राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK | Hindigk50k

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

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 Rajasthan Districts wise General Knowledge

1. अजमेर  6. भरतपुर  11. चित्तौड़गढ़  16. हनुमानगढ़  21. झुंझुनूं  26. पाली  31. सिरोही 
2. अलवर  7. भीलवाड़ा 12. दौसा  17. जयपुर  22. जोधपुर  27. प्रतापगढ़  32. टोंक
3. बांसवाड़ा  8. बीकानेर  13. धौलपुर  18. जैसलमेर  23. करौली  28. राजसमंद  33. उदयपुर 
4. बारां  9. बूंदी  14. डूंगरपुर  19. जालोर  24. कोटा  29. सवाई माधोपुर 
5. बाड़मेर  10. चुरू  15. गंगानगर  20. झालावाड़  25. नागौर  30. सीकर 

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन Rajasthan Panchayati Raaj Rajasthan GK

राजस्थान में पंचायती राज एवं शहरी स्वशासन

भारत में पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है। ऐतिहासिक ग्रन्थों के अनुसार ईसा पूर्व से ही हमें पंचायतों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। उस समय ग्राम पंचायत का प्रमुख ‘ग्रामणी’ से होता था अथर्ववेद में ‘ग्रामणी’ शब्द का उल्लेख मिलता है। यहॉ गठित महासभा विस: कहलाती थी बौद्धकाल में शासन की ईकाई ‘ग्राम’ थी जिसका मुखिया ‘ग्रामयोजक’ होता था जो ग्रामसभा द्वारा चुना जाता था ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा कहा जाता था मौर्यशासन में भी पंचायतों को सुदृढ बनाने में महत्वपूर्ण भूमि का का निर्वहन किया गया मुगलकाल में प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई गांव ही थी जिसका प्रबंध पंचायतों द्वारा किया जाता था तथा जिसका मुखिया मुकद्दम कहलाता था आधुनिक भारत में निर्वाचित एवं जनता के प्रति जवाबदेह स्वायत व्यवस्था का प्रथम बीजारोपण ब्रिटिश शासनकाल में सन् 1667 में मद्रास नगर परिषद में हुआ गवर्नर जनरल व वायसराय लॉर्ड रिपन ( (1880-1884)) ने सर्वप्रथम 1882 ई. में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत एवं न्याय पंचायत का प्रस्ताव कर देश में स्थानीय स्वशासन की ठोस बुनियाद रखी इस कारण रिपन को देश में ‘स्थानीय स्वशासन का पिता’ कहा जाता है। सन् 1919 में ‘माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारो’ के तहत स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया सर्वप्रथम 1919 में बंगाल में ‘स्थानीय सरकार अधिनियम, 1919’ पारित किया गया उसके पश्चात सभी प्रान्तों में अधिनियम पारित कर पंचायतों की स्थापना की गई परन्तु उनमें पंचों का चुनाव जनता द्वारा न होकर सरकार द्वारा मनोनयन किया जाता था राजस्थान में बीकानेर पहली देशी रियासत थी जहां 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम पारित कर ग्राम पंचायतों को वैधानिक दर्जा दिया गया जयपुर रियासत में 1938 में ग्राम पंचायत अधिनियम लागू किया गया था ।

महात्मा गाँधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी पंचायती राज ग्राम स्वराज्य का आधार है। उन्होनें पंचायती राज व्यवस्था का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘ माइ पिक्चर ऑफ फ्री इण्डिया’ में किया गया है। उन्होने गाँवों से सर्वांगीण विकास का सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम ग्राम पंचायतों को बताया था पंचायती राज व्यवस्था के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 40 में भी इसका प्रावधान है। इसके अनुसरण में विभिन्न राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के लिए अधिनियम पारित कर इन्हें साकार रूप प्रदान किया है।

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ग्रामीण विकास में जनस‍हभागिता प्राप्त करने एवं अधिकार व शक्तियों के प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण हेतु सलाह देने के उद्देश्य से जनवरी 1957 में श्री बलवंतराय मेहता समिति की स्थापना की गई इस समिति ने 24 नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देते हुए देश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की सिफारिश की गई इन सिफारिशों की क्रियान्वित में 2 अक्टूम्बर 1959 को सर्वप्रथम राजस्थान में नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया इस प्रकार ‘पंचायती राज’ के बापू के स्वप्न को पूरा करने की ओर कदम उठाया गया उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री स्व. श्री मोहनलाल सुखाड़िया लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थक थे राजस्थान के बाद 11 अक्टूम्बर 1959 को आंध्रप्रदेश में त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई त्र‍िस्‍तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समितियां व जिला स्तर पर जिला परिषदें गठित की गई पंचायतों की व्यवस्था के लिए तो पहले से ही राजस्थान पंचायत समिति और जिला परिषद अधिनियम, 1959 बनाया गया।

 2 अक्टूम्बर, 2009 को पंचायती राज प्रणाली के 50 वर्ष पूर्ण हुए हैं अतः इसकी स्वर्ण जयंती है। इस उपलक्ष में नागौर में 02-10-2009 को इसका स्वर्णजयन्ती समारोह मनाया गया ।
1965 के बाद पंचायती राज व्यवस्था में गिरावट आने लगी तथा ये संस्थाएं लगभग निष्प्रभावी सी होने लगी जिसका मुख्य कारण अधिकांश राज्यों में उनके चुनावों का बार बार स्थगित होना उनको अधिकारों का विकेन्द्रीकरण बहुत कम मात्रा में होना तथा वितीय साधनों की कमी होना था ।पंचायती राज व्यवस्था का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए समय समय पर विभिन्न समितियों का गठन किया गया ।
सादिक अली अध्ययन दल पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा 1964 में यह अध्ययन दल गठित किया गया। इसकी महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायत समिति के प्रधान तथा जिला परिषद के प्रमुख का चुनाव इन संस्थाओं के सदस्यों द्वारा किये जाने के स्थान पर वृहतर निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें ग्राम पंचायत के अध्यक्ष तथा सदस्य सभी सम्मिलित हों।
गिरधारीलाल व्यास समिति – 1973 में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति जिसने प्रत्येक क पंचायत के लिए ग्राम सेवक तथा सचिव नियु‍क्त करने तथा पंचायतीराज संस्थाओं को पर्याप्त वितीय संसाधन दिये जाने पर बल दिया।
अशोक मेहता समिति  पंचायतीराज व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए 1977-78 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति ने जिला स्तर और मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश की थी। इन्होने मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का केन्द्र बिन्दु बनाने का सुझाव दिया।
एल.एम. सिंघवी समिति – 1986 में गठित इस समिति द्वारा पंचायतीराज संस्थाओं को स्थानीय शासन की आधारभूत ईकाई के रूप में मान्यता देने, ग्रामसभा को महत्व देने आदि की सिफारिश यह थी कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान के अन्तर्गत सरकार का तृतीय स्तर घोषित किया जाना चाहिए और इस हेतु संविधान में एक नया अध्याय जोड़ा जाना चाहिए 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में नया अध्याय जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को सरकार का तीसरा स्तर प्रदान कर इन्हें संवैधानिक मान्यता कर दी है।

पंचायती राज हेतु संविधान संशोधन

16 सितम्बर 1991 को पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पंचायती राज के संबंध में 72 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा ने इस विधेयक की समीक्षा हेतु श्री नाथूराम मिर्धा (राजस्थान) की अध्यक्षता में संयुक्त प्रवर समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 22 दिसम्बर 1992 को लोकसभा द्वारा तथा अगले दिन राज्यसभा में 73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित किया गया। 17 राज्यों के अनुमोदन के पश्चात राष्ट्रपति ने इसे 20 अप्रेल 1993 को अपनी स्वीकृति प्रदान की तथा एक अधिसूचना द्वारा 24 अप्रेल 1993 का यह अधिनियम मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, जम्मू कश्मीर, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र व मणिपुर के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर संपूर्ण देश में लागू हो गया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243 को नवें भाग के रूप में जोड़ा गया तथा 11 वीं अनुसूची में जोड़ी गई। जिसमें पंचायती राज संस्थाओं के 29 कार्यो को सूचीबद्ध किया गया है। इस अधिनियम के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो गई है। इस अधिनियम द्वारा यह अपेक्षा की गई थी कि देश की सभी राज्य सरकारें इस अधिनियम के लागू होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपने पुराने प्रचलित पंचायती राज अधिनियमों को निरस्त कर 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में नए पंचायती राज अधिनियम तैयार कर लागू करें। इन्हीं निर्देशों की अनुपालना में राजस्थान सरकार ने अपने पुराने दोनों अधिनियमों को निरस्त कर एक नया पंचायती राज अधिनियम तैयार कर 23 अप्रेल 1994 से लागू कर दिया जिसे हम ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994’ के नाम से पुकारते हैं। इस अधिनियम के संदर्भ में ‘राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996’ बनाए गए हैं जो 30 दिसम्बर 1996 से लागू कर दिए गए हैं।
राज्य में वर्तमान में 249 पंचायत समितियां, 9177 ग्राम पंचायतें व 33 जिला परिषदें हैं।

73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 प्रमुख प्रावधान 

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ग्राम सभा: प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र के लिए एक ग्राम सभा होगी जिसके सदस्य उस पंचायत के अन्तर्गत आने वाले गांव या गांवों से संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्ति होंगे।
प्रत्येक राज्य में पंचायती राज की त्र‍िस्‍तरीय व्यवस्था होगी जिसमें ग्राम , मध्यवर्त व जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा परन्तु 20 लाख तक की आबादी वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन करना आवश्यक नहीं है।
कार्यकाल पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से 5 वर्ष तक होगा।
कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व ही चुनाव कराने आवश्यक होंगे किसी संस्था का विघटन किये जाने की स्थिति में विघटन से 6माह के भीतर उसके चुनाव कराने आवश्यक होंगे।
चुनाव
ग्राम व मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत के सभी सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा तथा जिला पंचायत के सभी सदस्य राज्य विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि के अनुसार चुनें जाएंगे।
अध्यक्षों का चुनाव ग्राम स्तर पर राज्य विधानमण्डल द्वारा विहित रीति से एवं मध्यवर्ती व जिला स्तर पर निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से होगा।
किसी भी पंचायती राज संस्था का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होगी।
आरक्षण
सभी पंचायतों में सभी पदों पर (अध्यक्ष पद सहित) अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गो के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें सुरक्षित होगी सभी पदों पर सभी वर्गो में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।
ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न भिन्न निर्वाचित क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आवंटित किए जाएंगे। केन्द्र सरकार ने अब पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को 27.08.09 को मंजूरी दे दी।
राज्य के विधानमंडल को यह छूट होगी कि पंचायतों में पिछड़े वर्गो के लिए भी स्थान सुरक्षित रखें।
निर्वाचन आयोग प्रत्येक राज्य में इन संस्थाओं के चुनाव निष्पक्ष व समय पर करवाने हेतु पृथक से चुनाव आयोग की स्थापना की जाएगी, जिसका प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा इसकी निुयक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी तथा उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही राष्ट्रपति द्वारा संसद् में महाभियोग प्रस्ताव पास होने के बाद हटाया जाएगा।
वित आयोग पंचायती राज संस्थाओं की वितीय स्थिति सुदृढ करने तथा पर्याप्त मात्रा में वितीय संसाधन उपलब्ध कराने हेतु सुझाव देने के लिए प्रत्येक राज्य के राज्यपाल द्वारा हर 5 साल में राज्य वित आयोग का गठन किया जाएगा जो अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को देगा।

ग्यारहवीं अनुसूची अनुच्छेद 243 छ

ग्यारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 छ)
कृषि
भूमिसुधार व मृदा संरक्षण
लघु सिंचाई, जल प्रबंध और जलग्र‍हण विकास
पशुपालन, डेयरी व मुर्गीपालन
मत्स्य पालन
सामाजिक वानिकी व कृषि वानिकी
लघु वनोपज

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लघु उद्योग, खाध प्रसंस्करण उद्योग समेत
शिक्षा, प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों समेत
तकनीक प्रशिक्षण व व्यावसायिक शिक्षा
प्रौढ व अनौपचारिक शिक्षा
पुस्तकालय
सांस्कृतिक गतिवधियां
हाट व मेले
स्वास्थ्य व साफ सफाई, अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र व डिस्पेंसरियां समेत
खादी व ग्रामीण कुटीर उद्योग
ग्रामीण आवास
पेयजल
ईंधन व चारा
सड़कें व नालियां पुल जलमार्ग व अन्य साधन
ग्रामीण विद्युतीकरण, विद्युत विवरण समेत
गैर परम्परागत उर्जा स्त्रोत
गरीबी उन्मूलन
परिवार कल्याण
महिला व बाल विकास
समाज कल्याण, विकलांगों व विमंदित के कल्याण समेत
कमजोर वर्गो का कल्याण खासकर अनुसूचित जाति व जनजाति
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
सामुदायिक संपदा का रखरखाव

 

राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था

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राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था
(73 वें संविधान संशोधन अधि., राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 व पंचायती राज नियम, 1996 के अधीन)

विवरण ग्राम स्‍तर (निम्‍नतम स्‍तर (9177 ग्राम पंचायतें) खंड स्‍तर (मध्‍य स्‍तर) कुल 249 ग्राम पंचायतें जिला स्‍तर (शीर्ष स्‍तर) (33 जिला परषिद्)
संस्‍था का नाम ग्राम पंचायत पंचायत समिति जिला परषिद्
क्षेत्राधिकार व गठन गॉव या गॉवों का समूह सरपंच, उपसरपंच व पंच विकास खण्‍ड ब्‍लॉक प्रधान, उपप्रधान व सदस्‍य जिला परिषद् ए‍क जिला जिला प्रमुख, उप जिला प्रमुख व सदस्‍य
सदस्‍य ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित पंच (प्रत्‍येक वार्ड से एक पंच) निर्वाचित सदस्‍य पदेन सदस्‍य सभी पंचायतों के सरपंच संबंधित क्षेत्र के राज्‍य विधानसभा सदस्‍य निर्वाचित सदस्‍य पदेन सदस्‍य, जिले की सभी लोकसभा, जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रधान, जिले की सभी लोकसभा राज्‍य सभा, व विधान सभा सदस्‍य
सदस्‍यों का निर्वाचन प्रत्‍येक वार्ड में पंजीकृत वयस्‍क सदस्‍यों द्वारा प्रत्‍यक्षः निर्वाचित पंचायत समिति क्षेत्र से प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित जिला परिषद क्षेत्र के निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित
निर्वाचित सदस्‍यों की योग्‍यता न्‍यूनतम आयु 21 वर्ष आयु 21 वर्ष आयु 21 वर्ष
निर्वाचित सदस्‍य सख्‍या न्‍यूनतम पंच 9 तीन हजार से अधिक जनसंख्‍या पर प्रति एक हजार या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त पंच न्‍यूनतम 15 एक लाख से अधिक जजसंख्‍या होने पर प्रत्‍येक अतिरिक्‍त 15 हजार या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त सदस्‍य न्‍यूनतम 17 4 लाख से अधिक जनसंख्‍या होने पर अतिरिक्‍त 1 लाख या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्‍त सदस्‍य
निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को प्रधान जिला प्रमुख
अध्‍यक्ष का पदनाम सरपंच प्रधान जिला प्रमुख
ग्राम सभा के सभी वयस्‍क सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर प्रत्‍यक्षतः निर्वाचित केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन
अध्‍यक्ष द्वारा त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को जिला प्रमुख को संभागीय आयुक्‍त को
उपाध्‍यक्ष उपसरपंच उपप्रधान उप जिला प्रमुख
उपाध्‍यक्ष का चुनाव निर्वाचित पंचों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन केवल निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा बहुमत के आधार पर अपने में से ही निर्वाचन
उपाध्‍यक्ष द्वारा पद से त्‍याग पत्र विकास अधिकारी को जिला प्रमुख को संभागीय आयुक्‍त को
बैठकें प्रत्‍येक 15 दिन में कम से कम एक बार प्रत्‍येक माह में कम से कम एक बार प्रत्‍येक तीन माह में कम से कम एक बार
सरकारी अधिकारी ग्राम सचिव (ग्राम सेवक ) खंड विकास अधिकारी (( )) मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी (( ))
आय के साधन राज्‍य सरकार से प्राप्‍त अनुदान कर एवं शस्तियों द्वारा प्राप्‍त आय राज्‍य सरकार से प्राप्‍त वितीय सहायता एवं अनुदान विभिन्‍न करों से प्राप्‍त आय (यथा मकान व जमीन कर, शिक्षा उपकर मेंलों पर कर आदि राज्‍य सरकार से प्राप्‍त वितीय सहायता एवं अनुदान पंचायत समितियों की आय से प्राप्‍त अंशदान जन सहयोग से प्राप्‍त धनराशि
कार्य सफाई, पेयजल व स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की व्‍यवस्‍था करना, सार्वजनिक स्‍थानों पर प्रकाश की व्‍यवस्‍था करना जन्‍म मृत्‍यु का पंजीकरण वन व पशुधन का विकास व संरक्षण मेलों/उत्‍सवो/मनोरंजन के साधनो की व्‍यवस्‍था करना भू आवंटन करना ग्रामोधोग व कुटीर उधोंगो को बढावा ग्राम पंचायत द्वारा किये कार्यो की देखरेख करना पंचायत समिति क्षेत्र में प्रारम्भिक शिक्षा की व्‍यवस्‍था किसानों के लिए उतम किस्‍म के बीज तथा खाद उपलब्‍ध कराना उतम स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराना पंचयत समिति मुख्‍यालय से गांवों तक सड़कों व पुलों का निर्माण व रखरखाव ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों के बीच समपन्‍वय करना व उन्‍हें परामर्श देना ग्राम पंचायतों व राज्‍य सरकार के बीच कड़ी का कार्य विकास कार्यो के बारे मे राज्‍य सरकार को सलाह देना पंचायत समितियों के क्रियाकलापों की सामान्‍य देखरेख करना विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करना

Rajasthan Me Panchayati Raaj Vyavastha

 

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