राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

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राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

राष्ट्रीय एकता पर निबंध (Rashtriya Ekta Essay In Hindi) :

भूमिका : भारत एक विशाल देश है। इसकी भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति ऐसी है कि इस एक देश में अनेक देशों की कल्पना को सहज रूप से किया जा सकता है। इस देश में 6 ऋतुओं का एक अद्भुत क्रम है। देश में एक ही समय में एक क्षेत्र में गर्मी का वतावरण होता है तो एक तरफ सर्दी का वातावरण होता है। एक क्षेत्र में हरियाली होती है तो दुसरे क्षेत्र में दूर-दूर तक रेती के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता है।

जनसंख्या की दृष्टि से भारत का संसार में दूसरा स्थान है। भारत में हिन्दू , सिक्ख , ईसाई , मुसलमान , पारसी , बौद्ध धर्म आदि सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग रहते हैं। सभी लोग भारत को राष्ट्र कहने में गौरव का अनुभव करते हैं। भारत देश किसी भी एक धर्म , जाति , वंश या संप्रदाय का देश नहीं है। भारत में आचार-विचार , रहन-सहन , भाषा और धर्म आदि सभी विभिन्नताओं का होना स्वभाविक है।

इन विभिन्नताओं में अनेकता में एकता के दर्शन भारत की सर्वप्रमुख विशेषता है। इसी विशेषता और समन्वय की भावना के कारण भारतीय संस्कृति अजर-अमर बन गयी है। जब किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए बहुत से लोग मिलकर काम करते हैं तो उसे संगठन कहते हैं। संगठन ही सभी शक्तियों की जड़ होता है। एकता एक महान शक्ति है इसी के बल पर अनेक राष्ट्रों का निर्माण हुआ था। सभी लोगों के पूजा स्थल व उपासना विधि अलग होते हुए भी सभी लोग एक ही ईश्वर की पूजा करते हैं।

सभी में एक भारतीयता की भावना व राष्ट्रीय एकता है। इसी तरह भारत कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से काठियावाड़ तक एक व्यापक अखण्ड भारत है जिसके पश्चिम में पाकिस्तान, पूर्व में बर्मा , बांग्लादेश , उत्तर में नगाधिराज हिमालय व दक्षिण में हिन्द महासागर है। उक्त सीमाओं से घिरा हुआ यह देश हमारा भारत है। इसका कहीं से भी कोई खण्ड अलग न हो , इसको अखण्ड भारत कहते हैं। देश की एकता व अखंडता हमेशा बनी रहे यह सभी भारतवासियों का कर्तव्य होता है।

एकता को खतरा : अंग्रेजों ने भारत में एकछत्र राज्य करने के लिए सबसे पहले यहाँ की एकता पर प्रहार किया क्योंकि कोई भी शासक अपना प्रभुत्व जमाने के लिए जनता में एकता नहीं चाहता है। इसलिए अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की प्रबल नीति अपनाई जिसके कारण वे सैंकड़ों वर्षों तक भारत के सशक्त शासक बने रहे।

जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में धर्मों व जातियों तथा वर्गों के आधार पर कलह , दंगे भडकते रहते हैं। वे कभी किसी एक धर्म के लोगों को संरक्षण देते और दूसरों को तंग करते तो कभी दुसरे धर्मों के लोगों को प्रोत्साहित करते थे जिससे जनता परस्पर लडती रहे। फिर भारत के स्वतंत्र होने पर अंग्रेज भारत की अखंडता समाप्त करके ही गये थे।

भारत का विभाजन होना अंग्रेजों की नीति थी। इस तरह से उन्होंने हमारी एकता और अखण्डता को तोडा था। आज के समय में भारत में समय-समय पर साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों से लड़ते रहते हैं। देश में कई जगहों पर वर्ग संघर्ष छिड़ा रहता है। स्वर्ण और हरिजनों के कलह भी देखने को मिलते हैं।

आज के समय में आरक्षण और अनारक्षण पर लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है। भाषा के आधार पर भी कई जगहों पर झगड़ा होता रहता है। दक्षिण में हिंदी के विरोध में सरकारी सम्पत्ति को क्षति पहुंचाई जाती है। उत्तर भारत में अंग्रेजी का विरोध प्रबल है। कहीं पर उर्दू का विरोध हुआ था तो कहीं पर हिंदी का विरोध हुआ।

इस तरह से ही राष्ट्रिय एकता खतरे में पड़ी थी। राष्ट्रिय अखण्डता भी विगत दशकों से संकट में है। कुछ आतंकवादी अलग जगह चाहते हैं। कश्मीर के आतंकवादी अलग कश्मीर की मांग कर रहे हैं। कुछ समय से अब पुरे भारत में हिन्दू आतंकवाद ने भी अपने पैर फैलाकर हमारी सरकार को परेशान कर दिया है। इस तरह कतिपय स्वार्थी तत्व भारत को छिन्न-छिन्न कर देना चाहते हैं।

भेदभाव के कारण : देश और राष्ट्र में अंतर होता है। देश का संबंध सीमाओं से होता है क्योंकि देश एक निश्चित सीमा से घिरा हुआ होता है। राष्ट्र का संबंध भावनाओं से होता है क्योंकि एक राष्ट्र का निर्माण देश के लोगों की भावनाओं से होता है। जब तक किसी देश के वासियों की विचारधारा एक नहीं होती है वह राष्ट्र कहलाने का हकदार नहीं होता है।

हमारे यहाँ आज तक शासकों ने अपने स्वार्थों की वजह से इस देश को राष्ट्र नहीं बनने दिया था। आज राजनैतिक नेताओं ने अपनी दलगत राजनीति की वजह से देश को राष्ट्र बनाने में बाधा पहुंचाई है। वोट प्राप्त करने के लिए सारे देश को धर्मों , जातियों , भाषाओँ की संकीर्ण धाराओं में बाँट दिया है।

अभी देश के नेताओं , अधिकारीयों व जनता में राष्ट्रिय भावना जाग्रत नहीं हुई है। वे पहले कोई और होते हैं और फिर बाद में भारतीय होते हैं। जब कोई भी व्यक्ति सत्ता में आता है तो वह अपने वहाँ के वर्ग का समर्थन करते हुए दिखाई देता है। वोटों की राजनीति सभी को लड़ाने का काम करती है।

इसी कारण से नेताओं की तुष्टिकरण की नीति देश को राष्ट्र बनने से रोक रही है। आज देश के लोग ही संविधान के प्रति जल रहे हैं। कहीं-कहीं पर राष्ट्र ध्वज को जलाने और उसे फाड़ने के समाचारों को भी सुना जाता है। जब राष्ट्रिय गीत गया जाता है उस समय खड़े न रहना एक साधारण सी बात बन गई है। इस सभी गलतियों के लिए दंडों को निर्धारित किया गया है लेकिन किसी को भी दंड नहीं दिया जाता है।

यही है नेताओं की तुष्टिकरण की नीति। इसकी वजह से देशद्रोहियों को अक्सर बढ़ावा मिलता है। आज के समय में देश में देश-द्रोहियों , राजनेताओं को बहुत अधिक प्रोत्साहन मिलता है। इसी वजह से सभी में राष्ट्रिय भावना का आभाव बढ़ता ही जा रहा है जिसकी वजह से देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ रही है। देश में भ्रष्टाचार , अनाचार , बेईमानी , धोखाधड़ी उच्च स्तर पर छाए हुए है।

भारत में उत्पन्न समस्याएँ : स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद से ही देश में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती रही है। इन समस्या में साम्प्रदायिक की समस्या सबसे प्रमुख समस्या है। हमारे देश का विभाजन भी इसी समस्या की वजह से हुआ था। कुछ स्वार्थी लोगों ने हमारे देश में साम्प्रदायिकता की भावना को फैला दिया था जिसकी वजह से हम आज तक उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं। हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए और प्रगति के लिए राष्ट्रिय एकता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हर वर्ग में एकता के बिना कोई भी देश उन्नति नहीं कर सकता है। वर्तमान समय के देश में अनुशासन और आपसी वातावरण की बहुत जरूरत है।

दूषित राजनीति : कुछ सालों से हमारे देश का वातावरण दूषित राजनीति की वजह से विषैला होता जा रहा है। धर्म में अंधे होने के कारण लोग आपस में झगड़ रहे हैं। अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुए लोग आपसी प्रेम को निरंतर भूलते जा रहे हैं। स्वार्थ की भावनाओं , प्रांतीयता एवं भाषावाद की वजह से राष्ट्रिय भावना बहुत प्रभावित हो रही है।

हमारे देश के लोगों में संकीर्णता की भावना पनप रही है और व्यापक दृष्टिकोण लुप्त होता जा रहा है। इसी वजह से विश्व-बन्धुत्व की भावना अपने परिवार तक ही सीमित होकर रह गई है। अगर कोई कोशिश भी करता है तो वह प्रदेश स्तर तक जाकर ही असफल हो जाता है। इसी के फलस्वरूप साम्प्रदायिक ताकतें मजबूत होती जा रही हैं।

असमानताओं में समानता : जम्मू-कश्मीर , असम आदि प्रदेशों में नर-संहार के किस्से सुनने को मिलते हैं। इन सब के लिए स्वार्थी नेता जिम्मेदार हैं , जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए देश को दांव पर लगा रहे हैं। अनेक प्रकार की विषमताओं के होते हुए भी जब हम राष्ट्रिय एकता के बारे में सोचते हैं तो हमें पता चलता है कि इस राष्ट्रिय एकता की वजह से धार्मिक भावना , आध्यात्मिकता , समन्वय की भावना , दार्शनिक दृष्टिकोण , साहित्य , संगीत और नृत्य आदि ऐसे अनेक तत्व हैं जो देश को एकता के सूत्र में बांधे हुए हैं।

सिर्फ जनता को एकजुट होकर कोशिश करने की जरूरत है। आज के समय में राष्ट्रिय एकता के लिए व्यक्तिगत और सार्वजिनक संपत्ति की सुरक्षा का प्रबंध करना जरूरी है। शत्रुपक्ष पर कठोर दंडनीति लागू की जानी चाहिए। पुलिस की गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखना चाहिए।

आज के समय में सभी संगठनों को मिलकर राष्ट्रिय एकता के लिए कोशिश करनी चाहिए। हमारी स्वतंत्रता राष्ट्रिय एकता पर निर्भर करती है। इसके अभाव की वजह से स्वतंत्रता असंभव है। हमारी स्वतंत्रता के लिए हमें पूरी कोशिश करनी चाहिए , हमें एकजुट होकर राष्ट्रिय एकता की रक्षा करनी चाहिए , जिससे हम और हमारे वंशज खुली हवा में साँस ले सकें।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता : भारतीय संस्कृति भावात्मक एकता का आधार है लेकिन बहुत बार राजनीतिक स्वार्थ , अस्पर्शयता , साम्प्रदायिक तनाव , भाषा भेद , क्षेत्रीय मोह तथा जातिवाद आदि की संकीर्णता की भावनाओं के प्रबल होने पर हमारी भावात्मक एकता को खतरा पैदा हो जाता है।

परिणामस्वरूप अदूरदर्शी , मंद बुद्धि , धर्मांध लोग गुमराह होकर अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए अलग-अलग रास्ते की मांग करने लगते हैं। राजनीतिक दलबंदी का सहयोग पाकर ये स्वार्थ कई बार भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। राष्ट्रिय एकता के लिए भावात्मक एकता बहुत जरूरी होती है।

भावात्मक एकता बनाये रखने के लिए भारत सरकार हमेशा से ही प्रयत्नशील रही है। हमारे संविधान में ही धर्म निरपेक्ष , समाजवादी समाज की परिकल्पना की गयी है। धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी ऐसे अनेक संगठन बनाये गए हैं जो राष्ट्रिय एकता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। सच्चा साहित्य भी प्रथक्तावादी प्रवृत्तियों का विरोधी रहा है।

अनेकता में एकता : वर्तमान समय में भावात्मक एकता के लिए सरकार को चाहिए कि वह राष्ट्रिय शिक्षा की व्यवस्था करें। चल-चित्र , दूरदर्शन और रेडियो भी राष्ट्रिय एकता में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। सामूहिक खेल-कूद , सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा धार्मिक और शैक्षिक यात्राएं भी राष्ट्रिय और भावात्मक एकता में सहायक हो सकती है।

ह्रदय परिवर्तन और सद्भावना वातावरण बनाने की बहुत अधिक जरूरत है। धार्मिक संकीर्णता और साम्प्रदायिक मोह राष्ट्रिय एकता में सबसे बाधक तत्व हैं। धर्म , ज्ञान और विश्वास में नहीं , वह तो कर्म और आचरण में बस्ता है। वास्तव में पूछा जाये तो सभी धर्म एक हैं , केवल पूजा विधियाँ भिन्न-भिन्न हैं।

इसी भिन्नता की वजह से एक ही धर्म के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने भी देशवासियों को संकीर्णता से ऊपर उठकर धर्म के व्यापक रूप की प्रेरणा देते हुए कहा था कि हे मेरे देश के लोगों ! धर्म को एकवचन में ही रहने दो। हमारे देश में लोग धर्म के नाम पर कुछ लोग स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए अनेक लोगों की शक्ति का दुरूपयोग करके राष्ट्रिय भावना का हनन कर रहे हैं।

उपसंहार : किसी भी देश की रक्षा और प्रगति देश की एकता और अखंडता पर निर्भर करती है। हमारे देश में जब तक उच्च स्तर पर राष्ट्रिय भावना नहीं आती है तब तक राष्ट्रिय एकता भी नहीं आती है। भारत देश को सबल बनाने के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव और सौहार्द बनाये रखने की जरूरत है।

हमें इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रेम से प्रेम और नफरत से नफरत उत्पन्न होती है। हमारा रास्ता प्रेम और अहिंसा का होना चाहिए। नफरत और हिंसा सब तरह की बुराईयों की जड़ होती है। संतों , महात्माओं और धर्म गुरुओं ने भी यह संदेश दिया है कि किसी में भी छोटे -बड़े का भेदभाव नहीं होता है।

सभी धर्मों में सत्य , प्रेम , समता , सदाचार और नैतिकता का पाठ विस्मरण होता है। प्रार्थना और आराधना की पद्धति अलग हो सकती है लेकिन उसकी उनके लक्ष्य हमेशा एक ही होते हैं। मन्दिर , मस्जिद , गुरुद्वारे और चर्च सभी धार्मिक स्थल एक ही संदेश देते हैं।

यह ख़ुशी की बात है कि हमारा देश राष्ट्रिय एकता के लिए राष्ट्र की आय का तीन प्रतिशत व्यय कर रहा है और हमारी सरकार भी इसके लिए अनेक प्रयास कर रही है। हम भारतवासियों से प्रार्थना करते हैं कि वे भी अपने पूर्वजों की तरह एकता के सूत्र में बंध जाएँ क्योंकि यही सच्चे अर्थों में देश की उन्नति की आपकी उन्नति होती है।

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

राष्ट्रीय एकता पर निबंध  (दो निबंध) | Read These Two Essays on National Unity in Hindi.

#Essay 1: राष्ट्रीय एकता पर निबंध | Essay on National Unity in Hindi!

राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया व एक भावना है जो किसी राष्ट्र अथवा देश के लोगों में भाई-चारा अथवा राष्ट्र के प्रति प्रेम एवं अपनत्व का भाव प्रदर्शित करती है ।

राष्ट्रीय एकता राष्ट्र को सशक्त एवं संगठित बनाती है । राष्ट्रीय एकता ही वह भावना है जो विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, जाति, वेश-भूषा, सभ्यता एवं संस्कृति के लोगों को एक सूत्र में पिरोए रखती है । अनेक विभिन्नताओं के उपरांत भी सभी परस्पर मेल-जोल से रहते हैं ।

हमारा भारत देश राष्ट्रीय एकता की एक मिशाल है । जितनी विभिन्नताएँ हमारे देश में उपलब्ध हैं उतनी शायद ही विश्व के किसी अन्य देश में देखने को मिलें । यहाँ अनेक जातियों व संप्रदायों के लोग, जिनके रहन-सहन, खान-पान व वेश-भूषा पूर्णतया भिन्न हैं, एक साथ निवास करते हैं । सभी राष्ट्रीय एकता के एक सूत्र में पिरोए हुए हैं ।

जब तक किसी राष्ट्र की एकता सशक्त है तब तक वह राष्ट्र भी सशक्त है । बाह्‌य शक्तियाँ इन परिस्थितियों में उसकी अखंडता व सार्वभौमिकता पर प्रभाव नहीं डाल पाती हैं परंतु जब-जब राष्ट्रीय एकता खंडित होती है तब-तब उसे अनेक कठिनाइयों से जूझना पड़ता है । हम यदि अपने ही इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो हम यही पाते हैं कि जब-जब हमारी राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ी है तब-तब बाह्‌य शक्तियों ने उसका लाभ उठाया है और हमें उनके अधीन रहना पड़ा है ।

इसके विपरीत हमारी राष्ट्रीय अवचेतना से ही हमें वर्षों की दासता से मुक्ति मिल सकी है । अत: किसी भी राष्ट्र की एकता, अखंडता व सार्वभौमिकता बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता का होना अनिवार्य है । भारत जैसे विकासशील देश के लिए जो वर्षों तक दासत्व का शिकार रहा है वहाँ राष्ट्रीय एकता की संपूर्ण कड़ी का मजबूत होना अति आवश्यक है ताकि भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न हो सके ।

देश में व्याप्त सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयता आदि सभी राष्ट्रीय एकता के अवरोधक तत्व हैं । ये सभी अवरोधक तत्व राष्ट्रीय एकता की कड़ी को कमजोर बनाते हैं । इन अवरोधक तत्वों के प्रभाव से ग्रसित लोगों की मानसिकता क्षुद्र होती है जो निजी स्वार्थ के चलते स्वयं को राष्ट्र की प्रमुख धारा से अलग रखते हैं तथा अपने संपर्क में आए अन्य लोगों को भी अलगाववाद के लिए उकसाते हैं । यही आगे चलकर लोगों में विघटन का रूप लेता है जो फिर खून-खराबे, मारकाट व दंगों आदि में परिवर्तित हो जाता है ।

इन विघटनकारी तत्वों की संख्या जब और अधिक होने लगती है तब ये पूर्ण अलगाव के लिए प्रयास करते हैं । हमारे देश की भौगोलिक भिन्नता जिसमें अनेक क्षेत्रों व उनमें रहने वाली अनेक जातियों व संप्रदायों का समावेश है ये सभी परस्पर राष्ट्रीय एकता को कमजोर बनाते हैं । इस प्रकार ये विभिन्नताएँ जो हमारी संस्कृति का गौरव हैं जब उग्र रूप धारण करती हैं तब यह हमारी एकता और अखंडता की बाधक बन जाती हैं ।

 

देश की एकता के लिए आंतरिक अवरोधक तत्वों के अतिरिक्त बाह्‌य शक्तियाँ भी बाधक बनती हैं । जो देश हमारी स्वतंत्रता व प्रगति से ईर्ष्या रखते हैं वे इसे खंडित करने हेतु सदैव प्रयास करते रहते हैं । कश्मीर की हमारी समस्या इन्हीं प्रयासों की उपज है जिससे हमारे देश के कई नवयुवक दिग्भ्रमित होकर राष्ट्र की प्रमुख धारा से अलग हो चुके हैं ।

राष्ट्रीय एकता व इसकी अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय एकता के तत्वों; जैसे हमारी राष्ट्रभाषा, संविधान, राष्ट्रीय चिह्‌नों, राष्ट्रीय पर्व व सामाजिक समानता तथा उसकी उत्कृष्टता पर विशेष ध्यान दें । उन सच्चे व महान देशभक्तों की गाथाओं को उजागर करें जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता व सार्वभौमिकता बनाए रखने के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए । महापुरुषों के आदर्शों पर चलना व उनके बताए मार्ग का अनुसरण करना भी राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है ।

राष्ट्रीय एकता को संबल प्रदान करने वाले तत्व कम नहीं हैं, बस उन्हें समय-समय पर अपने जीवन में आत्मसात् करने की आवश्यकता है । विभिन्न राष्ट्रीय दिवसों पर होने वाली गोष्ठियाँ, विचार-विमर्श आदि के माध्यम से राष्ट्र की एकता को बल मिलता है ।

विभिन्न संगीत सम्मेलनों, समवेत् गान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि के माध्यम से जनता के बीच एकता को बढ़ावा देनेवाला संदेश जाता है । सबसे बढ़कर आवश्यक यह है कि हम निजी रूप से ऐसा प्रयास जारी रखें जिससे देश की एकता को बल मिले ।

भारत एक महान, स्वतंत्र एवं प्रगतिशील राष्ट्र है । राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी क्षुद्र मानसिकता से स्वयं को दूर रखें तथा इसमें बाधक समस्त तत्वों का बहिष्कार करें । हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम चाहे जिस क्षेत्र, प्रांत, जाति या समुदाय के हैं परंतु उससे पूर्व हम भारतीय नागरिक हैं । भारतीयता ही हमारी वास्तविक पहचान है । अत: हम कभी भी ऐसे कृत्य न करें जो हमारे देश के गौरव व उसकी प्रगति में बाधा डालते हों ।

हम स्वयं अपने राष्ट्रीय प्रतीकों व अपने संविधान का सम्मान करें तथा अपने संपर्क में आने वाले समस्त व्यक्तियों को भी इसके लिंए प्रेरित करें जिससे हमारी राष्ट्रीय एकता युग-युगांतर तक बनी रहे । हम विघटनकारी तत्वों को राष्ट्रीय एकता की मशाल जलाकर ही भस्मीभूत कर सकते हैं । हम एक थे एक हैं और सदा एक बने रहेंगे, जैसे-जैसे यह विश्वास दृढ़ होता जाएगा हमारी राष्ट्रीय एकता त्यों-त्यों मजबूत होती जाएगी ।


#Essay 2 : राष्ट्रिय एकता पर निबंध | Essay on National Unity

”हम जब-जब असंगठित हुए, हमें आर्थिक व राजनीतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पडी । हमारे विचारों में जब-जब संकीर्णता आई, आपस में झगड़े हुए । हमने जब कभी नए विचारों से अपना मुख मोड़ा, हमें हानि ही हुई, हम विदेशी शासन के अधीन हो गए ।”

ये बातें स्व. प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के दौरान कही थीं । सचमुच राष्ट्रीय एकता सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होती है । राष्ट्रीय एकता के छिन्न होने पर देश की स्वतन्त्रता भी अक्षुण्ण नहीं रह पाती ।

राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य हैं- राष्ट्र के विभिन्न घटकों में परस्पर एकता, प्रेम एवं भाईचारे का कायम रहना, भले ही उनमें वैचारिक और आस्थागत असमानता क्यों न हो ।  भारत में कई धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अन्तर तो है ही, साथ ही उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग हैं । इन सबके बावजूद पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत रहते हैं उसे राष्ट्रीय एकता का विश्वभर में सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है ।

 

राष्ट्रीय एकता का परिणाम है कि जब कभी भी हमारी एकता को खण्डित करने का प्रयास किया गया, भारत का एक-एक नागरिक सजग होकर ऐसी असामाजिक शक्तियों के विरुद्ध खड़ा दिखाई दिया । रवीन्द्र नाथ ‘टैगोर’ ने कहा है- ”भारत की एकता तथा चेतना समय की कसौटी पर सही सिद्ध हुई है ।”

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीयता के लिए भौगोलिक सीमाएँ, राजनीतिक चेतना और सांस्कृतिक एकबद्धता अनिवार्य होती हैं । यद्यपि प्राचीनकाल में हमारी भौगोलिक सीमाएँ इतनी व्यापक नहीं थी और यहाँ अनेक राज्य स्थापित थे तथापि हमारी संस्कृति और धार्मिक चेतना एक थी ।

कन्याकुमारी से हिमालय तक और असोम से सिन्ध तक भारत की संस्कृति और धर्म एक थे । यही एकात्मकता हमारी राष्ट्रीय एकता की नींव थी । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी अलग परम्परा, रीति-रिवाज व आस्थाएँ थी, किन्तु समूचा भारत एक सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध था ।

इसी को अनेकता में एकता एवं विविधता में एकता कहा जाता है और यही पूरी दुनिया में भारत की अलग पहचान स्थापित कर, इसके गौरव को बढाता है । हम जानते हैं कि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है ।

यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे । इस प्रकार, अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए भी राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है ।

इतिहास के अध्ययन से हमें पता चलता है कि प्राचीनकाल में समूचा भारत एक ही सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध था, किन्तु आन्तरिक दुर्बलता के कारण विदेशी शक्तियों ने हम पर आधिपत्य स्थापित कर लिया । इन विदेशी शक्तियों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करना शुरू किया जिससे हमारी आस्थाओं एवं धार्मिक मूल्यों का धीरे-धीरे पतन होने लगा ।

राष्ट्रीय एकता परिषद के अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री मोरारजी देसाई ने कहा था- ”भारत में 1865 ई से पूर्व कभी साम्प्रदायिक दगे नहीं हुए । यहाँ सदियों से विभिन्न धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते आए है, किन्तु अंग्रेजों के शासनकाल में यहाँ हिन्दू-मुस्लिम दगे शुरू हो गए । यह अंग्रेजों की सोची-समझी कूटनीतिक चाल थी और इसका लाभ ब्रिटिश सरकार ने उठाया । कभी उन्होंने हिन्दुओं का समर्थन किया, तो कभी मुसलमानों का और कभी ईसाइयों का। अन्त में विभाजन हुआ । अगर हम इस विभाजन को न स्वीकारते, तो अंग्रेज अपने को बनाए रखते ।”

लगभग एक हजार वर्षों की परतन्त्रता के बाद अनेक संघर्षों व बलिदानों के फलस्वरूप हमें स्वाधीनता प्राप्त हुई । स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद हमारी एकता सुदृढ़ तो हुई, परन्तु आज साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता और भाषागत अनेकता ने पूरे देश को आक्रान्त कर रखा है ।

आज कभी देशवासी मन्दिर-मस्जिद को लेकर झगड़ पड़ते हैं, तो कभी अंग्रेजी-हिन्दी को लेकर, कभी असोम, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से अन्य राज्यवासियों को भगाया जाता है, तो कभी एक ही धर्म के लोग जात-पाँत की बातों पर उलझ पडते हैं ।

देश में बाबरी मस्जिद गिराए जाने, गोधरा काण्ड, मुजफुफरनगर दगे जैसी स्थितियाँ फिर से न आएँ, इसके लिए साम्प्रदायिक विद्वेष, स्पर्द्धा, ईर्ष्या आदि राष्ट्र विरोधी भावनाओं को अपने मन से दूर रखकर सद्‌भावना का वातावरण कायम रखना आवश्यक है ।

तभी हम ‘डॉ. एस राधाकृष्णन’ की कही गई इस बात को सही साबित कर सकते हैं- ”भारत ही अकेला देश है, जहाँ मन्दिरों, गिरिजाघरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और मठों में शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व है ।”  आज देश की राष्ट्रीय एकता को सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद से है । आतंकवाद न केवल हमारी, बल्कि सम्पूर्ण विश्व की समस्या है ।

आतंकवादियों द्वारा कभी मुम्बई को निशाना बनाया जाता है, तो कभी देश की राजधानी दिल्ली को । आज कश्मीर की समस्याएँ आतंकवाद की ही देन हैं ।  पिछले दो दशकों में इस आतंकवाद ने देश के कई राज्यों में अपार क्षति पहुँचाई है । इन सबके अतिरिक्त अलगाववादियों ने भी हमारी एकता को भंग करने का असफल प्रयास किया है ।

राष्ट्रीय एकता में बाधक अनेक शक्तियों में अलगाव की राजनीति भी एक है । यहाँ के राजनेता वोट बैंक बनाने के लिए कभी अल्पसंख्यकों में अलगाव के बीज बोते हैं, कभी आरक्षण के नाम पर पिछड़े वर्गों को देश की मुख्य धारा से अलग करते हैं, तो कभी किसी विशेष जाति, प्रान्त या भाषा के हिमायती बनकर देश की राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने की कोशिश करते हैं ।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हो, खालिस्तान की माँग हो, असोम या गोरखालैण्ड की पृथकता का आन्दोलन हो इन सबके पीछे वोटबैंक की राजनीति ही दिखाई पड़ती है । इस देश के हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी परस्पर प्रेम से रहना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्ट राजनेता उन्हें बाँटकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे रहते हैं ।

इन समस्याओं के समाधान का उत्तरदायित्व मात्र राजनेताओं अथवा प्रशासनिक अधिकारियों का ही नहीं है, इसके लिए तो सम्पूर्ण जनता को मिल-जुलकर प्रयास करना होगा । इतिहास साक्षी है कि अनेक धर्मों, अनेक जातियों और अनेक भाषाओं वाला यह देश अनेक विसंगतियों के बावजूद सदा एकता के एकसूत्र में बँधा रहा है । यहाँ अनेक जातियों का आगमन हुआ और बे धीरे-धीरे इसकी मूल धारा में विलीन हो गई ।

उनकी परम्पराएँ, विचारधाराएँ और संस्कृतियाँ इस देश के साथ एक रूप हो गई । भारत की यह विशेषता आज भी ज्यों-की-त्यों बनी हुई है । भारत के नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम इस भावना को नष्ट न होने दे वरन् इसको और अधिक पुष्ट बनाएँ ।

यदि हमारा देश संगठित है, तो विश्व पटल पर इसे बड़ी शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो राष्ट्र संगठित होता है, उसे न कोई तोड़ सकता है और न ही कोई उसका कुछ बिगाड़ ही सकता है बह अपनी एकता एवं सामूहिक प्रयास के कारण सदा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहता है ।

कई बार हमारे विरोधी, देश या पैसे के लिए सब कुछ बेच देने वाले कुछ स्वार्थी लोगों ने अराजकता एवं आतंकी कार्यों द्वारा हमारी एकता को भंग करने का असफल प्रयास किया है । अगर इन बिघटनकारी और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों पर पूरी तरह से नियन्त्रण नहीं किया गया, तो भारत की एकता और अखण्डता पर खतरा बना ही रहेगा । जब देश में कोई भी दो राष्ट्रीय घटक आपस में संघर्ष करते हैं, तो उसका दुष्परिणाम भी पूरे देश को भुगतना पड़ता है ।

मामला आरक्षण का हो या अयोध्या के राम मन्दिर का, सबकी गूँज प्रदेश के जन-जीवन को प्रभावित करती है । ऐसे में देश के सभी नागरिकों का कर्तव्य बन जाता है कि वे राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने हेतु तन, मन, धन से समर्पित रहें ।

आज आवश्यकता है हम सब देशवासियों को महात्मा गाँधी के इस कथन से प्रेरणा लेकर अपने कर्म पथ पर दृढ़प्रतिज्ञ होकर चलते हुए देश की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारत माता की सेवा में तन-मन-धन से जुट जाने की – ”जब तक हम एकता के सूत्र में बँधे हैं, तब तक मजबूत हैं और जब तक खण्डित हैं, तब तक कमजोर है ।”

आज आवश्यकता है केन्द्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय एकता परिषद को फिर से सक्रिय करने की, ताकि देशवासी आन्तरिक मतभेदों को भुलाकर आपस में प्रेम-भाईचारे के साथ रह सकें । सारे संचार माध्यमों को भी मिल-जुलकर राष्ट्रीय एकता को बढावा देने में सहयोग करना चाहिए, क्योंकि सिनेमा, टेलीविज़न, अखबार व पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार प्रभावपूर्ण ढंग से किया जा सकता है ।

लेखकों व कलाकारों का भी दायित्व बनता है कि वे अपनी रचनाओं व कला के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत करें, क्योंकि साहित्य व कला का संसार जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के बन्धनों से परे होता है । राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए असमानता लाने वाले कानूनों को खत्म किया जाना भी अति आवश्यक है ।

शैक्षिक संस्थानों को भी इस कार्य में बढ़-चढ़कर योगदान देना होगा । पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की इन पंक्तियों को पढ़कर अपनी राष्ट्रीय एकता को सर्वदा अक्षुण्ण रखने का संकल्प लें-

‘बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ

पाँवों के नीचे अंगारे

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ

निज हाथों में हँसते-हँसते

आग लगाकर जलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

एक देश में रह रहे लोगों के बीच एकता की शक्ति के बारे में लोगों को जागरुक बनाने के लिये ‘राष्ट्रीय एकता’ एक तरीका है। अलग संस्कृति, नस्ल, जाति और धर्म के लोगों के बीच समानता लाने के द्वारा राष्ट्रीय एकता की जरुरत के बारे में ये लोगों को जागरुक बनाता है। हम यहाँ पर स्कूल जाने वाले विभिन्न आयु वर्ग और कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के लिये अलग-अलग शब्द सीमा में राष्ट्रीय एकता पर निबंध उपलब्ध करा रहें हैं। इसका प्रयोग वो किसी भी स्कूली परीक्षा तथा अन्य प्रतियोगिताओं में कर सकते हैं।

राष्ट्रीय एकता पर निबंध (नेशनल इंटीग्रेशन एस्से)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

Find here some essays on National Integration in easy Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 1 (100 शब्द)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

राष्ट्रीय एकीकरण को राष्ट्रीय एकता दिवस भी कहा जाता है। देश के लोगों के बीच असमानता के साथ ही समाजिक संस्कृति और अर्थशास्त्र के भेदभाव को घटाना इसका एक सकारात्मक पहलू है। देश में राष्ट्रीय एकता लाने के लिये किसी समूह, समाज, समुदाय और पूरे देश के लोगों के बीच एकता को मजबूती देने के लिये ये बढ़ावा देता है। किसी सत्ता के द्वारा ये कोई एक दबाव नहीं है बल्कि भारत को एक विकसित देश बनाने के लिये ये लोगों से आग्रह करता है। ये केवल लोगों की एकता और सौहार्द के द्वारा ही संभव होगा। अपने भावनात्मक संबंध को बढ़ाने के लिये उन्हें अपने विचार, मूल्य और दूसरे मुद्दों को बाँटना चाहिये। लोगों को विविधता के अंदर एकता को जीना और महसूस करना चाहिये और अपने राष्ट्र की पहचान एक सुप्रिम शक्ति के रुप में बनानी चाहिये।

राष्ट्रीय एकीकरण

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 2 (150 शब्द)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

इस देश में व्यक्तिगत स्तर के विकास को बढ़ाने के लिये भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का बहुत महत्व है और ये इसे एक मजबूत देश बनाता है। पूरी तरह से लोगों को इसके प्रति जागरुक बनाने के लिये, 19 नवंबर से 25 नवंबर तक राष्ट्रीय एकता दिवस और राष्ट्रीय एकीकरण सप्ताह (अर्थात् कौमी एकता सप्ताह)

के रुप में 19 नवंबर (भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जन्म दिवस) को हर वर्ष एक कार्यक्रम के रुप में मनाया जाता है। एकीकरण का वास्तविक अर्थ है अलग-अलग भागों को एक बनाने के लिये जोड़ना।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ लोग विभिन्न धर्म, क्षेत्र, संस्कृति, परंपरा, नस्ल, जाति, रंग और पंथ के लोग एक साथ रहते हैं। इसलिये, राष्ट्रीय एकीकरण बनाने के लिये भारत में लोगों का एकीकरण जरुरी है। अगर एकता के द्वारा अलग-अलग धर्मों और संस्कृति के लोग एक साथ रहते हैं, वहाँ पर कोई भी सामाजिक या विकासात्मक समस्या नहीं होगी। भारत में इसे विविधता में एकता के रुप में जाना जाता है हालाँकि ये सही नहीं है लेकिन हमें (देश के युवाओं को) इसे मुमकिन बनाना है।

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 3 (200 शब्द)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

भारत में, हर साल 19 नवंबर को एक बहुत जरुरी सामाजिक कार्यक्रम के रुप में राष्ट्रीय एकीकरण दिवस को देखा जाता है। राष्ट्रीय एकीकरण के बारे में लोगों के बीच अधिक जागरुकता फैलाने के लिये, 19 से 25 नवंबर तक राष्ट्रीय एकीकरण सप्ताह के रुप में वार्षिक तौर पर देखे जाने के लिये भारतीय सरकार द्वारा एक पूरे सप्ताह का कार्यक्रम भी लागू किया गया है। भारत एक ऐसा देश है जो अपने विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं, नस्ल, धर्मों, जाति और पंथ के जाना जाता है लेकिन इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि यहाँ निवास कर रहे लोगों की सोच में विविधता के कारण ये अभी भी विकासशील देशों में आता है। यहाँ रह रहे लोग अपनी संस्कृति और धर्म के अनुसार अलग-अलग सोचते हैं जो व्यक्तिगत और देश के विकास को रोकने का एक बड़ा कारण हैं।

भारत अपनी विविधता में एकता के लिये प्रसिद्ध है लेकिन ये सही नहीं है क्योंकि विकास के लिये दूसरे के विचार को स्वीकार करने के लिये लोग तैयार नहीं है। यहाँ सभी मानते हैं कि उनका धर्म ही सबसे बेहतर है और जो भी वो करते हैं वही सबसे ठीक है। अपने खुद के फायदे के लिये केवल खुद को अच्छा साबित करने के लिये यहाँ रह रहे विभिन्न नस्लों के लोग आपस में शारीरिक, भावनात्मक, बहस और चर्चा आदि के द्वारा लड़ते हैं। अपने देश के बारे में एक साथ होकर वो कभी नहीं सोचते हैं। वो कभी नहीं सोचते कि हमारे देश का विकास केवल व्यक्तिगत वृद्धि और विकास के साथ ही संभव है।


 

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 4 (250 शब्द)

“लोगों की एकता” के रुप में भारत की एक पहचान बनाने के लिये अलग धर्मों के लोगों के बीच एकता को लाने के लिये राष्ट्रीय एकीकरण एक प्रक्रिया है। समन्वय और एकता की मजबूती के साथ ही समाज में असमानता और दूसरे सामाजिक मुद्दे जैसे विविधता, नस्लीय भेद-भाव आदि को हटाने के लिये ये एक और एकमात्र रास्ता है। भारत एक बहु-जातिय और बहु-भाषायी देश है जहाँ विभिन्न जाति के लोग एक साथ रहते हैं और अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। वो अपनी प्रथा और परंपरा अपने धर्म के अनुसार निभाते हैं। भारत में लोगों के बीच केवल धर्म, जाति, पंथ, रंग और संस्कृति से ही विविधता नहीं है बल्कि सोच में भी विविधता दिखाई देती है जो भारत में अनुचित विकास का एक बड़ा विषय है।

भारतीय लोगों के बीच अलगाव की एक उच्च स्थिति है जो सांप्रदायिक और दूसरी समस्याओं के साथ यहाँ एक बुरा परिदृश्य बनाती है। भारत में अलगाव के कारण, हम लोगों ने ढ़ेर सारी सामाजिक समस्याओं का सामना किया जैसे 1947 में भारत का बँटवारा, 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस, हिन्दू और मुस्लिमों के बीच दंगे आदि। अस्पृश्यता की बाधा, भाषा की बाधा, सामाजिक स्थिति की बाधा और दूसरी सामाजिक बाधाएँ हमें पीछे ले जा रहीं हैं। विविधता में एकता लाने के लिये भारतीय सरकार द्वारा बहुत सारे नियम-कानून लागू किये गये हैं हालांकि ये केवल मानव दिमाग है जो लोगों के बीच विविधता में स्वाभाविक एकता ला सकता है।

राष्ट्रीय एकीकरण में कमी के कारण यहाँ सभी सामाजिक समस्याओं का उदय हो रहा है। हम सभी को इस राष्ट्रीय एकीकरण के वास्तविक अर्थ, उद्देश्य और जरुरत को समझना चाहिये। अपने देश के मुख्य विकास के लिये भारतीय सरकार द्वारा सभी नियम-कानूनों को मानने के साथ ही हमें एक साथ रहना और सोचना चाहिये।

 

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 5 (300 शब्द)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ अपनी अनोखी संस्कृति और विविध जीवनशैली को मानने वाले विरोधी लोग रहते हैं। ये बहुत ही साफ है कि हमें हमारे जीवन में राष्ट्रीय एकीकरण के अर्थ को समझने की जरुरत है और अपने देश को एक पहचान देने के लिये सबकुछ मानना होगा। भारत में लोग विभिन्न धर्म, जाति, समुदाय, नस्ल और सांस्कृतिक समूह से संबंध रखते हैं और वर्षों से एक साथ रह रहें हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत को विविध धर्म, जाति और पंथ ने समृद्ध बनाया हुआ है जिसने यहाँ पर एक मिश्रित संस्कृति को सामने रखा है हालाँकि ये बहुत ही साफ है कि भारत में हमेशा राजनीतिक एकता की कमी रही है।

भारत में केवल एक बार राजनीतिक एकता दिखाई दी थी जब सभी ने मिलकर 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया गया था। अंग्रेजों ने यहाँ कई प्रकार से बाँटो और राज करो की नीति अपनाई थी हालाँकि, इसमें वो बाद में असफल हो गये थे। कुछ बिंदु जैसे सांस्कृतिक एकता, रक्षात्मक निरंतरता, संविधान, कला, साहित्य, सामान्य आर्थिक समस्याएँ राष्ट्रीय ध्वज़, राष्ट्र गान, राष्ट्रीय उत्सव और राष्ट्रीय प्रतीक के द्वारा भारत में राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दिया जाता है।

अलग धर्म और जाति होने के बावजूद हमें पहचाना चाहिये कि एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करने के लिये हम सब एक हैं। हमें भारत में विविधता में एकता का वास्तविक मतलब समझना चाहिये। इसका ये कतई मतलब नहीं है कि अखंडता की प्रकृति यहाँ पर नस्लीय और सांस्कृतिक समानता के कारण होनी चाहिये। बल्कि इसका मतलब है कि इतने अंतर के बावजूद भी एकात्मकता है। पूरे विश्वभर में दूसरी सबसे बड़ी जनसंखया वाले देश के रुप में भारत को गिना जाता है, जहाँ पर 1652 भाषाएँ बोली जाती हैं और विश्व के सभी मुख्य धर्म के लोग यहाँ एक साथ रहते हैं। सभी मतभेदों के बावजूद भी हमें बिना किसी राजनीतिक और सामाजिक विरोधाभास के शांति से एक-दूसरे के साथ रहना चाहिये। हमें इस महान देश में एकता का आनन्द उठाना चाहिये जहाँ राष्ट्रीय एकीकरण के उद्देश्य को पूरा करने के लिये सबकुछ विविधता है।


 

राष्ट्रीय एकता पर निबंध 6 (400 शब्द)

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

लोगों में जाति, धर्म, भाषा, नस्ल आदि में विविधता का एक देश है भारत हालाँकि अंग्रेजी शासन से आजादी के लिये सामान्य क्षेत्र, इतिहास और लगातार लड़ने के प्रभाव के तहत बहुत बार एकता यहाँ भी देखी गयी है। भारत पर राज करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ पर कई वर्षों तक बाँटो और राज करो की नीति अपनायी। हालाँकि विभिन्न धर्म, जाति, नस्ल का होने के बावजूद भी भारतीयों की एकता ने अंग्रेजों को यहाँ से खदेड़ दिया। लेकिन आजादी के बाद अलगाव ने जगह ले ली जिसने भारत को भारत और पाकिस्तान में बाँट दिया।

भारत विभिन्न धार्मिक समुदायों जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसियों की एक भूमि है। यहाँ पर राष्ट्रीय एकीकरण तभी संभव है जब सभी समुदाय एक-साथ शांतिपूर्वक रहें, एक-दूसरे समुदाय की सराहना करें, प्यार करें तथा एक-दूसरे की संस्कृति और परंपरा का सम्मान करें। हरेक समुदाय को उनके मेले, उत्सवों और दूसरे अच्छे दिनों को शांतिपूर्वक देखना चाहिये। हरेक समुदाय को एक दूसरे की मदद के साथ ही धार्मिक त्योंहारो की खुशियों को बाँटना चाहिये। किसी भी धार्मिक समुदाय को कुछ भी ऐसा बुरा नहीं करना चाहिये जो किसी दूसरे धर्म को ठेस पहुँचाये या उस धर्म में मनाही हो।

विभिन्न धर्मों के लोग अलग-अलग भाषा बोलते हैं जैसे हिन्दी, अंग्रेजी, ऊर्दू, उड़ीया, पंजाबी, बंगाली, मराठी आदि। सभी धर्मों के बीच समानता और सभी जाति के विद्यार्थीयों के लिये समान सुविधा होनी चाहिये। देश के मुख्य विकास के लिये सभी समुदायों के बराबर वृद्धि और विकास और सभी नस्लों के लोगों के बीच समानता लाने के लिये आधुनिक समय में भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की तुरंत जरुरत है। भारतीय सरकार ने इस आशा में राष्ट्रीय एकीकरण की परिषद का गठन किया है कि इसके सभी कार्यक्रमों के उद्देश्यों को पूरा करने में यहाँ रहने वाले लोग सहयोग करेंगे।

एक पहचान बनाने के लिये राष्ट्र के रहने वाले सभी लोगों का एक संघठित समूह राष्ट्रीय एकीकरण है। राष्ट्रीय एकीकरण एक खास मनोभाव है जो धर्म, जाति, भाषा या पृष्ठभूमि को बिना ध्यान दिये राष्ट्र को एक सामान संबंध में जोड़ता है। हमलोगों को खदु को भारतीय के रुप में पहचानना चाहिये ना कि किसी खास धर्म या जाति के व्यक्ति के रुप में। ये विरासत से समृध देश है हालांकि हमलोग ये नहीं कह सकते कि यहाँ लोगों में पूरी तरह से एकता है। ये देश के युवाओं में जागरुकता फैलने से ही संभव हो पायेगा। एक युवा के रुप में, हम देश का भविष्य हैं इसलिये हमें देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना चाहिये और राष्ट्रीय एकीकरण के लिये जरुरी सभी कदम उठाने चाहिये।

राष्ट्रीय एकता पर निबंध-Rashtriya Ekta Essay In Hindi

राष्ट्रीय एकता पर निबंध
Essay on National Unity in Hindi

 

राष्ट्रीय एकता पर निबंध  Essay on National Unity in Hindi – एकता का साधारण अर्थ होता है – मिलजुल कर किसी काम को संपन्न करना . किसी देश या राष्ट्र की उन्नति के लिए एकता बनाये रखना बहुत जरुरी है . एकता का महत्व मनुष्य को उस समय को उस समय ही पता चलता है ,जब वह बिलकुल आदिम अवस्था में था . अपनी उस स्थिति  में भी वह एकता के बल पर जंगलों में रहने वाले हिंसक पशुवों से अपनी रक्षा करता था .

एकता की आवश्यकता –

आज भी समाज या राष्ट्र के लिए एकता की बहुत बड़ी आवश्यकता है . जब तक समाज या राष्ट्र में एकता बनी रहती हैं ,तब तक कोई शत्रु उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता .लेकिन एकता के भंग होते ही कमज़ोर से कमज़ोर

एकता
एकता

शत्रु भी उस देश पर आक्रमण कर विजयी बन जाता है . कहा भी गया है कि संघे शक्ति कलियुगे ! अर्थात कलियुग में संगठन शक्ति ही प्रधान है. 

किसी भी कार्य या उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें एकता की जरुरत पड़ती हैं . कोई भी बड़ा से बड़ा कार्य अगर हमारे सामने आता है तो उसके हल या निराकरण के लिए हमें सामूहिक सलाह या मशविरे की आवश्कयता पड़ती है .उससे लाभ उठाकर हम उस काम को आसानी से संपन्न कर डालते हैं . पाँव तले रौंदी जाने वाली चीटियाँ का उदहारण हमारे सामने है . एकता के बल से ही वे हाथी जैसे बलशाली जानवर को परास्त कर डालती हैं .पानी की एक एक बूँद से ही तालाब भरता है , एक एक पैसा इकठ्ठा करने से व्यापारी लखपति बनता है .
एकता एक बहुत मूल्यवान वस्तु हैं . इससे बहुत लाभ हैं . हमें परिवार ,समाज और देश की एकता बनाये रखने के लिए हर संभव उपाय अपनाना चाहिए .परिवार की प्रगति एकता बनाये रखने पर ही हो सकती हैं . समाज का अग्रसर होना भी एकता पर आधारित है. देश की सुरक्षा भी एकता के द्वारा ही हो सकती हैं .एकता के द्वारा हम अपनी सुख सुविधा में चार चाँद लगा सकते हैं . अगर समाज में थोड़े व्यक्ति गरीब हैं तो उनकी गरीबी हम एकता के बल से दूर कर सकते हैं .

एकता से लाभ –

एकता से प्रत्येक व्यक्ति को लाभ पहुँचता है . व्यक्ति से ही समाज बनता है .इसी समाज का व्यक्ति अपने स्वतंत्र देश का शासक या संचालक बनता हैं .उसे भी शासन को उचारु रूप से चलाने के लिए एकता की अवास्क्यता पड़ती हैं .एकता में अद्भूत शक्ति होती हैं .एकता के बल पर ही बाबर की बारह हज़ार सेना ने सांगा की एक लाख सेना को पराजित कर दिया था . भारत में एकता के बल पर ही अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बाध्य किया या यों कहिये की देश को गुलामी के बंधन से मुक्ति दिलाई .

एकता न होने से हानि –

एकता न होने से समाज की बड़ी हानि होती हैं . कोई भी राष्ट्र या देश एकता के अभाव में रोगी या जीर्ण शीर्ण हो जाता हैं . भारत के राजाओं में एकता न होने के कारण ही इस देश पर मुसलमान का अधिपात्य हुआ और वे सैकड़ों वर्षों तक शासक रहे .हमारी एकता के अभाव के कारण ही देश सदियों तक गुलाम बना रहा .अतः हमें सदैव तैयार रहना चाहिए कि हमारी एकता भंग न हो और हम हमेशा एकता के बल से बलशाली बने रहें .

निष्कर्ष –

प्रत्येक भारतवासी को चाहिए कि प्रतिदिन एकता का पाठ पढ़ें और एकता को जीवन का संबल बनाये .इसमें आगे इतना और याद रखें कि एकता ही वास्तव में जीवन है .

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