दिया जाता है। जो कन्याएं योग्य होती हैं वे अपने धन के बल पर योग्य वरों को खरीद लेती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए गैर क़ानूनी काम भी करने से पीछे नहीं हट पाते हैं। आज के समय में लडकों और लडकियों की खुले आम नीलामी की जाती है।

आज के माता-पिता अपने सरकारी , अधिकारी और इंजीनियर लडके को लाखों से कम में नीलाम नहीं करते हैं जिसकी वजह से अनेक सामाजिक कुरीतियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। रोज समाचार पत्र और पत्रिकाओं में पढ़ा जाता है कि दहेज न मिलने की वजह से लडकी पर उसके ससुराल वालों ने अमानवीय और क्रूर अत्याचार किये जिसकी वजह से आधुनिक पीढ़ी बहुत अधिक प्रभावित होती है।

उन्हें देखने को मिलता है कि स्टोव फटना , आग लगना , गैस या सिलिंडर से जलना यह सब कुछ सिर्फ नवविवाहिताओं के साथ ही होता है। आज की नारी जागृत , समानता , वैज्ञानिक दृष्टि , प्रगति और चहुमुखी विकास के इस युग में अपनी वास्तविकता की भावना से हटकर दहेज प्रथा एक तरह से दवाब डालकर लाभ कमाने का एक सौदा और साधन बनकर रह गया है। दहेज अपनी आखिरी सीमा को पार करके एक सामाजिक कलंक बन चूका है।

दहेज प्रथा का समाधान : अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो उसके लिए खुद युवकों को आगे बढना चाहिए। उन्हें अपने माता-पिता और सगे संबंधियों को बिना दहेज के शादी करने के लिए स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। जो लोग नवविवाहिता को शारीरक और मानसिक कष्ट देते हैं युवकों को उनका विरोध करना चाहिए।

दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए नारी का आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होना भी बहुत जरूरी होता है। जो युवती अपने पैरों पर खड़ी होती है उस युवती से कोई भी अनाप-शनाप नहीं कह सकता है। इसके अलावा वह पूरे दिन घर में बंद नहीं रहेगी और सास और नन्द के तानों से भी बच जाएगी।

बहु के नाराज होने की वजह से मासिक आय के हाथ से निकल जाने का डर भी उन्हें कुछ बोलने नहीं देगा। लडकियों को हमेशा लडकों के बराबर समझना होगा और उन्हें भी लडकों जितने ही अधिकार और शिक्षा भी देनी होगी। दहेज की लड़ाई को लड़ने में कानून भी हमारी सहायता कर सकता है।

जब से हमारा देश दहेज निषेध विधेयक बना है तब से वर पक्ष के अत्याचारों में बहुत कमी आ गयी है। दहेज प्रथा की बुराई को तभी खत्म किया जा सकता है जब युवक और युवतियां खुद जाग्रत होंगे। जो लोग दहेज देते और लेते हैं उन पर कड़ी से कड़ी कर्यवाई की जानी चाहिए और उन पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए।

विवाह में अधिक खर्च और अधिक बारातियों को रोकने का विधान था। लेकिन जब कानून को समाज का सहयोग नहीं मिल रहा हो तो कानून भी विवश हो गया है। दहेज प्रथा को सामाजिक चेतना और नैतिक जागृति के माध्यम से खत्म किया जा सकता है। अनेक प्रकार की स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा दहेज प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाकर इसे कम कर सकते हैं।

युवतियां दहेज प्रथा को खत्म करने में विशेष योगदान दे सकती हैं वे अपने माता-पिता को दहेज न देने के लिए प्रेरित करें और लोभी व्यक्तियों से विवाह न करें। लोग दहेज का सख्ती से विरोध करें इसकी वजह से जो लोग दहेज की मांग करते हैं उनमें एक प्रकार से प्रेरणा उत्पन्न हो जायेगा। अगर बिना दहेज के विवाह के लिए उन्हें सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जाये और उन्हें सम्मान और पुरुष्कृत करने से भी समाज में बहुत परिवर्तन किया जा सकता है।

उपसंहार : यह समस्या किसी एक पिता की नहीं बल्कि पुरे राष्ट्र की समस्या है। इसकी वजह से जीवन बगिया नष्ट हो जाती है। दहेज प्रथा हमारे समाज के लिए एक कोढ़ साबित हो रही है। दहेज को खत्म करने के लिए हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। यह हमें यह याद दिलाती है कि हमें अपने आप को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं है।

जिस समाज में दुल्हनों को यातनाएं दी जाती हैं वह सभ्यों का नहीं बल्कि बिलकुल असभ्यों का समाज है। अब ही समय है कि हम सब मिलकर इस कुरीति को उखाडकर अपने आप को मनुष्य कहलाने का अधिकार वापस प्राप्त कर लें। मनुष्य को सभी कठिनाईयों का सामना करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

 

जानिए दहेज प्रथा को विस्तार से: Detailed Introduction to Dowry System:

दहेज प्रथा एक सामाजिक बीमारी है जो की आज कल समाज में काफी रफ़्तार पकडे गति कर रहा है| ये हमारे जीवन के मकसद को छोटा कर देने वाला प्रथा है| ये प्रथा पूरी तरह इस सोच पर आधारित है, की समाज के सर्व श्रेष्ठ व्यक्ति पुरुष ही हें और नारी की हमारे समाज में कोई महत्व भी नहीं है|

इस तरह की नीच सोच और समझ ही हमारे देश की भविष्य पर बड़ी रुकावट साधे बैठे हें|

दहेज प्रथा को भी हमारे समाज में लगभग हर श्रेणी की स्वीकृति मिल गयी है जो की आगे चल के एक बड़ी समस्या का रूप भी ले सकती है |

महात्मा गाँधी ने दहेज प्रथा के बारे में कहा था की

जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरुरी सर्त बना देता है , वह अपने शिक्षा और अपने देश की बदनाम करता है, और साथ ही पूरी महिला जात का भी अपमान करता है | 

ये बात महात्मा गाँधी ने देश की आजादी से पहले कही थी| लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी दहेज प्रथा को निभायी जाती है| हमारे सभ्य समाज के गाल पर इससे बड़ा तमाचा और क्या हो सकता है?

हम सभी ऊँचे विचारों और आदर्श समाज की बातें करते हें, रोज़ दहेज जैसी अपराध के खिलाफ चर्चे करते हें, लेकिन असल जिंदगी में दहेज प्रथा जैसी जघन्य अपराध को अपने आस पास देख के भी हम लोग अनदेखा कर देते हें| ये बड़ी ही शर्म की बात है|

दहेज प्रथा को निभाने वालों से ज्यादा दोषी इस प्रथा को आगे बढ़ते हुए देख समाज में कोई ठोस कदम नहीं उठाने वाले है|

 दहेज प्रथा एक गंभीर समस्या : Dowry System- A Serious Concern:

दहेज प्रथा सदियों से चलती आई एक विधि है जो की बदलते वक़्त के साथ और भी गहरा होने लगा है| ये प्रथा पहले के जमाने में केवल राजा महाराजाओं के वंशों तक ही सिमित था| लेकिन जैसे जैसे वक़्त गुजरता गया, इसकी जड़ें धीरे धीरे समाज के हर वर्ग में फैलने लगा| आज के दिन हमारे देश के प्रयात: परिवार में दहेज प्रथा की विधि को निभाया जाता है|

दहेज प्रथा लालच का नया उग्र-रूप है जो की एक दुल्हन की जिंदगी की वैवाहिक, सामाजिक, निजी, शारीरिक, और मानसिक क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव डालता है, जो की कभी कभी बड़े ही भयंकर परिणाम लाता है|

दहेज प्रथा का बुरा परिणाम के बारे में सोच कर हर किसी का रूह काँपने लगता है, क्यूंकि इतिहास ने दहेज प्रथा से तड़पती दुल्हनों की एक बड़ी लिस्ट बना रखी है| ये प्रथा एक लड़की की सारी सपनो और अरमानो को चूर चूर कर देता है जो की बड़ी ही दर्दनाक परिणाम लाता है |

लगभग देश की हर कोने में ये प्रथा को आज भी बड़े ही बेजिजक निभाया जाता है|

ये प्रथा केवल अमीरों तक ही सिमित नहीं है, बल्कि ये अब मध्य बर्गियों और गरीबों का भी सरदर्द बन बैठा है|

सोचने की बात है की देश में बढती तरक्की दहेज प्रथा को निगलने में कहाँ चूक जाती है? ऊँच शिक्षा और सामाजिक कार्यकर्मों के बावजूद दहेज प्रथा अपना नंगा नाच आज भी पूरी देश में कर रही है| ये प्रथा हर भारतीयों के लिए सच में एक गंभीर चर्चा बन गयी है जो की हमारे बहु बेटियों पर एक बड़ी ही मुसीबत बन गयी है|

दहेज प्रथा के कारण: Causes of Dowry System in Hindi:

दहेज प्रथा समाज की बीमारी है | इस बीमारी ने न जाने कितने ही परिवारों की खुशियों को मिटा दिया है| आज समाज में दहेज प्रथा पूरी तरह अपनी जगह बना चुकी है जो की एक दस्तक है आगे चलते समय के लिए|

दहेज प्रथा को बढ़ावा देने में समाज की ही अहम् भूमिका है | वह समाज ही है जो की दहेज प्रथा की जड़ को मजबूत कर रही है|

दहेज प्रथा की कई कारण हें, जैसे की–

  1.    इ-शादी की विज्ञापन से फैलती दहेज प्रथा-

आज के इन्टरनेट युग में शादी के लिए लड़का-लड़की इन्टरनेट के माध्यम से भी खोजे जाते हें| इस प्रकार की विज्ञापनों में लड़की की परिवार वाले कई बार अच्छे लड़के की आश में अपना स्टेटस और कमाई को ज्यादा बताने की भूल कर बैठते हें, जो की लड़के वालों में कभी कभी लोभ आ जाता है| इस प्रकार की लोभ शादी के बाद मांग में बदल जाते हें, जो की धीरे धीरे दहेज प्रथा को पनपने देता हें| और दहेज की मांग होने लगती है|

2.    समाज में पुरुष प्रधान की लहर से फैलती देहेज प्रथा-

हमारे समाज पुरुष प्रधान है| बचपन से ही लड़कियों की मन में ये बात बिठा दिया जाता है की लडके ही घर के अन्दर और बाहर प्रधान हें, और लड़कियों को उनकी आदर और इज्ज़त करनी चाहिए| इस प्रकार की अंधविश्वास और दक्क्यानूसी सोच  लड़कियों की लड़कों के अत्याचार के खिलाफ अवाज़ उठाने की साहस की गला घूंट देते हें| और इससे बढती है लड़कियों पर अत्याचार और रूप लेता है विभिन्न मांगों की, जो की दहेज प्रथा का रास्ता खोल देता है|

3.     समाज में अपनी झूठी स्टेटस से फैलती दहेज प्रथा-

जी हाँ, चौंकाने वाला पर सच| ऊँचे समाज में आज कल अपना सोशल स्टेटस की काफी कम्पटीशन चल रही है| बेटी की शादी में ज्यादा से ज्यादा खर्च करना, महँगी तोहफे देना, लड़के वालों को मांग से ज्यादा तोहफे देना, आदि लड़के वालों के मन को कई बार छू जाता है| ये आदतें धीरे धीरे लड़की पर दबाव बना देती है| शादी के बाद भी लड़के वालों की इस तरह के तोहफों की लत लग जाती है, जो की धीरे धीरे मांग की रफ़्तार को और आगे ले जाती है| और इसी झूठी शान के चलते हम जाने अनजाने में दहेज प्रथा को पनपने देते हैं|

4 .    लड़की की सुन्दरता या कोई कमी कई बार दहेज की रस्म को निभा जाती है-

कई बार दहेज प्रथा खुद लड़की की माँ बाप की गलती से भी पनपता है| अगर लड़की की सुन्दरता में कोई कमी है या फिर लड़की की किसी भी कमी के कारण शादी में दिक्कत आती है, तो माँ- बाप लड़की की शादी को तुरंत करवाने की आड़ में दहेज देना आरम्भ कर देते हें| और ये बात दहेज प्रथा को हवा देती है|

दहेज प्रथा के कारण तो अनगिनत हैं, लेकिन अब वक़्त आ गया है की हमे कारणों की नहीं, दहेज प्रथा के समाधान के बारे में सोचें|

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम in Hindi: Effects of Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा के परिणाम बहोत ही भयंकर हैं| दहेज प्रथा के कारण गरीब माँ बाप अपनी बेटी की भविष्य को अनसुलझा ही पाते हें|

लड़कियों की शादी के वक़्त दहेज प्रथा अपने सबसे खतरनाक रूप लेती है| शादी या उसके बाद भी जिस घर में दहेज की बू आई, उस घर में दहेज प्रथा के दुष्परिणाम दिखाई देती है| दहेज प्रथा के दुष्परिणाम से हम सब वाकिफ हैं, लेकिन इस कलंक को हम ही बढ़ावा देते हैं|

दहेज प्रथा के बुरे असर हें

  1. दहेज प्रथा के कारण होती लड़कियों के साथ अन्याय:

कई बार दहेज दुल्हन के परिवार पर बहोत ही बुरा प्रभाव डालती है | दहेज के खर्चे पूरा सन्न कर जाति है| लड़की के शादी का माहोल खुशियों भरा नहीं रहता, अपमान और शर्मसार का माहोल बन के रह जाती है| इसी कारण हमारे समाज में लडकीयों को कई बार एक बोझ माना जाता है |

      2. दहेज प्रथा के कारण लड़कियों पर अत्याचार :

शादी के बाद जैसे ही दिन गुजरने लगते हें, वैसे ही दहेज की मांगे बढ़ने लग जाती है| अगर लड़की दहेज लाने के खिलाफ बोलती है तो उस पर शारीरिक, मानसिक अत्याचार किया जाता है | घरोई हिंसा को हवा दिया जाता है | लडकी पर कई तरह के जुर्म किया जाता है ताकि वह अपने माईके से दहेज की बात कर सके|

      3. देहेज प्रथा से बढती लड़का लड़की में अंतर:

दहेज प्रथा के कारण कई घरों मे लड़कियों को उतना मोह और प्यार नहीं मिलता जितना की घर के लड़कों को दिया जाता है| माँ बाप को लड़कियों को आने वाली वक़्त में खर्चा का साधन लगता है, और इसी कारण वह कन्या संतान को कई बार अपने हाल में छोड़ते हें|  इसी तरह लड़का और लड़की में अंतर बनता है |

दहेज़ प्रथा रोकने के उपाय in Hindi:How to Stop Dowry Practice:

दहेज प्रथा हमारे समाज को खोंखला और बेमतलब बना रही है| ये प्रथा हमारे ही जिंदगी को तबाह कर रही है| लेकिन अब वक़्त आ गया है की हमे दहेज प्रथा के खिलाफ एक जूट हो कर अपना आवाज़ बुलंद करना है|

हर समस्या का समाधान उसके अन्दर ही है| इस तरह से दहेज प्रथा का समाधान भी इसी प्रथा में ही है, बस दहेज लेने और देने की आदत को “हाँ” से “ना” में बदलना है|

आइए जानते हें की दहेज प्रथा को कैसे रोकें

दहेज प्रथा को रोकने के लिए हम ही सबसे बड़ा और कामयाब कदम उठा सकते हें |

दहेज प्रथा को पूरी तरह मिटाने के लिए हमे बस दो ही बातों को अपनाना है-

  1.  अगर आप एक लड़की हें- तो आप कभी भी ऐसी घर में शादी करने के लिए अपना स्वीकृति न दें जो दहेज की मांग कर रही हें|
  2. अगर आप एक लड़का हें- तो आप दहेज को अपने शादी या वैवाहिक जिंदगी का हिस्सा न बनने दें|

बस हममे ही है समस्या|

हम दहेज प्रथा को पूरी तरह नाकामयाब बना सकते हें अगर हम अपने आप को पूरी तरह इसके लिए जिम्मेदार मानें |

दहेज प्रथा हमारे समाज का एक पुराने जमाने की हिस्सा है| हम ऐसे ही इस प्रथा को झट से बंद नहीं कर सकते| इसके लिए हमे कदम कदम कर के चलना होगा| हमे अपने समाज और देश में कई प्रकार के बदलाव लाना होगा, जैसे की-

  • दहेज प्रथा को रोकने के लिए क़ानून व्यवस्था में बदलाव लाना होगा-

आज कल हमारे समाज में दहेज प्रथा खुली तरह से निभाया जाता है जब कि ये कानूनन जुर्म है| दहेज की व्यापार को बिना किसी दर से किया जाता है| ये ऐसा है क्यूंकि हमारे देश की कानूनी व्यवस्था जरुरत के मुताबिक़ मजबूत नहीं है| जरुरत है दहेज के खिलाफ क़ानून में बदलाव लाना|

  • लड़का-लड़की एक सामान के बारे में लोगों को अवगत करना होगा –

सबसे पहले हमे अपने सोच में बदलाव की जरुरत है| हमे लड़कियों को लड़कों के बराबर समझना है| लड़कियों को लड़कों से किसी भी तरह छोटा महसूस नहीं होने देना है| अगर ऐसा हुआ तो लड़कियों को ससुराल जाने के लिए दहेज का साथ की जरुरत नहीं होगी| कहते हैं की कोई भी कार्य की शुरुवात पहले अपने आस पास की माहोल से करनी चाहिए| घर में अपने बच्चो को लडकियों को सम्मान और आदर करने के बारे में बताना होगा| हमे लड़का लड़की एक समान  को अपनाना होगा|

  • कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाना होगा –

हमे कन्या भ्रूण हत्या(को पूरी तरह से बंद करने की सपथ लेना होगा| | जितनी लड़कियों की हत्या होगी, दहेज प्रथा को उतना हाथ मिलेगा| दहेज प्रथा लड़कियों की कमी के कारण भी हमारे समाज में पनपती है | ज्यादा से ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागृति बना के हम दहेज प्रथा पर रोक लगा सकते हें|

  • दहेज प्रथा को रोकने के लिए महिला सशक्तिकरण पर जोर देना होगा –

इसकी चाबी है एजुकेशन | हमे लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाना होगा| उन्हें आजादी देनी होगी, आजादी अपने आप को एक मजबूत नारी बनाने की | हमे लड़कियों के पढाई पे ज्यादा से ज्यादा ध्यान और महत्व देना होगा | लड़कियों को पढ़ा लिखा के अपने पैरों पे खड़े होने के काबिल बनाना होगा, जो की वक़्त आने पर दहेज के खिलाफ खुद लढ सकती हें |

  • देहेज्प्रथा के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाना होगा –

हमे दहेज के खिलाफ समाज में जागरूकता पैदा करना है| गाँव और सहारों में दहेज के बुरे प्रकोप के बारे में बताना होगा जो की कई इंसानों को दहेज की पाप करने से रोकने में सहायक साबित होगी| खुद दहेज के खिलाफ सख्ती से पेश आना होगा|

  • हमे सही और गलत तय करना होगा –

जी हाँ!

हमे कुछ बातें अपनी जिंदगी में तय करना होगा| तय करना होगा की हम किसी भी ऐसी शादी में न शामिल हों जहां दहेज की प्रथा को निभायी गयी है|

लड़कियों को ये तय करना होगा की उन्हें दहेज मांगे जाने वाली घरों को अलविदा कहना है, बिना इस बात कि झूठी सपने देख कर की वक़्त सब कुछ ठीक कर देगा|

दहेज प्रथा पर अन्तिम चर्चा: conclusion on dowry system

दहेज प्रथा हमारे समाज को हमारा नहीं छोड़ा | ये प्रथा पुरे समाज को अपने वस में कर खोखला बना चुका है | वक़्त आ गया है इसके खिलाफ आवाज़ उठाने की| वक़्त आ गया है दहेज प्रथा के क़ानून कि सख्ति से इस्तेमीलकरने की| देहेज प्रथा के कारण आज भी हमारा समाज पिछडा हुआ है| लड़का और लड़की में अंतर मानते हें|

तो चलिए एक मुहीम छेड़ें देहेज प्रथा के खिलाफ| अगर आप के मन में दहेज प्रथा के बारे में कोई जानकारी है तो प्लीज निचे हमे लिख के जरुर भेजें ताकि आप कि कही हुई शायद कोई छोटी सी बात कई जिंदगियों को तबाह होने से बचा दे| दहेज की आदत को हमे जड़ से उखाड़ फेंकना है और एक स्वच्छ भारत की गठन करना है|

हमे अपने सुझाव जरुर दें | और दहेज प्रथा को “ना” बोले|

dehej pratha par nibandh wo lekh
दहेज प्रथा पर भाषण व निबंध in Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध-Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध | Essay on Dowry System in Hindi!

भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है । मनुस्मृति मे ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति, गउवें आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करे ।

यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने उल्लेख नहीं किया । समय बीतता चला गया स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मान बैठे हैं ।

अखबारों में अब विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं । उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है । ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहा जाता है तो असली चेहरा सामने आता है । वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है ।

दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं । जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में सुन्दर हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है? कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है?

शायद इसलिए कि समाज में अच्छे वरों की कमी है तथा योग्य लड़के बड़ी मुश्किल से तलाशने पर मिलते हैं । हिन्दुस्तान में ऐसी कुछ जातियां भी हैं जो वर को नहीं, अपितु कन्या को दहेज देकर ब्याह कर लेते हैं; लेकिन ऐसा कम ही होता है । अब तो ज्यादातर जाति वर के लिए ही दहेज लेती हैं ।

दहेज अब एक लिप्सा हो गई है, जो कभी शान्त नहीं होती । वर के लोभी माता-पिता यह चाह करते हैं कि लड़की अपने मायके वालों से सदा कुछ-न-कुछ लाती ही रहे और उनका घर भरती रहे । वे अपने लड़के को पैसा पैदा करने की मशीन समझते हैं और बेचारी बहू को मुरगी, जो रोज उन्हें सोने का अडा देती रहे । माता- पिता अपनी बेटी की मांग कब तक पूरी कर सकते हैं । फिर वे भी यह जानते हैं कि बेटी जो कुछ कर रही है, वह उनकी बेटी नहीं वरन् ससुराल वालों के दबाव के कारण कह रही है ।

यदि फरमाइश पूरी न की गई तो हो सकता है कि उनकी लाड़ली बिटिया प्रताड़ित की जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और यह भी असंभव नहीं है कि उसे मार दिया जाए । ऐसी न जाने कितनी तरुणियों को जला देने, मार डालने की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं ।

ADVERTISEMENTS:

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है । इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं । अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है । यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है ।

किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है; क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है । दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं ।

वरपक्ष के लोग शादी से पहले ही एक मोटी रकम कन्यापक्ष वालों से ऐंठ लेते हैं । जहां तक सामान का सवाल है रंगीन टीवी, सोफा सेट, अलमारी, डायनिंग टेबल, घड़ी, अंगूठियां-ये सब चीजें पहले ही वर पक्ष की शोभा बढ़ाने के लिए भेज दी जाती हैं या शादी के समय दी जाती है । बाकी बचती हैं ज्योनार उसमें खा-पीकर लोग चले जाते हैं ।

शुरू-शुरू में वर एवं कन्यापक्ष दोनों में मेलभाव होता है, अतएव दोनों से पूरी सतर्कता बरती जाती है । यदि सब कुछ खुशी-खुशी चलता रहा, तब तो सब गुप्त रहता है अन्यथा कोई दुर्घटना हो जाने पर सब रहस्य खुल जाते हैं । कन्या अथवा कन्यापक्ष के लोगों में यह हिम्मत नहीं होती कि वे लोग ये सुनिश्चित कर लें कि शादी होगी तो बिना दहेज अन्यथा शादी ही नहीं होगी ।

दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता । इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए । विवाह अपनी-अपनी जाति में करने की जो परम्परा है उसे तोड़ना होगा तथा अन्तर्राज्यीय विवाहों को प्रोत्साहन देना होगा; तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा ।

 

अन्तर्राज्यीय, अन्तर्प्रान्तीय और अन्तर्राष्ट्रीय विवाहों का प्रचलन शुरू हो गया है, यदि कभी इसमें और लोकप्रियता आई और सामाजिक प्रोत्साहन मिलता रहा, तो ऐसी आशा की जा सकती है कि दहेज लेने की प्रथा में कमी जरूर आएगी । सरकार चाहे तो इस प्रथा को समूल नहीं तो आंशिक रूप से जरूर खत्म किया जा सकता है । सरकार उन दम्पतियों को रोजगार देने अथवा धंधों में ऋण देने की व्यवस्था करे, जो अन्तर्राज्यीय अथवा बिना दहेज के विवाह करना चाहते हों या किया हो ।

पिछले दिनों बिहार के किसी सवर्ण युवक ने हरिजन कन्या से शादी की थी, तो उसे किस प्रकार सरकार तथा समाज का कोपभाजन बनना पड़ा था, इसे सभी जानते हैं, ज्यादा पुरानी घटना नहीं है । अत: आवश्यकता है कि सरकार अपने कर्तव्य का पालन करे और सामाजिक जागृति आए, तो दहेज का कलंक दूर हो सकता है ।

दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है । आजकल यह प्रथा व्यवसाय का रूप लेने लगी है । मां-बाप चाहते हैं कि बच्चे को पढ़ाने-लिखाने और उसे लायक बनाने के लिए उन्होंने जो कुछ खर्च किया है, वह लड़के का विवाह करके वसूल कर लेना चाहिए । इंजीनियर, डॉक्टर अथवा आई.ए.एस. लड़कों का दहेज पचास लाख से एक करोड़ रुपये तक पहुंच गया है । बताइए एक सामान्य गृहस्थ इस प्रकार का खर्च कैसे उठा सकता है ।

 

वर्तमान परिस्थितियों में उचित यही है कि ऐसे सभी लोग एक मंच पर आवें, जो दहेज को मन से निकृष्ट और त्याज्य समझते हों । वे स्वयं दहेज न लें तथा दहेज लेने वालों के खिलाफ आवाज उठाएं । यदि वे ऐसा समझते हों कि उनके काम का विरोध होगा, तो वे अपने सद्उद्देश्य के लिए सरकार से मदद भी मांग सकते हैं ।

कुछ साल तक यदि समग्र देश में दहेज विरोधी आन्दोलन चलाया जाए, तभी इस कुप्रथा को मिटाना संभव बन पाएगा । अन्यथा, अन्य कोई सूरत ऐसी दिखाई नहीं पड़ती जो इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर सके ।

 

दहेज प्रथा पर निबंध : 21वीं सदी में विकासशील भारत के लिए दहेज प्रथा एक कोड का काम कर रही है। दहेज प्रथा हमारे देश के लिए एक कलंक है जो कि दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। यह फोड़े की तरह इतना नासूर हो गया है कि अब बहू – बेटियों की जान भी लेने लगा। दहेज प्रथा किसी आतंकवाद से कम नहीं है। दहेज प्रथा का चंगुल हर जगह व्याप्त है।  इसकी जड़ें इतनी मजबूत हो गई है कि अमीर हो या गरीब हर वर्ग के लोगों को जकड़ रखा है।

dehej pratha par nibandh

Dehej Pratha Par Nibandh

दहेज प्रथा के खिलाफ भारत सरकार ने कई कानून भी बनाए है लेकिन उन कानूनों का हमारे रूढ़िवादी सोच वाले लोगों पर कोई असर नहीं होता है। वह दहेज लेना एक अभिमान का विषय मानते है, जिसको जितना ज्यादा दहेज मिलता है वह उतना ही गर्व करता है और पूरे गांव में इसका ढिंढोरा पीटता है। जबकि दहेज गर्व का नहीं शर्म का विषय है।

आइए जानते है दहेज प्रथा क्या है (What is dowry system in Hindi)

जब वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को विवाह करने के लिए किसी भी प्रकार की रुपयों, गाड़ी, सामान अन्य विलासता की वस्तुएं मांगना दहेज प्रथा के अंतर्गत आता है। दहेज लेना और देना दोनों भारतीय कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता है। पुरुष प्रधान देश होने के कारण हमारे देश में महिलाओं का शोषण किया जाता है। उसी शोषण का दहेज प्रथा एक रुप है।

दहेज लेना लोगों में एक गर्व का विषय बन चुका है, वह सोचते है कि अगर हम ने दहेज नहीं लिया तो समाज में हमारी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी। इसलिए लड़के वाले लड़कियों से जितनी ज्यादा हो सके उतनी दहेज की मांग करते है। पुराने रीति रिवाजों की ढाल लेकर इसे एक विवाह का रिवाज बना दिया गया है जिसे भारत के हर वर्ग ने अच्छी तरह से अपना लिया है।

इसके खिलाफ नहीं तो कोई बोलना चाहता है ना ही कोई सुनना चाहता है क्योंकि इसमें सब अपना – अपना स्वार्थ देखते है।  दहेज प्रथा नहीं लोगों की सोच को इतना खोखला कर दिया है कि अगर उनको दहेज नहीं मिलता है तो वह शादी करने से इनकार कर देते है और अगर कुछ लोग शादी कर भी लेते है तो फिर दहेज के लिए दुल्हन पर अत्याचार करते है उसका शोषण करते है जिसके कारण उसके मां-बाप मजबूर होकर दहेज देने को तैयार हो जाते है।

दहेज लेने  के वर्तमान में नए आयाम भी बना दिए गए है जिसके अनुसार दूल्हे की आय जितनी अधिक होगी उसको उतना ही अधिक दहेज मिलेगा। दहेज प्रथा मध्यम वर्गीय लोगों में आजकल बहुत प्रचलित हो गई है।

दहेज प्रथा की उत्पत्ति (Origin of dowry practice)

पुराने जमाने में लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों को उपहार स्वरूप कुछ वस्तुएं दी जाती थी जैसे कि घोड़ा, बकरी, ऊंट आदि है। लेकिन फिर जैसे जैसे भारत में प्रगति की तो लोगों के सोचने विचारने की मानसिकता भी बदलती गई।  लड़कियों वालों को जो वस्तुएं उपहार स्वरूप मिलती थी अब वे लड़की वालों पर उपहार देने के लिए विशेष मांग करने लगे है। जब से लड़के वालों की तरफ से यह विशेष मांग होने लगी है तब से दहेज प्रथा की उत्पत्ति होने लगी थी।

इसका एक अन्य पहलू यह भी है कि जब लड़की और लड़के की शादी कर दी जाती है तो उनकी आर्थिक सहायता के लिए उनको कुछ रुपए दिए जाते थे ताकि वह अपना जीवन ठीक प्रकार से निर्वाह कर सकें।

दहेज प्रथा को हवा तभी मिलती है जब लड़की में कुछ कमी हो जैसे कि वह  विकलांग हो उसका रंग रूप सावला होने पर लड़की वाले अपनी लड़की की शादी करने के लिए लड़की वालों को दहेज के रूप में बहुत सारे रुपए और अन्य विलासता की वस्तुएं देते है। जिससे इस प्रथा को और भी हवा मिलती है।

और वर्तमान में तो यह स्थिति है कि अगर लड़का कोई सरकारी नौकरी या किसी बड़े पद पर है तो उसको दहेज देना जरूरी है। लड़के वाले इसके लिए विशेष मांग रखने लगे है। जिसके कारण गरीब परिवार की लड़की वालों की आधी कमाई तो अपनी बेटी की शादी करने में ही चली जाती है।  और इसके कारण एक करने अभिशाप ने जन्म ले लिया है अब बेटियों को कोख में ही मार आज आने लगा है क्योंकि लोग मानते है कि बेटियां पराई होती है वह हमारे किसी भी प्रकार से काम नहीं आने वाली और उनकी शादी पर उनको दहेज भी देना पड़ेगा इसलिए अब बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या बहुत कम हो गई है।

दहेज प्रथा का जहरीला दंश (Poisonous bite of dowry practice)

दहेज प्रथा ने वर्तमान में एक महामारी का रुप ले लिया है, यह किसी आतंकवाद से कम नहीं है क्योंकि जब गरीब परिवार के माता पिता अपनी बेटी  की शादी करने जाते है तो उनसे दहेज की मांग की जाती है और वह दहेज देने में असमर्थ होते है तो या तो वे आत्महत्या कर लेते है या फिर किसी जमीदार से दहेज के लिए रुपए उधार लेते है और जिंदगी भर उसका ब्याज चुकाते रहते है।

इसका विस्तार होने का कारण इन लोगों की दकियानूसी सोच है वह सोचते है कि अगर बेटे की शादी में दहेज नहीं मिला तो समाज में उनकी थू-थू  होगी उनकी कोई इज्जत नहीं करेगा। वह दहेज लेना अपना अधिकार समझने लगे है जिस कारण यह दहेज रूपी महामारी हर वर्ग में फैल गई है। अगर जल्द ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह  मानव सभ्यता पर बहुत बड़ा कलंक होगा।

महात्मा गांधी जी ने भी दहेज प्रथा को एक कलंक बताया है उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि

“जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरुरी शर्त बना देता है, वह अपने शिक्षा और अपने देश की बदनाम करता है, और साथ ही पूरी महिला जात का भी अपमान करता है “

यह ऐसा कटु सत्य है जिस को झुठलाया नहीं जा सकता है। 21वीं सदी के भारत में लोग अपने सभ्य होने का दावा करते है लेकिन जब उनको कहा जाता है कि दहेज ना लें तो वह अपनी सभ्यता भूल जाते है और दहेज की मांग ऐसे करते है जैसे यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो।

समाज के पढ़े लिखे युवा भी इसके खिलाफ नहीं बोलते है क्योंकि उनको भी कहीं ना कहीं यह डर रहता है कि अगर उन्हें दहेज में कुछ नहीं मिला तो अपने परिवार वालों और दोस्तों में उनकी इज्जत घट जाएगी इसलिए वे भी दहेज की मांग करने लगे है। अगर पढ़े लिखे युवा ही इस प्रथा को बढ़ाने में लगे रहे तो मानव सभ्यता का विनाश दूर नहीं है।

दहेज प्रथा एक गंभीर समस्या (Dowry System is a Serious Problem)

दहेज प्रथा का जहरीला दंश सदियों से चला आ रहा है। और अब लोगों ने इसको एक परंपरा का रूप दे दिया है जिसके कारण लोगों को लगता है कि दहेज देना अनिवार्य है। इसके खिलाफ भारत सरकार ने कई कानून बनाए है लेकिन उनकी पालना सही प्रकार से नहीं होने के कारण लोगों का दहेज के प्रति आत्मविश्वास और बढ़ गया है।

दहेज प्रथा के कारण सभी लोग अमीर परिवारों में ही शादी करना चाहते है क्योंकि उनको उम्मीद होती है कि वहां से ज उनको ज्यादा दहेज मिलेगा। जिससे गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी नहीं हो पाती है और अगर कोई करना नहीं चाहता है तो लड़के वाले इतना दहेज मांगते है कि गरीब परिवार वाले उस देश की रकम को चुकाने में असमर्थ होते है। इसके कारण एक और गंभीर समस्या जन्म ले रही है। हम लड़कियों को कोख में ही मारे जाने लगा है क्योंकि हमारे आधुनिक भारत में अब  गर्भ में ही पता लगाया जा सकता है कि लड़का होगा या लड़की, अगर गर्भ में लड़की पाई जाती है तो उसको कोख में ही मरवा दिया जाता है क्योंकि लोग सोचते है कि लड़कियां किसी काम की नहीं होती और उनकी शादी पर दहेज भी देना पड़ेगा।

दहेज प्रथा के कारण भारत के कई राज्य में लड़के और लड़कियों का लिंगानुपात भी बिगड़ गया है जिसके कारण कई लड़कों की शादी नहीं हो पाती है। जिसके कारण देश में अब बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ने लगी है।

कुछ राज्यों में तो दहेज प्रथा के लिए Rate List भी बना ली गई है कुछ समय पहले राज्यों से खबर आई थी कि लड़के की शादी के लिए अभी दहेज की Rate List तय कर दी गई है।

– अगर कोई लड़का आईएएस अधिकारी है तो उसको साठ लाख से एक करोड़ का दहेज मिलेगा (इसमें जाति के  प्रकार पर दहेज कम ज्यादा हो सकता है)।

– और अगर कोई लड़का IPS अधिकारी है तो उसको 30 लाख से 60 लाख तक का दहेज मिल सकता है।

– अगर कोई लड़का किसी कंपनी के उच्च पद पर है तो उसे 40 से 50 लाख रुपए की रकम दहेज में मिल सकती है।

–  बैंक में काम करने वाले को 20 से 25 लाख और अगर कोई सरकारी Peon है तो वह भी 5 लाख तक का दहेज ले ही जाता है।

इस तरह की Rate List 21वीं सदी में आश्चर्य का विषय है। सोचने की बात तो यह है कि जिनको भी ज्यादा दहेज मिल रहा है वह उतने ही पढ़े-लिखे है लेकिन उनको दहेज देने में कोई शर्म नहीं आती है। वह इतने बड़े-बड़े सरकारी पदों पर बैठे है लेकिन सरकार के कानून का उनको कोई भी खौफ नहीं है। हम यह नहीं कह रहे कि सभी सरकारी या प्राइवेट पद के लोग दहेज लेते है लेकिन कुछ लालची लोग ऐसे है जो कि दहेज लेने को अभिमान मानते है।

उन लोगों को ऐसा करते हुए जरा भी शर्म का एहसास नहीं होता है वह खुलेआम दहेज की मांग करते है। अगर उनको दहेज नहीं मिलता है तो भी शादी करने से भी इनकार कर देते है। यह लोग समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है। यह लोग हर जगह पर पाए जाते है जब भी किसकी नई शादी होती है तो यह लोग वहां पर पहुंच जाते है और उनसे पूछते है कि बताओ दहेज में क्या-क्या मिला और अगर दहेज में  कम समान मिला होता है तो यह लोग अपना बखान करने लग जाते है और दूसरे को नीचा दिखाते है जिससे इस प्रथा को और हवा मिलती है।

वर्तमान समय में तो दहेज के लिए अब महिलाओं का शोषण भी होने लगा है उनको तरह-तरह के ताने सुनाए जाते है। और कोई लोग तो अब इतना आगे बढ़ गए है कि दहेज ना मिलने पर अपनी बहुओं को मारते-पीटते है और कुछ समय पहले खबर आई थी कि अब उनको जिंदा जलाकर मारा भी जाने लगा है।

ऐसे लोगों के कारण एक तरफ भारत विकासशील देश से विकसित होने के लिए बढ़ रहा है लेकिन इन लोगों की सोच की वजह से भारत में एक दहेज रूपी महामारी भी भयानक रूप ले रही है। अब समय आ गया है कि इन लोगों को समाज से बाहर किया जाए और उचित दंड का प्रावधान भी किया जाए।

दहेज प्रथा के कारण (Causes of Dowry System in Hindi)

दहेज प्रथा अभी इतनी नासूर बन गई है कि इतने कई अमीर और गरीब परिवारों की जिंदगी तबाह कर दी है।  जिसके कारण कई हंसते खेलते परिवार अब टूट गए है। दहेज प्रथा का यह विकराल रूप धारण करने के कई कारण है जैसे की हमारे समाज में चले आ रहे पुराने रीति रिवाज और लोगों का लालच, अशिक्षा, लोगों की दकियानूसी सोच के कारण इस प्रथा को बढ़ावा मिल रहा है।

1. पुराने रीति रिवाज –

लोग दहेज लेने के लिए अब पुराने रीति रिवाजों का सहारा लेते है और लड़की वालों से कहते है कि यह तो पुरानी परंपरा है आपको दहेज देना ही पड़ेगा। लेकिन अब उनको यह कौन समझाए कि पुराने समय में लोग अपनी इच्छा अनुसार उपहार दिया करते थे। लेकिन लोगों ने पुराने रीति रिवाजों को दहेज का चोला पहना करें अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे है।

2. पुरुष प्रधान समाज –

भारत में पुरुष प्रधान समाज होने के कारण महिलाओं को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं होता है।  जिसके कारण दहेज के लिए महिलाओं का शोषण होता है उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। ताकि वे अपने घरवालों से दहेज लेकर आए। महिलाओं को बचपन से ही यह समझा दिया जाता है कि पुरुषों की हर बात माननी चाहिए और उनका आदर सम्मान करना चाहिए इसी में उनकी भलाई है और यही उनका कर्तव्य है जिस कारण महिलाएं अपने आप को कमजोर मानती है। और इस दहेज रूपी महामारी का शिकार हो जाती है।

3. अशिक्षा –

हमारे विशाल देश में आज भी कई लोग पढ़े लिखे नहीं है जिसके कारण वह सोचते है कि अगर उन्होंने दहेज नहीं दिया तो उनकी बिटिया की शादी नहीं होगी। उन्हें कहा जाता है कि दहेज देना उनका कर्तव्य है।  शिक्षा की कमी के कारण उन लोगों को भारत सरकार के द्वारा बनाए गए दहेज के खिलाफ कानूनों का भी नहीं पता है। जिसका लाभ लालची व्यक्ति दहेज लेने के लिए उठाते है।

4. दहेज मान – सम्मान का विषय –

वर्तमान में दहेज को लोगों ने अपने मान सम्मान का विषय बना लिया है जिसको जितना ज्यादा दहेज मिलता है लोग उसका उतना ही सम्मान करते है जिसके कारण दहेज प्रथा को और बढ़ावा मिल रहा है। लोग सोचते है कि अगर उन्होंने दहेज नहीं लिया तो समाज में उनका कोई सम्मान नहीं करेगा उनकी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी इसलिए वह लड़की वालों से दहेज के लिए विशेष मांग रखते है।  अगर उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो भी रिश्ता तोड़ देते है या फिर शादी होने के बाद लड़की को दहेज के लिए प्रताड़ित करते है।

5. विवाह के लिए ई-विज्ञापन –

आजकल लोग शादी करने के लिए इंटरनेट पर भी विज्ञापन जारी करते है  जिसमें वे अपने आप को बढ़ा चढ़ाकर बताते है। जो स्वयं के पास नहीं भी होती है उनका भी बखान करते है। जिसके कारण  लड़के वाले सोचते है कि यह तो बहुत ही अमीर परिवार है इसलिए मैं उनसे अधिक दहेज की मांग करते है।

6. सांवला रंग या अन्य कोई विकार –

लोगों की मानसिकता का इसी से पता लगाया जा सकता है कि आपने अखबारों या इंटरनेट पर देखा होगा कि शादी के विज्ञापनों में लिखा होता है कि सुंदर लड़की या लड़का चाहिए इससे यह साफ जाहिर होता है कि लोग सुंदर लड़कियों  से ही शादी करना पसंद करते है। जिसके कारण सांवला रंग या अन्य कोई विकार होने पर उस लड़की से कोई शादी नहीं करता है इसलिए उसके मां-बाप उसकी शादी करने के लिए दहेज की पेशकश करते है या फिर कई लोग लड़की शादी करने के लिए दहेज की विशेष मांग रख देते है। जिसके कारण दहेज प्रथा को  बढ़ावा मिलता है।

7. अशिक्षित लड़कियां –

लड़कियों के शिक्षित होने के कारण उनकी शादी नहीं हो पाती है। इसलिए कुछ लोग अशिक्षित लड़कियों से शादी करने के लिए तो तैयार हो जाते है लेकिन वह कहते है कि हम इसकी जिंदगी भर देखभाल करेंगे इसलिए हमें आप दहेज के रूप में कुछ सहायता प्रदान करें। वह सहायता के नाम पर अपनी लालच की अभिलाषा को पूरा करते है।  ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए क्योंकि यह लोग दहेज मिलने के बाद भी लड़कियों को प्रताड़ित करते रहते है।

8. बेरोजगारी –

जी हां बेरोजगारी भी दहेज प्रथा का एक मुख्य कारण है क्योंकि जब बेरोजगार युवकों की शादी के लिए प्रस्ताव आता है तो वह कहते है कि हमें अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए आप कुछ धन की सहायता कीजिए जिससे कि हम विवाह के पश्चात अपना जीवन  सुख पूर्वक निर्वाह कर सकें। वह धन की सहायता के रूप में दहेज लेते है और दहेज प्रथा को बढ़ावा देते है। ऐसे लोग ना ही तो व्यवसाय करते है ना ही कोई नौकरी करते है यह लोगों दहेज के पैसों से ही अपना जीवन यापन करना चाहते है और दहेज के पैसे खत्म होते ही उस लड़की को प्रताड़ित करने लगते है कि वह अपने घरवालों से और दहेज लेकर आए। इस पर आपने कई कहानियां, फिल्में और नाटक भी देखे होंगे।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम (Effects of Dowry System in Hindi)

वर्तमान में आप देख ही रहे होंगे कि दहेज प्रथा के कारण महिलाओं का कितना शोषण हो रहा है उनको कितना प्रताड़ित किया जा रहा है। आए दिन खबरों में आता रहता है कि दहेज के लिए लड़के वालों वालों ने लड़की को जिंदा जलाकर मार डाला या फिर उस को घर से बाहर निकाल दिया। इससे आप सीधा अनुमान लगा सकते है कि लोगों की मानसिकता उनकी सोचने की शक्ति कितने हद तक नीचे गिर गई है।

दहेज प्रथा के कारण जब भी किसी परिवार में लड़की पैदा हो जाती है तो लोग खुश होने की वजह से सहम जाते है। क्योंकि उनको इस बात की चिंता सताती है कि अब इसके विवाह के लिए दहेज कहां से लाएंगे। दहेज का यह विकराल रूप हम बढ़ते हुए देख रहे है लेकिन इसके खिलाफ हम कोई आवाज नहीं उठा रहे है।  जिसके कारण आए दिन लड़कियों का शोषण होता रहता है।

अगर आप दहेज लेते या देते है और या फिर इसका समर्थन करते है तो आप भी कानून की नज़रों में गुनहगार है आप भी इसको बढ़ाने में सहयोग कर रहे है इसलिए जब भी आप ऐसा होते हुए देखें तो इसका विरोध करें और पुलिस को इसकी सूचना दें।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम इस प्रकार है-

1. लड़कियों का शोषण –

दहेज प्रथा के कारण आए दिन लड़कियों का शोषण हो रहा है क्योंकि जब लड़के वालों को  शादी में पर्याप्त धन नहीं मिलता है तो वे लड़की से कहते है कि अपने घरवालों से और अधिक धन की मांग करें अगर वह ऐसा नहीं करती है तो वह उसे मानसिक और शारीरिक रूप से पर्दा ना देते है कभी-कभी यह प्रताड़ना इतनी बढ़ जाती है कि लड़कियां आत्महत्या तक कर लेती है।  वर्तमान में तो यह भी देखने में आया है कि लड़कियों को दहेज के लिए या तो उन्हें जिंदा जला दिया जाता है या फिर उन्हें कहीं और ले जा कर उनकी हत्या कर दी जाती है।

2. लड़कियों के साथ भेदभाव –

दहेज प्रथा के कारण लड़कियों का उन्हीं के परिवार में भेदभाव किया जाता है क्योंकि लोग मानते है कि लड़कियां तो पराई होती है इसलिए मैं उनको ना तो पढ़ाते लिखाते है ना ही उन्हें किसी प्रकार के कार्य करने की आजादी होती है। कई परिवारों में तो यह भी देखा गया है कि  लड़कों की तुलना में लड़कियों को खाने और पहनने के लिए कम वस्तुएं दी जाती है। उन्हें घर से बाहर जाने की आजादी नहीं होती है।

3. घटता लिंगानुपात –

दहेज प्रथा के कारण लोग अब अपने घर में लड़कियां नहीं चाहते है वह लड़कियों को कोख में ही मरवा देते है जिसके कारण वर्तमान में लड़के और लड़कियों  के लिंगानुपात में भारी अंतर देखा गया है। वह लड़की होने को सिर्फ खर्चा मानते है जिस कारण बेचारी लड़कियों को बिना किसी कसूर की कोख में ही मरवा दिया जाता है। इसके खिलाफ कई कानून भी बनाए गए है लेकिन सब बेअसर है।

4. जनसंख्या वृद्धि –

जनसंख्या वृद्धि भी दहेज प्रथा का एक दुष्परिणाम है क्योंकि जहां पर अब लड़कियों के कोख में मारने पर  सख्त कार्रवाई होने लगी है वहां पर लोग अब लड़कियों को भी तो नहीं मारते है लेकिन लड़के की चाह में वे  एक के बाद एक बच्चे पैदा करते रहते है जिसके कारण जनसंख्या वृद्धि होती है।

5. देश के विकास की राह में रोड़ा –

चूँकि दहेज प्रथा के कारण जनसंख्या वृद्धि होती है तो बेरोजगारी भी उतनी ही बढ़ती है जिसके कारण देश के विकास की राह में बाधा आती है। और इससे देश की महिलाओं का शोषण भी होता है उनके मान सम्मान को भी ठेस पहुंचती है। और बाहरी देशों के लोग सोचते है कि जहां पर महिलाओं को सम्मान नहीं होता वहां के लोग कैसे होंगे इसलिए लोग यहां आने से कतराते है जिससे हमारे देश का विकास नहीं हो पाता है।

दहेज प्रथा को रोकने के उपाय (How to Stop Dowry Practice)

दहेज नामक इस प्रथा नहीं हमारी सोच को इतना नीचे तक गिरा दिया है कि अब हमें दहेज लेने पर शर्म तक नहीं आती है। ऐसा लगता है कि दहेज का दंश इतना घातक हो गया है कि ने हमारे जमीर को भी मार दिया है। यह कम होने की वजह दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है  जो कि हम और हमारे समाज के लिए बहुत ही घातक है। यह तो अभी इसका ट्रेलर है अगर इसे रोका नहीं गया तो यह हमारे पूरे समाज को निकल जाएगा और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाएंगे। दहेज लेना या देना हमारे ही हाथ में होता है इसलिए आग से हमें ही प्रण लेना होगा कि ना तो हम दहेज लेंगे ना ही किसी को देंगे।

दहेज प्रथा को रोकना कोई बड़ा कार्य नहीं है क्योंकि अगर दहेज प्रथा के दो मुख्य किरदार लड़का और लड़की ही इसका विरोध करने लगेंगे तो इसकी कमर वही टूट जाएगी।

दहेज प्रथा को रोकने के लिए लड़का और लड़की को दो बातें अपनानी होंगी-

  1. अगर आप लड़की है तो किसी भी ऐसे परिवार में शादी ना करें जो कि दहेज की मांग करते हो, या फिर आप को जरा सा भी ऐसा लगे कि यह परिवार आपके लिए सही नहीं है तो तुरंत शादी के लिए मना कर दें।
  2. और अगर आप लड़का है तो अपने घरवालों से साफ कह दें कि मैं शादी तभी करूंगा जब आप लड़की वालों से दहेज नहीं लेंगे।

लेकिन हमें पता है कि दहेज प्रथा को खत्म करना इतना आसान नहीं है क्योंकि किसी ना किसी के मन में तो खोट   आ ही जाती है। लड़की को उसके घर वाले किसी भी बात का दबाव देकर शादी के लिए मना लेते है और लड़के वाले लड़के को इतना गुमराह कर देते है कि वह दहेज लेने के लिए तैयार हो जाता है इसलिए हमें  दहेज प्रथा को रोकने के लिए कुछ कारगर उपाय खोजने होंगे जो कि इस प्रकार है –

1. दहेज प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर –

हमें सरकार से निवेदन करना चाहिए कि वह दहेज प्रथा के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाकर इस प्रथा को रोकने का प्रयास करें।  वर्तमान में कुछ ऐसे कानून भी आए है जो कि दहेज प्रथा को रोकने के लिए बनाए गए है उनमें प्रमुख है दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961 जिसके अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों दंडकारी है।

2. लड़कियों को शिक्षित बनाकर –

हमें लोगों में जागरूकता फैलाने होगी कि लड़कियों को जितना हो सके उतना ज्यादा पढ़ाया जाए उन्हें शिक्षित किया जाए जिससे कि वह कोई भी कार्य करने में सक्षम हो और उनको शादी करने के लिए दहेज भी नहीं देना पड़ेगा। शिक्षा ही हर विनाशकारी बीमारी का तोड़ है। अब तो सरकार भी बेटियों को पढ़ाने के लिए निशुल्क शिक्षा व्यवस्था जारी कर चुकी है बस लोगों को इस बारे में बताना है कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होती है।

3. लड़का और लड़की में भेदभाव बंद करें –

जब तक हम लड़की और लड़का में भेदभाव करते रहेंगे दहेज प्रथा को उतना ही अधिक बल मिलता रहेगा इसलिए हमें  लड़का और लड़की में भेदभाव बंद करना होगा लड़की को भी वही सभी सुविधाएं देनी होगी क्योंकि एक लड़के को दी जाती है  लड़की को भी उतना ही प्यार दिया जाए जितना कि लड़के को दिया जाता है। क्योंकि लड़की को भी उतना ही खुश रहने का हक है जितना कि लड़के को है। लड़की को भी उतनी आजादी दी जानी चाहिए जितनी कि लड़के को होती है उसे हर कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ना की मुझे लड़की जात होने का कहकर घर में बैठने को कहा जाए।

4. दहेज प्रथा के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाना –

दहेज प्रथा के खिलाफ हमें समाज में जागरूकता लानी होगी क्योंकि लोगों  की सोच इस कदर गिर चुकी है कि उन्हें दहेज के अलावा और कुछ भी नहीं सोचता इसलिए हमें गांव गांव जाकर दहेज प्रथा के खिलाफ चेतना के लानी होगी वहां के लोगों को बताना होगा कि इससे  देश का कितना नुकसान हो रहा है और साथ ही लड़कियों को इसके कारण कितनी प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।

हर स्कूल में ऐसे कार्यक्रम और नाटक होने चाहिए जिस दिन के माध्यम से समझाया जा सके कि लड़का और लड़की समान होते है उन्हें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए और दहेज लेना और देना दोनों ही पाप है  दंडकारी है। लोगों की सोच को बदलना होगा।

5. हमें दहेज प्रथा का विरोध करना होगा –

जब भी आप किसी भी विवाह में जाएं तो वहां देखें कि दहेज लिया और दिया तो नहीं जा रहा है अगर ऐसा होता है तो आपको उसका विरोध करना चाहिए। आपको ऐसे विवाह में नहीं जाना चाहिए जहां पर दहेज प्रथा को बढ़ावा मिलता हो। और आपकी सब की जिम्मेदारी बनती है कि आपको भी दहेज के लिए हां की जगह ना कहना होगा क्योंकि आपके जीवन में भी कभी ना कभी यह पल जरूर आएगा।

आपको इस दहेज प्रथा निबंध के माध्यम से पता तो चल ही गया होगा कि दहेज प्रथा के कारण हमारे समाज और परिवार को कितना नुकसान हो रहा है इसलिए जब भी ऐसा होते देखे तो इसका विरोध जरुर करें।

आप दहेज प्रथा के विरोध में हीन भावना फैला सकते है जब कोई भी व्यक्ति है दहेज ले रहा होता है तो उसे सिर्फ सिर्फ इतना कह दें कि लड़की वालों ने दहेज देकर लड़के को खरीद लिया। बस यह इतना सफ़र भी इतना असर  कर जाएगा कि लड़के के मन में दहेज प्रथा के खिलाफ हीन भावना उत्पन्न हो जाएगी और वह दहेज लेने से इंकार करेगा।

उपसंहार (Epilogue)

दहेज प्रथा में हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है। इसके कारण कई बहू बेटियों की जिंदगी खराब हो गई। दहेज प्रथा के कारण हमारे समाज के लोगों की  छोड़ आज इतनी गिर गई है कि वह दहेज लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।  और इसका उदाहरण आप आए दिन आने वाले समाचार और अखबारों में देख सकते है कि कैसे लोग दहेज के लिए अपनी बहुओं  की हत्या कर देते है या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वह खुद मजबूर हो सकती है आत्महत्या करने के लिए।

अब बहुत हुआ दहेज प्रथा के खिलाफ हमें आवाज उठानी होगी अगर आज हम ने आवाज नहीं उठाई तो कल हमारी ही बहन-बेटियां इसकी शिकार होंगे जिसके बाद आपको अफसोस होगा कि अगर हमने पहले ही इसके खिलाफ आवाज उठानी होती तो आज यह नहीं होता। हमें लोगों की पहचान उसकी सोच को बदलना होगा अगर हम उनका विरोध नहीं करेंगे तो कौन करेगा।

चलो आज हम सब प्रण ले कि दहेज प्रथा नामक इस महामारी को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। ना तो किसी को नहीं देंगे ना ही दहेज लेंगे।

हम आशा करते है कि हमारे द्वारा दहेज प्रथा पर लिखा गया आपको पसंद आया होगा। अगर यह लेख आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ शेयर करना ना भूले। इसके बारे में अगर आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

दहेज प्रथा पर निबंध pdf,

दहेज प्रथा पर निबंध 300 शब्द,

दहेज प्रथा पर निबंध pdf download,

दहेज प्रथा पर निबंध 200 शब्दों में,

दहेज प्रथा पर निबंध in english,

दहेज प्रथा पर निबंध ३०० शब्द,

दहेज प्रथा पर निबंध संस्कृत में,

दहेज प्रथा पर निबंध 100 शब्दों में,

essay on dowry system in 500 words,

dowry system essay in simple language,

dowry system essay in english pdf,

essay on dowry system in hindi,

evils of dowry system essay,

dowry essay topics,

dowry system effects,

dowry system topic speech,

महंगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh

महंगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh  Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

महंगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh

महंगाई पर निबंध :

महंगाई का अर्थ होता है-वस्तुओं की कीमत में वृद्धि होना। महंगाई एक ऐसा शब्द होता है जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव आते हैं। महंगाई मनुष्य की आजीविका को भी प्रभावित करता है। आज तक समाज में महंगाई और मुद्रा-स्फीति बहुत ही बड़ी समस्या है।

बढती हुई महंगाई भारत की एक बहुत ही गंभीर समस्या है। सरकार जब भी महंगाई को कम करने की बात करती है वैसे -वैसे ही महंगाई बढती जा रही है। जनता सरकार से बार-बार यह मांग करती है की महंगाई को कम कर दिया जाये लेकिन सरकार महंगाई को और अधिक बढ़ा देती है।

हमारी आवश्यकता की वस्तुएँ बहुत महंगी आती हैं और कभी -कभी तो वस्तुएँ बाजार से ही लुप्त हो जाती हैं। लोग अपनी तनखा में वृद्धि की मांग करते हैं लेकिन देश के पास धन नहीं है। सिक्के की कीमत घटती जाती है और महंगाई बढती जाती है।

मुद्रा स्फीति और महंगाई :

बढती हुई महंगाई का मुद्रा-स्फीति के साथ बहुत ही गहरा संबंध है। सरकार हर साल घाटे का बजट बढ़ा देती है जिससे कीमतें भी बढ़ जाती हैं। इसका परिणाम ये निकलता है कि रुपए की कीमत घट जाती है। महंगाई तो एक तरह से प्रतिदिन की प्रक्रिया बन गई है। सरकार नोट छापकर मुद्रा का निर्माण करती है और उसे समज में फैलाती है जो निरंतर चलता रहता है।

आजकल सभी लोग महंगाई के भत्ते की मांग करते हैं। सरकार ने कृषि की तो घोर उपेक्षा की लेकिन काले धन को रोकने के लिए नहीं किया गया है। भ्रष्टाचार को रोकने का इंतजाम नहीं किया गया है जस वजह से मुद्रा-स्फीति को नहीं रोका गया है। इसी वजह से महंगाई भारत देश म साल डॉ साल ऊपर चली जा रही है।

जब तक सरकार को वर्तमान पर कायम रहती है मुद्रा स्फीति बढती है। मुद्रा स्फीति में वृद्धि पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं है जब तक इन विसंगतियों को दूर नहीं किया जायेगा तब तक महंगाई को रोका नहीं जा सकता है।

भारत में महंगाई के कारण :

महंगाई के बढने के अनेक कारण होते हैं। महंगाई की समस्या हमारे ही नही बल्कि पुरे संसार की एक बहुत ही गंभीर समस्या है जो लगातार बढती जा रही है। आर्थिक समस्याओं की वजह से बहुत से देश महंगाई की समस्या से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। हमारा भारत एक विशाल देश है जनसंख्या की दृष्टि से यह दूसरे नम्बर पर आता है।

हमारे देश में जिस तरह से जनसंख्या बढ़ रही है उस तरह से फसलों की पैदावार नहीं हो रही है। पिछली 2-3 सालों से फसलों की पैदावार में आशा से अधिक वृद्धि हो रही है लेकीन हर साल एक नया ऑस्ट्रेलिया भी बन रहा है। देश में अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों की वजह से ही अन्न की कमी हो रही है।

इसी वजह से हमें कभी-कभी विदेशीं से अनाज मंगवाना पड़ता है। हमारा देश कृषि प्रधान देश है लेकिन फिर भी देश की समूची अर्थव्यवस्था की वजह से भी कृषि अच्छी वर्षा पर निर्भर करती है। बिजली उत्पादन भी महंगाई को प्रभावित करता है। भारत सरकार ने वस्तुओं की कीमतों को घटाने के आश्वाशन दिए थे लेकिन कीमतों को घटाने की जगह पर और अधिक बढ़ा दिया।

उपज की कमी से भी महंगाई बढती जाती है। जब सुखा पड़ने , बाढ़ आने और किसी वजह से जब उपज में कमी हो जाती है तो महंगाई का बढना तो आम बात हो जाती है। यह बहुत ही दुःख की बात है कि हमारी आजादी के इतने सालों बाद भी किसानों को खेती करने के लिए सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं।

बड़े-बड़े भवन बनाने की जगह पर कृषि की योजनाएँ बनाना और उन्हें सफल करना जरूरी है। हम लोग जानते हैं की सरकारी कागजों में कुएँ खुदवाने के लिए व्यय तो दिया गया था पर वे कुएँ कभी नहीं खुदवाये गये थे।

जमाखोरी की समस्या :

जमाखोरी से भी महंगाई की समस्या बढती है। कालाबाजारी की वजह से लोगों को खाने के लिए अन्न भी नहीं मिल पाता है। जब -जब मंडी में माल आता है तब अमीर लोग उसे खरीदकर उसे गोदामों में भर लेते हैं। इसी तरह से वे अनेक तरह की वस्तुओं को इकट्ठा कर लेते हैं। जब वस्तुओं की अधिक जरूरत पडती है तो उनकी कीमत बढ़ जाती है।

इस तरह व्यापारी अपने माल को दो गुने और तीन गुने दाम पर बेचता है। जब-जब देश में सुखा पड़ता है तब व्यापारियों को बहुत लाभ होता है। सरकार ने इस अर्थव्यवस्था के खिलाफ बहुत से कानून बनाए हैं लेकिन फिर भी भ्रष्ट अधिकारी व्यापरियों का साथ देते हैं। जब अनाज मंडी में आता है तो अमीर व्यापारी अधिक मात्रा में अनाज खरीदकर अपने गोदामों में रख लेता है और बाजार में अनाज की कमी हो जाती है।

व्यापरी अपने अनाज को गोदाम से तब निकालता है जब उसे कई गुना फायदा होने वाला हो। कई बार सरकार हर साल पट्रोल और डीजल के मूल्य बढ़ा देती है जिससे महंगाई बहुत प्रभावित होती है। भारत को निरंतर अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा था।

कई देशों को स्वतंत्रता के लिए बहुत भरी कीमत चुकानी पड़ी है। जब वर्षा की वजह से फसल अच्छी हुई थी तो कीमतों के कम होने के निशान दिखाई दिए लेकिन फिर से वही महंगाई की समस्या उत्पन्न हो गथी।

दोषपूर्ण वितरण प्रणाली :

हम लोग कई बार देखते हैं कि अच्छा उत्पादन होने के बाद भी वस्तुएँ नहीं मिलती हैं अगर मिलती भी हैं तो वे महंगी होती हैं। इसकी दोषी हमारी वितरण प्रणाली होती है। हमें कई बार उदाहरण भी देखने को मिले हैं कि भ्रष्ट लोगों और व्यापारियों की वजह से ही महंगाई बढती आ रही है। ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाई करने की जरूरत होती है।

व्यापारियों को कभी भी मनमानी करने का मौका नहीं मिलना चाहिए। इस तरह के वितरण के काम को सरकार को अपने हाथों में लेना चाहिए और ईमानदार लोगों को यह काम सौंपना चाहिए। उपजों में सरकार ने बढ़ोतरी करके भी देखी हैं लेकिन इससे कोई फायदा नहीं होता है वस्तु की कीमत फिर भी उतनी ही रहती है घटती नहीं है। हमारी वितरण प्रणाली में ऐसा दोष होता है जो लोगों की मुश्किलें बढ़ा देता है।

जिम्मेदार :

हमारे देश के अमीर लोग इस महंगाई के सबसे अधिक जिम्मेदार होते हैं ।आपात कल के शुरू-शुरू में तो वस्तुओं की कीमते कम करने की परिपाटी चली लेकिन व्यापारी फिर से अपनी मनमानी करने लगे। जो तेल-उत्पादक देश होते हैं उन्होंने भी तेल की कीमत बढ़ा दी है जिससे महंगाई और अधिक बढ़ गई है। अफसरशाही , नेता , व्यापारी ये सभी महंगाई को बढ़ाने के लिए बहुत अधिक जिम्मेदार हैं।

महंगाई को रोकने के उपाय :

अगर कोशिश की जाये तो भारत में महंगाई को रोका भी जा सकता है | सबसे पहले सरकार को मुद्रा-स्फीति पर रोक लगानी होगी और बजट घाटों को बनाना बंद करना होगा | हमारे लिए यह बहुत दुःख की बात है कि आज तक किसानों को सिंचाई के लिए आधुनिक साधन प्राप्त नहीं हुए हैं |

सरकार को बड़े-बड़े नगरों के विकास की जगह पर गांवों के विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए। पुरे देश के लिए एक तरह की सिंचाई व्यवस्था का आयोजन होना चाहिए। महंगाई को रोकने के लिए समय-समय पर हड़तालें और आन्दोलन चलाये गये हैं। महंगाई की वजह से गरीब लोग पहनने के लिए कपड़े नहीं खरीद पाते हैं वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए गलत रास्ते पर चल सकते हैं इसीलिए गरीबों के लिए कम दाम में वस्तुएँ उपलब्ध करनी चाहिएँ।

सरकार को कालाबाजारी , जमाखोरों को रोकने के लिए बहुत ही सख्त कानून बनाने चाहिएँ। महंगाई को खत्म करने के लिए जनता को भी सरकार का साथ देना चाहिए। जनता का कर्तव्य है कि महंगी चीजों से दूर रहे उसे महंगाई से होने वाली समस्याओं के बारे में सोचना चाहिए।

समुचित वितरण की व्यवस्था :

जरूरत की चीजों के उपभोग के समुचित वितरण के लिए बहुत से कानून बनाए गये हैं। हर जगह में खाद्यानों की पूर्ति के लिए खाद्यान आपूर्ति विभाग स्थापित किये गये हैं। जगह-जगह पर राशन की दुकानों को खोला गया है। अगर खाद्यान वितरण की व्यवस्था समुचित हो तो महंगाई को रोका जा सकता है लेकिन ऐसा होता नहीं है।

व्यापारी का एक मात्र लक्ष्य धन कमाना होता है वह इसके लिए अलग-अलग तरह के रास्ते निकालता रहता है। इस सब को देखकर ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार का साँप भी यहाँ पर अपना विष घोलता रहता है। जो लोग वितरण व्यवस्था के अधिकारी होते हैं वे अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं करते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि दुकानदार जरुरतमन्द वस्तुओं का संग्रह कर लेता है और अधिक से अधिक मूल्य में उसे बेचता है।

उपसंहार :

महंगाई को कम करने के लिए उपयोगी राष्ट्र नीति की जरूरत है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है उस तरीके से महंगाई को रोकना बहुत ही जरूरी है नहीं तो हमारी आजादी को दुबारा से खतरा पैदा हो जायेगा।

हमारी अधिकांश समस्याओं का मूल कारण बढती हुई जनसंख्या है। जब तक जनसंख्या को वश में नहीं किया जा सकता महंगाई कम नहीं होगी। महंगाई की वजह से निम्न वर्ग के लोगों को जरूरत की चीजें नहीं मिल पाती हैं और उनमें उन्हें खरीदने की लालसा पैदा होती है।

महंगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh


Essay Contents:

  1. महंगाई या मुल्य-वृद्धि  | Essay on Inflation in Hindi Language
  2. महँगाई और मनुष्य । Paragraph on Inflation and Mankind for School Students in Hindi Language
  3. महंगाई और आम आदमी । Essay on Inflation and the Common Man for School Students in Hindi Language
  4. महँगाई की समस्या । Essay on the Problem of Inflation for College Students in Hindi Language
  5. मूल्य-वृद्धि की समस्या-महँगाई | Essay on Inflation for College Students in Hindi Language

1. महंगाई या मुल्य-वृद्धि  | Essay on Inflation in Hindi Language

प्रस्तावना:

स्वतंत्रता के बाद भारत धीरे-धीरे चहुँमुखी विकास कर रहा है । आज लगभग दैनिक उपयोग की सारी वस्तुओ का निर्माण अपने देश  में ही होता है । जिन वस्तुओ के लिए पहले हम दूसरी पर निर्भर रहते थे, अब उनका उत्पादन हमारे देश  में ही होता है । कृषि क्षेत्र में भी हमें आशातीत सफलता मिली है ।

आज देश में आधुनिक वैज्ञानिक ढंग से कृषि उत्पादन होता है । परन्तु हर क्षेत्र मे इतनी प्रगति के साथ हमारी वस्तुओ के मूल्य स्थिर नही हो पाते हैं । खाद्य पदार्थ, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओ की कीमत दिन-प्रति-दिन इस प्रकार बढ़ती जा रही है कि वह उपभोक्ताओ की कमर तोड़ रही है ।

मूल्य-वृद्धि के कारण:

यद्यपि हमारे यहाँ लगभग सभी वस्तुओ का उत्पादन होता है, परन्तु उसका उत्पादन इतना नही हो पाता कि वह जनता को उचित मूल्य पर पूर्ण मात्रा में मिल सकें । उनकी पूर्ति की कमी से माँग बढ़ती है और माँग के बढ़ने से मूल्य का बढ़ना भी स्वाभाविक है ।

कभी-कभी किसी वस्तु की उत्पादन लागत इतनी बढ़ जाती है कि उपभोक्ता तक उसकी कीमत बहुत बढ जाती है, क्योकि उसके उत्पादन में सहायक सामग्रियो के लिए हमे विदेशो पर निर्भर रहना पड़ता है । कच्चे माल के लिए विदेशो की ओर ताकना पड़ता है । यातायात व्यय बढ़ जाता है जिससे सब ओर से उसकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है ।

राष्ट्रीय भावना का अभाव:

आज मूल्य-वृद्धि का सबसे बड़ा कारण है उत्पादकों मे राष्ट्रीय भावना का अभाव । हमारा उद्योगपति राष्ट्रीय भावना से वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता है ।

 

उसके अन्दर अधिक लाभ कमाने की भावना अधिक होती है इसके लिए चाहे उसको राष्ट्र व समाज का अहित भी करना पड़ जाए तो वह अपने लाभ के लिए राष्ट्रीय हितो की बलि कर देता है । यही कारण है कि आज देश में महंगाई बढ़ रही है और घटिया वस्तुओ के उत्पादन से विश्व बाजार में भारत की साख गिरती जा रही है ।

जनसंख्या में वृद्धि:

देश में जनसंख्या वृद्धि के कारण भी महंगाई बढ़ती जा रही है । उत्पादन सीमित है, उपभोक्ता अधिक है । देश की खेतिहर भूमि सिकुड़ती जा रही है । जनसख्या की वृद्धि के कारण नगरी, शहरी का विस्तार होता जा रहा है । खेतिहर भूमि में मकान बन रहे हैं । जगलों का भी विस्तार किया जा रहा है ।

जिससे कृषि उत्पादन मे स्वाभाविक रूप से कमी हो रही है । खाद्य पदार्थो के लिए हमे विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है । विदेशो से वस्तुओ के आयात का भार उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है फलत:  महंगाई  बढ़ने लगती है । दोष-पूर्ण वितरण प्रणाली-हमारे यहाँ वस्तुओं की वितरण प्रणाली भी दोष-पूर्ण है ।

इस समय वितरण की द्वैध प्रणाली प्रचलित है, सरकारी व व्यक्तिगत । एक ही वस्तु का वितरण सरकार व व्यापारियों द्वारा अपने-अपने ढंग से होता है । एक वस्तु सरकारी गोदामों में सड़ रही है, उसी वस्तु की जनता में अधिक माँग होने के कारण व्यापारी लूट मचाते हैं ।

कभी-कभी सरकारी वितरण में घटिया वस्तु बिकती है जिसे उपभोक्ता को उसी वस्तु के लिए अधिक कीमत पर व्यक्तिगत व्यापारी के चुगल में फंसना पड़ता है । सरकारी तत्र इतना अधिक भ्रष्ट हो चुका है कि वह व्यापारियों से मिलकर मूल्य वृद्धि में उसे सहयोग देते हैं । उनमे अपने देश, अपने समाज, अपनी वस्तु की भावना ही समाप्त हो चुकी है ।

मूल्य-मृद्धि के परिणाम:

भ्रष्टाचार को महगाई की जननी कहना अतिशयोक्ति नहीं है । महंगाई के कई दुष्परिणाम होते है । महंगाई से देश में गरीबी, भुखमरी, घूसखोरी को बढ़ावा मिलता है । महंगाई से देश की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जाती है । इसका सबसे अधिक शिकार होता है गरीब वर्ग ।

समाज में चोरी, डाके व ठगी आदि में वद्धि होती है । महंगाई से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है । महंगाइ से समाज का नैतिक पतन होता है । मूल्य-वृद्धि होने से कन्दोल, राशन, कोटा, परमिट आदि लागू होते हैं । उनके वितरण में सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार बढ़ता है ।

मूल्य-वृद्धि रोकने के उपाय:

 

हमारा देश कृषि प्रधान देश है । इसलिए मूल्य-वृद्धि रोकने के लिए अधिक उपज पैदा करने के सा धन जुटाये जाए । किसानो को आधुनिक वैज्ञानिक साधनो के द्वारा खेती करनी चाहिये । इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों को आगे आना चाहिये । कृषि पर आधारित सभी उद्योगो में किसानो को प्राथमिकता दी जानी चाहिये ।

कृषि-सम्बन्धी वस्तुओ के अधिक उत्पादन से मूल्य में स्पष्ट गिरावट आ जायेगी । उद्योगपतियो, नेताओ, व्यापारियों ,  व्येपारियों में राष्ट्रीय भावना का जब तक विकास नहीं होता तब तक अन्य सारे उपाय निष्फल सिद्ध हो सकते है । राष्ट्रीय भावना के अभाव में भष्टाचार बढ़ता है ।

भ्रष्टाचार महंगाई की जननी है । इसलिए नैतिक शिक्षा का विकास कर हर नागरिक मे राष्ट्रीय भावना पैदा की जाए । जब हर व्यक्ति समाज, राष्ट्र व वस्तुओ के प्रति अपनत्व रखेगा तो उसमे छल, कपट, बेईमानी   नहीं  आ पायेगी ।

उपसंहार:

हमारे देश में प्रजातंत्र है । महंगाई के विरुद्ध जनता द्वारा आवाज उठाने का उसको पूरा अधिकार है । इसलिए हमारी जनप्रिय सरकार महगाई रोकने के लिए हर संभव प्रयास करती है । नये-नये उद्योगों को प्रोत्साहन दे रही है । जब किसी वस्तु का अभाव होता है तो उपभोक्ताओ में उस वस्तु के प्रति संग्रह की भावना बढ़ती है ।

यह प्रवृत्ति महंगाई बढाने में सहायक होती है इसलिए जनता को अधिक वस्तुओं का संग्रह  नहीं करना चाहिये । महंगाई को दूर करने में सरकार के साथ सहयोग करना चाहिये । अभाव-ग्रस्त  वस्तुओं को बेकार, बर्बाद नहीं करना चाहिये । महगाई को एक राष्ट्रीय समस्या समझ कर समाधान ढूंढना चाहिये ।


2. महँगाई और मनुष्य । Paragraph on Inflation and Mankind for School Students in Hindi Language

प्रत्येक स्थिति या अवस्था के दो पक्ष होते हैं: आंतरिक एवं बाह्य । बाह्य स्थिति को सुधारना मनुष्य के लिए किसी प्रकार से कठिन कार्य नहीं है । कृत्रिम को यथार्थ का भ्रम बनाकर उसका विकल्प प्रस्तुत किया जा सकता है । किंतु आतरिक स्थिति को दृढ़ एवं प्रतिबद्धता के साथ किए गए उपायों से ही सुधारा जा सकता है ।

आज हमारे देश की बाह्य स्थिति उसकी कागजी नीतियों प्रस्तावों और सिद्धांतों के चलते चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो लेकिन उसकी आतरिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए केवल यह कहना ही काफी होगा कि उसे फुर्सत नहीं है ।

जहाँ सैकड़ों टन अनाज का भारत से निर्यात सिर्फ लाभार्जन के उद्‌देश्य से किया जाता है उसी देश में आज भी लोग भूख और कुपोषण से मर जाते हैं । नौकरियों के अभाव और आय का कोई स्थायी स्रोत न होने के कारण जहाँ लोग अपने जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं उस देश में दैनिक उपयोग की चीजों की कीमतें आसमान को छूती हैं ।

इस संदर्भ में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार न तो इस समस्या के कारणों को तलाश पाती हैं और न ही समय रहते इनका समाधान ही खोज पाती है । इन्हीं के चलते आत्महत्या निराशा कुंठा पारिवारिक कलह, शारीरिक कुपोषण की समस्याओं का जन्म होता है जिससे मनुष्य का जीवन निरंतर दुष्कर बनता जाता है ।

यह एक व्यावहारिक तथ्य है कि जैसे-जैसे उत्पादन में वृद्धि होती है, वैसे-वैसे वस्तु का मूल्य कम होता जाता है । लेकिन सरकारी आकड़ों में निरंतर उत्पादन वृद्धि के संकेत मिलने के बावजूद वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि होती जा रही है ।

अर्थशास्त्री निरंतर इस बात के दावे  करते हैं कि किसी वस्तु का उत्पादन इतने प्रतिशत बढ़ा, उतने प्रतिशत बढ़ा । लेकिन जब हम उन वस्तुओं को खरीदने के लिए बाजार में जाते हैं तब या तो हमें वह वस्तु ही नहीं मिलती या फिर उसकी कीमतें आवश्यकता से बहुत अधिक है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि इस अव्यवस्था का क्या कारण है ? क्या सरकारी कड़े झूठे हैं ? हम आर्थिक रूप से अग्रगामी हैं या पूर्वगामी ? इनका जवाब ‘न’ रहेगा, क्योंकि न तो सरकारी कड़े झूठे हैं और न ही हम आर्थिक रूप से पूर्वगामी हैं । लेकिन इसके पीछे, इस अव्यवस्था के पीछे, मनुष्य की स्वार्थलिप्सा काम कर रही है ।

नैतिक-मूल्यों के क्षरण ने मनुष्य के ‘अहम्’ को प्रभावशाली बना दिया है । मनुष्य आज अपने-आपको पूर्णत: स्वतंत्र समझने लगा है । जहाँ एक ओर राशन की दुकानों पर लंबी-लंबी कतार लगी रहती हैं और एक सीमा तक उसका भी खर्च वहन करने में असमर्थ रहती हैं वहीं दूसरी और काले धन से चोर बाजारी से मुनाफाखोर लोग उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा खरीदकर बाजार के लिए अव्यवस्था पैदा करते हैं ।

इन मुनाफाखोरों में जहाँ निजी-पूँजीपतियों की बहुसंख्या है तो वहीं दूसरी ओर सरकार के विभिन्न उपक्रम भी जाने-अनजाने में इस दिशा में ‘उल्लेखनीय’ भूमिका निभाते हैं । इनके लिए मुनाफा ही प्रधान है समाज के बहु-संख्यक वर्ग का कुपोषण या लाचारी नहीं ।

स्वयं सरकारी क्षेत्र की अनेक नीतियाँ गैर-उत्पादक मदों या अनुत्पादक मदों पर भारी खर्च करती हैं जिससे बहुत-सी चीजों-वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होती है और समाज में अव्यवस्था फैल जाती है । इसके अलावा देश के विभिन्न भागों में नियम से अकाल बाढ़ एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप पड़ता है ।

इनका स्थायी इलाज न कराकर सरकार अल्पकालिक-उपाय करके स्थिति को संभालने की कोशिश करती है। अल्पकालिक-उपायों पर एक बड़ी धन-राशि को व्यय किया जाता है जिसका असर प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है ।

वर्तमान समय में मूल्य-वृद्धि की समस्या को रोकना है तो ठोस उपाय किए जाने चाहिए । इसके लिए जनता के भीतर उन सभी भावनाओं का समावेश कराना होगा जिसमें नैतिकता रूपी मूल्य समाहित होते हैं । लेकिन इससे समाज के बहुत थोड़े-से वर्ग का ही हृदय-परिवर्तन संभव है ।

इसका समूल विनाश करने के लिए तो भ्रष्टाचार मिलावट और कालाबाजारी करने वालों पर शासक वर्ग का कठोर नियंत्रण होना चाहिए । साथ ही कठोर दंडों का भी प्रावधान होना चाहिए ताकि भय के चलते समाज से इन समस्याओं को हटाया जा सके ।

लेकिन देखा यह जा रहा है कि सरकार मूल्य-वृद्धि को रोकने के जो उपाय कर रही है, उन्हें पूरी ईमानदारी से कार्यरूप प्रदान नहीं किया जा रहा है । कालाबाजारी घूसखोरी प्रत्यक्षत: हमारे सामने रहती हैं । गोदामों में सैकड़ों टन अनाज हर साल सड़कर बेकार हो जाता है किंतु इस बात को आम जनता से छिपाया जाता है ।

इससे यही स्पष्ट होता है कि प्रशासन स्वयं सुखभोग में इतना लिप्त है कि उसे जनता की परेशानियों-कठिनाईयों से कुछ लेना-देना नहीं है । समस्याओं का समाधान समय रहते करने की आवश्यकता है क्योंकि बिना अपने प्रयत्नों को गति प्रदान किए इनसे उबरा नहीं जा सकता ।

मूल्य-वृद्धि के संदर्भ में जनता को भी अपने हितों को लेकर जागरूक होना पड़ेगा और सरकार से अपने अधिकारों की मांग करनी पड़ेगी, लेकिन इस कार्य को करने में जनता अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अपने जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने में लगा दे, उससे यह उम्मीद करना अपने-आप में ही बेमानी है । समाज के केवल यही अग्रणी तत्व ही भावी अराजकता को सार्थक परिवर्तन की ओर ले जा सकते हैं ।


3. महंगाई और आम आदमी । Essay on Inflation and the Common Man for School Students in Hindi Language

मौजूदा दौर में चीजों की बढ़ती कीमतों ने आम मेहनतकश आदमी की कमर ही तोड़ दी है । इस महंगाई ने आम आदमी के जीवन को बोझिल बना दिया है । अर्थशास्त्र के नियमानुसार महंगाई का प्रमुख कारण उपभोक्ता वस्तुओं का अभाव तथा मुद्रास्फीति है । जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी कई बातों पर निर्भर करती है ।

इनमें से कई तो दैवी होती हैं, जैसे- भारी वर्षा, हिमपात, अल्पवर्षा, अकाल, तूफान, फसलों को रोग लग जाना, विपरीत मौसम, ओले पड़ना आदि आदि । इसके अलावा कृत्रिम अथवा मानव द्वारा की गई काली करतूतों द्वारा भी जीवनोपयोगी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा किया जाता है और फिर उन वस्तुओं को ज्यादा कीमत वसूल करके बेचा जाता है ।

इस प्रकार के काम आमतौर पर व्यापारियों द्वारा किए जाते हैं । वे किसी वस्तु विशेष की जमाखोरी करके बनावटी अभाव पैदा करते हैं और फिर उस वस्तु को जरूरतमंद के हाथों बेचकर मनमाने दाम वसूल करते हैं । महंगाई बढ़ने का एक बड़ा कारण और है कि भारत में उपभोक्ता संगठनों में सक्रियता नहीं है ।

इस देश में न तो ऐसा कोई प्रभावी संगठन है और यदि कभी एकाध आदमी आवाज भी उठाता है तो निर्णय में अनावश्यक देर हो जाती है । यदि हमने जनसंख्या वृद्धि को महंगाई का एक कारण नहीं बताया तो अन्याय  होगा ।

देश की आबादी निरंतर बढ़ती जा रही है । इसके सभी अंकुश कुंद हो चुके हैं । सरकार जोर-जबरदस्ती करने से कतराती है और इन्दिरा गांधी के अनुभव को याद कर लेती है । ऐसी दशा में जमीन को तो बढ़ाना मुश्किल है, दाम का बढ़ाना सान हो जाता है ।

मकानों के किराये में वृद्धि, खाद्य सामग्री के मूल्यों में वृद्धि, कपड़ों के दामों में वृद्धि, सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं: बिजली, पानी, आवास, यातायात, रेल, हवाई जहाज आदि के दामों में वृद्धि का प्रकारान्तर से बहुत बड़ा कारण जनसंख्या में वृद्धि है । इस पर काबू पाने से हर सीमा तक कीमतों पर काबू पाया जा सकता है ।

भारत में महंगाई निरंतर बढ़ती जा रही है । सरकार द्वारा उत्पादित माल में तथा सरकारी उपक्रमों के उत्पादनों में वृद्धि अबाध गति से हो रही है । प्राइवेट सेक्टर के उत्पादनों की कीमतों पर प्रतिबंध लगाने तथा लाभ की सीमा तय करने में सरकार असमर्थ है । देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है जिसका भरपूर लाभ जमाखोर तथा मुनाफाखोर उठा रहे हैं ।

अर्थशास्त्री कहते हैं कि देश विकास की ओर अग्रसर होता है तो चीजों के भाव स्वत: बढ़ने शुरू हो जाते हैं । इस बात में कहां तक सच्चाई है, इसके जांचने का अधिकार तो अर्थशास्त्रियों को ही है किन्तु जहां तक व्यवहारिकता की बात है, कीमतों के बढ़ने के साथ-साथ उसी अनुपात में रोजगार के अवसरों एवं लोगों की आय में भी वृद्धि होनी चाहिए ।

सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन और भत्तों में हुई भारी वृद्धि का लाभ उठाकर उत्पादकों ने सभी प्रकार के उत्पादों की कीमतें काफी बढ़ा दीं । सरकार ने महंगाई पर अंकुश लगाने के जो भी प्रयास किए, उनका किसी भी क्षेत्र में कोई असर नहीं हुआ । आगे हालत क्या होगी कुछ कह पाना कठिन है ।


4. महँगाई की समस्या । Essay on the Problem of Inflation for College Students in Hindi Language

आज सारा देश महँगाई की समस्या से पीड़ित है । जिससे पूछिए वही कहता है कि महँगाई से हम बहुत दु:खी है, गुजारा नहीं होता है । चाहे कितना ही धन कमाकर लाएँ तब भी दिन नहीं कटते हैं । स्वतन्त्रता के पश्चात् प्रतिवर्ष महँगाई बढ़ती गई है और अब तो देश में महँगाई से हाहाकार मचा हुआ है ।

अब प्रश्न यह है कि महँगाई क्यों बढ़ती है ? इसके क्या-क्या मूल कारण है ? महँगाई के लिए सबसे प्रबल कारण युद्ध होते हैं । जब दो देशों में युद्ध छिड़ जाता है तब चीजों की आवश्यकता सैनिकों के लिए बढ़ जाती है । सरकार माल खरीदना आरम्भ कर देती है । ऐसी दशा में चीजों के दाम बढ़ जाते हैं ।

यातायात के साधनों की कमी के कारण भी चीजों की महँगाई हो जाती है । कई बार रेलें ठीक समय पर कोयला नहीं पहुँचाती तो नगरों में कोयले का मूल्य बढ़ जाता है । अनाज और वस्त्रों की भी यही स्थिति हो जाती है ।

हड़तालों से भी चीजों के मूल्य बढ़ जाते हैं । महँगाई बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े पूँजीपति व्यापारी भी उत्तरदायी होते हैं । क्योंकि ये लोग अनेक प्रकार के पदार्थों का संग्रह कर लेते हैं । इसके बाद माल को बाहर बाजार में लाते ही नहीं है । इससे छोटे-छोटे व्यापारियों को माल मिलना बन्द हो जाता है ।

ऐसी दशा में बाजार में कीमतें चढ़ने लगती हैं । लोग तंग आ जाते हैं । चोरबाजारी और कालाबाजारी का रंग खूब जमने लगता है । सब ओर बेईमान व्यापारी चोरबाजारी से अपना हाथ रंगते हैं । धनी और धनी बन जाते हैं और गरीब जनता भूख से पीड़ित होकर मरती है, बढ़ती हुई महँगाई से पिसती है ।

महँगाई कभी-कभी वस्तुओं के उत्पादन न होने से भी बढ़ जाती है । क्योंकि कच्चा माल नहीं मिलता । ऐसी दशा में साधारण लोगों को दैनिक प्रयोग की साधारण चीजें भी महँगी मिलती हैं । आजकल देश में ऐसी ही दशा है । सरकार महँगाई भत्ता बढ़ाती हैं । व्यापारी कीमतें बढ़ा देते हैं । अब तो तीन बार सरकार रुपये की कीमत भी गिरा चुकी है, तब भी महँगाई कम नहीं हुई है ।

चीजों के दाम पूँजीपति व्यापारी कम ही नहीं होने देते हैं । संभवत: उनकी आँखों के सामने देश की अपेक्षा धन अधिक प्रिय है । पदार्थों के वितरण की व्यवस्था के दोष पूर्ण होने से भी देश में महँगाई बढ़ जाती

है । वस्तुओं के अधिक उपयोग से भी उनका मूल्य बढ़ जाता है और वितरण व्यवस्था बिगड़ जाती है, क्योंकि कई पदार्थों का उपयोग अधिक होता है और उत्पादन कम ।

वनस्पति घी और गाय-भैंस के घी की कीमतें इसीलिए बढ़ती जा रही हैं कि दूध की मूल्य वृद्धि हो जाती है । महँगाई के बढ़ने के प्रमुख कारण हमारे सामने आते हैं, सरकार की प्रत्येक योजना पर पर्याप्त व्यय हो रहा है, भ्रष्ट लोग मध्य में आकर सरकार के धन को हड़प जाते हैं और गरीब लोगों का पैसा मार लेते हैं ।

जनसंख्या वृद्धि के कारण भी महँगाई की समस्या ज्यादा उत्पन्न होती है । क्योंकि कमरतोड़ महँगाई के कारण मजदूर वेतन की माँग करते हैं । व्यापारी लोग दर प्रतिदर कीमतें बढ़ाते रहते हैं और फिर इसको देखकर सरकार भी अपनी दर बढ़ा देती है, बनावटी कमी, व्यापारी वर्ग की मुनाफाखोरी तथा जमाखोरी की प्रवृति भ्रष्टाचारी आदि सब इसके प्रमुख कारण हैं ।

जनता को चाहिए कि उसे जिन वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हुई लगे, उन्हें खरीदे ही नहीं । जब खरीद कम होगी तो जमाखोर व्यापारी अपने आप ही चीजों की कीमत करेंगे । आवश्यकताओं को कम कर देने से वस्तुओं की कीमतें स्वत: ही कम हो जाती है ।

सरकार को चाहिए कि दैनिक आवश्यकता वाली वस्तुओं की कीमतें कमी बढ़ने न दे और न ही इन वस्तुओं का उत्पादन ऐसे लोगों के हाथों में जाने दे, जिन्होंने कीमतें बढ़ाने की शपथ रखा रखी हो । तब ही देश में महँगाई कम हो सकती है और जनता को सुख की साँस लेने की अवसर आ सकता है । जब तक ऐसा नहीं होगा, महँगाई बढ़ती रहेगी और जनता दु:खी होकर विद्रोह करने के लिए तैयार हो जाएगी ।


5.  मूल्यवृद्धि की समस्यामहँगाई | Essay on Inflation for College Students in Hindi Language

वस्तुओं की कीमतों में निरन्तर वृद्धि से एक ऐसी चिन्ताजनक स्थिति उत्पन्न हो गयी है, जिसका विकल्प निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रहा है । स्वतन्त्रता से पूर्व हमारे देश में मूल्य-वृद्धि की इतनी भयावह स्थिति नहीं थी, जित्तनी आज हो गयी है । उस समय जो वस्तुओं की कीमतें थीं । वे सर्वसाधारण के लिए कोई दुःख का कारण नहीं था ।

सभी सहजता के साथ जीवन को आनन्दपूर्वक बिता रहे थे । यद्यपि उस समय भी वस्तुओं की मूल्य-वृद्धि हो रही थी । उससे जीवन-रथ को आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं दिखाई देती थी । इसके विपरीत आज का जीवन-पथ तो वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से काँटों के समान चुभने वाला हो गया है ।

अब प्रश्न है कि आज वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होने का कारण क्या है? वस्तुओं की कीमतें इतनी तीव्र गति से क्यों बढ़ रही हैं? अगर इन्हें रोकने के लिए प्रयास किया गया है, तो फिर ये कीमतें क्यों न रुक पा रही हैं? दिन-दूनी रात चौगुनी गति से इस मूल्य-वृद्धि के बढ़ने के आधार और कारण क्या है?

भारतवर्ष में वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों के विषय में यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि आजादी के बाद हमारे देश में कीमतों की बेशुमार वृद्धि हुई है । बार-बार सत्ता-परिवर्तन और दलों की विभिन्न सिद्धान्तवादी विचारधाराओं से अर्थव्यवस्था को कोई निश्चित दिशा नहीं मिली है ।

बार-बार सत्ता-परिवर्तन के कारण अर्थव्यवस्था पर बहुत अरार पड़ा है । जो भी दल सत्ता में आया, उसने अपनी-अपनी आर्थिक नीति की लागू किया । यों तो सभी सरकार ने मुद्रास्फीति पर काबू पाने का बराबर प्रयास किया । फिर भी अपेक्षित सफलता किसी भी सरकार को नहीं मिली ।

प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण थोक कीमतों में 184 प्रतिशत कमी हुई । लेकिन इस योजना के अन्त में कीमतों का बढ़ना पुन: जारी हो गया । दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान कीमतों का बढ़ना रुका नहीं और इनकी वृद्धि 30 प्रतिशत हो गई । तीसरी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत खाद्यान्न की अत्यधिक वृद्धि के कारण कीमतों की वृद्धि दर लगभग स्थिर थी ।

लेकिन सन् 1962 में चीनी आक्रमण और सन् 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के फलस्वरूप युद्ध-खर्च के साथ-साध अन्य राज्यों में सूखा और बाढ़ की भयंकर स्थिति से खाद्यान्न में भारी कमी के कारण मूल्य दर बढ़ना शुरू हो गयी ।

इसी प्रकार से सन् 1971 में पाकिस्तानी आक्रमण के साथ लगभग एक करोड़ शरणार्थियों के पर्ची पाकिस्तान से आने के कारण सरकार को खर्च पूरा करने के लिए अतिरिक्त कर भी लगाने पड़े थे । इससे वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि दर करनी पड़ी । इस प्रकार समय-समय पर मूल्य स्थिरता के बाद मूल्य-वृद्धि इस देश की नियति वन गई है ।

वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होने के कारण अनेक हैं । जनसंख्या का तीव्र गति से बढ़ने के कारण पूर्ति मांग के अनुसार नहीं बढ़ना, मुद्रपूर्ति का लगभग एक प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ते जाना और वस्तु का उत्पादन इस गति से न होने के साथ-साथ रोजगारों में वृद्धि, घाटे की वित्त-व्यवस्था, शहरीकरण की प्रवृत्ति काले धन का दुष्प्रभाव तथा उत्पादन में धीमी वृद्धि आदि के कारण कीमतों में वृद्धि हुई ।

यही नहीं देश में भ्रष्ट व्यवसायी और दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था ने कीमतों में निरन्तर वृद्धि की है । कीमतों में निरन्तर वृद्धि के मुख्य कारणों में सर्वप्रथम एक यह भी कारण है कि विज्ञान की विभिन्न प्रकार की उपलब्धियों से आज मानव मन डोल गया है । वह विज्ञान के इस  अनोखे चमत्कार में आ गया है । इनके प्रति लालायित होकर आज मनुष्य में अपनी इच्छाओं को बेहिसाब चढ़ाना शुरू कर दिया है ।

