July 2018 | Hindigk50k

आंवला की खेती Amla Farming

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आंवला की खेती

आंवला की खेती Amla Farming

सामान्य जानकारी: आँवला युफ़ोरबिएसी परिवार का पौधा है। यह भारतीय मूल का एक महत्वपूर्ण फल है। भारत केविभिन्न क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों, जैसे, हिंदी में ‘आँवला’, संस्कृत में ‘धात्री’ या ‘आमलकी’, बंगाली एवं उड़ीया में, ‘अमला’ या ‘आमलकी’, तमिल एवं मलयालम में, ‘नेल्ली’, तेलगु में ‘अमलाकामू, गुरुमुखी में, ‘अमोलफल’, तथा अंग्रेजी में ‘ऐम्बलिक’, ‘माइरोबालान’ या इंडियन गूजबेरी के नाम से जाना जाता है। अपने अद्वितीय औषधीय एवं पोषक गुणों के कारण, भारतीय पौराणिक साहित्य जैसे वेद, स्कन्दपुराण, शिवपुराण, पदमपुराण, रामायण, कादम्बरी, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में इसका वर्णन मिलता है। महर्षि चरक ने इस फल को जीवन दात्री अथवा अमृतफल के समान लाभकारी माना है। अतः इसे अमृत फल तथा कल्प वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। आँवले की विशेषतायें हैं, प्रति इकाई उच्च उत्पादकता (15-20 टन/हेक्टेयर), विभिन्न प्रकार की भूमि (ऊसर, बीहड़, खादर, शुष्क, अर्धशुष्क, कांडी, घाड़) हेतु उपयुक्तता, पोषण एवं औषधीय (विटामिन सी, खनिज, फिनॉल, टैनिन) गुणों से भरपूर तथा विभिन्न रूपों में (खाद्य, प्रसाधन, आयुर्वेदिक) उपयोग के कारण आँवला 21वी सदी का प्रमुख फल हो सकता है। धर्म परायण हिन्दू इसके फलों एवं वृक्ष को अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा इसका पौराणिक महत्व भी है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कार्तिक मास में इसके वृक्ष के नीचे बैठ कर विष्णु की पूजा की जाये तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यदि तुलसी का पौधा नहीं मिले तो भगवान विष्णु की पूजा आँवले के वृक्ष के नीचे बैठ कर की जा सकती है। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि आँवले के वृक्ष के नीचे पिण्ड दान करने से पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार कार्तिक मास में कम से कम एक दिन आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जब इसके फल परिपक्व होते है। हिन्दू धर्म के अनुसार आँवले के फल का लगातार 40 दिनों तक सेवन करते रहने वाले व्यक्ति में नई शारीरिक स्फूर्ति आती है तथा कायाकल्प हो जाता है।

Anwla Ki Kheti Samanya Jankari युफ़ोरबिएसी Pariwar Ka Paudha Hai Yah Bharateey Mool Ek Mahatvapurnn Fal Bhaarat केविभिन्न Area Me Ise Vibhinn Namo Jaise Hindi Sanskrit धात्री Ya आमलकी Bangali Aivam उड़ीया अमला Tamil Malayalam नेल्ली तेलगु अमलाकामू Gurumukhi अमोलफल Tatha Angreji ऐम्बलिक माइरोबालान Indian गूजबेरी Ke Naam Se Jana Jata Apne Advitiya Aushadhiy Poshak Gunnon Karan Paurannik Sahitya Ved स्कन्दपुराण शिवपुराण पदमपुराण Ramayann

 

>>> आँवला क्षेत्र एवं वितरण

आँवला क्षेत्र एवं वितरण
आँवले के प्राकृतिक रूप से उगे वृक्ष भारत, श्रीलंका, क्यूबा, पोर्ट रिको, हवाई, फ्लोरिडा, ईरान, इराक, जावा, ट्रिनिडाड, पाकिस्तान, मलाया, चीन, और पनामा में पाये जाते हैं। परन्तु इसकी खेती भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश प्रांत में ज्यादा प्रचलित है। आज कल आँवले का सघन वृक्षारोपण उत्तर प्रदेश के लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं वाले बीहड़ एवं खादर वाले जिलों, जैसे आगरा, मथुरा, इटावा एवं फतेहपुर एवं बुन्देलखण्ड के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसके अलावा आँवले के क्षेत्र अन्य प्रदेशों जैसे, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में, हरियाणा के अरावली क्षेत्रों में, पंजाब, उत्तरांचल एवं हिमाचल में तेजी से बढ़ रहे हैं। एक नये आंकड़े के अनुसार भारतवर्ष में आँवले का क्षेत्रफल लगभग 50,000 हेक्टेयर तथा कुल उत्पादन लगभग 1.5 लाख टन आँका गया है। झारखंड राज्य के शुष्क एवं अर्धशुष्क जिलों जैसे – लातेहार, डाल्टनगंज, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, देवधर आदि में आँवला उत्पादन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

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>>> आँवले का उपयोग

आँवले का उपयोग
आँवले के पौधों के प्रत्येक भाग का आर्थिक महत्व है। इसके फलों में विटामिन ‘सी’ की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अतिरिक्त इसके फल लवण, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, कैल्शियम, लोहा, रेशा एवं अन्य विटामिनों के भी धनी होते हैं। इसमें पानी 81.2%, प्रोटीन 0.50%, वसा 0.10%, रेशा 3.40%, कार्बोहाइड्रेट 14.00%, कैल्शियम 0.05%, फोस्फोरस 0.02%, लोहा 1.20 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘सी’ 400-1300 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘बी’ 30.00 (माइक्रो ग्रा./100 ग्रा.) पाये जाते है। भारत में औषधीय गुणों से युक्त फलों में आँवले का अत्यंत महत्व है। शायद यह फल ही एक ऐसा फल है जो आयुर्वेदिक औषधि के रूप में पूर्ण स्वास्थ्य के लिए प्रयुक्त होता है। हिन्दू शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि तुलसी एवं आँवले के फलों से सिक्त जल से स्नान करना गंगा जल से स्नान करने के तुल्य है।
इसका फल तीक्ष्ण शीतलता दायक एवं मूत्रक और मृदुरेचक होता है। एक चम्मच आँवले के रस को यदि शहद के साथ मिला कर सेवन किया जाय तो इससे कई प्रकार के विकार जैसे क्षय रोग, दमा, खून का बहना, स्कर्वी, मधुमेह, खून की कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, कैंसर अवसाद एवं अन्य मस्तिष्क विकार एन्फ़्जलुएन्जा, ठंडक, समय से पहले बुढ़ापा एवं बालों का झड़ना एवं सफेद होने से बचा जा सकता है। प्राय: ऐसा देखा गया है कि यदि एक चम्मच ताजे आँवले का रस, एक कप करेले के रस में मिश्रित करके दो महीने तक प्राय: काल सेवन किया जाय तो प्राकृतिक इन्सुलिन का श्राव बढ़ जाता है। इस प्रकार यह मधुमेह रोग में रक्त मधु को नियंत्रित करके शरीर को स्वस्थ करता है। साथ ही रक्त की कमी, सामान्य दुर्बलता तथा अन्य कई परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। इसका प्रतिदिन प्रात: सेवन करने से कुछ ही दिनों में शरीर में नई स्फूर्ति आती है। यदि ताजे फल प्राप्त न हों तो इसके सूखे चूर्ण को शहद के साथ मिश्रित करके सेवन किया जा सकता है। त्रिफला, च्यवनप्राश, अमृतकलश ख्याति प्राप्त स्वदेशी आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं, जो मुख्यत: आँवले के फलों से बनायी जाती हैं। आँवला के इन्हीं गुणों के कारण इसे ‘रसायन’ एवं ‘मेखा रसायन’ (बुद्धि का विकास करने वाला) की श्रेणी में रखा गया है। आँवले के फलों का प्रयोग लिखने की स्याही एवं बाल रंगने के द्रव्य में भी किया जाता है। इसकी पत्तियों को पानी में उबालने के पश्चात उस पानी से कुल्ला करने पर मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं। ऐसा इसकी पत्तियों में विद्यमान टैनिन एवं फिनोल की अधिकता के कारण होता है। यही नहीं, आँवले के फल को यदि खाया जाय तो वह मृदुरेंचक (पेट साफ़) का कार्य करता है एवं इसकी जड़ का सेवन पीलिया रोग को दूर करने में सहायक होता है। हिन्दू पौराणिक साहित्य में आँवले एवं तुलसी की लकड़ी की माला पहनना काफी शुभ माना गया है। इस प्रकार आँवला की लकड़ी भी उपयोगी है।

Anwle Ka Upyog Ke Paudhon Pratyek Bhag Aarthik Mahatva Hai Iske Falon Me Vitamin Si Ki Atyadhik Matra Payi Jati Atirikt Fal Lawan Carbohydrate Phoshphorus Calcium Loha Resha Aivam Anya विटामिनों Bhi Dhani Hote Hain Isme Pani 81 20th Protein 0 50th Vasa 100th 3 40th 14 000 050 फोस्फोरस 02 1 20 Mili ग्रा 100 400 1300 B 30 00 Micro Paye Jate Bhaarat Aushadhiy Gunnon Se Yukt Atyant Shayad Yah Hee Ek Aisa Jo ayurvedic Ausha

>>> आँवले की खेती के लिए जलवायु

आँवले की खेती के लिए जलवायु
आँवला एक शुष्क उपोष्ण (जहाँ जाड़ा एवं गर्मी स्पष्ट रूप से पड़ती है) क्षेत्र का पौधा है परन्तु इसकी खेती उष्ण जलवायु में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। भारत में इसकी खेती समुद्र तटीय क्षेत्रों से 1800 मीटर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। जाड़े में आँवले के नये बगीचों में पाले का हानिकारक प्रभाव पड़ता है परन्तु एक पूर्ण विकसित आँवले का वृक्ष 0-460 सेंटीग्रेट तापमान तक सहन करने की क्षमता रखता है। गर्म वातावरण, पुष्प कलिकाओं के निकलने हेतु सहायक होता है जबकि जुलाई-अगस्त माह में अधिक आर्द्रता का वातावरण सुसुप्त छोटे फलों की वृद्धि हेतु सहायक होता है। वर्षा ऋतु में शुष्क काल में छोटे फल अधिकता में गिरते हैं तथा नए छोटे फलों के निकलने में देरी होती है।

Anwle Ki Kheti Ke Liye Jalwayu Anwla Ek Shushk Uposhnn Jahan जाड़ा Aivam Garmi Spashta Roop Se Padti Hai Shetra Ka Paudha Parantu Iski Ushnn Me Bhi SafalTapoorvak Jaa Sakti Bhaarat Samudra Tatiya Area 1800 Meter Unchai Wale Jade Naye Bagichon Pale HaniKaarak Prabhav Padta Poorn Viksit Vriksh 0 460 सेंटीग्रेट Tapaman Tak Sahan Karne Shamta Rakhta Garm Watavaran Pushp कलिकाओं Nikalne Hetu Sahayak Hota Jabki July August Month Adh

 

>>> आँवले की खेती के लिए भूमि

आँवले की खेती के लिए भूमि
आँवला एक सहिष्णु फल है और बलुई भूमि से लेकर चिकनी मिट्टी तक में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। गहरी उर्वर बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती हेतु सर्वोत्तम पायी जाती है। बंजर, कम अम्लीय एवं ऊसर भूमि (पी.एच. मान 6.5-9.5, विनियम शील सोडियम 30-35 प्रतिशत एवं विद्युत् चालकता 9.0 म्होज प्रति सें.मी. तक) में भी इसकी खेती सम्भव है। भारी मृदायें तथा ऐसी मृदायें जिनमें पानी का स्तर काफी ऊँचा हो, इसकी खेती हेतु अनुपयुक्त पायी गई हैं।

 

>>> आँवले की किस्में

पूर्व में आँवला की तीन प्रमुख किस्में यथा बनारसी, फ्रांसिस (हाथी झूल) एवं चकैइया हुआ करती थी। इन किस्मों की अपनी खूबियाँ एवं कमियाँ रही हैं। बनारसी किस्म में फलों का गिरना एवं फलों का कम भंडारण क्षमता, फ्रान्सिस किस्म में यद्यपि बड़े आकार के फल लगते हैं परन्तु उत्तक क्षय रोग अधिक होता है। चकैइया के फलों में अधिक रेशा एवं एकान्तर फलन की समस्या के कारण इन किस्मों के रोपण को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। पारम्परिक किस्मों की इन सब समस्याओं के निदान हेतु नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद ने कुछ नयी किस्मों का चयन किया है जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न है:

आँवला की किस्म कंचन (एन ए-4)

आँवला की किस्म कंचन (एन ए-4)
यह चकइया किस्म से चयनित किस्म है। इस किस्म में मादा फूलों की संख्या अधिक (4-7 मादा फूल प्रति शाखा) होने के कारण यह अधिक फलत नियमित रूप से देती है। फल मध्यम आकार के गोल एवं हल्के पीले रंग के व अधिक गुदायुक्त होते है। रेशेयुक्त होने के कारण यह किस्म गूदा निकालने हेतु एवं अन्य परिरक्षित पदार्थ बनने हेतु औद्योगिक इकाईयों द्वारा पसंद की जाती है। यह मध्यम समय में परिपक्व होने वाले किस्म हैं (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात के शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगायी जा रही है।

आँवला की किस्म कृष्णा (एन.ए.-5)

आँवला की किस्म कृष्णा (एन.ए.-5)
यह बनारसी किस्म से चयनित एक अगेती किस्म है जो अक्टूबर से मध्य नवम्बर में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के फल बड़े ऊपर से तिकोने, फल की सतह चिकनी, सफेद हरी पीली तथा लाल धब्बेदार होती है। फल का गूदा गुलाबी हरे रंग का, कम रेशायुक्त तथा अत्यधिक कसैला होता है। फल मध्यम भंडारण क्षमता वाले होते हैं। अपेक्षाकृत अधिक मादा फूल आने के कारण, इस किस्म की उत्पादन क्षमता बनारसी किस्म की अपेक्षा अधिक होती है। यह किस्म मुरब्बा, कैन्डी एवं जूस बनाने हेतु अत्यंत उपयुक्त पायी गयी है।

नरेन्द्र आँवला-6

नरेन्द्र आँवला-6
यह चकैइया किस्म से चयनित किस्म है जो मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) में पक कर तैयार हो जाती है। पेड़ फैलाव लिए अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। (फलों का आकार मध्यम से बड़ा गोल, सतह चिकनी, हरी पीली, चमकदार, आकर्षक) गूदा रेशाहीन एवं मुलायम होता है। यह किस्म मुरब्बा, जैम एवं कैन्डी बनाने हेतु उपयुक्त पायी जाती है।

नरेन्द्र आँवला-7

नरेन्द्र आँवला-7
यह फ्रांसिस (हाथी झूल) किस्म के बीजू पौधों से चयनित किस्म है। यह शीघ्र फलने वाली, नियमित एवं अत्यधिक फलन देने वाली किस्म है। इस किस्म में प्रति शाखा में औसत मादा फूलों की संख्या 9.7 तक पायी जाती है। यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तक पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म उत्तक क्षय रोग से मुक्त है। फल मध्यम से बड़े आकार, के ऊपर तिकोने, चिकनी सतह तथा हल्के पीले रंग वाले होते हैं। गूदे में रेशे की मात्रा एन ए-6 किस्म से थोड़ी अधिक होती है। इस किस्म की प्रमुख समस्या अधिक फलत के कारण इसकी शाखाओं को टूटना है। अतः फल वृद्धि के समय शाखाओं में सहारा देना उचित होता है यह किस्म च्यवनप्राश, चटनी, अचार, जैम एवं स्क्वैश बनाने हेतु अच्छी पायी गयी है। इस किस्म को राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल तथा तमिलनाडु के क्षेत्रों में अच्छी तरह अपनाया गया है।

नरेन्द्र आँवला-10

नरेन्द्र आँवला-10
यह किस्म बनारसी किस्म के बीजू पौधों से चयनित अधिक फलन देने वाली किस्म है। फल देखने में आकर्षक, मध्यम से बड़े आकार वाले, चपटे गोल होते हैं। सतह कम चिकनी, हल्के पीले रंग वाली गुलाबी रंग लिए होती है। फलों का गूदा सफेद हरा, रेशे की मात्रा अधिक एवं फिनाल की मात्रा कम होती है। अधिक उत्पादन क्षमता, शीघ्र पकने के कारण एवं सुखाने एवं अचार बनाने हेतु उपयुक्तता के कारण यह व्यवसायिक खेती हेतु उपयुक्त किस्म हैं, परन्तु इस किस्म में एकान्तर फलन की समस्या पायी जाती है।
इन सब किस्मों के अलावा लक्ष्मी-52, किसान चकला, हार्प-5, भवनी सागर आनंद-1, आनंद-2, एवं आनंद-3 किस्में विभिन्न शोध संस्थाओं से विकसित की गयी हैं परन्तु इनकी श्रेष्ठता देश के अन्य भागों में अभी सिद्ध नहीं हो पाई है।

 

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ऐसे करें जीरे की उन्नत खेती How to Do Cumin Farming

ऐसे करें जीरे की उन्नत खेती How to Do Cumin Farming  Hello readers,  Agriculture Gk in hindi If you are doing preparation for HSSC, SSC Exams, come to us regularly. Agriculture Gk in hindi for HSSC exams like SSC CGL, SSC CHSL haryana police, gram sachiv, clerk, canal patwari, HPSC. haryana general knowledge and current affairs .  haryana Samanyagyan । Aise Karein Jeere Ki Unnat Kheti 

जलवायु

जलवायु
जीरे की फसल को शुष्क एवं साधारण ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। बीज पकने के समय शुष्क एवं साधारण गर्म मौसम जीरे की फसल के लिए अच्छा रहता है। अधिक वायुमण्डलीय नमी, रोग व कीड़ों को पनपाने में सहायक होती है तथा जीरे की फसल पाला सहन करने में असमर्थ होती है।

उपयुक्त किस्में- आर.जेड. – 19, आर.जेड. – 209, आर.जैड. – 223, गुजरात जीरा -4 (जी.सी-4)

उपयुक्त किस्में- आर.जेड. – 19, आर.जेड. – 209, आर.जैड. – 223, गुजरात जीरा -4 (जी.सी-4)

भूमि तथा भूमि की तैयारी

भूमि तथा भूमि की तैयारी
जीवांश युक्त दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बुवाई से पूर्व यह आवश्यक है कि खेत की तैयारी ठीक तरह की जाये इसके लिये खेत को अच्छी तरह से जोत कर उसकी मिट्टी को भुरभुरी बना लिया जाए।

खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरक
जीरे की अच्छी पैदावार लेने के लिये 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिये। एक औसत उर्वर भूमि में 30 किलो नत्रजन एवं 20 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से दें।

फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देना चाहिये एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद एवं शेष 15 किलो नत्रजन बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई के साथ दे। बुवाई के समय 20 किलो प्रति हैक्टेयर गंधक खेत में डालें।

बीजदर व बीजोपचार

बीजदर व बीजोपचार
जीरे का 12 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। बीज जनित रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व जीरे के बीज को 2 ग्राम कार्बेण्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए।

बुवाई का समय व तरीका

बुवाई का समय व तरीका
जीरे की बुवाई मध्य नवम्बर के आसपास कर देनी चाहिये। बुवाई आमतौर पर छिटकवां विधि से की जाती है। तैयार खेत में पहले क्यारियां बनाते है। उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे की दंताली इस प्रकार फीरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी की एक हल्की सी परत चढ़ जाये। कतारों में बुवाई के लिए क्यारियों में 25-30 सेन्टीमीटर की दूरी पर लोहे या लकड़ी के बने हुक से लाईने बना देते हैं। बीजों को इन्हीं लाईनों में डालकर दंताली चला दी जाती है।

सिंचाई

सिंचाई
पहली हल्की सिंचाई बुवाई के तुरन्त बाद की जाती है। इस सिंचाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारियों में पानी का बहाव अधिक तेज न हो। दूसरी सिंचाई बुवाई के एक सप्ताह पूरा होने पर जब बीज फूलने लगे तब करें। इसके बाद मृदा की संरचना तथा मौसम के अनुसार 15-25 दिन के अन्तराल पर 5 सिंचाईयां पर्याप्त होगी। फव्वारा विधि द्वारा बुवाई समेत पांच सिंचाईयां बुवाई के समय, दस, बीस, पचपन एवं अस्सी दिनों की अवस्था पर करें। फव्वारा तीन घण्टे ही चलायें।

निराई-गुड़ाई

निराई-गुड़ाई
प्रथम निराई-गुड़ाई बुवाई के 30-35 दिन बाद व दूसरी 55-60 दिन बाद करनी चाहिये।

कटाई

कटाई
जीरे की फसल 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। फसल को दांतली से काटकर अच्छी तरह सूखा लेवें।

भण्डारण

भण्डारण
भण्डारण करते समय दानों में नमी की मात्रा 8-9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। संग्रहित जीरे को समय-समय पर धूप में रखें।

लहसुन की खेती से होगी लाखों की इनकम, ऐसे करें तैयारी Garlic Farming

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लहसुन की विभिन्न किस्में

लहसुन की विभिन्न किस्में

इन दिनों लहसुन की जी-1 और जी-17 प्रजाति प्रमुख हैं। जी-17 का प्रयोग ज्यादातर हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान कर रहे हैं। यह दोनों प्रजातियां ही 160 से 180 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इसके बाद अप्रैल-मई महीने में इसकी खुदाई होती है। एक हेक्टेयर में लगभग 8 से 9 टन पैदावार आसानी से हो जाती है।इसके इलावा प्रमुख किस्मे निचे दी हुई है

टाइप 56-4:लहसुन की इस किस्म का विकास पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इसमें लहसुन की गांठे छोटी होती हैं और सफेद होती हैं। प्रत्येक गांठ में 25 से 34 पुत्तियां होती हैं। इस किस्म से किसान को प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन तक उपज मिलती है।

आईसी 49381:इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से किया गया है। इस किस्म से लहसुन की फसल 160 से 180 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से किसानों को अधिक उपज मिलती है।

सोलन:लहसुन की इस किस्म का विकास हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इस किस्म में पौधों की पत्तियां काफी चौड़ी व लंबी होती हैं और रंग गहरा होता है। इसमें प्रत्येक गांठ में चार ही पुत्तियां होती हैं और काफी मोटी होती हैं। अन्य किस्मों की तुलना में यह अधिक उपज देने वाली किस्म है।

एग्री फाउंड व्हाईट (41 जी) :लहसुन की इस किस्म में भी फसल 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से लहसुन की उपज 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि प्रदेशों के लिए अखिल भारतीय समन्वित सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है।

यमुना (-1 जी) सफेद: लहसुन की यह किस्म संपूर्ण भारत में उगाने के लिए अखिल भारतीय सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है। इस किस्म में फसल से 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 175 क्विंटल होती है।

यमुना सफेद 2 (जी 50) : यह किस्म मध्य प्रदेश के लिए उत्तम पाई जाती है। इस किस्म में 160 से 170 दिन फसल तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 155 क्विंटल तक होती है। यह किस्म बैंगनी धब्बा और झुलसा रोग के प्रति सहनशील होती है।

जी 282:इस किस्म में शल्क कंद सफेद और बड़े आकार के होते हैं। इसके साथ ही 140 से 150 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। इस किस्म में किसान को 175 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है।

आईसी 42891:लहसुन की इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली की ओर से किया गया है। यह किस्म किसानों को अधिक उपज देती है और फसल 160-180 दिन में तैयार हो जाती है।

मिट्टी और जलवायु

मिट्टी और जलवायु

जैसा कि आपको पहले बताया जा चुका है कि लहसुन की खेती के लिए मध्यम ठंडी जलवायु उपयुक्त होती है। इसके साथ ही दोमट मिट्टी, जिसमें जैविक पदार्थों की मात्रा अधिक हो, लहसुन की खेती के लिए सबसे अच्छी है।

खेती की तैयारी

खेती की तैयारी

खेत में दो या तीन गहरी जुताई करें। इसके बाद खेत को समतल कर क्यारियां और सिंचाई की नालियां बना लें। बता दें कि लहसुन की अधिक उपज के लिए डेढ़ से दो क्विंटल स्वस्थ कलियां प्रति एकड़ लगती हैं।

ऐसे करें बुवाई और सिंचाई

ऐसे करें बुवाई और सिंचाई

अधिक उपज के लिए किसानों को बुवाई के लिए डबलिंग विधि का उपयोग करना चाहिए। क्यारी में कतारों की दूरी 15 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए। वहीं, दो पौधों के बीच की दूरी 7.5 सेंटीमीटर होनी चाहिए। वहीं किसानों को बोने की गहराई 5 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए। जबकि सिंचाई के लिए लहसुन की गांठों के अच्छे विकास के लिए 10 से 15 दिनों का अंतर होना चाहिए।

कितना आता है खर्च

कितना आता है खर्च

एक हेक्टेयर में लगता है 12 हजार रुपए का बीज लहसुन की खेती के लिए नवंबर महीना मुफीद रहता है। इसकी खेती भारत के लगभग हर हिस्से में की जाती है।लेकिन, इसके लिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश का मौसम बहुत ही उपयुक्त माना जाता है। एक एकड़ खेती में लगभग 5 हजार रुपए का बीज (लहसुन की गांठ) लगता है।

जबकि, एक हेक्टेयर को अगर मॉडल मानकर चलें तो 12 हजार से 13 हजार रुपए का बीज पर्याप्त होता है। छह महीने में खाद, पानी, मजदूरी आदि कुल सब मिलाकर 50 से 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है।

Lahsun Ki Kheti Se Hogi Lacs Income Aise Karein Taiyari Ko Agar Buisness Mankar Kiya Jaye To Yah AdhikTam return Dene Wala Sabit Ho Sakta Hai Yahi Karan In Dino Yuwaon Ka Rujhaan Bhi Or Raha Bus Jarurat Faslon Ke Sahi Chunav Aaj Isi Tarah Ek Fasal Jankari De Rahe Hain Jiski Aapko Mahaj 6 Mahine Me Karaa Sakti Kisano Liye October Mahina Upyukt Mana Jata Is Mausam Kund Nirmann Behtar Hota Iski Domat Bhumi Achhi Rehti Jitn

मिर्च की फसल की जानकारियां Chilly Farming

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मिर्च की फसल की जानकारियां Chilly Farming

जलवायु :

मिर्च की खेती के लिये आर्द्र उष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। फल परिपक्वता अवस्था में शुष्क जलवायु आवश्यक होती है। ग्रीष्म ऋतु में अधिक तापमान से फल व फूल झड़ते हंै. रात्रि तापमान 16-21डिग्री सेल्सियम फल बनने के लिये अत्यधिक उपयुक्त है।

भूमि :

मिर्च की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। परंतु अच्छे जल निकास वाली एवं कार्बनिक बलुई दोमट, लाल दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 6.7 हो मिर्च की खेती के लिये सबसे उपयुक्त है। वो मिट्टी जिसमें जल निकास व्यवस्था नहीं होती, मिर्च के लिये उपयुक्त नहीं है।
बीज, किस्म एवं बीज दर : संकर किस्मों का 120-150 ग्राम एवं 200-250 ग्राम प्रति एकड़ अच्छी पैदावार देने वाली किस्मों की बीज दर होती है। साथ ही ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहिए जो स्थानीय वातावरण, बाजार एवं उपभोक्ता के अनुसार.
खेत की तैयारी

– उठे हुए शैय्या तकनीक से पौध रोपण करें.
– 5 टन प्रति एकड़ की दर से शैय्या पर सड़ी हुई खाद (गोबर की) डालें.
– आधार उर्वरक के रूप में 250 किग्रा. एसएसपी., 500 कि.ग्रा. नीम खली, 50 कि.ग्रा. मैग्रैशियम सल्फेट एवं 10 कि.ग्रा. सूक्ष्म तत्व को शैय्या में मिलायें
– आधार गोबर खाद व उर्वरक को शैय्या में मिलायें.
– खरपतवार नियंत्रण के लिये 500 मि. ली. बासालीन 200 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ की दर से शैय्या पर छिड़काव करके मिट्टी में मिलायें.
ड्रिप सिंचाई प्रणाली में पौध रोपण
– अनिश्चित वृद्धि, झाड़ीनुमा सीधे बढऩे वाली किस्मों को 5 फीट की दूरी ड्रिप लाईन पर एकल कतार विधि एवं पौधे से पौधे की दूरी, कतार में 30 से 40 सेमी .रखना चाहिए.
– संकर किस्मों को युगल कतार विधि द्वारा लगाना चाहिए.
जल प्रबंध : यद्यपि मिर्च का मूल/ मुख्य जड़ जमीन में गहराई तक पाया जाता है। परंतु इसकी पोषक तत्व व पानी लेने वाली जड़े ज्यादातर जमीन के ऊपरी एक फीट में रहती है जो पौधे की 70 प्रतिशत जल की जरूरत को पूरा करती है। इसलिए ड्रिप सिस्टम इन जड़ों को हमेशा जीवित रखता है। जिससे पौधे में मिट्टी से पानी व पोषक तत्वों का अवशोषण सरलता से होता है।
नेटाफिम के उच्च एक समान उत्सर्जकता, स्वयं साफ होने एवं लचक समन्वित ड्रिप लाईन मिर्च की खेती के लिये बहुत उपयुक्त है।
आधार खुराक : 200 कि.ग्रा. एसएसपी, 50 कि.ग्रा. डीएपी, 500 कि.ग्रा. नीम खली, 50 कि.ग्रा. मैग्रेशियम सल्फेट, 10 कि.ग्रा. सूक्ष्म पोषक तत्व को जमीन में देना चाहिए.

मिर्च तुड़ाई में सावधानियां

– हरी मिर्च बेचना है तो तोड़ते समय यह सावधानी रखें कि फूलों एवं अविकसित मिर्च के ऊपर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। हरी मिर्च की तुड़ाई 6 से 8 बार औसतन 5 से 6 दिनों के अंतर से करनी पड़ती है।
– ग्रीष्म एवं शीत ऋतु की मिर्च पकने पर सुखाकर बेचते हैं। कभी-कभी अचार वाली जातियों को गीला बेचने हेतु तोड़ा जाता है।
– सामान्यत: पके हुए फल को थोड़े-थोड़े समयान्तराल पर हाथ से तोड़ लिया जाता है। सामान्यत: मिर्च में 3 से 6 तुड़ाई होती है। आमतौर पर मिर्च को प्राय: सूर्य की रोशनी में सुखाते हैं।
– मिर्च को सुखाने के लिये प्रत्येक मौसम में जमीन को समतल करके सुखाने के उपयोग में लाया जाता है।
– स्वच्छ, अच्छी गुणवत्ता वाली मिर्च के लिये पक्के प्लेटफार्म या तिरपाल या प्लास्टिक का उपयोग फलों को सुखाने के लिये किया जाता है।
– तुड़ाई उपरांत मिर्च की फलियों को ढेर के रूप में एक रात के लिये रखते हैं, जिससे आधे पके फल पक जाते हैं और सफेद मिर्च की संख्या कम हो जाती है।
– दूसरे दिन मिर्च को ढेर से उठाकर सुखाने के स्थान पर 2-3 इंच मोटी परत में फैला देते हैं।
– इस तरह दो दिन के बाद, प्रत्येक दिन सुबह मिर्च को उलटने-पलटने से सूर्य का प्रकाश हर पर्त पर समान रूप से पड़ता है।
– सूर्य के प्रकाश में शीघ्र और समान रूप से मिर्च को सुखाने के लिए 10 -25 दिन लगते हैं।
– सौर ऊर्जा से चलने वाली मशीन का उपयोग भी मिर्च को सुखाने के लिये किया जाता है। इससे केवल 10-12 घंटे में मिर्च को सुखाया जा सकता है।
– सौर ऊर्जा द्वारा सुखायी गई मिर्च अच्छे गुणों वाली होती है।

मिर्च की उन्नत खेती

हमारे यहां मिर्च एक नकदी फसल है। इस की व्यावसायिक खेती कर के ज्यादा लाभ कमाया जा सकता ? है। यह हमारे खाने में इस्तेमाल होती है। मिर्च में विटामिन ए और सी पाए जाते हैं और कुछ लवण भी होते हैं। मिर्च का इस्तेमाल अचार, मसालों और सब्जी में भी किया जाता है। मिर्च पर पाले का असर ज्यादा होता है, इसलिए जहां पाला ज्यादा पड़ता ? है उन इलाकों में इस की अगेती फसल लेनी चाहिए. ज्यादा गरमी होने पर फूलों व फलों का झड़ना शुरू हो जाता है। मिर्च की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6 से 7.5 के बीच होना अच्छा माना जाता ? है। अच्छी फसल के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी जिस में पानी का अच्छा निकास हो अच्छी मानी जाती है।

उन्नत किस्में

चरपरी मसाले वाली : एनपी 46 ए, पूसा ज्वाला, मथानिया लोंग, पंत सी 1, जी 3, जी 5, हंगेरियन वैक्स (पीले रंग वाली), पूसा सदाबहार, पंत सी 2, जवाहर 218, आरसीएच 1, एक्स 235, एलएसी 206, बीकेए 2, एससीए 235. शिमला मिर्च (सब्जी वाली) : यैलो वंडर, केलीफोर्निया वंडर, बुलनोज व अर्का मोहिनी.

Unnat Kismein Charpari MaSale Wali NP 46 A Pusa Jwala Mathaniya Long Pant Si 1 Ji 3 5 Hungerian Wax Pile Rang Sadabahar 2 Jawahar 218 RCH X 235 LAC 206 BKA SCA Shimla Mirch Sabji यैलो Wonder California BullNose Wa Arka Mohini
नर्सरी तैयार करना
सब से पहले नर्सरी में बीजों की बोआई कर के पौध तैयार की जाती ? है। खरीफ की फसल के लिए मई से जून में व गर्मी की फसल के लिए फरवरी से मार्च में नर्सरी में बीजों की बोआई करें. 1 हेक्टेयर में पौध तैयार करने के लिए 1 से डेढ़ किलोग्राम बीज और संकर बीज 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर काफी रहता है। नर्सरी वाली जगह की गहरी जुताई कर के खरपतवार रहित बना कर 1 मीटर चौड़ी, 3 मीटर लंबी और 10 से 15 सेंटीमीटर जमीन से उठी हुई क्यारियां तैयार कर लें. बीजों को बोआई से पहले केप्टान या बाविस्टिन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. पौधशाला में कीड़ों की रोकथाम के लिए 3 ग्राम फोरेट 10 फीसदी कण या 8 ग्राम कार्बोफ्यूरान 3 फीसदी कण प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन मिलाएं या मिथाइल डिमेटोन 0.025 फीसदी या एसीफेट 0.02 फीसदी का पौधों पर छिड़काव करें. बीजों की बोआई कतारों में करनी चाहिए. नर्सरी में विषाणु रोगों से बचाव के लिए मिर्च की पौध को सफेद नाइलोन नेट से ढक कर रखें.
Nursery Taiyaar Karna Sab Se Pehle Me Beejon Ki Boai Kar Ke Paudh Jati ? Hai Kharif Fasal Liye May June Wa Garmi February March Karein 1 Hectare Karne Dedh KiloGram Beej Aur Sankar 250 Gram Prati Kafi Rehta Wali Jagah Gahri Jutayi Kharpatwar Rahit Banaa Meter Chaudi 3 Lambi 10 15 Centimeter Jamin Uthi Hui Kyariyan Lein Ko keptaan Ya Bavistine 2 Matra Dar Upcharit PaudhShala Keedon Rokatham Phoret Feesdi Kann 8 Carbofuran V
रोपाई
नर्सरी में बोआई के 4 से 5 हफ्ते बाद पौधे रोपने लायक हो जाते हैं। तब पौधों की रोपाई खेत में करें. गर्मी की फसल में कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें. खरीफ की फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें. रोपाई शाम के समय करें और रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई कर दें. पौधों को 40 ग्राम एजोस्पाइरिलम 2 लीटर पानी के घोल में 15 मिनट डुबो कर रोपाई करें.
Ropai Nursery Me Boai Ke 4 Se 5 Hafte Baad Paudhe Ropne layak Ho Jate Hain Tab Paudhon Ki Khet Karein Garmi Fasal Kataar Doori 60 Centimeter Wa 30 45 Rakhein Kharif Liye Aur Sham Samay Turant Sinchai Kar Dein Ko 40 Gram एजोस्पाइरिलम 2 Litre Pani Ghol 15 Minute डुबो
खाद व उर्वरक
खेत की अंतिम जुताई से पहले प्रति हेक्टेयर करीब 150 से 250 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में डाल कर अच्छी तरह मिला दें. इस के अलावा मिर्च का अच्छा उत्पादन लेने के लिए 70 किलोग्राम नाइट्रोजन, 48 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई से पहले जमीन की तैयारी के समय व बची मात्रा आधीआधी कर के 30 व 45 दिनों बाद खेत में छिड़क कर तुरंत सिंचाई कर दें.
Khad Wa Urvarak Khet Ki Antim Jutayi Se Pehle Prati Hectare Karib 150 250 Quintal Achhi Tarah Sadi Hui Gobar Me Dal Kar Mila Dein Is Ke ALava Mirch Ka Achachha Utpadan Lene Liye 70 KiloGram Nitrogen 48 Phoshphorus 50 Potash Jarurat Hoti Hai Adhi Matra Ropai Jamin Taiyari Samay Bachi आधीआधी 30 45 Dino Baad Chhidak Turant Sinchai
सिंचाई व निराई गुड़ाई
गर्मी में 5 से 7 दिनों के अंतर पर और बरसात में जरूरत के हिसाब से सिंचाई करें. खरपतवार की रोकथाम के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करनी चाहिए. खरपतवार नियंत्रण के लिए 200 ग्राम आक्सीफ्लूरोफेन प्रति हेक्टेयर का पौधों की रोपाई के ? ठीक पहले छिड़काव (600 से 700 लीटर पानी में घोल कर) करें.

Sinchai Wa Nirai Gudai Garmi Me 5 Se 7 Dino Ke Antar Par Aur BarSaat Jarurat Hisab Karein Kharpatwar Ki Rokatham Liye समयसमय निराईगुड़ाई Karni Chahiye Niyantran 200 Gram आक्सीफ्लूरोफेन Prati Hectare Ka Paudhon Ropai ? Theek Pehle Chhidkaw 600 700 Litre Pani Ghol Kar )

कीड़े व रोग

सफेद लट : इस कीट की लटें पौधों की जड़ों को खा कर नुकसान पहुंचाती ? हैं। इस पर काबू पाने के लिए फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान 3 जी 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई से पहले जमीन में मिला देना चाहिए. सफेद मक्खी, पर्णजीवी (थ्रिप्स), हरा तेला व मोयला : ये कीट पौधों की पत्तियों व कोमल शाखाओं का रस चूस कर उन्हें कमजोर कर देते हैं। इन के असर से उत्पादन घट जाता ? है। इन पर काबू पाने के लिए मैलाथियान 50 ईसी या मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 1 मिलीलीटर या इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़ाकव करें. 15-20 दिनों बाद दोबारा छिड़ाकव करें.

मूल ग्रंथि सूत्रकृमि : इस के असर से पौधों की जड़ों में गांठें बन जाती ? हैं और पौधे पीले पड़ जाते हैं। पौधों की बढ़वार रुक जाती ? है, जिस से पैदावार में कमी आ जाती है। इस की रोकथाम के लिए रोपाई के स्थान पर 25 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान 3 जी प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन में मिलाएं.

आर्द्र गलन : इस रोग का असर पौधे जब छोटे होते हैं, तब होता है। इस के असर से जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़ कर कमजोर हो जाता ? है व नन्हे पौधे गिर कर मरने लगते हैं। रोकथाम के लिए बीजों को बोआई से पहले थाइरम या केप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. नर्सरी में बोआई से पहले थाइरम या केप्टान 4 से 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से जमीन में मिलाएं. नर्सरी आसपास की जमीन से 4 से 6 इंच उठी हुई जमीन में बनाएं.

श्याम ब्रण : इस रोग से पत्तियों पर छोटेछोटे काले धब्बे बन जाते हैं और पत्तियां झड़ने लगती ? हैं। जब इस का असर ज्यादा होता है, तो शाखाएं ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती हैं। पके फलों पर भी बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। रोकथाम के लिए जाइनेब या मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर 2 से 3 बार छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें.

पर्णकुंचन व मोजेक विषाणु रोग : पर्णकुंचन रोग के असर से पत्ते सिकुड़ कर छोटे रह जाते हैं व उन पर झुर्रियां पड़ जाती ? हैं। मोजेक विषाणु रोग के कारण पत्तियों पर गहरे व हलका पीलापन लिए हुए धब्बे बन जाते हैं। रोगों को फैलाने में कीट सहायक होते ? हैं। रोकथाम के लिए रोग लगे पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए. रोग को आगे फैलने से रोकने के लिए डाइमिथोएट 30 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

नर्सरी तैयार करते समय बोआई से पहले कार्बोफ्यूरान 3 जी 8 से 10 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन में मिलाएं. रोपाई के समय निरोगी पौधे काम में लें. रोपाई के 10 से 12 दिनों बाद मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें. छिड़काव 15 से 20 दिनों के अंतर पर जरूरत के हिसाब से दोहराएं. फूल आने पर मैलाथियान 50 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर के हिसाब से छिड़कें.

तना गलन : गर्मी में पैदा होने वाली मिर्च में तना गलन को रोकने के लिए टोपसिन एम 0.2 फीसदी से बीजोपचार कर के बोआई करें.

Kide Wa Rog Safed Lat Is Keet Ki Lantein Paudhon Jadon Ko Kha Kar Nuksan Pahunchati ? Hain Par Kabu Pane Ke Liye Phoret 10 Ji Ya Carbofuran 3 25 KiloGram Prati Hectare Dar Se Ropai Pehle Jamin Me Mila Dena Chahiye Makhhi ParnnJeevi Thrips Hara Tela Moyla Ye Pattiyon Komal Shakhaon Ka Ras choos Unhe Kamjor Dete In Asar Utpadan Ghat Jata Hai Malathion 50 EC Methyl Dematone 1 मिलीलीटर इमिडाक्लोरोपिड 0 5 Litre Pani छिड़ाकव

तोड़ाई व उपज

हरी मिर्च के लिए तोड़ाई फल लगने के 15 से 20 दिनों बाद कर सकते हैं। पहली तोड़ाई से दूसरी तोड़ाई का अंतर 12 से 15 दिनों का रखते ? हैं। फलों की तोड़ाई उस के अच्छी तरह से तैयार होने पर ही करनी चाहिए. हरी चरपरी मिर्च तकरीबन 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी लाल मिर्च प्राप्त की जा सकती है

TodaEe Wa Upaj Hari Mirch Ke Liye Fal Lagne 15 Se 20 Dino Baad Kar Sakte Hain Pehli Doosri Ka Antar 12 Rakhte ? Falon Ki Us Achhi Tarah Taiyaar Hone Par Hee Karni Chahiye Charpari Takriban 150 200 Quintal Prati Hectare Aur 25 Sookhi Laal Prapt Jaa Sakti Hai


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अनार की खेती Pomegranate Farming business Agriculture gk

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अनार की खेती Pomegranate Farming business Agriculture gk

अनार की खेती क्या आप अनार की खेती के बारे में सोच रहे हैं और इण्डिया में Pomegranate फार्मिंग business शुरुआत करना चाहते हैं ? यकीन मानिये अनार कि ऑर्गेनिक खेती से आप अच्छा खासा व्यापार बना सकते है

अनार खेती कि शुरुआत कैसे करे

How to start Pomegranate Farming

अगर आपमें अनार की खेती करने की इच्छा है और इसे एक नयी मुकाम पर ले जाना चाहते हैं तो निचे दी गयी जानकारी को ध्यान से पढ़े और इसे आगे ले जाये

भूमि का चयन (soil selection)
अनार की खेती करने से पहले आपको सावधानी पूर्वक भूमी का चयन करना होगा जिससे आपको अच्छे फल की प्राप्ति हो सके । वैसे तो सभी प्रकार के भूमि पर अनार की खेती की जा सकती है लेकिन अच्छे परिणाम और अच्छे फल की प्राप्ति के लिए आप दोमट मिट्टी वाली भूमि का उपयोग करें । यह अनार की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है ।

जलवायु (Climate) Pomegranate Farming

जलवायु (Climate)
जब आप किसी भी चीज़ की खेती करने का सोच रहे हो तो सबसे पहले उसके उपजाव के सही मौसम का पता लगा ले। अनार के फल उगने हेतु सामान्य ठंड का मौसम अच्छा होता है। कम तापमान वाले गर्मी के मौसम में भी अनार की खेती की जा सकती है। अच्छे फल की प्राप्ति हेतु कम से कम 4.0 से.ग्रैड. तक का तापमान उपयुक्त होता है ।

अनार की प्रजातियाँ (types of Pomegranate) Pomegranate Farming

अनार की प्रजातियाँ (types of Pomegranate)
अनार की कई प्रजातियाँ होती है :-
गणेश:- इस प्रजाति के फलो का उत्पादन अधिक मात्रा में होती है। गणेश किस्म के फलो का आकार सामान्य (normal) होता है। इस किस्म के फल ज्यादा तर महाराष्ट्र प्रांत में उगाया जाता है ।
मसकित :- इस किस्म में पाए जाने वाले फलो का आकार छोटा होता है और इसके ऊपरी छिलके मोटे होते है।इसके बिज कोमल और रस बहुत ही मीठे होते है ।
ढोलका:- ढोलका प्रजाति के फल एक साथ बहुत ही अधिक मात्रा में फलते है। इसके छिलके का रंग ज्यादातर सफ़ेद / हरा होता है । इसके दाने का रंग गुलाबी और सफ़ेद जैसे दिखते है ।
जालोर/बेदाना :-इस प्रजाति में पाए जाने वाले फलो के आकार बड़े होते है। इसके छिलके dark red color के और बिज बहुत ही soft होते है ।
इन सब के अलावा अनार के और भी कई प्रजातियाँ होते है जैसे :- बेसिन बेदाना जो ज्यादातर कर्णाटक में उगाये जाते है, : रूबी, मृदुला आदि ।

पौधे का रोपण Pomegranate Farming 

पौधे का रोपण
पौधा रोपने से पहले लगभग 50 से 60 से.मि. गहरा गड्ढा खोद लेना चाहिए।
फिर उस गड्ढे में पौधा रोपने की प्रक्रिया को शुरू करे ।
पौधे को रोपने समय दो पौधों के बिच कम से कम 5 मीटर की दूरी छोड़ना चाहिए।

अनार की खेती के लिए खाद तैयार करे Pomegranate Farming

अनार की खेती के लिए खाद तैयार करे
अनार की खेती करते समय एक साल में कम से कम दो बार आर्गनिक खाद के साथ गाय की सड़ी हुई गोबर की खाद मिला कर पौधे को देनी चाहिए। जैविक खाद (Organic manure) को तैयार करने का तरीका है :-

माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट- 40 kg
माइक्रो सुपर पावर -50 kg
सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट- 10 kg
माइक्रो नीम-20kg
अरंडी कि खली- 50kg
इन सब अच्छे से मिला कर इनका खाद तैयार कर ले ।
जब आपको लगे की पौधों में फुल आने वाले है तो उससे 10-15 दिन पहले 500 ml माइक्रो झाइम और 2 kg सुपर गोल्ड के साथ मैग्नीशियम को पानी में घोल ले फिर पम्प से उसका छिड़काव खेत में लगे सभी पौधों पर करे ऐसा करने से भरपूर मात्रा में फुल की प्राप्ति होगी। फिर जब लगे की फल लगने वाला है तो फिर से उस घोल का छिड़काव करे। उसके बाद हर 20 दिन में छिड़काव करते रहना चाहिए ऐसा करने से अच्छे और सुन्दर फल की प्राप्ति होगी।

सिंचाई Pomegranate Farming

सिंचाई
अनार की खेती में नियमित रूप से सिंचाई करते रहना चाहिए।इससे अच्छे फल की प्राप्ति होती है । गर्मी और ठंड के मौसम में हर 10 से20 दिन के अन्दर सिंचाई करते रहना चाहिए। अनार के खेती के लिए जिस भूमि का चयन किया गया हो उस भूमि में गीलापन (moisture) का सामान्य दरजा (level) बनाये रखना चाहिए। गीलेपन के स्तर में अगर तेज़ी से उतार चढ़ाव होता है तो फल के फटने कि संभावना होती है ।

कीट पतंग से बचाव Pomegranate Farming

कीट पतंग से बचाव
नुकसान पहुँचने वाले किट :-
फल भेदक
ये एक ऐसा तितली के प्रजाति होते है जो फले हुए फलो को नष्ट कर देते है। इस तितली के अंडो से निकली हुई तित्त्लियाँ फलो के अन्दर प्रवेश कर के सरे बीजो को खा जाती है। जिसकी वजह से फल अन्दर से सड़ जाते है।
इससे बचने का उपाय ये है की आप नीम का पानी या उसका काढ़ा तैयार कर ले और पीर उसका छिड़काव पौधों पर करे ।
माहू
माहू नमक किट नए उगने वाले पत्तियों और फूलों के सरे रस चूस जाते है । जिसकी वजह से पत्तियां टेढ़ी मेढ़ी होकर झड़ जाती है। अतः इससे बचने के लिए नीम का पानी या काढ़ा का छिड़काव है करे ।
इंडर/बिला
इंडर/बिला नमक कीड़े अनार के पेड़ कि छाल में छेद करके अन्दर घुस जाते है और अन्दर से पेड़ को खोकला कर देते है । अगर पेड़ अन्दर से खोखला हो जाये तो उसमें फल नहीं लगते है। इससे बचने के लिए खोखले जगह की अच्छे से साफ़ सफाई करके इंजेक्सन द्वारा मिट्टी का तेल या फिर पेट्रोल छेद में भरकर गीली मिटटी से छेद को बंद कर देना चाहिए।इससे सरे कीड़े छेद के अन्दर ही मर जाते है ।
निमेटोड
निमेटोड किट अक्सर अनार के पौधों कि जड़ों में लगते है। इसकी वजह से फल छोटे और इसके उपजाव कम हो जाते है। इससे बचने के लिए नीम कि खली या माइक्रो नीम कि खाद और अरंडी कि खली का खाद का प्रयोग करना चाहिए

उपज और तुड़ाई Pomegranate Farming

उपज और तुड़ाई
अलग अलग अनार के पौधों कि उपज अलग अलग तरह की होती है, जो कि मिट्टी के प्रकार, जलवायु और किसानो की मेहनत पर depend करता है। अगर अनार का पौधा 10 साल पुराना है तो उस पौधे से कम से कम 90 से 120 फलों के उत्पादन होते है। अनार के पौधे से लगभग 25-30 वर्ष तक फलो का उत्पादन होता है। अनार के फल 5 से 6 महीने में पक के तैयार हो जाते है। पके हुए अनार के फल हल्के पीले रंग के और कभी कभी लाल रंग के होते है। अनार के फलो को सेक्रोटियर कि सहायता से ही तोड़ना चाहिए।
अनार के पौधों को सही आकार देने के लिए starting year में इसकी कटाई छंटाई कि जाती है।


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नींबू की खेती How to start Lemon Farming – Kaise kare nimbu ki kheti

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नींबू की खेती कैसे करें

क्या आप नींबू की खेती करने की सोच रहे हैं ? जानिए इससे जुडी जानकारी, कैसे आप 1 acer से ही लाखों कम सकते है और कैसे करे इसकी उन्नत और वैज्ञानिक खेती, कीड़ों से बचाव । पूरे world में नींबू (lemon) का सबसे ज्यादा उत्पादन India में ही होता है । इसलिए India के किसान चाहे तो निम्बू की खेती कर के अच्छा पैसा कमा सकते है । यदि निम्बू की खेती को कृषि वैज्ञानिक द्वारा बताए गए तरीके से किया जाये तो किसानो को अच्छी उपज मिल सकती है । Jharkhand, Maharashtra, Andhra Pradesh, Tamil Nadu जैसे states में निम्बू की काफी अच्छी पैदावार होती है । इसमें सुरुवाती से ले कर उत्पादन तक कम पूंजी लगती है और अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है । तो चलिए जानते है निम्बू की खेती से जुडी जानकारी विस्तार में ।

How to start Lemon Farming – Kaise kare nimbu ki kheti

>>> नींबू की खेती कैसे करे / How to Start Lemon Farming

नींबू की खेती कैसे करे / How to Start Lemon Farming

मैं हमेशा suggest करता रहा हूँ की अगर आप agriculture से जुड़ा कोई business करना चाहते है और अगर आपके पास 1 से 5 acer तक की जमीन है तो proper training ले कर इसमें जम जाइये । तो अगर आपके पास खली पड़ी हुई कम से कम 1 acer की land हो तो आप lemon farming का business अपने India में ही कर के अच्छा profit कम सकते है । सुरुवात में भले ही आपको 2-3 साल का wait करना पड़े पर उसके बाद आप आसानी से हर साल लाख रूपया बैठे बैठे कमा सकते हैं । तो चलिए जानते है कैसे आप भी निम्बू की उन्नत खेती कर के खुद का agriculture business setup कर सकते हैं ।

 

>>> नींबू की खेती के लिए भूमि / Land Selection for Lemon Farming

नींबू की खेती के लिए भूमि / Land Selection

नींंबू की खेती को लगभग सभी तरह की भूमि पर Successfully किया जा सकता है । लेकिन फिर भी दोमट मिट्टी वाली भूमि जहाँ जल-प्रणाली का उत्तम प्रबंध किया गया हो उसे ही निम्बू की खेती के लिए सबसे अच्छा माना गया है । निम्बू की खेती के लिए भूमि की गहराई लगभग 2.5 मी.या से ज्यादा होनी चाहिए और इसका ph मान लगभग 7.0 तक होना चाहिए तभी निम्बू की अच्छी वृद्धि और उपज मिलती है । ऐसी मिट्टियाँ और ऐसा area जहाँ पर पानी जमा हो जाता हो उसे नींबू की खेती के लिए सही नहीं माना जाता है ।

निम्बू की खेती के लिए जलवायु / Suitable Climate for Citrus Cultivation For Lemon Farming

निम्बू की खेती के लिए जलवायु / Suitable Climate for Citrus Cultivation

निम्बू की खेती के लिए Warm और moderate humidity, पाला और जोड़ की हवा से मुक्त वाले area को अच्छा माना जाता है । निम्बू की अच्छी वृद्धि और इसके अच्छे उत्पादन के लिए 20-32 डिग्री से. तक का temperature की आवश्यकता होती है साथ ही इसकी खेती में औसत वार्षिक वर्षा 750 mm से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ।

>>> निम्बू की उन्नत किस्मे / Varieties of Lemon

निम्बू की उन्नत किस्मे / Varieties of Lemon

वैसे तो आज market में कई तरह के निम्बू available हैं जिसकी अच्छी demand है । अगर आप निम्बू की खेती को एक बड़े business model में ले जाना चाहते है तो यह काफी जरुरी है की आप सही किस्म के निम्बू का चुनाव करे ताकि आपको अधिक से अधिक मुनाफा मिले । इनमे से कुछ lemon hybrid भी होते है जो अच्छी पैदवार देतीं हैं ।

Varieties of Lemon

कागजी निम्बू – इसकी Wide popularity के वजह से इसे खट्टा नींंबू का समानार्थी माना जाता है।
प्रमालिनी निम्बू – इस किस्म के निम्बू bunch में फलते है, और इसके एक गुच्छे में लगभग 3 से 7 तक फल लगते हैं । प्रमालिनी निम्बू,कागजी नींंबू के compare में 30% ज्यादा उपज देती है ।
विक्रम निम्बू – इसके फल भी bunch में ही फलते है । एक bunch में लगभग 5 से 10 फल लगते है ।
चक्र धर निम्बू – इस निम्बू में बीज नहीं होते है और इसके फल से लगभग 65% रस निकलता है ।
पि.के. एम् -1 – यह भी ज्यादा उत्पादन वाली किस्मो में से एक है । इसके फलो से लगभग 50% रस प्राप्त हो जाते है ।
ऊपर दिए गए निम्बू के किस्मो के अलावा साईं सर्बती, सीडलेस निम्बू , भी निम्बू के उन्नत किस्मो में से एक है ।

Nimbu Ki Unnat Kisme Varieties Of Lemon Waise To Aaj Market Me Kai Tarah Ke available Hain Jiski Achhi demand Hai Agar Aap Kheti Ko Ek Bade business model Le Jana Chahte Yah Kafi Jaroori Sahi Kism Ka Chunav Kare Taki Aapko Adhik Se Munafa Mile Inme Kuch lemon hybrid Bhi Hote Jo पैदवार देतीं Kagji Iski Wide popularity Wajah Ise Khatta Nimboo Samanarthi Mana Jata प्रमालिनी Is bunch Falte Aur Iske गुच्छे Lagbhag 3 7 Tak F

बीज रोपण

बीज रोपण

नींबू के पौधों को रोपने का सबसे सही समय June से July तक का होता है और अगर सिंचाई का प्रबंध सही से किया जाये तो इसकी रोपाई February और March में भी की जा सकती है । पौधे को रोपने से पूर्व हर एक गड्ढे की मिट्टी में लगभग 20 kg गोबर की खाद और 1 kg सुपर फ़ॉस्फ़ेट को अच्छी तरह से mix कर दें । पौधों को रोपने समय हर एक पौधों के बीच का distance लगभग 20-20 cm का space होना चाहिए ।

Beej Ropann Nimboo Ke Paudhon Ko Ropne Ka Sabse Sahi Samay June Se July Tak Hota Hai Aur Agar Sinchai Prabandh Kiya Jaye To Iski रोपाई February March Me Bhi Ki Jaa Sakti Paudhe Poorv Har Ek गड्ढे Mitti Lagbhag 20 kg Gobar Khad 1 Super Phosphate Achhi Tarah mix Kar Dein Beech distance CM space Hona Chahiye

खाद प्रबंधन

खाद प्रबंधन

नींबू की खेती में सड़ी हुई गोबर की खाद को हर साल दिया जाता है । पहले साल में 5 kg दुसरे साल में 10 kg तीसरे साल में 20 kg और इसी तरह हर साल पिछले साल का दोगुना खाद देना होता है । निम्बू की खेती में Organic manure साल में दो बार पड़ता है । पहला december और January में और दूसरा April और May में । जो वृक्ष फल देने वाले होते है ऐसे वृक्ष में 60 kg गोबर की खाद, 2.5 kg अमोनियम सल्फ़ेट, 2.5 kg सुपर फास्फेट और 1.5 kg म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का use करना चाहिए ।

Khad Prabandhan Nimboo Ki Kheti Me सड़ी Hui Gobar Ko Har Sal Diya Jata Hai Pehle 5 kg Dusare 10 Teesre 20 Aur Isi Tarah Pichhle Ka Doguna Dena Hota Nimbu Organic manure Do Baar Padta Pehla december January Doosra April May Jo Vriksh Fal Dene Wale Hote Aise 60 2 Amonium Sulphate Super Phosphate 1 म्यूरेट Of Potash use Karna Chahiye

>>> सिंचाई

सिंचाई

निम्बू की खेती में साल भर नमी की जरूरत होती है । वर्षा के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है । ठंड के समय 1 month के interval पर सिंचाई और गर्मियों में 10 days के interval पर सिंचाई करना होता है ।

Sinchai Nimbu Ki Kheti Me Sal Bhar Nami Jarurat Hoti Hai Varsha Ke Mausam Nahi Thand Samay 1 month interval Par Aur Garmiyon 10 days Karna Hota

निम्बू का रोग व कीट से बचाव / Tips to Control Disease and Pest For Lemon Farming

निम्बू का रोग व कीट से बचाव / Tips to Control Disease and Pest

नींंबू का सिला – यह कीट नयी पत्तियों और कलियों से रस चूस जाते है । इस कीट के प्रकोप से पत्तियां गिरने लगती है । इस कीट से एक तरह का चिटचिटा पदार्थ निकलता है जिस पर काली मोल्ड जम जाती है । इस कीट के नियंत्रण हेतु इससे प्रभावित सभी parts को काट कर जला दे ।

निम्बू कि तितली – यह कीट नर्सरी के पौधों को काफी नुकसान पहुंचाती है । इसके green color के इल्ली पत्तियों को खा जाते है । यह किट April से May तक और August से October तक ज्यादा लगते है । निम्बू कि तितली से नियंत्रण के लिए अपने खेतो में नीम के काढ़ा का छिडकाव micro झाइम में mix कर करना चाहिए ।

माहू कीट – माहू कीट december से march तक ज्यादा लगते है । यह कीट फूलों व पत्तियों के सारे रस चूस जाते है जिससे फूल व पत्ते दोनों ही कमजोर होकर गिरने लगते है । इस कीट के नियंत्रण हेतु खेतो में नीम का काढ़ा का छिड़काव करना चाहिए ।

कैंकर रोग – यह रोग विशेष रूप से निम्बू पर ही लगते है । इस रोग के लगते ही पहले निम्बू के पत्तियों पर light yellow color के धब्बे होने लगते है और फिर वे धब्बे आहिस्ता आहिस्ता dark brown color के हो जाते है । इस रोग के बढ़ने से शाखाएं और फल दोनों ही ग्रसित हो जाते है । इस रोग के नियंत्रण हेतु रोग से ग्रसित शाखाओ को पौधों से छाट कर अलग कर देना चाहिए । उसके बाद कटे हुए सभी शाखाओ पर ग्रीस लगा दिया जाता है । इसके बाद बरसात start होते ही माइक्रो झाइम और नीम का काढ़ा का छिड़काव किया जाता है ।

गोदार्ती रोग – यदि इस रोग का आक्रमण तने पर हो तो इस रोग को गोदार्ती तना बिगलन कहा जाता है । इस रोग के प्रकोप से छाल में से गोंद की तरह एक पदार्थ निकालता है जिससे छाल brown हो जाती है और उसमें दरारें होने लगती है । इसके रोग से बचने हेतु बहुत से उपाय है जैसे की :-

खेत में से जल निकलने का अच्छा प्रबंध करना होगा और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना होगा की सिंचाई का पानी direct तने के संपर्क में नहीं आने चाहिए ।
इस रोग से ग्रसित भाग को किसी तेज़ धार वाले चाकू से छिल कर फिर उसके ऊपर से ग्रीस लगा दें ।
नीम का काढ़ा या मिट्टी का तेल (Kerosene) का भूमि में छिड़काव करे ।
विष्णु रोग – इस रोग के वजह से पत्तियों पर हरे रंग की महीनता नज़र आने लगती है । इसके अलावा पत्तियां और टहनियां dry होकर सुख जाती है । इससे बचना है तो नीम के काढ़ा को पूरे खेत में छिड़क दें ।

Nimbu Ka Rog Wa Keet Se Bachav Tips To Control Disease and Pest Nimboo Sila Yah Nayi Pattiyon Aur कलियों Ras choos Jate Hai Is Ke Prakop Pattiyan Girne Lagti Ek Tarah चिटचिटा Padarth Nikalta Jis Par Kali मोल्ड Jam Jati Niyantran Hetu Isse Prabhavit Sabhi parts Ko Kat Kar Jala De Ki Titli Nursery Paudhon Kafi Nuksan Pahunchati Iske green color Illi Kha Kit April May Tak August October Jyada Lagte Liye Apne खेतो Me Neem

फसल की तुड़ाई / Picking FOr Lemon Farming

फसल की तुड़ाई / Picking

खट्टे नींबू के पौधों में एक साल में कई बार फल लगते है और इसके फलो को तैयार होने में लगभग 6 month का time लगता है । जब फल पक कर हरे रंग से पीला रंग हो जाता है तब उसकी तुड़ाई start कर दी जाती है ।

उपज / Production for Lemon Farming

उपज / Production

यह अक्सर पुचा जाता है की निम्बू के पेड़ पर कितने साल से फल लगने लगते है । वैसे तो 1 साल के बाद ही निम्बू के छोटे-छोटे फल लगने लगते है पर वह किसी काम का नहीं होता है । 3 से 4 साल के होने तक निम्बू के पेड़ में अच्छी मात्र में निम्बू फल लगने लगते है । और 5 से 6 साल की उम्र वाले पौधो से सालाना 2,000 से 5,000 निम्बू के फल प्राप्त किये जा सकते है ।

आज के date में लगभग सभी सहरों में 10 रूपए (INR) में 3 से 5 piece ही निम्बू मिलता है ।

उस हिसाब से अगर आप देखे तो किसान भाई आसानी से हर एक piece पर Rs 0.75 से ले कर Rs 1.00 मिल सकते हैं । अगर किसान भाई कम ही मान कर चले और हर एक lemon के piece का price Rs 0.75 ही लगाये तो, कुछ इस प्रकार से profit margin आएगा :

Average Annual Production of Lemon from one Tree: 3,000 piece
Total no. of Lemon Trees in One Acer of Land: 150 Trees
Total production = 4,50,000 Lemon
Total Sales (4,50,000 x Rs 0.75) = Rs 3,37,500
अब अगर मान कर चला जाये की सब मिल कर खर्चा maximum 1 लाख सालाना भी हो तो आप आसानी से Rs 2,00,000 कम से कम कम सकते है वो भी केवल 1 acer से । यह सही बात है की सुरुवात में आपको 3 से 4 साल तक का इंतज़ार करना होगा और investment भी थोडा होगा, पर अगर आप 4 से 10 साल तक का नजरियाँ ले कर चलते है तो आपको यह बैठा बैठाया on-going कम से कम 2 लाख आसानी से कम सकते है ।

Upaj Production Yah Aksar पुचा Jata Hai Ki Nimbu Ke Ped Par Kitne Sal Se Fal Lagne Lagte Waise To 1 Baad Hee Chhote Wah Kisi Kaam Ka Nahi Hota 3 4 Hone Tak Me Achhi Matra Aur 5 6 Umra Wale Podhon Salana 2 000 Prapt Kiye Jaa Sakte Aaj Date Lagbhag Sabhi सहरों 10 Rupaye INR piece Milta Us Hisab Agar Aap Dekhe Kisaan Bhai Asani Har Ek Rs 0 75 Le Kar 00 Mil Hain Kam Maan Chale lemon price Lagaye Kuch Is Prakar pr

राजस्थानी कला Rajasthan GK

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

राजस्थानी कला Rajasthan GK

इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।

राजस्थानी स्थापत्य कला

राजस्थानी स्थापत्य कला

राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दु, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेष के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है। इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में वैष्णव, बौद्ध तथा जैन धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, बौद्ध, स्तूप, विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला “गरुड़ स्तम्भ’ यहां भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में अकबर द्वारा चित्तौड़ आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन “सूर्य मन्दिर’ इसी जिले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियां तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ जिले में स्थित मेनाल, डूंगरपुर जिले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की शिव, पार्वती, विष्णु, महावीर, भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।

सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर जिले में स्थित आमानेरी का मन्दिर (हर्षमाता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं।

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उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। तेरहवीं शताब्दी के पश्चात स्थापत्य प्रतीक का अद्वितीय उदाहरण चित्तौड़ का “कीर्ति स्तम्भ’ है, जिसमें उत्कीर्म मूर्तियां जहां हिन्दू धर्म का वृहत संग्रहालय कहा जा सकता है। वहां इसकी एक मंजिल पर खुदे फारसी-लेख से स्पष्ट होता है कि स्थापत्य में मुस्लिम लक्ष्ण का प्रभाव पड़ना शुरु होने लगा था।

सत्रहवीं शताब्दी के पश्चात भी परम्परागत आधारों पर मन्दिर बनते रहे जिनमें मूर्ति शिल्प के अतिरिक्त भित्ति चित्रों की नई परम्परा ने प्रवेश किया जिसका अध्ययन राजस्थानी इतिहास के लिए सहयोगकर है।

मुद्रा कला

मुद्रा कला

राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल कनिंघम को आगरा में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है। राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण वि.सं. 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों “”श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य ’ ’ , “”श्री एकलिंगस्य प्रसादात ’ ’ और “”श्री ’ ’ के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें “टका’ पुकारा जाता था। यह प्रबाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात शनै: शनै: मुगलकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर “”सुल्तान विन सुल्तान ’ ’ का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में स्वास्तिक, सूर्य और चन्द्र प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुगल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।

परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रही वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का “कलदार’ भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा मारवाड़ प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में “पंचमार्क’ मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहां बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा “द्रम’ का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। बांसवाड़ा जिले के सरवानियां गांव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में “फदका’ या “फदिया’ मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।

राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुगलकाल या उसके पश्चात स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुगल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, प्रतापगढ़ के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा – “डोडिया’ अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं।

मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।

 

Mudra Kala Rajasthan Ke Pracheen Pradesh Mewad Me Majjhamika Madhyamika naamdhari Chittaud Paas Sthit Nagri Se Prapt ताम्रमुद्रा Is Shetra Ko शिविजनपद Ghosit Karti Hai Tatpaschat Chhathi – 7 th Satabdi Ki Swarna Hui General Kaningham Agra Sansthapak Shashak Guhil Sikke Hue Aise Hee औझाजी Bhi Mile Iske उर्ध्वपटल Tatha अधोवट Chitrann Rajvansh शैवधर्म Prati Aastha Ka Pata Chalata Ranna कुम्भाकालीन 1433 1468 Ee Sikkon Tamra Mudraain

 

मूर्ति कला

राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर जिले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर “”बनजारे की छतरी ’ ’ नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, आभानेरी, कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।
गुप्तोतर काल के पश्चात राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया।

15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियां है। सोलहवी शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात भी मूर्तियां बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरूप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।

Murti Kala Rajasthan Me Kaale Safed Bhure Tatha Halke सलेटी Hare Gulabi Patthar Se Bani Murtiyon Ke Atirikt Peetal Ya Dhatu Ki Murtiyan Bhi Prapt Hoti Hain Ganga Nagar Jile Kaalibanga Udaipur Nikat Aahad – Sabhyata Khudai Paki Hui Mitti Banai खिलौनाकृति Milti Kintu आदिकाल शास्रोक्य Drishti Eesa Poorv Pehli Doosri Satabdi Madhy Nirmit Jaipur Lalsot Naam Sthan Par Banjare Chhatri ’ Prasidh Char Vedica Stambh Ka Lakshann द्रष्टत्य

धातु मूर्ति कला

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धातु मूर्ति कला

धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहां बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही जिले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के जिले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है।

अठाहरवी शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अतः इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरूप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।

Dhatu Murti Kala Ko Bhi Rajasthan Me Prayapt Prashray Mila Poorv Madhy Tatha उत्तरमध्य Kaal Jain Murtiyon Ka Yahan Bahutayat Nirmann Hua Sirohi Jile वसूतगढ़ Pindwada Namak Sthan Par Kai Pratimaein Prapt Hui Hain Jisme Sharda Ki Shilp Drishti Se द्रस्टव्य Hai Bharatpur Jaisalmer Udaipur Ke Is Tarah Udaharan Paripurn अठाहरवी Satabdi Murtikala ne Shanai Ek Udyog Roop Lena Shuru Kar Diya Tha Atah Inme Kalatmak Shailiyon व्यवसायिकृत

धातु एवं काष्ठ कला

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धातु एवं काष्ठ कला

इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएं प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियां, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबुल, कुर्सियां, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।

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लोककला

लोककला

अन्ततः: लोककला के अन्तर्गत बाध्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।

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राजस्थानी चित्रकला राजस्थान की चित्रकारी Rajasthani ChitraKala Rajasthan Ki Chitrakari Rajasthan GK

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

राजस्थानी चित्रकला राजस्थान की चित्रकारी Rajasthani ChitraKala Rajasthan Ki Chitrakari Rajasthan GK

भारतीय चित्रकला में राजस्थानी चित्रकला का विशिष्ट स्थान है, उसका अपना एक अलग स्वरूप है। यहाँ की इस सम्पन्न चित्रकला के तरफ हमारा ध्यान सर्वप्रथम प्रसिद्ध कलाविद आनन्दकंटक कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक राजपूत पेन्टिंग’ के माध्यम से दिलाया। कुछ उपलब्ध चित्रों के आधार पर कुमारस्वामी तथा ब्राउन जैसे विद्वानों ने यह धारणा बनाई कि राजस्थानी शैली, राजपूत शैली है तथा नाथद्वारा शैली के चित्र उदयपुर शैली के हैं। परिणामस्वरूप राजस्थानी शैली का स्वतंत्र अस्तित्व बहुत दिनों तक स्वीकार नहीं किया जा सका। इसके अलावा खंडालवाला की रचना ठलीवस फ्रॉम राजस्थान (मार्ग, भाग-त्ध्, संख्या 3, 1952) ने पहली बार विद्वानों का ध्यान यहाँ की चित्रकला की उन खास पहलुओं की तरफ खींचा जो इन पर स्पष्ट मुगल प्रभावों को दर्शाता है।

वास्तव में राजस्थानी शैली, जिसे शुरु में राजपूत शैली के रुप में जाना गया, का पादुर्भाव 15 वीं शती में अपभ्रंश शैली से हुआ। समयान्तर में विद्वानों की गवेषणाओं से राजस्थानी शैली के ये चित्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने लगे।

इन चित्रकृतियों पर किसी एक वर्ग विशेष का समष्टि रुप में प्रभाव पड़ना व्यवहारिक नहीं जान पड़ता। धीरे-धीरे यह बात प्रमाणित होती गई कि राजस्थानी शैली को राजपूत शैली में समावेशित नहीं किया जा सकता वरण इसके अन्तर्गत अनेक शैलियों का समन्वय किया जा सकता है। धीरे-धीरे राजस्थानी चित्रकला की एक शैली के बाद दूसरी शैली अपने कुछ क्षेत्रीय प्रभावों व उनपर मुगलों के आंशिक प्रभावों को लिए, स्वतंत्र रुप से अपना पहचान बनाने में सफल हो गयी। इनको हम विभिन्न नामों जैसे मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, बीकानेर शैली, नाथ द्वारा शैली आदि के रुप में जाना जाता है। उणियारा तथा आमेर की उपशैलियाँ भी अस्तित्व में आयी जो उसी क्षेत्र की प्रचलित शैलियों का रूपान्तरण है।

राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ

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राजस्थानी चित्रकला अपनी कुछ खास विशेषताओं की वज़ह से जानी जाती है।

प्राचीनता

प्राचीनकाल के भग्नावशेषों तथा तक्षणकला, मुद्रा कला तथा मूर्तिकला के कुछ एक नमूनों द्वारा यह स्पष्ट है कि राजस्थान में प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से ही चित्रकला का एक सम्पन्न रुप रहा है। वि. से. पूर्व के कुछ राजस्थानी सिक्कों पर अंकित मनुष्य, पशु, पक्षी, सूर्य, चन्द्र, धनुष, बाण, स्तूप, बोधिद्रम, स्वास्तिक, ब्रज पर्वत, नदी आदि प्रतीकों से यहाँ की चित्रकला की प्राचीनता स्पष्ट होती है। वीर संवत् 84 का बाड़ली-शिलालेख तथा वि. सं. पूर्व तीसरी शताब्दी के माध्यमिक नगरी के दो शिलालेखों से भी संकेतित है कि राजस्थान में बहुत पहले से ही चित्रकला का समृद्ध रुप रहा है। बैराट, रंगमहल तथा आहड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली, रेखावली तथा रेखाओं का अंकन इसके वैभवशाली चित्रकला के अन्य साक्ष्य है।

कलात्मकता

राजस्थान भारतीय इतिहास के राजनीतिक उथल-पुथल से बहुत समय तक बचा रहा है अतः यह अपनी प्राचीनता, कलात्मकता तथा मौलिकता को बहुत हद तक संजोए रखने में दूसरे जगहों के अपेक्षाकृत ज्यादा सफल रहा है। इसके अलावा यहाँ का शासक वर्ग भी सदैव से कला प्रेमी रहा है। उन्होने राजस्थान को वीरभूमि तथा युद्ध भूमि के अतिरिक्त ठकथा की सरसता से आप्लावित भूमि’ होने का सौभाग्य भी प्रदान किया। इसकी कलात्मकता में अजन्ता शैली का प्रभाव दिखता है जो नि:संदेह प्राचीन तथा व्यापक है। बाद में मुगल शैली का प्रभाव पड़ने से इसे नये रुप में भी स्वीकृति मिल गई।

रंगात्मकता

चटकीले रंगो का प्रयोग राजस्थानी चित्रकला की अपनी विशेषता है। ज्यादातर लाल तथा पीले रंगों का प्रचलन है। ऐसे रंगो का प्रयोग यहाँ के चित्रकथा को एक नया स्वरूप देते है, नई सुन्दरता प्रदान करते है।

विविधता

राजस्थान में चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ अपना अलग पहचान बनाती है। सभी शैलियों की कुछ अपनी विशेषताएँ है जो इन्हे दूसरों से अलग करती है। स्थानीय भिन्नताएँ, विविध जीवन शैली तथा अलग अलग भौगोलिक परिस्थितियाँ इन शैलियों को एक-दूसरे से अलग करती है। लेकिन फिर भी इनमें एक तरह का समन्वय भी देखने को मिलता है।

विषय-वस्तु

इस दृष्टिकोण से राजस्थानी चित्रकला को विशुद्ध रुप से भारतीय चित्रकला कहा जा सकता है। यह भारतीय जन-जीवन के विभिन्न रंगो की वर्षा करता है। विषय-वस्तु की विविधता ने यहाँ की चित्रकला शैलियों को एक उत्कृष्ट स्वरूप प्रदान किया। चित्रकारी के विषय-वस्तु में समय के साथ ही एक क्रमिक परिवर्तन देखने को मिलता है। शुरु के विषयों में नायक-नायिका तथा श्रीकृष्ण के चरित्र-चित्रण की प्रधानता रही लेकिन बाद में यह कला धार्मिक चित्रों के अंकन से उठकर विविध भावों को प्रस्फुटित करती हुई सामाजिक जीवन का प्रतिनिधित्व करने लगी। यहाँ के चित्रों में आर्थिक समृद्धि की चमक के साथ-साथ दोनों की कला है। शिकार के चित्र, हाथियों का युद्ध, नर्तकियों का अंकन, राजसी व्यक्तियों के छवि चित्र, पतंग उड़ाती, कबूतर उड़ाती तथा शिकार करती हुई स्त्रियाँ, होली, पनघट व प्याऊ के दृश्यों के चित्रण में यहाँ के कलाकारों ने पूर्ण सफलता के साथ जीवन के उत्साह तथा उल्लास को दर्शाया है।

बारहमासा के चित्रों में विभिन्न महीनों के आधार पर प्रकृति के बदलते स्वरूप को अंकित कर, सूर्योदय के रक्तिमवर्ण राग भैरव के साथ वीणा लिए नारी हरिण सहित दर्शाकर तथा संगीत का आलम्बन लेकर मेघों का स्वरूप बताकर कलाकार ने अपने संगीत-प्रेम तथा प्रकृति-प्रेम का मानव-रुपों के साथ परिचय दिया है। इन चित्रों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि कथा, साहित्य व संगीत में कोई भिन्न अभिव्यक्ति नहीं है। प्रकृति की गंध, पुरुषों का वीरत्व तथा वहाँ के रंगीन उल्लासपूर्ण संस्कृति अनूठे ढंग से अंकित है।

स्त्री -सुन्दरता

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राजस्थानी चित्रकला में भारतीय नारी को अति सुन्दर रुप में प्रस्तुत किया गया है। कमल की तरह बड़ी-बड़ी आँखे, लहराते हुए बाल, पारदर्शी कपड़ो से झाक रहे बड़े-बड़े स्तन, पतली कमर, लम्बी तथा घुमावदार उंगलियां आदि स्त्री-सुन्दरता को प्रमुखता से इंगित करते है। इन चित्रों से स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त विभिन्न उपलब्ध सोने तथा चाँदी के आभूषण सुन्दरता को चार चाँद लगा देते है। आभूषणों के अलावा उनकी विभिन्न भंगिमाएँ, कार्य-कलाप तथा क्षेत्र विशेष के पहनावे चित्रकला में एक वास्तविकता का आभास देते है।

 

मारवाड़ी शैली

मारवाड़ी शैली

इस शैली का विकास जोधपुर, बीकानेर, नागौर आदि स्थानों में प्रमुखता से हुआ। मेवाड़ की भाँति, उसी काल में मारवाड़ में भी अजन्ता परम्परा की चित्रकला का प्रभाव पड़ा। तारानाथ के अनुसार इस शैली का सम्बन्ध श्रृंगार से है जिसने स्थानीय तथा अजन्ता परम्परा के सामंजस्य द्वारा मारवाड़ शैली को जन्म दिया।

मंडोर के द्वार की कला तथा 687 ई. के शिवनाग द्वारा निर्मित धातु की एक मूर्ति जो अब पिंडवाड़ा में है यह सिद्ध करती है कि चित्रकला तथा मूर्तिकला दोनों में मारवाड़ इस समय तक अच्छी प्रगति कर चुका था। लगभग 1000 ई. से 1500 ई. के बीच इस शैली में अनेक जैन ग्रंथों को चित्रित किया गया। इस युग के कुछ ताड़पत्र, भोजपत्र आदि पर चित्रित कल्प सूत्रों व अन्य ग्रंथों की प्रतियाँ जोधपुर पुस्तक प्रकाश तथा जैसलमेर जैन भंडार में सुरक्षित हैं।

इस काल के पश्चात कुछ समय तक मारवाड़ पर मेवाड़ का राजनीतिक प्रभुत्व रहा। महाराणा मोकल के काल से लेकर राणा सांगा के समय तक मारवाड़ में मेवाड़ी शैली के चित्र बनते रहे। बाद में मालदेव का सैनिक प्रभुत्व (1531-36 ई.) इस प्रभाव को कम कर मारवाड़ शैली को फिर एक स्वतंत्र रुप दिया। यह मालदेव की सैनिक रुचि की अभिव्यक्ति, चोखेला महल, जोधपुर की बल्लियों एवं छत्तों के चित्रों से स्पष्ट है। इसमें ठराम-रावण युद्ध’ तथा सप्तशती’ के अनेक दृश्यों को भी चित्रित किया गया है। चेहरों की बनावट भावपूर्ण दिखायी गई है। 1591 में मारवाड़ शैली में बनी उत्तराध्ययनसूत्र का चित्रण बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित है।

जब मारवाड़ का सम्बन्ध मुगलों से बढ़ा तो मारवाड़ शैली में मुगल शैली के तत्वों की वृद्धि हुई। 1610 ई. में बने भागवत के चित्रण में हम पाते है कि अर्जुन कृष्ण की वेषभूषा मुगली है परन्तु उनके चेहरों की बनावट स्थानीय है। इसी प्रकार गोपियों की वेषभूषा मारवाड़ी ढंग की है परन्तु उसके गले के आभूषण मुगल ढंग के है। औरंगजेब व अजीत सिंह के काल में मुगल विषयों को भी प्रधानता दी जाने लगी। विजय सिंह और मान सिंह के काल में भक्तिरस तथा श्रृंगाररस के चित्र अधिक तैयार किये गये जिसमें ठनाथचरित्र’ ठभागवत ’ , शुकनासिक चरित्र, पंचतंत्र आदि प्रमुख हैं।

इस शैली में लाल तथा पीले रंगो का व्यापक प्रयोग है जो स्थानीय विशेषता है लेकिन बारीक कपड़ों का प्रयोग गुम्बद तथा नोकदार जामा का चित्रण मुगली है। इस शैली में पुरुष व स्त्रियाँ गठीले आकार की रहती है। पुरुषों के गलमुच्छ तथा ऊँची पगड़ी दिखाई जाती है तथा स्त्रियों के वस्त्रों में लाल रंग के फुदने का प्रयोग किया जाता है। 18 वीं सदी से सामाजिक जीवन के हर पहलू के चित्र ज्यादा मिलने लगते है। उदाहरणार्थ पंचतंत्र तथा शुकनासिक चरित्र आदि में कुम्हार, धोबी, मजदूर, लकड़हारा, चिड़ीमार, नाई, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि का चित्रण मिलता है। इन चित्रों में सुनहरे रंगों को प्रयोग मुगल शैली से प्रभावित है।

 

किशनगढ़ शैली

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जोधपुर से वंशीय सम्बन्ध होने तथा जयपुर से निकट होते हुए भी किशनगढ़ में एक स्वतंत्र शैली का विकास हुआ। सुन्दरता की दृष्टि से इस शैली के चित्र विश्व-विख्यात हैं। अन्य स्थानों की भाँति यहाँ भी प्राचीन काल से चित्र बनते रहे। किशनगढ़ राज्य के संस्थापक किशन सिंह कृष्ण के अनन्योपासक थे। इसके पश्चात सहसमल, जगमल व रूपसिंह ने यहाँ शासन किया। मानसिंह व राजसिंह (1706-48) ने यहाँ की कलाशैली के पुष्कल सहयोग दिया। परन्तु किशनगढ़ शैली का समृद्ध काल राजसिंह के पुत्र सामन्त सिंह (1699-1764) से जो नागरीदारा के नाम से अधिक विख्यात हैं, से आरम्भ होता है। नागरीदारा की शैली में वैष्णव धर्म के प्रति श्रद्धा, चित्रकला के प्रति अभिरूचि तथा अपनी प्रेयसी ठवणी-ठणी’ से प्रेम का चित्रण महत्वपूर्ण है। कविहृदय सावन्त सिंह नायिका वणी-ठणी से प्रेरित होकर अपना राज्य छोड़ ठवणी-ठणी’ को साथ लेकर वृन्दावन में आकर बस गये और नागर उपनाम से नागर सम्मुचय की रचना की। नागरीदास की वैष्णव धर्म में इतनी श्रद्धा थी और उनका गायिका वणी ठणी से प्रेम उस कोटि का था कि वे अपने पारस्परिक प्रेम में राधाकृष्ण की अनुभूति करने लगे थे। उन दोनों के चित्र इसी भाव को व्यक्त करते है। चित्रित सुकोमला वणी-ठणी को भारतीय मोनालिसा’ नाम से अभिहित किया गया। काव्यसंग्रह के आधार पर चित्रों के सृजन कर श्रेय नागरी दास के ही समकालीन कलाकार निहालचन्द को है। ठवणी-ठणी’ में कोकिल कंठी नायिका की दीर्घ नासिका, कजरारे नयन, कपोलों पर फैले केशराशि के सात दिखलाया गया है। इस प्रकार इस शैली में हम कला, प्रेम और भक्ति का सर्वांगीण सामंजस्य पाते है। निहालचन्द के अलावा सूरजमल इस समय का प्रमुख चित्रकार था। अन्य शैलियों की तरह इस शैली में भी गीत-गोविन्द’ का चित्रण हुआ।

इस शैली के चेहरे लम्बे, कद लम्बा तथा नाक नुकीली रहती है। नारी नवयौवना, लज्जा से झुका पतली व लम्बी है। धनुषाकार भ्रू-रेखा, खंजन के सदृश नयन तथा गौरवर्ण है। अधर पतले व हिगुली रंग के हैं। हाथ मेहन्दी से रचे तथा महावर से रचे पैर है। नाक में मोती से युक्त नथ पहने, उच्च वक्ष स्थल पर पारदर्शी छपी चुन्नी पहने रुप यौवना सौदर्य की पराकाष्ठा है। नायक पारदर्शक जामे में खेत 9 मूंगिया पगड़ी पहने प्रेम का आहवान से करता है। मानव रुपों के साथ प्रकृति भी सफलता से अंकित है। स्थानीय गोदोला तालाब तथा किशनगढ़ के नगर को दूर से दिखाया जाना इस शैली की अन्य विशेषता है। चित्रों को गुलाबी व हरे छींटदार हाशियों से बाँधा गया है। चित्रों में दिखती वेषभूषा फर्रुखसियर कालीन है। इन विशेषताओं को हम वृक्षों की घनी पत्रावली अट्टालिकाओं तथा दरबारी जीवन की रात की झांकियों, सांझी के चित्रों तथा नागरीदास से सम्बद्ध वृन्दावन के चित्रों में देख सकते है।

 

बीकानेर शैली

बीकानेर शैली

मारवाड़ शैली से सम्बंधित बीकानेर शैली का समृद्ध रुप अनूपसिंह के शासन काल में मिलता है। उस समय के प्रसिद्ध कलाकारों में रामलाल, अजीरजा, हसन आदि के नाम विशेषत रुप से उल्लेखनीय हैं। इस शैली में पंजाब की कलम का प्रभाव भी देखा गया है क्यों कि अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बीकानेर उत्तरी प्रदेशों से प्रभावित रहा है। लेकिन दक्षिण से अपेक्षतया दूर होने के बावजूद यहाँ फव्वारों, दरबार के दिखावों आदि में दक्षिण शैली का प्रभाव मिलता है क्यों कि यहाँ के शासकों की नियुक्ति दक्षिण में बहुत समय तक रही।

 

हाड़ौती शैली/बूंदी व कोटा शैली

हाड़ौती शैली/बूंदी व कोटा शैली

राजस्थानी चित्रकला को बूंदी व कोटा चित्रशैली ने भी अनूठे रंगों से युक्त स्वर्मिण संयोजन प्रदान किया है। प्रारंभिक काल में राजनीतिक कारणों से बूंदी कला पर मेवाड़ शैली का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। इस स्थिति को स्पष्ट व्यक्त करने वाले चित्रों में रागमाला (1625 ई.) तथा भैरवी रागिनी उल्लेखनीय है।

इस शैली का विकास राव सुरजन सिंह (1554-85) के समय के आरम्भ हो जाता है। उन्होने मुगलों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था अतः धीरे-धीरे चित्रकला की पद्धति में एक नया मोड़ आना शुरु हो जाता है। दीपक राग तथा भैरव रागिनी के चित्र राव रतन सिंह (1607-31) के समय में निर्मित हुए। राव रतन सिंह चूंकि जहाँगीर का कृपा पात्र था, तथा उसके बाद राव माधो सिंह के काल में जो शाहजहाँ के प्रभाव में था, चित्र कला के क्षेत्र में भी मुगल प्रभाव निरन्तर बढ़ता गया। चित्रों में बाग, फव्वारे, फूलों की कतार, तारों भरी राते आदि का समावेश मुगल ढंग से किया जाने लगा। भाव सिंह (1658-81) भी काव्य व कला प्रेमी शासक था। राग- रागिनियों का चित्रण इनके समय में हुआ। राजा अनिरुद्ध के समय दक्षिण युद्धों के फलस्वरुप बूंदी शैली में दक्षिण कला के तत्वों का सम्मिलित हुआ। बूंदी शैली के उन्नयन में यहाँ के शासक राव राजाराम सिंह (1821-89) का अभूतपूर्व सहयोग रहा। बूंदी महल के ठछत्र महल’ नामक प्रकोष्ठ में उन्होने भित्ति-चित्रों का निर्माण करवाया।

बूंदी चित्रों में पटोलाक्ष, नुकीली नाक, मोटे गाल, छोटे कद तथा लाल पीले रंग की प्राचुर्यता स्थानीय विशेषताओं का द्योतक है जबकि गुम्बद का प्रयोग और बारीक कपड़ों का अंकन मुगली है। स्त्रियों की वेशगुषा मेवाड़ी शैली की है। वे काले रंग के लहगे व लाल चुनरी में हैं। पुरुषाकृतियाँ नील व गौर वर्ण में हृष्ट-पुष्ट हैं, दाढ़ी व मूँछो से युक्त चेहरा भारी चिबुक वाला है। वास्तुचित्रण प्रकृति के मध्य है। घुमावदार छतरियों व लाल पर्दो से युक्त वातायन बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं। केलों के कुज अन्तराल को समृद्ध करते हैं।

बूंदी चित्रों का वैभव चित्रशाला, बड़े महाराज का महल, दिगम्बर जैन गंदिर, बूंदी कोतवाली, अन्य कई हवेलियों तथा बावड़ियों में बिखरा हुआ है।

कोटा में भी राजनीतिक स्वतंत्रता से नवीन शैली का आरम्भ होता है। वल्लभ सम्प्रदाय जिसका प्रभाव यहाँ 18 वीं शती के प्रारम्भिक चरण में पड़ा, में राधा कृष्ण का अंकन विशेष रुप से हुआ। परन्तु कोटा शैली अपनी स्वतंत्र अस्तित्व न रखकर बूंदी शैली का ही अनुकरण करती है। उदाहरणार्थ जालिम सिंह की हवेली में चित्रित नायिका हूँ-ब-हूँ बूंदी नायिका की नकल कही जा सकती है। आगे चलकर भी कोटा शैली बूंदी शैली से अलग न हो सकी। कोटा के कला प्रेमी शासक उम्मेद सिंह (1771-1820) की शिकार में अत्यधिक रुचि थी अतः उसके काल में शिकार से सम्बद्ध चित्र अधिक निर्मित हुए। आक्रामक चीता व राजा उम्मेद सिंह का शिकार करते हुए चित्र बहुत सजीव है। चित्रों में प्रकृति की सधनता जंगल का भयावह दृश्य उपस्थित करती है। कोटा के उत्तम चित्र देवताजी की हवेली, झालाजी की हवेली व राजमहल से प्राप्त होते हैं।

 

ढूँढ़ाड शैली / जयपुर शैली

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ढूँढ़ाड शैली / जयपुर शैली

जयपुर शैली का विकास आमेर शैली से हुआ। मुगल शैली के प्रभाव का आधिपत्य इस शैली की विशेषता है। जयपुर के महाराजाओं पर मुगल जीवन तथा नीति की छाप विशेष रुप से रही है। अकबर के आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाहोपरान्त सम्बन्धों में और प्रगाढ़ता आयी।

शुरुआती चित्र परम्परा भाऊपुरा रैनबाल की छंवरी, भारमल की छंवरी (कालियादमन, मल्लयोद्धा), आमेर महल व वैराट की छतरियों में भित्तियों पर (वंशी बजाते कृष्ण) तथा कागजों पर प्राप्त होती है। बाद में राजा जयसिंह (1621-67) तथा सवाई जयसिंह (1699-1743) ने इस शैली को प्रश्रय दिया। राजा सवाई जयसिंह ने अपने दरबार में मोहम्मद शाह व साहिबराम चितेरो को प्रश्रय दिया। इन कलाकारों ने सुन्दर व्यक्ति, चित्रों व पशु-पक्षियों की लड़ाई संबंधी अनेक बड़े आकार के चित्र बनाए। सवाई माधो सिंह प्रथम (1750-67) के समय में अलंकरणों में रंग न भरकर मोती, लाख व लकड़ियाँ की मणियों को चिपकाकर चित्रण कार्य हुआ। इसी समय माधोनिवास, सिसोदिनी महल, गलता मंदिर व सिटी पैलेस में सुन्दर भिति चित्रों का निर्माण हुआ। सवाई प्रताप सिंह (1779-1803) जो स्वयं पुष्टि मार्गी कवि थे, के समय में कृष्ण लीला, नायिका भेद, राग-रागिनी, ऋतुवर्णन, भागवतपुराण, दुर्गासप्तशती से सम्बंधित चित्र सृजित हुए। महाराज जगतसिंह के समय में पुण्डरीक हवेली के भित्ति चित्र, विश्व-प्रसिद्ध कृष्ण का गोवर्धन-धारण’ नामक चित्र रासमण्डल के चित्रों का निर्माण हुआ। पोथीखाने के आसावरी रागिणी के चित्र व उसी मंडल के अन्य रागों के चित्रों में स्थानीय शैली की प्रधानता दिखाई देती है। कलाकार ने आसावरी रागिणी के चित्र में शबरी के केशों, उसके अल्प कपड़ों, आभूषणों और चन्दन के वृक्ष के चित्रण में जयपुर शैली की वास्तविकता को निभाया है। इसी तरह पोथीखाना के 17 वीं शताब्दी के ठभागवत’ चित्रों में जो लाहोर के एक खत्री द्वारा तैयार करवाये गये थे, स्थानीय विशेषताओं का अच्छा दिग्दर्शन है। 18 वीं शताब्दी की ठभागवत’ में रंगों की चटक मुगली है। चित्रों में द्वारिका का चित्रण जयपुर नगर की रचना के आधार पर किया गया है और कृष्ण-अर्जुन की वेषभूषा मुगली है। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जयपुर शैली पर पाश्चात्य प्रभाव पड़ना शुरु हो जाता है। जयपुर शैली के चित्र गतिमय रेखाओं से मुक्त, शान्तिप्रदायक वर्ण में अंकित है। आकृतियाँ की भरमार होते हुए भी चेहरे भावयुक्त है। मुगल प्रभाव से चित्रों में छाया, प्रकाश व परदा का मुक्त प्रयोग हुआ है। आकृतियाँ सामान्य कद की हैं। आभूषणों में मुगल प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। स्त्रियों की वेशभूषा में भी मुगल प्रभाव स्पष्ट है। उनके अधोवस्त्र में घेरदार घाघरा ऊपर से बाँधा जाता है और पायजामा तथा छोटी ओढ़नी पहनाई जाती है जो मुगल परम्परा के अनुकूल है। पैरों में पायजेब व जूतियाँ है। चेहरों को चिकनाहट और गौरवर्ण फारसी शैली के अनुकूल है। वह अपने भाव मोटे अधरों से व्यक्त करती है। पुरुष के सिर पर पगड़ी,घेरदार चुन्नटी जामा, ढ़ीली मोरी के पाजामें, पैरों में लम्बी नोक की जूतियाँ हैं।

आज भी जयपुर में हाथी-दाँत पर लघु चित्र व बारह-मासा आदि का चित्रण कर उसे निर्यात किया जाता है। भित्ति चित्रण परंपरा भी अभी अस्तित्व में है।

 

अलवर शैली

अलवर शैली

यह शैली मुगल शैली तथा जयपुर शैली का सम्मिश्रण माना जा सकता है। यह चित्र औरंगजेब के काल से लेकर बाद के मुगल कालीन सम्राटों तथा कम्पनी काल तक प्रचुर संख्या में मिलते हैं। जब औरंगजेब ने अपने दरबार से सभी कलात्मक प्रवृत्तियों का तिरस्कार करना शुरु किया ते राजस्थान की तरफ आने वाले कलाकारों का प्रथम दल अलवर में आ टिका, क्योंकि कि मुगल दरबार से यह निकटतम राज्य था। उस क्षेत्र में मुगल शैली का प्रभाव वैसे तो पहले से ही था, पर इस स्थिति में यह प्रभाव और भी बढ़ गया।

इस शैली में राजपूती वैभव, विलासिता, रामलीला, शिव आदि का अंकन हुआ है। नर्त्तकियों के थिरकन से युक्त चित्र बहुतायक में निर्मित हुए। मुख्य रुप से चित्रण कार्य स्क्रोल व हाथी-दाँत की पट्टियों पर हुआ। कुछ विद्वानों ने उपर्युक्त शैलियों के अतिरिक्त कुछ अन्य शैलियों के भी अस्तित्व को स्वीकार किया है। ये शैलियाँ मुख्य तथा स्थानीय प्रभाव के कारण मुख्य शैलियाँ से कुछ अलग पहचान बनाती है।

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राजस्थानी चित्रकला आमेर शैली उणियारा शैली डूंगरपूर उपशैली देवगढ़ उपशैली

राजस्थानी चित्रकला आमेर शैली उणियारा शैली डूंगरपूर उपशैली देवगढ़ उपशैली

आमेर शैली 
अन्य देशी रियासतों से आमेर का इतिहास अलग रहा है। यहाँ की चित्रकारी में तुर्की तथा मुगल प्रभाव अधिक दिखते है जो इसे एक स्वतंत्र स्थान देती है।

उणियारा शैली
अपनी आँखों की खास बनावट के कारण यह शैली जयपुर शैली से थोड़ी अलग है। इसमें आँखे इस तरह बनाई जाती थी मानो उसे तस्वीर पर जमा कर बनाया गया हो।

डूंगरपूर उपशैली 

इस शैली में पुरुषों के चेहरे मेवाड़ शैली से बिल्कुल भिन्न है और पगड़ी का बन्धेज भी अटपटी से मेल नहीं खाता। स्त्रियों की वेषभूषा में भी बागड़ीपन है।

देवगढ़ उपशैली
देवगढ़ में बडी संख्या में ऐसे चित्र मिले हैं जिनमें मारवाड़ी और मेवाड़ी कलमों का समावेश है। यह भिन्नता विशेषत: भौगोलिक स्थिति के कारण देखी गई है।

 

 

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राजस्थान में खनिज संसाधन Minerals In Rajasthan GK

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

राजस्थान में खनिज संसाधन Minerals In Rajasthan GK

राजस्थान में खनिज संसाधन
खनिज संसाधनों में राजस्थान एक समृद्ध राज्य है क्योंकि यहाँ अनेक प्रकार के खनिज उपलब्ध है। इसी कारण भूगर्भवेत्ताओ ने इसे ‘खनिजों का संग्रहालय‘ कहा है। यहाँ की प्राचीन एवं विविधतापूर्ण भूगर्भिक संरचना ने खनिज संसाधनों में भी विविधता को जन्म दिया है।

भारत में राजस्थान का खनिज उत्पादन में विशेष महत्व है। जेस्पार, गार्ने ट, वोलस्टोनाइट और पन्ना का राजस्थान देश का एकमात्र उत्पादक राज्य है। देश में उत्पादित जस्ता का 99 91प्रतिशत, जिप्सम का 93 प्रतिशत, ऐस्बस्टोस का 89 प्रतिशत, घिया पत्थर (सोप स्टोन) का 85 प्रतिशत, सीसा का 77 प्रतिशत, रॉक फास्फेट का 75 प्रतिशत, फेल्सपार का 70 प्रतिशत, बुल्फेमाइट का 50 प्रतिशत, तांबा का 36 प्रतिशत तथा अभ्रक का 22 प्रतिशत भाग राजस्थान का है। इसके अतिरिक्त इमारती पत्थर विषेषकर संगमरमर के उत्पादन में भी राजस्थान का विशेष महत्व है।

राज्य के खनिजों को तीन श्रेणियो में विभक्त किया जाता है-
1. धात्विक खनिज ; डमजंससपब डपदमतंसेद्ध

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2. अधात्विक खनिज ; छवद दृ उमजंससपब डपदमतंसे द्ध
3. ऊर्जा उत्पादक खनिज ; च्वूमत च्तवकनबपदह डपदमतंसेद्ध
1. धात्विक खनिज: राजस्थान के धात्विक खनिजों में लोहा-अयस्क, मैंगनीज, तांबा, सीसा, जस्ता, चांदी, बैरेलियम, टंगस्टन तथा केडमियम प्रमुख है। राज्य के धात्विक

राजस्थान के प्रमुख धात्विक खनिज
राज्य के प्रमुख धात्विक खनिजों के उत्पादन क्षेत्रों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- लौह अयस्क – लौह अयस्क में राजस्थान महत्वपूर्ण नहीं है। राज्य में जयपुर, सीकर के कुछ क्षेत्रों में बूंदी से भीलवाड़ा, कांकरोली, उदयपुर, डूँगरपुर होती हुई बांसवाड़ा की पेटी में लोहा अयस्क के भण्डार है, किन्तु राज्य में व्यापारिक स्तर पर इसका खनन लाभकारी नहीं है। मैंगनीज – राजस्थान में बांसवाड़ा जिले के लीलवानी, नरडिया, सिवोनिया, कालाखूंटा, सागवा, इटाला, काचला, तलवाड़ा आदि में निकाला जाता है। जयपुर, उदयपुर, और सवाई माधोपुर में भी मैंगनीज पाया जाता है। सीसा और जस्ता – राजस्थान सीसा-जस्ता उत्पादन में अग्रणी है। सीसा-जस्ता उत्पादक क्षेत्रोंमें चाँदी भी मिलती है। राज्य के प्रमुख सीसा-जस्ता के साथ ही चाँदी भी मिलती है। राज्य के प्रमुख सीसा-जस्ता उत्पादक क्षेत्र दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में उदयपुर, राजसमंद, डँूगरपुर, बाँसवाड़ा और भीलवाड़ा में स्थित है। प्रमुख जस्ता-सीसा उत्पादक क्षेत्र है- जावर, राजपुरा-दरीबा एवं आगूचा-गुलाबपुरा।

ताँबा- ताँबा राजस्थान के कई स्थानों पर मिलता है, इनमें झुंझुंनू जिले में खेतड़ी, सिंघाना तथा अलवर जिले में खो-दरीबा क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। खेतडी क्षेत्र में लगभग 8 करोड़ टन ताँबे के भण्डार का अनुमान है। अलवर में खो-दरीबा के अतिरिक्त थानागाजी, कुषलगढ़, सेनपरी तथा भगत का बास में भी ताँबे की खाने मिली है।

टंगस्टन- राज्य में डेगाना (नागौर जिला) क्षेत्र में टंगस्टन के भण्डार है। डेगाना स्थित खान देश में एक मात्र खान है, जहाँ टंगस्टन का उत्पादन हो रहा है। चाँदी- राजस्थान में सीसा-जस्ता के साथ मिश्रित रूप में चाँदी का उत्पादन होता है। उदयपुर तथा भीलवाड़ा जिलो की सीसा-जस्ता खदानो से चाँदी प्राप्त होती है, वार्षिक उत्पादन लगभग तीस हजार किलोग्राम है।

अधात्विक खनिज
राजस्थान अधात्विक खनिजों के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इन्हे निम्न श्रेणियो में विभक्त किया जा सकता है-

उर्वरक खनिज- जिप्सम, रॉक फास्फेट, पाईराइट
बहुमूल्य पत्थर- पन्ना, तामड़ा, हीरा
आणविक एवं विद्युत उपयोगी- अभ्रक, यूरेनियम
ऊष्मारोधी, उच्चताप सहनीय एवं मृतिका खनिज- एस्बेटास, फेल्सपार, सिलिका सेण्ड, क्वाटर्टज,
मेगनेसाइट, वरमेकुलेट, चीनी मिट्टी, डोलोमाइट आदि।
रासायनिक खनिज- नमक, बेराइट, ग्रेनाइट, स्लेट आदि।
अन्य खनिज- घीया पत्थर, केल्साइट, स्टेलाइट आदि।

राजस्थान के प्रमुख अधात्विक खनिज
प्रमुख अधात्विक खनिजों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है-
ऐस्बेस्टॉस- राजस्थान ऐस्बेस्टास का प्रमुख उत्पादक है और भारत का 90 प्रतिशत भाग उत्पादित करता है। ऐस्बेस्टास के प्रमुख उत्पादक जिले उदयपुर, डूँगरपुर है तथा अजमेर, उदयपुर तथा जोधपुर में सीमित उत्पादन होता है।
फेल्सपार- राजस्थान भारत का 60 प्रतिशत फेल्सपार का उत्पादन करता है। राज्य का अधिकांष फेल्सपार अजमेर जिले से प्राप्त होता है। जयपुर, पाली, टोंक, सीकर, उदयपुर, और बाँसवाड़ा में भी सीमित मात्रा में फेल्सपार मिलता है।

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अभ्रक- राजस्थान में अभ्रक उत्पादन की तीन पेटियाँ-जयपुर-टोंक पेटी, भीलवाड़ा-उदयपुर पेटी और अन्य में सीकर में तोरावाटी तथा अजमेर, राजसमंद, अलवर तथा पाली जिलो में हैं।
जिप्सम- राजस्थान भारत का 90 प्रतिशत जिप्सम उत्पादित करता है। इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रहै- बीकानेर, हनुमानगढ़, चूरू क्षेत्र, नागौर क्षेत्र, जैसलमेर-बाड़मेर, पाली- जोधपुर क्षेत्र हैं।
रॉक फास्फेट- राजस्थान देश का लगभग 56 प्रतिशत रॉक फास्फेट उत्पादित करता है। इसके उत्पादक जिले उदयपुर, बाँसवाड़ा, जैसलमेर और जयपुर है।
डोलोमाइट- राज्य के बाँसवाड़ा, उदयपुर और राजसमंद जिलो में प्रमुखता से तथा अलवर, झुंझुनूं, सीकर, भीलवाड़ा, नागौर जिलो में सीमित उत्पादन होता है।
घिया पत्थर- राजस्थान में देश का 90 प्रतिशत घिया पत्थर उत्पादित होता है। राज्य में राजसमंद, उदयपुर, दौसा, अजमेर, अलवर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, करौली एवं भीलवाड़ा जिलो से घिया पत्थर का उत्पादन होता है।
इमारती पत्थर- राजस्थान इमारती पत्थर के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का संगमरमर प्रसिद्ध है। इसके लिए मकराना भारत भर में प्रसिद्ध है। संगमरमर के अन्य उत्पादक क्षेत्र किशनगढ़, अलवर, सीकर, उदयपुर,राजसमंद, बाँसवाड़ा में है। जालौर, पाली, बूंदी, अजमेर में भी संगमरमर सीमित खनन हो रहा है।

चूना पत्थर सिराही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, कोटा, जैसलमेर, बाँसवाड़ा, अजमेर, अलवर, जयपुर, नागौर और जोधपुर जिलो में मिलता है। सेण्ड स्टोन अर्थात बालुआ पत्थर जोधपुर, कोटा, बूंदी, भीलवाड़ा, जिलो में प्रमुखता से मिलता है। अन्य इमारती पत्थरो में ग्रेनाइट, सिस्ट, क्वार्टजाइट, स्लेट, कॉजला भी राजस्थान में मिलता है।

बहुमूल्य पत्थर
राजस्थान बहुमूल्य पत्थरों के उत्पादन के लिये भी प्रसिद्ध है। यहाँ पन्ना और तामड़ा प्रमुख रूप से उत्पादित होते हैं। पन्ना एक सुन्दर हरे रंग का चमकीला रत्न होता है। पन्ना मुख्यत: उदयपुर जिले के उत्तर में एक पेटी में मिलता है जिसका विस्तार देवगढ़ से कॉकरोली, राजसमंद जिले तक है। अजमेर के राजगढ़ से क्षेत्र में भी पन्ना मिलता है। तामड़ा भी एक बहुमूल्य पत्थर है जो लाल, गुलाबी रंग का पारदर्षी रत्न है। राजस्थान में टांेक, अजमेर, भीलवाड़ा, सीकर तथा चित्तोड़गढ़ में तामड़ा निकाला जाता है। तामड़ा उत्पादन में राजस्थान का एकाधिकार है। अन्य अधात्विक खनिजों में राजस्थान में केल्साइट, बेण्टोनाइट, नमक, पाइराइट आदि का उत्पादन होता है। ऊर्जा संसाधनों में कोयला बीकानेर के पलाना में और खनिज तैल बाड़मेर, जैसलमेर में निकाला जाता है। इनका विवरण अगले अध्याय में किया जायेगा।

खनिज संरक्षण
राजस्थान में जिस गति से खनिजों का शोषण हो रहा है, वह दिन दूर नहीं, जब ये खनिज समाप्त हो जाएंगे। खनिज एक प्राकृतिक सम्पदा है, यदि इसे अनियन्त्रित और अनियोजित तरीके से निकाला गया तो यह समाप्त हो सकता है। जब एक बार खनिज समाप्त हो जाते है तो इन्हे पुन: प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि लोखो वर्षों की प्रक्रिया से खनिज अस्तित्व में आते है। अतः खनिजों का संरक्षण अति आवश्यक है। खनिज संरक्षण हेतु प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) खनिज का बहुउद्देषीय उपयोग
(2) उत्खतित खनिजों से अधिकतम धातु प्राप्त करना
(3) खनिजों के विकल्पों की खोज
(4) खनिजों का नियोजित खनन
(5) धातु का बारम्बर प्रयोग
(6) गहराई तक खनन
(7) भूगर्भिक सर्वेक्षण एवं दूर संवेदन तकनीक से नए खनिजों की खोज
(8) खनिज खनन पर सरकारी नियन्त्रण
(9) उचित खनिज प्रबन्धन के अन्तर्गत निम्न कार्य किये जाने आवश्यक हैं –
सर्वेक्षण
खनिज उपयोग प्राथ्मिकता का निर्धारण

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अनियन्त्रित खनन पर रोक
खनन में उन्नत तकनीक का प्रयोग
सामरिक एवं अल्प उपलब्ध खनिजों के उपयोग पर नियन्त्रण
दीर्घकालीन योजना द्वारा खनिजों के उचित उपयोग
आधुनिक तकनीको के माध्यम से नवीन खनिज भण्डारो का पता लगाना
खनिज खनन से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव न हो इसके लिये आवश्यक व्यवस्था करना आदि।

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राजस्थान में कृषि Agriculture in Rajasthan GK

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

राजस्थान में कृषि Agriculture in Rajasthan GK

राजस्थान में कृषि
राजस्थान का कुल क्षेत्रफल 3 लाख 42 हजार 2 सौ 39 वर्ग कि.मी. है। जो की देश का 10.41 प्रतिशत है। राजस्थान में देश का 11 प्रतिशत क्षेत्र कृषि योग्य भूमि है और राज्य में 50 प्रतिशत सकल सिंचित क्षेत्र है जबकि 30 प्रतिशत शुद्ध सिंचित क्षेत्र है।

राजस्थान का 60 प्रतिशत क्षेत्र मरूस्थल और 10 प्रतिशत क्षेत्र पर्वतीय है। अतः कृषि कार्य संपन्न नहीं हो पाता है और मरूस्थलीय भूमि सिंचाई के साधनों का अभाव पाया जाता है। अधिकांश खेती राज्य में वर्षा पर निर्भर होने के कारण राज्य में कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है।

रबी की फसल      अक्टूबर, नवम्बर व जनवरी -फरवरी
खरीफ की फसल      जून, जुलाई व सितम्बर-अक्टूबर

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जायद की फसल      मार्च-अप्रैल व जून-जुलाई
खरीफ को उनालु कहा जाता है।

रबी को स्यालु/सावणु कहा जाता है।

रबी – गेहूं जौ, चना, सरसो, मसूर, मटर, अलसी, तारामिरा, सूरजमुखी।

खरीफ – बाजरा, ज्वार, मूंगफली, कपास, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, चांवल आदि।

जायद – खरबूजे, तरबूज ककडी

फसलों का प्रारूप

खाद्यान्न फसले (57 प्रतिशत)       नकदी/व्यापारिक फसले (43 प्रतिशत)
गेहूं,जो,ज्वार, मक्का      गन्ना, कपास, तम्बाकू
बाजरा,चावंल,दहलने      तिलहन, सरसों, राई
मोड,मंूग,अरहर उड्द      तारामिरा, अरण्डी, मूंग
मसूर चांवल इत्यादि      तिल, सोयाबीन, (जोजोबा)
नोट- राज्य में कृषि जाति का औसत आकार 3.96 हैक्टेयर है। जो देश में सर्वाधिक है। कुल क्षेत्र का 2/3 भाग (65 प्रतिशत) खरीफ के मौसम में बोया जाता है।

खाद्यान्न फसले
1. गेहूं

राजस्थान में सर्वाधिक खाया जाने वाला और सर्वाधिक उत्पन्न होने वाला खाद्यान्न गेहंू है। देश में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर-प्रदेश में होता है। राजस्थान का गेहूं उत्पादन में देश में चौथा स्थान है। राजस्थान का पूर्वी भाग गेहूं उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। जबकि श्रीगंगानगर जिला राज्य में गेहंू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। गेहंू के अधिक उत्पादन के कारण गंगानगर को राज्य का अन्न भंण्डार और कमाऊपूत कहा जाता है। राजस्थान में गेहूं की प्रमुख किस्में सोना-कल्याण, सोनेरा, शरबती, कोहिनूर, और मैक्सिन बोयी जाती है।

2.जौ

देश में जौ का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। यू.पी. के पश्चात राजस्थान जौ उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र में जौ सर्वाधिक होता है और जयपुर जिला जौ उत्पादन में राज्य का प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में जौ कि प्रमुख किस्मों में ज्योति राजकिरण और आर.एस.-6 प्रमुख है। जौ माल्ट बनाने में उपयोगी है।

3.ज्वार (सोरगम/गरीब की रोटी)

ज्वार को खाद्यान्न के रूप में प्रयोग किया जाता है। देश में सर्वाधिक ज्वार महाराष्ट्र में होता है। जबकि राजस्थान में देश में चौथा स्थान रखता है। राजस्थान में मध्य भाग में ज्वार का सर्वाधिक उत्पादन होता है। जबकि अजमेर जिला ज्वार उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। ज्वार की राज्य में प्रमुख किस्म पी.वी.-96 है।

राजस्थान में ज्वार अनुसंधान केन्द्र वल्लभनगर उदयपुर में स्थापित किया गया है।

4.मक्का

दक्षिणी राजस्थान का प्रमुख खाद्यान्न मक्का है। देश में सर्वाधिक मक्का का उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। जबकि राजस्थान का मक्का के उत्पादन में देश में आठवां स्थान है। राजस्थान का चितौड़गढ़ जिला मक्का उत्पादन में प्रथम

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स्थान पर है। राजस्थान में मक्के की डब्ल्यू -126 किस्म बोई जाती है जबकि कृषि अनुसंधान केन्द्र बांसवाडा द्वारा मक्का की माही कंचन व माही घवल किस्म तैयार की गई है।

5.चांवल

देश में सर्वाधिक खाया जाने वाला खाद्यान्न चावंल है। देश में इसका सर्वाधिक उत्पादन पश्चिमी बंगाल में है। राजस्थान में चावंल का उत्पादन नाममात्र का आधा प्रतिशत से भी कम है। राजस्थान में हुनमानगढ़ जिले के घग्घर नदी बहाव क्षेत्र (नाली बैल्ट) में “गरडा वासमती” नामक चावंल उत्पन्न किया जाता है। जबकि कृषि अनुसंधान केन्द्र बासवांडा ने चावंल की माही सुगंधा किस्म विकसित की है।

चांवन के लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सीयस तापमान व 200 सेंटी मीटर वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। जो कि राजस्थान में उपलब्ध नहीं है। अतः यहां जापानी पद्वति से चांवन उत्पन्न किया जाता है। देश में प्रति हैक्टेयर अधिक उत्पादन में पंजाब राज्य का प्रथम स्थान रखता है।

6. चना

यह एक उष्णकटिबधिय पौधा है। इसके लिए मिट्टी की आवश्यकता होती है। देश में उत्तर-प्रदेश के पश्चात राजस्थान चना उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान में चुरू जिला चने के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। गेहूं और जो के साथ चने को बोने पर उसे गोचनी या बेझड़ कहा जाता है।

7.दलहन

चने के पश्चात विभिन्न प्रकार की दालो में मोठ का प्रथम स्थान राजस्थान का पश्चिमी भाग दालों में अग्रणी स्थान रखता है। राजस्थान का नागौर जिला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में कुल कृषि भूमि का 18 प्रतिशत दाले बोयी जाती है। उड्द की दाल भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक है। पौधों को नाइट्रोजन नाइट्रेट के रूप में प्राप्त होती है। जबकि राइजोबियम नामक बैक्टीरिया नाइट्रोजन को नाइट्रेट के रूप में परिवर्तित करता है।

8.बाजरा

देश में सर्वाधिक बाजरे का उत्पादन राजस्थान में होता है। राजस्थान में सर्वाधिक बोया जाने वाला खाद्यान्न बाजरा है। राजस्थान का पश्चिमी भाग बाजरा उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है जबकि जयपुर जिला बाजरा उत्पादन में प्रथम स्थान पर हैं राजस्थान में बाजरे की साधारण किस्म के अतिरिक्त Raj-171 प्रमुख किस्म है। राजस्थान के पूर्वी भाग में संकर बाजरा होता है। उसे सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। राजस्थान में बाजरा अनुसंधान केन्द्र बाडमेर में स्थित है।

नगदी/व्यापारिक फसले
9.गन्ना

भारतीय मूल का पौधा (Indian Origine) है। अर्थात् विश्व में सर्वप्रथम गन्ने का उत्पादन भारत में ही हुआ। दक्षिणी भारत में सर्वप्रथम गन्ने की खेती आरम्भ हुई। वर्तमान में विश्व में गन्ने का सर्वाधिक उत्पादन भारत में ही होता है। भारत में उत्तर प्रदेश राज्य गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान पर है (देश का 40 प्रतिशत)। राजस्थान में गन्ने का उत्पादन नाम मात्र का होता है (0.5 प्रतिशत)। राजस्थान में बूंदी जिला गन्ना उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। गन्ने का कम उत्पादन होने के कारण राजस्थान में मात्र तीन शुगर मिले है।

1.      दा मेवाड शुगर मिल      भूपाल सागर (चित्तौड़) 1932 निजी
2.      गंगानगर शुगर मिल      गंगानगर (1937 निजी -1956 में सार्वजनिक)
3.      द केशोरायपाटन शुगर मिल      केशोरायपाटन (बूंदी) 1965 सहकारी
10.कपास

कपास देशी कपासअमेरिकन कपासमानवी कपास गंगानगरगंगानगरकोट (हडौती क्षेत्र) उदयपुरहनुमानगढ़बू चित्तौडगढ़बांसवाड बारां
कपास भारतीय मूल का पौधा है। विश्व में सर्वप्रथम कपास का उत्पादन सिंधु घाटी सभ्यता में हुआ। वर्तमान में विश्व में सर्वाधिक कपास भारत में उत्पन्न होती है। जबकी भारत में गुजरात राज्य कपास में प्रथम स्थान रखता है। राजस्थान देश में चौथे स्थान पर है। राजस्थान में कपास तीन प्रकार की होती है।

वर्तमान में राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला कपास उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। जबकि जैसलमेर व चरू में कपास का उत्पादन नाम मात्र का होता है। कपास को “बणीया” कहा जाता है। कपास से बिनौला निकाला जाता है उससे खल बनाई जाती है। कपास की एक गांठ 170 किलो की होती है।

11.तम्बाकू

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भारतीय मूल का पौधा नहीं। पूर्तगाली 1508 ईं. में इसको भारत लेकर आये थे। मुगल शासक जहांगीर ने सर्वप्रथम भारत में 1608 ई. में इसकी खेती की शुरूआत की किन्तु कुछ समय पश्चात इसके जब दुशपरीणाम आने लगे तब जहांगीर ने ही इसे बंद करवा दिया। वर्तमान में भारत का आंधप्रदेश राज्य तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में पूर्व भाग में तम्बाकू का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अलवर जिला तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में तम्बाकू की दो किस्में बोयी जाती है।

(अ) निकोटिना टेबुकम

(ब) निकोटिना रास्टिका

12.तिलहन (तिलहन विकास कार्यक्रम 1984-85)

सरसो, राई, तारामीरा, तिल, मूंगफली, अरण्डी, सोयाबीन, होहोबा राजस्थान में उत्पन्न होने वाली प्रमुख तिलहन फसले है। तिलहन उत्पादन में राजस्थान का तीसरा स्थान है। तिलहन उत्पादन में उत्तर प्रदेश प्रथम है। किन्तु सरसों व राई के उत्पादन में राजस्थान प्रथम स्थान रखता है।

सरसों

राजस्थान का भरतपुर जिला सरसों के उत्पादन में राज्य में प्रथम स्थान पर है। केन्द्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र सेवर भरतपुर की स्थापना 1983 में की गयी।

मूंगफली

विश्व में मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत में होता है। भारत में गुजरात राज्य मूंगफली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। राजस्थान का देश में मंूगफली के उत्पादन में चौथा स्थान है। राज्य का जयपुर जिला मूंगफली के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। बीकानेर का लूणकरणसर क्षेत्र उत्तम मंूगफली के लिए प्रसिद्ध है अतः उसे ? ? राजस्थान का राजकोट भी कहा जाता है।

तिल सोयाबीन अरण्डी

राज्य में तिल पाली जिले में अरण्डी जालौर जिले में, सोयाबीन झालावाड़ में उत्पन्न होती है। सोयाबीन राजस्थान राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग (हडौती) में होती है। इसमें सर्वाधिक प्रोटीन होती है। भारत में सर्वाधिक सोयाबीन मध्यप्रदेश में होता है।

हो होबा (जोजोबा)

यह एक प्रकार का तिलहन है इसे भारत में इजराइल से मगाया गया। इसका जन्म स्थान एरिजोना का मरूस्थल है। भारत में इसकी खेती की शुरूआत सर्वप्रथम सी.ए.जे.आर.आई संस्थान जोधपुर द्वारा की गयी। इसकी खेती इन क्षेत्रों में की जाती है जहां सिंचाई के साधनों का अभाव पाया जाता है। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, बडी-2 मशीनरियो व हवाई जहाजों में लुब्रिकेण्टस के रूप में किया जाता है।

राजस्थान में होहोबा के तीन फार्म है –

ढण्ड (जयपुर)
फतेहपुर (सीकर) सहकारी
बीकानेर (नीजी)
CAZRI (काजरी)

आस्ट्रेलिया व यूनेस्को के सहयोग से TITUTE (केन्द्रिय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केन्द्र) स्थापना 1959 इसका मुख्यालय जोधपुर में है। काजरी का प्रमुख कार्य मरूस्थलीय प्रसार को रोकना, वृक्षा रोपण को बढावा देना और मरूस्थलीय क्षेत्र की समस्याओं का निवारण करना है। इसके 5 उपकेन्द्र – बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज, लदाख।

नोट- 1998 में राजस्थान के सभी जिलों में काजरी संस्थान में ही विज्ञान सेवा केन्द्रो की स्थापना की गयी।

उत्पादन क्रान्तियां

1      हरित क्रांति      खाद्यान्न
2      श्वेत क्रांति      दुग्ध
3      पीली क्रांति      तिलहन (सरसों)
4      नीली क्रांति      मत्स्य
5      गुलाबी क्रांति      झींगा
6      काली (कृष्ण)       पेट्रोलियम (पैट्रोल, डीजल, केरोसीन)
7      लाल क्रांति      टमाटर
8      सुनहरी क्रांति      देशी अण्डा
9      रजत क्रांति      फार्मी अण्डा
10      भूरी क्रांति      खाद्य प्रसंस्करण
11      बादामी क्रांति      मसाला उत्पादन
12      स्लेटी क्रांति      सीमेण्ट
13      गोल क्रांति      आलू
14      इन्द्रधनुष क्रांति      सभी कृषि उत्पादन
खस का उत्पादन

सवाई माधोपुर, भरतपुर, टोंक

मसाला उत्पादन

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विश्व में मसाला उत्पादन में भारत प्रथम स्थान रखता है। भारत में राजस्थान मसाला उत्पादन में प्रथम है। किन्तु गरम मसालों के लिए केरल राज्य प्रथम स्थान पर है। केरल को भारत का स्पाइस पार्क भी कहा जाता है। राज्य में दक्षिण-पूर्व का बारां जिला राज्य में मसाला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान का प्रथम मसाला पार्क -झालावाड़ में है।

मसाले      सर्वाधिक उत्पादक जिला
मिर्च      जोधुपर
धनियां      बारां
सोंफ      कोटा
जिरा, इसबगोल      जालौर
हल्दी, अदरक      उदयपुर
मैथी      नागौर
लहसून      चित्तैडगढ़

फल उत्पादन      गंगानगर
फल      सर्वाधिक उत्पादक जिला
अंगूर      श्री गंगानगर
कीन्नू      श्री गंगानगर
माल्टा      श्री गंगानगर
मौसमी      श्री गंगानगर
संतरा      झालावाड़ (राजस्थान का नागपुर)
चीकू      सिरोही
सेब      माउन्ट आबू (सिरोही)
नींबू      धौलपुर
आम      भरतपुर
केला      बांसवाडा
नाशपति      जयपुर
मतीरा      टोंक/बीकानेर
पपीता/खरबूजा      टोंक
केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान -दुर्गापुरा (जयपुर)

यांत्रिक कृषि फार्म

सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म – गंगानगर

क्षेत्रफल -12410 वर्ग हैक्टेयर

स्थापना- 15 अगस्त 1956

एशिया का सबसे बड़ा यांत्रिक कृषि फार्म है। सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित किया। इसका मुख्य कार्य कृषि क्षेत्र में यंत्रों को बढ़ावा देना, अच्छी नस्ल के पशुओं का कृषि कार्य में उपयोग करना है।

जैतसर यांत्रिक कृषि फार्म – श्रीगंगानगर

स्थापना -26 जनवरी 1962 (कनाडा)

क्षेत्रफल -12140 वर्ग हेक्टेयर

एशिया का दूसरा सबसे बडा यांत्रिक फार्म

कृषि से संबंधित योजनाऐं

1.भागीरथ योजना

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कृषि संबंधित इस योजना के अन्तर्गत स्वयं ही खेती में ऐसे लक्ष्य निर्धारित करता है। जो कठिन होता हैं और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रयत्न भी करते है। इसके लिए जयपुर में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

2.निर्मल ग्राम योजना

गांवो में कचरे का उपयोग कर कम्पोस खाद तैयार करने हेतु शुरू की गई।

राजस्थान की मंडिया

जीरा मंडी      मेडता सिटी (नागौर)
सतरा मंडी      भवानी मंडी (झालावाड)
कीन्नू व माल्टा मंडी      गंगानगर
प्याज मंडी      अलवर
अमरूद मंडी      सवाई माधोपुर
ईसबगोल (घोडाजीरा) मंडी      भीनमाल (जालौर)
मूंगफली मंडी      बीकानेर
धनिया मंडी      रामगंज (कोटा)
फूल मंडी      अजमेर
मेहन्दी मंडी      सोजत (पाली)
लहसून मंडी      छीपा बाडौद (बारां)
अखगंधा मंडी      झालरापाटन (झालावाड)
टमाटर मंडी      बस्सी (जयपुर)
मिर्च मंडी      टोंक
मटर (बसेडी)       बसेड़ी (जयपुर)
टिण्डा मंडी      शाहपुरा (जयपुर)
सोनामुखी मंडी      सोजत (पाली)
आंवला मंडी      चोमू (जयपुर)
राजस्थान में प्रथम निजी क्षेत्र की कृषि मण्डी कैथून (कोटा) में आस्ट्रेलिया की ए.डब्लू.पी. कंपनी द्वारा स्थापित की गई है।

राजस्थान में सर्वाधिक गुलाब का उत्पादन पुष्कर (अजमेर) में होता है। वहां का ROSE INDIA गुलाब अत्यधिक प्रसिद्ध है। राजस्थान में चेती या दशमक गुलाब की खेती खमनौगर (राजसमंद) में होती है।

रतनजोत- सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा

अफीम- चितौड़गढ़, कोटा, झालावाड

सोयाबीन – झालावाड़, कोटा, बारां

हरित क्रांति

नारमन. ए. बोरलोग नामक कृषि वैज्ञानिक ने शुरू की 1966 में भारत में इसकी शुरूआत एम.एस. स्वामीनाथन ने की।

श्वेत क्रांति

भारत में इसकी शुरूआत वर्गीज कुरियन द्वारा 1970 में की गई। इस क्रांति को “ऑपरेशन फ्लड” भी कहते है। डॉ वर्गीज कुरियन अमूल डेयरी के संस्थापक भी है। जिसका मुख्यालय गुजरात को आनंद जिला है।

राज्य में संविदा खेती 11 जून 2004 में प्रारम्भ हुई

जालौर -समग्र मादक पदार्थो उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है।

कृषि के प्रकार

श्शुष्क कृषि
सिचित कृषि
मिश्रित कृषि
मिश्रित खेती

1.शुष्क कृषि

ऐसी कृषि जो रेगिस्तानी भागों में जहां सिंचाई का अभाव हो शुष्क कृषि की जाती है। इसमें भूमि में नमी का संरक्षण किया जात है।

(अ) फ्वारा पद्धति

(ब) ड्रिप सिस्टम

इजराइल के सहयोग से। शुष्क कृषि में इसका उपयोग किया जाता है।

2.सिचित कृषि

जहां सिंचाई के साधन पूर्णतया उपलब्ध है। उन फसलों को बोया जाता है जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

3.मिश्रित कृषि

जब कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है तो उसे मिश्रित कृषि कहा जाता है।

4.मिश्रित खेती

जब दो या दो से अधिक फसले एक साथ बोई जाये तो उसे मिश्रित खेती कहते है।

5.झूमिग कृषि

इस प्रकार की कृषि में वृक्षों को जलाकर उसकी राख को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में इस प्रकार की खेती को वालरा कहा जाता है। भील जनजाति द्वारा पहाडी क्षेत्रों में इसे “चिमाता” व मैदानी में “दजिया” कहा जाता है। इस प्रकार की खेती से पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान पहुंचता है। राजस्थान में उदयपुर, डूंगरपुर, बारां में वालरा कृषि की जाती है।


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