परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh  Hindi Essay in 100-200 words, Hindi Essay in 500 words, Hindi Essay in 400 words, list of hindi essay topics, hindi essays for class 4, hindi essays for class 10, hindi essays for class 9, hindi essays for class 7, hindi essay topics for college students, hindi essays for class 6, hindi essays for class 8

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध :

भूमिका : हर वर्ष करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा देते हैं। स्कूलों व् कोलेजों में बहुत प्रकार की परीक्षाएं आयोजित करवाई जाती हैं। अगर किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी प्रकार की नौकरी प्राप्त करनी हो तो परीक्षा देनी पडती है, किसी कोर्स का दाखिला लेना हो तो परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षाओं के अनेक रूप होते हैं। लेकिन हम केवल एक ही परीक्षा से परिचित हैं जो की लिखित रूप से कुछ प्रश्नों के उत्तर देने से पूरी होती है। खुदा ने अब्राहम की परीक्षा ली थी। परीक्षा के नाम से फरिश्ते घबराते हैं पर मनुष्य को बार-बार परीक्षा देनी पडती है।

परीक्षा क्या है : परीक्षा को वास्तव में किसी की योग्यता, गुण और सामर्थ्य को जानने के लिए प्रयोग किया जाता है। शुद्ध -अशुद्ध अथवा गुण-दोष को जांचने के लिए परीक्षा का प्रयोग किया जाता है। हमारी शिक्षा प्रणाली का मेरुदंड परीक्षा को माना जाता है। सभी स्कूलों और कॉलेजों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसका उद्देश्य विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल कराने के लिए किया जाता है।

स्कूलों में जो सामान्य रूप से परीक्षा ली जाती हैं वह वार्षिक परीक्षा होती है। जब वर्ष के अंत में परीक्षाएं ली जाती हैं तब उनकी उत्तर पुस्तिका से उनकी क्षमता का पता चलता है। विद्यार्थियों की योग्यता को जांचने के लिए अभी तक कोई दूसरा उपाय नहीं मिला है इस लिए वार्षिक परीक्षा से ही उनकी योग्यता का पता लगाया जाता है। परीक्षाओं से विद्यार्थियों की स्मरन शक्ति को भी जांचा जा सकता है।

परीक्षा का वर्तमान स्वरूप : तीन घंटे से भी कम समय में विद्यार्थी पूरी साल पढ़े हुए और समझे हुए विषय को हम कैसे जाँच -परख सकते हैं ? जब प्रश्न -पत्रों का निर्माण वैज्ञानिक तरीके से नहीं होता तो विद्यार्थियों की योग्यता को जांचना त्रुटिपूर्ण रह जाता है। जब परीक्षा के भवन में नकल की जाती है तो परीक्षा-प्रणाली पर एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है। प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना आजकल आम बात हो गई है। हमारी परीक्षा -प्रणाली की विश्वसनीयता लगातार कम होती जा रही है।

नकल क्यूँ : जिस प्रकार राम भक्त हनुमान को राम का ही सहारा रहता था उसी तरह कुछ बच्चों को बस नकल का ही सहारा रहता है। पहले समय में बच्चों को नकल करने के लिए कला का सहारा लेना पड़ता था लेकिन आजकल तो अध्यापक ही बच्चों को नकल करवाने के लिए चारों तरफ फिरते रहते हैं।

नकल करना और करवाना अब एक पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। अगर नकल करवानी है तो माता-पिता के पास धन होना जरूरी हो गया है। कुछ विद्यार्थी दूसरों के लिए आज भी नकल करवाने और चिट बनाने का काम करते रहते हैं। बहुत से विद्यार्थी तो ब्लू-टूथ और एस० एम० एस० के द्वारा भी नकल करते रहते हैं। बच्चों के मूल्यांकन में भी बहुत गडबडी होने लगी है।

नकल के लिए सुझाव : कोई भी परीक्षा प्रणाली विद्यार्थी के चरित्र के गुणों का मूल्यांकन नहीं करती है। जो लोग चोरी करते हैं हत्याएँ करते हैं वे भी जेलों में बैठकर परीक्षा देते और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हैं। जो परीक्षा प्रणाली केवल कंठस्थ करने पर जोर देती है वो विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती। सतत चलने वाली परीक्षा प्रणाली की स्कूलों और कॉलेजों में विकसित होने की जरूरत है। विद्यार्थी के ज्ञान , गुण और क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उपसंहार : आजकल बहुत से लोगों को परीक्षाएं देनी पडती हैं। अगर आपको कोई भी कार्य करना है तो पहले आपको परीक्षा देनी पडती है | कुछ लोग परीक्षा देने के परिश्रम से बचने के लिए नकल करते हैं तो कुछ लोग पैसे देकर नकल करते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। आगे चलकर जब उन्हें कोई व्यवसायिक कार्य या फिर नौकरी पाने के लिए फिर भी परीक्षा देनी ही पड़ेगी।

परीक्षाओं में बढती नकल की प्रवृत्ति पर निबंध-Hindi Nibandh

यूँ तो प्रत्येक परीक्षा केंद्र के बाहर बड़े-बड़े इश्तिहार लगाए जाते हैं, जिन पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता है- ‘परीक्षा में नकल करना पाप है/ सामाजिक बुराई है।’ फिर भी ‘रघुकुल रीत सदा चली आई’ की तर्ज पर परीक्षाओं में नकल है कि चलती ही आ रही है। यदि किसी रोज इस अपील का ऐसा असर हो जाए कि परीक्षाओं में नकल होना बिलकुल ही बंद हो जाए तो इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
मसलन ऐसे कई प्राइवेट स्कूलों को अपना बोरिया-बिस्तर गोल करना पड़ सकता है, जिनमें विद्यार्थी दाखिला ही इस आश्वासन के बाद लेते हैं कि उन्हें ‘शर्तिया पास’ करवाया जाएगा और इस गारंटी को पूरा करने के लिए ‘परीक्षा केंद्र अधीक्षक’ नामक प्राणी की ‘पेड’ सेवाएँ ली जाती हैं। दूसरी तरफ नकल बंद होने के कारण आए खराब परीक्षा परिणामों के मद्देनजर गुस्साए अभिभावकों द्वारा सरकारी स्कूलों पर, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, ताले जड़े जा सकते हैं।
सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों के इस प्रकार धड़ाधड़ बंद होने से पूरी शिक्षा व्यवस्था ही चरमरा सकती है और विद्या के इन मंदिरों में तैयार होने वाले समाज के भावी नागरिकों का प्रोडक्शन यकायक बंद हो सकता है।

यही नहीं, प्राइवेट स्कूलों में अपना शोषण करवाकर भी जैसे-तैसे अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे शिक्षक सड़कों पर आ जाएँगे, जिससे कि बेरोजगारी के सेंसेक्स में अभूतपूर्व उछाल आ सकता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को खराब परीक्षा परिणाम के कारण खराब हुई अपनी एसीआर को सुधरवाने के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जेबें गर्म करनी पड़ सकती हैं, जिससे कि भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से ऊपर की ओर जाने लगेगा। 

विभिन्न परीक्षा केंद्रों के आसपास ‘फोटोस्टेट’ की दुकान वालों, जो कि मात्र परीक्षाओं के दिनों में ही अपनी-अपनी जीरोक्सिंग मशीन की पूरी लागत से भी कहीं अधिक रकम वसूल कर लेते हैं, को नकल न होने की स्थिति में अभूतपूर्व गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। नकल करवाने वाले परीक्षा केंद्र अधीक्षकों एवं इस सुकृत्य में उनके सहयोगी चपरासियों, क्लर्कों, सुपरवाइजरी स्टाफ आदि को मिलने वाले सुविधा शुल्क एवं उपहारों का सिलसिला बंद होने की स्थिति में अपना सोशल स्टेटस बनाए रखने में काफी दिक्कतें पेश आ सकती हैं।
इतना ही नहीं, नकल न होने की स्थिति में पर्चियाँ बनाने जैसी उच्चकोटि की प्राचीनकाल से चली आ रही कला का दम घुट जाएगा। नकल बंद होने के फलस्वरूप विभिन्न राज्यों के अथवा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालयों आदि के परीक्षा परिणामों में भारी गिरावट आने पर, शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर विधानसभा, लोकसभा अथवा राज्यसभा में धरना, विरोध, प्रदर्शन, हंगामा जैसी अप्रिय स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं और मीडिया कवरेज के चलते, देश की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बट्टा लग सकता है।
कहीं भी नकल न होने की स्थिति में परीक्षाओं में फेल होने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के चलते युवा वर्ग में बेचैनी, निराशा एवं कुंठा जैसे नकारात्मक भाव जागृत हो सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हो सकती है और अंततोगत्वा संपूर्ण सामाजिक वातावरण तनावग्रस्त हो सकता है। परीक्षाओं में नकल न होने के फलस्वरूप उपरोक्त दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चाहिए कि वह इस मामले में यथास्थिति बनाए रखे और परीक्षाओं में नकल रोकने जैसे अभियान को, जैसा कि अब तक होता आया है, ‘औपचारिकता मात्र’ बनाकर सिर्फ कागजों तक ही सीमित रखा जाए।

 

परीक्षाओं को नकलमुक्त करने के लिए शिक्षा बोर्ड प्रत्येक वर्ष काफी प्रतिबद्धता का ढिंढोरा पीटता है, परंतु परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’ वाला ही रहा है। मेरा ऐसा कहने का तात्पर्य यह नहीं कि पूर्व में किए गए बोर्ड द्वारा प्रयत्न संदेहास्पद थे। बोर्ड ने विगत वर्षों में अपनी क्षमता के अनुसार विद्यार्थियों में नकल की प्रवृत्ति को रोकने के लिए भरसक प्रयत्न किए। इसके लिए बोर्ड ने सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शिक्षा अधिकारियों तथा अध्यापकों तथा बोर्ड के अधिकारी वर्ग और अन्य कर्मचारियों को भी परीक्षाओं के दौरान निरीक्षण पर लगाया, परंतु परिणाम इतने उत्साहवर्धक नहीं रहे। बोर्ड इस बार भी काफी होम वर्क कर रहा है, देखते हैं परिणाम कैसे रहते हैं। बोर्ड की अब तक की असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण सभी स्कूलों में परीक्षा केंद्रों का होना है, जबकि 80 प्रतिशत परीक्षा केंद्रों के भवन इतने घटिया स्तर के हैं कि वहां पर परीक्षा केंद्र रखना नकल को बढ़ावा देना है। बोर्ड ने काफी संख्या में परीक्षा केंद्रों को इस बार बंद किया है। बोर्ड का यह पग अति सराहनीय है, परंतु और भी परीक्षा केंद्र ऐसे हैं, जिनको बंद करना भी अनिवार्य है। इन परीक्षा केंद्रों के दो कमरे एक जगह हैं और दो या तीन कमरे दूसरी जगह हैं। इनकी खिड़कियां और दरवाजे भी टूटे हैं। अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर भी सही नहीं हैं। न ही इन कमरों के बाहर कोई कांटेदार तार लगी है, जिससे कि बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सके। एक आदर्श परीक्षा केंद्र के लिए एक बड़ा हाल जिसमें 200 से 300 बच्चों के बैठने का प्रावधान हो, होना चाहिए। यदि कमरों को परीक्षा केंद्र बनाया गया है, तो वे अंदर से एक दूसरे के साथ जुडे़ होने चाहिए, ताकि परीक्षार्थियों का ठीक ढंग से निरीक्षण किया जा सके। बोर्ड अधिकारियों को समय रहते इन सभी परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करना चाहिए और जो परीक्षा केंद्र बोर्ड के मापदंडों के अनुसार नहीं हैं उन्हें तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए। परीक्षाओं के संचालन में केवल, स्वच्छ छवि, ईमानदार और चरित्रवान अध्यापकों को ही लगाया जाना चाहिए। बहुत से ऐसे पेशेवर अध्यापक हैं जो अपनी ड्यूटी परीक्षाओं में बोर्ड कर्मचारियों के साथ मिलीभगत से प्रतिवर्ष लगवा लेते हैं, ऐसे अध्यापकों को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। परीक्षा अधीक्षक केवल स्कूलों के प्रिंसीपल और मुख्याध्यापक ही लगाए जाने चाहिए तथा इस ड्यूटी को मैनडेटरी किया जाना चाहिए। यदि प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक किसी कारण इस ड्यूटी पर नहीं जा सकते तो सीनियर पीजीटी को इस ड्यूटी पर भेजा जाना चाहिए। सीबीएससी केवल प्रिंसीपल/मुख्याध्यापक या सीनियर पीजीटी को ही परीक्षा अधीक्षक की ड्यूटी पर लगाता है और दूसरे इसके परीक्षा केंद्र कम होते हैं और यही कारण है कि  सीबीएससी की परीक्षाओं में नकल का नामोनिशान नहीं है। यदि हिमाचल बोर्ड भी इस नीति का अनुसरण करता है तो मुझे पूरा भरोसा है कि नकल पर काबू पाया जा सकता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पुस्तकों तक ही सीमित है। इसको ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए अध्यापक को स्वयं रोल मॉडल बनना चाहिए, ताकि बच्चों में अच्छे संस्कार बने और वे उचित और अनुचित में भेद कर सकें और नकल को पास होने का अनुचित ढंग समझ कर इसे त्याग दें। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अध्यापकों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। यदि अध्यापक नकल को समाप्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है तो समझ लो कि नकल समाप्त हो गई। ऐसी मानसिकता बनाने के लिए बोर्ड को समय-समय पर ऐसी समस्याओं पर गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए। नकल रोको अभियान में अध्यापकों को अग्रणी किया जाना चाहिए और नकल को समाप्त करने का पूरा श्रेय उन्हीं को दिया जाना चाहिए। स्कूली स्तर जहां परीक्षा केंद्र हैं, वहां पर नकल को रोकने के लिए स्थानीय विशिष्ट व्यक्तियों की एक कमेटी बनाई जानी चाहिए। इसमें सेवानिवृत्त प्रिंसीपल मुख्याध्यापक, अध्यापक तथा अन्य विभागों के सेवानिवृत्त अधिकारी होने चाहिएं जो परीक्षाओं के दौरान नकल रोकने के लिए रणनीति बनाएं तथा उस पर कार्य करें।

 

क्या कभी परीक्षा के दौरान क्लास के दूसरे बच्चों के पेपर में झाँकने का आपका मन किया है? अगर हाँ, तो ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं हुआ। बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाली जॆना, अपनी क्लास के कई बच्चों के नकल करने के बेशर्म रवैए के बारे में इस तरह कहती है: “वे शेखी बघारते हुए बताते हैं कि उन्होंने नकल कैसे की। अगर आप नकल नहीं करते तो वे आपको अजीब निगाहों से देखते हैं!”

अमरीका में किए एक सर्वे से पता चला कि अपनी क्लास में सबसे ज़्यादा नंबर लानेवाले 80 प्रतिशत किशोरों ने कबूल किया कि उन्होंने नकल की थी और इन “सबसे अच्छे नंबर” लानेवालों में से 95 प्रतिशत विद्यार्थी कभी नहीं पकड़े गए। पाँचवीं से बारहवीं कक्षा में पढ़नेवाले 20,000 से भी ज़्यादा बच्चों का सर्वे लेने के बाद जोसेफसन इंस्टिट्यूट ऑफ एथिक्स इस नतीजे पर पहुँचता है: “ईमानदारी और खराई के मामले में स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है।” नकल करना हर कहीं इतना आम हो गया है कि शिक्षक भी हक्के-बक्के रह जाते हैं! स्कूल के निर्देशक गैरी जे. नील्स ने यहाँ तक कहा: “अब नकल न करनेवालों की संख्या बहुत कम है।”

ज़्यादातर माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई के मामले में ईमानदार रहें। मगर अफसोस कि कई नौजवान नकल करने के लिए अपनी ईमानदारी को ताक पर रख देते हैं। वे कौन-से नए तरीके अपनाते हैं? कुछ नौजवान नकल क्यों करते हैं? आपको इससे दूर क्यों रहना चाहिए?

आधुनिक तकनीक के ज़रिए नकल करना

नए ज़माने के नकल करनेवाले कई धूर्त तरीके अपनाते हैं। किसी का होमवर्क नकल करना या परीक्षा के दौरान चुपके से परचे में से नकल करना, ये सारे तरीके तो आज की आधुनिक तकनीकों और तरकीबों के आगे बिलकुल फीके पड़ जाते हैं। आधुनिक तकनीक में पेजर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से परीक्षा में आए सवालों के जवाब दूसरे व्यक्‍ति से लिए जा सकते हैं; कैलकुलेटर में ऐसे प्रोग्राम बनाए गए हैं, जिसमें “अतिरिक्‍त” जानकारी मिलती है; कपड़ों में बिलकुल छोटे कैमरे छिपे होते हैं जिससे दूसरी जगह मौजूद मददगार तक परीक्षा में आए सवाल पहुँचाए जाते हैं; कुछ आधुनिक कैलकुलेटर ऐसे हैं जो इंफ्रारॆड रेडिएशन के ज़रिए क्लास में बैठे दूसरे विद्यार्थी तक संदेश पहुँचाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी इंटरनॆट साइट्‌स भी हैं, जिनमें किसी भी विषय पर पूरा-का-पूरा जवाबों का परचा पाया जा सकता है!

नकल करने के इस खतरनाक चलन को रोकने और उस पर काबू पाने के लिए शिक्षक काफी कोशिश कर रहे हैं, मगर यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि नकल करने के मतलब के बारे में सभी विद्यार्थियों या शिक्षकों की राय अलग-अलग है। मसलन, जब किसी प्रॉजॆक्ट पर विद्यार्थियों का समूह काम करता है तो इसमें मिलकर ईमानदारी से किए काम और साँठ-गाँठ से बेईमानी के काम के बीच की रेखा, साफ-साफ नज़र नहीं आती। ऐसे भी कुछ विद्यार्थी होते हैं जो समूह का फायदा उठाते हुए सारा काम दूसरों पर छोड़ देते हैं। सरकारी कॉलेज में पढ़नेवाला युजी कहता है, “कुछ विद्यार्थी तो बेहद आलसी होते हैं। वे कुछ भी नहीं करते! फिर भी उन्हें उनके बराबर अंक मिलते हैं जिन्होंने असल में सारी मेहनत की थी। मेरे हिसाब से यह भी नकल करना ही है!”

वे नकल क्यों करते हैं?

एक सर्वे से पता चला कि नकल करने का सबसे बड़ा कारण है, विद्यार्थियों का तैयारी करके न जाना। कुछ मामलों में, स्कूल में एक-दूसरे से होड़ लगाने का माहौल या माता-पिताओं की ऊँची उम्मीदों पर खरे उतरने का दबाव विद्यार्थियों पर इतना ज़्यादा होता है कि वे कहते हैं, उनके पास नकल करने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता। तेरह साल का सैम कहता है: “मेरे मम्मी-पापा के लिए ज़्यादा नंबर लाना ही सब कुछ था। वे मुझसे पूछते थे: ‘तुम्हें गणित में कितने नंबर मिले? तुम अँग्रेज़ी के पेपर में कितने नंबर लाए हो?’ और इन सवालों से मुझे नफरत थी!”

कुछ लोगों पर अच्छे नंबर लाने का लगातार दबाव रहता है इसलिए वे नकल करने लगते हैं। किताब अमरीकी किशोरों की निजी ज़िंदगी (अँग्रेज़ी) कहती है: “जिस व्यवस्था में विद्यार्थियों पर इतना दबाव होता है कि उन्हें किसी विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज़्यादा चिंता अच्छे नंबर लाने की लगी रहती है, और वह भी इतनी कि वे कभी-कभी ईमानदारी को भी ताक पर रख देते हैं, तो ऐसी व्यवस्था में बिलकुल संतुलन नहीं है।” यह बात कई विद्यार्थी मानते हैं। आखिर कौन परीक्षा में फेल होना चाहेगा या खासकर कौन फिर से उसी क्लास में बैठना चाहेगा। हाई स्कूल का एक विद्यार्थी जिमी कहता है, “कुछ बच्चे तो फेल होने से इतना डरते हैं कि सही जवाब मालूम होने पर भी वे नकल करते हैं, सिर्फ यह तय करने के लिए कि उनके जवाब गलत ना जाएँ।”

आज ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग ईमानदारी के स्तर को छोड़कर नकल कर रहे हैं तो ऐसा लग सकता है कि नकल करने में कोई नुकसान नहीं है। कभी-कभी तो शायद इसके फायदे ही फायदे नज़र आएँ। सत्रह साल का ग्रेग कहता है, “कल मैंने अपनी एक क्लास में एक बच्चे को नकल करते देखा। आज जब हमें अपना-अपना पेपर मिला तो उसको मुझसे ज़्यादा नंबर मिले थे।” कई लोग अपने दोस्तों की देखा-देखी नकल करने लगते हैं। युजी कहता है, “कुछ बच्चे सोचते हैं कि ‘अगर दूसरे करते हैं तो मुझे करने में क्या हर्ज़ है?’” लेकिन क्या ऐसी सोच सही है?

ऐसी लत जो एक धोखा है

ज़रा नकल करने की तुलना चोरी से कीजिए। आज चोरी करना आम हो गया मगर क्या यह बात चोरी करने को जायज़ ठहराती है? ‘हरगिज़ नहीं।’ आप शायद ऐसा कहें, खासकर तब जब आपका पैसा चुराया गया हो! दरअसल नकल करके हम उस बात का श्रेय ले रहे होते हैं, जिसके हम हकदार नहीं। यहाँ तक कि हम उस इंसान का भी नाजायज़ फायदा उठा रहे होते हैं, जिसने ईमानदारी से काम किया था। हाल ही में हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म करनेवाला टॉमी कहता है, “नकल करना बिलकुल सही नहीं है। ऐसा करके दरअसल आप कह रहे होते हैं कि ‘मुझे उन विषयों की अच्छी जानकारी है’ जबकि हकीकत में आप कुछ नहीं जानते। तो यह एक झूठ ही हुआ।” इस मामले में बाइबल का नज़रिया में बिलकुल साफ बताया गया है: “एक दूसरे से झूठ मत बोलो।”

नकल करना एक ऐसी लत बन सकती है, जिसे छुड़ाना बहुत मुश्‍किल हो सकता है। जॆना कहती है: “नकल करनेवाले यह सीख लेते हैं कि पास होने के लिए उन्हें पढ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए वे पूरी तरह से नकल करने पर निर्भर रहते हैं। लेकिन ज़िंदगी में जब उन्हें अपने बलबूते कुछ करना पड़ता है, तो वे ठीक से काम नहीं कर पाते।”

में दिया गया सिद्धांत वाकई गौर करने लायक है: “मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।” स्कूल में नकल करनेवालों को ये अंजाम भुगतने पड़ सकते हैं, जैसे उनका विवेक उन्हें कचोटने लगे, दोस्तों का उन पर से भरोसा उठ जाए और पढ़ने की क्रिया को टालने की वजह से उनकी पढ़ने-लिखने की क्षमता कमज़ोर पड़ जाए। जिस तरह कैंसर शरीर में फैलकर जानलेवा हो जाता है, उसी तरह धोखाधड़ी करने की आदत ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं पर असर कर सकती है, और यह अच्छे-से-अच्छे रिश्‍तों में भी ज़हर घोल सकती है। लेकिन इसका सबसे बुरा असर परमेश्‍वर के साथ आपके रिश्‍ते पर पड़ेगा क्योंकि उसे धोखाधड़ी से सख्त नफरत है।—

नकल करनेवाले दरअसल खुद को ही धोखा देते हैं। अपने काम से वे दिखाते हैं कि वे प्राचीन नगर यरूशलेम के उन भ्रष्ट शासकों की तरह हैं: “हम ने झूठ की शरण ली और मिथ्या की आड़ में छिपे हुए हैं।”  लेकिन यह हकीकत है कि नकल करनेवाला अपना काम, परमेश्‍वर की नज़रों से छिपा नहीं सकता।

नकल मत कीजिए!

कई मामलों में नौजवान नकल करने के लिए बहुत दिमाग लड़ाते और मेहनत करते हैं। इसके बजाए वे ईमानदारी से पढ़ाई करने में उतना ही दिमाग लगाएँ और मेहनत करें तो ज़्यादा फायदा पा सकते हैं। जैसा कि 18 साल की ऐबी कहती है, “अगर वे नकल करने के बजाय पढ़ाई करने में खुद को लगाएँ तो ज़्यादा अच्छे नंबर ला सकते हैं।”

यह सच है कि नकल करने का प्रलोभन ज़बरदस्त होता है। लेकिन गलत राह की ओर ले जानेवाले ऐसे फँदे से दूर रहिए! आप यह कैसे कर सकते हैं? सबसे पहले, याद रखिए कि आप स्कूल क्यों जाते हैं—सीखने के लिए। बेशक, ऐसा लग सकता है कि उन सारी बातों को सीखने का क्या फायदा, जिनका आप शायद ही कभी इस्तेमाल करें। मगर जो इंसान पढ़ाई करने से जी चुराता है और नकल करता है, वह नयी-नयी बातों को सीखने और ज्ञान का व्यावहारिक तरीके से इस्तेमाल करने की अपनी काबिलीयत को कमज़ोर कर देता है। सचमुच की समझदारी बिना मेहनत के हासिल नहीं की जा सकती; उसे पाने के लिए कोशिश करनी पड़ती है। बाइबल कहती है: “सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।” जी हाँ, आपको अपनी पढ़ाई और उसकी तैयारी को गंभीरता से लेना चाहिए। जिमी सलाह देता है: “परीक्षा से पहले पढ़ाई करनी ही चाहिए। इससे आपमें आत्म-विश्‍वास बढ़ेगा कि आप सवालों के जवाब जानते हैं।”

बेशक कभी-कभी हो सकता है कि आप सभी जवाब न जानते हों, जिसकी वजह से आपको नंबर कम मिले। लेकिन अगर आप अपने सिद्धांतों से समझौता न करें तो आप देख सकेंगे कि सुधरने के लिए आप और क्या कर सकते हैं।—

युजी, जिसका पहले भी ज़िक्र किया गया है, एक यहोवा का साक्षी है। वह बताता है कि जब नकल करने के लिए क्लास के बच्चों की मदद करने का उस पर दबाव आता है तो वह क्या करता है: “सबसे पहले मैं उन्हें बता देता हूँ कि मैं एक साक्षी हूँ। और इससे मुझे काफी मदद मिली है क्योंकि वे जानते हैं कि यहोवा के साक्षी ईमानदार हैं। अगर कोई मुझसे परीक्षा के दौरान किसी सवाल का जवाब पूछता है तो मैं साफ मना कर देता हूँ। फिर बाद में उसे समझाता हूँ कि मैंने क्यों ऐसा किया।”

युजी, इब्रानियों को कहे प्रेरित पौलुस के कथन से सहमत है: “हम सब बातों में अच्छी चाल [या “ईमानदारी से,” NW] चलना चाहते हैं।” (इब्रानियों 13:18) अगर आप ईमानदारी के ऊँचे स्तर पर टिके रहते हैं और नकल करने से इनकार करके समझौता नहीं करते तो इससे आप जो अच्छे नंबर हासिल करेंगे, उन नंबरों की असली कीमत होगी। उस समय आप अपने माता-पिता को सबसे बेहतरीन तोहफा दे रहे होंगे और वह है, मसीही खराई का सबूत। (3 यूहन्‍ना 4) इसके अलावा, आप एक शुद्ध विवेक बनाए रखते हैं और इस बात से खुश रहते हैं कि आपने यहोवा परमेश्‍वर के दिल को खुश किया है।

नकल विरोधी कानून पर निबंध,

स्कूलों में नकल की रोकथाम पर संपादकीय,

नकल की रोकथाम के उपाय,

नकल पर शायरी,

परीक्षा में नकल करने के तरीके,

नकल विरोधी कानून इन हिंदी,

नकल करना,

किसी की नकल करने की,

Comments

comments

Leave a Comment

error: