आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story | Hindigk50k

आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story

आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story collection of 100+ hindi story kahaniyan short bal kahani in hindi, baccho ki kahani suno, dadi maa ki kahaniyan, bal kahaniyan, cinderella ki kahani, hindi panchatantra stories, baccho ki kahaniya aur cartoon, stories, kids story in english, moral stories, kids story books, stories for kids with pictures, short story, short stories for kids, story for kids with  moral, moral stories for childrens in hindi, infobells hindi moral stories, hindi panchatantra stories, moral stories in hindi,  story in hindi for class 1, hindi story books, story in hindi for class 4, story in hindi for class 6, panchtantra ki kahaniya.

आत्मप्रशंसा से बचें Avoid self praise Hindi Story

लंबे समय तक राज्य करने के बाद ययाति ने पुत्र को अपना सिंहासन सौंप दिया.  स्वयं वन में जाकर तप करने लने.  कठोर तप के फलस्वरूप वे स्वर्ग पहुंचे.  वे कभी देवताओं के साथ स्वर्ग में रहते और कभी ब्रह्मलोक चले जाते.

Avoid self praise Hindi Story

Avoid self praise Hindi Story

उनका इतना मान  था कि देवता भी उनसे ईर्ष्या करने लगे. वे इन्द्र की सभा में जाते तो उनके तप के प्रभाव से इन्द्र उन्हें अपने से नीचे सिंहासन पर नहीं बैठा सकते थे. अतः इन्द्र को उन्हें अपने ही आसन पर साथ बैठना पड़ता था .

यह बात इन्द्र को अप्रिय लगती थी. देवता भी मृत्यु लोक के किसी जीव के इंद्रासन पर बैठने को स्वीकार नहीं कर  पाते थे. इन्द्र देवताओं की भावना से परिचित थे.

एक दिन इन्द्र ने ययाति से कहा, “आपका पूण्य तीनों लोकों में विख्यात है. आपकी समानता भला कौन कर  सकता है.  मुझे यह जानने की इच्छा है. आपने ऐसा कौन – सा तप किया है जिसके प्रभाव से आप ब्रह्मलोक में जाकर इच्छानुसार रह सकते हैं.”

अपनी प्रशंसा सुनकर ययाति इन्द्र के शब्द जाल में आ गए.  उन्होंने कहा, “हे देवेन्द्र ! मनुष्य, गन्धर्व और ऋषियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे समान तपस्वी हो.” बस  फिर क्या था, इन्द्र का स्वर कठोर हो गया.

 

इन्द्र ने कहा, “ययाति ! “ तत्काल मेरे आसन से उठ जाओ. अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से करके तुमने अपने सारे पुण्य समाप्त कर लिए हैं. तुमने यह जाने बगैर कि देवता, मनुष्य,गन्धर्व और ऋषियों ने क्या – क्या तप किए, उनसे अपनी तुलना की और उनका तिरस्कार भी कर  दिया. अब तुम स्वर्ग से गिरोगे.” आत्मप्रशंसा ने ययाति के तप फल समाप्त कर  दिए.  वे स्वर्ग से गिरा दिए गए. इसीलिए तो कहा गया है कि प्रशंसा दूसरे  के द्वारा हो तो उत्तम है. यदि स्वयं अपनी प्रशंसा करेंगे, तो पुण्य का क्षय होकर पतन हो जाएगा.  अतः आत्मप्रशंसा से दूर ही रहना चाहिए.

आपको यह हिंदी कहानी कैसी लगी, अपने विचार कमेंट द्वारा दें. धन्यवाद!

Comments

comments

Leave a Comment

error: