अमीर कौन? Who is Rich Hindi Story

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अमीर कौन? Who is Rich Hindi Story

महिला पिकनिक के दौरान 3 स्टार होटल में  ठहरी थी. उसके साथ उसका एक छोटा सा बच्चा था. बच्चा भूख से रोये जा रहा था.
सर एक कप दूध मिलेगा क्या…?
8 माह के बच्चे की माँ ने 3 स्टार होटल मैनेजर से पूछा…
मैनेजर “हाँ, 100 रू. में  मिलेगा”…
महिला ने कहा – “ठीक है दे दो”
वह सुबह जब गाड़ी में जा रहे थे …
बच्चे को फिर भूख लगी…., बच्चा रोए जा रहा था ..
गाडी को टूटी झोपड़ी वाली पुरानी सी चाय की दुकान पर रोका…
बच्चे को दूध पिला कर शांत किया…
दूध के पैसे पूछने पर बूढा दुकान मालिक बोला…
“बेटी! मैं इस बच्चे के दूध के पैसे नहीं ले सकता ” यदि रास्ते के लिए चाहिए तो लेती जाओ…
“अब बच्चे की माँ के दिमाग मे एक सवाल बार बार घूम रहा था कि अमीर कौन 3 स्टार होटल वाला या टूटी झोपड़ी वाला…?

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अपना अपना स्थान Apna Apna Sthan Hindi Story

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अपना अपना स्थान Apna Apna Sthan Hindi Story

एक राजा था. वह दिन- रात यही देखता रहता कि कौन वस्तु उपयोगी है और कौन अनुपयोगी. एक बार उसने यह फरमान दिया कि पता करो कौन -कौन से प्राणी, वनस्पति, जीव -जंतु उपयोगी हैं और कौन अनुपयोगी. राजा के मंत्रियों -दरवारियों ने इसके लिए समिति बनाई जिसे एक महीने बाद अपनी रिपोर्ट देनी थी. एक महीने बाद समिति के प्रतिनिधि राजा से मिलने आये. उन्होंने राजा को बताया कि दो कीड़े- मकड़ी और मक्खी बेकार हैं. ये किसी भी तरह से उपयोगी नहीं हैं. राजा ने सोचा- क्यों न हम इन दोनों कीड़ों को बिलकुल नष्ट करवा दें. तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला – महाराज! हमारे ऊपर पडोसी राजा ने आक्रमण कर दिया है. दोनों में युद्ध हुआ और राजा हार गया और जंगल की और जान बचाने के लिए भागा. राजा  थक गया था इसलिए एक पेड़ के नीचे सो गया.
तभी एक जंगली मक्खी ने उसकी नाक पर डंक मार दिया  जिससे राजा की नींद खुल गई. राजा ने सोचा इस तरह खुले में सोना सुरक्षित नहीं और एक गुफा में छिप गया. उस गुफा में बहुत मकड़ी रहती थी. मकड़ियों ने गुफा के द्वार पर जाल बन दिया. जब राजा को खोजते हुए सैनिक आये और उस गुफा की तरफ़ा देखा तो बोले – इसमें नहीं गया होगा. अगर गया होता तो मकड़ी का जाला नष्ट हो गया होता. गुफा में छिपा राजा यह सब सुन रहा था. सैनिक चले गए. राजा ने सोचा- प्रकृति में सभी जीव -जंतुओं का अपना अपना स्थान होता है. सबकी अपनी उपयोगिता होती है. अब राजा की आँखें खुल चुकी थी.

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बहरा कौन? हिंदी कहानी Deafness Hindi Story

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बहरा कौन? हिंदी कहानी Deafness Hindi Story

पतिदेव महाशय को कई दिनों से लग रहा था कि मैं जो कुछ भी बोलता हूँ, पत्नी जी उसका जबाब नहीं देती. कहीं कान का प्रॉब्लम तो नहीं. बेचारे पतिदेव असमंजस में थे कि पूंछू तो कैसे.

deafness hindi story

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आखिर बीबी है. यह कैसे पूछ सकता हूँ कि तुम्हें ठीक से सुनायी देता है कि नहीं? सो महाशय गए डॉक्टर साहब के पास राय मांगने. डॉक्टर ने कहा – साधारण सी बात है. पहले 40 फीट की दूरी से कुछ पूछो फिर 20 फीट से फिर 10 फीट से फिर बिलकुल पास से. जब आपकी बीबी को सुनायी दे दे तो  आकर बता देना. उसी के मुताबिक कान का मशीन दे दूंगा.

पतिदेव उचित समय का इंतजार करने लगे. एक दिन पत्नी जी किचन में खाना पका रही थी. पति जी को मौका उचित जान पड़ा. गेट के पास से जो लगभग 40 फीट दूर होगा, आवाज लगाई – सुन रही हो आज खाना में क्या पका रही हो? नो आंसर.

फिर दरवाजे के पास आये जो 20 फीट दूर होगा. वहां से वही प्रश्न पूछा – फिर कोई उत्तर नहीं. फिर 10 फीट की दूरी  से पूछा. फिर कोई उत्तर नहीं. फिर पास आकर पूछा – तो पत्नी जी ने कहा – क्या गोपाल के पापा. कितनी बार बताऊँ. चौथी बार बता रही हूँ आलू मटर और पराठा बना रही हूँ.

पति देव को काटो तो खून नहीं. अरे यह क्या? कान के मशीन की जरुरत तो इसे नहीं. कान  तो मेरा ख़राब है – पतिदेव मन -ही मन बुदबुदाया.

कई बार हमारे जीवन में ऐसा होता है जब हम सामनेवाले को इस प्रकार से देखते हैं जैसे उसमे कोई भारी कमी या एब हो जबकि हम खुद ही किसी न किसी कमजोरी या दुर्गुण से ग्रस्त होते हैं. इसलिए अति आत्म विश्वास कभी कभी अच्छे अच्छों को ले डूबता है. अपने गिरेबान में झाक कर देखने वाला व्यक्ति इस तरह की परिस्थिति से कभी नहीं घिरता.

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शहादत हिंदी कहानी Martyr Hindi Story

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शहादत हिंदी कहानी Martyr Hindi Story

एक बार एक ही दिन तीन लोगों की मृत्यु हुई. यमदूत तीनों को चित्रगुप्त महाराज के पास ले गए. तीनों के कर्मों का हिसाब किताब करने के बाद उन्हें स्वर्ग भेज दिया गया. स्वर्ग में जाने के बाद साधु महाराज ने देखा – ये क्या! एक मामूली सा किसान उनसे ऊँचे सिंहासन पर आसीन है और एक मामूली सेना के जवान को बिलकुल धर्मराज के बगल में बैठा
देख साधु महाराज बैचैन हो गए.

उनसे रहा नहीं जा रहा था. क्या करें, किससे पूछें.
तभी उन्हें चित्रगुप्त जी आते दिखाई पड़े. साधु भागकर उनके पास गए. हाथ जोड़ते हुए पूछा – चित्रगुप्त महाराज! मैंने जिन्दगी भर भगवान का भजन किया. मोह-माया से बचने के लिए शादी विवाह तक नहीं किया. अपने मन को वश में रखा और भिक्षाटन से प्राप्त अन्न से अपना निर्वाह किया. फिर भी उस किसान को मुझसे ऊँचा स्थान क्यों मिला?
चित्रगुप्त ने कहा – साधू जी! यह बात सही है कि आपने निरंतर भगवान का भजन किया और अपना जीवन भिक्षाटन से प्राप्त अन्न पर किया और उस किसान ने दिन में सिर्फ दो बार भगवान का नाम लिया. लेकिन यह भी तो देखिये उसने अपने परिवार, खेती बारी, माल -मवेशी सबसे प्यार किया, उनका ध्यान रखा लेकिन इतने कार्यों के बाद भी भगवान को स्मरण करता रहा. इसलिए उसे आपसे ऊँचा दर्जा प्राप्त हुआ.
साधु ने फिर पूछा – और उस नौजवान का जो इतने कम उम्र का होते हुए भी सीधे धर्मराज के बगल में स्थान पा लिया.
चित्रगुप्त गंभीर स्वर में बोले – हे साधु महाराज! वह नौजवान नहीं एक शहीद नौजवान है. उस नौजवान ने अपने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण दिए हैं. उसकी वीरता, उसका त्याग और बलिदान किसी भी सांसारिक भक्ति से ऊँचा और सर्वश्रेष्ट है. ऐसे लोगों को यहाँ स्वर्ग में भी अति विशिष्ट स्थान प्राप्त होता है और वे धर्मराज के भी अतिप्रिय होते हैं.
साधु महाराज सिर  झुकाए वहां से चले गए.

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मेहनत करो और खूब सोओ Hard work and Sleep Hindi Story

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मेहनत करो और खूब सोओ Hard work and Sleep Hindi Story

सेठ पीरामल राजनगर के धनी मानी लोगों में गिने जाते थे. धन धान्य की कोई कमी नहीं थी. महल जैसा घर था और कई नौकर चाकर थे. परिवार भरा- पूरा और परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ और सुशील थे.

Hard work and Sleep Story

Hard work and Sleep Story

यों तो हर प्रकार का सुख था लेकिन एक भारी तकलीफ थी. सेठ जी को रात में नींद ही नहीं आती थी. कभी कभार आँख लग भी जाती तो बुरे सपने देखने लगते थे सेठ जी, इससे वे घबरा जाते. मन में तरह तरह की शकाएँ उठने लगते. बहुत इलाज कराया लेकिन रोग घटने की जगह बढ़ता ही चला गया.

एक दिन एक सिद्ध महात्मा का उस नगर में आगमन हुआ. वे लोगों से मिलते और उनकी समस्याओं का उपचार बताते चलते. सेठ पीरामल को भी उनके बारे में पता चला. वे भी उस महात्मा के पास गए और अपनी समस्या बताई.

महात्मा गंभीर होकर उनकी बातें सुनते रहे. सेठ जी बोले – ‘हे महात्मन! किसी भी तरह से मेरा संकट दूर कीजिये.’

महात्मा ने कहा – ‘सेठ जी, आपके दुखों का एक ही कारण है कि आप विकलांग हैं?’ सेठ ने आश्चर्य से कहा – ‘क्या कहते है महाराज! मैं तो पूरी तरह से स्वस्थ हूँ फिर आप मुझे विकलांग कैसे कह सकते हैं.’

सेठ जी बातें सुन महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा –  ‘विकलांग वह नहीं होता जिनके हाथ पैर नहीं होते बल्कि वास्तव में विकलांग वे होते हैं जो इनके होते हुए भी इनका इस्तेमाल नहीं करते हैं.’

महात्मा ने आगे पूछा – ‘क्या आप बताएँगे कि आप अपने हाथ- पैर का प्रयोग कर कितना काम करते हैं.’ सेठ जी तो निरुत्तर, उनका तो सारा काम उनके एक आदेश पर उनके नौकर चाकर दौड़ – दौड़ कर देते हैं.

महात्मा ने कहा – ‘सेठ जी यदि आप रात को अच्छी नींद में सोना चाहते हैं तो मेहनत कीजिये और जी भरके सोइये. मेहनत करने से शरीर थक  जाता है और नींद तो अपने आप ही जाती  है.’

सेठ जी ने उस दिन  पूरा काम किया. नौकरों की बजाय खुद ही सारे काम किये. रात को सेठ जी खूब अच्छी नींद में सोये. अब उन्हें अपनी बीमारी का इलाज पता चल गया.

उस दिन से सेठजी स्वयं मेहनत करने लगे. मन ही मन सेठ जी उस महात्मा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते रहते.

 

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जीनियस डॉक्टर Genius Doctor Hindi Story

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जीनियस डॉक्टर Genius Doctor Hindi Story

यह कहानी सत्तर के दशक की है. उन दिनों गांवों में आगजनी की घटना ज्यादातर होती रहती थी विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में. एक दिन एक गाँव में एक घर में आग लग गई. मकान खपरैल था. घर के मालिक ने जब अपने घर से धुआं ऊपर उठते देखा तो वह जोर -जोर से चिल्लाने लगा. वह चिल्ला चिल्ला कर लोगों को इकट्ठा करना चाह रहा था. लेकिन उसके मुंह से तो आवाज ही नहीं निकल रही थी. फिर भी वह जोर जोर से चिल्लाये जा रहा था. चिल्लाते चिल्लाते वह बेहोश होकर गिर पड़ा. खैर, पडोसी दौड़ कर आये आग पर काबू पा लिया गया. कुछ लोग दौड़कर उस आदमी के पास गए. मुंह पर पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाया.
लेकिन यह क्या? उसकी मुंह को क्या हो गया. मुंह तो खुली की खुली है, वह तो बंद ही नहीं हो रहा. कोई कहता – जबड़ा जाम हो गया. कोई कहता शॉक लग गया है, इसलिए बंद नहीं हो रहा है. लोकल डॉक्टर को बुलाया गया. उसने इंजेक्शन दिया लेकिन कोई फायदा नहीं. फिर दो तीन और डॉक्टर को दिखाया गया लेकिन मुंह बंद ही नहीं हो पा रहा था.
फिर उसे एक बड़े ही नामी डॉक्टर शिवनारायण जी के पास लाया गया. उन्होंने मरीज को देखा और बोला इसे ठीक करने का 100 रूपये लूँगा. (उन दिनों 100 रूपये का बहुत महत्व होता था) मरता क्या न करता, 100 रूपये दे दिए गए. डॉक्टर साहब ने अपने स्टाफ को 25 पैसे दिए और कहा – जाओ माचिस की डिब्बी ले आओ. माचिस की डिब्बी आ गया. उसमें से डॉक्टर ने दो तीलियाँ निकाली, उसे जलाया और तेजी से उस आदमी के खुले मुंह में फेंकने की चेष्टा की. अपने खुले मुंह की तरफ जलती तीली को आता देख उस आदमी ने झट से अपना मुंह बंद कर लिया. डॉक्टर ने कहा – ले जाओ! इसका इलाज हो गया.
सारे लोग उस जीनियस डॉक्टर की प्रतिभा की दाद देने लगे. आज भी उस डॉक्टर की चर्चा यदा कदा सुनने को मिल ही जाती है.
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संत पुरंदरदास हिंदी कहानी

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संत पुरंदरदास हिंदी कहानी

यह कहानी महाराज कृष्णदेव राय के शासनकाल की है. वे विजय नगर राज्य के प्रसिद्ध राजा थे. यह राज्य वर्तमान में दक्षिण भारत में स्थित था.  उनके राजगुरु व्यास राय थे.

Saint Purandar Das Story in Hindi

उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में एक प्रसिद्ध संत हुए – पुरंदरदास. वे सादगी – भरा जीवन जीते थे. कृष्णदेव राय के सामने उनके राजगुरु प्राय: पुरंदरदास जी सादगी की प्रशंसा करते थे. उन्होंने जब उनके मुख से पुरंदरदास जी की कई बार प्रशंसा सुन ली तो उन्होंने सोचा – ‘क्यों न संत पुरंदरदास जी की परीक्षा ली जाए.’

एक दिन कृष्णदेव राय ने अपने सेवकों को भेजकर पुरंदरदास जी को महल में बुलवाया. महाराज ने संत को भिक्षा में चावल दिए. संत प्रसन्न होकर बोले – “महाराज, आप रोज मुझे इसी तरह भिक्षा दिया करें.”

भिक्षा लेकर प्रसन्न मन से पुरंदरदास अपने घर लौट आए और भिक्षा की थैली अपनी पत्नी को सौंप दी. उनकी पत्नी सरस्वती देवी जब चावल बीनने बैठीं तो उन्हें चावलों में बहुत -से हीरे दिखाई दिए. उन्होंने अपने पति से पूछा   –“ये चावल आप कहाँ से लाए हैं?”

पुरंदरदास ने कहा – “मुझे आज महाराज कृष्णदेव राय ने बुलाया था. उन्होंने ही ये चावल दिए हैं.”

पति की बात सुनकर सरस्वती देवी समझ गई कि चावल में हीरे क्यों हैं. वे चावलों में से हीरे बीनकर घर के पिछवारे मिट्टी के ढेर पर फेक आई और चावलों को खाने के लिए पका लिया.

अगले दिन पुरंदरदास जी फिर भिक्षा के लिए राजमहल गए. उनके मुख पर प्रसन्नता देखकर राजा ने समझा कि हीरों के कारण संत का मुख चमक रहा है. राजा ने फिर चावलों में हीरे मिलाकर उन्हें भिक्षा दे दी. एस प्रकार एक सप्ताह तक पुरंदरदास राजमहल में भिक्षा के लिए आते रहे और राजा उन्हें हीरे मिलाकर चावल देते रहे.

 

एक सप्ताह बीत जाने के बाद  राजा कृष्णदेव राय ने अपने गुरु व्यास राय से कहा – “गुरुदेव, आप तो कहते थे कि पुरंदरदास जी जैसा कोई दूसरा वैरागी नहीं है, परन्तु मुझे तो वे लोभी जान पड़ते हैं. यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो उनके घर चलिए और सच्चाई अपनी आँखों से देख लीजिए.”

कृष्णदेव राय राजगुरु व्यास राय के साथ संत पुरंदरदास जी की कुटिया पर पहुँचे. वहाँ पहुंचकर उन्होंने देखा की लिपे-पुते आंगन में तुलसी के पौधे के निकट बैठकर पुरंदरदास जी की पत्नी चावल बीन रही हैं.

राजगुरु ने सरस्वती देवी से कहा – “बहन, क्या आप चावल बीन रही हैं ?”
सरस्वती देवी ने कहा – “हाँ भाई, मैं चावल बीन रही हूँ. इन चावलों में कोई गृहस्थ कंकड़ डाल देता है. मेरे पति इन चावलों को इसलिए ग्रहण कर लेते हैं कि भिक्षा देने वाले का दिल दुखी न हो, इन कंकडों को बीनने में बहुत समय लगता है.”

राजा कृष्णदेव राय ने कहा – “बहन, तुम बहुत भोली हो! ये कंकड़ नहीं हैं, ये तो बहुमूल्य हीरे हैं.”

सरस्वती देवी बोलीं – “हीरे होंगे आपके लिए, हमारे लिए तो ये मात्र कंकड़ हैं. जब हम जीवन का आधार धन को मानते थे, तब ये हमारी दृष्टि में हीरे थे, परन्तु अब हमने जीवन का आधार भगवान को मान लिया है तो ये हमारे लिए कंकड़ ही हैं.”

सरस्वती देवी ने चावलों में से बीने हुए हीरों को घर के पीछे कूडें में फ़ेंक दिया, जहाँ उन्होंने पहले बीने हीरों को फेंका था.यह देखकर कृष्णदेव राय लज्जित हो गए. वे श्रद्धा पूर्वक सरस्वती देवी के चरणों में झुक गए. यह देख व्यास राय मंद-मंद मुस्कराने लगे.

वाकई महान देश भारत में एक से बढ़कर एक संत हुए हैं जिनका जीवन  अनुकरणीय और प्रेरणादायी है. इसलिए भारत को धर्म और अध्यात्म का देश कहा जाता है. जबतक भारत भूमि में ऐसे संत होते रहेंगे भारत का धर्म ध्वज लहराता रहेगा.

 

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ईश्वर एक हैं God Is One Hindi Story

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ईश्वर एक हैं God Is One Hindi Story

बहुत पुरानी बात है. महाराष्ट्र में एक संत हुए थे – नरहरि.  वे शिव के परम भक्त थे. उनकी इतनी अधिक आस्था थी कि वे किसी दूसरे  देवता के स्वप्न में भी दर्शन नहीं करना चाहते थे. वे केवल भगवान शिव के मंदिर में ही जाते थे.
God Is One Hindi Story
नरहरि सुनार का काम करते थे. एक दिन वे अपनी दुकान पर बैठकर आभूषण बना रहे थे. उसी समय एक सेठ उनके पास आया और बोला – “मुझे भगवान विठोबा की मूर्ति के लिए कमरबंद बनवाना है. आप मंदिर में चलकर श्री विठोबा की मूर्ति की कमर का नाप ले लें.”नरहरि ने सेठ से पुछा  –“किस प्रयोजन से आप विठोबा के लिए कमरबंद बनवा रहे हैं?”सेठ ने कहा –“मैंने मनौती मानी थी की यदि मेरे पुत्र तो मैं भगवान विठोबा के लिए कमरबंद बनवाऊंगा. उनकी कृपा  से मेरे यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ है, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ.”
नरहरि ने सेठ से पुछा –“मैं तो केवल भगवान शिव के ही मंदिर में जाता हूँ. मैं विठोबा के मंदिर में उनकी मूर्ति का नाप लेने के लिए नहीं जाऊंगा.आप किसी अन्य सुनार से कमरबंद बनवा लें.”सेठ जी बोले – “आपके समान अच्छे आभूषण बनाने वाला कोई और सुनार नहीं है, इसलिए मैं किसी अन्य सुनार से कमरबंद नहीं बनवाऊंगा. मैं आपको विठोबा जी की मूर्ति की कमर का नाप लाकर दे दूंगा.आप उसी नाप का कमरबंद बना देना.”सेठ जी की बात पर नरहरि जी सहमत हो गए.सेठ जी ने विठोबा जी की मूर्ति की  कमर का नाप लाकर नरहरि को दे दिया. उन्होंने सेठ जी द्वारा लाए नाप के अनुसार कमरबंद तैयार कर दिया.

सेठ जी कमरबंद लेकर विठोबा जी के मंदिर में गए. सेठ जी ने जब विठोबा जी को कमरबंद पहनकर देखा तो वह बड़ा निकला.नरहरि ने उसे पुन: बनाया: अब वह छोटा निकला. एस प्रकार सेठ जी कई बार नाप लेकर आए. नरहरि ने बार-बार उनके लाए नाप के अनुसार ही कमरबंद बनाया, परन्तु पहनाते पर वह कभी छोटा हो जाता तो कभी बड़ा.

अंत में पुजारी तथा अन्य लोगों की सलाह मानकर नरहरि आँखों पर पट्टी बाँधकर भगवान विठोबा के मंदिर में उनकी मूर्ति की कमर का नाप लेने स्वयं गए. नरहरि ने जब नाप लेने के लिए मूर्ति को स्पर्श किया तो उन्हें वह मूर्ति भगवान शिव की मालूम हुई. उन्होंने समझा कि उनके साथ मजाक किया गया है. यह सोचकर उन्होंने अपनी आँखों पर बंधी पट्टी हटा दी.

पट्टी हटकर उन्होंने मूर्ति को देखा. मूर्ति देखकर वे चकित रह गए. मूर्ति विठोबा देवता की थी. उन्होंने झट से दोबारा आँखों पर पट्टी बांध ली और नाप लेने लगे. नाप लेते समय उन्हें फिर वह मूर्ति भगवान शिव की प्रतीत हुई. उनके हाथ में त्रिशूल भी था. उन्होंने मूर्ति के गले का स्पर्श करके देखा तो उन्हें सर्प का अनुभव हुआ. उन्होंने अपनी आँखों की पट्टी फिर से हटा दी और देखा तो सामने भगवान विठोबा की मूर्ति थी.

नरहरि को ऐसा लगा मानों विठोबा देवता की मूर्ति उन्हें प्रसन्न होकर देख रही है उन्होंने फिर: पट्टी बाँधने के लिए ज्योंही हाथ बढ़ाया, वह मूर्ति शिवजी की प्रतिमा बन गई. फिर वह मूर्ति विठोबा की दिखाई पड़ने लगी. उन्हें एस बात की प्रतीत हुई की दोनों देवता एक ही हैं. उन्होंने मन-ही मन सोचा –‘दोनों देवता एक ही हैं. मैं व्यर्थ ही भेद मानता रहा.’

नरहरि प्रसन्नता से चिल्ला उठे –“ हे देवाधिदेव ! हे सकल विश्व के जीवनदाता ! मैं आपकी शरण में आया हूँ. आज आपने मेरे अज्ञान मेरे अज्ञान का अंधकार दूर कर दिया है. अब मैं आपकी भी पूजा- अर्चना किया करूंगा. आज मुझे पता चल गया है कि  आप एक ही हैं. इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि  ईश्वर के सभी रूपों को समान भव  से देखना चाहिए. यह आज के युग में अति महत्वपूर्ण है कि हम अन्य धर्मों के भी इष्टों का सम्मान करें. ठीक ही कहा गया है :

किरणों का हो बंटबारा सूरज को तुम मत बांटो
 पथ का हो बंटबारा मंजिल को तुम मत बांटो
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संत अपमान – एक प्रेरक हिंदी कहानी

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संत अपमान – एक प्रेरक हिंदी कहानी

हमने कई बार सुना है कि हमारा देश भारत साधु संतों का देश है. यहाँ एक से बढ़कर संत हुए हैं. प्रायः लोग संतों का सम्मान ही करते हैं लेकिन कुछ लोग कभी कभार संत अपमान भी करते हैं.
संत अपमान
संत कई प्रकार के होते हैं. बड़े बड़े संत जो टी वी पर दीखते हैं. कुछ संत तो कभी दीखते ही नहीं, कुछ गुदरी मांगते नजर आते हैं. कुछ बहुत हट्टे कट्ठे साधु महाराज हर घर के दरवाजा पर जाकर ज़ोर ज़ोर से अलख जगाते हैं, जयकारा लगाते हैं, बदले में जो कुछ भी मिल जाता है उससे अपना गुजारा करते हैं. इसे यूँ कहें कि यह भिक्षाटन का एक रूप है. हमें तरह तरह के मागन चन्द मिल जाते हैं.वह गेरुआ धारी बहुत ज़ोर ज़ोर से आवाज लगा रहा  था – गुदरी दे दो गुदरी दे दो. गुद्दरवाला बाबा. गुद्दर दे दो. उसकी जटाएं सघन और काफी आकर्षक लग रहा था. पीठ पर एक बड़ी सी पोटली जिसमें माँगा हुआ गुदरी यानि फटा पुराना धोती या साड़ी भरा हुआ था.

तभी अपने दालान पर खड़ा रणजीत ने ज़ोर से आवाज लगाई – ऐ गुदरी! इधर आना! गुदरी वाला उनकी तरफ मुड़ गया. गुदरी वाला रणजीत के दालान पर आकर एक तख़्त ( लकड़ी का बना चौकी जिसमे चार पौआ होता है) बैठ गया.
रणजीत ने पूछा – कहाँ से आये हो. “ कामरू कामख्या से” “ देखो इतना हट्टा कठ्ठा होकर क्यों भीख मांगते फिरते हो. शर्म नहीं आती” “ ये लो कुदाल और मेरे खेत में काम कर दो” दिहारी का २०० रूपये दूंगा”
“ नहीं बाबा! मैं तो गुदरी वाला बाबा हूँ” अगर आपको गुदरी नहीं देना है तो कोई बात नहीं माता रानी आपका कल्याण करें” वह उठकर जाने लगा. रणजीत ने कहा – ऐसे कैसे चले जाओगे? बिना खेत में काम किये नहीं जाने दूंगा.’ गुदरी वाला बाबा जाने लगा.
तभी रणजीत ने अपने दो चार चमचों को बोला – इस ढोगी को सबक सिखाना है. पकड़ो इसे इसका जटा ही नोच डालते हैं. आज इसका सब ढोंग निकाल देते हैं. गुदरी वाले साधू को रणजीत के चमचों ने पकड़ लिया. अब बाबा को लगा कि ये लोग सचमुच उसका जटा काट देंगे.
वह रोने लगा – बोला , ‘देखो बाबा! आप मेरे जटा को मत काटो. इसे 12 वर्षों से मैंने नहीं काटा है. इसे मैं १४ साल पर काटूँगा ऐसा मैंने व्रत लिया हुआ है.’ गुद्दरवाला रोता रहा. लेकिन रणजीत नहीं माना. उसके जटा को काट डाला. वह बाबा ज़ोर ज़ोर से दहाड़े मार मार कर रो रहा था. सिर्फ इतना बोले जा रहा था – मातारानी तुम्हारा भला करें.
उस घटना के छह महीने बाद रणजीत के बाल झरने शुरू हुए. पंद्रह दिनों में सिर के बाल, भौहें के बाल और मूंछ –ढाढ़ी सबके बाल झरकर गिर गए और फिर दुबारा नहीं उगे.
अब रणजीत सुबह सबेरे उठकर सिर पर एक टोपी डालता है. औरत के मेक अप बॉक्स में प्रयोग की जानेवाली काले रंग की पेंसिल से अपने भौहे और मूंछ बनाता है. यह अब उसके रोज की दिनचर्या है.  अब वह साधु- संतों का भी खूब इज्जत करता है. लोग उसे उस गुद्दर वाले बाबा के शाप से शापित मानते हैं. संत अपमान का फल वह आज भी भुगत रहा है.
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स्वदेश सबसे प्यारा Hindi Story

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स्वदेश सबसे प्यारा Hindi Story

किसी गाँव में कुत्तों की एक टोली रहती थी. चित्रांग नाम का कुत्ता सबसे बुड्ढा पर होशियार था. वह सबको अच्छी अच्छी बातें बताता रहता था. सबको वफ़ादारी और नेकी का पाठ पढ़ाते रहता था. एक दिन एक युवा कुत्ता हीरा ने पूछा – बाबा स्वदेश और परदेश में क्या फर्क है?

चित्रांग ने वहां उपस्थित सभी कुत्तों को यह कहानी सुनायी.

homeland is better than any place hindi

एक बार एक चिड़ीमार ने दो तोते पकडे. दोनों तोता को एक सेठ को बेच दिया. सेठ ने एक तोता को अपने पास रखा और दूसरे को अपने मित्र को दे दिया. उसका मित्र उसे अपने साथ परदेश ले गया.

एक बार सेठ का परदेशी मित्र अपने दोस्त  के पास गया.  उसने वहां तोते से पूछा – कहो क्या हाल है ? अगर तुम्हारा कोई सन्देश है तो बताओ तुम्हरे मित्र को दे दूंगा. तोता रो पड़ा. जब सेठ का मित्र गया तो उसने उस तोते को यह बताया कि जब मैंने तुम्हारे मित्र को यह बताया कि वह मेरे पास है. सोने के पिंजरे में रहता है. मेवा मिठाई खाता है तो उसने आसूं गिरा दिए.

यह सुन सेठ का तोता ऐसा उल्टा मानो मर गया हो. सेठ ने मारा जान उसे छोड़ दिया. पिंजरे से निकलते ही वह तोता उड़कर जंगल में अपने पेड़ पर जा बैठा.कुछ दिनों बाद सेठ का दोस्त जब अपने घर गया तो सारी बात अपने तोते को बताई. उस तोते ने भी वैसा ही किया. सेठ  ने उसे भी फिकवा दिया. वह भी उड़कर अपने दोस्त के पास चला गया. उसने अपने दोस्त से कहा : नहीं चाहिए सोने का पिंजरा. आजादी और स्वदेश सबसे प्रिय होता है. इस बात पर हीरा नामक कुत्ता बोला – नहीं बाबा! मुझे अगर अच्छा खाना मिले तो मैं विदेश में ही रहना चाहूँगा.

कुछ समय बाद वहां भारी अकाल पड़ा. हीरा भागकर शहर चला गया और एक गृहस्थ के यहाँ  रहने लगा. जब गृहिणी घर पर नहीं होती रसोई से चुराकर रोटी ले आता लेकिन जैसे ही बाहर निकलता वहां के लोकल कुत्ते उसपर टूट पड़ते और उसे लहूलुहान कर उसकी रोटी छिन लेते. अब उसे स्वदेश का मर्म समझ आया.

कुछ दिनों बाद वह स्वदेश लौट आया और चित्रांग को प्रणाम कर बोला – बाबा ! आप ठीक कहते थे. स्वदेश का मूल्य परदेश  में ही समझ आता है.

 

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