यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

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यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi 

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध :

भूमिका : व्यक्ति जब भी अपने जीवन से संतुष्ट होता है तो वह अपने संतुष्टि के कारणों को मिटाने की कोशिश करता है। इसी इच्छा से मनुष्य की उन्नति के भेद का पता चलता हैं। मैं एक विद्यार्थी हूँ तो मेरी ज्यादातर इच्छाएँ मेरी शिक्षा से संबंधित हैं इसलिए मैं कई बार शिक्षा में ऐसे परिवर्तन लाने की कोशिश करता हूँ जिससे हमारी शिक्षा सही अर्थों में उपयोगी बन जाये। जब तक मैं शिक्षा मंत्री नहीं बन जाता तब तक मैं अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता इसलिए कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि – काश! मैं शिक्षा मंत्री होता।

पाठ्य पुस्तकों का बोझ कम करने : यदि मैं शिक्षा मंत्री होता तो सबसे पहले ये आदेश जारी करता कि पाठ्यक्रमों में किताबों का बोझ कम कर दिया जाये। आज के समय में एक ही विषय की चार-चार किताबें होती हैं विद्यार्थी उन्हें देखकर ही घबरा जाता है और उसे कुछ भी समझ में नहीं आता। विद्यार्थी उन्हें देखकर असमंजस में पड़ जाते हैं कि वे कौन सी पुस्तक को अपनाएं। विद्यार्थियों पर पाठ्यपुस्तकों का बहुत भार होता हमें ज्यादा से ज्यादा बोझ को कम करने की कोशिश करनी चाहिए।

व्यवसाय से जुडी शिक्षा :- शिक्षा को व्यवसायिक बनाना जरूरी होता है। आज की वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमे किताबी कीड़ा बनाती है और बाद में बेकार नौजवानों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर देती है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए मेहनत और साहस की जरूरत होती है। लेकिन मुझे भरोसा है कि जब मैं शिक्षा मंत्री बन जाउँगा तब मैं अपनी मन की इच्छा को पूरा जरुर करूंगा।

जब मैं शिक्षा मंत्री का पद ग्रहण करता तो सरकारी अध्यापकों को प्राईवेट ट्यूशन देने से मना कर देता। जो अध्यापक ट्यूशन पढ़ाते हैं वे कक्षा में तो कुछ नहीं पढ़ाते हैं पर स्कूल का समय खत्म होते ही उनके घरों पर विधिवत स्कूल खुल जाते हैं। जो विद्यार्थी प्राईवेट ट्यूशन के लिए तैयार नहीं होते हैं उन्हें अपमानित और दंडित किया जाता है।

बहुमुखी विकास : शिक्षा अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान होता है। छात्रों के बहुमुखी विकास में खेलों, भ्रमण और सांस्कृतिक कार्यक्रम का अहिक महत्व होता है। गांधी जी ने भी शिक्षा दी थी कि गर्मी की छुट्टियों में गाँव में जाकर गाँव के सुधार के काम किये जाने चाहिएँ , अनपढ़ों को पढाना , किसानों को कृषि करने के नए ढंग सिखाने चाहिएँ , गरीब बच्चों को स्वास्थ्य के नियम बताने चाहिएँ , सफाई का महत्व समझाना चाहिए। विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास के लिए मैं ज़रुरतमंद कदम उठाऊंगा।

माध्यम :- शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए ? वर्तमान समय में हमारी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा बनी हुई है। इस विदेशी भाषा को समझने और जानने के लिए हमारी पूरी बौद्धिक शक्ति नष्ट हो जाती है। शिक्षा मंत्री के रूप में मैं अपने अपने कर्तव्य को पूरी तरह समझूंगा और मैं बच्चों और माता-पिता को स्वंय भाषा को चुनने की आज्ञा दूंगा मुझे पूरा विश्वास है की वो हिंदी भाषा को ही चुनेंगे।

हम शिक्षा की तरफ बहुत कम ध्यान देते हैं। हमारे स्कूलों में जब अध्यापक होते हैं वहाँ पर विद्यार्थी नहीं होते हैं और जहाँ पर विद्यार्थी होते हैं वहाँ पर योग्य अध्यापकों की कमी होती है। कहीं-कहीं पर तो विद्यालय के भवन ही नहीं होते और खेल के मैदान किसी-किसी विद्यालय के साथ ही दिखाई देते हैं। मैं स्कूलों और कॉलेजों से राजनीति को साफ कर दूंगा। मैं योग्य छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करूंगा।

उपसंहार : शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करने से देश की हालत को बदला जा सकता है। जापान जैसा देश अपनी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था की वजह से ही इतने कम समय में आज उन्नति के शिखर पर पहुंच गया है। मैं भी संसार को बता देता की भारत के विद्यार्थी भी देश के निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अभी तो बस यही दोहराना पड़ता है कि – काश! मैं शिक्षा मंत्री होता।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता- Yadi Main Shiksha Mantri Hota Essay In Hindi

भूमिका- मनुष्य कल्पनाशील प्राणी है। जीवन के प्रति उसकी उमंगे और लालसाएं कल्पना का सहारा लेकर पंख पसार कर उड़ने लगती है और नीले आकाश की ऊंचाई तथा विस्तार को भी छू जाती है। कल्पना का जन्म उस समय भी होता है जबकि मनुष्य किसी वस्तु का अभाव झेलता है। अभाव के कारण ही दु:ख जन्म लेते हैं और दु:खों से छुटकारा पाने की कामना प्रत्येक व्यक्ति करता है। कल्पना के मधुर क्षणों में व्यक्ति कुछ समय के लिए दु:खों से मुक्ति पा लेता है। रात्रि में जब व्यक्ति नींद में सोते हुए स्वप्न देखता है तो कभी-कभी इन स्वप्नों में भी वह अपनी मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर लेता है अथवा उसी रूप को प्राप्त कर लेता है। कल्पना कवियों और कलाकारों के लिए आवश्यक सोपान मानी जाती है। मैं एक विद्यार्थी हूँ और शिक्षा की वर्तमान दशा को देखकर मेरे मन में इसमें कुछ परिवर्तन करने की कामना हुई। मैं सोचने लगा-काश ! मैं शिक्षा मन्त्री होता।

शिक्षा और शिक्षा मन्त्री- यदि मैं शिक्षा मन्त्री बन गया तो सबसे पहले मैं अपने अधिकार और कर्तव्य को जानता। राजनीति के दाव-पेचों से अलग रहकर मैं पवित्र मन से शिक्षा को ही समर्पित हो जाता। मैं इस घमण्ड से न भरा होता कि मैं शिक्षा मन्त्री हूं। मैं शिक्षक, शिक्षा, और शिक्षार्थियों का सेवक स्वयं को समझता, जिसे बहुत बड़ा कर्तव्य निभाना होता है। शिक्षकों के प्रति मैं अत्यंत सम्मान की भावना रखने वाला शिक्षा मन्त्री हूं और सभी बातों में उनकी राय तथा उनके विचार जानता हूं। उनको शिक्षा से अलग रखकर मैं शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने की कल्पना कैसे कर सकता हूं ? स्कूल और कॉलेजों में नियमित रूप से जाने का भी प्रयास करता हूं और शिक्षकों तथा विद्यार्थियों से व्यक्तिगत सम्पर्क करता हूं। मैं यह भी जानता हूं कि हमारा देश निर्धन है तथा बहुत गरीब घर के विद्यार्थी हमारे स्कूलों में आते हैं जिनके पास पहनने के लिए उचित वस्त्र तथा पुस्तकें आदि खरीदने के लिए भी साधन नहीं हैं, उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए मैं यथाशक्ति उनकी सहायता करता हूं।

शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन- अब मैं शिक्षा मन्त्री हूं और मैंने यह जाना है कि शिक्षा के किन क्षेत्रों में क्या परिवर्तन करने अनिवार्य हैं। आज के युग में शिक्षकों का मान समाज में गिर रहा है। मैं उन्हें पूर्ण सम्मान दिलाने के लिए कृत-संकल्प हूं। इसके लिए मैं अध्यापक बनने के लिए इच्छुक व्यक्तियों का चयन करते हुए बहुत सावधानी ध्यान में रखने के लिए आदेश देता हूं। उनके चरित्र तथा नैतिकता के प्रति मैं सजग हूं। अत: समर्पित व्यक्ति ही अब ट्रेनिंग में चुने जाएंगे और ट्रेनिंग में भी उनके व्यवहारों का अध्ययन कर ही उन्हें उत्तीर्ण माना जायेगा। मैं जानता हूं कि टीचर्स अपनी यूनियन बनाते हैं और कुछ अध्यापक यूनियन के डर और भय के द्वारा शिक्षा संस्थानों में मनमाना व्यवहार करते हैं। ऐसे अध्यापकों के प्रति मैं अब जागरूक हूं। अध्यापक को सबसे पहले सही अर्थों में अध्यापक होना आवश्यक है। अब मैं अध्यापकों को सभी सुविधाओं को दिलाने के लिए भी प्रयास कर रहा हूं अर्थात् उनके वेतन में पर्याप्त वृद्धि कर रहा हूं ताकि उन्हें ट्यूशन के लिए बिल्कुल भटकना न पड़े। दूसरी ओर उन्हें मकान, चिकित्सा, उनके बच्चों की शिक्षा, उचित छुट्टियाँ तथा देश भ्रमण की सुविधा दिलाने का ध्यान रखता हूं।

विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम के प्रति सतर्क रहना भी आवश्यक है। मैं समझता हूं कि विज्ञान, गणित जैसे विषय सभी विद्यार्थी समझ नहीं पाते हैं। अत: मैं अध्यापकों की सहायता से उनकी रुचियों और प्रतिभा को देख कर ही उन्हें अलग-अलग विषयों की शिक्षा दिलाने के पक्ष में हूं। वे दसवीं कक्षा के बाद अपनी प्रतिभा के अनुसार विषय ले सकें, इसकी अपेक्षा मैं नौवीं कक्षा में प्रवेश के समय ही ऐसी व्यवस्था कर रहा हूं। अब कालेजों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए केवल वे ही विद्याथीं जा सकेंगे जो वास्तव में इसके योग्य हैं, अधिक परिश्रमी हैं तथा ऊंची शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक भी हैं। इस प्रणाली के साथ कालेजों में भीड़ कम होगी और अध्यापक विद्यार्थियों के प्रति अधिक ध्यान दे सकेंगे तथा उनके साथ न्याय भी कर पायेंगे। विद्यार्थी अब खुश होंगे क्योंकि उनके भारी-भारी बस्ते अब छोटे हो जायेंगे। इसी दिशा में मैं एक महत्वपूर्ण परिवर्तन करने पर आजकल गम्भीरता से विचार कर रहा हूं। हम जानते हैं कि आजकल विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता उत्पन्न हो रही है। वे अध्यापकों के प्रति, समाज के प्रति तथा देश के प्रति, माता-पिता के प्रति अपना उत्तरदायित्व नहीं निभाते हैं, इसलिए उनमें नैतिक, चारित्रिक शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न करना आवश्यक है। अब मैं सोचता हूं कि इसके लिए अध्यापकों का ही सहयोग अनिवार्य है, क्योंकि अध्यापकों की सभी समस्याओं को मैं सुलझा चुका हूं, वे मुझे सहयोग अवश्य देगे क्योंकि इससे उनका सम्मान करना भी विद्याथीं जानेंगे। स्कूल में चरित्र को व्यवहार के आधार पर देखा जाएगा। विनम्र और सुशील विद्यार्थियों की, आज्ञापालन करने वाले को और शिक्षा के प्रति ईमानदार, गंभीर तथा समर्पित विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष पुरस्कार दिये जाएंगे। इसके अलावा इसके लिए अलग से सौ अंकों की व्यवस्था होगी। इन अंकों में से प्रत्येक विद्याथों को कम से कम अस्सी अंक प्राप्त करने अनिवार्य ही होंगे और जो विद्याथीं इतने अंक प्राप्त न कर पायेगा उसे उनुप्तीर्ण घोषित कर दिया जाएगा। यदि कोई अध्यापक इन अंकों में अनियमित करता हुआ पाया जाएगा उसे भी दण्डित किया जाएगा।

मुझे इस बात का भी ज्ञान है कि परीक्षा के समय में बोर्ड में भी तथा परीक्षा केन्द्रों में भी अनियमितताओं का प्रयोग होता है। परीक्षक पर अनेक प्रकार के दबाव डाले जाते हैं। इसके लिए मुझे अब कठोर निर्णय लेने हैं तथा उन्हें कठोरता से ही लागू करना है। जो माता-पिता ऐसा करने का प्रयास करेंगे उन्हें निश्चय ही अब कम से कम दो महीने की कैद की सज़ा दी जाएगी। जो अध्यापक ऐसा करेंगे या इसमें सहायक होंगे उन्हें उनकी नौकरी से अलग किया जाएगा तथा जो बोर्ड के कर्मचारी इस कार्य में भाग लेते हुए पाए जायेंगे उन्हें भी नौकरी से तुरन्त अलग किया जाएगा। इसी प्रकार जो विद्यार्थी ऐसा करता हुआ पाया जाएगा उसका शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार समाप्त कर दिया जाएगा और उसे कठोर सजा भी देने की व्यवस्था होगी।

शिक्षा में चरित्र, नैतिकता के अतिरिक्त खेलों के प्रति भी विद्यार्थियों को आकर्षित करवाने की व्यवस्था होगी और जो विद्यार्थी अच्छे खिलाड़ी बनने के योग्य होंगे उन्हें सभी प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जायेगी।

स्त्री शिक्षा- मैं जानता हूँ कि वर्तमान युग में स्त्री शिक्षा का भी विशेष महत्व है। अत: इस ओर ध्यान देना आवश्यक है। स्त्री शिक्षा के विषय में मेरा दृष्टिकोण है कि दसवीं कक्षा तक सभी लड़कियों को अनिवार्य रूप से शिक्षा दी जाय। इसके बाद जो प्रतिभावान् तथा मेहनती लड़कियाँ हों उन्हें ही उच्च शिक्षा के अवसर और सुविधाएं प्रदान की जाएं। स्त्रियों के लिए जो महत्वपूर्ण शिक्षा गृह विज्ञान से संबंधित है तथा बच्चों के मनोविज्ञान से जुड़ी है, उनकी व्यवस्था अत्यावश्यक है। आज समाज में नारी का विशेष योगदान है। उनकी शिक्षा के प्रति भी मैं विशेष ध्यान देना चाहता हूं ; उनके लिए भी नैतिक चारित्रिक और धार्मिक शिक्षा की विशेष व्यवस्था करने का पक्षपाती हूं। सहशिक्षा के अनुकूल मैं अपनेदेश में वातावरण नहीं देखता हूं। केवल उच्च शिक्षा के समय ही सहशिक्षा का मैं पक्ष लूगा। इस प्रकार स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मैं अथक प्रयास करूंगा।

उपसंहार- आप शायद मेरी कल्पना के प्रति गम्भीर नहीं होंगे और इस पर हँसेगे लेकिन मैं इसमें आपका सहयोग चाहता हूं। आप इसकी हँसी न उड़ाइए बल्कि अपना सहयोग दीजिए तो यह सभी कुछ संभव हो जाएगा और जब मैं सबसे पहले अपना चरित्र और कार्य स्वच्छ रखूगा तब आप मेरी बातों पर विश्वास क्यों नहीं करेंगे। तो हम सब ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह मुझे शिक्षा मन्त्री बनने का अवसर दें ताकि मैं आपकी सेवा कर सकूं।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षामंत्री होता (निबंध ) | Essay on If I were the Education Minister in Hindi!

मनुष्य के मन की उड़ान ही उसे ऊँचाई की ओर प्रेरित करती है । मनुष्य पहले कल्पनाएँ करता है उसके बाद उन्हें साकार करने की चेष्टा करता है । यदि मनुष्य ने हजारों वर्ष पूर्व कल्पना न की होती तो आज वह अंतरिक्ष में विचरण नहीं कर रहा होता । वह कभी चंद्रमा पर विजय पताका फहराने में सक्षम नहीं हो पाता ।

बचपन से ही मनुष्य बड़ा होकर कुछ बनने या करने का स्वप्न देखता है । इसी प्रकार मैं भी प्राय: अपनी कल्पना की उड़ान में शिक्षा जगत् में अपना योगदान देना चाहता हूँ । मैं भी लाल बहादुर शास्त्री, पं॰ जवाहरलाल नेहरू व डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद की तरह राजनेता बनना चाहता हूँ ।

ये सभी राजनेता साथ-साथ महान विद्‌वान भी थे । इन्हें देश की समस्याओं की बड़ी गहरी समझ थी । मेरा विचार है कि कोई भी राजनेता यदि शिक्षामंत्री बनना चाहता है तो उसे अच्छा शिक्षाशास्त्री भी होना चाहिए । इसी स्थिति में वह राष्ट्र की उचित सेवा कर सकता है ।

बड़े होकर मैं भी चुनाव में भाग लूँगा । मेरी मंजिल संसद भवन है । लोकसभा सदस्य का चुनाव लड़ने के पश्चात् यदि मैं मंत्रिमंडल का सदस्य बना और मुझे मंत्रिपद के चुनाव के लिए कहा गया तब मैं निश्चित रूप से शिक्षामंत्री का ही पद ग्रहण करूँगा । देश का शिक्षामंत्री बनना मेरे लिए गौरव की बात होगी । मैं इस गौरवान्वित पद की प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और लगन से अपने दायित्व का निर्वाह करूँगा ।

राष्ट्र के माननीय राष्ट्रपति जी से पद और गोपनीयता की शपथ लेने के पश्चात् मैं पदभार ग्रहण करूँगा । इसके पश्चात् मैं अपने शिक्षा सचिवों से शिक्षा जगत के ताजा हालात के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करूँगा ।

इसके अतिरिक्त मैं शिक्षा क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं के बारे में जानना चाहूँगा तथा इसकी पूर्ण जानकारी लूँगा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए पूर्व मंत्रियों द्‌वारा क्या-क्या कदम उठाए गए हैं । पूर्व मंत्रियों द्‌वारा लिए गए निर्णयों का गहन अवलोकन भी मेरे लिए नितांत आवश्यक होगा ताकि उनमें वांछित संशोधनों का पता लगाया जा सके ।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का अवलोकन उस राष्ट्र के शिक्षा स्तर से लगाया जा सकता है । देश की शिक्षा का स्तर प्रायोगिक न होने से बेरोजगारों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती है । शिक्षा का उद्‌देश्य तब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता जब तक मनुष्य में आत्मचिंतन की धारा प्रवाहित नहीं होती है ।

 

अत: शिक्षा जगत की वास्तविक जानकारी ग्रहण करने के उपरांत शिक्षामंत्री के अपने अधिकार से मैं देश में शिक्षा का एक ऐसा प्रारूप तैयार करवाऊँगा जो हमारी शिक्षा को प्रायोगिक रूप दे सके । देश के नवयुवक पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कर सकें ।

नौकरियाँ न मिलने की स्थिति में हताश होने के बजाय स्वरोजगार की ओर प्रेरित हों । जीवन पथ पर महान आदर्शों व नैतिक मूल्यों को ग्रहण कर एक उत्तम चरित्र का निर्माण कर सकें । शिक्षा के उक्त प्रारूप के निर्धारण के लिए शिक्षा जगत की समस्त महान विभूतियों व आधुनिक शिक्षा-शास्त्रियों का मार्गदर्शन अवश्य ही मेरे इस महत्वपूर्ण कार्य में सहयोग करेगा ।

मैं शिक्षा में सुधार के अपने उपायों में प्रयास करूँगा कि शिक्षा जगत का राजनीतिकरण न हो सके । मैं एक ऐसी व्यवस्था कायम करूँगा जिससे शिक्षा क्षेत्र से भाई-भतीजावाद व क्षेत्रवाद जैसी विषमताएँ दूर हो सकें क्योंकि जब तक शिक्षा जगत में भ्रष्टाचार व्याप्त है तब तक उद्‌देश्यों की प्राप्ति नहीं की जा सकती ।

हमारी शिक्षा की दूसरी प्रमुख कमी यह है कि इसका प्रारूप अभी भी लार्ड मैकाले के प्रारूप पर आधारित है जो हमें स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व प्राप्त हुआ था । आज की बदलती परिस्थितियों व समय को देखते हुए इसमें अनेक मूलभूत परिवर्तनों की आवश्यकता है । शिक्षा का वर्तमान प्रारूप रोजगारपरक नहीं है ।

इस समस्या के निवारण के लिए सर्वप्रथम विभिन्न शिक्षा शास्त्रियों के सहयोग से मैं शिक्षा का नीवन प्रारूप तैयार करवाऊँगा जो रोजगारपरक एवं प्रायोगिक होगा । साथ ही साथ देश भर में ऐसे नियमों को लागू करवाऊँगा जिससे रोजगार अथवा उच्च शिक्षा के लिए चयन योग्यता के आधार पर हो सके ।

मनुष्य के जीवन में अनुशासन का विशेष महत्व है । बाल्यकाल से ही अनुशासन के महत्व को स्वीकार करने पर ही उत्तम चरित्र का निर्माण संभव है । मैं विद्‌यालयों में अनुशासन भंग करने वाले समस्त कारणों के निवारण हेतु उचित कार्यवाही करूँगा ।

इस प्रकार शिक्षा जगत में अब तक जो कमियाँ रह गईं हैं, जिसके कारण शिक्षा के मूल उद्‌देश्य की प्राप्ति नहीं हो रही है, मैं उन्हें अपने प्रयासों से दूर करने का प्रयास करूँगा ताकि हमारे देश की गणना विश्व के अग्रणी देशों में हो सके ।

मैं शिक्षा जगत की रीढ़ की हड्‌डी शिक्षकों का क्षीण होता सम्मान लौटाने की पुरजोर चेष्टा करूँगा । आजकल शिक्षकों की नियुक्ति का मापदंड केवल उनका ज्ञान होता है, उनमें पढ़ाने की योग्यता है या नहीं, इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है । शिक्षक यदि चरित्रवान तथा शिक्षण कार्यक्रमों में रुचि लेने वाले न हों तो किसी भी तरह के शिक्षा अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता, यह मेरी यथार्थ सोच है ।

यदि मैं शिक्षा मंत्री होता पर निबंध If I was the Education Minister Essay in Hindi

यदि मैं शिक्षामंत्री होता

कल्पना करना और अपने भावी जीवन के लिए मधुर स्वप्न संजोना मानव की सहज प्रवृत्ति है। एक विद्यार्थी होने के कारण जब आज मैं देश में चल रही शिक्षा पद्धिति पर नजर डालता हूँ तो मन खिन्न हो उठता है। मुझे लगता है कि आज देश में जितनी दुर्दशा शिक्षा की हो रही है, उतनी संभवत: किसी अन्य वस्तु की नहीं। लार्ड मैकाले ने भारत में स्वार्थवृत्ति के कारण जिस शिक्षा पद्धिति की शुरुआत की, वाही आज तक चल रही है। मैंने पढ़ा है कि शिक्षा पद्धिति में सुधर के लिए न जाने कितने आयोग बने, कितनी ही समितियां बनी, पर इनके मूल ढांचे में कोई परिवर्तन ही नहीं हुआ। इसीलिए मेरे मन में एक विचार आया कि यदि मैं देश का शिक्षा मंत्री बन जाऊँ, तो इन दोषों को सुधारने में कोई कसार नहीं छोड़ूगा।

आजकल देश में दो तरह के विद्दालय चल रहे हैं। एक वे पब्लिक स्कूल जिनमें अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं तथा जहाँ शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। जिसमे प्रवेश के लिए पचास हजार से लेकर दो-तीन लाख रूपये तक का डोनेशन देना पड़ता है और दुसरे वे सरकारी विद्द्यालय जिनमे समाज के माध्यम या निर्धन परिवारों के पढ़ते हैं, जो पब्लिक स्कूलों में पढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते। देश का शिक्षा मंत्री बनने पर मेरा सर्वप्रथम काम होगा। इन पब्लिक स्कूलों की व्यापारिक मनोवृत्ति पर अंकुश लगाना। मैं पूरे देश में एक ही प्रकार के विद्द्यालयों की स्थापना के लिए प्रयास करूँगा। मैं जनता हूँ कि एसा करना आसन नहीं होगा क्योंकि समाज के उच्च तथा धनाढ्य वर्ग एसा कभी नहीं चाहेंगे। यदि मैं इसमें सफल न हुआ, तो इतना तो अवश्य करूँगा कि पब्लिक स्कूलों में 50 प्रतिशत स्थान छात्रों के लिए आरक्षित जरूर करवाऊंगा।

शिक्षा मंत्री बनने पर मेरा ध्यान पाठ्य पुस्तकों पर भी होगा। मैंने यह स्वयं अनुभव किया है कि प्राथमिक, मिडिल तथा उच्च सभी श्रेणियों में बालकों को न तो खेलने-कूदने का समय है और न मनोरंजन का। छोटे बालकों के बसते का वजन भी उनके अपने बोझ के बराबर होता है। मैं पाठ्यपुस्तकों के इस बोझ को निश्चय ही कम कराऊंगा।

मैं, देश में चल रही वर्तमान प्रणाली में अमूल चूल परिवर्तन करूँगा। जो परीक्षा पद्धिति तीन घंटों में विद्द्यार्थी की योग्यता का मूल्यांकन करती हो, मेरी दृष्टि में वह किसी भी भांति सही नहीं हो सकती। मैं शिक्षा में सत् एवं समग्र मूल्यांकन पद्धति को शुरू करूँगा जिसे छात्रों की योग्यता तथा क्षमता का उचित मूल्यांकन किया जा सके।

आज के अध्यापकों द्वारा विद्द्यालयों में ठीक से न पढ़ाने और ट्यूशन को बढ़ावा देने के विरुद्ध मैं कठोर कदम उठाऊंगा। मेरी योजना होगी कि अध्यापकों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाये तथा उनका वार्षिक वेतन वृद्धि का आधार भी उनका परीक्षा फल हो। जिस अध्यापक की परीक्षाफल ठीक नहीं होगा, उसके विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दूँगा।

मैं शिक्षा को धर्म तथा राजनीति से अलग रखने के लिए कनून बनाऊंगा। जो शिक्षण संस्था इस कानून का उल्लंघन करेगी उसके विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करने से भी नहीं हिचकूंगा। इसी प्रकार जिन निजी शिक्षण संस्थाओं में अध्यापकों का शोषण किया जाता है, उन्हें कम वेतन दिया जाता है। और हस्ताक्षर पूरे वेतन पर करवाए जाते हैं, उनकी खुफिया जांच करवाकर उनके विरुद्ध सख्त कार्यवाही कराऊंगा। ऐसे विद्यालयों की मान्यता ही रद्द कर दी जाएगी या उन्हें सरकारी अधिकार मिल जाने के लिए कानून पास कराऊंगा। मैं जनता हूँ कि शिक्षा में सुधर में मेरी उपर्युक्त योजनाए साकार करना, अत्यधिक कठिन है पर किसी ने ठीक कहा है –

‘जहाँ चाह वहाँ रहा’। यदि किसी बात को मन में ठान लिए जाये, तो उसे प्राप्त करना असंभव नहीं होता। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि एक बार मुझे शिक्षा मंत्री बनने का सुअवसर प्रदान करें तथा मेरी योजनाओं को सफल करने में सहायक हों।

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