आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story

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आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story

लंबे समय तक राज्य करने के बाद ययाति ने पुत्र को अपना सिंहासन सौंप दिया.  स्वयं वन में जाकर तप करने लने.  कठोर तप के फलस्वरूप वे स्वर्ग पहुंचे.  वे कभी देवताओं के साथ स्वर्ग में रहते और कभी ब्रह्मलोक चले जाते.

Avoid self praise Hindi Story

Avoid self praise Hindi Story

उनका इतना मान  था कि देवता भी उनसे ईर्ष्या करने लगे. वे इन्द्र की सभा में जाते तो उनके तप के प्रभाव से इन्द्र उन्हें अपने से नीचे सिंहासन पर नहीं बैठा सकते थे. अतः इन्द्र को उन्हें अपने ही आसन पर साथ बैठना पड़ता था .

यह बात इन्द्र को अप्रिय लगती थी. देवता भी मृत्यु लोक के किसी जीव के इंद्रासन पर बैठने को स्वीकार नहीं कर  पाते थे. इन्द्र देवताओं की भावना से परिचित थे.

एक दिन इन्द्र ने ययाति से कहा, “आपका पूण्य तीनों लोकों में विख्यात है. आपकी समानता भला कौन कर  सकता है.  मुझे यह जानने की इच्छा है. आपने ऐसा कौन – सा तप किया है जिसके प्रभाव से आप ब्रह्मलोक में जाकर इच्छानुसार रह सकते हैं.”

अपनी प्रशंसा सुनकर ययाति इन्द्र के शब्द जाल में आ गए.  उन्होंने कहा, “हे देवेन्द्र ! मनुष्य, गन्धर्व और ऋषियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे समान तपस्वी हो.” बस  फिर क्या था, इन्द्र का स्वर कठोर हो गया.

 

इन्द्र ने कहा, “ययाति ! “ तत्काल मेरे आसन से उठ जाओ. अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से करके तुमने अपने सारे पुण्य समाप्त कर लिए हैं. तुमने यह जाने बगैर कि देवता, मनुष्य,गन्धर्व और ऋषियों ने क्या – क्या तप किए, उनसे अपनी तुलना की और उनका तिरस्कार भी कर  दिया. अब तुम स्वर्ग से गिरोगे.” आत्मप्रशंसा ने ययाति के तप फल समाप्त कर  दिए.  वे स्वर्ग से गिरा दिए गए. इसीलिए तो कहा गया है कि प्रशंसा दूसरे  के द्वारा हो तो उत्तम है. यदि स्वयं अपनी प्रशंसा करेंगे, तो पुण्य का क्षय होकर पतन हो जाएगा.  अतः आत्मप्रशंसा से दूर ही रहना चाहिए.

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मृत्यु का चिन्तन Remember Death Hindi Short Story

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मृत्यु का चिन्तन Remember Death Hindi Short Story

एक व्यक्ति रोज संत फरीद के पास जाकर पूछता था, “मेरी बुरी आदतें, मेरा दुष्ट स्वभाव कैसे छूटेगा?” फरीद उसे रोज टाल देते थे.

Remember Death Hindi Short Story

Remember Death Hindi Short Story

एक दिन जब उसने बहुत जिद की. तब  संत फरीद ने कहा, “मैं तुमसे क्या कहूँ ? तुम्हारा अंत समय निकट है. तुम्हारी जिन्दगी अब चालीस दिनों से ज्यादा नहीं है.” इतना सुनना था कि वह व्यक्ति चिंता में डूब गया. इसके बाद वह चालीस दिनों तक दुःख, भय, पश्चाताप और भजन में लगा रहा.

चालीस दिन खत्म होने में जब एक दिन शेष बचा, तो संत फरीद ने उसे अपने पास बुलाया. उन्होंने उससे  पूछा. “इन उनतालीस दिनों में कितनी बार तुमने दुष्टतापूर्ण कार्य किए ? कितने पापकर्म किए?” उसने उत्तर दिया, “आश्चर्य की बात है कि इतने दिनों में एक बार भी मेरे मन में कोई गलत ख्याल नहीं आया. चित्त पर हर क्षण मृत्यु का भय छाया रहा.ऐसे में दुष्ट आदतें कहाँ हावी हो पातीं.”

उसकी बातें सुनकर संत फरीद जोर से हंसे और बोले,”बुराइयों से बचने का एक ही उपाय है और वह यह है कि हर घड़ी मृत्यु को याद रखो और वह काम करने की सोचो जिससे भविष्य उज्ज्वल बने,”

मृत्यु टल जाने के अभयदान को पाकर वह व्यक्ति चला गया. अब उसके स्वभाव में दुष्टता और बुराईयां नहीं रह गई थी. मृत्यु के स्मरण ने उसे निष्पाप कर दिया था. मृत्यु का चिन्तन करने से बड़े से बड़े भय का निराकरण हो जाता है.

जो व्यक्ति मृत्यु को ध्यान में रखते हुए कर्म करता है, उसके कर्म दूषित नहीं हो सकते. वह सदैव इसी प्रयास में रहता है कि उसमें कोई बुराई उत्पन्न न हो जाए.

 

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सबसे बड़ी पूजा Biggest Prayer Hindi Short Story

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सबसे बड़ी पूजा Biggest Prayer Hindi Short Story 

प्रख्यात महिला संत आंडाल एक बार भगवत प्राथर्ना में लीन थीं. तभी कई लोग उनकी कुटिया पर आ पहुंचे. उन्होंने पहले उनकी जय-जयकार की. फिर मदद की गुहार करने लगे.  वे चिल्ला रहे थे,”रक्षा करो, रक्षा करो”.

Biggest Prayer Hindi Short Story

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आंडाल के शिष्यों ने उन्हें ऐसा करने से रोका और समझाया कि वे संत आंडाल की पूजा में विघ्न न डालें. शोर –शराबे से आंडाल का ध्यान भंग हो गया. वह बाहर आई. उन्होंने लोगों से इस तरह आने का कारण पूछा.

लोगों ने बताया कि गाँव के मुखिया की हालत बेहद खराब है. अब उसको सिर्फ आप ही  बचा सकती हैं.

संत आंडाल ने जब यह सुना तो वे तत्काल उनके साथ चल पडीं.  उनके शिष्यों के लिए यह आश्चर्य का विषय था.  वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर कर  आंडाल ने मुखिया के लिए अपनी पूजा अधूरी क्यों छोड़ दी?  शिष्य इस बात पर हैरान थे कि संत ने मुखिया के मामले को इतनी गंभीरता से क्यों लिया. ऐसे भी उस मुखिया की छवि बहुत अच्छी  नहीं थी.

एक पहर  बाद उन्होंने देखा कि आंडाल बीमार मुखिया को साथ लिए गाँव वालों के साथ चली आ रही हैं.  उन्होंने उसकी चारपाई एक वृक्ष की छाया में डाल दी.  उन्होंने  गांववालों को लौट जाने को कहा. फिर वे अपनी कुटिया में गई और कुछ औषधियां निकाल लाई.

उन्होंने अपने शिष्यों को निर्देश दिया कि वे मुखिया को समय – समय पर औषधियां देते रहें और सेवा करें.  शिष्यों ने उनकी आज्ञा का पालन तो किया पर उनका विस्मय बढ़ता ही जा रहा था.  आखिरकार एक शिष्य ने उनसे पूछ ही लिया, “माते ! आज आपने बीच में ही आराधना छोडकर इस मुखिया की सेवा की. इसमें क्या रहस्य है.”

आंडाल ने शांत भाव से उत्तर दिया, “पुत्र ! ईश्वर समस्त प्राणियों में है. उसका कोई एक रूप या आकार नहीं है. वे तो कण –कण में निवास करते हैं और प्रत्येक कर्म उनकी ही पूजा है. मनुष्य की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है. आज हम सबको इसका अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए हमें प्रसन्नता होनी चाहिए.”

संत आंडाल की सीख में एक बहुत बड़ा सन्देश छिपा हुआ है. मानव सेवा करना सबसे बड़ी पूजा है. हम व्यर्थ में इधर- उधर भटकते रहते हैं. गरीबों, जरुरतमंदों, बेबस और लाचार लोगों की सेवा करें. दूसरों की मदद करके देखें और उसके बाद उसकी अनुभूति को महसूस करें. वह अनुभूति अनमोल होती है. उसे आप जब भी याद करेंगे, आपको अपने बारे में सोचकर बहुत अच्छा लगेगा.

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जिसे मौत का भय न था – अभय सुकरात [Socrates Took Poison Motivational Anecdote]

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सुकरात विष का प्याला पी रहा थे.  उसके पास आस्तिक और नास्तिक दोनों प्रकार के मित्र मौजूद थे.  पहले उनके नास्तिक मित्रों ने पूछा,  “क्या आपको मौत का भय नहीं है?”

Socrates Took Poison Motivational Anecdote

Socrates Took Poison Motivational Anecdote

सुकरात ने मुस्कुराते हुए कहा.  ”इस समय मैं आप लोगों के विश्वास के अनुसार ही निर्भय हूँ. आप लोग कहते हैं कि आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है. अगर ऐसा है तो फिर भय कैसा? जब आत्मा ही नहीं है तो मौत का भय किस लिए? विषपान के बाद मैं मर जाउँगा तो हमेशा के लिए कहानी खत्म हो जाएगी|”

इसी समय सुकरात के आस्तिक मित्रों ने भी वही सवाल किया. सुकरात ने उन्हें कहा. “आप लोगों के अनुसार आत्मा अमर  है. विषपान के बाद मर गया तो मुझे किस बात का भय? आत्मा तो मरेगी नहीं,फिर डर किस बात का ?”

इस प्रकार अपने अंतिम समय में भी सुकरात ने अपने नास्तिक और आस्तिक दोनों प्रकार के मित्रों को संतुष्ट कर  दिया.

सुकरात की  देशभक्ति [Socrates Took Poison Motivational Anecdote]

सुकरात को मृत्युदंड सुनाया जा चुका था. वे  काल कोठरी में मौत की प्रतीक्षा कर रहे थे. करोटो उनका प्रिय शिष्य था. एक दिन सिपाहियों के साथ सांठ – गांठ करके जेल की उस काल –कोठरी में पहुँच गया. उसने अत्यंत विनम्र भाव से निवेदन किया.

“गुरूजी! मैंने सब व्यवस्था कर  ली है. आपको जेल से बाहर निकलने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं होगी.  जैसे ही आप बाहर जायेंगे, मेरा सारा धन आपको समर्पित हो जाएगा. फिर आप  बड़े चैन से किसी अन्य  देश में जाकर अपना जीवन व्यतीत कर सकेगें. यहाँ तो आपकी मौत निश्चित है.”

अपने प्रिय श्रद्धालु शिष्य के आग्रह को सुन कर सुकरात ने सहज भाव से कहा, “प्रियवर! मैं तुम्हारी गुरू –भक्ति और स्नेह के लिए बहुत धन्यवाद करता हूँ. लेकिन खेद हैं कि तुम्हारे आग्रह को स्वीकार नहीं कर सकता.  क्योंकि मैंने जिस देश की धरती पर जन्म लिया, जिसकी धूल  में खेल – खेल कर बड़ा हुआ, जिसकी हवाओं  में अब तक साँस लेकर जी रहा हूँ, उस स्नेहमयी पावन मातृभूमि को मौत के डर से छोड़ कर क्या कायरों की तरह भाग कर  विदेश चला जाउँ? यह मातृभूमि द्वारा मुझ पर किये गये उपकारों के प्रति विश्वासघात है. मौत तो एक न एक दिन अवश्य आयेगी.  फिर क्यों न मैं अपने प्राणों का उत्सर्ग अपनी  माटी में ही करूँ. जिसने मुझे प्राण दिए, वे मेरे प्राण मेरे देश की अमानत हैं.  उस अमानत को उसे ही सौंपना मेरा कर्तव्य है.”

उनका शिष्य करोटो मूक बनकर सिर्फ सुनता रहा अपने गुरु के उच्च आदर्शों को. सचमुच  सुकरात ने अपने उच्च आदर्शों और मूल्यों की वजह से पूरी दुनिया में प्रसिद्द हुए.

उदार बनो हिंदी कहानी Generous Hindi Short Story

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उदार बनो हिंदी कहानी Generous Hindi Short Story 

दक्षिण कर्नाटक के बेलगाम जिले की एक महिला सन्तान न होने के कारण बहुत दुखी रहा करती थी. भजन, पूजन, व्रत, उपवास जिसने जो बताया, उसने बड़ी श्रद्धा से अपनाया.  फिर भी उसकी गोद सूनी की सूनी ही रही. अंत में उदास मन लेकर वह सन्तान पाने की लालसा से चिदम्बर दीक्षित के पास पहुंची.

 Generous Hindi Short Story

Generous Hindi Short Story

दीक्षित जी सिद्ध पुरूष, समाजसेवी और लोकोपकारी व्यक्ति थे. वे दूसरों  के दुःख और दर्द को अपना दुःख-दर्द समझकर उसे दूर करने का भरसक प्रयत्न करते थे.

जिस समय वह महिला वहाँ पहुंची, उस समय दीक्षित जी के पास वर्तन में भुने हुए चने रखे थे. उन्होंने उस महिला को अपने पास बुलाकर दो मुट्ठी चने दिए. फिर उसको  कहा, “ उस आसन पर बैठ कर  चबा लो.”  उस ओर कई बच्चे खेल रहे थे. छोटे – छोटे बच्चों को अपने –पराए का ज्ञान कहाँ होता है ? वे खेल बंद कर उस महिला के पास आकर इस आशा से खड़े हो गए कि वह महिला शायद उन्हें भी खाने के लिए कुछ चने देगी. लेकिन महिला तो मुँह फेरकर अकेले ही चने खाती जा रही थी. बच्चे ललचाई दृष्टि से उसे ताकते ही रह गए.

जब चने समाप्त हो गए तो वह दीक्षित जी के पास पहुंची. वह उनसे बोली, “अब आप हमारे दुःख दूर करने का उपाय बतला दीजिए.” तब दीक्षित जी ने कहा, “देखो देवी ! मुफ्त में मिले चनों से तुम उन बच्चों को चार दाने भी न दे सकीं, जबकि एक बच्चा तो तुम्हारी ओर एक हाथ तक पसार रहा था.

उदार भगवान से और भी अधिक उदारता पाने वालों को अपने स्वभाव और चरित्र में भी उदारता लानी चाहिए. उन्हें अधिक से अधिक उदार बनने का प्रयत्न करना चाहिए. तभी ईश्वर भी उनकी सुनते हैं. उस औरत को दीक्षित जी की बात समझ में आ गयी.

हम अक्सर किसी चीज को पाने की लालसा तो रखते हैं. लेकिन हमारे अन्दर उसकी योग्यता नहीं होती. मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी वर्तमान स्थिति के बारे में सोचे. आत्म अवलोकन से सारी  समस्या अपनेआप सुलझ जाती है.

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अनोखा पुरस्कार हिंदी कहानी /Anokha Puraskaar Hindi Short Story

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अनोखा पुरस्कार हिंदी कहानी /Anokha Puraskaar Hindi Short Story

आधी रात का समय था.  चारों ओर घना अँधेरा छाया हुआ था. मूसलाधार बारिश हो रही थी, बादल रह – रहकर गरज उठते थे. बिजली के बार – बार कौंधने से वातावरण बहुत ही भयानक हो उठा था. इस बुरे मौसम में सारा उज्जयिनी नगर अपने घरों में दुबका मीठी नींद सो रहा था.

Anokha Puraskaar Hindi Short Story

Anokha Puraskaar Hindi Short Story

राजमहल के अधिकांश दीपक बुझ चुके थे. जो बचे रह गए थे, वे भी बस बुझने ही वाले थे.ऐसे तूफानी मौसम में राजमहल का द्वारपाल मात्रिगुप्त राजमहल की एक अटारी के नीचे खड़ा अपने दुर्भाग्य पर सोच – विचार कर रहा था. अपने भाग्य को कोस रहा था.

राजा विक्रमादित्य की सेवा करते – करते उसे एक साल बीत चुका था. लेकिन अभी तक उनसे भेंट तक भी नहीं हो सकी थी. वह निर्धन आदमी था, लेकिन किसी गुनी राजा के आश्रय में काम करना चाहता था. वह एक असाधारण कवि था और अपनी कला के पारखी की  तलाश कर रहा था.

एक दिन उसने उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के गुणों की चर्चा सुनी.  राजा  विद्वानों और गुणियों को उचित सम्मान देते हैं. उसने यह सुन राजा विक्रमादित्य के दरबार में जाने का निर्णय किया. मात्रिगुप्त ने बहुत प्रयास किया किन्तु वह राजा से मिल न सका. बड़ी कठिनाई से उसे द्वारपाल का काम मिला. राजा से मिलने की प्रतीक्षा करते हुए उसे एक साल बीत चुका था.

उधर उस तूफानी रात में भी राजा विक्रमादित्य की आँखों से नींद कोसों दूर थी.  वे उस समय एक गंभीर समस्या के बारे में सोच रहे थे. वह समस्या उन्हें कई दिनों से सता रही थी. सोचते हुए उनकी नजर अचानक राजमहल के बाहर दिख रही एक कली- सी आकृति पर पड़ी. उत्सुकतावश उन्होंने जोर से पुकारा, “द्वार पर कौन खड़ा है?” राजा का स्वर पहचानकर द्वारपाल चौका.  उसने सावधान होकर अपना परिचय दिया, “मैं मात्रीगुप्त हूँ, महाराज  ! महल का द्वारपाल.”

महाराज ने प्रश्न किया, “ओह ,ठीक है. अभी कितनी घड़ी की रात्रि शेष है ?”

“महाराज ! अभी डेढ़ प्रहर रात्रि और शेष है.” द्वारपाल ने उत्तर दिया.

“यह तुम्हें कैसे मालूम ?” महाराज ने फिर प्रश्न कर  दिया.

राजा के इस प्रश्न पर मात्रिगुप्त ने सोचा कि अपनी बात कहने का इससे अच्छा मौका और नहीं हो सकता. उसने राजा के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अपनी निर्धनता, अपनी चिंता और उस कारण  नींद न आना आदि इन सभी परेशानियों की एक कविता बनाकर भावपूर्ण शब्दों में राजा को सुना दी.

विद्वान सम्राट सुनके चकित भी हुए और मुग्ध भी. उसके शब्दों में छुपी उपेक्षा और उसकी निर्धनता के वर्णन ने राजा के ह्रदय को व्यथित कर  दिया. सम्राट सोचने लगे कि इस अनोखे कवि के लिए उन्हें क्या करना चाहिए. वह कुछ कह न सके, बस सोचते ही रह गए.

बहुत देर तक  राजा की ओर से कोई उत्तर न मिलने पर मात्रिगुप्त ने सोचा कि उसका प्रयास सफल नहीं हुआ. उसे लगा कि कहीं उसने राजा को नाराज तो नहीं कर दिया.

अगले दिन प्रात: महाराज ने मात्रिगुप्त को बुलवाया. उसने सोचा कि कल की गई अशिष्टता पर महाराज जरूर उसे कोई कठोर दण्ड देंगे. वह डरते – डरते राजदरबार में पहुंचा. राजा ने बिना किसी भूमिका के कहा, “मात्रिगुप्त ! तुम्हें इसी समय कश्मीर जाना होगा और वहाँ मेरा लिखा यह अत्यंत गोपनीय पत्र वहाँ के प्रधानमन्त्री को पहुंचाना होगा. ध्यान रहे, यह पत्र सिर्फ उन्हीं के हाथों में पहुंचे.”

“जैसी आज्ञा अन्नदाता ! आपके आदेश का पालन होगा .” मात्रिगुप्त बोला और राजा के हाथ से वह पत्र ले लिया.

अब तो मात्रिगुप्त और भी ज्यादा परेशान हो उठा. उज्जयिनी से कश्मीर बहुत दूरी पर था.  लेकिन जाना तो था ही. वह क्या –क्या सपने संजोकर इस राज्य में आया था और अब कहाँ दण्ड की तरह महाराज ने उसे इतनी दूर जाने का आदेश दे डाला था.

कई दिनों तक लगातार यात्रा करने के बाद जब मात्रिगुप्त कश्मीर पहुंचा तो वहाँ के मनोरम प्राकृतिक दृश्यों को देखकर उसकी रास्ते की सारी थकावट दूर हो गई . राजमहल पहुँचकर उसने अपने आने की सूचना प्रधानमन्त्री तक पहुंचा दी. प्रधानमन्त्री ने कुछ ही देर बाद उसे अंदर बुलवा लिया. मात्रिगुप्त ने महाराज का दिया हुआ वह गोपनीय पत्र प्रधानमन्त्री को सौंप दिया. पूरा पत्र पढने के बाद अचानक प्रधानमन्त्री के चेहरे के भाव बदल गए. उनका चेहरा अपार खुशी से भर गया. उन्होंने पूछा, “क्या आप ही मात्रिगुप्त हैं?”

“जी हाँ, मेरा ही नाम  मात्रिगुप्त है.” मात्रिगुप्त ने बिना किसी भाव के उत्तर दिया. इतना सुनते ही प्रधानमन्त्री ने प्रतिहारी को बुलाकर तुरंत राज्याभिषेक की तैयारी के आदेश दे दिये. पूरे राज्य में घोषणा करवा दी गई. सभी प्रतिष्ठित अधिकारीयों को बुला लिया गया. मंगल वाद्य गूंगने लगे और वैदिक  मन्त्रों का जाप होने लगा. इन अदभुत परिवर्तनों को देखकर मात्रिगुप्त हैरान था. उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था.

तभी अचानक प्रधानमन्त्री ने उसके समीप आकर कहा, “महाराज ! अब आप सम्राट विक्रमादित्य के आदेशानुसार इस देश के राजा हैं. आज से यह देश आपका है.”

यह सुनकर मात्रिगुप्त को तनिक भी विश्वास न हुआ. उसने सोचा कि कहीं उसके साथ बहुत बड़ा मजाक तो नहीं किया जा रहा है. प्रधानमन्त्री ने आगे कहा, “यहाँ के राजा का कोई उत्तराधिकारी नहीं था. कुछ समय पूर्व ही राजा की मृत्यु हो गई. राज्य के सभी कार्यों को संभालने के लिए मैं बार – बार महाराज विक्रमादित्य से किसी योग्य अधिकारी को भेजने की माँग कर  रहा था. आज आपके यहाँ पहुँचने से मेरी वह मुराद पूरी हो गई. आइए महाराज मात्रिगुप्त, राज्याभिषेक के मुहूर्त का समय निकला जा रहा है ”

मात्रिगुप्त सम्राट विक्रमादित्य की इस अदभुत कृपा से भाव विभोर हो गया. उसने जैसा सोचा था उससे बहुत अधिक उसे मिल गया था. पूरे राज्य में खुशियां मनाई जाने लगीं. मात्रिगुप्त राजा बनने के बाद महाराज विक्रमादित्य से फिर कभी मिल न पाया.

इस अनोखे पुरस्कार के लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उसने अनेकों बहुमूल्य उपहारों के साथ अपने दूत के हाथों  महाराज के पास भिजवा दी. साथ ही उसने कई कवितायेँ भी भेजी जिसमें राजा की इस दान वीरता और उनके गुणों  का अनुपम तरीके से वर्णन किया गया था.

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न्याय का धन हिंदी लघु कथा/Judicious Wealth Hindi Short Story

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न्याय का धन हिंदी लघु कथा/Judicious Wealth Hindi Short Story

बहुत पहले यूनान में हेलाक नाम का एक धनी व्यक्ति रहता था. उसके पुत्र का नाम था चेलाक और पुत्रवधू का नाम हेली था. पुत्रवधू जितनी धर्मपरायण और पाप से डरने वाली थी, सेठ उतना ही लालची और क्रूर प्रवृति का था.

Judicious Wealth Hindi Short Story

Judicious Wealth Hindi Short Story

दुकान पर आने वाले कुशल से कुशल मनुष्य को भी ठग लेना उसके लिए सहज था.  इसीलिए लोग उसे वंचक सेठ के नाम से पुकारने लगे थे. उसकी आमदनी भी अच्छी थी, किन्तु उसका कमाया धन कभी नष्ट हो जाता. कभी चोरी हो जाता. कभी अन्य तरीकों से समाप्त हो जाता, पर फलता नहीं था. पुत्रवधू बहुत टोका करती कि अन्याय के पैसे से बरकत नहीं होती. आप बईमानी मत किया करिए. आखिर में खाना रोटी और पहनना कपड़ा ही है, तब फिर इतनी धोखाधड़ी क्यों ? पर सेठ कब मानने वाला था.

एक दिन पुत्रवधू की कही बात की परीक्षा करने के लिए न्याय से धन कमाकर उससे सोने की एक पंसेरी बनवाई. अपनी छाप लगाकर उसे कपड़े में बाँधा  और एक चौराहे पर रख आया. कुछ दिन तक वह पंसेरी यों ही चौराहे पर पड़ी लोगों के पैरों में रूलती रही. एक दिन एक व्यक्ति ने उसे उठाकर पास के एक तालाब में फ़ेंक दिया.

संयोगवश उसी समय एक मगरमच्छ सरोवर में मुँह फाड़े बैठा था. पोटली उसके मुँह में गिरी तो वह उसे निगल गया. कुछ दिनों बाद मछेरों ने तालाब में जाल डाला तो मगरमच्छ उस जाल में फंस गया. मछेरों ने जब उस मगरमच्छ का पेट चीरा तो वह पंसेरी बाहर निकल आई. मछेरों ने सेठ के नाम की छाप देखकर वह पंसेरी लाकर सेठ को सौंप दी.

महीनों बाद अपनी सोने की पंसेरी पाकर सेठ बहुत खुश हुआ. अब तो उसका यह विश्वास और भी दृढ हो गया कि न्याय का धन कहीं जाता नहीं है तथा अन्याय से कमाया हुआ धन कभी फलता नहीं है. पुत्रवधू की सीख ने सेठ की जीवन दिशा ही बदल दी. उसने अन्याय और बईमानी से तौबा कर ली और ईमानदारी से धन कमाने लगा.

Read this story in Roman Hindi:

Judicious Wealth Hindi Short Story

Bahut pahale Yunan mein Helak naam ka ek dhanee vyakti rahata tha. Usake putra ka naam tha Chelaak aur putravadhoo ka naam Hely tha. Putravadhoo jitanee dharmaparaayan aur paap se darane vaalee thee, seth utana hee laalachi aur kroor pravrti ka tha.

Dukaan par aane vaale kushal se kushal manushy ko bhee thag lena usake liye sahaj tha. Isiliye log use vanchak seth ke naam se pukaarane lage the. Uski aamadani bhee achchhee thee, kintu usaka kamaaya dhan kabhee nasht ho jaata. kabhee choree ho jaata. kabhee any tareekon se samaapt ho jaata, par phalata nahin tha. Bahu bahut toka karatee ki anyaay ke paise se barakat nahin hotee. aap baimani mat kiya kariye. aakhir mein khaana rotee aur pahanana kapada hee hai, tab phir itanee dhokhaadhadee kyon? par seth kab maanane vaala tha.

Ek din bahu kee kahi baat kee pariksha karane ke liye nyaay se dhan kamaakar usase sone kee ek panseree banavaee. Apni chhaap lagaakar use kapade mein baandha aur ek chauraahe par rakh aaya. kuchh din tak vah panseree yon hee chauraahe par padee logon ke pairon mein roolatee rahee. Ek din ek vyakti ne use uthaakar paas ke ek talaab mein fenk diya.

Sanyogavash usee samay ek magaramachchh sarovar mein munh phaade baitha tha. Potli usake munh mein giree to vah use nigal gaya. kuchh dinon baad machheron ne taalaab mein jaal daala to magaramachchh us jaal mein phans gaya. machheron ne jab us magaramachchh ka pet cheera to vah panseri bahar nikal aayi. Machheron ne seth ke naam kee chhap dekhakar vah panseri laakar seth ko saump dee.

Mahinon baad apanee sone kee panseree paakar seth bahut khush hua. ab to usaka yah vishvaas aur bhee drdh ho gaya ki nyaay ka dhan kaheen jaata nahin hai tatha anyaay se kamaaya hua dhan kabhee phalata nahin hai. putravadhoo kee seekh ne seth kee jeevan disha hee badal dee. usane anyaay aur baimani se tauba kar lee aur Imandari se dhan kamane laga.

 

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गोनू झा और चोरों की मजदूरी हिंदी लोक कथा/ Gonu Jha aur Choron ki Majduri Hindi folklore

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गोनू झा और चोरों की मजदूरी हिंदी लोक कथा/ Gonu Jha aur Choron ki Majduri

एक बार की बात है. एक राजा ने दरबार में किसी विषय पर भारी शास्त्रार्थ आयोजित किया. राजा ने जीतनेवाले को सौ बीघा जमीन इनाम में देने का एलान किया था. हर गाँव से शास्त्रार्थ के लिए विद्वान लोग राजा के दरवार में पहुँच रहे थे.

Gonu Jha Cat Mithilanchal Hindi Story

Gonu Jha aur Choron ki Majduri Hindi Folklore

गोनू झा के गाँववालों ने उनसे शास्त्रार्थ के लिए जाने का आग्रह किया. गोनू झा ने कहा, ”यह राजा शास्त्रार्थ को तीतर-बटेर की लड़ाई समझता है. मैं ऐसे शास्त्रार्थ में नहीं जाउँगा.”

पर, गाँव वाले कहाँ मानने वाले थे! उनके गाँव की प्रतिष्ठा का प्रश्न था. सबने गोनू झा को काफी मान –मनोबल के बाद शास्त्रार्थ के लिए तैयार कर लिया. उन्होंने गोनू झा को लोभ दिया, ”आप इस बार शास्त्रार्थ में जीत गये, तो बस समझिए कि आपकी गरीबी हमेशा के लिए समाप्त हो गयी. सौ बीघे की जोत तो इस पूरे इलाके में किसी के पास नहीं है.”

गोनू झा ने उस शास्त्रार्थ में सबको पराजित कर दिया. अब राजा को अपने वचन के अनुसार सौ बीघा जमीन गोनू झा को देनी थी. राजा के कुछ दरबारियों ने उसके कान भर दिये. राजा ने दरबारियों के षडयंत्र में पड़कर वर्षों से बंजर पड़ी जमीन में से सौ बीघा जमीन गोनू झा को दे दी. गोनू झा और उनके गाँववालों ने जब जमीन देखी, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ. उस बंजर जमीन को कोई मजदूर भी हाथ नहीं लगाता. जमीन इतनी ऊसर थी कि कहीं घास भी नजर नहीं आ रही थी. पर गोनू झा ने गाँववालों को समझाते हुए कहा, “आप चिंता मत करिए, एक-दो-दिन में ही मैं इसका कोई अच्छा उपाय कर लूँगा. बस आप लोग गाँव में यही कहिएगा कि गोनू झा भारी शास्त्रार्थ जीत कर आये हैं.” सबने गोनू झा के कहे अनुसार ही किया.

बात जंगल के आग की तरह चोरों के टोली तक पहुँच गई. गोनू झा स्वयं भी दिन भर घूम-घूम कर अपनी विजय की कथा और राजा द्वारा किये गये मान – सम्मान की बात फैलाते रहे. रात हुई, तो गोनू झा घर पहुंचे. उनके बिछाये जाल के अनुसार ही सब कुछ होने लगा. उन्हें बाडी में कुछ हलचल लगी. वे समझ गये कि चोर आ गये हैं. तभी पत्नी ने पूछा, “चार दिन कहाँ से बेगारी कर लौटे हैं?”
“पहले लोटा दीजिए, खाना लगाइए, फिर बताता हूँ.”

“खाना कहाँ से बनाकर रखती. तेल-मसाला तो खत्म हो गया है, कहिए तो चूड़ा- दही दे दूँ.”

“कोई बात नहीं, आज भर चूड़ा – दही ही दे दो. कल से तो पूआ-पूरी, और पकवान ही खाएँगे.”

“क्यों कोई खजाना हाथ लग गया है ?” गोनू झा की पत्नी ने झल्लाते हुए पूछा.

”धीरे बोलिए, धीरे. एक खजाना नहीं सैकड़ों खजाना. राजा ने कई पुस्तों का खजाना खुश होकर मुझे दे दिया है.”

“क्या कह रहे हैं, खुलकर समझाइए.”- गोनू झा की पत्नी ने पूछा. अब तक तो चोरों के कान खुलकर सूप जैसे हो गये थे. वे गोनू झा के घर की दीवार से कान सटाए, साँस रोककर खजाने का राज सुनना चाह रहे थे.

गोनू झा भी दीवार की तरफ पत्नी को ले जाते हुए फुसफुसाते हुए बोले, “आप तो जानती ही हैं हर बार मैं शास्त्रार्थ जीतकर आता हूँ, तो राजा- महाराजा सोना-चाँदी, अशर्फी देकर भेजते हैं और उसके बाद चोर सेंध मारने के लिए ताक लगाये रहते हैं. हमने इस बार राजा से कहा कि हमें घर ले जाने के लिए कुछ भी मत दीजिए. आप लोगों की दी हुई चीजें हमारी रात की नींद ले उडती हैं.”

“तो फिर कुछ दिया भी उन्होंने या आप बस ज्ञान ले-देकर आ गए?”- गोनू झा की पत्नी की चिंता जायज ही थी. चोरों की जिज्ञासा भी उनकी पत्नी के साथ बढ़ रही थी.

“सुनिए, राजा के पूर्वज हजारों सालों से अपने खजाने एक सुरक्षित राजकीय भूमि के अंदर छिपाते आये हैं. अब तक वह खजाना सौ बीघे में दबाया जा चुका है. चूँकि जमीन बंजर है, इसलिए भूल से भी कोई भैंस भी चराने उधर नहीं जाता. राजा ने वह सौ बीघे की पूरी जमीन मुझे दे दी. हमें जब भी जरूरत पड़ेगी एक तोला सोना खजाना खोदकर ले आएँगे. अब समझिए हमारी आनेवाली सौ पुस्त बैठकर आराम से जिन्दगी बसर कर सकती है.”

“पर, वह है कहाँ”- गोनू झा की पत्नी ने पूछा.

“वह आपको बताऊंगा. आप बहुत खर्चीली हैं और कोई बात आपके पेट में पचती भी नहीं.”- गोनू झा ने कहा.

“वह तो ठीक है, पर भगवान न करे, आपको कुछ हो गया, तो सौ पुस्त के लिए धन रहते हुए भी हम सब भूखे मर जाएँ.” – पत्नी की इस बात पर कुढ़ते हुए भी गोनू झा ने फुसफुसाते हुए वह जगह बता दी, जहाँ राजा ने गोनू झा को जमीन दी थी.

“आप सुबह ही जाकर एक तौला खजाना तो ले ही आइए “- पत्नी ने गोनू झा से कहा.

“ठीक है, पर अब मुझे कुछ खाने के लिए दो. मैं थका हुआ हूँ. सुबह सूर्य उगने से पहले ही मैं जाकर एक तौला खजाना ले आऊंगा.”- गोनू झा की बात पूरी हुई कि सारे चोर उडन – छू हो गए. वे एक-दो तौला, नहीं सारा दवा खजाना निकाल लेना चाहते थे. उन्होंने चोरों की टोली से एक-एक चोर को बुला लिया और सब कुदाल- खंती लेकर उस बंजर खेत में कूद पड़े. पूरी ताकत लगाकर और बिजली की फुर्ती से वे खेत कोड़ने लगे.

चोरों ने सूर्य उगने से पहले ही सारा खेत कोड डाला, पर खजाना तो दूर, एक कौड़ी भी नहीं मिली. इससे पहले कि वे गोनू झा की होशियारी और अपनी बेवकूफी पर खीजते, गोनू झा खखसते हुए आते दिखाई पड़े. उनको देखते ही सारे चोर नौ दो ग्यारह हो गए. गोनू झा उन्हें आवाज देते हुए बोले, “अरे भाई रात-भर इतनी मेहनत की है, मजदूरी तो लेते जाओ. कम-से-कम जलपान ही करते जाओ.”

गोनू झा अपने साथ आठ – दस मजदूर और बीज लेकर आये थे. उन्होंने बीज डाला. उस साल और उसके बाद हर साल गोनू झा के खेत में इतनी फसल हुई कि सचमुच उनकी सारी दरिद्रता मिट गयी. गाँव वाले एक बार फिर गोनू झा की बुद्धिमत्ता के कायल हो गये.

 

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Albert Einstein Two Motivational Stories

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Albert Einstein Two Motivational Stories 

Albert Einstein Two Motivational Stories/ बात उन दिनों की है, जब आइंस्टीन जर्मनी छोड़ चुके थे. दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से उनको निमंत्रण मिला. मगर उन्होंने चूना प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी को, उसके बौद्धिक और शांत वातावरण के कारण.

Albert Einstein Two Motivational Stories

Albert Einstein Two Motivational Stories

जब वे पहली बार Princeton पहुंचे, तो वहां के administrative officer ने पूछा – “ मैं आपके लिये कौन –कौन से instruments की व्यवस्था कर दूँ.”

आइंस्टीन ने बड़ी ही सहजता से कहा – “मुझे केवल एक ब्लैकबोर्ड, कुछ चाक. कुछ पेपर और कुछ पेंसिलें चाहिए.”

अधिकारी उनके instruments की लिस्ट देखकर आश्चर्य में पड़ गया. वह कुछ कहता कि तभी आइंस्टीन ने फरमाइश की – “ इन चीजों के अलावा मुझे एक बड़ी सी टोकरी भी चाहिए.”

“क्यों?”

“क्योंकि अपनी गणनाओं के दरम्यान मैं जगह जगह गलतियाँ करूँगा और छोटी टोकरियों रद्दी से जल्दी ही भर जायेगी.” आइंस्टीन ने हँसते हुए जबाब दिया.

सचमुच अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे असाधारण प्रतिभा के धनी व्यक्ति का जीवन किसी बाह्य आकर्षण से कोसों दूर था.

वह लोकैषना से परे थे/Albert Einstein Two Motivational Stories

सन 1952 में इसराइल के प्रथम राष्ट्रपति कैम बीजमान का निधन हो गया. तब अल्बर्ट आइंस्टीन को इसराइल के राष्ट्रपति पद को सम्हालने की प्रार्थना की गयी.

आइंस्टीन ने विनम्रतापूर्वक उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया और इसराइली राष्ट्रपति अब्बा रब्बान से स्पष्ट शब्दों में कहा – “मुझे प्रकृति के बारे में थोडा बहुत ज्ञान है, पर मनुष्य के बारे में लगभग कुछ भी मालूम नहीं. हमारे राष्ट्र इसराइल के इस निमंत्रण ने मेरे हृदय के अंतरतम को छू लिया है. मुझे एक ही साथ उदास और लज्जित कर दिया है क्योंकि मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता.”

आइंस्टीन ने अपने पत्र में आगे लिखा – “ जीवन भर मेरा पाला भौतिक पदार्थों से रहा है. मुझमे मानवों से समुचित व्यवहार करने और सरकारी कामों को निभाने की न स्वाभाविक क्षमता है और न ही अनुभव. अगर बढ़ती उम्र मेरी शक्ति को सोखने न लगी होती तो भी सिर्फ ये कारण ही मुझे उस उच्च पद के लिये अनुपयुक्त ठहराने के लिये काफी हैं.”

यदि इस घटना को आज के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो लोग इतने पदलोलुप हो गए हैं कि उन्हें कभी भी अपनी योग्यता और अयोग्यता की परवाह नहीं होती. वे पद पाने के लिये कोई भी उचित अनुचित कार्य करने से नहीं घबराते.

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हवेली नहीं हॉस्पिटल बनाओ Moral hindi Story

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हवेली नहीं हॉस्पिटल बनाओ Moral hindi Story

सेठ गुणीचंद के पास अथाह संपत्ति थी. उनके कई कल कारखाने थे. नौकरों-चाकरों की कोई कमी नहीं थी. यूँ तो उनकी हवेली किसी महल से कम नहीं था, लेकिन पता नहीं सेठ को क्या सुझा. उन्होंने अपने उसी महलनुमा हवेली के पास ही एक और भव्य हवेली का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया. उसमे दिन रात मजदुर लगे रहते. उसे बनाने के लिये नामी वास्तुकारों की सलाह ली गयी. उसमें बहुमूल्य पत्थर और इमारती लकड़ी लगाईं गयी. उस हवेली में कुल मिलाकर सौ कमरे थे.

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Moral Story

जिस दिन उस भव्य हवेली में प्रवेश के लिये पूजा किया जा रहा था तो उस समय आस पास के बड़े बड़े सेठों को बुलाया गया था. सेठ ने आगंतुकों से अपने इस नवनिर्मित हवेली के बारे में पूछा- कि सच सच बतलाना आपको मेरी यह नयी हवेली कैसी लगी?

सभी लोगों ने सेठ से कहा – अत्यंत सुन्दर! कारीगरों ने इसे बनाने में कमाल कर दिया है. सारी सुविधाएं हैं इस हवेली में. सेठ प्रशंसा सुनकर बहुत खुश हुआ. उसने सभी मेहमानों को अच्छे अच्छे पकवान और सुस्वादु भोजन कराया. सबको उपहार देकर विदा किया.

एक दिन उस नगर में एक परम विरक्त और पहुंचे हुए संत बाबा शांतानंद का आगमन हुआ. सेठ अपनी पत्नी के साथ उनसे मिलने गए और उनका खूब आदर सत्कार किया. सतसंग किया और अपनी नयी हवेली में आने का न्योता भी दे दिया.

बाबा शांतानंद अपने शिष्यों के साथ अगले ही दिन उनकी हवेली में गए. सेठ ने अपनी हवेली में संत का बहुत आदर- सत्कार किया. अंत में सेठ ने संत से पूछा – बाबा! आपको मेरी यह हवेली कैसी लगी? संत ने सेठ से पूछा – इस हवेली का उपयोग क्या आपके परिवार के अलावा कोई और भी कर सकेगा? सेठ ने कहा – नहीं ! ऐसा तो नहीं हो पायेगा.

बाबा शांतानंद ने कहा – सेठ जी! आपका पहले वाली हवेली ही बहुत बड़ा और भव्य है. यदि आप इसे दूसरों के उपयोग के लिये बनबाते तो उसका सदुपयोग हो पाता.

संत की बातों से सेठ का विवेक जाग उठा. उन्होंने सौ कमरों वालों उस हवेली को धर्मशाला में परिवर्तित करवा दिया. उसके एक भाग में एक हॉस्पिटल खुलवा दिया. आते- जाते लोगों को रुकने का एक सुन्दर स्थान मिल गया और आस –पास के गाँव के लोग आकर उस हवेली में चल रहे हॉस्पिटल में अपना इलाज करवाते. उन सबको देख सेठ को आत्मिक आनंद मिलता और मन ही मन वह बाबा शांतानंद जी को स्मरण कर प्रफुल्लित हो उठता.

साथियो! आज भी हमारे आस पास बहुत ऐसे लोग हैं जो सेठ गुणीचंद की तरह कई घरों और मकानों के स्वामी हैं,. वर्षों से वह घर बंद पड़ा होता है. उसका कोई उपयोग नहीं होता है. यदि ऐसे लोग सेठ की भांति कुछ लोक कल्याण का कार्य करें तो कितना अच्छा हो. हमें इस moral story से सीख लेने की आवश्यकता है.

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