फलत: वस्तु की माँग और पूर्ति उत्पादन से कहीं अधिक होने लगी है । इसलिए माँग की और खपत की तुलना में वस्तु उत्पादन की कमी देखते हुए वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि करने के सिवाय और कोई चारा नहीं रह जाता है । इस तरह महंगाई का दौर हमेशा होता ही रहता है ।

वस्तुओं की कीमतों के बढ़ने रो जीवन का अव्यवस्थित हो जाना स्वाभाविक है । आगे की कोई आर्थिक नीति तय करने में भारी अड़चन होती है । कीमतों की वृद्धि दर और कितनी और कब घट-बढ़ सकती है, इसकी जानकारी प्राप्त करना एक कठिन बात है ।

महंगाई बढ़ने से चारों और से जन-जीवन के अस्त-व्यस्त हो जाता है । इससे परस्पर विश्वास और निर्भरता की भावना समाप्त होकर कटुता का विष बीज बो देती है । अतएव वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों को स्थिर करने के लिए कोई कारगर कदम उठाना चाहिए । इससे जीवन और समुन्नत और सम्पन्न हो सके ।

 

महंगाई एक ऐसा शब्द है, जो हर देश की अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ाव लाता है और इंसान की आजीविका को प्रभावित करता है। बीस पच्चीस साल पहले भी महंगाई थी, पर अब यह समस्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है।

आज वस्तु के दाम कई गुना बढ़ गये हैं। आम आदमी के लिये तो दो वक्त पेट भरना भी कठिन हो गया है।

Essay on mehngai inn Hindiयूँ तो मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग की आमदनी भी कई गुना बढ़ गयी है, पर चीजों की कीमतों की तुलना में वह बहुत कम है। हर वस्तु की कीमतें इस समय आसमान छू रही हैं।

महंगाई को लेकर समय समय पर सरकारी कर्मचारी हड़तालें और आन्दोलन करते हैं। सरकार वेतन तथा महंगाई भत्ते बढ़ाते हैं, पर वह ऊँट के मुंह में जीरे के समान होता है।

आये दिन हम समाचार पत्रों में किसानों द्वारा आत्महत्या के समाचार पढ़ते हैं या व्यापारियों द्वारा सपरिवार आत्महत्या की खबरें सुनायी देती हैं। ये सब इस महंगाई के ही दुष्परिणाम हैं। इस मंहगाई में अपना खर्च चलाना कठिन होता जा रहा है।

महंगाई के पीछे कई कारण हैं जिनमें जनसंख्या वृद्धि, सामान की माँग का बढ़ाना, चीजों की कमी, भ्रष्टाचार, अनुचित वितरण व्यवस्था आदि शामिल हैं।

सरकार को गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले लोगों की मदद के लिये अतिरिक्त सहायता का प्रबन्ध करना चाहिये। कृत्रिम रूप से महंगाई बढ़ाने के दोषी लोगों को कठोर दण्ड दिया जाना जरूरत है। मुनाफाखोरी, कालाबाजारी करने वालों पर नजर रखी जानी चाहिये। इसके लिये जनता का जागरूक रहना भी जरूरी है।

 

बढ़ती महंगाई पर निबंध

महंगाई हमारे देश के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट है। देश में कई साधारण और जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छु रही हैं।

गरीब लोगों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर आज दाल की कीमत 100 रूपए प्रति किलो से ज्यादा है। ऐसे में एक गरीब व्यक्ति दाल भी नहीं खरीद सकता है।

महंगाई क्या है?

बढ़ती महंगाई
बढ़ती महंगाई

बढते समय के साथ महंगाई मे भी हर दिन बढत हो रही है। महंगाई को हम कुछ इस प्रकार समझ सकते है जब मूलभूत वस्तुो के दाम आसमान छूने लगते है।

पैसो का मूल्य गिरना और दाम बढने को महंगाई कहा जाता है। महंगाई बढते ही कमाई कम हो जाती है और खर्च बढ जाता है। महंगाई के विरोध मे कई बार प्रदर्शन होते है, रैलिया निकलती है और मार्च निकलते है।

महंगाई बढ़ने के मुख्य कारण

महंगाई हमारे देश मे एक बड़ी और गंभीर समस्या के रूप मे सामने आई है। समय के साथ महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण हमारे देश की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब गरीबी के दलदल मे फस रहा है।

कई बार पयार्यवण के कारण भी गरीब आती है अगर फसल के समय कोई आपदा आ जाती है और फसल खराब हो जाती है तो उस परिवार का भरण पोषण रूक जाता है।

बात यह नही है कि हमारे देश मे भोजन नही है, बात कुछ यूं है कि काला बाजारी के चलते भी अकसर दामो मे वृद्धि होती है। देश के कुछ अर्थशास्त्रीयो ने इस विषय पर शोध किया है। कुछ ऐसे अहम बिंदुो पर जांच की जिनके कारण महंगाई का बढना तय किया जाता है।

अर्थशास्त्रीया ने कुछ विषयोे पर जांच की जो कुछ इस प्रकार है – दाम कैसे तय होते है, दाम बढने का कारण क्या है, किस प्रकार से समय समय पर उनका आंकलन होना चाहिए।

महंगाई बढने के कारण नौकरी से मिलने वाली रकम से खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। पिछले एक दशक मे भारत ने और उसकी अर्थव्यवस्था ने बहुत तरक्की की है।

परंतु अभी तक भी गरीब व्यक्ति को वे मूल सुविधाए नही मिली जो चाहिए होती है इसका कारण है महंगाई। हमारे देश मे महंगाई के कई कारण है जैसे कि सरकार का नियंत्रण ना होना, काला बाजारी, आपदाए इत्यादि।

महंगाई का कारण काला बाजारी

वस्तुो की मांग बढने और निर्माण कम होने के कारण भी महंगाई बढ रही है। काला बाजारी भी एक कारण है क्योकि निर्मित वस्तुओं को कम मात्रा मे बाजार मे भेजा जाता है जिसके चलते उसका दाम बढ जाता है।

हमारे देश मे महंगाई और दाम बढाने के लिए काम करने वाली संस्थाए ज्यादा सक्रिय नही है।

सरकार का पक्ष

सरकार का दाम बढाने की योजनाओ पर कोई नियंत्रण नही है। सरकार योजनाए बनाती है । परंतु उन्हे पूर्ण रूप से और अच्छी तरह लागू करने मे असर्मथ होती है। सरकार की तय राशि का फायदा जरूरतमंद और गरीब को नही मिल पाता।

महंगाई का हल

उपभोक्ता और सरकार के बीच अच्छे गठबंधन से महंगाई पर लगाम कसी जा सकती है। महंगाई बढते ही सरकार देश मे ब्याज दर बढा देती है। सरकार द्वारा तय की हुई राशि का आम आदमी तक पहुचना बेहद जरूरी है। इससे गरीबी मे भी गिरावट आएगी और लोगो के जीने के स्तर मे भी सुधार आएगा।

समय समय पर यह जांच करना जरूरी है कि कोई व्यापारी या फिर कोई अन्य व्यक्ति काला बाजारी या मुनाफाखोरी का काम तो नही कर रहा है। समय समय पर यह सर्वे कराना भी जरूरी है कि बाजार मे किसी वस्तु का दाम कितना है, यह तय मानक से ज्यादा तो नही है। मूल सुविधाओ और अनाज के दाम समय समय पर देखने होगे क्योकि मनुष्य जीवन के लिए अनाज बेहद जरूरी है।

ग्राहक को अपने अधिकारो के बारे मे जानना होगा और अगर कोई दुकानदार ज्यादा दाम मे समान बेच रहा है तो उसके खिलाफ कारवाही करनी होगी। कई बार ऐसे देखा गया है कि उपभोक्ता दुकानदार से समान ज्यादा दाम मे खरीदता है जिससे आने वाले समय मे भी उसे समान आसानी से उपलब्ध हो सके।

महंगाई पर निबंध in english,

महंगाई पर निबंध in marathi,

महंगाई की मार पर निबंध,

महंगाई पर कविता,

महागाई निबंध,

महंगाई का अर्थ,

महंगाई के कारण,

बढ़ती महंगाई की समस्या पर निबंध,

badhti mehangai par nibandh hindi mein,

mehangai ki samasya par nibandh hindi mein,

short essay on mehangai ki samasya in hindi,

essay on mehangai in english,

mehngai ke karan in hindi,

badhti mehangai essay in punjabi,

kamartod mehangai anuched,

mehangai par kavita,

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बालश्रम पर निबंध (Essay On Child Labour In Hindi) :

भूमिका : बालश्रम बच्चों के द्वारा अपने बाल्यकाल में किया गया श्रम या काम है जिसके बदले उन्हें मजदूरी दी जाती है। बालश्रम भारत के साथ-साथ सभी देशों में गैर कानूनी है। बालश्रम एक कलंक होता है। बालश्रम एक अभिशाप है जिसने अपना जाल पूरे देश में बिछा दिया है कि प्रशासन की लाखों कोशिशों के बाद भी यह अपना प्रचंड रूप लेने में सफलता प्राप्त कर रहा है। बालश्रम हमारे समाज के लिए एक कलंक बन चुका है।

बालश्रम : किसी भी बच्चे के बाल्यकाल के दौरान पैसों या अन्य किसी भी लोभ के बदले में करवाया गया किसी भी तरह के काम को बालश्रम कहा जाता है। इस प्रकार की मजदूरी पर अधिकतर पैसों या जरूरतों के बदले काम किया जाता है। बालश्रम पूर्ण रूप से गैर कानूनी है। इस प्रकार की मजदूरी को समाज में हर वर्ग द्वारा निंदित भी किया जाता है।

लेकिन इसका ज्यादातर अभ्यास हम समाज वाले ही करते हैं। जब कोई बच्चे को उसके बाल्यकाल से वंचित कर उन्हें मजबूरी में काम करने के लिए विवश करते हैं उसे बालश्रम कहते हैं। बच्चों को उनके परिवार से दूर रखकर उन्हें गुलामों की तरह पेश किया जाता है।

अगर सामान्य शब्दों में समझा जाए तो बच्चे जो 14 वर्ष से कम आयु के होते हैं उनसे उनका बचपन , खेल-कूद , शिक्षा का अधिकार छीनकर उन्हें काम में लगाकर शारीरिक , मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित कर कम रुपयों में काम करा कर शोषण करके उनके बचपन को श्रमिक रूप में बदल देना ही बालश्रम कहलाता है।

बालश्रम के कारण : आज के समय में बालश्रम पूरे देश में फैल चुका है। हमारे समाज के लिए बालश्रम एक अभिशाप बन चुका है। सरकार द्वारा चलाए गए नियमों के बाद भी गंदी आदत समाज से कभी छूटती ही नहीं है। भारत देश की ज्यादातर आबादी गरीबी से पीड़ित है। कुछ परिवारों के लिए भर पेट खाना खाना भी एक सपना सा लगता है।

गरीबी से पीड़ित लोग बहुत बार अपनों को खोने के गम से अवगत हो चुके हैं। गरीबी की वजह से गरीब माता-पिता अपने बच्चों को घर-घर और दुकानों में काम करने के लिए भेजते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसे निर्णय बच्चों की शारीरिक और मानसिक अवस्था को झंझोर कर रख देते हैं। इस निर्णय को अपने परिवार के पेट पालने के उद्देश्य से लिया जाता है।

दुकान और छोटे व्यापारी बच्चों से काम बड़ों जितना करवाते हैं लेकिन उन्हें कीमत आधी देते हैं क्योंकि वो बच्चे होते हैं। बच्चे अधिक चालाक नहीं होते हैं इसलिए उन्हें ज्यादा चोरी और ठग का अवसर नहीं मिलता है। व्यापार में उत्पादन लागत कम लगने की वजह से भी कुछ व्यापारी बच्चों की जिन्दगी बर्बाद कर देते हैं।

बच्चे बिना किसी भी लोभ के मन लगाकर काम करते हैं। हमारे देश की आजादी के बाद भी बहुत से इलाके हैं जहाँ के बच्चे आज तक शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार से वंचित हैं। हमारे देश में हजारों गाँव हैं जहाँ पर पढाई की कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है लेकिन अगर व्यवस्था है तो कोशों दूर है।

इस तरह का प्रशासनिक ढीलापन भी बालश्रम के लिए जिम्मेदार है। इन सब से ज्यादा पीड़ित गरीब परिवार होते हैं क्योंकि उनके बच्चों के लिए पढना एक सपना होता है। बच्चों के लिए किफायती स्कूलों की कमी की वजह से बच्चों को अनपढ़ और बेबस रहना पड़ता है। बच्चों द्वारा अनपढ़ और बेबस रहना उन्हें मानसिक रूप से कई बार छू जाता है।

बहुत बार बच्चे पढाई के बिना जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं और कभी-कभी ये मजबूरियां उन्हें बालश्रम की खाई में धकेल देती हैं जिससे आज तक किसी का भी भला नहीं हुआ है न ही कभी होगा। बहुत से परिवारों में बालश्रम को परंपरा और रीती का नाम देकर इसको बड़ी आसानी से अंजाम दिया जाता है। बहुत से परिवारों का मानना होता है कि उनके जीवन में कभी अच्छी जिन्दगी लिखी ही नहीं है और वर्षों से चली आ रही मजदूरी की परंपरा ही उनका कमाई और जीवन व्यतीत करने का एक श्रोत होता है।

बहुत से परिवारों का तो यह भी मानना होता है कि बाल्यकाल से काम करने से बच्चे आने वाले समय में ज्यादा मेहनती और दुनियादार हो जाएंगे। बालश्रम बच्चों के निजी विकास को जन्म देता है जो आगे जिन्दगी जीने में आसान होता है। हमारे समाज को लगता है कि लडकियाँ लडकों से कमजोर होती हैं उनकी लडकों से समानता नहीं की जा सकती है। इसी वजह से उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

बालश्रम के परिणाम : एक बच्चे को 1000-1500 रूपए देकर मजदूरी करवाने से कई प्रकार की हानि होती है। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चा अशिक्षित रह जाता है। देश का आने वाला कल अंधकार की ओर जाने लगता है। इसके साथ ही बेरोजगारी और गरीबी और अधिक बढ़ने लगती है।

अगर देश का आने वाला कल इतना बुरा होगा तो इसमें सभी का नुकसान होगा। जिस उम्र में बच्चों को सही शिक्षा मिलनी चाहिए , खेल कूद के माध्यम से अपने मस्तिष्क का विकास करना चाहिए उस उम्र में बच्चों से काम करवाने से बच्चों का शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक और सामाजिक विकास रुक जाता है। शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार होता है। शिक्षा से किसी भी बच्चे को वंचित रखना अपराध माना जाता है।

बच्चों का कारखाने में काम करना सुरक्षित नहीं होता है। गरीबी में थोड़े से पैसों के लिए अपनी जान को खतरे में डालना या पूरी उम्र उस बीमारी से घिरे रहने जो लाइलाज हो। इसलिए किसी भी बच्चे के लिए बालश्रम बहुत अधिक खतरनाक होता है। अगर कोई बच्चा गरीबी या मजबूरी से परिश्रम कर रहा है तो उसका पर्याप्त वेतन नहीं दिया जाता है और हर प्रकार से उसका शोषण किया जाता है जो बहुत ही गंभीर अपराध है।

बालश्रम रोकने के उपाय : बालश्रम हमारे समाज के लिए एक अभिशाप है जो हमारे समाज को अन्याय मुक्त नहीं बनने देगा। हमें बालश्रम का अंत करने के लिए सबसे पहले अपने घरों या दफ्तरों में किसी भी बच्चे को काम पर नहीं रखना चाहिए। हमें हमेशा इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चे से काम करवाने के बदले उसे पैसे देकर या खाना देकर हम उन पर कोई एहसान नहीं करते हैं बल्कि हम उसके भविष्य से खेलते हैं।

बालश्रम को खत्म करने के लिए सबसे पहले हमें अपनी सोच को बदलना होगा। बालश्रम को रोकने के लिए मजबूत और कड़े कानून बनाने चाहिएँ जिससे कोई भी बाल मजदूरी करवाने से डरें। अगर आपके सामने कोई भी बालश्रम का मामला सामने आए तो सबसे पहले नजदीकी पुलिस स्टेशन में खबर करनी चाहिए।

हमें बालश्रम को पनाह देने वाले पत्थर दिलों के विरुद्ध अपनी आवाज को बुलंद करना चाहिए। आम आदमी को भी बाल मजदूरी के विषय में जागरूक होना चाहिए और अपने समाज में होने से रोकना चाहिए। गरीब माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए क्योंकि आज सरकार मुफ्त शिक्षा , खाना और कुछ स्कूलों में दवाईयां जैसी चीजों की सुविधाएँ प्रदान कर रही है।

कारखानों और दुकानों के लोगों को प्रण लेना चाहिए कि वो किसी भी बच्चे से मजदूरी या श्रम नहीं करवाएंगे और काम करवाने वाले लोगों को रोकेंगे। अक्सर हम लोग बाजार जाकर अपनी जरूरत का सामान खरीद लेते हैं बिना इस बात को जाने कि इसकी बनावट के पीछे किसी बालश्रम का अभ्यास है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि इससे हमारे समाज में बदलाव लाया जा सकता है।

हम जब भी कोई सामान खरीदें तो पहले दुकानदार से उसकी तकनीक के बारे में जरुर पूंछें। हम इस प्रश्न को पूंछ कर समाज में सचेतना का एक माहौल पैदा कर सकते हैं। बालश्रम की बनायीं गई किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अगर हमें किसी भी बालश्रम का पता चले उसके बारे में सबसे पहले बच्चे के परिवार वालों से बात करनी चाहिए। उनके हालातों को समझकर उनके बच्चे के भविष्य के बारे में उन्हें बताना चाहिए। बच्चों के परिवार वालों को बालश्रम के नुकसान और कानूनी जुर्म के बारे में बताना चाहिए।

उपसंहार : बालश्रम को खत्म करना केवल सरकार का ही कर्तव्य नहीं है हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस योजना में सरकार का पूरा साथ दें। सरकार इस योजना को सफल बनाने के लिए बहुत प्रयास कर रही है। बालश्रम एक बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है। इस समस्या को सभी के द्वारा जल्द-से-जल्द खत्म करने की जरूरत है। बच्चे बहुत कम हैं लेकिन वे भविष्य के विकासशील देश का भविष्य हैं।

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बाल श्रम पर निबंध | Essay on Child Labour!

भारत में भगवान के बाल रूप के अनेक मंदिर हैं जैसे बाल गणेश, बाल हनुमान, बाल कृष्ण एवं बाल गोपाल इत्यादि । भारतीय दर्शन के अनुसार बाल रूप को स्वयं ही भगवान का रूप समझा जाता है । ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश एवं अभिमन्यू आज भी भारत में सभी के दिल-दिमाग में बसे हैं ।

आज के समय में गरीब बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं है । बाल श्रम समाज की गंभीर बुराइयों में से एक है । गरीब बच्चों का भविष्य अंधकारमय है । पूरे संसार में गरीब बच्चों की उपेक्षा हो रही है तथा उन्हें तिरष्कार का सामना करना पड़ता है । उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाता है और शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, साथ ही बाल श्रम हेतु मजबूर होना पड़ता है ।

समाज में गरीब लडकियों की स्थिति और भी नाजुक है । नाबालिक बच्चे घरेलु नौकर के रूप में काम करते हैं । वे होटलों, कारखानों, दुकानों एवं निर्माण स्थलों में कार्य करते हैं और रिक्शा चलाते भी दिखते हैं । यहाँ तक की वे फैक्ट्रियों में गंभीर एवं खतरनाक काम के स्वरुप को भी अंजाम देते दिखाई पड़ते हैं ।

भारतीय के संविधान, १९५० के अनुच्छेद २४ के अनुसार १४ वर्ष से कम आयु के किसी भी फैक्ट्री अथवा खान में नौकरी नहीं दी जाएगी । इस सम्बन्ध में भारतीय विधायिका ने फैक्ट्री एक्ट, १९४८ एवं चिल्ड्रेन एक्ट, १९६० में भी उपबंध किये हैं । बाल श्रम एक्ट, १९८६ इत्यादि बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने हेतु भारत सरकार की पहल को दर्शित करते हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४५ के अनुसार राज्यों का कर्त्तव्य है कि वे बच्चों हेतु आवश्यक एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करें ।

गत कुछ वर्षो से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा इस सम्बन्ध में प्रशंसा योग्य कदम उठाए गए हैं । बच्चों की शिक्षा एवं उनकी बेहतरी के लिए अनेक कार्यक्रम एवं नीतियाँ बनाई गयी है, तथा इस दिशा में सार्थक प्रयास किये गए हैं । किन्तु बाल श्रम की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है ।

इसमें कोई शक नहीं है कि बाल श्रम की समस्या का जल्दी से जल्दी कोई हल निकलना चाहिए । यह एक गंभीर सामाजिक कुरीति है तथा इसे जड़ से समाप्त होना आवश्यक है ।

 

बाल श्रम पर निबंध

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

Child Labour Essay in Hindi बालश्रम का तात्पर्य उस कार्य से है, जिसे करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु से छोटा हो |बालश्रम एक ऐसा सामाजिक अभिशाप है, जो शहरों में, गांव में, एवं चारों और मकड़जाल की तरह बचपन को अपने आगोश में लिए हुए हैं| खेलने-कूदने के दिनों में कोई बच्चा श्रम करने को मजबूर हो जाए तो, इससे बड़ी विडंबना किसी भी समाज के लिए भला और क्या हो सकती है| बालश्रम से परिवारों को आए स्त्रोतों का केवल एक छोटा सा भाग ही प्राप्त होता है, जिसके लिए गरीब परिवार अपने बच्चों के भविष्य को गर्त में झोंक देते हैं| बालश्रम मानवाधिकारों का हनन है| मानव अधिकारों के अंतर्गत प्रत्येक बच्चे को शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास का हक पाने का अधिकार है, लेकिन यथार्थ में स्कूल, खेल, प्यार-स्नेह, आत्मीयता आदि इनकी कल्पना में ही रह जाते हैं|

Child Labour Essay in Hindi 200 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बालश्रम का प्रारंभ औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से ही माना जाता है| कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कारखानों में मौजूदा स्वरुप में बाल श्रम के त्याग की बात कही थी| 1990 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोमालिया को छोड़कर अन्य सभी देशों ने बाल अधिकार सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर  किए| यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, दुकानों, कारखानों, ईंट-भट्ठों एवं खदानों के साथ-साथ घरेलू कार्यों में  विश्वभर में करोड़ों की संख्या में बाल श्रमिक कार्यरत हैं, किंतु सभी मामलों में बाल श्रमिकों का शोषण नहीं होता, कई बार तो उनके द्वारा किए गए श्रम उनके और उनके परिवार वालों के लिए हितकर भी होते हैं|

बांग्लादेश में 55,000 से भी ज्यादा बाल श्रमिक के वस्त्र उद्योग में कार्यरत हैं, जिनकी बदौलत यह देश अमेरिका को लगभग 75 करोड़ डॉलर के वस्त्र निर्यात करता है, किंतु अमेरिका द्वारा बाल श्रम कानून लागू किए जाने और बाल श्रमिको द्वारा तैयार किए गए माल पर प्रतिबंध लगाया जाने पर बांग्लादेश में 75% बाल श्रमिकों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिससे उनके साथ-साथ उनके परिवार वालों के सामने भुखमरी की स्थिति आ पहुँची | बावजूद इसके आज दुनिया के संपन्न देशों में बाल श्रम को मानव अधिकार का उल्लंघन मान इस पर कानून प्रतिबंध लगा दिया गया है | संयुक्त राज्य अमेरिका में बालश्रम कानून के अंतर्गत किसी भी प्रतिष्ठान में कार्य करने की न्यूनतम आयु 16 वर्ष है| संयुक्त राष्ट्र संघ एवं राष्ट्रीय संस्थान द्वारा वर्ष 1979 को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस के रुप में मनाया गया था|

Child Labour Essay in Hindi
बाल श्रम पर निबंध – Child Labour Essay in Hindi

Child Labour Essay in Hindi 300 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग 1.3 करोड़ थी | यहां अधिकांश बाल श्रमिक ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत हैं| उनमें से लगभग 60% 10 वर्ष की आयु से कम है| व्यापार एवं व्यवसाय में 23% बच्चे संग्लन हैं, जबकि 36% बच्चे घरेलू कार्य में| शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्याधिक, जो कैंटीन एरिया में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संग्लन है, लेकिन वह रिकॉर्ड में नहीं है| अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं| कितने ही बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईंट की दीवार पर कालिख जमी रहती है और जिनकी हवा में विषद्जनक बू होती है|

वे ऐसी भठियों के पास काम करते हैं, जो 1200 डिग्री सेल्सियस ताप पर जलती हैं| वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं| वह कांच-धमन की इकाइयों में कार्य करते हैं, जहां उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि उनके बदन में दर्द होता है, दिमाग परेशान रहता है, उनका दिल रोता है और आत्मा दुखी रहती है, लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है| कूड़े के ढेर में से रिसाइक्लिंग के लिए विभिन्न सामग्री इकट्ठा करने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही कई खतरनाक और संक्रामक बीमारियां घिर कर जाती है, जिनसे बचपन और जवानी का होने पता ही नहीं चल पाता और उनके कदम सीधे बुढ़ापे में भी चले जाते हैं|

Child Labour Essay in Hindi Language
बाल श्रम पर निबंध – Child Labour Essay in Hindi Language

भारत में बालश्रम के प्रमुख कारणों में निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, कम आय की प्राप्ति आदि है| जहां 40% से अधिक लोग गरीबी से जूझ रहे हैं| ऐसी स्थिति में बच्चे बालश्रम करके अपना और अपने माता-पिता का पेट भरते हैं| उनकी कमाई के बिना उनके परिवार का जीवन स्तर और गिर सकता है|

Child Labour Essay in Hindi 400 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

भारत में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है, जिसके दृष्टिकोण में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक आवश्यक है धन कमाना, जिससे बाल श्रम को बढ़ावा मिलता है| बड़ा और संयुक्त परिवार होने से परिवार के कम ही लोगों को रोजगार मिल पाता है, फलस्वरूप बच्चों को काम करने के लिए विवश होना पड़ता है| इसके अतिरिक्त समाज के स्वार्थी तत्वों और गलत तरीकों से आर्थिक हितों की पूर्ति करने वाले व्यावसायिक संगठनों के द्वारा जान-बूझकर प्रतिकूल स्थिति पैदा कर दी जाती है, ताकि उन्हें सस्ती मजदूरी पर बिना विरोध के काम करने वाले बाल श्रमिक आसानी से मिल जाए|

भारत के संविधान में बालश्रम को रोकने या हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएँ की गई है जैसे 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने में काम करने के लिए या किसी जोखिम वाले रोजगार में नियुक्त नहीं किया जाएगा (धारा -24), बाल्यावस्था और किशोरावस्था को शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक परित्यक्ता से बचाया जायेगा (धारा -39 Af ),  संविधान के प्रारंभ होने से 10 वर्षो की अवधि में सभी बालकों की, जब तक वे 14 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर लेते हैं, राज्य निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रत्यन करेगा (धारा -39 AF) आदि|

वर्ष 1949 में सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी श्रमिकों के कार्य करने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई| भारत सरकार ने वर्ष 1979 में बालश्रम समस्याओं से संबंधित अध्ययन हेतु गुरुपाद स्वामी समिति का गठन किया, जिसके सुझाव पर बालश्रम अधिनियम 1986 लागू किया गया| यह पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों:- जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण में रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाता है|

वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बालश्रम नीति तैयार की गई, जिसके अंतर्गत जोखिम भरे व्यवसायों में कार्यरत बच्चों के पुनर्वास पर जोर दिया गया| वर्ष 1996 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए उस फैसले ने बालश्रम के विरुद्ध कार्रवाई में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें संघीय एवं राज्य सरकारों को जोखिम भरे व्यवसायों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने  एवं शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था| केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 28 अगस्त 2012 को बालश्रम अधिनियम, 1986 में संशोधन को मंजूरी दी गई|

Child Labour Essay in Hindi 500 Words

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

इस अधिनियम में संशोधन के द्वारा गैर-जोखिम भरे कार्यों में भी 14 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को लगाने पर पूर्णत:  प्रतिबंध लगाया गया है| इससे पूर्व 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों से सिर्फ जोखिम भरे व्यवसायों में कार्य कराने पर ही प्रतिबंध था| संशोधित अधिनियम के अनुसार, 14 से 18 वर्ष की आयु वालों को किशोर की श्रेणी में रखा गया और जोखिम वाले उद्योग धंधों में काम करने वालों की न्यूनतम आयु 14 से बढ़ाकर 18 कर दी गई है| इसमें बालश्रम का संघये अपराध कानून के उल्लंघन करने पर अधिकतम सजा 1 वर्ष से बढ़ाकर 2 वर्ष, साथ ही साथ जुर्माने की रकम 20000 से बढ़ाकर 50000 कर दी गई है| बावजूद इन सबके हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या आज भी करोड़ों में है|

भारतवर्ष से बालश्रम को पूर्णत: समाप्त करने का संकल्प लेने वाले वर्ष 2014 के नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी के शब्दों में “इससे बड़ी त्रासदी और भला क्या होगी कि देश में आज भी 17 करोड़ बाल श्रमिक और लगभग 20 करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं| ये वयस्क कोई और नहीं, बल्कि बाल श्रमिकों की माता पिता ही है| वास्तव में, यह विरोधाभास बालश्रम के खत्म होने से ही समाप्त हो पाएगा|” बालश्रम को बच्चों के विरूद्ध हिंसा मानने वाले श्री कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधन और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से बालश्रम समाप्त किया जा सकता है| इन्होंने बालश्रम मिटाने हेतु लोगों का आव्हान करते हुए यह नारा भी दिया “सहानुभूति का वैश्वीकरण, सूचना का लोकतांत्रिकरण और अधिकारों का सर्वव्यापीकरण|”

Essay on Child Labour in Hindi
बाल श्रम पर निबंध  – Essay on Child Labour in Hindi

वास्तव में, हम यह सोचते हैं कि इस तरह की समाज की कुरीतियों को समाप्त करने का दायित्व सिर्फ सरकार का है| सब कुछ कानूनों के पालन एवं कानून भंग करने वालों को सजा देने से सुधारा जाएगा, लेकिन यह असंभव है| हमारे घरों में, ढाबों में, होटलों में अनेक श्रमिक मिल जाएंगे जो, कड़ाके की ठंड या तपती धूप की परवाह किए बगैर काम करते हैं| सभ्य होते समाज में या अभिशाप आज भी क्यों बरकरार है? क्यों तथाकथित सभ्य एवं सुशिक्षित परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्चों को पसंद किया जाता है| हमें इन सब प्रश्नों के उत्तर स्वयं से पूछने होंगे|

हमें इन बच्चों से बालश्रम न करवाकर इन्हें प्यार देना होगा, जिनके लिए विलियम वर्ड्सवर्थ ने कहा था “द चाइल्ड इस द फादर ऑफ द मैन” अर्थात बच्चा ही व्यक्ति का पिता है| हमें भी निंदा फाजली की तरह ईश्वर की पूजा समझकर बच्चों के दुख को दूर करना होगा| आज हम 21वीं सदी में विकास और उन्नति की ऐसी व्यवस्था में जी रहे हैं, जहां समानता, धर्मनिरपेक्षता, मान्यता आदि की चर्चा बहुत जोर-शोर से की जा रही है|

Note :- Child Labour Essay in Hindi अगर आपको बाल श्रम पर निबंध यह हमारा लिखा हुआ अच्छा लगा हो तो कृपया आप इसे जरूर शेयर करे और लोगो तक ताकि बाल श्रम इंडिया में न हो|

child labour in hindi pdf,

child labour act in hindi,

how to stop child labour in hindi,

ppt on child labour in hindi,

slogans on child labour in hindi,

child labour act 1986 in hindi,

essay on child labour in hindi with quotes,

child labour in hindi meaning,

बाल श्रम की रोकथाम पर निबंध,

बाल मजदूरी एक अभिशाप पर निबंध,

बाल श्रम पर संस्कृत निबंध,

बाल श्रम की परिभाषा,

बाल श्रम कानून,

बाल श्रम समस्या और समाधान,

बाल श्रम के कारण,

बाल श्रम व बाल तस्करी पर निबंध,

 

error: