छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

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छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध :

भूमिका : भारत में सबसे बड़ा लोकतंत्र है और कई जातियों और धर्मों में विभाजित है। छुआछूत भारत के हिन्दू समाज से जुडी हुई एक बहुत ही गंभीर समस्या है। छुआछूत हमारे देश के लिए एक ऐसी बीमारी है जो दूसरी समस्याओं को पैदा करती है। छुआछूत दीमक की तरह होती है जो हमारे देश को अंदर से खोखला कर रही है।

हमारे देश में अनेक समस्याएँ हैं लेकिन छुआछूत बहुत ही भयंकर और घातक सिद्ध होने वाली समस्या है। किसी विद्वान् ने कहा था कि छुआछूत इन्सान और भगवान दोनों के प्रति एक पाप है। छुआछूत एक ऐसा कलंक है जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि मेरा कोई अपना देश ही नहीं है जिसे मैं अपना देश कहता हूँ उस देश में हमारे साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता है।

छुआछूत का अर्थ : छुआछूत का अर्थ होता है – जो स्पर्श करने योग्य न हो। जब किसी व्यक्ति के समूह या समुदाय को अस्पर्शनीय माना जाता है और उसके हाथ की छुई हुई वस्तु को कोई नहीं खाता उसे छुआछूत कहते हैं। उन लोगों के साथ कोई भी मिलजुल कर नहीं रहता और न ही उनके साथ कोई खाना खाता है।

जिन लोगों से निचली जाति का काम करवाया जाता है उन्हें अछूत कहा जाता है। प्राचीनकाल में महाराजाओं के द्वारा किसी व्यक्ति के व्यवसाय क देखकर ही उसके धर्म की स्थापना की गई थी। उस समय पर हर किसी ने अपने धर्म को खुद चुना था। ब्राह्मण लोगों को शिक्षा देते थे , क्षत्रिय देश और समाज की रक्षा किया करते थे।

वैश्यों का काम व्यापार और वाणिज्य की देखभाल करना और शूद्रों का काम ऊपर की तीन जातियों की सेवा करना था। लेकिन कालान्तर में ये विभाजन रूढ़ हो गया था। एक वेद में भी कहा गया है कि मैं एक शिल्पी हूँ। मेरे पिता वैश्य हैं और मेरी माँ उपले थापने का काम करती हैं। प्राचीनकाल में एक ही परिवार के लोग अलग-अलग काम करते थे फिर भी वे ख़ुशी से रहते थे। उन लोगों में उंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं था।

भारत के अछूत लोग : हमारे भारत में हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के अनुसार चार जातियाँ हैं – ब्राह्मण , क्षत्रिय , सैनिक , शुद्र आदि। जो लोग हरिजन जाति मतलब दबी हुई जाति के होते हैं उन्हें अछूत कहते हैं। अछूत लोगों को हिन्दू की वर्ण-व्यवस्था की जातियों में नहीं गिना जाता हैं। अछूत लोगों को बहिष्कृत जाति का व्यक्ति समझा जाता है।

अछूतों को हिन्दू की जाति व्यवस्था में नहीं गिना जाता है। अछूत वर्ण एक अलग पांचवां वर्ण स्थापित किया गया है। प्राचीनकाल में जो लोग घटिया स्तर का काम करते थे या निचली जाति के लोग जो नौकरों का काम करते थे वे अपराधी होते थे और जिन लोगों को छूत की बीमारी होती थी वे लोग देश से बाहर ही रहते थे।

जो लोग सभ्य होते थे वो लोग उन लोगों को ही अछूत कहते थे। ऐसे लोगों से दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया जाता था क्योंकि यह बीमारी छूने से होती थी। उस समय पर छूत बीमारी वाले लोग दूसरे लोगों के लिए बहुत ही हानिकारक होते थे।

उस समय इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं था इसी वजह से छूत लोगों को दूसरे लोगों को स्वस्थ रखने के लिए उस राज्य से दूर भेज दिया जाता था ताकि यह बीमारी किसी और को ना हो। छुआछूत एक तरह का दंड होता है जो उन लोगों को दिया जाता था। जो लोग राज्य के बनाए हुए कानूनों को तोड़ता था और समाज की व्यवस्था में एक बाधा पैदा करता था।

जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें दलित कहा जाता है। उन्हें इस नाम से इसलिए बुलाया जाता है क्योंकि जो लोग अछूत लोगों से संबंध रखते थे उन्हें भी अछूत ही माना जाता है। सफाई , चमडा ,स्वच्छता , मृत शरीरों को हटाने वाले लोगों को अछूत माना जाता है।

छुआछूत को दूर करने के प्रयत्न : छुआछूत को एक बुराई के रूप में समाज ने स्वीकार किया है जिसको दूर करने के लिए प्राचीनकाल से ही कोशिशें की जा रही हैं। बहुत से महापुरुषों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन फिर भी यह समस्या वैसी की वैसी बनी रही। महात्मा बुद्ध ने इसके खिलाफ सशक्त आवज उठाई थी।

रामायण को दिखाकर इस भेदभाव को समाप्त करने की भी कोशिश की गई। उन्हें श्री राम के गुहराज , शबरी और भीलों के संग मेल-मिलाप की बातें बताई गयीं। सबसे पहले तो दयानन्द जी ने छुआछूत को खत्म करने की जिम्मेदारी ली थी। एक तरफ तो उन्होंने मूल हिन्दुओं को हिन्दू बनाया था दूसरी तरफ उन्हें अछूत कहकर गले से लगाया था।

आर्य समाज में भी अछूतोद्धार शब्द का प्रयोग किया गया था। वे खुद जाकर हरिजन बस्ती में रहे थे जिसका अर्थ होता है भगवान का प्यारा व्यक्ति। हरिजन में रहने वाले लोगों के लिए भीम राव अंबेडकर ने बहुत ही उत्थान काम किया था उससे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।

युवाओं के विचारों को बदला जा रहा है और भी चीजों में धीरे-धीरे परिवर्तन किये जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा और वैश्वीकरण से भी युवाओं की सोच को बदला जा रहा है इसे धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से सोच को बदला नहीं गया है।

जब संविधान का निर्माण किया गया था तब यह निर्धारित किया गया था कि समाज में फैली बुराईयों का उन्मूलन करने के लिए पिछड़ी जातियों के उत्थान में संविधान में प्रावधान किये जायेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान में अनुच्छेद 17 बनाया गया था।

अछूतों के साथ भेदभाव : भारत के दलितों के साथ एन.सी.डी.एच.आर.के अनुसार बहुत भेदभाव किया जाता है। अछूत लोगों के साथ कोई भी भोजन नहीं कर सकता। कोई भी किसी अलग जाति के सदस्य से शादी नहीं कर सकता। गांवों में चाय की दुकानों पर अछूत लोगों के लिए अलग बर्तन होते हैं।

अछूत लोग मंदिरों में नहीं जा सकते। अछूत लोगों को सार्वजनिक रास्ते पर चलना मना होता है। अछूत बच्चों को स्कूलों में अलग बैठाया जाता है। अछूतों के लिए होटलों में बैठने के लिए और खाने के लिए अलग बर्तनों की व्यवस्था होती है। अछूतों के लिए गांवों के कार्यक्रम या त्यौहारों में बैठने और खाने के लिए अलग व्यवस्था होती है।

जब अछूत लोग अपना काम करने से मना कर देते हैं तो समाज से उनका बहिष्कार कर दिया जाता है। अछूत लोगों को उच्च जाती के लोगों के सामने छाता लगाना और चप्पल पहनना मना है। अछूत लोगों के लिए अलग शमशान बनाया गया है। उनसे कोई अन्य जाति का सदस्य दोस्ती नहीं कर सकता।

वर्तमान युग में छुआछूत के बने रहने के कारण :- आज भी हमारे समाज में जाति और जन्म के बीच आज भी भेदभाव किया जाता है। आज भी हम देख सकते हैं कि गाँव और कस्बों के लोगों में छुआछूत का व्यवहार किया जाता है। आज के युग में भी अछूत लोगों को पनघटों और मन्दिरों में जाने से रोका जाता है। उनके रहने के लिए जगह भी अलग दी जाती है।

आख़िरकार ये कुप्रथा अब तक किस प्रकार से बनी हुई है ? शहरों में जो लोग कूड़ा बीनते हैं उन लोगों को भी अछूतों की नजर से देखा जाता है। बुराई हिन्दू समाज के लोगों में बहुत ही गहराई तक पहुंच गई है इसी वजह से आजादी के बाद भी आज तक ये समस्या अलग-अलग तरह से समाज में बनी हुई है।

जो लोग छुआछूत में विश्वास रखते हैं उनके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाई की जाती है क्योंकि छुआछूत के खलिफ कानून बनाए गये हैं। ऐसा करने से भी छुआछूत की समस्या खत्म नहीं हो रही है। इस प्रथा के अब तक बने रहने का सबसे बड़ा कारण हमारे देश में उचित शिक्षा का न होना है। जो लोग अछूत समझे जाते हैं वे लोग आज भी अशिक्षित और रूढ़ग्रस्त होते हैं।

उन के पास अभी तक अन्य ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुँचा है। हम लोग प्राय देखते हैं कि जो हरिजन लोग शिक्षा को प्राप्त करते हैं वे अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार लेते हैं और उन्हें अछूत नहीं माना जाता है। अछूतों की आर्थिक स्थिति भी एक प्रकार से छुआछूत की समस्या का एक बहुत ही मुख्य कारण है।

छुआछूत के दुष्परिणाम : सारे जगत में छुआछूत के सामाजिक , राजनितिक , धार्मिक और संस्कृतिक दुष्परिणाम बहुत ही प्रचलित हैं। आज के युग में हमारा देश आगे तो बढ़ रहा है पर फिर भी छुआछूत की समस्या की वजह से देश के एक बहुत बड़ा भाग को सुख-सुविधाओं से अभी तक परिचित नहीं कराया गया है।

जो हरिजन गाँव में रहते हैं उनके पास जीवन को जीने के लिए सुविधाएँ बहुत ही कम होती हैं। हमारे देश में गरीबी का एक कारण छुआछूत भी है। जब तक अच्चुत लोगों को समाज की मुख्यधारा में स्थान नहीं मिल जाता तब तक देश का समुचित विकास कभी नहीं हो सकता है।

हमारा देश कई साल पहले आजाद हो चूका है लेकिन हरिजन वर्ग आज तक राजनितिक ,आर्थिक और सामाजिक रूप से आजाद नहीं हो पाया है। हम लोगों से समय यह मांग करता है कि छुआछूत को समाप्त कर दिया जाये। प्राचीनकाल में लोग यह मानते थे की अगर अछूत लोग उन्हें छू लेते या फिर उनकी परछाई भी उन पर पड़ जाती थी तो वे अपवित्र हो जाते हैं और दोबारा से पवित्र होने के लिए उन्हें गंगा जल से स्नान करना पड़ता है।

उपसंहार :- आज के युग में भी छुआछूत की समस्या हमारे लोगों के बीच की दीवार बनी हुई है। आज के समय में भी कुछ लोग अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ , उच्च और योग्य समझते हैं। हरिजन वर्ग के लोगों पर आज भी अत्याचार किया जाता है उनके साथ जानवरों से भी बुरा बरताब किया जाता है।

जब चुनाव होते हैं तो लोगों को अपने मत को स्वंय चुनने का अधिकार नहीं दिया जाता है। आज भी बंधुआ मजदूर के रूप में बहुत से लोग अमीरों के दास बने हुए हैं। हमारी सरकार अछूतों की आर्थिक स्थिति को सुधरने के लिए अनेक प्रयास कर रही है। जो लोग अछूत माने जाते हैं उन्हें भी अपनी तरफ से कुछ प्रयास करने चाहिए। जब तक वे शिक्षित नहीं हो जाते तब तक उनका सुधार होना असंभव है।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

अस्पृश्यता या छूआछूत परम्परागत हिन्दू समाज से जुड़ी सामाजिक बुराई और एक गंभीर खतरा है। ये बहुत से समाज सुधारकों के विभिन्न प्रयासों के बाद भी जैसे डॉ. भीमराव अंबेडकर और उनके द्वारा निर्मित संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन के बावजूद ये अति प्राचीन समय से प्रचलित प्रथा आज भी प्रचलन में है।

छूआछूत (अस्पृश्यता) क्या है?

अस्पृश्यता या छूआछूत एक सामान्य शब्द है जिसे अभ्यास द्वारा समझा जा सकता है जहाँ एक विशेष जाति या वर्ग के व्यक्ति को निम्न जाति में जन्म लेने या उस निचली जाति समूह से संबंध रखने के कारण उस समूह से निचले स्तर के कार्यों को कराकर भेदभाव किया जाता है। उदाहरण के लिये; तथाकथित ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उच्च जाति के लोग भंगी के साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते।

ये मान्यता है कि अस्पृश्य या अछूत लोगों से छूने, यहाँ तक कि उनकी परछाई भी पड़ने से उच्च जाति के लोग अशुद्ध हो जाते है और अपनी शुद्धता वापस पाने के लिये उन्हें पवित्र गंगा-जल में स्नान करना पड़ता है।

भारत में अस्पृश्य या अछूत कौन है?

हिन्दूओं की परंपरागत प्राचीन “वर्ण-व्यवस्था” के अनुसार, एक व्यक्ति का जन्म कर्म और ‘शुद्धता’ के आधार पर चारों में से किसी एक जाति में होता है। जिनका जन्म ब्राह्मण वर्ण में होता है वो पुजारी या शिक्षक होता है, क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाला शासक या सैनिक; वैश्य वर्ण में जन्म लेने वाला व्यापारी और शूद्र वर्ण में जन्म लेने वाला मजदूर होता है।

अछूत सचमुच बहिष्कृत जाति है। वो किसी भी हिन्दूओं की परंपरागत “वर्ण व्यवस्था” में सीधे रुप से गिनती में नहीं आते। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार, अछूत पूरी तरह से नया वर्ग है उदाहरण के तौर पर पहले से स्थापित चार वर्णों से अलग पांचवां नया वर्ण है। इस प्रकार, अछूत हिन्दूओं की जाति व्यवस्था में पहचाने नहीं जाते।

हांलाकि, ऐतिहासिक रुप से निचले स्तर के व्यक्ति जो घटिया निम्न स्तर के नौकर-चाकर वाले कार्य करते थे, अपराधी, व्यक्ति जो छूत (छूने से फैलने वाली बीमारी) की बीमारी से पीड़ित होते थे, वो समाज से बाहर रहते थे, उन्हें ही सभ्य कहे जाने वाले नागरिकों द्वारा अछूत माना जाता था। उस समय उस व्यक्ति को समाज से निष्काषित इस आधार पर किया जाता था कि वो समाज के अन्य लोगों के लिये हानिकारक है, उसकी बीमारी छूने से किसी को भी हो सकती है और उस समय में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं था जिसकी वजह से उसे समाज से बाहर अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा के लिये रखा जाता था।

अस्पृश्यता दंड़ के रुप में भी दी जाने वाली प्रथा थी जो उन व्यक्तियों को दी जाती थी जो समाज के बनाये हुये नियमों को तोड़कर समाजिक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करते थे।

दलित कौन है?

दबी हुई जाति (दबाब में जीने वाले), हरिजनों आदि को अस्पृश्य या अछूत के रुप में जाना जाता है; लेकिन आज उन्हें दलित कहा जाता है। आधुनिक समय में, दलित, एक व्यक्ति के स्तर की अपेछा उसकी जाति को संबोधित किया जाता है। ऐसा उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अस्पृश्य कहे जाने वाले, घटिया काम करने वाले व्यक्ति के घर या उससे संबंधित किसी भी सदस्य के घर में पैदा होते है। ऐसा सिर्फ इसलिये कहा या किया जाता है कि उनके परिवार का सदस्य अछूत था तो पंपरागत रुप से उससे जुड़ा हर व्यक्ति या समुदाय भी उसी श्रेणी में आयेगा। वो अपवित्र और दूषित माने जाते है जिसके कारण शारीरिक और सामाजिकता से बाकि के समाज से निष्काषित करके पृथक या अलग रखे जाते है।

आजकल अनुसूचित जाति या जनजाति (एस.सी/एस.टी.) के सदस्यों को ‘दलित’ माना जाता है और उन्हें समाज में विभिन्न प्रकार के भेदभावों का विषय बनाया जाता है। विशेषरुप से अनुसूचित जाति जैसे चमार, पासी और भंगी को दलित के रुप में माना जाता है, ये लोग सामान्यतः निकृष्ट (निचले स्तर के काम) कामों जैसे गंदगी साफ करना, चमड़े से चीजें बनाने का काम करना, झाड़ू लगाना, कूड़े या कचरे से काम की चीजें खोजकर बेचना आदि को करते है।

 

दलित या अस्पृश्यों के साथ भेदभाव के प्रकार

नेशनल कैंपेन ऑफ दलित ह्यूमैन राइट्स (एन.सी.डी.एच.आर.) के अनुसार, भारत में दलितों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के भेदभावों को किया जाता है जो निम्न है:

  • अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करना निषेध।
  • किसी अन्य जाति के सदस्य के साथ शादी करना निषेध।
  • गाँवों में चाय के ठेलो पर दलितों के लिये चाय के अलग गिलास।
  • होटलों में बैठने की व्यवस्था में भेदभाव और खाने के लिये अलग बर्तन।
  • गाँवों में त्यौहारों और कार्यक्रमों में बैठने और खाने की अलग व्यवस्था।
  • मन्दिरों में प्रवेश पर निषेध।
  • शासित जाति के व्यक्तियों के सामने पैरों में चप्पल पहनने और छाता लगाने पर निषेध।
  • गाँवों में सार्वजनिक रास्ते पर चलना निषेध।
  • अलग शमशान (जहाँ मरे हुये व्यक्तियों को जलाया जाता है।)।
  • स्कूलों में दलित बच्चों के लिये अलग बैठने की व्यवस्था।
  • अपने कामों को करने से मना कर देने पर शासित जातियों द्वारा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन

भारत को 100 वर्षों के लम्बे दर्दनाक संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। ये संघर्ष केवल विदेशी ब्रिटिश शासन के ही खिलाफ नहीं था बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक बुराईयों जैसे छूआछूत के खिलाफ भी था। आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम के महान नेताओं ने संविधान का निर्माण करते समय निर्धारित किया कि समाज में फैली बुराईयों के उन्मूलन के संदर्भ में और पिछड़ी जातियों के उत्थान आदि के लिये संविधान में प्रावधान किया जाये।

इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुये अनुच्छेद 17 को संविधान में जोड़ा गया, जिसमें निम्न प्रावधान किये गये थे:

“अस्पृश्यता” का उन्मूलन हो और किसी भी तरह से इसे व्यवहार में लाने की अनुमति नहीं है। “अस्पृश्यता” के नाम पर किसी भी तरह का भेदभाव को अपराध मानते हुये कानून के अन्तर्गत दंड दिया जायेगा।”

इस प्रकार, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता या छूआछूत का उन्मूलन करते हुये किसी भी रुप में अपनाने की अनुमति नहीं देता। साथ ही, ये इसे एक अपराध मानते हुये संसद में बनाये गये कानूनों के अन्तर्गत दंड का भी प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 17 को संविधान में मान्यता प्रदान करने के लिये संसद में अस्पृश्यता अधिनियम 1955 पारित किया गया था। ये अधिनियम हर तरह से भेदभावों को करने पर दंड का प्रावधान करता है, यद्यपि इसके लिये निर्धारित किया गया दंड कम होने के साथ ही इसका वास्तविकता में बहुत कम ही प्रयोग किया जाता है।

 

अस्पृश्यता या छूआछूत अधिनियम 1955 के क्रियान्वयन में बहुत की कमियाँ और बचने के तरीके थे जिसके कारण सरकार ने इसमें 1976 में संशोधन करके इसके दंड को और भी अधिक कठोर कर दिया। ये अधिनियम नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम में परिवर्तित कर दिया।

हांलाकि, अस्पृश्यता का खतरा लगातार बना हुआ है और दलितों के साथ आज भी भेदभाव किया जा रहा है, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सोचनीय है, उन्हें बहुत से नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं है और इसके साथ ही वो अनेक अपराधों, अपमान और तिरस्कार के विषय है।

इसके साथ ही समाज के दलित वर्ग के साथ हिंसा को रोकने के लिये संसद ने ‘अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम 1989 (हिंसात्मक निषेधता)’ को पारित किया। ये अधिनियम दलितों के साथ भेदभाव व हिंसा को रोकने के लिये और भी अधिक विस्तृत व दंडात्मक साधन उपलब्ध कराता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य दलितों को भारतीय समाज में सम्मान के साथ शामिल करना था।

ये ऊपर वर्णित अधिनियम दलितों/अस्पृश्यों के साथ होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिये अच्छे लक्ष्य और सकारात्मक उद्देश्य के साथ बनाये गये थे लेकिन वास्तविकता में ये अधिनियम उम्मीदों पर खरे उतरने में फेल हुये है।

अस्पृश्यता या छूआछूत: वर्तमान परिदृश्य

हमारे समाज में जाति और जन्म की श्रेष्ठा की भावना आज भी उपस्थित है। हम अपने जीवन में प्रतिदिन चारों तरफ के वातावरण में विशेषरुप से ग्रामीण और कस्बों में छूआछूत के व्यवहार का अनुभव करते है। यहाँ तक कि बड़े शहरों में भी कूड़े बीनने वालों से आज भी अमानवता का व्यवहार किया जाता है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पी.टी.आई.) की 3 जनवरी 2014 की सूचना के अनुसार, कर्नाटक पुलिस ने 4 चाय विक्रेताओं को छूआ-छूत को व्यवहार में लाने के लिये गिरफ्तार किया, वो हिन्दू और एस.सी. और एस.टी. जाति के लोगों को चाय देते समय अलग-अलग तरह के कपों का प्रयोग करते थे। ये घटना दिखाती है कि ये बुराई हिन्दू समाज में इतनी गहराई तक पहुँची हुई है कि आजादी के 67 साल के बाद भी अलग-अलग रुपों में उपस्थित है।

हांलाकि, ये कहा जाता है कि चीजें धीरे धीरे बदलती है; आधुनिक युवाओं की सोच में भी परिवर्तन हुआ है। आज के युवाओं की आधुनिक शिक्षा और वैश्विकरण के परिदृश्य ने सामाजिक स्तर पर समानता के विभिन्न आयामों पर सोच को बदला है और न कि धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से।

उम्मीद यही है कि अस्पृश्यता या छूआछूत की दुष्ट प्रथा समाज से बहुत जल्द खत्म हो जायेगी जिसके बाद हमारा देश सामाजिक समानता और भाईचारे के नये युग का प्रतिनिधिकर्ता होगा जो गाँधी और अंबेडकर का वो सच्चा भारत होगा जिसकी कल्पना उन्होंने आजादी और संविधान का निर्माण करने के समय की थी।

छुआछूत एक अभिशाप पर निबंध-Untouchability in India in Hindi

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने पिछले दिनों मंदिरों में दलितों के प्रवेश निषेध को उचित ठहराते हुए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बयान का समर्थन किया है। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पिछले कुछ समय से मंदिरों में साई बाबा की पूजा-अर्चना का विरोध कर रहे हैं। वे मंदिरों से साई बाबा की मूर्तियों को हटाने की मुहिम में जुटे हैं। अब पुरी के शंकराचार्य का कहना है कि मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। ऐसी मानसिकता की प्रेरणा क्या है? द्वारका पीठ के शंकराचार्य जहां लोगों की आस्थाओं को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं पुरी के शंकराचार्य इस सनातनी राष्ट्र की बहुलतावादी मान्यताओं को कलंकित करने का प्रयास कर रहे हैं।

8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर आदि अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। हिन्दू परम्परा, दर्शन और चिंतन के प्रचार-प्रसार में चार पीठों, उत्तर में जोशी मठ, दक्षिण में शृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारका पीठ का अत्यंत महत्व है। स्वाभाविक प्रश्न है कि जिन संतों पर समाज को आध्यात्मिक राह दिखाने की जिम्मेदारी है, वे किस काल खंड में जी रहे हैं? वे किस शास्त्र के आधार पर 21वीं सदी के समाज को संचालित करने का प्रयास कर रहे हैं? ऐसा यदि किसी शास्त्र और स्मृति में है भी तो वह कालबद्ध है और उसकी कोई प्रासंगिकता शेष नहीं रह गई है।

यह सही है कि भारतीय समाज में अनेक कुरीतियां रही हैं, किन्तु उन कुरीतियों को दूर करने के लिए अनेकों सुधारवादी सद्प्रयास हुए। रामायण के रचयिता वाल्मीकि दलित थे। आज उनके द्वारा सृजित रामायण और उसके साथ तुलसीकृत रामायण हर हिन्दू परिवार में पूर्ण आस्था और श्रद्धा के साथ पढ़ी जाती है। समाज में जातिपात और छुआछूत के लिए मनुस्मृति का उदाहरण दिया जाता है। कितने हिन्दुओं ने मनुस्मृति का अध्ययन किया होगा या कितने हिन्दू घरों में मनुस्मृति रखी जाती है? मनुस्मृति का उदाहरण देकर यह कहा जाता है कि परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैर से शूद्र की उत्पत्ति हुई। फिर सारे मांगलिक अनुष्ठानों में भगवान के चरणों में ही जल, पुष्प, नैवेद्य क्यों अर्पित किया जाता है? वास्तव में देखा जाए तो हिन्दू समाज में जो कुरीतियां थीं, उसे पोषित कर समाज को तोडऩे का काम विधर्मियों ने किया। ब्रिटिश शासकों ने उसे ही अपना गुरुमंत्र बनाया और समाज को जातियों में बांटकर अपने शत्रुओं को निस्तेज करने का काम किया।

जिस पुरी के स्वामी निश्चलानंद सरस्वती पीठाधीश हैं, उसी पुरी के जगन्नाथ धाम को विधर्मियों ने 18 बार लूटा है। इसमें से 17 हमले 14वीं सदी से 18वीं सदी में हुए। स्वाभाविक रूप से उस पुरी के पीठाधीश को समाज को जोडऩे का काम करना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है। इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्वित है। इसे लेकर मंदिर प्रबंधन की लंबे समय से आलोचना भी होती रही है। संत कबीर को भी पुजारी ने मुस्लिम मानते हुए उनके मंदिर-प्रवेश की मनाही की थी। गुरु नानक देव तीर्थाटन करते हुए जब पुरी पहुंचे तो उनके साथ भी पहले यही व्यवहार हुआ क्योंकि उनके साथ मुस्लिम शिष्य मर्दाना थे। कहा जाता है कि बाद में पुरी के गजपति राजा को स्वप्न आया जिसमें स्वयं भगवान ने कहा कि दोनों मेरे परम भक्त हैं तो संत कबीर और गुरु नानक देव जी को पूर्ण सम्मान के साथ प्रभु दर्शन के लिए ले जाया गया।

ब्रितानियों ने अपने साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए भारतीय समाज को जाति और वर्गों में बांटने की नीति अपनाई। पुरी मंदिर की इस विकृति के बारे में जब ब्रितानियों को खबर लगी तो उन्होंने फौरन इसे वैधानिक स्वीकृति दे दी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेस्ले ने अपने कमांडिंग अफसर कर्नल कैंपबेल को पुरी कूच करने से पूर्व ‘ब्राह्मणों के धार्मिक पूर्वाग्रहों’ का पूर्ण ध्यान रखने के कड़े निर्देश दिए थे। उनकी कूटनीति काम कर गई। ब्रिटिश फौज जब पुरी पहुंची तो उसे कहीं से किसी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति पर चलते हुए उन्होंने गैर-हिन्दुओं के मंदिर प्रवेश पर निषेध की जो परम्परा थी, उसे 1809 में कानूनी जामा पहना दिया।

आजादी के बाद परिस्थितियां बदलनी चाहिएं थीं किन्तु न केवल पुरी, बल्कि कई अन्य जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं। सभ्य समाज के लिए इस तरह का सामाजिक भेदभाव कलंक है। किन्तु हमारे यहां स्वयं समाज के अंदर से ही सुधार की आवाजें समय-समय पर उठती रही हैं। सामाजिक कुप्रथाओं को रोकने के लिए गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, गांधी जी, डा. केशव बलिराम हेडगेवार, वीर सावरकर, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, संघ परिवार आदि करते आए हैं। मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर डा. भीमराव अम्बेदकर और वीर सावरकर ने सार्थक आंदोलन किए। सावरकर ने रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर की स्थापना की। नारायण गुरु और ज्योतिबा फूले आदि दलित थे और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुखर रहे।

हिन्दू समाज में भेदभाव और अलगाववाद का फायदा विधर्मियों को होता रहा है। जब अपने ही समाज में तिरस्कार और भेदभाव के शिकार व्यक्ति को छलावा या अन्य प्रलोभन के बल पर दूसरे मत के प्रचारक सम्मान देने का भरोसा देते हैं तो स्वाभाविक रूप से उस मत के प्रति प्रताडि़त व्यक्ति का आकर्षण भी बढ़ता है। शोषित और वंचित आदिवासी समाज में चर्च की दखल सामाजिक कार्य के लिए नहीं है। वह समाज में फैले भेदभाव का फायदा उठाकर अपने विस्तार और अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने में अपना ध्यान केन्द्रित रखे हुए है। निश्चलानंद सरस्वती जैसे विचारक वस्तुत: चर्च के मतांतरण अभियान में परोक्ष रूप से सहायक ही बनते हैं।

निश्चलानंद सरस्वती को आदि शंकराचार्य से जुड़ी एक घटना याद होगी। काशी में आदि शंकराचार्य स्नान व मंदिर जाने को निकले तो रास्ते में एक अछूत अपनी पत्नी और 4 कुत्तों के साथ खड़ा मिला। शंकराचार्य के शिष्य उनसे रास्ते से हटने को कहने लगे तो उसने कहा, ‘‘मैं कहां जाऊं? तुम्हारे अद्वैत सिद्धांत के अनुसार हर जीवात्मा परमात्मा है। मैं भला अपने से दूर कैसे जा सकता हूं?’’ आदि शंकराचार्य समझ गए। स्वयं भोलेनाथ उन्हें पाठ देने आए थे।

छुआछूत और भेदभाव का कभी कोई समर्थन नहीं कर सकता और न ही ग्रंथों में कहीं इसका उल्लेख है। उलटे सैंकड़ों प्रेरणादायक प्रसंग हैं। भगवान राम को अपनी नौका में सवार कराने वाला केवट कोई ब्राह्मण नहीं था। वह समाज के उपेक्षित वर्ग से था, किन्तु प्रभु राम ने क्या उसे दुत्कार दिया? नहीं, बल्कि उसे गले लगाया और कहा, ‘‘तुम संग सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।’’ श्री राम के हृदय में जो स्थान भरत के लिए था, वही स्थान केवट को दिया। वनवास काल में श्रीराम का तो अधिकांश समय कोलभीलों, वानरों के साथ गुजरा। उन्होंने गिद्धराज से मित्रता की, जो मांसाहारी था। ‘‘गीध अधम खग आमिश भोगी। गति दीन्हि जेहि याचत योगी,’’ उन्होंने गिद्धराज का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया।

शबरी के आश्रम में जब श्रीराम गए तो उसने अपना परिचय देते हुए कहा कि एक तो मैं कोलभील आदिवासी, ऊपर से अभागी नारी हूं। मैं बुद्धिहीन हर तरह से अधम हूं, किन्तु श्रीराम न केवल उसके भक्ति भाव से प्रसन्न हुए, बल्कि उसके जूठे बेर भी खाए। साधु-संतों का काम समाज को सही दिशा में प्रेरित करना है। इस बात में दो राय नहीं कि भारतीय समाज में अभी भी कई बुराइयां हैं और उसे दूर करने में साधु-संत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

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