राजस्थान की जलवायु एवं मृदा Rajasthan GK | Hindigk50k

राजस्थान की जलवायु एवं मृदा Rajasthan GK

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राजस्थान की जलवायु एवं मृदा Rajasthan GK

जलवायु परिचय

जलवायु किसी भू भाग पर लम्बी समयावधि के दौरान विभिन्न समयों में विविध वायुमण्डलीय दशाओं की औसत अवस्था को उस भू भाग की जलवायु कहते हैं। तापक्रम, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा, वायुवेग आदि जलवायु के निर्धारित घटक हैं धरातल पर विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और प्राणियों के वितरण को जलवायु ही निर्धारित करती है। यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मनुष्य के क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। कृषि, सिंचाई, वनप्रबन्धन, भवन निर्माण, भूमि उपयोग, परिवहन तथा अन्य अनेक आर्थिक कार्यक्रम जलवायु की दशाओं से बहुत ज्यादा प्रभावित होते है। अतः मनुष्य के लिए जलवायु का विशेष महत्व है।
राजस्थान देश का सबसे बडा राज्य है। इसकी जलवायु मानसूनी जलवायु का ही एक अभिन्न अंग है। राज्य के पश्चिमी भाग (61 प्रतिशत भू भाग) में मरूस्थलीय जलवायु की दशाएं पाई जाती है। राज्य का अधिकांश भाग कर्क रेखा के उत्तर में उपोष्ण कटिबन्ध में स्थित है। केवल डूँगरपुर एवं बांसवाड़ा जिले का कुछ भाग ही उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। सहारा, अरब, दक्षिण पश्चिम संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया भी इसी कटिबन्ध में स्थित है। यहॉ शुष्क जलवायु पाई जाती है। जिसमें वाष्पीकरण की मात्रा वर्षण से अधिक होती है। और जल का अभाव हमेशा बना रहता है। राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियों ने जलवायु की दृष्टि से राजस्थान को दो भागो में विभक्त किया गया है। अरावली के पश्चिम में तापक्रम में अतिशयताएं, ग्रीष्मकालीन तीव्र प्रचण्ड धूल भरी आंधियां, शुष्क गर्म झुलसा देने वाली, हवाएं आर्द्रता की कमी एवं अकाल की अवस्थाएं ग्रीष्मकालीन तीव्र प्रचण्ड धूल भरी आंधियां, शुष्क गर्म झुलसा देने वाली हवाएं आर्द्रता की कमी एवं अकाल की अवस्थाएं मिलती है। यहॉ वर्षा की मात्रा केवल अत्यंत कम ही नहीं होती बल्कि बड़ी अनियमित होती है। मेघरहित आ‍काश और कम नमी के कारण सौर विकिरण दिन के समय अधिक मात्रा में जमीन पर पहुँचता है। और रात के समय भौमिक विकिरण भी तेज होता है। फलस्वरूप यहॉ अधिकतम दैनिक तापान्तर पाए जाते है। जिनकी मात्रा 15 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक होता है। दिन अत्यधिक गर्म व रात अत्यधिक ठंडी होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 38 डिग्री सेल्सियस होता है। अरावली पर्वत श्रृँखलाएं मानसूनी हवाओं के चलन की दिशाओं के अनुरूप होने के कारण मार्ग में बाधा नहीं बन पाती अतः मानसूनी पवन घाटियों से होकर सीधी निकल जाती है। और वर्षा नहीं कर पाती इस प्रकार पश्चिम क्षेत्र अरावली का वृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण अत्यल्प वर्षा प्राप्त करता है। अरावली के पूर्वी भाग में तापक्रम में प्राय: एकरूपता, अपेक्षाकृत अधिक आर्द्रता एवं सामयिक वर्षा देखने को मिलती है। इस प्रकार इस पूर्वी भाग में आर्द्र जलवायु पाई जाती है।

राजस्थान की जलवायु की विशेषताएं

राज्य की लगभग समस्त वर्षा (90 प्रतिशत से भी अधिक) गर्मियों में (जून के अंत से जुलाई, अगस्त व मध्य सितम्बर तक) दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाओं से होती है। शीतकाल (दिसम्बर जनवरी) में बहुत कम वर्षा उतरी पश्चिमी राजस्थान में भूमध्य सागर से उत्पन्न पश्चिमी विक्षोभों से होती है। जिसे मावठ कहते है। राज्य में वर्षा का वार्षिक औसत लगभग 58 सेमी है।
वर्षा की मात्रा व समय अनिश्चित व अनियमित
वर्षा की अपर्याप्तता वर्षा के अभाव में आए वर्ष अकाल सूखे का प्रकोप रहता है।
वर्षा का असमान वितरण है। दक्षिणी पूर्वी भाग में जहां अधिक वर्षा होती है। वहीं उतरी पश्चिमी भाग में नगण्य वर्षा होती है।
राजस्थान में जलवायु के आधार पर शुष्क, उपआर्द्र, आर्द्र अति आर्द्र चारों प्रकार की जलवायु की स्थितियाँ पाई जाती हैं
तापमान की अतिशयताएँ, ग्रीष्म ऋतु का औसत तापमान 35 डिग्री से 40 डिग्री से सेल्सियस रहता है। जबकि सर्दी में 12 डिग्री से 17 डिग्री सेल्सियस रहता है। क्षेत्रवार तापमान में अधिक अंतर देखने को मिलते हैं ग्रीष्म ऋतु में दोपहर तापमान कुछ स्थानों पर कई बार 48 डिग्री से 50 डिग्री तक पहुँच जाता है। जबकि सर्दियों में हिमांक बिंदु से नीचे चला जाता है।

 

राज्य की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

राज्य की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
राज्य की अक्षांशीय स्थिति: कर्क रेखा राज्य के दक्षिणी भाग से हो कर गुजरती है। अतः राज्य का अधिकांश भाग उपोष्ण कटिबंध में आने के कारण यहॉ तापान्तर अधिक पाये जाते हैं
समुद्र तट से दूरी समुद्र तट से दूरी: समुद्र तट से दूरी अधिक होने के कारण यहॉ की जलवायु पर समुद्र की समकारी जलवायु का प्रभाव नहीं पडता अतः तापमान में महाद्वीपीय जलवायु की तरह विषमताएं पाई जाती है।
धरातल राज्य का लगभग 60-61 प्रतिशत भू-भाग मरूस्थलीय है। जहां रेतीली मिट्टी होने के कारण दैनिक व मौसमी तापांतर अत्यधिक पाये जाते है। गर्मी में गर्म व शुष्क ‘लू’ व धूलभरी हवाएं चलती है। तथा सर्दी में शुष्क व ठण्डी हवाएँ चलती है। जो रात के तापमान को हिमांक बिन्दु से नीचे ले जाती है।
अरावली पर्वत श्रेणी की स्थिति अरावली पर्वतमाला की स्थिति दक्षिणी पश्चिमी मानूसनी पवनों के समानान्तर होने के कारण पवनें यहॉ बिना वर्षा किए आगे उतरी भाग में बढ जाती है। फलत: राज्य का पश्चिमी भाग प्राय: शुष्क रहता है। जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
समुद्र तल से ऊँचाई राज्य के दक्षिणी एवं दक्षिणी पश्चिमी भाग की ऊँचाई समुद्र तल से अधिक है। अतः इस भू-भाग में गर्मियों में भी शेष भागों की तुलना में तापमान कम पाया जाता है। माउण्ट आबू पर ऊँचाई के कारण गर्मी में भी तापमान अधिक नहीं हो पाता तथा सर्दी में जमाव बिन्दु से भी नीचे पहुँच जाता है। इसके विपरीत मैदानी भागों की समुद्र तल से ऊँचाई कम होने के कारण वहाँ तापमान में अंतर अधिक पाये जाते है।

जलवायु के आधार पर मुख्य ऋतुएँ

जलवायु के आधार पर मुख्यत: तीन ऋतुएं पाई जाती है।
ग्रीष्म ऋतु – मार्च से मध्य जून
शीत ऋतु – नवम्बर से फरवरी तक
वर्षा ऋतु – मध्य जून से सितम्बर तक

ग्रीष्म ऋतु (Summer)

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण (कर्क रेखा की ओर) होने के कारण मार्च में तापमान बढने के साथ ही ग्रीष्म ऋतु प्रारम्भ होता हैं जून में सूर्य के कर्क रेखा पर लम्बवत होने के कारण तापमान उच्चतम होते हैं इस समय सम्पूर्ण राजस्थान में औसत तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के लगभग होता है। परन्तु राज्य के पश्चिमी भागों जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी तथा पूर्वी भाग में धौलपुर में उच्चतम तापमान 45-50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाते है। इससे यहॉ निम्न वायुदाब का केन्द्र उत्पन्न हो जाता है। परिणामस्वरूप यहॉ धूलभरी आंधियां चलती है। धरातल के अत्यधिक गर्म होने एवं मेघरहित आकाश में सूर्य की सीधी किरणों की गर्मी के कारण तेज गर्म हवायें जिन्हें ‘लू’ कहते हैं, चलती है। यहॉ चलने वाली आँधियों से कहीं कहीं वर्षा भी हो जाती है। अरावली पर्वतीय क्षेत्र में ऊँचाई के कारण अपेक्षाकृत कसम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस रहता है। रा‍त में रेत के शीघ्र ठण्डी हो जाने के कारण तापमान 14-15 डिग्री सेल्सियस तक रह जाता है। अतः मरूस्थलीय क्षेत्र में तापांतर अधिक 32-33 डिग्री सेल्सियस तक पाये जाते हैं ग्रीष्म ऋतु में राज्य में आर्द्रता कम पाई जाती है। दोपहर के समय यह लगभग 10 डिग्री तक या उससे भी कम रह जाती है।
वर्षा एवं पवनें तीव्र गर्मी के कारण राजस्थान के उतरी व पश्चिमी क्षेत्रों में आगे चली जाती है। इसी कारण राज्य के पश्चिमी भाग में औसतन 20 सेमी वर्षा हो पाती है। राज्य में सर्वाधिक वर्षा (75 से 100 सेमी वार्षिक) दक्षिणी पूर्वी पठारी भाग में होती है। राज्य के पूर्वी मैदानी भाग में वर्षा का सामान्य औसत 50 से 75 सेमी वार्षिक होता है।

वर्षा ऋतु

मध्य जून के बाद राजस्थान में मानसूनी हवाओं के आगमन से वर्षा होने लगती है। फलस्वरूप तापमान में कुछ कमी हो जाती है। परन्तु आर्द्रता के कारण मौसम उमस भरा हो जाता है। इस समय राज्य के अधिकांश भागों का सामान्य तापमान 18 से 30 डिग्री से. ग्रेड हो जता है। वायुदाब कम होने के कारण हिन्द महासागर के उच्च वायुदाब क्षेत्र से मानसूनी पवनें बंगाल की खाडी की मानसून हवाएं एवं अरब सागरीय मानसूनी हवाएं राज्य में आती है। जिनसे यहॉ वर्षा होती है। ये मानसूनी हवाएं दक्षिणी पश्चिमी हवाऐं कहलाती है। राज्य की लगभग अधिकांश वर्षा इन्ही मानसूनी पवनों से होती हैं। यहॉ आने वाली बंगाल की खाडी की मानसूनी पवनें गंगा यमुना के सम्पूर्ण मैदान को पार कर यहॉ आती है। अतः यहॉ आते आते उनकी आर्द्रता बहुत कम रह जाती है। इस कारण राजस्थान में वर्षा की कमी रह जाती है। अरावली पर्वत होने के कारण ये राज्य के पूर्वी व दक्षिणी पूर्वी भाग में ही वर्षा करती है। तथा राज्य के उतर व पश्चिमी भाग में बहुत कम वर्षा कर पाती है। इस मानसूनी हवाओं को यहॉ पुरवाई (पुरवैया) कहते है। अरब सागर की मानसूनी हवाएं अरावली पर्वत के समानान्तर चलने के कारण अवरोधक के अभाव में यहॉ बहुत कम आगे बढ जाती है। राज्य में अधिकांश वर्षा जुलाई-अगस्त माह में ही होती है। सितम्बर में वर्षा की मात्रा कम होती है।
राजस्थान को अरावली पर्वतमाला की मुख्य जल विभाजक रेखा के सहारे सहारे गुजरने वाली 50 सेमी समवर्षा रेखा लगभग दो भिन्न भिन्न जलवायु प्रदेशों में विभक्त करती है। इस समवर्षा (50 सेमी) रेखा के पश्चिमी भाग में वर्षा का अभाव न्यूनता, सूखा, आर्द्रता की कमी, वनस्पति की न्यूनता एवं जनसंख्या घनत्व में कमी पाई जाती है। इसके विपरीत इस समवर्षा रेखा के पूर्वी भाग में आर्द्रता अधिक, अधिक वर्षा, कृषि की अपेक्षाकृत ठीक स्थिति एवं आबादी की गहनता आदि विशेषताएं पाई जाती है। वर्षा की मात्रा राज्य में उतर पूर्व से उतर पश्चिम एवं पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है। पिछले कुछ वर्षो से कभी कभी पश्चिमी भाग में भी वर्षा की मात्रा बढ गई हैं।

शीत ऋतु

22 दिसम्बर को सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा पर लम्बवत चमकने लगता है। फलस्वरूप उतरी गोलार्द्ध में तापमान में अत्यधिक कमी हो जाती है। राजस्थान के कुछ रेगिस्तानी क्षेत्रों में रात का तापमान शून्य या इससे भी कम हो जाता हैं दिन के तापमान भी बहुत कम हो जाते है। कई बार तापमान शून्य या इससे भी कम हो जाने पर फसलों पर पाला पड जाने से वे नष्ट हो जाती है। शीत ऋतु में राजस्थान में कभी कभी भूमध्य सागर से उठे पश्चिमी वायु विक्षोभों के कारण वर्षा हो जाती है। जिसे मावट कहते है। यह वर्षा रबी की फसल के लिए लाभदायक होती है। इस ऋतु में कभी कभी उतरी भाग से आने वाली ठण्डी हवाएं शीत लहर का प्रकोप डालती है। यहॉ जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पडती है। वायुमण्डल में इस समय आर्द्रता कम पाई जाती है।
अक्टूम्बर नवम्बर में राज्य में मानसूनी हवाओं के प्रत्यावर्तन का समय (Winter) होता है। सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ ही तापमान धीरे धीरे गिरने लगता है। एवं इन माहों में राज्य में 20-30 से. ग्रेड तापमान हो जाता है। इस अवधि में यहॉ वर्षा भी नहीं होती है।

राज्य में कम वर्षा के कारण

राज्य में कम वर्षा के कारण
बंगाल की खाड़ी का मानसून राजस्थान में प्रवेश करने से पूर्व गंगा के मैदान में अपनी आर्द्रता लगभग समाप्त कर चुका होता है।
अरब सागर से आने वाली मानसून हवाओं की गति के समानान्तर ही अरावली पर्वत श्रेणियां हैं, अतः हवाओं के बीच अवरोध न होने से वे बिना वर्षा किये आगे बढ जाती हैं
मानसूनी हवाएं जब रेगिस्तानी भाग पर आती है। तो अत्यधिक गर्मी के कारण उनकी आर्द्रता घट जाती है। जिससे वे वर्षा नहीं कर पाती

राजस्थान के जलवायु प्रदेश

जलवायु प्रदेश 
तापक्रम, वर्षा व आर्द्रता के आधार पर राज्य को निम्न जलवायु प्रदेशों में बांटा जा सकता हैः-

शुष्क जलवायु प्रदेश – क्षेत्र जैसलमेर उतरी बाड़मेर, दक्षिणी गंगानगर, हनुमानगढ तथा बीकानेर व जोधपुर का पश्चिमी भाग ।

औसत वर्षा 0-20 से. मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 34-40 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12 से 16 डिग्री सेल्सियस पाया जाता है। गर्मियों में दिन का तापमान 48-49 सेल्सियस तथा सर्दियों में रात में न्यूनतम तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। अतः दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर अधिक पाये जाते है। यह प्राकृतिक वनस्पति रहित प्रदेश है। गर्म शुष्क जलवायु के कारण रेत भरी आंधियां व लू चलती हैं ।

अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश: क्षेत्र- चुरू, गंगानगर, हनुमानगढ, द. बाड़मेर, जोधपुर, व बीकानेर का पूर्वी भाग तथा पाली, जालौर, सीकर, नागौर व झुन्झुनू का पश्चिम भाग ।
औसत वर्षा 20-50 से.मी. व औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 30-36 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 10-17 डिग्री सेल्सियस होता है।
कांटेदार झाड़ियाँ व घास की प्रधानता कृषि व पशुपालन मुख्य कार्य । वनस्पति के रूप में आक, खेजडी, रोहिडा, बबूल, कंटीली झाड़ियाँ, फोग आदि वृक्ष, सेवण व लीलण घास आदि पाई जाती है।

उपआर्द्र जलवायु प्रदेश: 
क्षेत्र अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर, व झुन्झुनू का पूर्वी भाग तथा टोंक, भीलवाड़ा व सिरोही का उतरी पश्चिमी भाग ।
औसत वर्षा 40-60 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 28-34 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12-18 डिग्री सेल्सियस रहता है।
पतझड़ वाली वनस्पति जैसे नीम, बबूल, आम, आँवला, खेर, हरड़, बहड़ आदि वृक्ष पाए जाते है।

आर्द्र जलवायु प्रदेश 
क्षेत्र भरतपुर,धौलपुर, कोटा, बून्दी, सवाईमाधोपुर, उ.पू. उदयपुर, द.पू. टोंक तथा चितौड़गढ ।
औसत वर्षा 60-80 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 32-35 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 14-17 डिग्री सेल्सियस होता है।
सघन वनस्पति पाई जाती है। नीम, इमली, आम, शहतूत, गुलाब, गुग्गल, जामुन, पीपल, बरगद, बेर, धोकड़ा आदि वृक्ष बहुतायत में पाए जाते है।
इसी जलवायु क्षेत्र में प्रसिद्ध रणथम्भौर अभयारण्य व केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य है।

अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र द.पू. कोटा, बारां, झालावाड़, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, डूँगरपुर, द.पू. उदयपुर व माउन्ट क्षेत्र
औसत वर्षा 80-150 से.मी. तथा औसत तापमान ग्रीष्म ऋतु में 30-34 डिग्री सेल्सियस तथा शीत ऋतु में 12-18 डिग्री सेल्सियस रहता है।
मानसूनी सवाना प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। आम, शीशम, सागवान, शहतूत, बॉस, जामुन, खेर आदि वृक्षों को बहुतायत है।

 

जलवायु महत्वपूर्ण तथ्य

जलवायु महत्वपूर्ण तथ्य
सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – माउण्ट आबू
राजस्थान का सबसे वर्षा वाला जिला – झालावाड़
सबसे ठंडा महीना – जनवरी
सबसे गर्म महीना – जमन
न्यूनतम वर्षा वाला स्थान जैसलमेर
आर्द्रता वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते है। आपेक्षिक आर्द्रता मार्च-अप्रेल में सबसे कम व जुलाई- अगस्त में सर्वाधिक होती है।
मरूस्थल में चलने वाली अति गर्म व शुष्क हवाएँ लू कहलाती है।
समुद्र तल से ऊँचाई बढने के साथ तापमान घटता है। इसके घटने की यह सामान्य दर 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 सेंटीग्रेड हैं
राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग से दक्षिणी पूर्वी भाग की ओर तापमान में कमी दृष्टिगोचर होती जाती है।
टांका राजस्थान में मारवाड़ व शेखावाटी क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्र‍ित करने हेतु घरों में बनाये गए जलकुण्ड इस पानी को वर्षभर प्रयोग में लिया जाता है। यह पानी पालर पानी कहलाता है।

 

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